"छार
दुआरी के हनुमान"
अपने घर झाँसी से ओरछा तो प्रायः आना जाना
होता रहता हैं। मेरा मानना हैं कि ओरछा (जिला निवाड़ी, मध्य प्रदेश) सबसे सुंदर,
सबसे छोटा, सरल और सबसे सस्ता धार्मिक पर्यटन स्थल हैं जहां पर
आप ऐतिहासिक किला, छतरियाँ,
और पवित्र राम राजा सरकार का मंदिर के साथ बेतवा नदी के सुंदर प्राकृतिक मनोहारी घाट
को देख सकते है और सावधानी बर्तते हुए स्नान भी कर सकते हैं। चूंकि ओरछा,
झाँसी से इतना नजदीक है तो कभी ठहरने और रहने का सौभाग्य तो नहीं मिला पर खानपान
और प्रवास भी अन्य शहरों के मुक़ाबले सस्ता है। मैंने अपने ब्लॉग दिनांक 6 जुलाई
2019 मे इस विश्व प्रिसिद्ध धरोहर का उल्लेख किया था (https://sahgalvk.blogspot.com/2019/07/orcha.html)।
दिनांक 13
अक्टूबर 2024 को ओरछा दर्शनों के पश्चात ओरछा मंदिर से 5-6 किमी दूर स्थित पवित्र
पुरातन मंदिर छारदुआरी हनुमान
मंदिर के दर्शन का सौभाग्य प्राप्त हुआ। ऐसी मान्यता हैं कि राम दूत श्री हनुमान,
राम राजा मंदिर धाम की सुरक्षा करते हैं। राम राजा मंदिर के पीछे स्थित पक्के मार्ग से इस स्थान तक पहुंचा जा सकता है। जैसे
ही ओरछा ग्राम का परिकोटा समाप्त होता हैं एक एकल मार्गीय है जो छोटे से जंगल से
होकर गुजरता हैं। रास्ता पक्का हैं जो ओरछा ग्राम से होकर गुजरने वाले मार्ग से छारदुआरी पहुंचाता है। एक छोटे ग्रामीण परिवेश
और रहन सहन के दर्शन आप इस दौरान कर सकते
हैं। शनिवार और मंगलवार को यहाँ काफी
संख्या मे झाँसी, दतिया,
निवाड़ी से लोग छारदुआरी हनुमान
मंदिर के दर्शनार्थ आते हैं।
ऐसी किवदंती है कि बुंदेले राजा वीर हरदौल
के भाई पहाड़ सिंह जू देव ने गायों की रक्षा हेतु अपने मंत्रियों और सभा सदों की एक
बैठक मे गायों की रक्षा हेतु एक संकल्प इस
स्थल पर लिया था। मंत्रियों की सलाह पर रामदूत हनुमान के जय घोष और स्मरण करते हुए
उन्होने गायों की रक्षा करते हुए विजय श्री हांसिल की। इस घटना के बाद महल मे रक्खी
भगवान हनुमान की प्रतिमा को उसी स्थल पर प्राण प्रतिष्ठा की गयी जहां पर गायों की रक्षा
का संकल्प लिया गया था। ऐसा कहा जाता है कि प्रतिमा की स्थापना के समय मंदिर की दीवार
द्वार तक तो बिना किसी अवरोध के बन गयी,
पर द्वार के उपर जब दीवार का निर्माण दिन मे किया गया वो रात मे छार-छार होकर गिर गयी।
कुछ दिनों तक यही सिलसिला चलता रहा। दिन मे दीवार बनाई जाती और रात मे दीवार छार-छार
(छोटे छोटे टुकड़े टुकड़े) होकर स्वतः गिर जाती। एक दिन सेनापति ने जब स्वयं जाग कर,
रहस्य जानने की कोशिश की पर उन्हे कोई नहीं मिला। इस रहस्यमय घटना की जानकारी होने
पर राजा ने स्वयं उपस्थित होकर क्षमा प्रार्थना कर पूजा पाठ कराया। इसलिए ही इस मंदिर
का नाम छार दुआरि के हनुमान नाम पड़ा। पुजारी श्री अवधेश पांडे ने बताया कि 9 फुट ऊंची
दक्षिणाभिमुख हनुमान प्रतिमा इस क्षेत्र की एक मात्र प्रतिमा है जिसमे श्री हनुमान
के शांत रूप के दर्शन होते हैं।
प्रशासन और श्रद्धालुओ द्वारा मंदिर प्रांगण
मे निर्माण कार्य कराया हैं इस कारण श्रद्धालु सहजता से मंदिर परिसर मे आकार भगवान
राम दूत हनुमान को अपने श्र्द्धा सुमन अर्पित कर अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति हेतु नमन और वंदन करते हैं।
मंदिर से लगभग 50 मीटर दूर एक प्राचीन बावड़ी
है जिसका निर्माण 17वी शती ई॰ मे हुआ था। राज्य पुरातत्व विभाग के अनुसार उक्त प्राचीन
बावड़ी जिसकी लंबाई 35 मीटर एवं चौड़ाई 17 मीटर हैं। चार मंज़िला बावड़ी मे विशाल जल राशि
का संग्रहण आज भी देखा जा सकता हैं। वरसाती जल एवं भूमि गत जल के संग्रहण का प्राचीन
अद्भुद नमूना यहाँ जीवंत देखा जा सकता हैं। चूना और गारे से निर्मित दुमंजिला इमारत
मे लोहे के प्रवेश द्वार करते हैं एक छोटा सा बराण्डा है। दालान मे प्रवेश करते ही
बावड़ी का एक शानदार दृश्य दिखलाई पड़ता है। 9-10 सीढ़ियाँ
उतरते ही एक खुला आयताकार आँगन और उनके तीनों तरफ बनी दल्लान एक सुंदर नज़ारा प्रस्तुत
करती हैं जो प्राचीन वास्तु का एक नायाब नमूना है। आँगन के बीचों बीच बनी सीढ़ियाँ बावड़ी
की ओर नीचे की तरफ ले जाती है जिसमे उपर तक पानी भरा है। यह पूरी बावड़ी पाँच मंज़िला
है, तीन मंजिल उपर एवं शेष दो मंजिल जल मे डूबी
हुई है।
मुख्य दरवाजे के एकदम सामने आँगन मे बनी छोटे
दरवाजों से निर्मित दालान मे जैसे ही प्रवेश करते हैं दो-ढाई फुट ऊंची कलात्मक पत्थरों की चहर दीवारों से निर्मित अष्टाकर
कुएँ की आकृति इस बावड़ी की सुंदरता मे चार चाँद लगा देता है। दल्लान और अष्टाकार आकृति
के बीच बने पाट पर खड़े होकर सारे दृश्य को देखना एक अद्भुद अनुभव था। ऐसा बताया गया
कि आसपास के खेतों मे सिंचाई का प्रबंध भी इस बावड़ी से होता है। आबादी न के बराबर है।
कुछ सब्जी,
चाय और मंदिर के प्रसाद, फल,
फूल की दुकानों के अलावा अन्य आबादी शाम के बाद अपने अपने घरों मे बापस चली जाती है।
लेकिन चारों ओर का दृश्य शांत और सुकून देने
वाला है।
मंदिर से निकले फल,
फूल जैसे अपशिष्ट के निस्तारण के पूर्व उन्हे एक गड्ढे मे एकत्रित कर निस्तारण हेतु
रखने को देख अच्छा लगा। पूरे मंदिर परिसर मे साफ सफाई देख प्रसन्नता हुई। बुंदेलखंड
क्षेत्र मे जंगली फल कचरी का उपयोग सर्वविदित है। इस फल को शादी-विवाह या अन्य धार्मिक
उत्सवों मे परोसा जाता है। इस फल को काटकर,
सूखा कर तेल मे तल कर खाने-खिलाने का चलन हैं।
कचरी को चार भाग मे काट कर,
सूखा कर स्थानीय लोगो द्वारा विक्रय किया जा रहा था। श्रीमती जी ने बगैर एक पल गवाएं
उस महिला की पूरी कचरियाँ खरीद ली जो वह बिक्री के लिए लायी थी।
इस तरह एक सुखद और शांत धार्मिक स्थल छार-दुआरी
के हनुमान के परिवार के साथ दर्शन एक यादगार यात्रा थी। बोलो,
रामदूत हनुमान की जय!! पवनसुत हनुमान की जय!!
विजय सहगल





3 टिप्पणियां:
*हमारे देश में सर्वाधिक मंदिर श्री हनुमान जी के ही मिलेंगे और इसका श्रेय श्री हनुमान जी की, स्वामी प्रभु श्रीरामजी के प्रति अनन्य भक्ति को जाता है।माता जानकी के वरदान स्वरूप श्री हनुमान जी अजर-अमर हैं और उनके मंदिरों की संख्या अनगिनत है।*
*आपने एक तरह से अलग-थलग छार दुआरी के प्राचीन,हनुमान मंदिर का रोचक व सराहनीय चित्रण किया है।पढ़ते हुए ऐसी अद्भुत अनुभूति हो रही थी मानो हम भी बजरंगी के साक्षात दर्शन कर रहे हों।*
*आशा है कि आप ऐसे पवित्र स्थानों के रोचक व ज्ञानवर्धक यात्रा विवरणों के माध्यम से हम सभी को लाभान्वित करते रहेंगे।* *जय सियाराम..!*👌👌👌 🌹🙏🌹👍👍👍
सुरेन्द्र सिंह कुशवाहा, ग्वालियर
बहुत ही अच्छी जानकारी आपके द्वारा दी गई है 🙏🙏
कमल शर्मा, ग्वालियर
Murari Lal Agarwal Jhs: आपने काफी अच्छा लिखा, एक कितब्नतिं यह भी है
ओरछा नरेश मधुकर शाह जू की छावनी थी
छावनी का अपभ्रंश से छारद्धारी बना
जो भी सही हो.
मुरारीलाल अग्रवाल, झाँसी
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