"हुक्के
की
गुढ़ गुढ"
11 जनवरी 2025 को अपने गुड़गाँव प्रवास के
दौरान प्रातः भ्रमण मे मेरा ध्यान सड़क किनारे लगे एक बोर्ड ने खींचा जिस पर लिखा
था हरियाणा देशी तंबाकू हुक्का भंडार। यूं तो हुक्के से परिचय पुराना था हुक्के पर
मुहावरे पहले सुन रक्खे थे, पर हुक्के के क्रय बिक्रय के साथ उसकी रिपइरिंग,
शादी विवाह, पार्टी मे हुक्कों की
व्यवस्था करने आदि का विज्ञापन पहली
वार देख जिज्ञासा वश दुकानदार के पास
बातचीत के सिलसिले मे मिला। दुकान मालिक शिवनारायन जो जनवरी की सर्दी से बचाव करते
हुए एक तस्सल मे आग जलाने का जतन कर रहे थे। अभिवादन की औपचारिकता करने पर,
कहीं उन्हे मेरे ग्राहक होने का भ्रम न हो तो पहले ही हमने अपना घुममकड़ी परिचय
देते हुए हुक्का के बारे मे अधिक जानकारी चाहने
का मंतव्य बता दिया ताकि सबेरे सबेरे बोहनी खराब का इल्जाम न लग जाय। खैर...... । शिवनारायन से बातों का
सिलसिला शुरू हुआ तब तक उन्होने तस्सल आग जला कर सर्दी से बचाव का इंतजाम कर लिया
था। एक बड़े हुक्के के बारे मे बताते हुए उन्होने बतलाया कि हरियाणा मे हुक्का गाँव
देहात की चौपालों, बैठकों,
और पंचायतों का एक आवश्यक हिस्सा हैं। सामाजिक धार्मिक और राजनैतिक चर्चाओं मे भी
हरियाणा सहित उत्तर प्रदेश के मेरठ,
मुजफ्फर नगर नोएडा आदि क्षेत्रों मे भी आपसी, सामाजिक भाईचारे को बढ़ाने मे सक्रिय भूमिका
निभाता हैं। यध्यपि हुक्का पीना भी सिगरेट,
तंबाकू की तरह धूम्र पान स्वास्थय के लिये हानिकारक है लेकिन सदियों से प्रचलन मे
हुक्का, जाति,
धर्म से परे हरियाणा मे आपसी सौहद्र बढ़ाने मे अहम भूमिका निभा रहा हैं।
लकड़ी या धातु के एक सीधे पाइप के सिरे पर
माटी से बनी चिलम लगी होती है जिसमे हुक्के की तंबाकू को भरा जाता हैं जबकि पाइप
का निचला सिरा धातु से बने बर्तन मे भरे पानी मे डूबा रहता हैं। उपर की चिलम मे
भरी तंबाकू पानी से भरे पात्र मे पाइप के माध्यम से कहीं नीचे न गिरे इसको रोकने
के लिये एक मिट्टी की गोली डाल कर उसे रोका जाता है। भारत,
तुर्की, अरब,
फारस और चीन मे हुई हुक्के की के उत्पत्ति के इस यंत्र ने वेशक धूम मचाई हो पर
हरियाणा के गाँव-गाँव मे इसका चलन इस बात
का सबूत है कि ग्रामीण सांस्कृति मे हुक्का ने समरसता बढ़ाने मे बड़ा महत्वपूर्ण योगदान है। शादी विवाह समारोह मे तो
विशेष रूप से हुक्कों की सप्लाइ शिवनारयन द्वारा की जाती हैं। एक हुक्का 4-5 से लेकर 12-15 लोगों के लिये
पर्याप्त रहता हैं। उम्र के हिसाब से समूह बन जाते हैं और 5-6 हुक्के भी शादी
विवाह पार्टी आदि मे समूह के अनुसार लगाए जाते हैं। दुकान का एक कर्मचारी हर
हुक्के मे तंबाकू, आग,
पानी, चिलम भरने आदि की सेवायें दे कर हुक्का
पार्टी को निरंतर सुचारु रूप से चलाने मे
सहायक की भूमिका निभाता है।
अब बारी थी 15-20 लीटर के तीन कंटेनर जिसमे
तंबाकू रक्खी थी। तंबाकू की तीव्रता के हिसाब से उन्हे तीन भागों मे विभक्त किया
गया था। हल्की और मीठी तंबाकू जिसमे नशे
की मात्रा न के बराबर होती है, तीव्रता के
अनुसार मध्यम और तेज़ तंबाकू को उनकी तीक्षणता के हिसाब से विभक्त किया जाता
हैं। कीमत का निर्धारण भी हल्की तंबाकू
सस्ती और क्रमश: मध्यम और तीक्षण की कीमत होती है। तीनों तरह की तंबाकू मे गन्ने
के शीरा को मिलाकर हल्का, नमी युक्त कर
दिया जाता है जिससे तंबाकू मे एक विशेष प्रकार का स्वाद और सुगंध पैदा होती हैं।
इस खुशबू की तुलना सिगरेट या बीड़ी से निकलने वाले धुआँ से कर सकते है। तंबाकू से निकलने वाली इस गंध को मैंने
सूंघा जो बहुत प्रिय तो नहीं थी। अब बारी थी उस गन्ने के रस को देखने,
गंध को सूंघने और स्वाद लेने की जिसे इस तंबाकू मे मिलाया जाता हैं। एक प्लास्टिक
के कंटेनर मे सुर्ख काले रंग का द्रव्य भरा था जो देखने मे कुछ कार या स्कूटर के
इंजिन के जले हुए तेल या पिघले हुए कोलतार की तरह था। शिवनारायन ने बतलाया कि ये उत्पाद
गन्ने के रस को गर्म कर गुड बनाते समय
उसके उपर उतराने वाले मैल को एकत्रित कर बनाया जाता है। जिसकी गंध तीक्ष्ण और
अप्रिय सी लगती हैं। इस रस का स्वाद अति मीठा सड़े हुए फलों की तरह था जिसे
स्वादिष्ट तो कदापि नहीं कहा जा सकता।
अब आते हैं हुक्का तैयार करने की विधि पर।
तैयार तंबाकू को चिलम मे भर कर उसके उपर लगभग 3 इंच व्यास की गर्म अवतल लेंस के
आकार की मिट्टी से बनी डिस्क को रक्खा जाता हैं और उसके उपर थोड़े थोड़े लकड़ी के
जलते कोयले के टुकड़े डाल दिये जाते हैं। गर्म कोयले के टुकड़े मिट्टी की डिस्क को
लगातार गर्म किए रहते हैं और ये डिस्क धीरे धीरे तंबाकू को जलाती रहती हैं। जैसे
ही नीचे लगे पीतल के लोटे नुमा पात्र जिसमे पानी भरा रहता हैं और इस पात्र दे
निकले दो पाइप जिसमे एक सीधा पाइप का,
एक सिरा जिसमे चिलम लगी होती है और दूसरा जो पीतल के पाइप से जुड़ा होकर पानी मे
डूबा रहता है। दूसरा पाइप जो पानी के बाहर होता है उसके दूसरे सिरे पर एक पीतल की
खोखली नोब को मुट्ठी मे बांध कर हुक्का पीने वाला मुंह से अंदर की तरफ सांस खींचता
है, जिससे गुढ़-गुढ़ जैसी आवाज आती है। अंदर
की तरफ सांस खींचने से हवा जलते कोयले और तंबाकू से से होकर पाइप से पानी के नीचे से बुलबुले के
रूप मे दूसरे पाइप से होती हुई हुक्का पीने वाले के मुंह मे धुआँ के रूप मे प्रवेश
करती हैं। इसी धुएँ का स्वाद मुँह मे अनुभव कर हुक्का पीने वाला बापस धुआँ को मुँह
से निकाल कर हुक्के के एक चक्र को पूरा करता हैं। यही क्रम एक के बाद दूसरे हुक्का
प्रेमी द्वारा दोहराया जाकर, हुक्के के दूसरे
सिरे को क्रमशः चारों तरफ बैठे हुक्का प्रेमियों द्वारा दोहराया जाता है। अब बिना
हुक्का गुढ़-गूढ़ाए उसका स्वाद बतलाने के पूर्व आवश्यक था हम भी एक-दो कॅश खींच
हुक्का गुढ़-गूढ़ाते। फिर क्या था हमने मे हुककि को अपनी मुट्ठी मे पकड़ सांस अंदर को
खींची। चिलम से होते हुए तंबाकू का धुआँ मुँह और नाक मे आ गया। हुक्का प्रेमियों
से माफी मांगते हुए लिखना चाहते हैं कि उस धुएँ का स्वाद बहुत ही बेढ़व कसैला और
वेस्वाद था। पहले हुक्के के पानी वाले
पात्र मे लगे पाइप को दूसरे हुक्का पीने वाले की तरफ बढ़ाने के लिये पूरे हुक्के को
घूमना पड़ता था कालांतर मे आवश्यकता आविष्कार की जननी की नीति के तहत एक लंबा लचीला लेजम की तरह का पाइप लगाने का चलन शुरू
हुआ जिसके लिये हुक्के को बगैर खिसकाये मात्र लचीले पाइपे को आसानी से दूसरे की
तरफ बढ़ाना आसान हो गया। आधुनिक हुक्के मे पीतल के पात्र के नीचे एक चक्री नुमा बालबेयरिंग
की प्लेट लगा दी गयी जिसकी सहायता से हुक्के को किसी भी दिशा मे मोड़ना आसान हो
गया। हुक्के मे लगातार शोध और अनुसंधान के एक नये रूप के भी दर्शन गुरुग्राम
के रामपुरा गाँव मे देखने को मिले। सुरेश
नमक व्यक्ति के दुकान पर पंचमुखी हुक्का देखने को मिला जिसमे एक ही हुक्के मे पाँच
चिलम लगी हुई थे और जो कलात्मकता से लकड़ी
पर उकेरे गये ज्योमिति के चित्रों सुसज्जित था।
हरियाणा मे बुजुर्ग महिलाओं मे भी हुक्के
पीने का चलन देखने को कहीं कहीं मिल जाता है। इन बुजुर्ग महिलाओं द्वारा प्रयुक्त
इस हुक्के को हुक्की कहा जाता है। हुक्का रूपी धूम्रपान को पीने वाले इस धूम्रपान
को स्वास्थय के लिये हानिकारक नहीं मानते क्योंकि इस का धुआँ पानी से होकर मुँह मे
आता हैं जबकि सिगरेट, बीड़ी या अन्य
तंबाकू के उपत्पाद का धुआँ सीधे मुँह मे जाता हैं जो आगे कैंसर का कारण बनती हैं।
हैल्थ की दृष्टि से कुछ भी हो जो एक शोध का
विषय हो सकता हैं लेकिन इस बात मे कोई शक
नहीं कि हुक्का का कॅश लगाते समय पानी से निकलने वाली गुढ़-गुढ़ की आवाज के हरियाणा
वासी दीवाने हैं। शायद हुक्के के महत्व को देखते हुए ही हमारे साहित्यिक भाषा मे
हुक्का के उपर मुहावरे भी बने हैं जैसे हुक्का भरना (चापलूसी करना),
हुक्का पानी बंद करना (समाज से बहिष्कृत करना),
हुक्का गुढ-गुढाना (समय व्यर्थ गँवाना)। हुक्का पीने का चलन हरियाणा सहित पश्चिमी
उत्तर प्रदेश मे आपसी भाईचारे, भ्रातृत्व और
बंधुत्व को बढ़ावा देकर समाज मे समरसता,
सामंजस्य और मेलजोड़ को बढ़ावा देता है जिसमे कोई शंका संदेह और संशय नहीं है।
विजय सहगल






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