शुक्रवार, 5 सितंबर 2025

समुद्रतटीय, सड़क यात्रा- मेंगलुरु से उडुपी

 

"समुद्रतटीय, सड़क यात्रा- मेंगलुरु से उडुपी"











अनेक बार कुछ ऐसी यात्राएं होती है जो यादगार हो ताउम्र मन मस्तिष्क पर अमिट छाप छोड़ जाती हैं। कुछ ऐसी ही यात्राओं मे अपनी कार से, नई दिल्ली स्थित राष्ट्रपति भवन के  के गेट से नॉर्थ और साउथ ब्लॉक से गुजर कर, विजय चौक से होते हुए इंडिया गेट तक जाना मेरा प्रिय शगल, शौक था। जिसे मैंने अपने दिल्ली प्रवास के दौरान कई बार किया। अभी पिछले दिनों 8 जुलाई 2025 को ऐसी ही मनोरंजक यात्रा को फिर से  करने का सौभाग्य मिला, जब मेंगलुरु से उडुपी की 56 किमी॰ की यात्रा राष्ट्रीय राजमार्ग से न कर समुद्र तटीय छोटी, संकरी  ग्रामीण सड़कों से होकर अपने निजी टाटा नेक्सोन से मालपे ब्रिज होकर उडुपी जाने का मौका मिला। बेंगलुरु मे इस यात्रा की तैयारी मैंने 8-10 पहले से कर ली थी। यात्रा के पढ़ाव और समुद्र तटीय गाँव के नाम भी एक पेपर पर नोट कर लिए थे। बैसे गूगल पर यात्रा का मार्ग  तो राष्ट्रीय राजमार्ग क्रमांक 66 (जो कि कन्याकुमारी को कोची होकर पनवेल से जोड़ता है) से होकर दिखा रहा था। लेकिन हमारी इच्छा तो थी कि इस शानदार राष्ट्रीय राजमार्ग को छोड़ कर समुद्र तटीय इलाके की ग्रामीण सड़कों से होकर उडुपी पहुंचे, जो समुद्र तट  से लगी इन छोटी और संकरी सड़कों से होकर गुजरती हैं। इन सड़कों के एक तरफ तो दूर दूर तक नज़र आने वाले समुद और दूसरी तरफ ग्रामीड़ घरों, नारियल के वृक्षों और कहीं कहीं तो एक तरफ समुद्र और दूसरे तरफ समुद्र मे मिलने वाली नदी के मध्य मे से होकर गुजरती हैं। लेकिन पेपर पर बनाई गयी योजना और धरातल के यथार्थ मे उतरी योजना के बीच जमीन आसमान का अंतर होने के कारण सारा प्लान फ़ेल होते दिखा। दरअसल हुआ यूं कि जब हमने कर्नाटक के मेंगलुरु के पास स्थित समुद्र तटीय गाँव को गूगल मैप मे डाला तो वह एक गाँव से दूसरे गाँव तक जाने के लिए बार-बार हमे राष्ट्रीय राजमार्ग 66 पर भेज देता, इसलिए जो योजना हमने समुद्र तटीय यात्रा के लिए बनाई थी वह धरातल पर धरी की धरी रह गयी।

लेकिन मै भी कहाँ हिम्मत हारने वाला था। मेंगलुरु से कुछ किमी नेशनल हाइवे पर चलने के बाद मैंने कार को रोक कर एक ग्रामीण से पश्चिमी दिशा मे जा रही एक संकरी सड़क के बारे मे पूंछा कि यहाँ से समुद्र तट कितनी दूर हैं? उसने बताया समुद्र तट यहाँ से लगभग 1 किमी॰ ही दूर हैं। मैंने बिना कुछ सोचे विचारे, कार को पश्चिमी दिशा मे समुद्र तट की ओर मोड़ दिया। सड़क पतली जरूर थी लेकिन ठीक ठाक थी और विपरीत दिशा से आ रहे ऑटो, कार और छोटे वाहन आसानी से क्रॉस हो रहे थे। मेरे उल्लास, उमंग और उत्साह की  सीमा उस समय न रही जब मैंने कुछ मिनटों की कार ड्राइव के बाद सामने हिलोरें मारती समुद्र की ऊंची ऊंची लहरों को सामने पाया। कुछ समय तक तो मै कार को एक तरफ खड़ा कर, समुद्र को निहारता रहा। मैं गर्जना करती समुद्र की लहरों की दहाड़, लहरों के गरजन और अठखेलियों के शोर मे कहीं गहरे तक डूब गया। कुछ समय बाद वहाँ नजदीक ही बैठे कुछ ग्रामीण लोगों से जब मैंने पूंछा कि समुद्र के किनारे जाने वाली ये संकरी सड़क कहाँ तक जाती हैं? लोग सज्जन और सरल थे, भाषा की कोई समस्या नहीं थी। उन ग्रामीणों ने प्रीतिप्रश्न करते हुए पूंछा कि आपको जाना कहाँ है? मैंने अपने मन्तव्य व्यक्त करते हुए कहा कि मेरी प्राथमिकता समुद्र तटीय सड़क मार्ग से होकर उडुपी तक यात्रा करना हैं, जिसमे दूरी, समय या खर्च कोई बाधा नहीं। हमारा उद्देश्य मात्र समुद्र के किनारे जा रही तटीय यात्रा को उपयोग करते हुए आनंद उठाना है। अपने उद्देश्य को स्पष्ट करने पर उन ग्रामीणों ने बतलाया कि ये सड़क उडुपी तक जाएगी लेकिन इसकी स्थिति ऐसे ही संकरी, पतली रहेगी, सड़क कभी गाँव के अंदर और अधिकतर समुद्र तट के समानान्तर जाएगी। बीच बीच मे कहीं कहीं, थोड़ी टूटी या खराब हो सकती है। ट्रेफिक शांत, बहुत ज्यादा वाहनों की आवाजाही नहीं मिलेगी। आप आराम से मालपे ब्रिज होकर मुख्य भूमि से उडुपी तक जा सकते हैं।               

अब क्या था स्थानीय नागरिकों की सलाह शिरोधार्य कर, मै आगे बड़ा। कुछ दूर चला ही था कि एक शानदार नज़ारा मेरे सामने था। कमल के फूल पर पद्मासन लगाये, ध्यान मुद्रा मे विराजित भगवान बुद्ध की एक सुंदर प्रतिमा समुद्र तट पर बनी थी। पीछे कुछ दूरी पर, ऊंची ऊंची समुद्र की लहरें  हिलोरें लेते हुए मन को सुकून और शांति प्रदान कर रहीं थी। प्रतिमा के सामने ही सड़क के पार एक शानदार रिज़ॉर्ट बना हुआ था, जो शायद किसी धनाढ्य व्यक्ति का प्रतीत हो रहा था। समुद्र तट भी साफ सुथरा था। काफी देर तक हम समुद्र तट पर चहल कदमी करते रहे। इच्छा तो थी कि एक दिन का प्रवास इस रिज़ॉर्ट मे कर लिया जाय पर एक तो,  इस आशय का कोई सूचना पटल नहीं दिखलाई दिया और आगे की यात्रा का कार्यक्रम भी पूर्व निश्चित होने के कारण ऐसा करना संभव नहीं था। कुछ आगे आधुनिक वास्तु का एक अनोखा मॉडल देखने को मिला। किसी कलाकार ने एक घड़े को आधा झका हुआ बनाया था शायद वो संदेश दे रहा था कि ईश्वर द्वारा प्रदत्त समुद्र से मिलने वाले प्राकृतिक धन-सम्पदा रत्न और उपहार निरंतर मानव जाति को प्राप्त होते रहे। रास्ते मे दुपहिया वाहन के साथ, एकाध कार भी नज़र आयी, लेकिन कर्नाटक राज्य परिवहन निगम की एक बस को देखकर प्रसन्नता हुई कि समुद्रतटीय ग्रामीण इलाकों मे भी राज्य सरकार, आम नागरिकों को सार्वजनिक वाहन सुविधा उपलब्ध करा अपने सामाजिक दायित्वों का निर्वहन बखूबी कर रही है।

आगे बच्चों के लिये बने पार्क मे लगे झूलों और फिसल पट्टी को देख अच्छा लगा कि गाँव के बच्चे भी सुबह शाम शायद इस मनोरंजक सुविधाओं का उपयोग करते हों, जगह जगह छोटी-मोटी किराने, गोली विसकुट, कोल्ड ड्रिंक की दुकाने तो थी, पर हरे नारियल पानी, पीने की मेरी! चाहत पूरी न हो सकी। शायद इसका कारण पर्यटकों का समुद्र तटीय सड़कों  से आना-जाना, रहा हो। शायद अधिकतर पर्यटक समुद्र तट से 1-1.5 किमी॰ दूर, समांतर चल रहे सर्वसुविधा सम्पन्न राष्ट्रीय राज मार्ग क्रमांक 66 पर चलना ज्यादा पसंद करते हों।

आगे सड़क समुद्र तट से मुड़कर ग्रामीण इलाके की ओर मुड़ गयी, लेकिन मैंने कार का चलाना  सड़क की पश्चिम दिशा मे,  समुद्र तट की ओर ही रक्खा। आगे, सड़क किनारे एक सुंदर आकर्षक रंगों से रंगे मंदिर को देख मै अनायास रुक कर मंदिर को देखने लगा! हम पति पत्नी मंदिर की साज-सज्जा को निहारने लगे। छोटे से गाँव मे किसी  परदेशी प्रवासी को देख एक ग्रामीण महिला भी स्वागत भाव से, हमारे पास आयी।  कुछ ही देर मे एक नौजवान भी पास आ गया। औपचारिक अभिवादन के बाद बातचीत का सिलसिला शुरू हो गया। लड़के ने अपना नाम गुरु प्रसाद  सालियान और महिला ने अपना नाम सम्मभवी बतलाया। उन्होने बतलाया हमारे गाँव मट्टू, जिला उडुपी का  ये मंदिर भगवान राम-सीता और हनुमान को समर्पित हैं। दोपहर मे मंदिर बंद रहता हैं। गुरु ने मंदिर खोल कर दर्शन कराने का प्रस्ताव भी किया लेकिन मैंने तय नियमों का पालन करने का आग्रह कर दोबारा उसके गाँव आने का वादा किया। सालियान ने अयोध्या, काशी, प्रयाग दर्शन की अपनी इच्छा को बतलाया। मैंने भी उसे अयोध्या यात्रा के दौरान ग्वालियर प्रवास पर आने का निमंत्रण दिया। लोग अच्छे, मिलनसार, संस्कारित  और सरल थे।

यात्रा का क्रम यूं ही आगे बढ़ रहा था समुद्र तट के बाद एक जगह तो ऐसी स्थिति बनी कि सड़क के एक तरफ उफनता समुद्र और दूसरी ओर शांत भाव से उद्यावरा, जिसे स्वर्णा  नदी भी कहते है, बह रही थी और बीच सड़क पर, मै कार ड्राइव करते हुए अपनी  अविस्मरणीय यात्रा प्रसंगों को, अपने मन रूपी खजाने मे सहेजते हुए आगे बढ़ता चला जा रहा था। स्कूलों, पंचायत और ग्रामीण स्वास्थ्य केन्द्रों से होते हुए अंत  मे हम मालपे ब्रिज पर आ पहुंचे, जो इस समुद्री तट पर बसे ग्रामीण भूमि को मुख्य भूमि, उडुपी से जोड़ता है। पुल पर चारों ओर नदी के इस मुहाने को देख मैंने एक छोटा विडियो भी बनाया जिसके दूसरी सिरे पर मछ्ली मारने वाले छोटे जहाजों की मरम्मत का यार्ड था। अब तक हम मालपे ब्रिज को पार कर उडुपी की ओर बढ़ लिये जो यहाँ से 5-6 किमी दूर था। इस तरह मैने  समुद्र तट के किनारे यात्रा करने की अपनी  इच्छा, आकांक्षा और अभिलाषा को पूरा करते हुई अपनी अविस्मरणीय यात्रा को विराम दिया।

विजय सहगल     

2 टिप्‍पणियां:

बेनामी ने कहा…

आपकी समुद्र के किनारे किनारे चलने की यात्रा का वर्णन बहुत ही सुंदर और अच्छा है मैंने पढ़कर बगैर यात्रा करे हुए भी पुरी यात्रा का आनंद ले लिया l आपका बहुत-बहुत आभार

बेनामी ने कहा…

बहुत अच्छा
आप तो राहुल सांकृत्यायन के समकक्ष निकले