शुक्रवार, 20 जून 2025

ताशीचो द्जोंग अर्थात तशीचो मठ या किला - थिंपु (भूटान)

 

"ताशीचो द्जोंग अर्थात तशीचो मठ या किला - थिंपु (भूटान)"











भूटान मे भ्रमण के दौरान, भूटान के इतिहास की पृष्ठभूमि मे तीन बड़े महापुरुष हुए हैं। पहला बौद्ध धर्म के संस्थापक भगवान श्री गौतम बुद्ध का स्थान सार्वभौमिक रूप से लिया जाता है। एक बौद्ध धर्म राष्ट्र होने के नाते जो स्वाभाविक है। भूटान मे भगवान बुद्ध के बाद दूसरे सबसे   महत्वपूर्ण स्थान भगवान पद्मसंभव जिन्हे गुरु रिन्पोछे के नाम से भी जाना जाता है। पद्मसंभव ने 8वी-9वी शताब्दी मे बौद्ध धर्म के संस्थापन के लिए तिब्बत से आकर भूटान मे बड़ी महत्वपूर्ण भूमिका अदा की थी। गुरु रिन्पोछे को भगवान बुद्ध का ही दूसरा अवतार माना जाता है। भूटान मे भी ऐसी मान्यता है कि भगवान पद्मसंभव की तरह आने वाले समय मे भगवान बुद्ध के और भी अवतार होंगे।

भूटान मे तीसरे सबसे महत्वपूर्ण  व्यक्ति के रूप मे झाबद्रुंग न्गवांग नामग्याल  का नाम आता है जिन्होने 17वी शताब्दी मे भूटान के एकीकरण मे अपनी  महत्वपूर्ण भूमिका निभायी। भूटान के प्रायः हर घर, बौद्ध मठ और  धार्मिक जोंग अर्थात किलों मे इन तीनों  महापुरुषों की प्रतिमाएँ, प्रतिरूप और प्रतिबिंब कदम कदम पर मिल जाएंगे। जहां भगवान बुद्ध और गुरु रिन्पोछे अर्थात पद्मसंभव की धार्मिक मान्यता है वही झाबद्रुंग न्गवांग नामग्याल को 17वी शताब्दी मे बिखरे हुए भूटान के एकीकरण, भूटान की सांस्कृतिक पहचान की स्थापना के लिये एक बीर योद्धा के रूप मे जाना जाता है। भूटान के लोग अपने बौद्ध मठों, मंदिरों और मोनेस्ट्री मे इन तीनों को क्रम से भगवान की तरह पूजते है। भूटान के एकीकरण के अलावा शूरवीर झाबद्रुंग न्गवांग नामग्याल को  भूटान मे दोहरी शासन प्रणाली के लिये भी जाना जाता है। शासन की इस प्रणाली मे जहां एक ओर बौद्ध धार्मिक प्रमुख जिन्हे खेंपों कहा जाता है और दूसरी  ओर भूटान के रॉयल परिवार के राजा सत्ता मे सांझीदार होते हैं। जहां एक ओर धार्मिक प्रमुख खेंपों, धार्मिक मामलों मठों और मोनेस्ट्रियों के संचालन मे सर्वप्रमुख भूमिका निभाते हैं वही शाही परिवार का राजा देश के प्रशासन के प्रमुख के रूप मे अपनी भूमिका निभाता हैं। यही कारण है कि भूटान के लोग धार्मिक प्रमुख खेंपों और अपने राजा और राजपरिवार के प्रति गहरी निष्ठा, श्रद्धा  और सम्मान रखते हैं।

हो सकता है कि उपर्युक्त कहानी से आप ऊब, उकताहट या  बोरियत महसूस करें पर भूटान मे हर छोटे-बड़े और प्रमुख मठ और मोनेस्ट्रियों मे भगवान के रूप मे बुद्ध, पद्मसंभव और झाबद्रुंग न्गवांग नामग्याल के नीचे  दो सिंहासनों मे से एक  पर वर्तमान धर्म गुरु श्री जे खेंपों और दूसरे सिंहासन पर भूटान के शाही राज परिवार की पाँचवी पीढ़ी के  श्री जिग्मे खेसर नामग्याल वांगचुक  के चित्रों को स्थापित कर अपना आदर और  सम्मान प्रकट करते है। इस वर्णन से आपको मोनेस्ट्री और बौद्ध मठों को समझने मे मदद मिलेगी।

तो आइये भूटान की राजधानी मे 27 अप्रैल 2025 की इस शानदार अपराह्न की यात्रा, थिंपु शहर मे बांग चू नदी के किनारे बने इस  शानदार, आकर्षक और महत्वपूर्ण ताशीचो द्जोंग अर्थात ताशीचो मठ या किले से करते हैं। इस किले का निर्माण सन 1641 मे किया गया था बीच मे एक-दो बार अग्नि दुर्घटना मे नष्ट हो जाने के बाद इसके वर्तमान स्वरूप के  पुनर्निर्माण का कार्य सन 1962 मे किया गया। सुर्ख स्वेत रंग से रंगे आधार और तीखे गरुए रंग से रंगे खिड़की दरवाजों के बार्डर और ऊपरी छज्जों, छत्तों को उसी गेरुए रंग की टीन से  आच्छादित ढालू दार  वास्तु निर्माण ने  मठ के भवन की सुंदरता को चार चाँद लगा दिये थे। एक विशाल वर्गाकार चबूतरे पर निर्मित यह किला भूटान की राजधानी का मुख्य प्रशासनिक केंद्र है। दो मंज़िली मुख्य इमारत के चारों कोनों तीन मंज़िला मीनारे हैं। बांग चू नदी के तट की ओर मध्य मे ऊंची सीढ़ियों पर बने, किले का प्रवेश और उस पर गहरे नीले और सफ़ेद रंग की बर्दी मे  तैनात सुरक्षा कर्मियों को देखना अच्छा लग रहा था। हमारे ग्रुप के सदस्य इस द्जोंग मे प्रवेश कर पाते कि इसके पूर्व मठ की सुरक्षा मे तैनात रॉयल भूटान पुलिस के सुरक्षा कर्मियों की अदला-बदली की सेरेमनी की परेड  भी देखने का सौभाग्य मिला।  तीन पुलिस अधिकारी अपने पारंपरिक गहरे नीले और सफ़ेद रंग की बर्दी मे मुस्तैदी से  कदमताल करते हुए अपने ठिकाने पर जाते नज़र आए।    

ग्रुप के सभी साथियों ने  सीढ़ियों से चढ़ कर, आवश्यक सुरक्षा जांच के पश्चात एक बार पुनः बनी, सीढियों से चढ़ कर किले मे प्रवेश किया। सीढ़ियों से होकर अब हम सभी लोगों के सामने एक अति विशाल आँगन था जिसके चारों ओर दो मजिला भवन बने थे। प्रत्येक मंजिल पर बने कमरों के बाहर लकड़ी के स्तंभों से निर्मित एक समान बरामदा था। भूटानी वास्तु और रंग-बिरंगे रंगो से बने ड्रेगन और अन्य भूटानी प्रतीक छज्जों, दरबाजे और खिड़कियों पर उकेरे गए थे।      भूटान देश की प्रशासनिक नीति के तहत आँगन के बायें हिस्से मे रॉयल किंग के नेतृत्व मे कार्यरत  सरकारी कार्यालय और विभाग थे जहाँ जाना निषेध था क्योंकि कार्यालय मे कर्मचारी कार्यरत थे।  वही दाहिनी ओर के दूसरे हिस्से मे धर्म प्रमुख खेंपों द्वारा सचलित  धार्मिक क्रिया कलापों का केंद्र भी इसी द्जोंग मे था, जहाँ बौद्ध भिक्षु अपने  परंपरागत वेषभूषा मे नज़र आ रहे थे। इसी धार्मिक परिसर मे बने एक विशाल कक्ष मे ऊपर वर्णित क्रमानुसार मध्य मे भगवान बुद्ध, बायें पद्मसंभव और दायीं तरफ भूटान के एकीकरण करने मे अहम भूमिका निभाने वाले राजा नामग्याल की प्रतिमा थी। नीचे बने दो सिंहासन पर वर्तमान धार्मिक प्रमुख खेंपों और वर्तमान राजा के चित्रों को सँजोया गया था। मठ की दीवारों पर भगवान बुद्ध की कथाओं को रंग बिरंगे चित्रों से उकेरा गया था जो भव्य और आकर्षक थी। कक्ष के दोनों ओर बौद्ध भिक्षुओं और बौद्ध शिक्षकों के बैठने के लिये आसन लगे हुए थे। रंग बिरंगे झंडों से पूरे कक्ष को सजाया गया था। एक विचित्र परंपरा को हमने भूटान मे नोट किया कि यहाँ अपनी सनातन परंपरा के विपरीत धार्मिक मठों मे प्रवेश पर सिर ढंकने की मनाही है। आप छाता, टोपी कैप या पल्लू सिर पर ढंकने प्रवेश वर्जित है। अपनी अपनी परंपरा और विश्वास है जिनका आदर किया ही जाना चाहिये। परिसर के मध्य मे एक केंदय टावर थी जो प्रशासनिक और धार्मिक विभागों को विभाजित करती प्रतीत हो रही था। पूरे परिसर मे बनी सभी इमारतों मे,  सफ़ेद और तीखे गेरुए रंगों के संयोजन और उनका अनुपात समान था। पूरा परिसर एकदम साफ सुथरा था। कचरे का एक भी तिनका कहीं भी दिखलाई नहीं पड़ा जो इस मठ या किले के अलंकरण को एक विशेष दर्जा देता है।

भूटान मे एक आश्चर्यजनक सत्य भी देखने को मिला। ताशीचो द्जोंग अर्थात बौद्ध मठों मे सैकड़ो की संख्या मे बौद्ध भिक्षुओं के अध्यन और अध्यापन और अनेकों बौद्ध मठों के बावजूद पूरे भूटान मे एक भी भिखारी देंखने को नहीं मिला जो अचंभित और अप्रत्याशित घटना है।   

किले की बापसी का वही रास्ता था पर वापसी मे सीढ़ियों के ऊपर बने बरामदे की दीवारों पर भगवान बुद्ध की जातक कथाएँ, तांत्रिक विध्याओं को दर्शाती आकर्षक, मनमोहक और सुखदायक  त्रिदर्शीय पेंटिंग बनी थी जिन पर विद्धुत की रोशनी को फोकस कर प्रकाशित किया गया था। विभिन्न सुंदर रंगों से रंगी इन पेंटिंग पर सुंदर सुनहरी विद्धुत प्रकाश ने सोने पर सुहागे का काम किया, जिसके कारण इन पेंटिंग की खूबसूरती मे और भी निखार आ गया था। तशिचो द्जोंग के बारे मे एक बात प्रसिद्ध हैं कि इस किले पर कभी कोई हिंसक युद्ध या लड़ाई नहीं लड़ी गयी।

अब समय था कुछ शॉपिंग और खरीद दारी करने का। मुख्य मार्केट मे जहां एक ओर ऊंची ऊंची बिल्डिंग मे बैंक, सरकारी कार्यालय और प्रतिष्ठान थे वैन सड़क के दूसरी ओर बने फुटपाथ पर छोटी-छोटी दुकाने लाइन से बनी थी जिन पर भूटान के हैंडिक्राफ्ट, पेंटिंग, छोटे उत्पाद और सजावट का सामान बिक रहा था। पूरा मार्केट अनुशासित और साफ सुथरा। दुकानों के अतिरिक्त न कोई खोमचा, रेहड़ी-पटरी वाले दिखे। न कोई भिखारी और न कोई मांगने वाला। दिल्ली की तरह थोड़ा मोलभाव यहाँ भी देखने को मिला। सारे दुकान पर महिलाओं का वर्चस्व लेकिन  अपनी पारंपरिक भूटानी भेष-भूषा में।  

इस तरह थिंपु के इस बौद्ध मठ के दर्शन-भ्रमण और ख़रीदारी मे भूटान यात्रा का एक यादगार दिन और शामिल हो गया।     

विजय सहगल          

 

    

 

1 टिप्पणी:

बेनामी ने कहा…

Ati uttam varnan kyonki m bhi iska sakhi th