#ग्वालियर
की छत्रियाँ"
14 मार्च 2025 को होली के
पर्व पर लश्कर की होली देखने की इच्छा से हम अपने अनुज समान संजय पांडे के साथ
मोटरसाइकल पर सवार होकर ग्वालियर के महाराज बाड़े की ओर चल दिये। पूरे रास्ते होली
मे रंगे हुरियारों की टोलियों को देखते हुए हम महाराज बाड़े पर थे। महाराज बाड़े को
हमने साधारण दिनों मे इतना सुनसान और खाली कभी नहीं देखा जितना की आज था। इसी क्रम
मे खासगी बाज़ार होते हुए जब हम छत्री मंडी पहुंचे तो वरवश ही मेरा ध्यान सामने बनी
भव्य और सुंदर छत्रियों ने खींच लिया। आजकल
निर्माण कार्य के चलते ऐसा लगा कि सड़क से किनारे एक पैर बढ़ाते ही परिसर मे पहुंचा
जा सकता था लेकिन गार्ड ने बतलाया अगले गेट से अपना वाहन अंदर ले जा सकते हैं। जनक
गंज स्थित छत्री मंडी मे सिंधिया राजघराने की तीन छतरियाँ हैं। पहली छत्री जो छोटी
पर भव्यता मे अद्वतिय जनको जी राव
सिंधिया (शासन 1755-1761) की, दूसरी छत्री जो आकार
मे बड़ी, दौलत राव सिंधिया (शासन 1794-1827) की और तीसरी जायाजी राव सिंधिया (शासन 1843-1886)
की थी जिसपर संस्कृत भाषा मे एक छोटा शिला
लेख भी लगा हैं। ऐसा बताया जाता हैं कि सिंधिया घराने के दो सदस्यों की छतरियाँ
उनकी इच्छानुसार शिवपुरी मे बनी हैं बाकी अन्य सदस्यों की छत्रीयां उनके महल
जयविलास पैलेस के दक्षिण दिशा के द्वार के सामने बनी हैं। ऐसा माना जाता हैं कि पैलेस का ये दरवाजा सिर्फ किसी सदस्य के
देहावसान के समय ही खोला जाता है। महल के सामने स्थित सिंधिया राजघरानों के
पूर्वजों की समाधियों के दर्शन करने पर
आपको 50 रुपए का शुल्क अदा करना पड़ेगा। पर यहाँ इन छत्रियों को देखने का कोई शुल्क
नहीं हैं।
मंदिर नुमा इन छत्रियों के परिसर के प्रवेश
द्वार के सामने बने प्रांगण के सामने बाएँ और दायें एक-एक समाधि बनाई गयी हैं। इस
प्रांगण से लगे बायें तरफ तरफ बने प्रांगण
के प्रवेश करते ही इटेलिअन वास्तु से निर्मित गोल स्तंभों पर बना एक छोटा शिव
मंदिर था। इसी गोल स्तंभों के वास्तु शास्त्र
को ग्वालियर मे बाड़े स्थित मुख्य डाक घर और स्टेट बैंक के नए भवन पर भी
देखा जा सकता हैं। मैंने इसी वास्तु निर्माण को दिल्ली के कॅनाट प्लेस, पन्ना के एक मंदिर और कुचेसर फोर्ट के हरिटेज होटल मे भी देखा।
मंदिर के साथ ही अद्भुद वास्तु कला को
दर्शाती बलुआ पत्थरों से निर्मित भव्य और
सुंदर छत्री बनी हैं जो कि सिंधिया राजघराने के जनको जी राव सिंधिया की हैं। जो आज
बंद थी पर ऐसा बताया गया हैं कि इस छत्री के गर्भ गृह मे मे
भगवान शिव का मंदिर हैं। प्रायः सिंधिया वंश के हर परिवार की समाधि के साथ भगवान
शिव का मंदिर अवश्य होता हैं। इन छत्रियों
के दैनिक कार्यक्रमों मे ऐसी दिनचर्या है जो उनके
जीवित रहते हुए की जाती रही अर्थात सुबह का जागरण, दोपहर का प्रसाद और शयनार्ती आदि। ऊंचे चबूतरे पर वैदिक वास्तु
शैली मे मंदिर का मुख्य द्वार पत्थरों से निर्मित कलाकृतियों को उकेर कर बनाया गया
हैं। प्रवेश द्वार के उपर श्री गणेश की छोटी
प्रतिमा और उसके उपर बड़ी ही भव्य छीर सागर मे सर्पराज की सैया पर लेते भगवान
विष्णु और देवी लक्ष्मी को दिखाया गया है
उनकी नाभि से निकले कमल को भी देखा जा सकता है। दोनों ओर हाथों मे दंड लिये द्वारपाल नज़र आते
हैं जिंका गणवेश मराठा शैली का हैं। उनके उपर छोटे से मंदिर मे दोनों ओर लड्डू
गोपाल विराजमान हैं। दरवाजे पर अर्धवलयकर सुंदर नक्काशी का द्वार बनाया गया हैं। छत्री
के चारों तरफ बड़ी खूबसूरती से वेलबूटे,
ज्योमिति और मंदिर की आकृति उकेरी गयी हैं। मंदिर के चारों तरफ ठोस पत्थर के
हथियों की शृंखला बनाई गयी हैं। विशेष तरह के दैत्याकार आकृति भी आकर्षण का विषय
है। मंदिर के उपर बाड़े ही सुंदर ढंग से
ग्वालियर पत्थरों से झरोखे बनाए गया हैं। मंदिर के पिछले भाग मे भगवान शिव का
मंदिर हैं।
दौलतराव सिंधिया की छत्री बाहर से दो मंजिला
भवन मे बड़े आकार बनी हैं लेकिन छत्री की वास्तु और कलात्मकता के विषय मे यह जनको
जी राव सिंधिया की छत्री से कमतर हैं। छत्री मे प्रवेश के लिए दोनों ओर से सीढ़ियों
से रास्ता बनाया हुआ है। दरबाजे के उपर भगवान गणेश की छोटी से प्रतिमा है और
दरबाजे के दोनों ओर बड़े आकार के द्वारपाल की सुंदर प्रतिमाएँ मराठा सरदारों के
पहनावे और विशेष आकृति की पगड़ी पहने दंड के साथ
देखे जा सकते हैं। पूरी दीवार पर फूल पत्ते, वेलबूते की आकृतियों को उकेरा गया हैं। जो आकर्षक और सुंदर
हैं। लकड़ी के दरवाजों के उपर अर्धवलयाकार आकृति मे विभिन्न रंगों के काँच की
पट्टियाँ उन दिनों के काँच के रंगों की वास्तु शैली को उजागर करते हैं जो कि उन
दिनों यूरोपियन देशों मे प्रचलित था।
जायाजी राव सिंधिया की छत्री मे समय के
हिसाब से कलात्मकता और वास्तु शैली मे क्षरण स्पष्ट ड्राष्टिगोचर होता हैं। छत्री
अति साधारण है लेकिन स्थान और आकार की दृष्टि से राजघराने के सदस्यों के प्रति
श्रद्धा और समर्पण की दृष्टि से किसी भी मामले मे कम नहीं हैं। प्रांगण मे प्रवेश
के पूर्व बनी द्वारपालों की भेषभूषा और शक्ल से भारतीय प्रतीत नहीं होती। ऐसा लगता है मानों द्वारपाल
चीनी मूल का हो। इस पर इतिहास के विध्यार्थी ही कुछ प्रकाश डाल सकते हैं।
रोकड़िया हनुमान ( बड़े हनुमान ) छत्री मंदिर
ग्वालियर - इसी परिसर मे जनको राव सिंधिया की छत्री के
पास एक सुंदर हनुमान मंदिर स्थित है जिसे
बड़े हनुमान या रोकड़िया हनुमान मंदिर भी कहा जाता है। इस मंदिर मे बाल हनुमान की
प्रतिमा है जिसकी स्थापना सिंधिया राजदरबार के सेठ रामचंद्र पेंटर ने की था। इस
मंदिर की ग्वालियर के लश्कर सहित दूर दूर तक लोगो के बीच बढ़ी मान्यता हैं। ऐसी माना जाता है कि जो भक्त इस मंदिर मे लगातार पाँच मंगलवार
तक दर्शन करता हैं भगवान हनुमान उसकी सारी मनोकामना पूरण करते हैं।
इस तरह होली के इस पवन पर्व के दिन ग्वालियर
राजघराने की कलात्मक छत्रियों को नजदीक से देखने और अनुभव करने की ये यात्रा
परंपरागत विरासत को देखने की यादगार यात्रा थी। जब कभी भी आप ग्वालियर पर्यटन पर आयें तो कुछ समय निकाल कर जनकगंज,
छत्री मंडी स्थित इन छत्रियों का भी भ्रमण अवश्य करें जो दर्शनीय ऐतिहासिक महाराज बाड़े से चंद कदमों की दूरी पर
ही है।
विजय सहगल





























