शुक्रवार, 25 अप्रैल 2025

#ग्वालियर की छत्रियाँ

 

#ग्वालियर की छत्रियाँ"

 













14 मार्च  2025 को होली के पर्व पर लश्कर की होली देखने की इच्छा से हम अपने अनुज समान संजय पांडे के साथ मोटरसाइकल पर सवार होकर ग्वालियर के महाराज बाड़े की ओर चल दिये। पूरे रास्ते होली मे रंगे हुरियारों की टोलियों को देखते हुए हम महाराज बाड़े पर थे। महाराज बाड़े को हमने साधारण दिनों मे इतना सुनसान और खाली कभी नहीं देखा जितना की आज था। इसी क्रम मे खासगी बाज़ार होते हुए जब हम छत्री मंडी पहुंचे तो वरवश ही मेरा ध्यान सामने बनी भव्य और सुंदर छत्रियों ने खींच लिया।  आजकल निर्माण कार्य के चलते ऐसा लगा कि सड़क से किनारे एक पैर बढ़ाते ही परिसर मे पहुंचा जा सकता था लेकिन गार्ड ने बतलाया अगले गेट से अपना वाहन अंदर ले जा सकते हैं। जनक गंज स्थित छत्री मंडी मे सिंधिया राजघराने की तीन छतरियाँ हैं। पहली छत्री जो छोटी पर भव्यता मे अद्वतिय  जनको जी राव सिंधिया (शासन 1755-1761) की, दूसरी  छत्री जो आकार मे बड़ी,  दौलत राव सिंधिया (शासन 1794-1827) की  और तीसरी जायाजी राव सिंधिया (शासन 1843-1886) की थी जिसपर संस्कृत भाषा मे एक  छोटा शिला लेख भी लगा हैं। ऐसा बताया जाता हैं कि सिंधिया घराने के दो सदस्यों की छतरियाँ उनकी इच्छानुसार शिवपुरी मे बनी हैं बाकी अन्य सदस्यों की छत्रीयां उनके महल जयविलास पैलेस के दक्षिण दिशा के द्वार के सामने बनी हैं। ऐसा माना  जाता  हैं कि पैलेस का ये दरवाजा सिर्फ किसी सदस्य के देहावसान के समय ही खोला जाता है। महल के सामने स्थित सिंधिया राजघरानों के पूर्वजों की समाधियों  के दर्शन करने पर आपको 50 रुपए का शुल्क अदा करना पड़ेगा। पर यहाँ इन छत्रियों को देखने का कोई शुल्क नहीं हैं।     

मंदिर नुमा इन छत्रियों के परिसर के प्रवेश द्वार के सामने बने प्रांगण के सामने बाएँ और दायें एक-एक समाधि बनाई गयी हैं। इस प्रांगण से लगे  बायें तरफ तरफ बने प्रांगण के प्रवेश करते ही इटेलिअन वास्तु से निर्मित गोल स्तंभों पर बना एक छोटा शिव मंदिर था। इसी गोल स्तंभों के वास्तु शास्त्र  को ग्वालियर मे बाड़े स्थित मुख्य डाक घर और स्टेट बैंक के नए भवन पर भी देखा जा सकता हैं। मैंने इसी वास्तु निर्माण को दिल्ली के कॅनाट प्लेस, पन्ना के एक मंदिर और कुचेसर फोर्ट के हरिटेज होटल मे भी देखा।

मंदिर के साथ ही अद्भुद वास्तु कला को दर्शाती बलुआ पत्थरों से निर्मित  भव्य और सुंदर छत्री बनी हैं जो कि सिंधिया राजघराने के जनको जी राव सिंधिया की हैं। जो आज बंद थी पर ऐसा बताया गया हैं कि इस छत्री के गर्भ गृह मे   मे भगवान शिव का मंदिर हैं। प्रायः सिंधिया वंश के हर परिवार की समाधि के साथ भगवान शिव का मंदिर अवश्य होता  हैं। इन छत्रियों के दैनिक कार्यक्रमों मे ऐसी दिनचर्या है जो उनके  जीवित रहते हुए की जाती रही अर्थात सुबह का जागरण, दोपहर का प्रसाद और शयनार्ती आदि। ऊंचे चबूतरे पर वैदिक वास्तु शैली मे मंदिर का मुख्य द्वार पत्थरों से निर्मित कलाकृतियों को उकेर कर बनाया गया हैं।  प्रवेश द्वार के उपर श्री गणेश की छोटी प्रतिमा और उसके उपर बड़ी ही भव्य छीर सागर मे सर्पराज की सैया पर लेते भगवान विष्णु और देवी लक्ष्मी  को दिखाया गया है उनकी नाभि से निकले कमल को भी देखा जा सकता है।  दोनों ओर हाथों मे दंड लिये द्वारपाल नज़र आते हैं जिंका गणवेश मराठा शैली का हैं। उनके उपर छोटे से मंदिर मे दोनों ओर लड्डू गोपाल विराजमान हैं। दरवाजे पर अर्धवलयकर सुंदर नक्काशी का द्वार बनाया गया हैं। छत्री के चारों तरफ बड़ी खूबसूरती से वेलबूटे, ज्योमिति और मंदिर की आकृति उकेरी गयी हैं। मंदिर के चारों तरफ ठोस पत्थर के हथियों की शृंखला बनाई गयी हैं। विशेष तरह के दैत्याकार आकृति भी आकर्षण का विषय है।  मंदिर के उपर बाड़े ही सुंदर ढंग से ग्वालियर पत्थरों से झरोखे बनाए गया हैं। मंदिर के पिछले भाग मे भगवान शिव का मंदिर हैं।

दौलतराव सिंधिया की छत्री बाहर से दो मंजिला भवन मे बड़े आकार बनी हैं लेकिन छत्री की वास्तु और कलात्मकता के विषय मे यह जनको जी राव सिंधिया की छत्री से कमतर हैं। छत्री मे प्रवेश के लिए दोनों ओर से सीढ़ियों से रास्ता बनाया हुआ है। दरबाजे के उपर भगवान गणेश की छोटी से प्रतिमा है और दरबाजे के दोनों ओर बड़े आकार के द्वारपाल की सुंदर प्रतिमाएँ मराठा सरदारों के पहनावे और विशेष आकृति की पगड़ी पहने दंड के साथ  देखे जा सकते हैं। पूरी दीवार पर फूल पत्ते, वेलबूते की आकृतियों को उकेरा गया हैं। जो आकर्षक और सुंदर हैं। लकड़ी के दरवाजों के उपर अर्धवलयाकार आकृति मे विभिन्न रंगों के काँच की पट्टियाँ उन दिनों के काँच के रंगों की वास्तु शैली को उजागर करते हैं जो कि उन दिनों यूरोपियन देशों मे प्रचलित था।

जायाजी राव सिंधिया की छत्री मे समय के हिसाब से कलात्मकता और वास्तु शैली मे क्षरण स्पष्ट ड्राष्टिगोचर होता हैं। छत्री अति साधारण है लेकिन स्थान और आकार की दृष्टि से राजघराने के सदस्यों के प्रति श्रद्धा और समर्पण की दृष्टि से किसी भी मामले मे कम नहीं हैं। प्रांगण मे प्रवेश के पूर्व बनी द्वारपालों की भेषभूषा और शक्ल से भारतीय  प्रतीत नहीं होती। ऐसा लगता है मानों द्वारपाल चीनी मूल का हो। इस पर इतिहास के विध्यार्थी ही कुछ प्रकाश डाल सकते हैं।        

रोकड़िया हनुमान ( बड़े हनुमान ) छत्री मंदिर ग्वालियर - इसी परिसर मे जनको राव सिंधिया की छत्री के पास  एक सुंदर हनुमान मंदिर स्थित है जिसे बड़े हनुमान या रोकड़िया हनुमान मंदिर भी कहा जाता है। इस मंदिर मे बाल हनुमान की प्रतिमा है जिसकी स्थापना सिंधिया राजदरबार के सेठ रामचंद्र पेंटर ने की था। इस मंदिर की ग्वालियर के लश्कर सहित दूर दूर तक लोगो के बीच  बढ़ी मान्यता हैं।  ऐसी माना जाता  है कि जो भक्त इस मंदिर मे लगातार पाँच मंगलवार तक दर्शन करता हैं भगवान हनुमान उसकी सारी मनोकामना पूरण करते हैं।   

इस तरह होली के इस पवन पर्व के दिन ग्वालियर राजघराने की कलात्मक छत्रियों को नजदीक से देखने और अनुभव करने की ये यात्रा परंपरागत विरासत को देखने की यादगार यात्रा थी। जब कभी भी  आप ग्वालियर  पर्यटन पर आयें तो कुछ समय निकाल कर जनकगंज, छत्री मंडी स्थित इन छत्रियों का भी भ्रमण अवश्य करें जो दर्शनीय  ऐतिहासिक महाराज बाड़े से चंद कदमों की दूरी पर ही है।  

विजय सहगल 

 

   

शनिवार, 19 अप्रैल 2025

समानता और संभाव की प्रतिमा-श्री रामानुजाचार्य, हैदराबाद

 

समानता और संभाव की प्रतिमा-श्री रामानुजाचार्य, हैदराबाद








13 अप्रैल 2025 को हैदराबाद से 39 किमी॰ दूर, हवाई अड्डा मार्ग पर स्थित श्री रामानुजाचार्य की विशाल स्वर्णाभा से युक्त अप्रतिम, अद्व्तिय, अतुलनीय  प्रतिमा को देखना एक आश्चर्यजनक, अद्भुद अनुभव था। 216 फुट ऊंची इस प्रतिमा को 11वी शताब्दी के महान वैष्णव संत और समाज सुधारक श्री रामानुजाचार्य की याद मे बनाया गया हैं। श्री रामानुजाचार्य के वैष्णव मतानुसार, भगवान की  दृष्टि मे प्रांत, भाषा, जाति, वर्ग और  लिंग से परे ईश्वर सभी को समान दृष्टि से अपना अनुराग और आशीर्वाद प्रदान करते हैं। तत्कालीन समय मे समाज मे व्याप्त असमानताओं का विरोध कर समाज मे परस्पर संभाव और एकरूपता के लिए श्री रामानुजाचार्य ने बहुत  बड़ा काम किया था। पल्लामाकूल गोलकुंडा रोड, मुंचितल कस्बे मे चिन्ना जीयार जी यार ट्रस्ट के विशाल परिसर मे स्थित हैं। श्री रामानुजाचार्य जी के जन्म के 1000 वर्ष के उपलक्ष्य मे इस स्टेचू को बनाया गया हैं जिस पर लगभग एक हजार करोड़ रुपए की लागत आयी हैं और इस भव्य और विशाल प्रतिमा का उद्घाटन प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने फरवरी 5, 2022 को इस भव्य और दिव्य प्रतिमा का उद्घाटन किया था।

गोलाकार कमल पुष्प पर श्री रामानुजाचार्य की ध्यान मुद्रा (हाथ जोड़े) मे विराजित इस स्वर्णाभूषित  भव्य और विशाल प्रतिमा मे नीचे कमल के फूल की 54 पंखुड़ियां हैं। दक्षिण भारत मे वैष्णव मत के अनुसार श्री रामानुजाचार्य के हाथ मे 135 फुट लंबा त्रिदण्डम  हैं, जिसके ऊपरी सिरे पर ध्वज हैं, जो वैष्णव मत के पीठधिपति की  पहचान हैं और जिसे हर आचार्य हमेशा अपने साथ रखते हैं। कमल के फूल को 36 हाथियों की सूड़ उठाए प्रतिमाए चारों ओर गोलाकार रूप मे बनी हैं। इन हथियों की सूड़ से लगातार पानी का प्रवाह गिरते देखना एक दिव्य अनुभव हैं। कमल पुष्प पर बनी पंखुड़ियों पर चारों ओर भगवान विष्णु के प्रतीक 18 शंख और 18 चक्र भी बने हैं। स्वर्ण आभा से युक्त एक छत्र भी आचार्या के चरणों के पास स्थापित हैं इस तरह के चाँदी के छत्रों को भक्तों के सिर पर रख कर आशीर्वाद देने की परंपरा का निर्वहन दक्षिण भारत के मंदिरों मे सहज रूप से किया जाता हैं।  मूर्ति के सामने दोनों ओर 108 सीढ़ियां चढ़ कर प्रतिमा के पास उपर तक पहुंचा जा सकता हैं। अशक्त और वृद्ध जनों को मध्य और ऊपरी मंजिल तक जाने के लिए व्हील चेयर और लिफ्ट की व्यवस्था भी हैं।

सीढ़ियों से पहली माला पर जाने पर एक विशालाकार कक्ष हैं जिसके मध्य मे लगभग 4 फुट की प्रतिमा की प्रतिकृति रक्खी गयी है जो कमोवेश विशाल प्रतिमा का ही प्रतिरूप है। मंदिर के गर्भगृह मे स्थित अनेकों तोरण द्वार  ही नहीं पूरे परिसर का वास्तु दक्षिण भारत की नागर वास्तुकला, चोल, पल्लव, काकतीय, विजय नागर की वास्तु कला के दर्शन यहाँ कदम कदम पर  दिखलाई पड़ते हैं। विजयनगर के रथ के छोटे प्रारूप के सुंदर दर्शन भी यहाँ होते हैं।  पहली मंजिल पर स्थापित इस छोटी और भव्य प्रतिमा की विशेषता ये हैं कि इस का निर्माण 120 किलो सोने से किया गया हैं। तमिलनाडू के पेरंबूदूर मे अप्रैल सन  1017 मे जन्मे श्री रामानुजाचार्य का देहावसान सन 1137 मे हुआ था। वे 120 वर्ष जीवित रहे,  इस कारण ही प्रबंधन ने इस स्वर्ण निर्मित प्रतिमा का वजन 120 किलो रक्खा हैं । रत्न  जड़ित स्वर्ण  प्रतिमा पर  विद्धुत प्रकाश की किरणे प्रतिवर्तित होकर एक दिव्य और आध्यात्मिक स्वर्णाभा चारों ओर विखेर रही थी। उक्त प्रतिमा के अपूर्व  और अलौकिक दर्शन बड़े ही भव्य थे। सनातन मे 108 का बड़ा महत्व है इसी कारण प्रतिमा परिसर के चारों ओर 108 मंदिर बनाए गए हैं जहां पर भगवान विष्णु के विभिन्न अवतारों को स्थापित किया गया हैं। जगह जगह स्वल्पाहार और ठंडे पीने के पानी की व्यवस्था के साथ महिला और पुरुषों के प्रसाधन कक्ष भी बनाए गये हैं। पूरे परिसर मे साफ सफाई की पर्याप्त और अच्छी व्यवस्था हैं।

मंदिर दर्शनार्थियों के लिये  यूं तो प्रातः 9.00 बजे से रात्रि 8.00 बजे तक लेकिन शनिवार और रविवार को 8.30 तक खुला रहता हैं और प्रवेश शुल्क वयस्कों के लिये 250 रुपए और बच्चों के लिये 150 रुपए हैं। कार पार्किंग शुल्क 50 रुपए हैं। खान-पान सहित सभी मूलभूत सुविधाएं अति उत्तम हैं। लेकिन मेरी राय मे दर्शन के लिये मंदिर मे लगभग शाम छह बजे पहुँचना सर्वोत्तम समय है क्योंकि 7.30 बजे से मंदिर मे श्री रामानुजाचार्य की 108 पुरोहितों द्वारा समूहिक आरती, लेसर शो और म्यूज़िकल फाउंटेन का शो भी साथ साथ शुरू होता हैं लगभग एक घंटे का ये भव्य कार्यक्रम अति दर्शनीय और प्रशंसनीय है जिसकी जितनी भी प्रशंसा की जाय कम हैं और जिसे शब्दों मे वर्णित करना संभव नहीं। ध्वनि और प्रकाश (लाइट एंड साउंड) का कार्यक्रम मंदिर पर चढ़ने वाली सीढ़ियों के सामने बने एक जल स्तंभ पर होता  है जिसके चारों ओर रंगीन फब्बारे लगे हुए हैं।

रामानुजाचार्य जी की आरती, मंत्रोचारण और गोविंदा...., जय श्रीराम..... के जयकारों   के बाद लेसर शो शुरू हुआ जिसका केंद्र जलस्तंभ था जिसके नीचे वेलबूटे आदि हैं जिसके उपर सूँड और अगले दो पैरों सहित हथियों की मूर्तियों हैं, जिसके ऊपर कलश आकृति और शीर्ष पर कमल पुष्प की आकृति बनी है। फब्बारों  के स्थल के चारों ओर सैकड़ों प्लास्टिक की कुर्सियाँ रक्खी गई थी जिन पर बैठ कर श्रद्धालु आरती, म्यूज़िकल फाउंटेन और लेज़र शो को देखा जा सकता हैं। जैसे ही प्रकाश और फब्बरों का शुरू हुआ परिसर की सारी लाइट बंद कर दी गयी। फब्बरों  की रंग बिरंगी लाइटों और  ऊंची ऊंची धाराओं के बीच जल स्तंभ पर लेज़र शो का पड़ने वाला प्रकाश अत्यंत ही चमकदार और सुंदर था, जो घड़ी घड़ी मे तीखे  रंग बदल कर एक अद्भुद और आकर्षक दृश्य उत्पन्न कर रहा था। लेज़र शो के माध्यम से श्री रामानुजाचार्य की जीवनी को चित्रित किया गया था। इस लेज़र प्रदर्शन के साथ जल स्तम्भ पर रंगों की बरसात के साथ जब फब्बारों की जल की बौछार के संयोजन से अत्यंत आकर्षक और मनोहारी दृश्य प्रदर्शित हो रहा था। लेज़र शो के अंत मे जल स्तम्भ के ऊपरी सिरे पर जैसे ही फबबरों की तीक्ष्ण धराए कमल पुष्प की पंखुड़ियों पर गिरने लगी पंखुड़ियों के बीच से एकदम श्वेत रंग की श्री रामानुजाचार्य की प्रतिमा उपर उठ कर दिखलाई देने लगी, जिस पर फब्बारों की जल धाराएँ ऐसे गिर रही थीं मानो जल धाराएँ आचार्या श्री को जल स्नान समर्पित करने के लिए होड़ कर रही हों। मैंने ऐसे अनेकों शो देखे हैं पर ऐसा अच्छा और जीवंत  लेज़र शो कदाचित पहले कभी देखा था।

मंदिर या अन्य धार्मिक स्थलों पर सुरक्षा की दृष्टि से मोबाइल का निषेध एक वाद-विवाद या चर्चा का विषय हो सकता हैं लेकिन मंदिर के अंदर आप मंदिर के प्रबंधन द्वारा नियुक्त फोटो ग्राफर को दो सौ रुपए प्रति फोटो  का शुल्क देकर अपनी या परिवार की फोटो निकलवा सकते हैं। एक अच्छी बात मंदिर प्रबंधन की और देखने को मिली कि जो मोबाइल और जूते चप्पल आपसे प्रवेश द्वार पर जमा करवाये गए थे जिनका वितरण लगभग 400 मीटर दूर निकास द्वार पर किया गया, ताकि इन वस्तुओं को प्राप्ति के लिए आपको दुबारा प्रवेश द्वार पर न जाना पड़े। निकास द्वार पर ही भोजन हेतु भोजन कक्ष बनाया गया है जहां आवश्यक शुल्क देकर आप दक्षिण और उत्तर भारतीय भोजन का आनंद उठा सकते हैं।

 

विजय सहगल                               

रविवार, 13 अप्रैल 2025

#शेगाँव (जिला बुलढाणा)-महाराष्ट्र

 

#शेगाँव (जिला बुलढाणा)-महाराष्ट्र#











यूं तो महाराष्ट्र की भूमि मे अनेक साधू-संत-महात्मा हुए हैं जिन्होने अपने कार्यों द्वारा श्रीमद्भगवत गीता मे भगवान श्री कृष्ण के बताए अनासक्त भाव से कर्म करने के भाव को   कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन.........के माध्यम से साकार कर मानव मात्र का  पथ प्रशस्त किया हैं। संत ज्ञानेश्वर, संत नामदेव, संत तुकाराम, संत एकनाथ, समर्थ रामदास, संत गजानन महाराज सहित एक लंबी सूची हैं। 1988-89 मे ग्वालियर सेवा के दौरान माधव नगर मे अपने प्रवास के दौरान मैंने अपने भवन स्वामी, श्री सुरेश शंकर सोमनी के घर एक फोटो देखी थी जिसमे एक संत चिलम पीते हुए दिखाई दिये थे। उन्होने बताया था कि ये महाराष्ट्र के प्रसिद्ध संत श्री गजानन महाराज जी का चित्र हैं जिनकी महाराष्ट्र मे काफी मान्यता हैं और हम लोग इनके प्रति बड़ा श्रद्धा और समर्पण का भाव रखते हैं। 23 और  24 मार्च 2025 को स्वामी श्री गजानन महाराज की कर्मस्थली शेगाँव के दर्शन का  सौभाग्य मुझे भी  प्राप्त हुआ।

बुरहानपुर से 125 किमी की सड़क यात्रा आराम से तीन लगभग घंटे मे पूरी कर  हम महाराष्ट्र स्थित स्वामी श्री गजानन महाराज की कर्म भूमि,  शेगाँव पहुँच गये। किसी भी शहर मे पहुँचने के पहले सबसे पहला काम आवास की व्यवस्था करना होता हैं। कुछ लोगो से मुझे जानकारी मिली थी कि शेगाँव मे श्री गजानन महाराज मंदिर ट्रस्ट की अति उत्तम व्यवस्था हैं। यूं तो शेगाँव एक छोटा सा कस्बा हैं पर यहाँ की सम्पूर्ण अर्थव्यवस्था यहाँ आने वाले श्रद्धालुओं पर ही निर्भर हैं। एकादशी या अन्य हिन्दू पर्वों पर यहाँ दर्शनार्थियों की काफी भीड़ आती हैं। समान्यतः 15-20 हजार भक्त शेगाँव मे हर रोज ही आते हैं और इन सामान्य दिनों मे शेगाँव मे मंदिर दर्शन और मंदिर ट्रस्ट के आवास की कोई बहुत समस्या नहीं रहती, परंतु पूरे संवाद के अभाव मे मै मंदिर के पास स्थित भक्त निवास मे आवास के तलाश मे पहुँच गया। आवास हेतु दर्शनार्थियों की लंबी लाइन थी, बताया गया कि 3-4 घंटे का प्रतीक्षा समय लग सकता हैं।

ट्रस्ट के कुछ अन्य लोगो से पूंछ-तांछ करने पर पता चला कि इस भक्ति निवास के अलावा 1-2 किमी पर अन्य आवास गृह आनंद-बिहार और विश्रांवा मे वातानुकूलित व्यवस्था भी हैं। हम भक्तिनिवास से आनंद बिहार मे आवास हेतु पहुंचे। संस्थान के कर्मचारियों का व्यवहार सहयोगात्मक था। उन्होने बताया कि यहाँ सुविधा जनक आवास कुछ ज्यादा राशि पर लगभग आधा घंटे मे पहले आओ-पहले पाओं की नीति पर सभी को उपलब्ध हो जाते हैं। लगभग 20-25 मिनिट मे एक साधारण फॉर्म भरकर देने पर मुझे वातानुकूलित 3 बेड रूम उपलब्ध हो गया।  तीन, चार, पाँच, छह विस्तर वाले इस परिसर मे यहाँ 550 कमरे थे।  पूरे परिसर की सफाई की सफाई व्यवस्था देख कर मै आश्चर्य चकित था।  नजदीक ही रूम था पूरा परिसर एक विशाल हाउसिंग सोसाइटी की तरह था, जहां तीन तीन मंज़िला आवास की हर मंजिल पर  4-से- 6 तक कमरे थे। कमरा एक-दम साफ सुथरा था जिसमे एक सोफा, टेबल, अलमिरा था, दो तौलिया, साबुन, कपड़े सुखाने के लिए स्टैंड के साथ अटैच  लैट्रीन बाथरूम थी। हर फ्लोर पर ठंडे पानी की समूहिक व्यवस्था थी। मेरा मानना हैं कि 850/- रुपए मे इतनी सुविधाओं युक्त कमरा सामान्यतः यहाँ की कीमत से तीन गुना कीमत पर भी शायद ही मिले और कमरा सहित पूरे परिसर की इतनी सफाई, किसी  पाँच सितारा होटल से कम न थी। परिसर मे ही कार पार्किंग और कैंटीन की व्यवस्था थी जहां नाममात्र की कीमत पर स्वल्पाहार, भोजन, चाय नाश्ता श्रद्धालुओं के लिये   उपलब्ध था। इस परिसर से चौवीसों घंटे भक्तजनों का आना जाना लगा रहता हैं।

कुछ समय बाद फ्रेश होकर हम लोगो ने मंदिर दर्शन के लिए प्रस्थान करने का निश्चय किया। परिसर से ही मंदिर तक श्रद्धालुओं को लाने-ले जाने की निशुल्क बस सुविधा उपलब्ध थी। कार पार्किंग के झंझट से बचने के लिए हमने बस से ही मंदिर जाने के निश्चय किया। बस संस्थान के अन्य आवासीय गृहों से यात्रियों को छोड़ने और लेने के कारण यात्रियों से भरी थी। बस मे ही एक सहयात्री श्री संजय शर्मा मिल गये जो परभानी से थे और पहले भी शेगाँव आते रहे थे। जब कार पार्किंग की बात चली तो उन्होने बताया कि मंदिर ट्रस्ट का एक निशुल्क कार पार्किंग हैं जिसमे छह हजार कार पार्क की जा सकती हैं। बहुत उत्तम व्यवस्था हैं। लगभग आधा घंटे मे बस सभी सहयात्रियों को लेकर मंदिर के पास स्थित भक्ति निवास पहुंची जहां से मंदिर पैदल 10 मिनिट का रास्ता था। शर्मा जी के सहयोग से पहले हम लोगों ने जूते चप्पल स्टैंड पर रक्खी जहां मंदिर के सेवादार बड़ी श्र्द्धा से इस कार्य को संपादित कर रहे थे। अब बारी थी मंदिर मे श्री गजानन महाराज की समाधि और मंदिर के दर्शन की जिसे हम, लाइन का हिस्सा बन आगे बढे। बाहर ही एक डिजिटल बोर्ड लगा था जिसमे दर्शन का संभावित समय 20 मिनिट दर्शा रहा था। 23 मार्च रविवार होने के कारण भक्त जनों की भीड़ कुछ ज्यादा थी। धीरे धीरे आगे बढ़ते हुए हम लोग समाधि की गुफा की ओर बढ़े। विशाल मंदिर प्रांगढ़ मे भी साफ सफाई का पूरा ध्यान रक्खा जा रहा था। ठंडे पानी की व्यवस्था थी। लाइन मे लगे श्रद्धालुओं के पथ के ऊपर पंखे, कूलर जगह जगह थे ताकि लोगो को गर्मी उमस आदि से कष्ट न हो।

श्री गजानन महाराज का जन्म कब और कहाँ हुआ और उनके माता-पिता कौन थे ये कोई नहीं जनता। पहली बार 23 फरवरी 1878 को शेगाँव के दो व्यक्तियों श्री बनकट लाला और दामोदर ने गाँव मे एक श्वेत वर्ण बालक को झूठी पत्तल मे से चावल खाते देखा। बालक मुँह से गं गं गणात बूते, का मंत्र जाप कर रहा था इसलिये ही बालक को गजानन के नाम से जानने लगे। गजानन के गाँव मे प्रवास के दौरान लोगों ने बड़े चमत्कार देखें। ईश्वर मे भक्ति, इंद्रियों मे नियंत्रण एवं जैसे तैसे अपने जीवन से संतुष्टि के कारण लोगो की श्री गजानन महाराज मे श्रद्धा, समर्पण और भक्ति बढ़ने लगी। शेगाँव और आसपास के दूर दराज के लोगो के प्रति अनुराग और अपनत्व के कारण वे नाथ संप्रदाय के एक पहुंचे हुए संत कहलाये। एक बार पंढरपुर मे भगवान बिट्ठल के समक्ष अपने  भक्तों के बीच उन्होने समाधि लेने के निर्णय की घोषणा कर दी। ऐसा सुन भक्तों मे उदासी छा गयी पर उन्होने अपने अनुयायियों को समझा कर समाधि के दिन को अवगत करा कर, 8 सितम्बर 1910 मे  शेगाँव गाँव के इसी स्थान पर समाधि ले ली। इस तरह अब हम गजानन महाराज की समाधि के सामने खड़े थे। समाधि के उपर गजानन स्वामी के सिर की संगमरमर की एक सुंदर प्रतिमा रक्खी थी जिसका उसके चारों ओर सफ़ेद, नारंगी, हरे फूलों से सजाया गया था। मध्य मे एक गुलाब के फूल के नीचे वेल्पत्री की तीन पत्तियों से मूर्ति  और उसकी सुंदरता मे एक अलग ही आध्यात्मिक तेज था। समाधि स्थल के पास ही महाराज की पादुका, महाराज का चिमटा, औज़ार और चिलम के भी दर्शन किया। स्थल के सामने ही भगवान शिवलिंग बनाया गया था। साथ ही चाँदी से जड़ित दंड भी मूर्ति के समीप ही रक्खा था।  सैकड़ों लोग गजानन महाराज के जयकारों के बीच अपनी प्रार्थना उन तक पहुंचा रहा था। लोगो की ऐसी आस्था और विश्वास हैं कि गजानन महाराज अपने भक्तवत्सल भक्तों की हरेक मनोकामना पूर्ण करते हैं। गुफा के उपरी तल पर  एक सुंदर श्री राम, सीता और लक्ष्मण का मंदिर बनाया गया था। सामने ही हनुमान की वो प्रतिमा विरजित थी जिसकी गजानन महाराज पूजा करते थे। मंदिर के एक अन्य कक्ष मे उनकी गद्दी थी जहां वे अपने भक्तों के साथ मिलते और  बाते किया करते थे।

अब हमलोग मंदिर के दर्शन पश्चात मुख्य मंदिर के बाहर आँगन मे थे। गर्मी के कारण मंदिर को बड़े से पंडाल से ढँक दिया गया था। आँगन के चारों ओर बने बरामदे मे मंदिर के साहित्य भंडार, प्रसाद गृह, चरणामृत कक्ष, कार्यालय आदि थे जिसके एक तरफ श्रद्धालुओं द्वारा भजन किया जा रहा था। संगीत की स्वर लहरियों और बाध्य यंत्रों की मधुर आवाज से एक दिव्य आध्यात्मिक वातावरण बन गया था। स्वर्ण पताका के दर्शन और परिक्रमा कर हम लोग अपने आवास आनंद बिहार बापस आ गए।

24 मार्च 2025 को प्रातः ही हमने एक बार पुनः अपनी कार से ही मंदिर मे जाकर गजानन महाराज के मुख दर्शन किये। कार को संस्थान के पार्किंग मे रक्खा जहाँ बड़े  भारी क्षेत्र मे  मुख्य सड़क के दोनों ओर कारों के निशुल्क  पार्किंग की व्यवस्था थी।  मंदिर के विशाल रसोई  मे अन्न प्रसाद ग्रहण किया जिसमे एक बार मे टेबल कुर्सी पर हजारों लोगो के बैठ कर भोजन करने की शुद्ध और सात्विक व्यवस्था थी। शेगाँव के पास गजानन महाराज के गुरु के नगझरी मे अत्यंत पुराने और दर्शनीय शैली के मंदिर के  दर्शन करना एक अद्भुद अनुभव था।

मंदिर से दो किमी दूर आनंद सागर नामक कृत्रिम झील का निर्माण भी ट्रस्ट द्वारा कराया गया हैं। जिसमे ध्यान केंद्र, उद्धयान और आध्यात्मिक केंद्र भी बनाया गया हैं। एक वृत्ताकार जगह मे भारत के संत महात्माओं आदि की सफ़ेद संगमरमर की प्रितमायेँ लगी हैं जिनमे आदि शंकराचार्य, गोस्वामी तुलसी दास, संत कबीर सूरदास सहित अनेक संतों की मूर्तियाँ हैं।   325 एकड़ मे फैले इस झील मे बच्चों के मनोरंजन, पीने के ठंडे पानी और नाममात्र की दर पर खाने पीने की सुविधा भी हैं। पशु पक्षियों के कलरव के बीच झील के बीच मे बने टापू पर ध्यान केंद्र को देखना  अंत्यन्त ही मनोहारी दृश्य  था।

क्षेत्र के श्रद्धालुओं और भक्तों के समर्पण और सम्मान को इस बात से भी देखा जा सकता हैं कि नगझरी जाते मे एक लगभग दो सौ लोगो का जलूस अमरावती से प्रभात फेरी करते हुए, भजनों के भक्ति रस मे डूबे शेगाँव की ओर बढ़ते हुए दिखा। इस जलूस मे पानी का टैंकर और सम्पूर्ण भोजन सामाग्री लिए ट्रैक्टर दिखे। जो अपने पंद्रह दिन की यात्रा के बाद शेगाँव पहुँचते दिखे। हर जगह अति उत्तम सफाई के बारे मे जब हमने पूंछ तांछ की तो पता चला श्री गजानन महाराज के भक्त जो सफ़ेद कुर्ता, पायजामा और टोपी पहने अलग ही दिखलाई पड़ जाते, हैं बड़े ही त्याग और समर्पण भाव से संस्थान की हर सेवा, मंदिर भक्त निवास, आनंद सागर, और अन्य भवनों की साफ सफाई करते हुये, हर दस कदम पर लगभग चौबीसों घंटे दिखाई दे जाते हैं। उनमे से एक गणेश पाटिल ने बताया कि गजानन महाराज के अनुयायियों वाले  हर गाँव मे  मण्डल बने हुए हैं। तीस व्यक्तियों का मण्डल, माह मे पाँच दिन के लिए शेगाँव मे सेवा देने आते है और सफाई, भोजन प्रसाद  सहित मंदिर की हर व्यवस्था मे सहभागिता करते हैं। एक समय मे लगभग ढाई हजार व्यक्ति शेगाँव मे सेवा के लिये हर समय उपस्थित रहते हैं।  कुछ पूर्ण कालिक स्टाफ आदि भी हैं। गजानन महाराज के भक्तों का ऐसा निस्वार्थ समर्पण कदाचित ही मैंने कहीं देखा हो। साफ सफाई से लेकर, खाने पीने, ठहरने, पार्किंग आदि की सारी व्यवस्थाओं का  उच्च कोटि का होने के पीछे इन सेवकों की निस्वार्थ सेवा और समर्पण ही हैं।

शेगाँव  की  एक और बात ने हमे प्रभावित किया वह थी सभी के साथ बिना किसी पक्षपात के समानता का व्यवहार। शेगाँव मे कहीं वीआईपी कल्चर देखने को नहीं मिली। चाहे आवास की व्यवस्था हो, मंदिर के दर्शन की व्यवस्था या खान पान और वाहन पार्किंग की व्यवस्था, किसी भी व्यक्ति को कहीं कोई वरीयता नहीं दी जाती हैं। जो क्रम मे पहले है उसे ही प्रथम  वरीयता प्राप्त  हैं, यहीं कारण है कि शेगाँव मे श्री गजानन महाराज के किसी भी संस्थान मे नेताओं-अभिनेताओं या धनवानों को कहीं भी किसी कार्यक्रम, वस्तु या स्थान मे   कोई प्राथमिकता नहीं दी जाती है और  शायद यही कारण हैं कि यहाँ वीआईपी लोगो की उपस्थिती नहीं दिखाई देती।                                        

शनिवार, 5 अप्रैल 2025

#बुरहानपुर

 

#बुरहानपुर-म॰ प्र॰#













23 मार्च 2025 को मै अपनी ग्वालियर हैदराबाद के तीसरे पढ़ाव के रूप मे बुरहानपुर मे अपने भाई श्री संतोष खत्री के आतिथ्य का सौभाग्य  प्राप्त हुआ। बुरहानपुर प्रवास के दौरान शहर भ्रमण कराने मे मेरे भतीजे श्री सुमित खत्री हमारे सारथी और संवाहक बने। महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश की सीमा पर वसा बुरहानपुर ऐतिहासिक दृष्टि के साथ साथ अपने केला उत्पादन के लिये मशहूर हैं। रेल्वे और सड़क  परिवहन के माध्यम से केले की पूर्ति सारे देश मे की जाती हैं इसलिये ही कृषि पर आधारित बागवानी से यहाँ के गाँवों मे आर्थिक समृद्धि और किसानों के रहन सहन को आप स्पष्ट रूप से आवागमन के दौरान देख सकते हैं। अन्य पारंपरिक राजशाही वाले शहरों की तरह ही बुरहानपुर शहर किले नुमा चारदीवारी से घिरा हैं और शहर मे प्रवेश या निकासी के लिये 7 दरबाजे बने हैं। मुगलों की दक्षिण विस्तार की नीति का प्रधान केंद्र होने के कारण इस शहर की सुरक्षा भी सुनिश्चित की गयी थी।     

ताप्ती नदी के तट पर स्थित शाही महल (किला) का निर्माण आदिल खान द्व्तिय ने सन 1457 से 1503 ई॰ के बीच कराया था। किले नुमा यह  शाही महल कभी 7 मंज़िला हुआ करता था, जिसके अबशेष पूर्व दिशा की तरफ ताप्ती नदी के तट की तरफ अभी भी  देखे जा सकते हैं। 1536 ईस्वी मे गुजरात विजय के बाद हुमायूँ अपनी दक्षिण क्षेत्र के विस्तार नीति के तहत बुरहानपुर आया था। इसके उपरांत बुरहानपुर को केंद्र मानकर दक्षिण विस्तार के अभियान चलाये जाने लगे। मुगल राजकुमार शाहजहाँ को बुरहानपुर का गवर्नर बनाये जाने पर शाहजहाँ ने इस किले को अपना  निवास बनाया।   मुगलों के दक्षिण विस्तार नीति के कारण इस किले को  खजाने को रखने के  रूप मे उपयोग किया जाता था क्योंकि किले के पूर्वी दिशा मे ताप्ती नदी के प्रवाह के कारण सुरक्षा की दृष्टि से उत्तम स्थान था, जहां सोने-चाँदी के अकूत भंडारण की व्यवस्था थी। सुरक्षा की चाक चौबन्द व्यवस्था के बावजूद मराठा शासक छत्रपति संभाजी महाराज ने 31 जनवरी 1681 से 2 फरवरी 1681 मे, तीन दिन तक बुरहानपुर शहर को बंधक बनाकर मुगल शासकों की संपत्ति, सोना-चाँदी, आभूषण और अन्य हीरे-जवाहरात लूट कर अपनी सेना के साथ सुरक्षित रायगढ़ बापस पहुँच गये थे।  बुरहान पुर के बाद छत्रपति संभाजी महाराज ने मुगल शासको के औरंगाबाद मे भी इसी  तरह की एक अन्य खजाना लूटने की घटना को अंजाम दिया था। यही कारण हैं कि, इन घटनाओं से घबड़ा कर औरगंजेब ने दीक्षिण विस्तार की अपनी नीति से मुँह मोड लिया था।    

बैसे तो किला जीर्ण शीर्ण अवस्था को प्राप्त हो चुका था परंतु भारतीय पुरातत्व विभाग के संरक्षण मे आने के पश्चात यहाँ के रख रखाव की अति उत्तम, अच्छी व्यवस्था हो गई हैं। किले के अंदर हरी घास के मैदान और साफ सफाई के  कारण प्रातः भ्रमण करने वालों के लिये एक अच्छा स्थान उपलब्ध हो गया। टूटे फूटे भग्नावशेष देख कर ये पहचानना कठिन था कि उसमे महल कौन सा था या इन भवनों का क्या  उपयोग था? क्योंकि हम सुबह प्रातः 7 बजे पहुँच गए थे। लेकिन सफ़ेद संगमरमर  पर रंग विरंगी मुगल शैली मे बनी पेंटिंग को देख कर पहचानना कठिन न था कि यह तब के शासकों का  स्नानालय था।

प्रातः सूर्य देव के उदय के साथ स्वर्ण आभा लिये सूर्य रश्मियों जब किले के ऊपरी छत्त पर  बने तीन अर्धवलयाकार द्वारों को प्रकाशित कर रही थी तो नीचे ताप्ती नदी के घाटों को देखना एक सुखद और आनंद दायक अनुभूति दे रहा था। किले के उत्तरी छोर से नीचे, जब ताप्ती नदी की ओर निहारते हैं तो किले की पाँच मंज़िले स्पष्ट दृष्टिगोचर होती हैं। ऐसा कहाँ जाता हैं कि यहीं पर शासकों का खजाना रक्खा जाता था।  

ऐसा कहा जाता हैं कि ताज महल मूलतः बुरहानपुर मे बनाया गया था।  मुमताज़ महल जिसकी याद मे शाहजहाँ ने बुरहानपुर मे ताज महल बनाया था, 17 जून 1631 मे, अपने चौहदवे बच्चे को जन्म देते समय बुरहानपुर मे उनका देहांत हो गया था। 17 साल बाद, ताजमहल के 1748 मे पूर्ण होने के बाद मुमताज़ की दो अस्थाई कब्रों  से निकाल कर आगरा के ताज महल दफनाने को प्रेम का प्रतीक बताना समझ से परे हैं? इस पर विद्वान और बुद्धिजीवि ही कुछ प्रकाश डाल संकेंगे? इस विषय मे कृपया हमारे ब्लॉग दिनांक 21 मई 2022 का अवलोकन कर सकते हैं। ( https://sahgalvk.blogspot.com/2022/05/blog-post_20.html )

हमारी बुरहानपुर यात्रा के सारथी सुमित ने जब मुझे एक जगह ले जाकर खड़ा कर दिया तो  सामने ताजमहल को देख कर सहसा मुझे विश्वास नहीं हुआ!! लगा कि मै स्वपन देख रहा हूँ? लेकिन साक्षात ताजमहल को देख कर आश्चर्य से अचंभित था। यहाँ यमुना नदी का किनारा तो नहीं था लेकिन खेत खलिहानों के बीच ताजमहल को देखना निश्चित ही रोमांच देने वाला था। मैंने सुमित से हँसते हुए पूंछा, पता करो!, कहीं बजरंग दल ने आगरा का ताजमहल चोरी कर, उसे यहाँ बुरहानपुर तो नहीं ले आये?? सुमित ने बताया कि ये आधुनिक ताजमहल,  आईआईटी, एनईईटी, जेईईई जैसे परीक्षाओं की कोचिंग देने वाले युवा आनंद चोकसे नामक नौजवान के सफलता की कहानी कहता हैं। क्षेत्र मे अपने आप मे इस इकलौते कोचिंग सेंटर के संचालक ने ये सफ़ेद संगमरमर का ताजमहल अपने निजि उपयोग के लिये बुरहानपुर मे बनवाया हैं। जब मैंने सुमित खत्री, जो स्वयं चार्टर्ड एकाउंटेंट हैं से पूंछा कहीं इस ताजमहल के निर्माण मे भी मजदूरों के हाथ तो नहीं कटवाये गये जैसे प्रेम के प्रतीक!!  आगरा के ताजमहल मे हुआ था? सुमित ने मुस्कराते हुए कहा ये आगरा का नहीं बुरहानपुर का ताजमहल है!!

केला उत्पादन के साथ केले के सहायक उत्पाद जैसे केला  चिप्स का भी यहा ऊटपादन होता हैं। किसी जमाने मे अपने हैंडलूम कपड़े के निर्माण के लिये प्रसिद्ध बुरहानपुर मे मावा जलेबी भी काफी लोकप्रिय, प्रसिद्ध हैं। गनीमत है कि इस मावा जलेबी का स्वाद भारत के राजनैतिक नेताओं के मुँह नहीं लगा अन्यथा बुरहानपुर मे भी मावा जलेबी की फ़ैक्टरि लगाने की चर्चा शुरू हो जाती। बुरहानपुर मे किला, मस्जिद आदि के साथ अत्यंत महत्वपूर्ण मंदिर और एतिहासिक गुरद्वारे भी हैं। यहाँ बड़ा गणपति मंदिर, रोकड़िया हनुमान मंदिर, रेणुका मंदिर, श्री इच्छादेवी जैसे प्रसिद्ध मंदिर हैं साथ ही साथ बुरहानपुर मे एक एतिहासिक गुरद्वारा भी हैं, जहां सिक्खों के पहले गुर, गुरु नानक और दसवें गुरु, गुरु गोविंद सिंह, अपने नांदेड़ प्रवास पर जाते हुए कुछ दिन यहाँ रुके थे। गुरु गोविंद सिंह जी ने गुरुग्रंथ साहब के एक पृष्ठ पर अपने हस्ताक्षर किए थे जिसकी प्रति गुरद्वारे मे श्रद्धालुओं के दर्शनार्थ रक्खी है, जिसके दर्शन का सौभाग्य मुझे भी प्राप्त हुआ।   

इस तरह एक और शहर का भ्रमण कर हमने अपनी अगली मंजिल शेगाँव की तैयारी शुरू कर दी।

 

विजय सहगल