शुक्रवार, 27 जून 2025

टाइगर नेस्ट मठ, भूटान की चुनौतीपूर्ण चढ़ाई

 

"टाइगर नेस्ट मठ, भूटान की चुनौतीपूर्ण चढ़ाई"











"टाइगर नेस्ट मठ, भूटान की चुनौतीपूर्ण चढ़ाई"

2 मई 2025 को भूटान यात्रा की सबसे कठिन जगह, पारो शहर स्थित  टाइगर्स  नेस्ट बौद्ध मठ के दर्शन की थी। आधार शिविर से मठ तक की लौटा बाट दूरी 13 किमी की पहाड़ी चढ़ाई मेरे जैसे वरिष्ठ नागरिक के लिए हिमालय पर्वत की  एवरेस्ट चोटी को फतह करने से कम न थी। मठ तक पहुँचने का पूरा मार्ग  अँग्रेजी के अक्षर N के आकार का था अर्थात पहले आधार से सीधी खड़ी पहाड़ी की  पगडंडी पर ऊपर चढ़ना फिर शीर्ष से लगभग 850 सीढ़ियाँ नीचे उतरना तत्पश्चात एक सुंदर छोटे जलप्रपात से होकर पुनः लगभग 250 सीढ़ियों की चढ़ाई कर मठ मे प्रवेश करना। रास्ता ऊबड़ खाबड़, कच्चा, कहीं कहीं  फिसलन भरा और कहीं पथरीली चट्टानों से होकर  कठिन था। यात्रा के अंतिम पढ़ाव मे सीढ़ियाँ भी थी। पूरे रास्ता प्राकृतिक सौन्दर्य से भरपूर देवदार के ऊंचे ऊंचे हरे भरे वृक्षों से आच्छादित।  हमारे ग्रुप के ग्यारह परिवारों मे से पूरे पूरे छह परिवारों ने तो बिना चढ़े ही अपनी पराजय स्वीकार कर होटल मे ही आराम करने का निर्णय लिया। 22 लोगों मे से टाइगर नेस्ट की दुरूह चढ़ाई की चुनौती स्वीकार करने वालों मे हमारे ग्रुप के छह सदस्य थे। दो परिवारों मे  मै और मेरी श्रीमती रीता एवं श्री राकेश एवं श्रीमती नलिनी सिन्हा थी, बाकी के दो मिस्टर भाटिया और मिस्टर धवन अकेले ही इस टाइगर नेस्ट अभियान मे शामिल थे।

भूटान के सबसे प्रसिद्ध मठों मे से एक टाइगर्स नेस्ट जिसे ताक्त्सांग भी कहा जाता हैं भूटान की पहचान है जो एक पहाड़ी पर लटका हुआ प्रतीत होता है। टाइगर्स नेस्ट  के बारे मे भूटान मे एक किवदंती है कि बौद्ध धर्म गुरु पद्मसंभव जिन्हे रिनपोछे  भी कहा जाता हैं और जिन्होने 8वी सदी मे भूटान मे बौद्ध धर्म की शुरुआत की थी। माना  जाता है कि गुरु रिनपोछे, तिब्बत से बाघिन की पीठ पर बैठ कर भूटान के पारो स्थित इस तक्त्सांग हिल पर पहुंचे थे। बौद्ध धर्म गुरु पद्मसंभव अर्थात रिनपोछे ने इस स्थान पर स्थित गुफा मे 3 साल, तीन महीने, 3 सप्ताह, 3 दिन और तीन घंटे तक तपस्या की थी इसलिये इस स्थान का नाम टाइगर्स नेस्ट पड़ा। 1692 मे इस मठ का निर्माण तत्कालीन भूटान नरेश तेनजिंग राबगे ने कराया था। टाइगर्स नेस्ट न केवल भूटान अपितु दुनियाँ भर के बौद्ध धर्मावलंबियों के बीच, महत्वपूर्ण धार्मिक स्थल है। यह  एक लोकप्रिय पर्यटन स्थल भी है जहां पर्यटक इस अद्भुत  बौद्ध मठ को देखने आते हैं।  

हम सभी लोगों ने  प्रातः 7 बजे, भूटान के  पारो से लगभग 10-12 किमी दूर टाइगर्स नेस्ट के आधार स्थल के लिए प्रस्थान किया। बस यात्रा के दौरान मेरा, मेरे सहभागियों को सुझाव था कि हमे अपनी ऊर्जा और क्षमता को सही और संरक्षित उपयोग करने की अत्यंत आवश्यकता होगी इसलिये आधार शिविर से लगभग 3 किमी दूर स्थित कैफेटेरिया तक, उपलब्ध घोड़ों से यात्रा करने की सुविधा का उपयोग करना  चाहिए, ताकि हम अपनी ऊर्जा और क्षमता का बेहतर इस्तेमाल करते हुए टाइगर्स नेस्ट तक की यात्रा के लक्ष्य को हांसिल कर सके। यात्रा का आरंभ लगभग आधा किमी पैदल चल कर घोडों के घुडशाल मे पहुँचना था। रास्ते मे दूर दूर तक देवदार के ऊंचे ऊंचे वृक्ष हमारे स्वागत के लिये आतुर दिखे। एक जगह मंदिर की घण्टियों की आवाज सुनाई दी मानों कहीं दूर देवाहन पश्चात आरती हो रही हो। ज्ञात हुआ कि बौद्ध धर्म चक्र मे लगी घंटी को पहाड़ो से आ रही जल धाराओं से स्वचालित तरीके से संचालित किया जा रहा हैं, जो रात दिन 24 घंटे बिना रुके देव स्तुति करतीं हैं।  सभी की स्वीकृति के बाद हम जैसे ही अपने गाइड बाँगड़ू  और यात्रा मैनेजर सिद्देश के साथ आधार शिविर की घुडशाल  पहुंचे तो अपने गाइड से, हम सभी के लिए घोड़ों का इंतजाम करने के लिए कहा। हम सभी छह वरिष्ठ नागरिक  सहयात्रियों ने घोड़े पर सवार होकर पहले चरण, कैफेटेरिया तक की यात्रा का श्री गणेश किया। इसके पूर्व हम सभी लकड़ी की एक-एक छड़ी लेना नहीं भूले जिसने पूरी यात्रा मे बड़ी मदद की। यूं तो पूर्व मे केदारनाथ, अमरनाथ आदि यात्राओं मे घोड़े से यात्रा का अनुभव था लेकिन हर घोड़े की यात्रा का रोमांच अलग ही होता हैं।                   

कैफेटेरिया तक की घोड़े की यात्रा से  बची  हमारी क्षमता और ऊर्जा ने आगे की यात्रा मे बड़ा सहयोग किया जिसके कारण हम लोग शेष 9 किमी की यात्रा को पूरा कर सके। यात्रा के पहले पढ़ाव तक की सफल यात्रा के बाद कैफेटेरिया मे मिली एक बड़े कप मे गरमागरम कॉफी और कुछ स्नेक्स ने हमे टाइगर्स नेस्ट की यात्रा के लिये तरोताजा कर दिया। कच्ची पगडंडी मे मिट्टी की सीढ़ियाँ लकड़ी की सहायता से बनाई गयी थी। कोई ऊंची कोई नीची और कुछ छोटी या बड़ी थी। धीरे धीरे हमने पहाड़ पर चढ़ाई शुरू की। चढ़ाई 60 डिग्री के कोण से कहीं भी कम न थी लेकिन कहीं-कहीं चढ़ाई 70-75 डिग्री तक थी। कभी पचास कदम का लक्ष्य ले कर आगे बढ़ते, लेकिन अधिकतर  तय कदमों से पहले ही हिम्मत जवाब दे जाती। शुरू शुरू मे तो बैठने के लिये किसी साफ सुथरी चट्टान या पत्थर पर विश्राम किया लेकिन ज्यों-ज्यों आगे बढ़ते शक्ति सामर्थ्य मे ह्रास स्पष्ट दिखलाई देने लगा। अब तो विश्राम के लिये धूल धूसरित जगह की परवाह किए बिना, कहीं भी आराम के लिये बैठक शुरू हो गयी। पीने के पानी की बोतल भी  बोझ सी लगने  लगी। यात्रा मे आम, संतरे और नीबू की गोलियों को चूसने से लगातार ऊर्जा प्राप्त होती रही। थोड़ी थोड़ी दूर पर दो-दो घूंट पानी ने भी गले को सूखने नहीं दिया। शारीरिक शिथिलता को दूर करने के लिये पिट्ठू बैग मे रक्खे सेंडबिच और सेव का सेवन लाभप्रद रहा क्योंकि हैवी खाना यात्रा मे बिघ्न डाल सकता था। इस समय उस अँग्रेजी कहावत ने बड़ी प्रेरणा मिली कि धीरे-धीरे लेकिन लगातार  स्थिरता से दौड़ जीती जा सकती है। लेकिन बचपन मे पढ़ी खरगोश और कछुए की उस कहानी की भी खूब याद किया और दोनों से प्रेरणा लेते हुए कछुआ चाल चलते हुए धीरे धीरे आगे बढ़े और खरगोश की तरह थोड़ा थोड़ा विश्राम भी किया, हार-जीत का कोई डर यहाँ  नहीं था, क्योंकि इस रेस मे कोई प्रतियोगिता नहीं थी। इन्ही सब विचारों की सकारात्मक सोच के साथ अब तक हम पहाड़ की उस सबसे ऊंची चोटी पर पहुँच गए थे जहां से हमे लगभग 850 सीढ़ियों से नीचे उतरना था। टाइगर्स नेस्ट के पहाड़ी पर  सामने दिख रहे बौद्ध मठ को देखना बड़ा अद्भुद और रोमांचकारी अनुभव था। बौद्ध मठ का जो दृश्य पहाड़ी की इस चोटी से जितना सुंदर, नयांभिराम सुखदायक दिखाई दिया, बैसा कदाचित ही बौद्ध मठ से देखने को मिलता। पहाड़ी की इस चोटी से ऐसा लगा काश उड़ कर सीधे मोनेस्ट्री मे पहुँच पाता!! कुछ मिनिट इस मनोहारी दृश्य को अपनी आँखों के माध्यम से अपने अन्तः चेतना पटल पर अंकित करने का जतन करते हुए कुछ तस्वीरें मोबाइल से भी निकली। सीढ़ियों से उतरना तो सहज सरल था कुछ समय बाद हम उस सेतु पर थे जो मोनेस्ट्री को मुख्य पहाड़ से जोड़ता था। पहाड़ की चोटी से पुल के बीच मे बह रहे झरने और उस  से निकल रहीं फुहारों ने मानों शरीर की पूरी थकान को ही तिरोहित कर दिया। कुछ समय ऊपर से गिरते हुए झरने को निहार कर, शरीर मे पुनः ऊर्जा के नवीन संचय भंडार को महसूस किया। पूरी यात्रा के दौरान सैकड़ों लोग आते जाते दिखे। बच्चे और नौजवानों की संख्या बहुतायत मे थी। कभी हम उन्हे सराहते और कभी युवा और नौजवान हमारी क्षमता और दृढ़ इच्छा शक्ति की सराहना करते। अब हमारी मंजिल चंद कदमों दूर हमारे सामने थी। तभी हल्की बूँदा-बाँदी और छोटे छोटे ओलो ने मानो लक्ष्य पाने की खुशी मे हमारा अभिनन्दन किया हो। हम चढ़ते हुए अब मठ के प्रवेश द्वार पर थे। चूंकि बौद्ध मठ मे मोबाइल और कैमरा ले जाना निषेध अतः आगे वर्णन मन की आँखों देखि। आगे कुछ लोग द्वार के नजदीक बनी छोटी सी चट्टान पर बने अंगूठे के निशान को आँख  बंद कर अपने अंगूठे से बेधने का प्रयास कर रहे थे। सफल बेधन  उस भक्त की मनोकामना पूर्ण होने का संकेत थी। मेरे क्रम पर मैंने सविनय उस अंगूठा को स्पर्श करने को इंकार कर दिया कि उम्र के इस पढ़ाव पर अब  ऐसी कोई महत्वाकांक्षा या  मनोकामना नहीं हैं। हमारे गाइड और टूर मैनेजर जो नौजवान युवा थे हमसे पहले पहुँच कर हमारा इंतज़ार कर रहे थे। लगभग 45 मिनिट के प्रवास पर तीन बौद्ध मठों मे भगवान बुद्ध, पद्मसंभव और भूटान के एकीकरण करने वाले झाबद्रुंग न्गवांग नामग्याल की प्रतिमाओं को नमन किया। पारंपरिक बौद्ध सन्यासियों को "कुजू जाम्बोला" कह अभिवादन किया और उनकी मधुर मुस्कान को आशीर्वाद के रूप मे ग्रहण कर अपनी बापसी की यात्रा शुरू की।

बापसी मे जिन 850 सीढ़ियों से  सहजता से उतरे थे, सिवाय उन के  चढ़ने के अलावा कोई बड़ी चुनौती नहीं थी। जैसे तैसे उन सीढ़ियों को चढ़ा और वहाँ पहुँच गया जहां से बापसी की पगडंडी शुरू होनी थी। अब तो दिमाग मे मोनेस्ट्री के दर्शन का भी कोई तनाव नहीं था सिर्फ और सिर्फ ढलान पर उतरना ही था। लेकिन वर्षात के बाद फिसलन होने से एवं  ढलान के कारण श्रीमती जी एक दो बार लुढ़कते लुढ़कते बचीं लेकिन एक जगह तो लुढ़क ही गयी। बो तो अच्छा था हमारा गाइड बाँगड़ू जी पीछे पीछे आ रहे थे तुरंत दौड़ कर उन्हे सम्हाला। आधार शिविर तक आते आते शरीर की हालात निढाल हो कर जबाब दे रहे थे। बापस आकार बस मे ऐसे बैठे कि थक कर शांत बैठ गये। उस दिन के गूगल फिट एप्प मे 2 मई की चली गयी दूरी 11.69 किमी॰ दर्शा रही थी जिसमे घोड़े से की गयी यात्रा शामिल नहीं थी और पूरे पैदल उपक्रम मे 304 मिनिट अर्थात 5 घंटे 4 मिनिट की पैदल यात्रा हुई। आप इससे सरलता से अंदाजा लगा सकते हैं कि हम लोगो की क्या हालत रही होगी।  

टूर मैनेजर और गाइड हमारे ग्रुप के साथ लगातार संपर्क मे थे जैसे ही हम सभी छह लोग होटल पहुंचे तो हमारे ग्रुप के उन लोगो ने लाइन से  खड़े होकर तालियाँ बजा कर हम लोगो की जो हौसला अफजाई करते हुए स्वागत किया जो टाइगर्स नेस्ट नहीं गए थे। ऐसे स्वागत अभिनंदन की उम्मीद नहीं थी।  बैसे टाइगर्स नेस्ट की इस यात्रा को हम एक सामान्य यात्रा मान कर चल रहे थे लेकिन ग्रुप के सदस्यों के शानदार और यादगार स्वागत ने इसे अविस्मरणीय घटना बना दिया और हमे ऐसा लगा वास्तव मे हम हिमालय पर्वत की एवरेस्ट चोटी पर विजय प्राप्त कर बापस आयें हों। धन्यवाद!! बारबार धन्यवाद!! मेरे ग्रुप के सभी  सदस्यों का!!  

विजय सहगल    



शुक्रवार, 20 जून 2025

ताशीचो द्जोंग अर्थात तशीचो मठ या किला - थिंपु (भूटान)

 

"ताशीचो द्जोंग अर्थात तशीचो मठ या किला - थिंपु (भूटान)"











भूटान मे भ्रमण के दौरान, भूटान के इतिहास की पृष्ठभूमि मे तीन बड़े महापुरुष हुए हैं। पहला बौद्ध धर्म के संस्थापक भगवान श्री गौतम बुद्ध का स्थान सार्वभौमिक रूप से लिया जाता है। एक बौद्ध धर्म राष्ट्र होने के नाते जो स्वाभाविक है। भूटान मे भगवान बुद्ध के बाद दूसरे सबसे   महत्वपूर्ण स्थान भगवान पद्मसंभव जिन्हे गुरु रिन्पोछे के नाम से भी जाना जाता है। पद्मसंभव ने 8वी-9वी शताब्दी मे बौद्ध धर्म के संस्थापन के लिए तिब्बत से आकर भूटान मे बड़ी महत्वपूर्ण भूमिका अदा की थी। गुरु रिन्पोछे को भगवान बुद्ध का ही दूसरा अवतार माना जाता है। भूटान मे भी ऐसी मान्यता है कि भगवान पद्मसंभव की तरह आने वाले समय मे भगवान बुद्ध के और भी अवतार होंगे।

भूटान मे तीसरे सबसे महत्वपूर्ण  व्यक्ति के रूप मे झाबद्रुंग न्गवांग नामग्याल  का नाम आता है जिन्होने 17वी शताब्दी मे भूटान के एकीकरण मे अपनी  महत्वपूर्ण भूमिका निभायी। भूटान के प्रायः हर घर, बौद्ध मठ और  धार्मिक जोंग अर्थात किलों मे इन तीनों  महापुरुषों की प्रतिमाएँ, प्रतिरूप और प्रतिबिंब कदम कदम पर मिल जाएंगे। जहां भगवान बुद्ध और गुरु रिन्पोछे अर्थात पद्मसंभव की धार्मिक मान्यता है वही झाबद्रुंग न्गवांग नामग्याल को 17वी शताब्दी मे बिखरे हुए भूटान के एकीकरण, भूटान की सांस्कृतिक पहचान की स्थापना के लिये एक बीर योद्धा के रूप मे जाना जाता है। भूटान के लोग अपने बौद्ध मठों, मंदिरों और मोनेस्ट्री मे इन तीनों को क्रम से भगवान की तरह पूजते है। भूटान के एकीकरण के अलावा शूरवीर झाबद्रुंग न्गवांग नामग्याल को  भूटान मे दोहरी शासन प्रणाली के लिये भी जाना जाता है। शासन की इस प्रणाली मे जहां एक ओर बौद्ध धार्मिक प्रमुख जिन्हे खेंपों कहा जाता है और दूसरी  ओर भूटान के रॉयल परिवार के राजा सत्ता मे सांझीदार होते हैं। जहां एक ओर धार्मिक प्रमुख खेंपों, धार्मिक मामलों मठों और मोनेस्ट्रियों के संचालन मे सर्वप्रमुख भूमिका निभाते हैं वही शाही परिवार का राजा देश के प्रशासन के प्रमुख के रूप मे अपनी भूमिका निभाता हैं। यही कारण है कि भूटान के लोग धार्मिक प्रमुख खेंपों और अपने राजा और राजपरिवार के प्रति गहरी निष्ठा, श्रद्धा  और सम्मान रखते हैं।

हो सकता है कि उपर्युक्त कहानी से आप ऊब, उकताहट या  बोरियत महसूस करें पर भूटान मे हर छोटे-बड़े और प्रमुख मठ और मोनेस्ट्रियों मे भगवान के रूप मे बुद्ध, पद्मसंभव और झाबद्रुंग न्गवांग नामग्याल के नीचे  दो सिंहासनों मे से एक  पर वर्तमान धर्म गुरु श्री जे खेंपों और दूसरे सिंहासन पर भूटान के शाही राज परिवार की पाँचवी पीढ़ी के  श्री जिग्मे खेसर नामग्याल वांगचुक  के चित्रों को स्थापित कर अपना आदर और  सम्मान प्रकट करते है। इस वर्णन से आपको मोनेस्ट्री और बौद्ध मठों को समझने मे मदद मिलेगी।

तो आइये भूटान की राजधानी मे 27 अप्रैल 2025 की इस शानदार अपराह्न की यात्रा, थिंपु शहर मे बांग चू नदी के किनारे बने इस  शानदार, आकर्षक और महत्वपूर्ण ताशीचो द्जोंग अर्थात ताशीचो मठ या किले से करते हैं। इस किले का निर्माण सन 1641 मे किया गया था बीच मे एक-दो बार अग्नि दुर्घटना मे नष्ट हो जाने के बाद इसके वर्तमान स्वरूप के  पुनर्निर्माण का कार्य सन 1962 मे किया गया। सुर्ख स्वेत रंग से रंगे आधार और तीखे गरुए रंग से रंगे खिड़की दरवाजों के बार्डर और ऊपरी छज्जों, छत्तों को उसी गेरुए रंग की टीन से  आच्छादित ढालू दार  वास्तु निर्माण ने  मठ के भवन की सुंदरता को चार चाँद लगा दिये थे। एक विशाल वर्गाकार चबूतरे पर निर्मित यह किला भूटान की राजधानी का मुख्य प्रशासनिक केंद्र है। दो मंज़िली मुख्य इमारत के चारों कोनों तीन मंज़िला मीनारे हैं। बांग चू नदी के तट की ओर मध्य मे ऊंची सीढ़ियों पर बने, किले का प्रवेश और उस पर गहरे नीले और सफ़ेद रंग की बर्दी मे  तैनात सुरक्षा कर्मियों को देखना अच्छा लग रहा था। हमारे ग्रुप के सदस्य इस द्जोंग मे प्रवेश कर पाते कि इसके पूर्व मठ की सुरक्षा मे तैनात रॉयल भूटान पुलिस के सुरक्षा कर्मियों की अदला-बदली की सेरेमनी की परेड  भी देखने का सौभाग्य मिला।  तीन पुलिस अधिकारी अपने पारंपरिक गहरे नीले और सफ़ेद रंग की बर्दी मे मुस्तैदी से  कदमताल करते हुए अपने ठिकाने पर जाते नज़र आए।    

ग्रुप के सभी साथियों ने  सीढ़ियों से चढ़ कर, आवश्यक सुरक्षा जांच के पश्चात एक बार पुनः बनी, सीढियों से चढ़ कर किले मे प्रवेश किया। सीढ़ियों से होकर अब हम सभी लोगों के सामने एक अति विशाल आँगन था जिसके चारों ओर दो मजिला भवन बने थे। प्रत्येक मंजिल पर बने कमरों के बाहर लकड़ी के स्तंभों से निर्मित एक समान बरामदा था। भूटानी वास्तु और रंग-बिरंगे रंगो से बने ड्रेगन और अन्य भूटानी प्रतीक छज्जों, दरबाजे और खिड़कियों पर उकेरे गए थे।      भूटान देश की प्रशासनिक नीति के तहत आँगन के बायें हिस्से मे रॉयल किंग के नेतृत्व मे कार्यरत  सरकारी कार्यालय और विभाग थे जहाँ जाना निषेध था क्योंकि कार्यालय मे कर्मचारी कार्यरत थे।  वही दाहिनी ओर के दूसरे हिस्से मे धर्म प्रमुख खेंपों द्वारा सचलित  धार्मिक क्रिया कलापों का केंद्र भी इसी द्जोंग मे था, जहाँ बौद्ध भिक्षु अपने  परंपरागत वेषभूषा मे नज़र आ रहे थे। इसी धार्मिक परिसर मे बने एक विशाल कक्ष मे ऊपर वर्णित क्रमानुसार मध्य मे भगवान बुद्ध, बायें पद्मसंभव और दायीं तरफ भूटान के एकीकरण करने मे अहम भूमिका निभाने वाले राजा नामग्याल की प्रतिमा थी। नीचे बने दो सिंहासन पर वर्तमान धार्मिक प्रमुख खेंपों और वर्तमान राजा के चित्रों को सँजोया गया था। मठ की दीवारों पर भगवान बुद्ध की कथाओं को रंग बिरंगे चित्रों से उकेरा गया था जो भव्य और आकर्षक थी। कक्ष के दोनों ओर बौद्ध भिक्षुओं और बौद्ध शिक्षकों के बैठने के लिये आसन लगे हुए थे। रंग बिरंगे झंडों से पूरे कक्ष को सजाया गया था। एक विचित्र परंपरा को हमने भूटान मे नोट किया कि यहाँ अपनी सनातन परंपरा के विपरीत धार्मिक मठों मे प्रवेश पर सिर ढंकने की मनाही है। आप छाता, टोपी कैप या पल्लू सिर पर ढंकने प्रवेश वर्जित है। अपनी अपनी परंपरा और विश्वास है जिनका आदर किया ही जाना चाहिये। परिसर के मध्य मे एक केंदय टावर थी जो प्रशासनिक और धार्मिक विभागों को विभाजित करती प्रतीत हो रही था। पूरे परिसर मे बनी सभी इमारतों मे,  सफ़ेद और तीखे गेरुए रंगों के संयोजन और उनका अनुपात समान था। पूरा परिसर एकदम साफ सुथरा था। कचरे का एक भी तिनका कहीं भी दिखलाई नहीं पड़ा जो इस मठ या किले के अलंकरण को एक विशेष दर्जा देता है।

भूटान मे एक आश्चर्यजनक सत्य भी देखने को मिला। ताशीचो द्जोंग अर्थात बौद्ध मठों मे सैकड़ो की संख्या मे बौद्ध भिक्षुओं के अध्यन और अध्यापन और अनेकों बौद्ध मठों के बावजूद पूरे भूटान मे एक भी भिखारी देंखने को नहीं मिला जो अचंभित और अप्रत्याशित घटना है।   

किले की बापसी का वही रास्ता था पर वापसी मे सीढ़ियों के ऊपर बने बरामदे की दीवारों पर भगवान बुद्ध की जातक कथाएँ, तांत्रिक विध्याओं को दर्शाती आकर्षक, मनमोहक और सुखदायक  त्रिदर्शीय पेंटिंग बनी थी जिन पर विद्धुत की रोशनी को फोकस कर प्रकाशित किया गया था। विभिन्न सुंदर रंगों से रंगी इन पेंटिंग पर सुंदर सुनहरी विद्धुत प्रकाश ने सोने पर सुहागे का काम किया, जिसके कारण इन पेंटिंग की खूबसूरती मे और भी निखार आ गया था। तशिचो द्जोंग के बारे मे एक बात प्रसिद्ध हैं कि इस किले पर कभी कोई हिंसक युद्ध या लड़ाई नहीं लड़ी गयी।

अब समय था कुछ शॉपिंग और खरीद दारी करने का। मुख्य मार्केट मे जहां एक ओर ऊंची ऊंची बिल्डिंग मे बैंक, सरकारी कार्यालय और प्रतिष्ठान थे वैन सड़क के दूसरी ओर बने फुटपाथ पर छोटी-छोटी दुकाने लाइन से बनी थी जिन पर भूटान के हैंडिक्राफ्ट, पेंटिंग, छोटे उत्पाद और सजावट का सामान बिक रहा था। पूरा मार्केट अनुशासित और साफ सुथरा। दुकानों के अतिरिक्त न कोई खोमचा, रेहड़ी-पटरी वाले दिखे। न कोई भिखारी और न कोई मांगने वाला। दिल्ली की तरह थोड़ा मोलभाव यहाँ भी देखने को मिला। सारे दुकान पर महिलाओं का वर्चस्व लेकिन  अपनी पारंपरिक भूटानी भेष-भूषा में।  

इस तरह थिंपु के इस बौद्ध मठ के दर्शन-भ्रमण और ख़रीदारी मे भूटान यात्रा का एक यादगार दिन और शामिल हो गया।     

विजय सहगल          

 

    

 

गुरुवार, 12 जून 2025

बेंगलुरु के रॉयल चैलेंज टीम के जश्न मे 11 मौतों का जिम्मेदार कौन?

 

"बेंगलुरु के रॉयल चैलेंज टीम के  जश्न मे 11 मौतों का जिम्मेदार कौन?"










बेंगलुरु के चिन्ना स्वामी स्टेडियम मे बुधबार, 4 जून 2025 की शाम मची भगदड़ मे 11 निरीह, मासूम और अबोध  लोगों की मौत ने आईपीएल के रॉयल क्रिकेट टूर्नामेंट  की, रॉयल चैलेंज टीम के, बेंगलुरु मे हुए रॉयल जश्न को, हृदय विदारक, दुःखद और शोकाकुल घटना मे परिवर्तित कर दिया। घटना अत्यंत दुख और वेदना देने वाली थी जिसके कारण  सारे देश मे  मातम छा गया, लेकिन खेद और अफसोस इस बात का रहा कि  प्रारम्भिक तौर पर कर्नाटक सरकार और उसके मुखिया ने इस अफसोस जनक घटना मे मारे गये लोगों की मौत  से अपना पल्ला झाड़ते हुए, लाखों की संख्या मे एकत्रित होने के कारण  आम क्रिकेट प्रेमियों को ही इस विपदा का दोषी ठहरा दिया। वहीं दूसरी ओर उपमुख्यमंत्री डीके शिव कुमार हैदराबाद पुलिस का पक्ष लेते हुए नज़र आए और उम्मीद से अधिक लगभग तीन लाख से भी अधिक प्रशंसकों के आने को, इस दर्दनाक घटना का मुख्य कारण बतलाते और माफी मांगते दिखे। मुख्य मंत्री और उपमुख्यमंत्री के बीच संवाद हीनता और प्रभाव दिखलाने की होड की चर्चा भी मीडिया और राजनैतिक हल्कों मे सुनाई दी कि पुलिस प्रशासन द्वारा आयोजन की अनुमति से स्पष्ट इंकार किए जाने के बावजूद डीके शिवकुमार  के दबाव   कार्यक्रम का आयोजन किया गया अन्यथा क्या कारण था कि 03 जून की रात को रॉयल चैलेंज टीम के विजयोप्लक्ष मे क्रिकेट प्रेमियों द्वारा सारी रात जश्न मनाने के दौरान, जो बेंगलुरु पुलिस  कानून व्यवस्था को बनाए रखने मे व्यस्त रही, उसके मना करने के बावजूद, उससे पुनः 04 जून के कार्यक्रम मे  लाखों लोगो के सुरक्षा प्रबंध की उम्मीद कैसे की जा सकती थी?  04 जून को बेंगलुरु मे इतने बड़े आयोजन को पर्याप्त सुरक्षा प्रबंधों की अनदेखी कर लगभग तीन लाख लोगों की  भारी भीड़ को आमंत्रण  देकर, समुचित सुरक्षा देने मे सरकार क्यों असफल रही, जिसके परिणाम स्वरूप 11 निरपराध लोगो को अपनी जान गवानी पड़ी और उनकी मौत की ज़िम्मेदारी को सरकार द्वारा अस्वीकारना एक बहुत बड़ा प्रश्न खड़ा करता  है?

कर्नाटक सरकार के उपमुख्यमंत्री डीके शिव कुमार रॉयल चैलेंज टीम के आगमन के लिये इतने उतावले और व्याकुल थे कि अपने अति व्यस्त समय के बावजूद टीम की अगवानी के लिये बेंगलुरु हवाई अड्डे पर मौजूद थे। कर्नाटक विधान सभा के प्रांगण मे मुख्यमंत्री द्वारा आयोजित रॉयल चैलेंज टीम के स्वागत सत्कार हेतु खिलाड़ियों को पगड़ी और हार पहनाकर कर फोटो खिंचवाते नज़र आये। यही नहीं चिन्नास्वामी स्टेडियम मे भी क्रिकेट प्रशंसकों की भगदड़ मे मौतों की सूचना होने के बावजूद खिलाड़ियों के अभिनंदन समारोह मे पलक पांवड़े विछाते नज़र आना, क्या मंत्री महोदय की क्रिकेट प्रेमियों की दुःखद मौतों के प्रति उनकी असंवेदनशीलता, अदयालुता और अमानवीयता  को नहीं दर्शाता? कर्नाटक सरकार के मुख्यमंत्री द्वारा आयोजित रॉयल चैलेंज टीम के सम्मान का कार्यक्रम का औचित्य भी समझ से परे हैं। एक व्यापारिक घराने की निजी टीम रॉयल चैलेंज बेंगलुरु (आरसीबी) जिसका एक मात्र उद्देश्य पैसा कमाना हो, का सम्मान क्या महज इसलिए ही किया जाय की उसके साथ "बेंगलुरु" जुड़ा है?  यदि रॉयल चैलेंज टीम मे कर्नाटक के युवाओं और खिलाड़ियों को लेकर प्रोत्साहन दिया गया होता तब तो समझ आता है, किन्तु विदेशी और देश के अन्य प्रान्तों  के खिलाड़ियों को बोली लगाकर नीलामी मे खरीद कर रॉयल चैलेंज टीम मे शामिल करने से कर्नाटक के लोगों और कर्नाटक सरकार की अस्मिता मे कौन से आलंकरण लगने वाले थे जिसके बशीभूत रॉयल चैलेंज टीम के सम्मान कार्यक्रम की आवश्यकता पड़ी? इस पर विचार किया जाना चाहिए।

ग्यारह मृतक लोगों के शोक संतृप्त परिवार के लिये तो ये अपूरणीय क्षति है जिसकी पूर्ति कभी नहीं हो सकती लेकिन इस घटनाक्रम मे मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री के बीच शक्ति के केंद्र के वर्चस्व की लड़ाई स्पष्ट देखने को मिली। जहां मुख्यमंत्री सिद्दा रमैया चिन्ना स्वामी स्टेडियम मे होने वाले कार्यक्रम की अनुमति न होने की बात पर ज़ोर देते रहे वही दूसरी ओर उपमुख्यमंत्री डीके शिव कुमार कर्नाटक पुलिस की शिथिलता और असफलता का बचाव करते हुए बारम्बार माफी मांगते नज़र आये। जब बेंगलुरु पुलिस ने अयोजन के लिये स्पष्ट इंकार किया था तो  बेंगलुरु पुलिस के पुलिस आयुक्त सहित  अन्य अनेकों अधिकारियों के निलंबन पर भी सवालिया निशान खड़े होते है, जिसके  जांच की भी समुचित अवश्यता है?

देश के बढ़े बड़े व्यापारिक घरानों द्वारा अपने मालिकाना हक मे बनाई गयी इन दस टीमों के मालिक देश के नामी गिरामी व्यापारी और उद्धयोगपति हैं जिन्होने अपने धनबल से खिलाड़ियों के कौशल को पैसों से खरीदा। अतः इस पूरे आयोजन को पाँच सितारा चका-चौंध और तड़क-भड़क वाला आयोजन कहना अति संयोक्ति न होगी।  मेरी राय मे ऐसे आयोजनों मे खेल की तकनीकि, ज्ञान और कौशल से कोई सरोकार नहीं होता। खेल मे राष्ट्रियता, प्रांतीयता या क्षेत्रीयता की खेल भावना या स्वस्थ्य  प्रतिस्पर्धा  कहीं दूर दूर तक दिखलाई नहीं पड़ती सिर्फ और सिर्फ वैभव,  विलासता का फूहड़ प्रदर्शन  ही कदम कदम पर दिखाई देता हैं। पाठकों को याद होगा कि 1977 मे जब ऑस्ट्रेलिया क्रिकेट बोर्ड ने वहाँ के एक बड़े व्यापारी केरी पैकर को  क्रिकेट के लिए विशेष प्रसारण अधिकार देने से मना कर देने के कारण, उस ऑस्ट्रेलियाई व्यापारी केरी पैकर ने चैनल नाइन पर क्रिकेट के प्रसारण दिखाए जाने वाले मैचों की एक श्रृंखला के लिए 35 सर्वश्रेष्ठ अंतरराष्ट्रीय क्रिकेटरों को भर्ती किया था जिन्हे पैसों से खरीदा गया था। उस समय भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड ने खिलाड़ियों की इस सौदेबाजी वाली टीम के  इस केरी पैकर सर्कस का विरोध किया था। वही बीसीसीआई, आईपीएल के तहत, आज  ऐसे आयोजनों से लोगों की जज़्बातों से खिलवाड़ कर अपना व्यापार कर रही है। इन्ही स्थिति और परिस्थितियों का लाभ लेकर, क्या  कर्नाटक मे अपने राजनैतिक हितलाभ के लिये अपने वर्चस्व और शक्ति  प्रदर्शन की होड मे लोगो की सुरक्षा के साथ खिलवाड़ करते हुए, ग्यारह निरीह, निर्दोष  लोगो के जीवन को असमय, अकारण ही काल का ग्रास नहीं बना दिया?

भारतीय राजनीति का ये दुर्भाग्य हैं कि राज्य सरकारें किसी आपदा या विपदा मे हुई आम जनों की मौत की ज़िम्मेदारी को स्वीकारने और नकारने मे उस चतुर व्यापारी की तरह व्यवहार करती  हैं जो हर वस्तु के विनिमय मे अपना लाभ और हानि को देखते  हैं।  पाठकों को याद होगा कि 4 दिसंबर 2024 को हैदराबाद के संध्या थियेटर मे "पुष्पा-2" फिल्म के प्रीमियर के दौरान मची भगदड़ मे एक महिला की मौत की ज़िम्मेदारी के रूप मे फिल्म के मुख्य अभिनेता अल्लू अर्जुन को गिरफ्तार किया था। लेकिन बेंगुलुरु मे घटी भगदड़ मे मची घटना मे  उन ग्यारह अभागे लोगों की मौतों ऐसा हुआ।  बेंगलुरु की भगदड़ की घटना मे भी आनन फानन मे रॉयल चैलेंज टीम के प्रबंधन और इवैंट कंपनी डीएनए एंटरटेनमेंट  और कर्नाटक क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड के विरुद्ध पुलिस मे मामला दर्ज़ किया गया है। रॉयल चैलेंज टीम और इवैंट कंपनी के कुछ लोगो को गिरफ्तार भी किया गया है जो कार्यवाही कम लीपा पोती ज्यादा नज़र आती है। सच शायद ही सामने आये? लेकिन एक पूर्व न्यायाधीश की अगुआई मे गठित समिति शायद सच को सामने लाने मे कामयाब होगी ऐसी आशा करनी चाहिये। इसी बीच भाजपा की कर्नाटक राज्य इकाई के मुखिया ने इस घटना मे मारे गये अबोध व्यक्तियों की मौत के लिए मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री को जिम्मेदार ठहराते हुए उनसे इस्तीफे की मांग की है।   

 भारतीय राजनीति का ये दुर्भाग्य है राजनैतिज्ञ, किसी भी विपदा मे आम जनों की आकस्मिक मौतों पर  विपक्षियों के राज्यों मे घटी दुर्घटनाओं के उदाहरण देकर बड़ी निर्लज्जता से बचने या अपने राज्य मे घटी घटना को कमतर बताने के कुप्रयास करते है। यहाँ भी यही हुआ मुख्यमंत्री सिद्दा रमैया द्वारा इस भगदड़ की घटना की तुलना प्रयागराज के महाकुंभ मे घटी भगदड़ से कर  अपने यहाँ घटी घटना को कमतर बताने का कुप्रयास किया। क्या ये, बेंगलुरु मे भगदड़ मे कर्नाटक सरकार की घोर लापरवाही के कारण, अकारण ही उन ग्यारह मृतकों का अपमान नहीं है? क्या वे बेंगलुरु मे हुई घटना को कमतर आँकते हुए उसे न्यायोचित ठहराने का कुप्रयास नहीं कर रहे? पक्ष और विपक्ष द्वारा, एक दूसरे पर घात प्रतिघात का ये खेल कब तक खेला जाता रहेगा? देश के ये कर्णाधार कभी अपनी असफलताओं, अक्षमताओं और अज्ञानताओं के लिये, देश की जनता के प्रति अपनी जवाबदेही भी कभी  सुनिश्चित करेंगे?     

विजय सहगल

शनिवार, 7 जून 2025

पारो हवाई अड्डा

"पारो हवाई अड्डा, भूटान, दुनियाँ के कठिनतम हवाई अड्डों मे से एक"







भूटान के शहर पारो मे स्थित पारो अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा उन दस खतरनाक हवाई अड्डों मे से एक है जहां हवाई जहाज की लेंडिंग करना एक कठिन और दुरूह कार्य है। भूटान मे हवाई मार्ग से प्रवेश के लिए यह एक मात्र हवाई अड्डा है। पूर्वी हिमालय की ऊंची ऊंची पहाड़ियों के बीच मे स्थित भूटान देश की सीमाएं भारत, नेपाल और तिब्बत से मिलती हैं। लगभग 72% भूमि पर हरे-भरे  पेड़ो और सघन वनों से  आच्छादित बौद्ध धर्म और संस्कृति वाला भूटान अपनी प्राकृतिक सुंदरता के कारण दिन व दिन पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र बनता जा रहा है इसलिए सड़क परिवहन के साथ हवाई परिवहन भी यहाँ दिन-प्रतिदिन बढता जा रहा है। आपको जानकार हैरानी और आश्चर्य होगा कि पारो हवाई अड्डा दुनियाँ के कठिनम हवाई अड्डों मे से एका है और यहाँ पर विमानों की उड़ान भरने और उतारने  मे लगभग पचास पायलट ही पारंगत, प्रवीण और निपुण है जिनके साहसिक हवाई परिवहन के कारण भारत के बागडोगरा, दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, बेंगलुरु सहित दुनियाँ के नेपाल, ढांका, दुबई, होंगकोंग और सिंगापूर से अंतर्राष्ट्रीय उड़ाने उपलब्ध हैं। 2 मई 2025 की  एक बरसाती सुबह मे  मुझे भी अपने अन्य ग्रुप के साथियों के साथ इस रोमांचक और चुनौती पूर्ण हवाई अड्डे को देखने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। दृश्यता कुछ कम थी और हवाई अड्डे का रनवे कहीं कहीं थोड़े  बरसाती पानी से भरा था।

समुद्रतल से 2265 मीटर अर्थात 7431 फुट की  ऊंचाई पर स्थित यह हवाई अड्डा यूं तो चारों ओर से ऊंचे ऊंचे पहाड़ों से घिरा हैं पर पहाड़ों के बीच की घाटी मे तकनीकी कौशल से बनाए गए एक छोटे 2265 मीटर लंबे रनवे पर कुशल पायलट को मिले कठिन प्रशिक्षण, निरंतर अभ्यास और अनुभव ने यहाँ आने वाले पायलट को पारो हवाई अड्डे पर हवाई जहाज को उड़ाने और उतारने की कला मे महारत हांसिल है। हवाई पट्टी की पूर्व दिशा मे एरोड्रम के बाहर अद्देद को पारो शहर से जोड़ती समांतर सड़क है जिसके साथ ही लगी पारो नदी हिमालय की कन्दराओं से निकालकर पारो शहर से निकलती हुई बंगाल की खड़ी को इठलाती-बलखती बहती चली जाती है। आगे का तो पता नहीं, पर पारो नदी का पानी भूटान मे तो एकदम निर्मल और साफ है। न केवल हवाई अड्डे पर अपितु दिल्ली या अन्य महानगरों की भागमभाग और भागदौड़ भरी ज़िंदगी के मुक़ाबले  पूरे पारो शहर मे जन जीवन एकदम शांत और सुकून भरा है। पूरे शहर मे बिना किसी लाल-हरी बत्ती के यातायात पूर्णतः अनुशासित, शांत और स्वतः नियंत्रित है जिसमे वाहनों से कदाचित ही कभी हॉर्न बजता सुनाई दे।

पारो हवाई अड्डे पर विमानों के कुशल चालन और परिचालन करने वाले शिक्षित और प्रशिक्षित चालक अपनी योग्यता  सूझबूझ और चतुरता के कारण पारो हवाई अड्डे को कठिन और चुनौती पूर्ण बनाने वाले कारणों का निवारण कर अपनी योग्यता सिद्ध करते हैं।  इस हवाई अड्डे को चैलेंजइंग बनाने वाला मुख्य कारक इस हवाई अड्डे की ऊंचाई है। लगभग साढ़े सात हजार फुट की ऊंचाई के कारण हवा का घनत्व और पहाड़ो पर चलने वाली तीखी हवा हवाई जहाज की उड़ान को प्रभावित करता है जिसे एक कुशल पायलट ही नियंत्रित कर सकता है। दूसरी सबसे बड़ी चुनौती चारों ओर स्थित ऊंची-ऊंची पहाड़ियों के बीच की घाटी मे हवाई जहाज को एक निश्चित और सीधी लाइन मे उड़ाना एक सिद्धहस्त पायलट के ही बूते का काम है। कुशल तकनीकि के साथ पायलट की गिद्ध दृष्टि भी उसकी निपुणता का एक मुख्य कारण है जो उड़ान को सुगम और सुरक्षित बनाता है। कदाचित पच्चीस-पचास मीटर की भी गलत, दायें-बाएँ उड़ान जहाज को मुश्किल मे डाल सकता है क्योंकि घाटी के दोनों ओर बहुमंजिला इमारतों से भी कई गुना ऊंची पहाड़ी एक खतरनाक प्राकृतिक अवरोध है। यही कारण है कि इस हवाई अड्डे पर या कम दृश्यता पर या  रात्रि मे  उड़ान की सुविधा नहीं है। मैदानों मे स्थित लंबे-लंबे रनवे वाले हवाई अड्डों के मुक़ाबले पारो अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे के रनवे की लंबाई मात्र 2.3 किमी ही है जिसके कारण पायलट को इस शीघ्र नियंत्रित कर स्थिर करना होता है। पहाड़ों पर  ठंड और अत्यधिक ऊंचाई के कारण होने वाली भौगोलिक घटना के परिणाम स्वरूप एनोबेटिक और कैटाबोटिक हवाओ के उपर नीचे बहने के कारण हवाई जहाज को भी उपर नीचे होने से  उड़ान के संचालन मे  कठिनाई होती  है। ऊंची ऊंची पहाड़ियों के बीच विमान का उतरना या उढ़ान भरने पर ऐसा प्रतीत होता है कि बड़े-बड़े पहाड़ों को बीच कोई छोटा उड़न खटोला, जहाज खिलौने की तरह उड़ रहा हो।                      

एक रोचक तथ्य, जहां एक ओर भारत के नागरिकों को सड़क और वायु मार्ग से आने जाने की सुविधा है पर भारत मे बांग्लादेशी घुसपैठियों की समस्या से सबक ले कर भूटान मे बंगलादेशी पर्यटकों को सिर्फ वायु मार्ग से ही भूटान मे पर्यटन के लिए आने जाने की अनुमति  हैं ताकि अवैध घुसपैठ पर नियंत्रण रक्खा जा सके।  हमारे ग्रुप के सदस्य श्री टंडन द्वारा और मैंने पारो हवाई जहाज के उतरने और चढ़ने का विडियो बना कर इस घटना को दिखाने का प्रयास किया है।   

विजय सहगल