"पहिया"
पहिया मानव और मानवता के विकास की पहली सीढ़ी
थी, जिसे पचपन मे हमने समाज शास्त्र मे किसी
कक्षा मे पढ़ा था, लेकिन इसके पहले ही
पहिये ने हमारी ज़िंदगी मे प्रवेश कर लिया था। मुझे अच्छी तरह याद हैं झाँसी मे
हमारे मुहल्ले के हमउम्र हर लड़कों के पास
एक पहिया था जिसे एक डंडे की सहायता पहिये को आगे की ओर धकेलते हुए हम अपने
मुहल्ले और उसके आसपास की गली-कूँचों मे चलाया करते थे। आज से साठ-सत्तर के दशक के
पूर्व मध्यम परिवार मे जन्मे हर उस बच्चे के बचपन मे सामना अवश्य ही पहिये से पड़ा
होगा। आज की पीढ़ी को तो शायद पहिया चालन का ज्ञान ही न हो,
पर हमारी पीढ़ी या साठ सत्तर के दशक के आसपास जन्मे बच्चों के अनेक खेलों मे एक प्रिय शगल या शौक पहिया चलाना भी था। बचपन
के उन दिनों, पहिया चलाने से मिलने
वाले आत्मिक सुख को शब्दों मे ब्यान नहीं कर सकते। हमारे मुहल्ले के हर घर मे
बच्चों के माता-पिता इस पहिया चालन को बड़ी ही हिकारत की दृष्टि से देख इस शौक को
गली के आवारा और गंदे बच्चों का खेल बता हमेशा डांटते और फटकारते थे। उनके पास इस
बात के समुचित कारण भी थे क्योंकि शुरू
शुरू मे पहिये का संतुलन बनाने और नियंत्रित करने की कला नहीं आयी थी इसलिए कभी
कभी पहिया, सड़क किनारे बनी
मल-मूत्र की गंदी नालियों मे घुस कर गंदा हो जाता था,
और उसको बगैर एक सेकंड गवाए तुरंत ही अपने
हाथों से निकाल कर,
चलाने के लिए तैयार कर लेते थे। साफ सफाई का, आज के बच्चों की तरह,
हैंड वॉश या साबुन से हाथ धोने के चोचले
उन दिनों दूर दूर तक नहीं थे। सड़कों पर डंडे की सहायता से पहिये को घुमाते हुए न
जाने किस धुन मे घर से दूर निकल जाते थे। पहिये को चलाने मे लागने वाली एकाग्रता और उसके घूमने मे लगने वाला ध्यानाकर्षण से,
कब न्यूटन के गति के नियम से बंध दूरी,
समय, गति और वेग को बगैर जाने समझे पहिये को चलाने
मे निपुणता हांसिल कर ली थी। जैसे नवजात पक्षी अपने पंखों की सहायता से खुले आकाश
मे उड़ान भरते थे कुछ ऐसे ही पंख, पहिये ने हमारे
बचपन को लगा दिये थे जिसका अहसास घर से दूर निकल,
खुले आकाश मे उड़ने से कम न था। पहिया चलाने की धुन ऐसी कि अंडर बीयर पहने,
बगैर जूते चप्पल के घर से दूर 1-2 किमी निकाल जाते,
जब पहिया चलाने का नशा उतरता तो अपने पहनावे का होश आता कि कहीं कोई पहचान वाला देख
न ले बरना घर पर शिकायत हुई तो अच्छी तरह से मरम्मत पक्की। उन दिनों शहर ने ऑटो
युग मे प्रवेश नहीं किया था, स्कूटर-कार यदा
कदा ही देखने को मिलती थी सिवाय नगर
पालिका के कचरा भरने की ट्रक के सड़कों पर
गाडियाँ न के बराबर थी। साइकल का जमाना था गाँव से आने वाली बैल गाडियाँ
ट्रांसपोर्ट का मुख्य साधन थी। अनेकों बार
अपनी धुन मे पहिया चलाने के कारण पहिया बैल गाड़ी के बीच से उसके नीचे चला जाता था और कभी कभी साइकल चलाने वालों से टक्कर हो जाती। एकाध बार
हाथ पैरों मे इस कारण चोट भी लगी, लेकिन हम बच्चों
के डांटने की बजाय अड़ौस पड़ौस के बड़े लोग साइकल बालों को भला-बुरा कह,
कभी कभी उन की मार पिटाई भी कर देते थे।
पहियों के बर्गीकरण से उत्साह मे कभी-कभी
कमी हो जाती थी। पहली बार पहिये से सामना साइकल के टायर से हुआ जो पड़ौस मे स्थित
भगवनदास साइकल वाले के दुकान से बड़ी सहजता से मिल जाता था। लेकिन जब मुहल्ले के दूसरे अन्य साथियों के पास
कार या मिनी ट्रक के टायर के केंद्र की
तरफ से काट कर निकाले गोल मजबूत पहिये को देख कर जो रंज होता। तब उदासी और बढ जाती थी,
जब कोई दूसरा साथी साइकल के स्टील रिम को लेकर पहिया चलाने साथ निकलता। उस स्टील
रिम वाले पहिये के चलने से निकली सुरीली ध्वनि संगीत की किसी स्वर लहरी से कम न
होती। उन दिनों बचपन मे एक ही ख्वाइश थी कि इस साइकल टायर के पहिये से छुटकारा
मिले और साइकल के रिम न सही पर मजबूत रबर का पहिया चलाने को तो मिल ही जाय?
जब मुहल्ले मे ही जूते निर्माण करने वाली
दुकान से रबर का मजबूत पहिया मिला तो खुशी
का ठिकाना न रहा। मुझे उस पहिये का हुलिया आज भी याद है कि किस तरह उस पहिये को
बाएँ कंधे पर लटका कर, दायें हाथ मे
डंडा लेकर मै कुछ बैसी ही विजयी मुद्रा मे खड़ा था मानों कोई हॉकी का खिलाड़ी किसी
मैच मे जीतने के बाद अपनी हॉकि के साथ विजयी मुद्रा मे खड़ा होता है। पहिया चलाने की खुशी उस दिन दुगनी
हो जाती जब साइकल के स्टील रिम का बगैर स्पोक्स का पुराना पहिया चलाने को मिल जाता
था। जब डंडे से स्टील रिम के टकराने से
निकली प्रतिध्वनि शरीर मे एक नई स्फूर्ति और नयी ऊर्जा का संचार कर देती थी। उस
संगीतमय लय और ताल के सहारे कभी कभी 1-2 किमी की पहिया यात्रा का पता नहीं चल
पाता। पता जब चलता जब अहसास होता कि पहिया चलाते चलाते हम घर से कितने दूर निकल
आये। कभी कभी तो हमारी मित्र मंडली समूह मे अपने घर से एक मील छह फ़र्लांग दूर
स्थित सखी के महावीर मंदिर चले जाते और मंदिर के भोग प्रसाद ग्रहण कर पहिया चलाते
हुए ऐसे घर बापस आते मानों हिमालय पर्वत की एवरेस्ट चोटी को फतह कर बापस आ रहे
हों। पहिया चालन मे उस लड़के को ही पारंगत और प्रवीण माना जाता था जो धीमी और तेज
गति, सड़क की ढलान और चढ़ाई के बावजूद,
पहिये के बगैर गिरे, बगैर रुके,
निरंतर चला कर अपनी मंजिल पर पहुंच कर ही रुकता था।
उन दिनों लगभग एक-सवा फुट ब्यास का एक ठोस
स्टील का छोटा पहिया, जैसा कि आज कल डिस्क
ब्रेक स्कूटर और मोटर साइकल मे लगा होता है,
जिसमे अनेकों छोटे-छोटे छेद रहते थे, भी चलन मे था जिसको एक दूसरे मुहल्ले का बच्चा
लकड़ी मे लगी एक पतले तार की छड़ी से चलाते हुए निकलता। आज ऐसा प्रतीत होता है कि
ऐसा पहिया भारी मशीनरी के बुश के रूप मे स्तेमाल होता था जो घर के पास कबाड़ी की
दुकान मे उन दिनों दिखलाई दे जाता था। दूसरे मुहल्ले के बच्चे उस स्टील के पहिये
को सीधे खड़े होकर तार की छड़ी के छोर से,
जो यू की शेप मे मुड़ी रहती पर आगे की ओर दबाव बना कर पहिये के पीछे पीछे दौड़ लगते।
लोहे के तार और लोहे के पहिये की रगड़ से उत्पन्न ध्वनि,
कुछ ऐसे निकलती थी मानो कोई छुरी-चाकू या कैंची पर धार धरने की मशीन से उत्पन्न
होती है। बचपन मे उस पहिये को चलाने की बड़ी ख्वाइश थी जो आज तक भी अधूरी है। बचपन
मे पहिये के वर्गीकरण से अपनी बालक बुद्धि उसके आर्थिक स्थिति का अनुमान लगता।
सबसे नीचे स्तर पर साइकल के टायर का स्थान था। रबर का मजबूत पहिया दूसरी और साइकल
के स्टील रिम का पहिया चलाने वाले बालक को धनाढ्य मानता था। और स्टील के छोटे छेद
वाले पहिये को मुड़े तार से चलाने वाला तो अंबानी अदानी की श्रेणी मे आता था। उन
दिनों, मन
मे बड़ी इच्छा थी कि काश स्टील के छेद वाले पहिये का स्वामी हो सकूँ और उसको चला
सकूँ?
लिखने मे कहीं कोई अतिसन्योक्ति न होगी कि पहिये
के बिना विकास कि कल्पना भी मुमकिन नहीं। आज पहिये के विकास ने इतनी ऊँचाइयाँ हांसिल
कर ली है कि मजदूर वर्ग अपनी मांगों को पूरा करने के लिए ऐसे नारे लगता हैं,
मांगे पूरी नहीं हुई तो देश का चक्का जाम करेंगे......
विजय सहगल



2 टिप्पणियां:
👌🏻Aap ne bachpan ki yad diladi. Ham bhi ek golnuma lohe ke pahiye ko ' U ' shape ki taar se dakelte huve 5-6 kilo meter ki duri kuchh hi samay me tae kar lete the. Ye lag bag prati din ki khel thi jab ki ghar se jad punchh bi hoti thi.
🙏🙏🌹🌹
I S Kadian. Chandigarh
*आपके लेख ने फिर बचपन की यादों के झरोखे में झाँकने को विवश कर दिया।शायद तीसरी कक्षा के पहले से टायर,साइकिल की ताड़ी रहित रिम व रबर की रिंग भी खूब चलाई और आठवीं में आने तक अन्य परंपरागत खेलों की ओर ज्यादा रुचि बढ़ गई ।*
*पहिआ संचालन से बच्चों का शरीर तंदुरुस्त रहता था।फास्ट फूड का नाम भी नहीं सुना था ।वर्तमान समय में टी.वी. आने के बाद बच्चे घरों में जैसे कैद होकर रह गए। रही सही कसर एंड्रॉयड मोबाइल ने पूरी कर दी।बच्चे तो बच्चे बड़ों को भी संवादहीन कर दिया।परिवार में कई सदस्यों के उपस्थित रहने के बाद भी एक सन्नाटा सा पसरा रहता है।*
*हम पाश्चात्य संस्कृति के मकड़जाल जाल में बुरी तरह जकड़ से गए हैं जिससे वापसी नामुमकिन है।*
👍👍👍🌹🙏🌹
सुरेन्द्र सिंह कुशवाहा, ग्वालियर
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