शुक्रवार, 28 फ़रवरी 2025

महा कुम्भ 2025, प्रयागराज - न भूतो न भविष्यते

 

"महा कुम्भ 2025, प्रयागराज - न भूतो न भविष्यते"











एको अहं द्वितीयो नास्ति, न भूतो न भविष्यति' अर्थात मै एक ही हूँ, दूसरा कोई नहीं हैं, न हुआ है, न होगा!! यह  अद्वैत वेदान्त का एक सिद्धान्त है जो महाकुम्भ-2025, प्रयागराज पर सटीक बैठता है। बेशक, खगोल शास्त्र मे 144 वर्ष पूर्व के गृह नक्षत्रों की ठीक ऐसी ही स्थिति ने प्रयाग महाकुंभ 2025 के इस पर्व  को  और भी महत्वपूर्ण बना दिया। 7 फरवरी 2025 को इस दिव्य और भव्य महाकुंभ मे सपत्नीक मुझे भी शामिल होने और संगम मे डुबकी लगाने का परम सौभाग्य प्राप्त हुआ। हर किसी शुभ और पवित्र कार्य मे कोई न कोई व्यक्ति या संस्था सहायक होती है, इस परम धार्मिक और भारतीय सांस्कृतिक प्रथाओं और परम्पराओं मे सहभागी होने पर, बगैर किसी शंका और संदेह के उत्तर प्रदेश की योगी सरकार तो है ही साथ ही साथ हमारे समधी द्वय रीना-जुगल किशोर रावल ने भी मेरे परिवार को इस महा कुम्भ मे  संगम स्नान के लिये  अति महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जिससे इंकार नहीं किया जा सकता। रावल दंपति के साथ और सहयोग के बिना, तीन दिन लगातार विशाल महाकुंभ क्षेत्र की परिक्रमा कर पूरे मेला क्षेत्र का जायजा लेना कठिन ही नहीं असंभव था। इन तीन दिनों मे पूरे मेला क्षेत्र मे लगभग 70-80 किमी॰ की यात्रा रावल साहब के प्रयागराज और संगम क्षेत्र के अच्छे ही नहीं बहुत अच्छे भौगोलिक ज्ञान का परिणाम थी।

6 फरवरी 2025  को एक-दो छोटी-मोटी बाधाओ को छोड़ सड़क मार्ग से 465 किमी॰ की दूरी तय करने मे कहीं कोई बाधा नहीं आयी। कहीं कोई जाम, अवरोध दिखलाई नहीं पड़ा। छः लाइन का रास्ता सरल और सुगम था। प्रयागराज के पूर्व 25-30 किमी॰ की शहरी यात्रा मे कुछ भीड़ भाड़ दिखी जो स्वाभाविक ही महाकुंभ क्षेत्र, जहां हर रोज करोड़ो श्रद्धालुओं की भीड़ जुट रही हो ऐसा होना लाज़मी था। गुरुवार 5 फरवरी को शाम पाँच-सवापांच बजे मै उनके आवास पर बिना किसी रुकावट के पहुंच गया पर मेरी, सुगम, बाधा-रहित यातायात की   इस गलत फहमी ने, उसी शाम को मेला क्षेत्र मे गंगा-संगम क्षेत्र तक कार से जाने के इरादे को धराशायी कर दिया, जब रावल जी के प्रयाग राज की गली-कूँचों से वाकिफ होने के बावजूद भीड़ मे 2-3 घंटे की यात्रा मे जाम मे फंसे रहने के कारण  हम लोगों को घर बापस आने को मजबूर कर दिया। संगम तट पर न जाने की लालसा मे यातायात के बिघ्न से निराश तो था लेकिन सौभाग्य से सिविल लाइंस मे स्थित हनुमत निकेतन मे रामदूत, राम भक्त हनुमान जी मंदिर मे दर्शनों का सौभाग्य प्राप्त होने से मन प्रफ़्फुलित हो गया।  मंदिर क्षेत्र के आसपास और पूरे रास्ते मे कुम्भ स्नान मे  आये श्रद्धालुओं को देख कर,  सरकार द्वारा की गयी तैयारियों की झलक देखने को अवश्य मिल गयी। जगह जगह रंगीन लाइटों से जगमगाते मार्ग, पेड़ो और चौराहों पर झिलमिलाती बत्तियों के बीच अनवरत पैदल आते जाते लोगों का हजूम प्रयागराज की रात मे भी दिन होने का अहसास करा रहा था। चका चौंध भरी रात्रि और उस पर गुलाबी सर्द हवा, इस बात का स्पष्ट गवाही दे रही थी कि सिवाय पैदल चलने के श्रमसाध्य कठिनाई के अलावा प्रयाग मे यात्रियों को कदाचित ही कोई असुविधा महसूस हुई  हो।

प्रयागराज के पूरे रास्ते असंख्य श्रद्धालुओं का तांता लगा हुआ था जो या तो कुम्भ स्नान के बाद खुशी खुशी अपने गंतव्य के लिये बस स्टैंड या रेल्वे स्टेशन की ओर जा रहे थे या रेल्वे स्टेशन से गंगा स्नान की बलबती इच्छा मन मे लिये संगम घाट की ओर जोश और उत्साह से, हर हर गंगे, जय महाकुंभ, हर हर महादेव  के जयकारे लगाते हुए त्रिवेणी की ओर जा रहे थे। किसी भी श्रद्धालु के मन मे कोई शिकायत नहीं थी, चेहरे पर तेज और मुस्कान इस बात का सबूत थी कि इन लोगो के मन मे अपनी सांस्कृति सभ्यता और सनातन के प्रति कितनी गहरी आस्था, श्रद्धा और सम्मान है।  चार पहिया वाहन के निषेध के कारण जिसको जो साधन मिला, कोई  ई-रिक्शा, या अन्य कोई दोपहिया वाहनों से जा रहे थे।  कोई  तो तीन पहिया रिक्शा और कहीं कहीं तो सामान ढोने वाले रिक्शे मे बैठ यात्री अपनी अपनी मंजिल की ओर बढ़ रहे थे। जहां कहीं थोड़ी बहुत भी चढ़ाई होती तो रिक्शे से कुछ लोग उतर और कुछ लोग रिक्शे मे धक्का लगा कर रिक्शा चालक के श्रम मे सहयोग कर उसकी थकान मे राहत दे रहे थे। हनुमान मंदिर के प्रांगढ़ मे या उसके आसपास पैदल चल रहे महाकुम्भ  श्रद्धालुओं को दो घड़ी आराम कर सुस्ताने के दृश्य जहां तहां देखने को मिले। रास्ते मे फुटपाथ, मैदान, पार्क आदि जगह भी बड़ी संख्या मे यात्रियों द्वारा अपने साथ लाये सिर पर पोटली मे रक्खे बिछौनों को बिछा-ओढ़ कर सोते, आराम करते देख उनके महाकुंभ मे शामिल होने की दृढ़ इच्छा शक्ति के  जज्बे जुनून को मै,  नमन किये बिना न रह सका। जगह जगह रास्ते, फुटपाथ, मैदानों मे सफाई की अभूतपूर्व व्यवस्था दिखलाई पढ़ रही थी।             

पूरे प्रयागराज मे सड़कों के किनारे और बीच मे लगे बिजली के खंभों पर रंग बिरंगी एलईडी बल्बों से बनी स्वास्तिक, डमरू, खाटू श्याम जी के तीन बाण की आकृति, नारियल और आम के पत्ते का  कलश, न्याय का प्रतीक तराजू, साधू बाबा द्वारा कुम्भ स्नान के बाद अपनी जटाओं को उपर फेंकने और महाकुंभ का प्रतीक अमृत कलश की चमकती आकृतियाँ दर्शाई गयी थी जो बड़ी ही मनमोहक और मन भावन थी। स्थानीय लोगो द्वारा जगह जगह भंडारे मे श्रद्धालुओं को सप्रेम भोजन ग्रहण कराया जा रहा था। जाति, धर्म, भाषा, प्रांत से परे सारे देश के विभिन्न प्रान्तों से आये महाकुंभ मे सहभागी हुए सनातन श्रद्धालुओं का ऐसा समागम दुनियाँ मे शायद ही कहीं देखने को मिलता हो।        

7 फरवरी 2025 का दिन जिसका मुझे काफी अधीरता से इंतज़ार था। प्रातः 7.30 बजे हम दोनों परिवार संगम पर त्रिवेणी स्नान की लालसा मे घर से निकले। महाकुम्भ मे घूमने के लिए  मेरे परिवार के लिये एक्टिवा  और बुलेट मे से एक को चुनने का विकल्प था तब इतनी भीड़ मे एक्टिवा  का चुनाव ही मेरे लिये सर्वश्रेष्ठ था। तमाम गलि-कूंजों से होते हुए हम लोग त्रिवेणी संगम की ओर बढ़े। अंग्रेज़ो के जमाने की वास्तु निर्माण से बना ऐसा पुल जिस की पहली मंजिल पर  सड़क और दूसरी पर रेल पुल था। लगभग एक शताब्दी से प्रयोग मे लाये जा रहे इस पुल पर महाकुंभ के  यातायात के दबाव के बावजूद आवागमन सुगम था। संगम पर स्नान करने जाते हुए यात्रियों के बीच एक महिला के सिर पर रक्खी पोटली से झाँकता एक छोटा से प्लास्टिक क्रिकेट बैट और महिला की  गोद मे 3-4 साल के बच्चे को देख दिल भर आया कि कैसे महाकुंभ मे अपनी आवश्यकताओं के बोझ को पैदल ढोने के साथ बच्चे के सुख-सुविधाओं के बीच संतुलन बनाना तो इस माँ से सीखे?

तमाम ऊंचे-नीचे रास्ते, पगडंडियों और नदी के किनारे बने रास्तों से, एक घंटे के पहले ही,   हम कब संगम के तट पर पहुँच गए पता ही नहीं चला। मीलों दूर तक टेंटों के समांतर पार्किंग की व्यवस्था बिना किसी पार्किंग शुल्क के एक कुशल व्यवस्था मे ही संभव थी। संगम स्नान के जाने के पूर्व लघुशंका हेतु, एक मेला कर्मी से जानकारी ले मै घाट से लगभग सौ गज दूर बने स्थान पर गया जहां एक ओर एक लिने मे लगभग 15-20 महिलाओं और दूसरे ओर इतने ही  पुरुष  शौंचालय  की लाइन थी। बाहर 3-4 नल लगातार चालू हालत मे दिखे। सफाई ठीक ठाक थी। लघु शंका से निवृत्त हो हम नाव पर सवारी के लिए घाट पर पहुंचे।   रावल जी से ज्ञात हुआ कि हम लोग अरैल घाट से त्रिवेणी संगम पर जाने के लिये नाव से प्रस्थान करेंगे। स्वाभविक ही था एक अनार सौ बीमार को चरितार्थ करती कहावत के अनुसार एक नाव मे चढ़ने के लिये पचासों लोग तैयार थे। मांग और पूर्ति के अर्थशास्त्र के दर्शन यहाँ दिखाई दिये। जिस संगम तक तट तक सहज भले मे नाव के नाविक  50 रूपये प्रति व्यक्ति ले चलने मे निहोरें करते थे आज वे ही मल्लाह हजार-बारह सौ रूपये प्रति व्यक्ति  के  मुंह मांगे दामों मे भी चलने मे आना कानी कर रहे थे। बारह साल बाद होने वाली इस फसल को काटने मे नाविक  भी पीछे कहाँ रहने वाले थे तब बिना  किसी तरह मोल-भाव के हम लोगो ने नाव से संगम की ओर प्रस्थान किया। घाट से त्रिवेणी संगम तक का नदी मार्ग एकल मार्ग था। यातायात के नियमों के सख्ती से पालन करवाने हेतु नदी पुलिस की एक चौकी नदी के बीच मे स्थित थी जिसको नियंत्रित करने वाले पुलिस कर्मी छोटे से माइक से नाव वालों को आवश्यक निर्देश दे नियंत्रित कर रहे थे। ये बात अलग थी कि सड़क पर यातायात की तरह रजिस्ट्रेशन, ड्राइविंग लाइसेंस या इन्शुरेंस के बदले बसूला जाने वाला शुल्क या बसूली यहाँ नहीं थी पर सुरक्षा जैकेट और अन्य व्यवस्थाओं का शक्ति से पालन कराया जा रहा था।

तीन नदियों के त्रिवेणी संगम पर दो-तीन कृत्रिम लेकिन बड़े द्वीप प्लास्टिक के पीपों को आपस मे जोड़ कर बनाये गये थे। इस प्रतिरूप द्वीप तक पहुँचने मे नावों की रेलम पेलम जरूर थी पर यात्रियों को, हाथ-पैर  नाव के अंदर रखने की हिदायत के साथ नाविक नावों को आगे-पीछे कर आगे बढ़ रहे थे। कृत्रिम द्वीप के चारों ओर के स्थान का अधिकतम उपयोग की नीति के तहत नाविक जददो-जहद करते ताकि हर तीर्थ यात्री सुगमता से संगम के नकली द्वीप पर पहुँच जाय। एक के पीछे दूसरी और फिर तीसरी नाव को आपस मे बांध कर नाविक श्रीद्धालुओं के लिये रास्ता बना रहे थे ताकि यात्री सुगमता पूर्वक कृत्रिम द्वीप पर पहुँच सके। द्वीप के एक कोने मे अपने सामान और वस्त्रादि रखने के बाद संगम मे स्नान के लिये उतरे। त्रिवेणी संगम मे मटमैले गंगा जल और यमुना नदी के हरे जल के रंग को देखा जा सकता था वही दोनों पवित्र नदियों के संगम से उत्पन्न माँ गंगा की पवित्र धारा तो देखते ही बनती थी। नदी का बहाव मध्यम था कहीं नदी की गहराई घुटने और अगले ही कदम पर कमर तक थी। पानी साफ सुथरा था। गंगा जल से पूरी काया को पवित्रीकरण और आचमन के पश्चात, पहली डुबकी ने  शीत लहर की तरह चुभन तो दी लेकिन उसके बाद शरीर से उत्पन्न ऊष्मा ने अंनगिनित डुबकी की ऊर्जा प्रदान कर दी। नदी के बहाव से कदम थोड़े बहुत डगमगाये लेकिन संगम की पवित्र डुबकी ने शरीर की सारी थकान मिटा दी और शरीर को  स्फूर्ति, उत्साह और उमंग से भर दिया। सूर्य को अर्क देने के पश्चात बापस आ वस्त्रादि बदल कर तैयार हो गए।   कृत्रिम द्वीप पर सैकड़ों की संख्या मे  महिलाओं के लिये चेंजिंग रूम  की अच्छी व्यवस्था थी। लगभग सवा-डेढ़ घंटे संगम पर स्नान आदि के पश्चात माँ गंगा की आरती, नमन और  संकल्प के पश्चात हम लोगो ने गंगा तट की ओर प्रस्थान किया।

मौसम सुहावना था गंगा स्नान के बाद सुनहरी धूप मे नाव से बापसी यात्रा भी सुहावनी थी। साथ मे लाये वेसन के सेव जब नदी मे उच्छाले तो अनेक साइवेरियन सफ़ेद पक्षी सेव को खाने के लिये नाव के साथ साथ उड़ने लगे। पक्षियों द्वारा अपनी टेयू-टेयू की  विशेष आवाज से वातावरण को एक विशेष संगीत से गुंजायमान कर दिया। संगम के बीच मे से नाव के पहुँचने पर नाविक ने लोगो द्वारा लायी गयी बोतलों मे गंगा जल भरने की सलाह दी। हम लोगो द्वारा लायी गई एक बोतल के साथ अन्य यात्रियों ने भी पवित्र गंगा जल भरा। नदी के मध्य मे सैकड़ों नावों को नदी मे आते-जाते देखना मन को सुकून देने वाला था। नदी के पृष्ठ भूमि मे प्रयागराज के किले की प्राचीरों ने इस दृश्य मे चार चाँद लगा दिये। मल्लाह ने नदी के तट के नजदीक ही छिछले पानी नाव  को लगाया, तब एक बार पुनः गंगा जल के परम पावन जल मे उतरने का सौभाग्य प्राप्त कर एक बार पुनः माँ गंगा को नमन कर कुम्भ मेले के दर्शनार्थ आगे बढ़े।

महाकुम्भ 2025-प्रयागराज मेले और मेला क्षेत्र की अन्य व्यवस्थाओं, गतिविधियां अगले ब्लॉग मे.................................

विजय सहगल

शनिवार, 22 फ़रवरी 2025

सालासर बालाजी मंदिर

"सालासर बालाजी मंदिर"









19 जनवरी 2025 को विश्व प्रसिद्ध सालासर बालाजी, हनुमान मंदिर के दर्शन का सौभाग्य प्राप्त हुआ। राजस्थान प्रदेश के चुरू जिले मे जयपुर-बीकानेर हाईवे पर सालासर कस्बे मे स्थित बालाजी मंदिर के बारे मे कहा जाता हैं कि इस मंदिर की स्थापना बाबा मोहन दास ने सन 1755 मे की थी। भक्त प्रवर श्री मोहन दास जी की भक्ति भावना से प्रसन्न होकर स्वयं रामदूत हनुमान ने असोटा ग्राम मे मूर्ति रूप मे प्रकट होकर श्री मोहन दास की मनोकामना पूर्ण की। ऐसी किवदंती है कि असोटा गाँव के एक किसान द्वारा अपने खेत की जुताई के दौरान अपने हल की नोक से एक पत्थर के टकराने की आवाज सुनी। किसान ने उस जगह की मिट्टी को जब और खोदा तो उसे एक हनुमान प्रतिमा की प्राप्ति हुई। इसी दौरान किसान की पत्नी उसके लिये लाये भोजन के साथ जब खेत मे पहुंची तो किसान ने अपनी पत्नी को हनुमान प्रतिमा को दिखाया। किसान की पत्नी ने वस्त्रों से प्रतिमा को साफ कर जल आदि से स्नान करा कर साफ किया और अपने साथ लाये बाजरे के चूरमे का प्रसाद अर्पण कर सिर झुका कर अपने आराध्य को नमन किया। ऐसा कहा जाता है तभी से भगवान बालाजी जी हनुमान को बाजरे के चूरमे का प्रसाद भी अर्पित किया जाता हैं।

भगवान बालाजी हनुमान के प्रकट होने का समाचार असोटा गाँव मे आग की तरह फ़ेल गया। असोटा के ठाकुर ने भी यह खबर सुनी। बालाजी ने ठाकुर को सपने मे आदेश दिया कि इस मूर्ति को सालासर कस्बे मे स्थापित करें। उसी रात सालासर के भक्त मोहन दास को भी उसी रात सपने मे बालाजी को देखा और वे बालाजी हनुमान के स्वागत आगमन हेतु सालासर कस्बे की सीमा पर पहुँच गये। जब ठाकुर को इस बात का ज्ञान हुआ कि असोटा आए बिना ही मोहन दास जी को बालाजी भगवान की अगमानी हेतु खड़े है तो उन्हे घोर आश्चर्य हुआ। निश्चित ही ऐसा सर्वशक्तिमान बालाजी हनुमान की कृपा और आशीर्वाद से ही हो रहा था। ऐसा कहा जाता हैं कि जब ससम्मान बालाजी हनुमान की मूर्ति सालासर पहुंची तो भक्त मोहन दास ने निर्देश दिया कि जिस बैल गाड़ी मे बालाजी हनुमान की प्रतिमा लायी जा रही थी उस गाड़ी के बैल जहां स्वतः रुकेंगे वहीं पर बालाजी हनुमान की स्थापना कर मंदिर का निर्माण किया जायेगा। कुछ समय बाद बैल रेत के टीले पर जाकर रुक गया। तब उसी पवित्र और पूजनीय स्थान पर विक्रम संवत 1811 श्रावण शुक्ल नवमी (सन 1755) मे बालाजी हनुमान की स्थापना की गयी और इस तरह वो  सालासर बालाजी धाम  कहलाया जाने लगा। जिस बैल गाड़ी मे असोटा गाँव से हनुमान जी की प्रतिमा को लाया गया था वह बैलगाड़ी आज भी मंदिर परिसर मे भक्तों के दर्शनार्थ आज भी रक्खी हैं। चूंकि भक्त मोहन दास ने बालाजी हनुमान की कल्पना  दाड़ी व मूंछ मे अपने आराध्य के  रूप मे किये थे इसलिये ही सालासर बालाजी हनुमान ही एक मात्र ऐसा  मंदिर है जहां भगवान हनुमान के दर्शन दाड़ी-मूंछ के रूप मे होते हैं।

ऐसी मान्यता हैं कि भक्त मोहनदास की भक्ति और समर्पण देख कर बालाजी भगवान ने उनको दर्शन देकर मनोकामना पूर्ण करने का वचन दिया। तब मोहन दास ने बालाजी भगवान से सदा सालासर मे निवास करने और दर्शनार्थ आये उनके भक्तों की मनोकामना पूरी करने का वचन लिया, तब से सालासर मे आये बालाजी हनुमान के दर्शनार्थियों की हर मनोकामना पूरी होती हैं। मनौती की कामना के रूप मे दर्शनार्थी मंदिर मे नारियल बांधते हैं। मंदिर परिसर मे ही भक्त  मोहन दास द्वारा अपने हाथों से प्रज्वलित धूनी जो अभी तक प्रजावलित है। अपनी बहिन कान्ही के  देहावसान के बाद उनकी समाधि के पास ही  मोहनदास ने जीवित समाधि ले ली जो वहीं पास मे स्थित है।

प्रवेश द्वार क्रमांक 1 मे बालाजी भगवान के दर्शनार्थ लोगो की भीड़ के साथ मैंने भी अपने परिवार के साथ प्रवेश किया। एक दालान से होते ही मंदिर की विशाल सीढ़ियों से चढ़ते हुए हम लोग सीधे बालाजी भगवान के मंदिर के ठीक सामने  पहुँच गए। सोने के पत्तरों से जढ़ित मंदिर मे सिंदूर से विभूषित दाड़ी और मूँछ के रूप मे भगवान बालाजी की छोटी सी लेकिन भव्य और तेज आभामंडल से प्रकाशित मूर्ति के दर्शन हुए। चाँदी और सोने के आभूषण और पात्रो से मंदिर की दिव्यता और भव्यता मे और निखार आ गया था। स्वर्ण धातु से निर्मित भगवान हनुमान की गदा बालाजी भगवान के  शाश्वत रूप के दर्शन करा रही थी। मंदिर के दरबार मे जहां एक ओर स्वर्ण पत्रों से बालाजी हनुमान के एक ओर चतुर्भुज  भगवान विष्णु और दूसरी ओर स्वर्ण कमल पर माँ लक्ष्मी की प्रतिमा को उकेरा गया था। भगवान गणेश, राधा कृष्ण और सीता-राम लक्ष्मण सहित विराजमान थे। भगवान बालाजी हनुमान के दर्शन कर हम सभी लोग जैसे ही बाहर निकले तब तक दोपहर का समय हो गया था। एक काउंटर पर कुछ लोगो की भीड़ देख जिज्ञासावश पूंछतांछ की तो जानकारी मिली की मंदिर के प्रसाद हेतु टोकन लेने वालों की भीड़ थी। इस समय तक भूख भी लगनी शुरू हो गयी थी। फिर क्या था 150 रुपए प्रतिव्यक्ति की दर से हम लोग भी मंदिर के प्रसाद ग्रहण करने हेतु  ने भंडारगृह से होकर लिफ्ट के माध्यम से हम सभी मंदिर के भोजनालय कक्ष मे जा पहुंचे। सुव्यवस्थित भोजन कक्ष मे टेबल कुर्सी पर बैठ कर भोजन की शुरुआत की। प्रसाद की सुमधुर सुगंध ने भूख को और बढ़ा दिया था। तत्काल ही दाल, गट्टे की सब्जी और आलू-परमल की सब्जी गरमा-गर्म पूड़ियों के साथ ग्रहण की। राजस्थान का प्रसिद्ध मीठा चूरमा जिसमे शुद्ध घी ने उसका स्वाद को दुगना कर दिया। भर पेट भोजन के पश्चात पुनः मंदिर की ओर भगवान बालाजी हनुमान को प्रणाम कर कार पार्किंग की ओर अपने गंतव्य के लिये बढ़ चले।

बापसी मे राजस्थान पुलिस की बर्दी मे एक पुलिस कर्मी को कचड़े के ढेर से खाने पीने की वस्तुओं को खोजते देख मन बिचलित हो गया। कुछ समझ मे आये इससे पूर्व ही कुछ अन्य पुलिस कर्मी उस सहकर्मी का हाथ पकड़ कर अपने साथ ले गये। शायद वह व्यक्ति मानसिक रुग्णावस्था मे रहा था।    

सालासर कस्बा एक छोटा लेकिन विकसित और एवं प्रसिद्ध तीर्थ स्थान हैं। कस्बे की सारी आर्थिक गतिविधियों सालासर बालाजी मंदिर के इर्द-गिर्द ही घूमती हैं। सालासर मे आये हुए भक्तजनों से होने वाली कस्बे की आय ही लोगो का मुख्य आर्थिक स्रोत है। मंदिर के चारों ओर ही व्यापारिक केंद्र, होटल, धर्मशालाएँ भोजनालय और अन्य सामाग्री की दुकाने हैं। इस धार्मिक स्थान पर कार या स्कूटर पार्किंग के शुल्क के नाम पर कुछ लोग दर्शनार्थियों की मजबूरी का फ़ायदा भी उठाते हुए दिखे।

इस तरह बालाजी हनुमान के भव्य दर्शनों  को मन मे सँजोये हम लोगो ने अपने घर की ओर प्रस्थान किया।

विजय सहगल              


रविवार, 16 फ़रवरी 2025

ग्वालियर व्यापार मेला-2025

 

"ग्वालियर व्यापार मेला-2025"





हर वर्ष की भांति इस वर्ष भी ग्वालियर व्यापार मेला ग्वालियर मे जारी है। 25 दिसम्बर 2024 से शुरू इस व्यापारिक मेले के औपचारिक समाप्ति 25 फरवरी 2025 को  होगी। कभी 1905 मे ग्वालियर के तत्कालीन महाराज स्व॰ माधव राव सिंधिया द्वारा क्षेत्र के किसानों के लिये शुरू किये गये पशु मेले ने आज मध्य प्रदेश के सबसे बड़े व्यापारिक मेले का रूप धारण कर लिया। 104 एकड़ मे फैले इस मैदान को स्थाई रूप से सिर्फ इस वार्षिक मेले के लिये आरक्षित किया गया हैं। जहां सैकड़ों छोटी-छोटी स्थाई दुकाने, एक सभागार, पार्क पुलिस चौकी बनी हुई है जो प्रायः दिसम्बर से जनवरी-फरवरी तक चलने वाले मेले के दौरान ही सक्रिय होकर मेले का रूप धारण कर लेती हैं।

मेले मे देश के विभिन्न प्रदेशों से आये हुए हेंडीक्राफ्ट्स, कलाकृतियाँ, मूर्ति शिल्प, कालीन एवं विभिन्न उत्पादों के अतिरिक्त, इलेक्ट्रॉनिक्स सामान जैसे टीवी, फ्रिज, वॉशिंग मशीन, एसी, फ़र्निचर, स्टील आलमीरा  के साथ कपड़े, कंबल खिलौने भी बिक्री के लिये उपलब्ध कराये जाते हैं। कश्मीर, भदोही, कर्नाटक बंगाल आदि के उत्पाद भी बिक्रय हेतु लाये जाते हैं। विभिन्न छतरियों (पविलियन) के हिस्सों मे प्रदर्शित खान पान की दुकाने भी मेला भ्रमण करने वाले लोगो को अपनी ओर आक्रर्षित किये बिना नहीं रहती। वृजवासी की प्रसिद्ध नाश्ते और खाने की दुकान,  खाने वालों का एक मुख्य आकर्षण है।  मेरठ का प्रसिद्ध सीरमल, खाजा भी  आकर्षण का केंद्र था। महिलाओं के चूड़ी, कड़े, नकली गहने, और प्रसाधन की वस्तुएँ भी जगह जगह देखी जा सकती हैं।   मेले मे किशोरों और बच्चों के लिये गुब्बारों पर निशाना साधती बंदूकों की दुकान और  झूले ने हों ऐसा कैसे हो सकता हैं। बड़े-बड़े आधुनिक ऊंचे ऊंचे विभिन्न झूलों की लंबी श्रंखला एक क्षेत्र मे अपनी अलग ही छटा बिखेरते हैं। रात्रि मे इन झूलों पर लगी लाइटें दूर से ही मेले मे बच्चों के साथ बड़ों को आकर्षित करती हैं। बच्चे तो बच्चे मुझ जैसे वरिष्ठ नागरिक भी ऊंचे से झूले मे बैठकर चक्कर खाने और शरीर मे हिंडोले का  ऊंचे जाने और नीचे आने की गुद-गुदी को ज़ोर से हंस कर और चिल्ला कर संतप्त करने की कोशिश करते दिखा जो अवर्णीय और अविस्मृतिय है।   






किसानों और ग्रामीणों के लिये शुरू हुए इस सम्पूर्ण  पशु मेले का अब उतना तो हिस्सा तो वर्तमान मेले मे नहीं दिखता परंतु कुछ दुकाने अब भी परंपरागत ग्रामीणों और किसानों के लिये समर्पित हैं। पशुओं जैसे गाय, बैल, भैंस, ऊंट और घोड़ों को पहनाये जाने वस्त्र, आभूषण, घंटी, काठी, घुंघरू, चैन, कौड़ी और मोतियों से सजे  पट्टे आदि    को मेले मे बिकते देखा जा सकता हैं। इन पालतू जानवरों के सफाई और मालिश आदि की औज़ार जो पशुओं को मीठी मीठी और मन भावन खुजली करती है मानों पशुओं को उनके शरीर पर हाथ फेरते हुए उन्हे  प्यार और दुलार कर रहे हों। ग्रामीणों के अपने परंपरागत पहनावे धोती, कुर्ता के साथ उनके सिर से एक फुट  ऊंची लाठी ने हो ऐसा कैसे हो सकता हैं। एक से एक सुंदर मोटी, ऊंची, छोटी लठियाँ का चलन आज भी ग्रामीण क्षेत्रों मे हैं जो उन्हे आत्मरक्षा के लिये शहरी और जंगली जानवरों से बचाता हैं। लाठी के दोनों सिरों पर अल्युमुनियाम, पीतल की कैप लगाने और मजबूती के लिये लोहे का छल्ला एक सिरे पर लगाने का कार्य भी साथ साथ अतिरिक्त कीमत देकर लाठी को सजाया भी जाता है। उक्त दुकान को देखना और अनुभव करना एक अलग ही सुखद और अजूबा अनुभव था।









ग्रामीण क्षेत्रों मे गंगा भोज (मृतक की तेहरवीं) पर आयोजित किये जाने वाले समूहिक भोज के लिये सौ किलो  खीर या  सब्जी बनाने के लिये विशाल कढाई को देखना भी आश्चर्य करने वाला था कि आज भी सैकड़ों लोगो का भोजन, धार्मिक और सामाजिक अवसरों इन कढ़ाइयों पर तैयार किया जाता हैं। धार्मिक उत्सवों मे उपयोग होने वाले ढ़ोल, मजीरे, झांझर की दुकाने मेला मे लगी हुई थी। घरों और रसोई मे दैनिक उपयोग मे आने वाली वस्तुओं चकला, बेलन, चूल्हे तवा, सूप, छलनी, पतीलों के साथ आइरन बॉक्स के व्यापार भी मेले मे आये हुए थे जो दशकों से मेले मे भाग लेते आ रहे हैं। हर रोज मेले के सभागार मे संगीत और सांस्कृतिक कार्यक्रम अपनी एक छटा संगीत और कला के रसिकों को लुभाने मे पीछे नहीं रहता। न केवल ग्वालियर अपितु देश के अलग अलग क्षेत्रो के कला संगीतज्ञों और मर्मज्ञों की भागीदारी से मेले का महत्व और भी बढ़ जाता है।







एक समय था मेले मे राज्य सरकार बिक्री कर मे 50% की छूट देती थी तब हर वस्तु पर आम नागरिकों को वसुओं के क्रय मे लाभ मिलता था लेकिन जीएसटी लागू होने से ये छूट अब समाप्त हो गयी लेकिन इस मेले का मुख्य आकर्षण मेले मे बिकने वाले घरेलू और व्यापारिक दुपहिया, तिपहिया  और चार पहिया वाहन हैं। मेले मे बिक्रय किये जाने वाले वाहनों के रोड टैक्स पर राज्य सरकार 50% की छूट इस मेले का सबसे बड़ा आकर्षण हैं। यही कारण है कि जीतने वाहन ग्वालियर मे पूरे साल नहीं बिकते उतने इस एक-डेढ़ माह मे बिक जाते हैं। जहां एक ओर दुपहिया वाहनों पर 4-5 हजार की छूट मिलती हैं वहीं कारों की खरीद पर 40-50 हजार की बचत तक हो जाती हैं। महंगी कारों पर ये बचत दो ढाई लाख तक होती हैं। 

छोटू भाई के बाइस्कोप ने तो बचपन की यादें ताजा कर दी। ढाई फुट के छोटू भाई बहुत ही खुश मिजाज व्यक्ति मेले मे 50-60 के दशक मे घर-घर गली कूँचों मे सिर पर रख कर बच्चों को  दिखलाये जा रहे बाइस्कोप के माध्यम से उन दिनों चलने वाली किसी फिल्म की रील के कुछ टुकड़े इसमे चलाया करते थे। लेंस के माध्यम से थिएटर मे फिल्म देखने का मजा देता हैं।    

तब आप भी ग्वालियर मेले मे वाहनों सहित अन्य वस्तुओं को क्र्य करने का लाभ अभी आने वाले 10-15 दिन उठा सकते हैं। एक राज के बात और जब मेला समाप्त हो जाता हैं तो कश्मीर के शाल, भादोही कालीन, खुर्जा की क्रॉकरी  या अन्य उत्पाद भी सस्ते मे बिक्री किये जाते है ताकि इन उत्पादों के व्यापारियों को अपने माल को बापस ले जाने के लिये माल-भाड़े की बचत हो सके। तो आइए इस मेले से वस्तुओं को क्रय कर फायदा उठाइये।

विजय सहगल                       

सोमवार, 10 फ़रवरी 2025

उत्तराखण्ड में समान नागरिक संहिता के निहितार्थ


"उत्तराखंड मे समान नागरिक संहिता के निहितार्थ"


अंततः 27 जनवरी 2025 को उत्तराखंड मे  समान नागरिक संहिता लागू करने वाला देश का पहला राज्य बन गया। अब गुजरात भी उत्तराखंड के पदचिन्हों पर चल उसका अनुसरण करने वाला अगला राज्य हो सकता है। उत्तराखंड के मुखमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने इस दिन अधिसूचना जारी कर एक इतिहास रच दिया। यह कानून राज्य की अनुसूचित जनजातियों को छोड़कर, पूरे उत्तराखंड राज्य और इसके बाहर रहने वाले राज्य के निवासियों पर लागू होंगे। मुख्यमंत्री धामी ने उत्तराखंड की जनता से तीन वर्ष पूर्व किये वादे को पूरा किया। सर्वोच्च न्यायालय ने अनेकों बार देश मे समान नागरिक संहिता, लागू करने का सुझाव अपने विभिन्न निर्णयों मे दिया था। संघ और भारतीय जनता पार्टी के एजेंडे मे, यूनिफ़ोर्म सिविल कोड (यूसीसी), एक मुख्य विषय के रूप मे शुरू से ही रहा हैं। उत्तराखंड सरकार द्वारा यूसीसी को लागू होना समाज मे एक आधुनिक, प्रगतिशील और समानता के सार्वभौमिक   सिंद्धांत की ओर एक उत्तम कदम है। समान नागरिक संहिता के लागू होती ही उत्तराखंड मे महिलाओं के साथ होने वाले अमानवीय बहू विवाह, हलाला, तीन तलाक  जैसे मामलों पर रोक लगेगी। यूसीसी को उत्तराखंड मे लागू करने से  किसी धर्म, संप्रदाय या समुदाय को लक्ष्य कर उनकी भावनाओं को ठेस पहुँचाना  नहीं है। इस कानून को लागू करने के विरुद्ध  देश और राज्य के विभिन्न राजनैतिक दलों के नेताओं मे कड़ी प्रितिक्रिया स्वाभाविक थी। देश के सबसे पुराने राजनैतिक दल कॉंग्रेस ने अपने स्वभाव के अनुरूप अल्पसंख्यक तुष्टीकरण की नीति को आगे बढ़ाते हुए इसे मुस्लिमों के विरुद्ध बतलाया। कॉंग्रेस का ये मानना  कि देश अभी यूसीसी के लिये तैयार नहीं है!! इसके लिये लंबे समय की जरूरत है!! देश की स्वतन्त्रता के 77 साल बाद भी उसकी ये संकुंचित सोच और तंगदिली उसकी तुष्टीकरण की नीति का पुष्टीकरण करती प्रतीत होती है। मुस्लिम संगठन जमीयत उलेमा-ऐ-हिन्द ने भी यूसीसी को उच्चतम न्यायालय मे चुनौती देने की बात कहीं।

कुछ लोगों ने लिव इन रिलेशन मे रह रहे वयस्कों को अनिवार्य पंजीकरण और सूचनाओं को पुलिस के साथ सांझा करने की बाध्यता को निजता का हनन करने वाला बताया गाया। हालांकि सरकार ने  कानून के अन्य प्रावधानों और इस बात का ध्यान रखने का आश्वासन दिया है।

जब देश के शीर्ष न्यायालय ने शहबानों केस मे  यह सुझाव दिये जाने के बावजूद कि मुस्लिम समाज को इस दिशा मे पहल करने की आवश्यकता है ताकि वे प्रगति की राह मे पीछे न रह जाए!! पर खेद और अफसोस, तत्कालीन कॉंग्रेस सरकारों ने देश मे समान नागरिक संहिता के सुझाव पर तार्किक बहस करने के उलट इसे  सांप्रदायिक अमली जामा पहनाने की कोशिश की। इस विषय पर कॉंग्रेस सहित, विपक्षी दल के दोहरे मापदण्ड देखने को मिलते हैं। जहां एक ओर ये दल हमेशा देश के  युवाओं मे बेरोजगारी, आम जनों के लिये रहने के मकान, खाने के लिये रोटी और पहनने के लिये  कपड़ा आदि की मांग करते  है, वहीं जब इन सभी समस्याओं के मूल मे बढ़ती आबादी को नियंत्रित करने के लिये सरकार,  समान नागरिक संहिता और जनसंख्या नियंत्रण कानून के क्रियान्वयन की बात करती है तो विपक्षी  दल इन क़ानूनों पर मौन रह कर चुप बैठ जाते हैं, मानों मुँह मे दही जम गया हो। जब भारतीय संविधान, स्त्री-पुरुष  को समानरूप से मताधिकार, शिक्षा और रोजगार मे समानता, आपराधिक कानून मे समानता प्रदान करता  है, तो शादी, तलाक, संपत्ति उत्तराधिकार कानूनी विषयों  मे धर्म और लिंग  के आधार पर महिलाओं के साथ भेदभाव क्यो?  विदित हो कि इन्डोनेशिया, बहरीन, तुर्किये, और लेबनान जैसे मुस्लिम देशों तक मे आधुनिक कानून लागू हैं तब भारत मे इन प्रगतिशील कानून को लागू करने पर आपत्ति  क्यो?

जहां एक ओर हर धर्म के मानने वालों को अपने रीति-रिवाज के अनुसार शादी करने की छूट होगी वहीं शादी का पंजीकरण 60 दिन मे कराना अनिवार्य होगा। इस कानून के अंतर्गत 27 मार्च 2010 के बाद से कानून लागू होने की तारीख के बीच हुए विवाह को भी 6 महीने मे रजिस्टर करवाने होंगे। इसकी शुरुआत स्वयं  मुख्यमंत्री  पुष्कर सिंह धामी ने अपने विवाह का पंजीकरण करा कर किया। किसी व्यक्ति की मृत्यु पर उसकी संपत्ति का समान रूप से वितरण उसके पति/पत्नी और बच्चों मे किया जायेगा। उस मृतक व्यक्ति के माता-पिता को भी समान अधिकार मिलेंगे। बेटियों को भी बेटों के समान संपत्ति मे समान अधिकार मिलेंगे। इस अवसर पर मुख्य मंत्री जी ने एक पोर्टल का भी शुभारंभ किया। उन्होने कहा कि सभी धर्मों की महिलाओं को भी समान अधिकार प्राप्त होंगे और सही मायनों मे राज्य मे महिला सशक्तिकरण और सुरक्षा सुनिश्चित होगी। इस कानून के माध्यम से  समाज मे महिलाओं पर हलाला, बहुविवाह, और तीन तलाक जैसी कुप्रथाओं पर पूरी तरह से रोक लगाई जा सकेगी। सभी धर्मों मे विवाह न्यूनतम उम्र लड़कों के लिये 21 वर्ष और लड़कियों के लिये 18 वर्ष निश्चित की गयी।    

आशा ही नहीं पूर्ण विश्वास है कि उत्तराखंड मे समान नागरिक संहिता के लागू करने से प्रेरणा लेकर इस आधुनिक और प्रगतिशील कानून को पूरे देश मे लागू करने की दिशा मे  देश की  अन्य राज्य सरकारें इसी नक्शे कदम पर कानून बना कर देश को एक उन्नत और प्रगतशील देश की श्रेणी मे लाने का प्रयास करेंगे और संविधान निर्माताओं का समानता पर आधारित   लिंगभेद, वर्गभेद, जातिभेद की भावनाओं से परे,  एक महान भारत के सपने को साकार करेंगे।            

विजय सहगल

       


शनिवार, 1 फ़रवरी 2025

खाटू श्याम-हारे का सहारा

 

"खाटू श्याम-हारे का सहारा"








अपने गुड़गाँव प्रवास के दौरान 18 जनवरी 2025 को राजस्थान के सीकर जिले के ग्राम खाटू मे स्थित, विश्व प्रसिद्ध तीर्थ खाटू श्याम जाने का अवसर प्राप्त हुआ। प्रातः 9 बजे, गुड़गाँव से खाटुश्याम की लगभग  248 किमी सड़क यात्रा  अच्छी थी। लगभग 5.30  घंटे की कार यात्रा के पश्चात ये कहना अतिसन्योक्ति न होगी कि  राजस्थान राज्य मे सड़क परिवहन अच्छा हैं। सारा परिवार इस सड़क यात्रा मे कुछ थक गया था, इसलिये भगवान खाटू श्याम मंदिर  के दर्शन आदि की जानकारी लेकर दो घंटे के विश्राम के पश्चात एक नयी स्फूर्ति, उमंग और उत्साह ने  मंदिर के दर्शन की इच्छा  और आकांक्षा को और भी बढ़ा दिया। पूरी यात्रा के दौरान दिन मे अच्छी ख़ासी गर्मी रही पर सूर्यास्त के बाद खाटू श्याम  कस्बे मे हल्की सर्दी थी। होटल से अन्य धर्मावलंबीयों की तरह बिना जूते चप्पलों के नंगे पैर ही जाने का निर्णय उचित ही था क्योंकि मंदिर का प्रवेश द्वार एक ओर से शुरू होकर दूसरी ओर के रास्ते से निकलता है इसलिये उतारे गये जूते चप्पल को लेने के लिये फिर से प्रवेश द्वार पर जाने से बचने का यही एक रास्ता था।  

ऐसा कहा जाता है कि जब कौरवों और पांडवों के बीच महाभारत का युद्ध अवश्य संभावी हो गया तो दोनों पक्षों के वीर योद्धाओं ने अपनी अपनी युद्ध रणनीतियों पर चर्चा की। जब भीम के पौत्र और घटोत्कच के पुत्र बर्बरीक को महाभारत के युद्ध पर चर्चा हेतु भगवान श्रीकृष्ण ने पांडवों सहित अन्य महारथियों को आमंत्रित किया गया। विभिन्न योद्धाओं मे से किसी ने  महाभारत युद्ध एक माह, किसी ने  पंद्रह दिन और किसी ने दस दिन चलने की राय दी। जब बर्बरीक से इस विषय मे कृष्ण ने पूंछा तो उसने युद्द को चंद पलों मे समाप्त होने की बात की। सुन कर पांडव पक्ष के सभी महारथी हैरान थे। तब श्रीकृष्ण ने बर्बरीक से इस संदर्भ मे विस्तृत रणनीति बताने के लिये कहा।         

ऐसी किंवदंती हैं कि बर्बरीक, भगवान शिव का भक्ति मे लीन हो तपस्या मे रत था। बर्बरीक पांडू पुत्र भीम का पौत्र और घटोत्कच का  पुत्र था। वह बड़ा प्रतापी, वीर और साहसी था। कठिन तपस्या से प्रसन्न हो भगवान शिव ने बर्बरीक को बरदान मे तीन तीर दिये। इसी लिये उन्हे तीन बाण धारी भी कहा जाता हैं। शिव जी ने बताया कि पहला तीर चलाने पर बर्बरीक अपने उन सभी दुश्मनों पर मृत्यु का चिन्ह अंकित कर देगा जिनका वह वध करना चाहता है  और दूसरा तीर उन चिन्हित दुश्मनों का वध कर देगा। तीसरा तीर पूरी सृष्टि का विनाश कर देने मे सक्षम होगा। तीनों तीर  अपने लक्ष्य भेदन कर, बर्बरीक के पास उसके तुरीण मे बापस आ जाएंगे।  लेकिन शर्त ये थी कि इन बाणों का उपयोग सिर्फ हारने वालों के पक्ष मे करना होगा। इसलिये बर्बरीक अर्थात खाटू श्याम को,  हारे का सहारा कहा जाता हैं। इन बरदानों का परीक्षण हेतु कृष्ण ने बर्बरीक से पीपल के उस पेड़ पर लगे समस्त पत्तों का छेदन करने को कहा। बर्बरीक द्वारा पहला तीर छोड़ते ही बाण ने पेड़ के समस्त पत्तों का भेदन करते हुए उनमे छेद कर दिया, तत्पश्चात बाण  कृष्ण के पैर के चारों ओर मंडराने लगा क्योंकि एक पत्ते को कृष्ण ने अपने पैर के नीचे जो दबा लिया था। पांडव सेना के सभी महारथी इस धनुरविध्या को देख कर आश्चर्य से हैरान और  प्रसन्न थे कि बर्बरीक जैसा धनुर्धर उनके पक्ष मे लड़ेगा, पर अंतर्यामी भगवान श्री कृष्ण मन ही मन ऐसा देख चिंता मे पढ़ गये। वे जानते थे कि कम सेना के बावजूद अंत मे पांडव सेना ही विजयश्री का वरण करेगी तब बर्बरीक अपनी शपथ के वशीभूत हारने वाली कौरव सेना के  पक्ष मे लड़ते हुए पांडव सेना का पूरी तरह वध कर देगा। इसलिये श्रीकृष्ण ने एक ब्राह्मण का वेश धर कर, बर्बरीक से ब्राह्मण को  दान देने का वचन लेते हुए उसका शीश मांग लिया। इस तरह अपनी रणनीति के तहत उन्होने बर्बरीक जैसे शक्तिशाली योद्धा युद्ध के रास्ते से हटा कर  पांडवों को,  विनाश से बचा लिया। लेकिन बाद मे उन्होने बर्बरीक की महाभारत युद्ध देखने की इच्छा की पूर्ति हेतु उसके कटे हुए शीश को  एक पहाड़ी पर स्थापित कर उसकी  युद्ध देखने की अभिलाषा को पूर्ण किया साथ ही बर्बरीक को अपने प्रिय भक्त के रूप मे  कलियुग के  "खाटू  श्याम"  के रूप मे सुविख्यात होने का आशीर्वाद दिया।             

खाटुश्याम मंदिर एक छोटा किन्तु अति प्राचीन मंदिर हैं। मूल मंदिर सन 1027 मे रूप सिंह चौहान और उनकी पत्नी नर्मदा कंवर ने बनवाया था। 1720 मे मारवाड़ के शासक अभय सिंह ने मंदिर का जीर्णोद्धार कराया था। मंदिर प्रबंधन ने वर्तमान मे मंदिर के सामने, प्रवेश द्वार से निकासी द्वार तक स्टील के पाइप से 13-14 मार्ग बनाये हैं। पूरा परिसर प्रवेश मार्ग से निकासी तक ऊंची-ऊंची टीन की चादरों से ढंका हुआ है।  जिनके माध्यम से मार्ग के बीच मे एक ऊंचे चबूतरे पर निर्मित मंदिर मे स्थापित भीम के पौत्र बर्बरीक के शीश को  खाटू जी श्याम के रूप मे दर्शन कर श्रद्धालु उन्हे अपनी आदरांजलि देकर अपनी मनोकामना और मनौती के लिये प्रार्थना करते हैं। भक्तगण लोहे के पाइप्स से अलग-अलग बने इन 13-14 निश्चित, निर्धारित मार्गों से होते  हुए दर्शन के लिये जाते  हैं, इसलिये प्रसाद, फूल इत्र या अन्य अर्पण के लिये लायी हुई वस्तुओं को आप स्वयं भावनात्मक रूप से भगवान को अर्पित कर अपने पास ही रक्खे और अपने साथ अपने घर ले जाएँ। उन्हे दूर से मंदिर की ओर फेंक कर उनका अनादर और अपव्यय न  करें।  इस आशय की सूचनाओं का प्रसारण मंदिर प्रशासन भी लगातार करता रहता हैं। मंदिर प्रबंधन द्वारा की गयी दर्शन व्यवस्था और कम भीड़ होने के कारण पहले तो हमने अपने परिवार के साथ 5वी-छठी लाइन मे लगकर दर्शन किये क्योंकि पहली की चार लाइन महत्वपूर्ण व्यक्तियों के लिये निर्धारित थी। लेकिन सदस्यों के  एक राय होने के कारण सभी लोगो ने पुनः प्रवेश द्वार पर आकार सबसे आखिर 14वी लाइन मे लगकर फिर से खाटू श्याम जी के दर्शन किये क्योंकि इस लाइन के दर्शनार्थी, मंदिर के सामने बने एक ऊंचे चबूतरे पर खड़े होकर भगवान के दर्शन करते हैं, जो सुदूर तो हैं पर ज्यादा स्पष्ट और सुदर्शन हैं। इस चबूतरे पर से मंदिर और भक्त बर्बरीक के शीश के दर्शन, श्रंगार और चाँदी के नक्काशीदार मंदिर के भव्य वास्तु और द्वार के दर्शन कर सकते  हैं। प्रतिवर्ष खाटू मे फाल्गुन माह की षष्ठी से बारस (द्वादशी) तक एक विशाल मेला लगता है क्योंकि इस दिन ही बर्बरीक ने स्वयं अपने हाथों से अपना शीश भगवान श्रीकृष्ण के चरणों मे समर्पित किया था। देश विदेश से इन दिनों लाखों भक्तगण खाटू श्याम जी के दर्शनार्थ यहाँ आ कर अपनी मनोकामनाओं के लिये भगवान से प्रार्थना करते हैं।

खाटू कस्बा का पूरा अर्थशास्त्र सिर्फ भगवान खाटू श्याम के दर्शनार्थ आये भक्तों के कारण सौभाग्य, समृद्धि और सफलता के सोपान की कहानी कहता हैं। मंदिर के रास्ते मे प्रसाद की दुकानों के सेवकों द्वारा जबर्दस्ती हाथ पकड़ कर प्रसाद क्रय करने की ढिठाई से मन के खिन्नता को रोकने के  उपाय व्यापार मण्डल और पुलिस प्रशासन द्वारा यदि किये जाएँ तो भक्तों को अनावश्यक कटु अनुभवों से बचाया जा सकता हैं।  पूरे दिन के भ्रमण और भगवान श्री खाटू श्याम जी के दर्शन परश्चात रात को राधा की हवेली नाम के रेस्टोरेन्ट मे स्वादिष्ट राजस्थानी भोजनालय मे पूर्णतः भारतीय रीतिरिवाज और राजस्थानी परिवेश मे सेवा कर रहे स्टाफ ने  सुरुचि भोजन को  और भी स्वादिष्ट और सुखद बना दिया।  

तीन बाणधारी, हारे का सहारा, प्रभु खाटू श्याम की जय!!

विजय सहगल