"टाइगर
नेस्ट मठ,
भूटान की चुनौतीपूर्ण चढ़ाई"
"टाइगर
नेस्ट मठ,
भूटान की चुनौतीपूर्ण चढ़ाई"
2 मई 2025 को भूटान यात्रा की सबसे कठिन जगह,
पारो शहर स्थित टाइगर्स नेस्ट बौद्ध मठ के दर्शन की थी। आधार शिविर से
मठ तक की लौटा बाट दूरी 13 किमी की पहाड़ी चढ़ाई मेरे जैसे वरिष्ठ नागरिक के लिए हिमालय
पर्वत की एवरेस्ट चोटी को फतह करने से कम
न थी। मठ तक पहुँचने का पूरा मार्ग
अँग्रेजी के अक्षर N के आकार का था
अर्थात पहले आधार से सीधी खड़ी पहाड़ी की पगडंडी पर ऊपर चढ़ना फिर शीर्ष से लगभग 850
सीढ़ियाँ नीचे उतरना तत्पश्चात एक सुंदर छोटे जलप्रपात से होकर पुनः लगभग 250
सीढ़ियों की चढ़ाई कर मठ मे प्रवेश करना। रास्ता ऊबड़ खाबड़,
कच्चा, कहीं कहीं
फिसलन भरा और कहीं पथरीली चट्टानों से होकर कठिन था। यात्रा के अंतिम पढ़ाव मे सीढ़ियाँ भी
थी। पूरे रास्ता प्राकृतिक सौन्दर्य से भरपूर देवदार के ऊंचे ऊंचे हरे भरे वृक्षों
से आच्छादित। हमारे ग्रुप के ग्यारह
परिवारों मे से पूरे पूरे छह परिवारों ने तो बिना चढ़े ही अपनी पराजय स्वीकार कर
होटल मे ही आराम करने का निर्णय लिया। 22 लोगों मे से टाइगर नेस्ट की दुरूह चढ़ाई
की चुनौती स्वीकार करने वालों मे हमारे ग्रुप के छह सदस्य थे। दो परिवारों मे मै और मेरी श्रीमती रीता एवं श्री राकेश एवं
श्रीमती नलिनी सिन्हा थी, बाकी के दो
मिस्टर भाटिया और मिस्टर धवन अकेले ही इस टाइगर नेस्ट अभियान मे शामिल थे।
भूटान के सबसे प्रसिद्ध मठों मे से एक
टाइगर्स नेस्ट जिसे ताक्त्सांग भी कहा जाता हैं भूटान की पहचान है जो एक पहाड़ी पर
लटका हुआ प्रतीत होता है। टाइगर्स नेस्ट के
बारे मे भूटान मे एक किवदंती है कि बौद्ध धर्म गुरु पद्मसंभव जिन्हे रिनपोछे भी कहा जाता हैं और जिन्होने 8वी सदी मे भूटान
मे बौद्ध धर्म की शुरुआत की थी। माना जाता
है कि गुरु रिनपोछे, तिब्बत से बाघिन की पीठ
पर बैठ कर भूटान के पारो स्थित इस तक्त्सांग हिल पर पहुंचे थे। बौद्ध धर्म गुरु
पद्मसंभव अर्थात रिनपोछे ने इस स्थान पर स्थित गुफा मे 3 साल,
तीन महीने, 3 सप्ताह,
3 दिन और तीन घंटे तक तपस्या की थी इसलिये इस स्थान का नाम टाइगर्स नेस्ट पड़ा। 1692
मे इस मठ का निर्माण तत्कालीन भूटान नरेश तेनजिंग राबगे ने कराया था। टाइगर्स
नेस्ट न केवल भूटान अपितु दुनियाँ भर के बौद्ध धर्मावलंबियों के बीच,
महत्वपूर्ण धार्मिक स्थल है। यह एक
लोकप्रिय पर्यटन स्थल भी है जहां पर्यटक इस अद्भुत बौद्ध मठ को देखने आते हैं।
हम सभी लोगों ने प्रातः 7 बजे,
भूटान के पारो से लगभग 10-12 किमी दूर
टाइगर्स नेस्ट के आधार स्थल के लिए प्रस्थान किया। बस यात्रा के दौरान मेरा,
मेरे सहभागियों को सुझाव था कि हमे अपनी ऊर्जा और क्षमता को सही और संरक्षित उपयोग
करने की अत्यंत आवश्यकता होगी इसलिये आधार शिविर से लगभग 3 किमी दूर स्थित
कैफेटेरिया तक, उपलब्ध घोड़ों से यात्रा
करने की सुविधा का उपयोग करना चाहिए,
ताकि हम अपनी ऊर्जा और क्षमता का बेहतर इस्तेमाल करते हुए टाइगर्स नेस्ट तक की
यात्रा के लक्ष्य को हांसिल कर सके। यात्रा का आरंभ लगभग आधा किमी पैदल चल कर
घोडों के घुडशाल मे पहुँचना था। रास्ते मे दूर दूर तक देवदार के ऊंचे ऊंचे वृक्ष
हमारे स्वागत के लिये आतुर दिखे। एक जगह मंदिर की घण्टियों की आवाज सुनाई दी मानों
कहीं दूर देवाहन पश्चात आरती हो रही हो। ज्ञात हुआ कि बौद्ध धर्म चक्र मे लगी घंटी
को पहाड़ो से आ रही जल धाराओं से स्वचालित तरीके से संचालित किया जा रहा हैं,
जो रात दिन 24 घंटे बिना रुके देव स्तुति करतीं हैं। सभी की स्वीकृति के बाद हम जैसे ही अपने गाइड
बाँगड़ू और यात्रा मैनेजर सिद्देश के साथ
आधार शिविर की घुडशाल पहुंचे तो अपने गाइड
से, हम सभी के लिए घोड़ों का इंतजाम करने के लिए
कहा। हम सभी छह वरिष्ठ नागरिक सहयात्रियों
ने घोड़े पर सवार होकर पहले चरण, कैफेटेरिया तक
की यात्रा का श्री गणेश किया। इसके पूर्व हम सभी लकड़ी की एक-एक छड़ी लेना नहीं भूले
जिसने पूरी यात्रा मे बड़ी मदद की। यूं तो पूर्व मे केदारनाथ,
अमरनाथ आदि यात्राओं मे घोड़े से यात्रा का अनुभव था लेकिन हर घोड़े की यात्रा का
रोमांच अलग ही होता हैं।
कैफेटेरिया तक की घोड़े की यात्रा से बची
हमारी क्षमता और ऊर्जा ने आगे की यात्रा मे बड़ा सहयोग किया जिसके कारण हम
लोग शेष 9 किमी की यात्रा को पूरा कर सके। यात्रा के पहले पढ़ाव तक की सफल यात्रा
के बाद कैफेटेरिया मे मिली एक बड़े कप मे गरमागरम कॉफी और कुछ स्नेक्स ने हमे
टाइगर्स नेस्ट की यात्रा के लिये तरोताजा कर दिया। कच्ची पगडंडी मे मिट्टी की
सीढ़ियाँ लकड़ी की सहायता से बनाई गयी थी। कोई ऊंची कोई नीची और कुछ छोटी या बड़ी थी।
धीरे धीरे हमने पहाड़ पर चढ़ाई शुरू की। चढ़ाई 60 डिग्री के कोण से कहीं भी कम न थी
लेकिन कहीं-कहीं चढ़ाई 70-75 डिग्री तक थी। कभी पचास कदम का लक्ष्य ले कर आगे बढ़ते,
लेकिन अधिकतर तय कदमों से पहले ही हिम्मत
जवाब दे जाती। शुरू शुरू मे तो बैठने के लिये किसी साफ सुथरी चट्टान या पत्थर पर
विश्राम किया लेकिन ज्यों-ज्यों आगे बढ़ते शक्ति सामर्थ्य मे ह्रास स्पष्ट दिखलाई
देने लगा। अब तो विश्राम के लिये धूल धूसरित जगह की परवाह किए बिना,
कहीं भी आराम के लिये बैठक शुरू हो गयी। पीने के पानी की बोतल भी बोझ सी लगने लगी। यात्रा मे आम,
संतरे और नीबू की गोलियों को चूसने से लगातार ऊर्जा प्राप्त होती रही। थोड़ी थोड़ी
दूर पर दो-दो घूंट पानी ने भी गले को सूखने नहीं दिया। शारीरिक शिथिलता को दूर
करने के लिये पिट्ठू बैग मे रक्खे सेंडबिच और सेव का सेवन लाभप्रद रहा क्योंकि
हैवी खाना यात्रा मे बिघ्न डाल सकता था। इस समय उस अँग्रेजी कहावत ने बड़ी प्रेरणा
मिली कि धीरे-धीरे लेकिन लगातार स्थिरता
से दौड़ जीती जा सकती है। लेकिन बचपन मे पढ़ी खरगोश और कछुए की उस कहानी की भी खूब
याद किया और दोनों से प्रेरणा लेते हुए कछुआ चाल चलते हुए धीरे धीरे आगे बढ़े और
खरगोश की तरह थोड़ा थोड़ा विश्राम भी किया,
हार-जीत का कोई डर यहाँ नहीं था,
क्योंकि इस रेस मे कोई प्रतियोगिता नहीं थी। इन्ही सब विचारों की सकारात्मक सोच के
साथ अब तक हम पहाड़ की उस सबसे ऊंची चोटी पर पहुँच गए थे जहां से हमे लगभग 850
सीढ़ियों से नीचे उतरना था। टाइगर्स नेस्ट के पहाड़ी पर सामने दिख रहे बौद्ध मठ को देखना बड़ा अद्भुद और
रोमांचकारी अनुभव था। बौद्ध मठ का जो दृश्य पहाड़ी की इस चोटी से जितना सुंदर,
नयांभिराम सुखदायक दिखाई दिया, बैसा कदाचित ही
बौद्ध मठ से देखने को मिलता। पहाड़ी की इस चोटी से ऐसा लगा काश उड़ कर सीधे
मोनेस्ट्री मे पहुँच पाता!! कुछ मिनिट इस मनोहारी दृश्य को अपनी आँखों के माध्यम
से अपने अन्तः चेतना पटल पर अंकित करने का जतन करते हुए कुछ तस्वीरें मोबाइल से भी
निकली। सीढ़ियों से उतरना तो सहज सरल था कुछ समय बाद हम उस सेतु पर थे जो
मोनेस्ट्री को मुख्य पहाड़ से जोड़ता था। पहाड़ की चोटी से पुल के बीच मे बह रहे झरने
और उस से निकल रहीं फुहारों ने मानों शरीर
की पूरी थकान को ही तिरोहित कर दिया। कुछ समय ऊपर से गिरते हुए झरने को निहार कर,
शरीर मे पुनः ऊर्जा के नवीन संचय भंडार को महसूस किया। पूरी यात्रा के दौरान
सैकड़ों लोग आते जाते दिखे। बच्चे और नौजवानों की संख्या बहुतायत मे थी। कभी हम
उन्हे सराहते और कभी युवा और नौजवान हमारी क्षमता और दृढ़ इच्छा शक्ति की सराहना
करते। अब हमारी मंजिल चंद कदमों दूर हमारे सामने थी। तभी हल्की बूँदा-बाँदी और
छोटे छोटे ओलो ने मानो लक्ष्य पाने की खुशी मे हमारा अभिनन्दन किया हो। हम चढ़ते
हुए अब मठ के प्रवेश द्वार पर थे। चूंकि बौद्ध मठ मे मोबाइल और कैमरा ले जाना निषेध
अतः आगे वर्णन मन की आँखों देखि। आगे कुछ लोग द्वार के नजदीक बनी छोटी सी चट्टान
पर बने अंगूठे के निशान को आँख बंद कर
अपने अंगूठे से बेधने का प्रयास कर रहे थे। सफल बेधन उस भक्त की मनोकामना पूर्ण होने का संकेत थी।
मेरे क्रम पर मैंने सविनय उस अंगूठा को स्पर्श करने को इंकार कर दिया कि उम्र के
इस पढ़ाव पर अब ऐसी कोई महत्वाकांक्षा या मनोकामना नहीं हैं। हमारे गाइड और टूर मैनेजर जो
नौजवान युवा थे हमसे पहले पहुँच कर हमारा इंतज़ार कर रहे थे। लगभग 45 मिनिट के प्रवास
पर तीन बौद्ध मठों मे भगवान बुद्ध,
पद्मसंभव और भूटान के एकीकरण करने वाले झाबद्रुंग न्गवांग नामग्याल की प्रतिमाओं को नमन किया। पारंपरिक बौद्ध सन्यासियों को "कुजू जाम्बोला" कह अभिवादन किया और उनकी मधुर
मुस्कान को आशीर्वाद के रूप मे ग्रहण कर अपनी बापसी की यात्रा शुरू की।
बापसी मे जिन 850 सीढ़ियों से सहजता से उतरे थे, सिवाय उन के चढ़ने के अलावा कोई
बड़ी चुनौती नहीं थी। जैसे तैसे उन सीढ़ियों को चढ़ा और वहाँ पहुँच गया जहां से बापसी
की पगडंडी शुरू होनी थी। अब तो दिमाग मे मोनेस्ट्री के दर्शन का भी कोई तनाव नहीं
था सिर्फ और सिर्फ ढलान पर उतरना ही था। लेकिन वर्षात के बाद फिसलन होने से एवं ढलान के कारण श्रीमती जी एक दो बार लुढ़कते
लुढ़कते बचीं लेकिन एक जगह तो लुढ़क ही गयी। बो तो अच्छा था हमारा गाइड बाँगड़ू जी
पीछे पीछे आ रहे थे तुरंत दौड़ कर उन्हे सम्हाला। आधार शिविर तक आते आते शरीर की
हालात निढाल हो कर जबाब दे रहे थे। बापस आकार बस मे ऐसे बैठे कि थक कर शांत बैठ
गये। उस दिन के गूगल फिट एप्प मे 2 मई की चली गयी दूरी 11.69 किमी॰ दर्शा रही थी जिसमे
घोड़े से की गयी यात्रा शामिल नहीं थी और पूरे पैदल उपक्रम मे 304 मिनिट अर्थात 5 घंटे
4 मिनिट की पैदल यात्रा हुई। आप इससे सरलता से अंदाजा लगा सकते हैं कि हम लोगो की क्या
हालत रही होगी।
टूर मैनेजर और गाइड हमारे ग्रुप के साथ लगातार
संपर्क मे थे जैसे ही हम सभी छह लोग होटल पहुंचे तो हमारे ग्रुप के उन लोगो ने
लाइन से खड़े होकर तालियाँ बजा कर हम लोगो
की जो हौसला अफजाई करते हुए स्वागत किया जो टाइगर्स नेस्ट नहीं गए थे। ऐसे स्वागत अभिनंदन
की उम्मीद नहीं थी। बैसे टाइगर्स नेस्ट की
इस यात्रा को हम एक सामान्य यात्रा मान कर चल रहे थे लेकिन ग्रुप के सदस्यों के
शानदार और यादगार स्वागत ने इसे अविस्मरणीय घटना बना दिया और हमे ऐसा लगा वास्तव
मे हम हिमालय पर्वत की एवरेस्ट चोटी पर विजय प्राप्त कर बापस आयें हों। धन्यवाद!! बारबार
धन्यवाद!! मेरे ग्रुप के सभी सदस्यों का!!
विजय सहगल


























