"पटिया वाले बाबा-करह
धाम-मुरैना मध्य प्रदेश"
मध्य
प्रदेश के मुरैना जिला जहां एक ओर दुर्दांत दस्यु अर्थात डाकूँओं के लिए कुख्यात
रहा हैं वही दूसरी ओर पुरातन काल से ही
यहाँ बड़े सिद्ध महात्मा और साधु हुए है
जिनकी यह जिला तपस्थली रही हैं। जहां एक
ओर पोरसा मे नागाजी महाराज, करह या पटिया वाले धाम, बाबा चेतनदास, सिद्धा रामदास महाराज, बाबा देवपुरी, घिरौना धाम, बाबा बालक दास आदि सिद्ध पुरूष और
तपस्वी हुए हैं वहीं दूसरी ओर ग्राम एंति
मे ऐतिहासिक शनिचरी मंदिर, बटेश्वर की मंदिर श्रंखला, गढ़ी पढ़वाली, चौसठ योगिनी मंदिर मितावली और ककनमठ का प्राचीन शिव मंदिर जो पुरातात्विक
महत्व के स्थल भी हैं, अपनी वास्तु और कलात्मकता के लिये जाने जाते है। इन सिद्ध महात्माओं और इन पवित्र स्थानों का न केवल इस क्षेत्र
अपितु दूर दूर के लोगो के बीच यहाँ के प्रति
लोगों की
गहरी आस्था और विश्वास है अपितु अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति हेतु इन के
कर्मक्षेत्रों मे विशेष श्रद्धा और मान्यता
हैं। यही कारण हैं कि इन धार्मिक स्थलों
पर हर रोज हजारों लोग अपनी हाजिरी लगाते हैं। ऐसे ही एक महत्वपूर्ण स्थल जो आगरा मुंबई राष्ट्रीय राजमार्ग क्रमांक 44 पर
ग्वालियर से मुरैना की ओर 40 किमी पर जाने
पर बनमोर से कुछ आगे बाएँ ओर एक रास्ता करह धाम के लिए जाता है। इस करह धाम को
बाबा पटिया वाले के नाम से भी लोग पुकारते हैं, शांक नदी के
किनारे यह एक पवित्र और पावन स्थान हैं। यूं तो आगरा मुंबई राष्ट्रीय राजमार्ग से
सैकड़ों वार आना जाना हुआ पर जिसके दर्शन का सुखद संयोग का सौभाग्य मुझे 10 जनवरी
2025 को अपने परम मित्र अश्वनि मिश्रा के साथ
प्राप्त हुआ।
ऐसा
कहा जाता है कि धनेला गाँव के पास स्थित करह धाम की स्थापना बाबा चेतनदास की तपस्थली के
रूप मे शुरू हुई, इसी तप साधना को उनके शिष्य बाबा
रामदास ने आगे बढ़ाया। बाबा चेतनदास जी ने रामदास बाबा को सिद्ध रामदास के
नाम से अलंकृत किया। आज भी बाबा सिद्ध रामदास द्वारा रोपित बरगद का पेड़ उनकी
पवित्र स्मृति को उनके अनुयायि याद करते
हैं। ऐसा कहा जाता हैं कि इस वियवान जंगल मे बाबा के पास जंगली पशु शेर, भालू आदि आश्रम मे चले आते थे। यहाँ आने वाले उनके शिष्यों को इस स्थान पर भोजन प्रसादी के दूध के रूप वितरित
किया जाता था इस हेतु सदैव कढ़ाह मे अग्नि
से प्रज्वलित रहा करती थी। यही कढाह बाद मे कड़ाह और कालांतर मे करह नाम से विख्यात
हुआ। पुरातन करह को आज भी आश्रम मे सँजो कर रक्खा गया हैं। मेरा अनुमान हैं कि इस
करह अर्थात कढाह की क्षमता लगभग तीन हजार लीटर दूध से भी अधिक
होगी। ऐसे अनेकों करह आश्रम के भंडरगृह मे जहां तहां देखने को मिल जाएंगे।
करह
नामक स्थान को पवित्र धाम मे बनाने मे पटिया वाले बाबा राम रतन दास महाराज की
महत्वपूर्ण भूमिका रही। बचपन से ही भगवान राम के प्रति अनुराग और भक्ति के कारण
करह मे भगवान राम जानकी मंदिर के सामने पड़ी पटिया पर वर्षों तपस्या करने के कारण वे पटिया वाले बाबा के नाम
से प्रसिद्ध हुए।
मुख्य
सड़क के बाएँ तरफ एक बड़ा, भव्य और विशाल द्वार नज़र आता है
जो कराह धाम के पवित्र स्थान का प्रवेश द्वार हैं। कुछ दूरी पर जाते ही सुंदर पीले
रंग से पुते एक अन्य प्रवेश द्वार के आते ही अंदर चारों तरफ के भवनों का रंग इसी
रंग मे ही रंगा दिखाई दिया। पीले रंग से अधिकतर भवनों के पुते होने पर इस छोटे से
कस्बे की भव्यता और सुंदरता और भी आकर्षक और प्रभावशाली नज़र आई। बड़ी पक्के विशाल
आँगन मे चारों ओर अलग अलग भवन नज़र आए। एक तरफ धर्मशाला का निर्माण यहाँ आने वाले
दर्शनार्थियों के लिए बनाई गयी थी। सामने ही गऊ शाला दिखाई दी। मंदिर के रास्ते मे
दोनों तरफ प्रसादी और अन्य पूजन सामाग्री की दुकाने थी साथ ही बच्चों के खिलौने, और अन्य सामान की दुकाने भी थी। पुनः एक ऊंचे बड़े चबूतरे पर एक वटवृक्ष दिखलाई
दिया जो कराह धाम के बाबा सिद्ध राम दास जी
महाराज द्वारा रोपित था। दूसरी ओर राम धुन गा रही महिलाओं की बैठक थी।
विदित हो कि यह राम धुन भजन पिछले 50 वर्षों से भी अधिक निरंतर अखंड जाप की तरह
किया जा रहा है। सिद्ध रामदास जी महाराज
की गद्दी और चरणपादुकायेँ रक्खी हुई थी। सामने ही एक कुआँ बना हुआ था ऐसी मान्यता
है कि इस कुएं के जल मे स्नान करने और जल पीने से से कुत्ते काटने के दुष्प्रभाव
समाप्त हो जाते हैं। एक महिला अपने साथ इस पवित्र जल को ले कर अपने साथ ले जा रही
थी उसने बताया जो लोग कराह धाम आने मे असमर्थ हैं उन तक जल पहुंचाने और पिलाने से
भी कुत्ते के काटे का दुष्प्रभाव समाप्त हो जाता हैं। कुएं के चारो तरफ चार हैंड
पंप से कुएं का पानी निकाला जा सकता हैं। पास ही पवनसुत हनुमान के ग्यारह रूपों की एक
विशाल प्रतिमा भी महाराज जी द्वारा बनवाई गयी है जो अपने आप मे अकेली और अनोखी है।
जगह जगह श्री राम संकीर्तन मंत्र "सीता राम, राधे
श्याम" लिखा हुआ था। कराह धाम का सम्पूर्ण वातावरण राम-कृष्ण मय था। मंदिर की
एक दीवार की ऊंचाई पर एक डाक विभाग का लाल पोस्ट बॉक्स देख कर आश्चर्य हुआ कि शायद
डाक विभाग ने भी चिट्ठी पत्रियों की प्रासंगिकता की समाप्ति को स्वीकार कर लिया है
तभी पोस्ट बॉक्स को इतनी ऊंचाई पर लगाया हैं कि साधारण जन तो डिब्बे मे चिट्ठियाँ
डाल ही नहीं सकते या पत्रों को डालने के लिए सीढ़ियों की सहायता लेनी होगी। यहाँ के
क्षेत्रवासी नए वाहनों की खरीदी पर सबसे पहले करह धाम लाकर वाहनों को संकट से
बचाने के लिए यहाँ पूजा करने आते हैं। ऐसे ही एक नवयुवक लवकुश अपने नए ट्रैक्टर के
साथ डबरा से पूजा करने महाराज जी के पास आया था।
मंदिर
के प्रवेश द्वार के नजदीक ही करह धाम का एक परिक्रमा पथ भी बना है जो पेड़ो और
फुलवारियों से आच्छादित है। पथ मे विभिन्न
प्रकार के पक्षियों के साथ बहुतायत मे मोरें भी दिखाई देती है। ऐसा कहा जाता है इन
मोरों के कारण ही इस क्षेत्र का नाम मुरैना पड़ा है। पथ मे पटिया वाले बाबा की बैठक, शयन कक्ष, यज्ञ शाला इत्यादि हैं। रास्ते
मे जगह जगह आने वाले श्रद्धालुओं द्वारा पत्थरों को एक के उपर एक रक्ख कर घरों की आकृति
बनाई गयी थी । ऐसी मान्यता है कि जो भक्तगण घर बनाने की अभिलाषा से यहाँ घरों की
आकृति बना कर जाते हैं पटिया वाले बाबा उस भगत की मनों कामना पूर्ण करते हैं। करह धाम मे महाराज की समाधि वाले कमरे मे बहुत से
पाँच, सरपंच, परिषद के स्वतंत्र प्रत्याशियों
के पोस्टर भी देखने को मिले जो शायद बाबा जी के आशीर्वाद प्राप्त करने हेतु लगाए गए
थे।
अब
मै आपको करह धाम के भंडारगृह के बारे मे
अवगत कराना चाहूंग जो कि अति विलक्षण और आश्चर्यचकित करने वाला हैं। भंडार गृह मे
घुसते ही बीच पक्के रास्ते के दोनों ओर एक बड़ी कंक्रीट की छत्त के नीचे, लगभग 8-10
फीट वृत्ताकार के 4-4 बड़े बड़े समतल करह, को पक्के सीमेंटेड
चूल्हों पर फिक्स कर लगाया गया था। ये विशेष समतल लोहे के कढाहे मालपूए बनाने के
लिये उपयोग मे लाये जाते हैं। कराह धाम पर हर वर्ष माघ महीने की पूर्णिमा से फागुन
माह की नौमी तक सिया पिय मिलन समारोह मनाया जाता है। इस अवसर पर यहाँ विशाल भंडारे
का आयोजन किया जाता हैं और भंडारे मे सिर्फ खीर और मालपूए का प्रसाद वितरण किया
जाता हैं, जिसमे
लाखों लोग दूर दूर से शामिल होने के लिए आते हैं, तब की छंटा
देखते ही बनती है। खीर बनाने के लिये मालपूए की तरह ही विशाल लेकिन गहरे कढाहे
आश्रम के पिछवाड़े बने हुए हैं। इन 7-8
कढ़ाहों मे भी हजारों लीटर दूध मे चावलों को पकाया जाता हैं। फिर बनी हुई
खीर को कढाहों के पीछे टाइल्स की हौदियों मे एकत्रित कर आगे भंडारे मे वितरण के
लिये भेजा जाता है और उन खाली कढ़ाहों मे फिर से खीर बनाने का सिलसिला नौमी तक
निरंतर चलता रहता हैं।
खीर
और मालपूओं को बना कर भंडरगृह मे एकत्रित किया जाता हैं और इस मेले मे निरंतर चल
रहे भंडारे मे प्रसादी वितरित की जाती हैं। ऐसे मान्यता हैं कि माघ और फागुन के इस
मेले मे यहाँ से निकलने वाली हर बसों मे बैठे यात्री भंडारा ग्रहण करने के पश्चात
ही अपना आगे का सफर पूरा करते हैं।
जय बोलो पटिया वाले महराज की जय!!!!
विजय सहगल











2 टिप्पणियां:
बहुत अच्छा विवरण। बधाई के पात्र । मुझे भी अपनी तैनाती के दौरान दर्शन का सौभाग्य मिला । पटियाल वाले बाबा की जय ।
संजीव टंडन ( उपरोक्त टिप्पणी मेरे दौरा प्रेषित)
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