शनिवार, 31 अगस्त 2024

बस!, अब बहुत हो गया!!

 

"बस!, अब बहुत हो गया!!.............माननिय राष्ट्रपति"





दिनांक 28 अगस्त 2024 को आखिरकार देश के सर्वोच्च पदासीन राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मू के चेहरे का  दर्द, पश्चिमी बंगाल सहित देश के अन्य प्रांतों मे बच्चियों, महिलाओं पर हो रहे यौन हिंसा, दुराचार एवं बलात्कार की पीढ़ा उनके वक्तव्यों के माध्यम से छलकी। उन्होने अपने वक्तव्य मे पश्चिमी बंगाल के राधा गोविंद कर मेडिकल कॉलेज के एक ट्रेनी डॉक्टर की 9 अगस्त 2024 को बलात्कार के बाद हत्या की घटना से पूरे देश मे उपजे आक्रोश और गुस्से से अपनी सहमति जताते हुए इन घटनाओं पर तुरंत अंकुश लगाने की बात की। बंगाल की घटना पर श्रीमती मुर्मू ने जिक्र करते हुए कहा कि, घटना से, निराश और डरी हुई हूँ!! बस! बहुत हो चुका, एक सभ्य समाज, अपनी बेटियों और बहिनों के साथ ऐसी वर्बरता वर्दाश्त नहीं कर सकता हैं। अब समय आ गाया है कि भारत ऐसी विकृतियों के प्रति जागरूक हो और उस मानसिकता का मुक़ाबला करें, जो महिलाओं को 'कम शक्तिशाली', कम सक्षम और कम बुद्धिमान के रूप मे देखती है। माननीय राष्ट्रपति महोदया का ये दुःख दर्द यूं ही नहीं था, वे, पिछले दिनों पश्चिमी बंगाल सहित देश के अलग अलग क्षेत्रों मे लगातार  महिलाओं, लड़कियों यहाँ तक कि किंडर गार्डन मे पढ़ने वाली मासूम बच्चियों  तक से  बलात्कार की इन अमानवीय घटनाओं  से आहत थी।

यध्यपि माननीय राष्ट्रपति महोदया का ये वक्तव्य देश मे महिलाओं, बच्चियों पर हो रहे यौन हिंसा के विरुद्ध एक बड़े परिपेक्ष मे दिया  था पर तृणमूल कॉंग्रेस  सहित इंडि गठबंधन के अन्य दलों ने बगैर किसी राजनैतिक मर्यादाओं और नैतिकताओं की परवाह किये माननीय राष्ट्रपति महोदया के वक्तव्य को भी राजनीति के भँवर जाल मे उलझाने का कुत्सित  प्रयास किया, जो घोर निंदनीय है। तृणमूल कॉंग्रेस के सांसद कुणाल घोष ने राष्ट्रपति मुर्मू जी के वक्तव्य पर प्रतिक्रिया देते हुए आरजी कर मेडिकल कॉलेज की ट्रेनी डॉक्टर की रेप के बाद हत्या को देश के अनय राज्यों मे हुई हत्या और बलात्कार की घटनाओं का उल्लेख कर हल्का करने के प्रयास किये  और माननीय राष्ट्रपति द्वारा अन्य घटनाओं पर प्रतिक्रिया न देने पर सवाल उठाये। क्या महामहिम राष्ट्रपति को देश की ज्वलंत एवं गंभीर समस्या पर अपनी चिंता प्रकट करने के भी अधिकार नहीं?     

ऐसा नहीं है  कि महिलाओं के साथ हिंसा, बलात्कार और हत्या की घटनाएँ पहले नहीं हुई थी पर पश्चिमी बंगाल मे आरजी कर मेडिकल कॉलेज की प्रशक्षु डॉक्टर की बलात्कार और हत्या की घटना, इसलिये  घिनौनी और निंदनीय है, क्योंकि मेडिकल कॉलेज प्रशासन, पुलिस प्रशासन एवं प॰ बंगाल सरकार  ने जिस तरह से  इस घटना मे लापरवाही, और लीपापोती की वैसी अन्य  राज्यों मे कदाचित ही देखने को मिली हो! प॰ बंगाल राज्य मे ममता बनर्जी सरकार,  प्रदेश की कानून व्यवस्था सहित राजनैतिक हिंसा के मामले मे हमेशा से ही सवालों के घेरे मे रही थी, पर पिछले कुछ वर्षों से राजनैतिक हिंसा के साथ आरजी कर मेडिकल कॉलेज की ट्रेनी डॉक्टर की रेप और हत्या के मामले ने राज्य की  कानून व्यवस्था पूरी तरह चरमरा गयी जो सामान्य मानवी की दृष्टि से  अत्यंत चिंतनीय है और उस पर  राज्य सरकार का  पक्षपात पूर्ण, ढुलमुल  नजरिया अत्यंत निंदनीय हैं। देश अभी पश्चिमी बंगाल के संदेशखाली मे महिलाओं पर तृणमूल कॉंग्रेस के सदस्य शाहजहाँ शेख द्वारा फरवरी 2024 मे  की गयी जुल्म और ज्यादती पर, ममता सरकार द्वारा उसकी करतूतों पर पर्दा डालने के कुत्सित प्रयासों को भूला भी नहीं था कि ममता सरकार द्वारा ट्रेनी डॉक्टर की बलात्कार और  हत्या पर उसके परिवार से सहानुभूति, हमदर्दी और संवेदना के उलट इस रेप और हत्याकांड को  पहले ही दिन से ही आत्महत्या बतलाकर, लीपापोती करने का घिनौना प्रयास,   इस बात की पुष्टि करता हैं कि ममता सरकार मे महिलाओं के विरुद्ध हो रहे अपराधों को रोकने मे सक्षम नहीं हैं।   

पश्चिमी बंगाल मे आरजी कर मेडिकल कॉलेज मे एक ट्रेनी डॉक्टर की रेप के बाद हत्या की घटना इसलिये भिन्न हैं क्योंकि पीढ़ित परिवार, सेवारत डॉक्टर और प्रदेश के लोगो को ममता  सरकार और पुलिस प्रशासन  की नीयत पर भरोसा नहीं? 9 अगस्त 2024 को एक ट्रेनी डॉक्टर की रेप के बाद हत्या होने के बाद डॉक्टर के परिवार को मेडिकल कॉलेज प्रशासन द्वारा फोन पर बीमारी और फिर अत्महत्या बतलाना, तीन  घंटे तक परिवार को बेटी के शव को न दिखलाना, तृणमूल कॉंग्रेस सरकार की नीयत पर संदेह, शक और शंका को सही सावित नहीं करता हैं? कोलकाता पुलिस द्वारा पोस्टमार्टम के पश्चात अंतिम संस्कार और उसके बाद पुलिस एफ़आईआर कराना, अपराध स्थल पर छेड़छाड़, जैसे मुद्दे पर सर्वोच्च न्यायालय द्वारा प्रश्न खड़े करना कोलकाता पुलिस की लापरवाही को स्पष्ट दर्शाता है और इस घटना पर  ममता सरकार के इरादों पर शुबहा  करने के लिए पर्याप्त नहीं? आरजी मेडिकल कॉलेज के जिस प्राचार्य संदीप घोष को  ट्रेनी डॉक्टर की हत्या के बाद तुरंत पुलिस को सूचना देने के ज़िम्मेदारी थी, ने इस कार्य मे कोताही वरतते हुए हत्या के लंबे अंतराल के बाद पुलिस को सूचना देना, संदेह की पुष्टि के लिए क्या पर्याप्त नहीं? आरजी मेडिकल कॉलेज मे डॉक्टर की हत्या जैसी जघन्य और शर्मनाक घटना और उसके पश्चात उस पर लीपापोती के जिस कुप्रयास पर प्राचार्य डॉक्टर संदीप घोष को तुरंत बर्खास्तगी की सजा के उलट, उस कृतघ्न प्राचार्य को शहर के नेशनल मेडिकल कॉलेज और हॉस्पिटल मे स्थानांतरित कर पुरुस्कृत करना, ममता सरकार की नीयत मे खोट दिखलाई देने के लिये पर्याप्त नहीं है? घटना के दूसरे दिन ही घटना स्थल पर मजदूरों द्वारा निर्माण कार्य के लिये तोड़ फोड़ करना और घटना के बाद 14 अगस्त को 6-7 हजार की अराजक भीड़ द्वारा पूरे आरजी मेडिकल कॉलेज सहित घटना स्थल पर तोड़-फोड़ कर सबूतों के साथ छेड़छाड़ करना और धरना प्रदर्शन कर रहे डॉक्टर्स के साथ मारपीट करना, क्या ये प्रदर्शित नहीं करता कि इस पूर्वनियोजित घिनौने षड्यंत्र के पीछे ममता सरकार की सोची समझी चाल है?

सुप्रीम कोर्ट द्वारा इस हत्याकांड की जांच सीबीआई से कराने के निर्णय से बौखलाई तृणमूल कॉंग्रेस सरकार ने कुछ दिन बाद ही, अपने ही राज्य की कानून व्यवस्था के विरुद्ध अपनी ही सरकार द्वारा आंदोलन करना इस बात को दर्शाता हैं कि, ममता बनर्जी सरकार अपनी सरकार के विरुद्ध किसी भी तरह की निंदा, किसी भी तरह के आंदोलन को सहन नहीं करेंगी चाहे उन्हे इसके लिए किसी भी हद तक अनैतिकता, अन्याय और अधर्म की सीमा को लांघना पड़े। अपने एक दशक से ज्यादा के कार्य काल मे जो ममता बनर्जी महिलाओं पर यौन हिंसा, अत्याचार पर अंकुश न लगा सकीं वह अगले विधान सभा सत्र मे बिल ला कर, महज 10 दिन मे पीढ़िता को इंसाफ दिलाने की डींगे हांक रही हैं!! 28 अगस्त 2024 को तृणमूल छात्र परिषद के स्थापना दिवस के कार्यक्रम मे ममता बनर्जी ने सारी मर्यादाएं लांघते हुए बांगलादेश मे हुए तख्तापलट पर, प्रधानमंत्री को अकारण ही चुनौती देते हुए कहा, मोदी बाबू, आप चाहते हैं कि वह आग बंगाल मे फैले, तो फिर आपको ये समझ लेना चाहिये कि अगर आग बंगाल मे लगेगी तो असम नहीं बचेगा, यूपी, झारखंड, बिहार नहीं बचेगा, नॉर्थ ईस्ट नहीं बचेगा!! आग मणिपुर, ओड़ीशा मे नहीं रुकेगी, यह आग दिल्ली भी पहुंचेगी!! हम आपकी कुर्सी हिला कर रख देंगे!! स्वाभिक था सत्ताधारी दल के नेताओं ने इस पर तीखी प्रतिक्रिया देते हुए उनकी तीव्र आलोचना की और इसे आलोकतांत्रिक और देश विरोधी ब्यान बतलाया। यह भाषा किसी राज्य के मुख्यमंत्री की भाषा नहीं अपितु एक डरे, घबराए  और बौखलाए मुख्यमंत्री की थी जो एक डॉक्टर से  रेप और हत्या की घटना को सही ढंग से नहीं सुलझा पाया।

डॉक्टर्स के जीवन की रक्षा करने मे असफल ममता सरकार, अपरोक्ष रूप से आंदोलनकारी डॉक्टर्स को, चेतावनी देते हुए    उनके भविष्य को पुलिस एफ़आईआर के माध्यम से  दांव पर लगाने से बचने की सलाह दी। जिन डॉक्टर्स का जीवन सुरक्षा के अभाव मे दांव पर लगा हो? वे नौजवान डॉक्टर्स अपने भविष्य के दांव पर लगने की भला क्यों परवाह करने लगे? अतः आरजी मेडिकल कॉलेज के डॉक्टर्स का शांति पूर्ण आंदोलन आज भी जारी है।  आज आवश्यकता इस बात की हैं कि ममता बनर्जी इस हत्या कांड की निष्पक्ष सीबीआई  जांच मे सहयोग कर दूध का दूध और पानी का पानी करें, फिर भले ही इस षड्यंत्र मे उनका कितना भी निकट संबंधी, पार्टी कार्यकर्ता या शुभचिंतक क्यों ने शामिल हों। उनका प्राथमिक कर्तव्य राज्य की आम जनता के हितों के प्रति हैं ने कि किसी और के लिए।

विजय सहगल                               

शनिवार, 24 अगस्त 2024

सावन का महिना और बृंदावन की गलियाँ

 

"सावन का महिना और बृंदावन की गलियाँ"










सावन का महिना और वृन्दावन की गलियों मे बांके बिहारी के दर्शन करना शारीरिक ही नहीं मानसिक रूप से भगवान कृष्ण के भक्ति भाव मे सरावोर होने जैसा हैं।  इस भक्ति रस की बरसात मे मुझे भी 21 अगस्त 2024 को भीगने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। लक्ष्य सिर्फ वृन्दावन, बाँके बिहारी जी के दर्शन ही था। जिस भूमि मे  भगवान कृष्ण की जन्मस्थान और बाल्यकाल बीता हो वहाँ अन्य देवताओं के साथ साक्षात भगवान श्रीराम न हों, ऐसा तो हो ही नहीं सकता। कार को एक सुरक्षित स्थान पर छोड़ हम बमुश्किल दस कदम बड़े ही थे कि राम दूत हनुमान की बानर सेना के नायकों से साक्षात्कार हो गया। एक बंदर ने, हमारे बहनोई सुनील जी के कांधे पर उछलते हुए उनकी आँखों का  चश्मा छीन, एक दुकान की मुंडेर पर बैठ कर चश्मे का अंग-भंग का प्रयास शुरू कर दिया। अचानक से हुए इस देव दर्शन से हम सभी हतप्रभ थे! लेकिन हम सब ने अपने आप को संयत कर शांतिपूर्वक उनकी उपस्थिती को स्वीकारते हुए, चश्मा रूपी समस्या से निवृत्ति के उपाय सोच ही रहे थे कि अचानक कुछ स्थानीय रहवासियों ने समाधान की कुंजी के रूप मे फ्रूटी का सुझाव दे डाला!! लेकिन चारों तरफ निगाह डालने पर समोसे, कचौड़ी, पूड़ी, पराँठे तो दिखाई दिये पर फ्रूटी कहीं भी नज़र न आयी। अब तक बंदर भी भेंट-पूजा न मिलने पर चश्मे के नोज़ पैड को अपना कोप भाजन बना चुका था, अब तक एनक की दोनों डंडियों पर चढ़ी रबर के कवर को निकाल फेंक चुका था। चश्मा नज़र का था, जिसके बगैर एक कदम भी चलना मुश्किल था। बहनोई साहब, फ्रूटी की तलाश मे भटक रहे थे कि अचानक एक किशोर, अर्जुन ने फ्रूटी दिखाते हुए उसकी कीमत 100 रुपए बताई? मैंने बंदर और किशोर, दोनों को  प्यार की  झिड़की देते हुए बीच  का रास्ता  निकालने का आग्रह किया, बंदर पर तो कुछ असर नहीं हुआ, लेकिन किशोर ने झट से स्वीकृत समाधान निकाल 50 रुपए मे सौदा तय कर लिया और फ्रूटी को बंदर की तरफ उछला!! परिणाम मेरे लिये भले ही अप्रत्याशित था पर किशोर के लिये फ्रूटी देने के नतीजे पूर्णत: अपेक्षित थे। बंदर ने जैसे ही फेंकी गयी फ्रूटी को पकड़ा, उसने तुरंत ही चश्मे को नीचे गिरा दिया। बंदर मे विकसित हुई इस लेन-देन और किशोर अर्जुन का, आपदा मे अवसर तलाशने की इस नीति का मै कायल हो गया।

चश्मे की घटना से मिले इस सबक ने हम सब मे एक सावधानी का अहसास करा दिया। हम सभी अपना मोबाइल, पर्स, चश्मा बैग को रखने के अतिरिक्त एहतियात के साथ आगे बड़े। गलियों के अंदर छोटी गली और उसके भी अंदर अति छोटी गली से होते हुए हम बाँके बिहारी मंदिर की ओर अग्रसर होते रहे। छोटी और पतली गलियों मे पूजन सामाग्री, खाने और नाश्ते  के अलावा अधिकांशतः सिर्फ मिठाई की दुकानों ही दिखाई दी। सुंदर और स्वच्छ मिठाई निश्चित ही स्वादिष्ट भी होंगी, डायबिटिस की बीमारी की सीमा रेखा न होती तो आपको मिठाइयों के  स्वाद का विवरण भी देता।

अब तक हम लोग मंदिर के प्रवेश द्वार पर थे। ऐसी किवदंती हैं कि बाँके बिहारी मंदिर मे स्थित यह मूर्ति स्वयं प्रकट हैं। काले पत्थर से बनी इस  मूर्ति को निधिवन से,  भगवान कृष्ण के अनन्य भक्त स्वामी हरिदास ने खोजा था। कालांतर मे इस मूर्ति को 1864 के आसपास निर्मित इस मंदिर मे लाया गया। ऐसी मान्यता हैं कि संत स्वामी हरिदास जी, भगवान श्रीकृष्ण को  बाल्य रूप मे पूजित करने के कारण उनके आराम का पूरा ध्यान रखते थे इसलिए इस मंदिर मे प्रातः काल का  मंगलाचरण अर्थात सुबह की आरती नहीं होती एवं मंदिर के अंदर घंटियाँ नहीं लगी ताकि भगवान को परेशानी न हो। वर्गाकार आकृति मे निर्मित इस मंदिर मे तीन  ओर से प्रवेश द्वार बने हैं। मंदिर मे प्रवेश करते ही एक आयताकार बरामदे मे श्रद्धालु प्रवेश करते हैं जो चारों दिशाओं की तीन-तीन द्वारों अर्थात बरादरी के माध्यम से एक बड़े आँगन मे खुलता हैं। काले सफ़ेद संगमरमर के वर्गाकार पत्थरों से निर्मित आँगन का  धरातल बाहरी बरामदे से 3-4 सीढ़ियाँ नीचे होने के कारण श्रद्धालु आराम से भगवान बाँके बिहारी जी के दर्शन अपने अपने स्थान से, आसानी से  कर सकते हैं। गर्भग्रह मे विराजित भगवान के दरबाजे और दिवारे चाँदी जड़ित हैं। हर मिनिट मे हजारों भक्तगण अपने आराध्य के दर्शन करते हैं। सेवक, पुजारी हर कुछ मिनिटों के अंतराल के  बाद कुछ क्षणों के लिये गर्भ गृह का पर्दा डाल देते हैं ताकि भगवान के बाल्य रूप को किसी की नज़र न  लग जाय।  लाल बालुई पत्थरों से निर्मित मंदिर का आँगन और उसके ऊपर चारों दिशाओं मे बने झरोखे (बालकनी) जितने  बारीक नक्काशी दार जालियों से बने हैं उतने ही मुख्य द्वार के बाहर बनी तीन मंज़िला आकृति, वास्तु का सुंदर और अनोखा उदाहरण हैं। मंदिर के प्रवेश द्वार के दोनों ओर भी पत्थरों के नक्काशीदार स्तंभों पर अर्धगोलाकार मेहराब युक्त छोटे झरोखे बनाए गये हैं।  मनभावन, मनोरथ दर्शन के पश्चात मंदिर के तीन नंबर द्वार से हम लोग बाहर आ गये। यध्यपि पूरे वर्ष रहने वाली श्रद्धालुओं की भीड़ उतनी नहीं थी जितनी अष्टमी, एकादशी या अन्य विशेष पर्वों पर होती हैं। मंदिर के आँगन मे अनेकों एक्सॉस्ट पंखे लगे होने के बावजूद कभी कभी अनियंत्रित भीड़ के कारण  कुछ अप्रिय हादसे भी हो चुके हैं, जो दुःखद हैं।

दर्शन के पश्चात बापसी मे पतली पतली गलियों से निकलने के दौरान सुगंधित और  स्वादिष्ट मिष्ठानों की खुशबू से जब बच निकलना मुश्किल हो गया तो एक छोटी सी, राधे-राधे पेड़े वाले की दुकान मालिक से प्रहलाद से मैंने कह ही दिया, "भाई तुम से बड़ी शिकायत हैं", इन गलियों से मेरा दस मिनिट निकलना मुश्किल हो गया, मुँह मे बार बार पानी भर जाता हैं। तुम कैसे दिन भर स्वादिष्ट मिठाइयों के बीच शांत, बैठे रहते हो? सभ्य और सुसंस्कारित युवक प्रह्लाद ने हाजिर जबाबी से मुझे लाजबाब कर दिया!! सर, जब मिठाई देख कर मुँह मे पानी आ रहा तो  पानी देख कर, मुँह मे मिठाई आना चाहिये? और मुस्कराते हुए लौकी की बर्फी मेरे तरफ बढ़ा दी!! इसके बाद तो उसने एक के बाद एक कलाकंद, पेड़ा, घेवर और बर्फी  की झड़ी लगा दी!! मै आया तो था, मिठाई वाले को अपने जाल मे फँसाने, लेकिन मै खुद ही डाईविटीज के बावजूद प्रहलाद मिठाई वाले  के जाल मे फंस गया!! और घेवर खरीद का ऑर्डर दे दिया।          

सुबह के वक्त भीड़ के बावजूद गलियों मे पिछले दिन के कचरे को सफाई कर्मी पूरी मेहनत और लगन से गलियों को साफ रखने के यतन कर रहे थे। लेकिन इन व्यक्तियों के भरपूर प्रयास तब छोटे पड़ जाते हैं जब हम भारतीय कचरे के डिब्बे लगे होने के बावजूद अनुपयुक्त कचरा डिब्बों मे न डाल कर यहाँ वहाँ फेंक देते हैं। इन सफाई कर्मियों द्वारा गलियों की सफाई को बड़ी  मेहनत और लगन से साफ करता देख मैंने उन लोगो का परिचय प्राप्त किया। चैनु, लेखी, परमेश्वर और खेरे को जब हमने बताया कि मंदिरों और  वृन्दावन की इन  गलियाँ की साफ, सफाई महत्व इसलिए हैं क्योंकि सफाई मे आप लोगों का महत्वपूर्ण योगदान हैं। हम भगवान बाँके बिहारी के दर्शन श्रीमद्भगवत गीता के श्लोक ...........योगक्षेमं वहाम्यहम् के भाव के अनुरूप इसलिए अच्छी तरह से कर सके, क्योंकि उनके दर्शन तक के मार्ग को आपलोगों ने अपनी मेहनत से साफ सुथरा कर दिया। कुछ पलों के लिये उन सफाई कर्मियों के चेहरे पर उभरे खुशी और उनके महत्वता के अहसास के भाव ने उनके साथ मुझे भी कुछ क्षणों की खुशी दे दी। इस सुखद पलों को मैंने अपने मोबाइल मे कैद करने का प्रयास किया।  

बापसी के दौरान फ्रूटी प्रेमी बंदर के एक बार फिर दर्शन हुए जो एक महिला के पर्स और उसमे रक्खे मोबाइल और स्वर्ण कुंडल को नुकसान पहुंचाने मे प्रयासरत था। लेकिन बंदर के लिये स्वर्ण और पत्थर समान थे वह तो अनासक्त भाव से फ्रूटी के लिये पर्स के विनाश के लिये तत्पर था। लेकिन यहाँ भी फ्रूटी मिलते ही बंदर ने छिन्न-भिन्न पर्स के साथ महिला का मोबाइल और स्वर्ण कुंडल फेंक दिये। इसलिये कृपया वृंदावन मे भ्रमण के दौरान अतिरिक्त सावधानी बरते। अन्य पर्यटन या धार्मिक स्थलों की तरह शौञ्च की समस्या के समाधान की भी कमी यहाँ भी महसूस की गयी। जागरूक धर्मावलम्बियों और प्रशासन से  इस संबंध मे कार्यवाही अपेक्षित हैं।        

विजय सहगल

             

शनिवार, 17 अगस्त 2024

निरुआ अर्थात "निरुद्देश्य यात्रा"


                                                         निरुआ अर्थात "निरुद्देश्य यात्रा"







शहरों और महानगरों मे बेशक आती या जाती हुई रेल को देखना कोई अचरज न हो पर गाँव, देहात या छोटे कस्बों से निकलती हुई रेल लाइन पर जाती या आती हुई  रेल गाड़ी और माल गाड़ी को देखना मेरा प्रिय विषय रहा हैं। पहली वार मै अपने बाबा के साथ झाँसी रेल स्टेशन पर खड़ी एक यात्री गाड़ी मे बैठा था जिसका खाली रैक यूं ही प्लेटफॉर्म  पर खड़ा था, क्योंकि मेरे पिता जी रेल विभाग मे सेवारत थे। मेरे पिता जी की पदस्थापना के दौरान, बचपन मे, मैं प्रायः,  राजा की मंडी, आगरा स्टेशन के किसी कोने की बेंच पर या अपने रेल आवास के उस दरबाजे पर, जहां से यात्री गाड़ी या माल गाड़ी दिखाई देती, उसको आते-जाते घंटों निहारा करता था। वो कोयले वाले इंजिन का दौर था। हम गोल मुंह वाले इंजिन को सुस्त और धीमी गति का वाला मानते थे और नुकीले इंजिन को तेज गति का मानते थे, क्योंकि उन दिनों ताज एक्स्प्रेस शुरू हुई थी, जिसको नुकीले इंजिन से चलाया जाता था।  पहली वार वातानुकूलित चेयर कार के डिब्बे मे दो कदम अंदर जाकर जो ठंडक मैंने महसूस की थी आज भी मुझे याद हैं। उस दिन मेरे आश्चर्य और उत्साह का ठिकाना न था। यात्री गाड़ी और माल गाड़ी को देखने का नज़रिया और मन मे आने वाले भाव भी अलग होते थे। यात्री गाड़ी मे जहां चहल-पहल और जीवंतता थी, चाय वाला चाय....... की सार्वभौमिक,  आवाज कश्मीर से कन्या कुमारी तक एक भाषा, एक लय और एक स्वर मे सुनाई दे जाती थी। कैसे यात्री गाड़ी के आते ही, रेल स्टाफ डिब्बों के उपर चढ़कर उसके उपर लगे नलों मे पाइप लगा कर पानी भरता और नीचे तकनीकि विभाग का कर्मचारी, लंबे डंडे मे लगी छोटी हथौड़ी से डिब्बे के एक ओर लगे हर डिब्बे से टकराकर टन्न की आवाज उत्पन्न करते। उस टक्कर से निकलने वाली आवाज की गूंज हमारे चेतना पटल पर अव भी ताजी हैं। इस तरह हथौड़ी से पहिये को टकराने का प्रोयजन मै आज तक नहीं जान पाया।    

14 अगस्त 2024 को अपने ललितपुर प्रवास के दौरान निकला तो था, चहल कदमी करते हुए भ्रमण पर जाने को, लेकिन एक रेल अंडर ब्रिज पर बनी सीढ़ियों को देखते ही, कदम अनायास ही रेल पटरियों की तरफ बढ़ चले। चंद कदमों की चढ़ाई के बाद मै आज दशकों बाद फिर रेल पटरियों के पत्थर और गिट्टियों से भरी पगडंडी पर था। निरुद्देश्य, अंजान अजनबी रस्तों पर चलना आज अच्छा लग रहा था। दूर दूर तक चमकती लाल बत्तियों के बीच चलना,  मन मे कुछ जिज्ञासाओं और सवालों के साथ नव उत्साह  को जन्म दे रहा था, इसी बीच दूर सामने से आती हुई, यात्री गाड़ी की तेज आवाज सुनाई दी, जो धड़-धड़ाती हुई मेरी तरफ ही चली आ रही थी। चिंता की कोई बात नहीं थी, रेल लाइन से दूर खड़े होकर ललितपुर से खजुराहो जा रही, इस जाती हुई सवारी गाड़ी के साथ सेल्फी लेने का प्रयास किया जो असफल रहा क्योंकि शायद मै इस विद्या मे उतना प्रवीण या पारंगत नहीं हूँ।

एक बात तो माननी पड़ेगी कि आज से एक दशक पूर्व कश्मीर से कन्याकुमारी तक, जब गाँव या देहात से जा रही रेल लाइन के किनारे चलने पर, जगह जगह स्त्री पुरुष शौंच के लिए बैठे मिल जाते थे और लाइन के किनारे मानव मलमूत्र जहां तहां देखने को मिल जाता था, बड़ी घिन आती थी। लेकिन प्रधानमंत्री मोदी की एक दशक पूर्व शुरू हुई हर घर शौंचालय योजना ने लाइन पर शौच करने वालों की संख्या की कमी ने, बड़ी अहम भूमिका निभाई।  इस उद्देश्य हीन भ्रमण मे एक भी व्यक्ति शौंच करते या रेल लाइन किनारे मानव माल-मूत्र दिखाई नहीं दिया। निश्चित ही इस कार्य की सराहना की जानी चाहिए।

रेल लाइन के किनारे रेल विभाग की मशीनरी और उपकरण मे कुछ धातु या इलैक्ट्रिकल पार्ट्स की चोरी होना आम बात थी। पिछले दशकों मे इसमे काफी बदलाब हुए। रेल लाइन के किनारे एक लोहे के बॉक्स पर लिखी इबारत देख कर मै ठिठक गया। किसी रेल कर्मचारी की सकारात्मक सोच के संदेश को पढ़ कर दिल खुश हो गया। उस बॉक्स के बाहर लिखा हुआ था, "हमारे पास कुछ नहीं है, हम खाली हैं!! उक्त संदेश के माध्यम से, जैसे बॉक्स, चोर या उठाईगीर से कह रहा हो, "मुझे तोड़ने या खोलने का प्रयास न करें"? 

कभी सीमेंट के स्लीपरों पर चलकर, कभी गिट्टी पत्थरों पर सम्हल-सम्हल कर पैर जमाकर, मंथर गति से चलना एक नया अनुभव और नया अहसास करा रहा था। इस भ्रमण के दौरान उत्तर दक्षिण से आने जाने वाली एक जोड़ी लाइन एवं खजुराहो की लाइन, निर्माणाधीन, कुल मिला कर चार-पाँच लाइनों पर एक दो मालगाड़ी और यात्री गाडियाँ  गुजरी। रेल यात्रा के दौरान जब कभी मुझे, लाइन किनारे एकांत, निर्जन और वीराने मे  चलने वाले व्यक्तियों को देख जो संवेदना और सहानुभूति का भाव जाग्रत होता है, आज बैसी  ही अनुभूति, शायद रेल यात्री मुझे देख कर कर रहे होंगे!! रेल किनारे खड़े होने या रहने का एक अलग ही अध्यात्मबोध होता है, बेशक अल्प आबादी वाले गाँव देहात हों या निपट अकेले रेल लाइन के किनारे चल रहे हों पर रेल लाइन, सारे देश से जुड़े रहने का अहसास दिलाती हैं जैसे सारा देश आपके साथ खड़ा हैं और हम सारे देश के साथ!!

इन्ही उधेड़-बुन और विचारों के सैलाब मे तैरते-उतराते और गोता लगाते निरंतर आगे बढ़ा चला जा रहा था। अब तक मै प्लेटफॉर्म के नजदीक पहुँच गया था। एक कोयले की मालगाड़ी खजुराहो की दिशा मे जाने को तैयार थी। इंजिन का ड्राईवर, गेट पर खड़े होकर सिग्नल मिलने का इंतज़ार कर रहा था। अचानक मन मे सेल्फी का कीड़ा फिर कुलबुलाने लगा। यध्यपि मै इस बीमारी से कोसों दूर हूँ फिर भी इंजिन को कवर करते हुए, रेल लाइन के किनारे हो कर सेल्फी लेने लगा पर अपने को थोड़ा और साहसी दिखलाने के लिये मैने  बिल्कुल रेल लाइन के बीच मे खड़े होकर फटाफट एक सेल्फी ले डाली!! हालांकि खड़े हुए इंजिन के सामने से सेल्फी लेने मे कहीं भी किसी तरह के खतरे, संकट की शंका नहीं थी फिर भी कुछ क्षणों के लिये भी खड़े होकर सेल्फी लेने पर मन ही मन डर, भय आशंका बनी रही। मेरे द्वारा सेल्फी का उक्त सुरक्षित ड्रामा था, पर इस तरह के जीवंत  प्रयास कदापि न करें। पता नहीं लोग चलती ट्रेन  के किनारे या उसके पास आकर  कैसे सेल्फी लेने का दुस्साहस करते हैं और कभी कभी अपनी जान गँवा देते हैं। निश्चित ही इस तरह के आत्मघाती कृत्य कर अपने जीवन को संकट मे डालना महा मूर्खता हैं अतः ऐसा कभी न करें।

इंजिन के ठीक पीछे लगे गार्ड के डिब्बे को देख मुझे, 28 सितम्बर 2018 को लिखे अपने ब्लॉग "मालगाड़ी" के रोचक प्रसंग  की याद हो आयी, आप भी उक्त प्रसंग का आनंद उठा सकते हैं।  ( https://sahgalvk.blogspot.com/2018/09/blog-post_44.html )

अब तक रेल लाइन के किनारे-किनारे चलते कुछ थक गया था। प्लेटफॉर्म के एक सिरे पर बैठ सुस्ता ही रहा था कि कुछ महिलाएं, पुरुष और बच्चों का समूह निकट ही आ कर जमीन पर बैठ गया। राम-राम से अभिंवादन की  सामान्य औपचारिकता के बाद जब मैंने उन लोगो का परिचय पूंछा। प्रकाश नमक व्यक्ति जो ग्राम कडेसरा कलाँ, तालबेहट के निवासी थे। कुछ दिन पूर्व अपनी माँ के देहावसान के पश्चात उनकी  पवित्र अस्थियों को त्रिवेणी मे विसर्जन के लिये अपने भाई, बहिनों, भतीजे और भांजों के साथ प्रयाग जा रहे थे। करीब 15-17 लोगो का समूह था। समाज के वंचित वर्ग से आने वाले प्रकाश के परिवार के सभी लोगों से मुलाक़ात यध्यपि भावुक माहौल मे हुई। अपनी  माँ के प्रति उनकी,  भावनाओं और सम्मान को देख, उन्हे अपने रीति और परम्पराओं को पालन करते देख मेरा सिर श्रद्धा से झुक गया। प्रकाश की  लगभग सौ वर्षीय उनकी स्वर्गीय माँ को अपने श्रद्धा सुमन अर्पित करने के दौरान मन के किसी कोने मे मुझे भी अपनी स्वर्गीय माँ का स्मरण  हो आया, जो पिछले वर्ष 19 जून को हम सब को छोड़कर परलोक गमन कर गयीं थी।                              

आज की इस अंजान और अजनबी, बिना किसी उद्देश्य के निरुद्देश्य यात्रा यादगार बन गयी। इस यात्रा से  एक सुखद अनुभूति, एक नया अनुभव और एक नवीन अनुमान की दिशा और दशा प्राप्त हुई जो ताउम्र याद रहने वाली है।  

विजय सहगल

मंगलवार, 13 अगस्त 2024

सपा सांसद, जया बच्चन द्वारा सभापति का मर्यादा हनन

 

"सपा सांसद, जया बच्चन द्वारा सभापति का मर्यादा हनन"





9 अगस्त 2024 को एक बार फिर देश के उच्च सदन, राज्य सभा मे उपराष्ट्रपति श्री जगदीप धनखड़ के लिये अत्यंत अपमानजनक भाषा का प्रयोग किया गया। लोकतन्त्र के सर्वोच्च सदन राज्य सभा की वरिष्ठ, अनुभवि और परिपक्व समाजवादी पार्टी की  सदस्या, जया बच्चन  से ऐसी उम्मीद नहीं की जा सकती। सभापति के लिये प्रयुक्त  उनकी भाषा और व्यवहार की जितनी भी निंदा की जाय कम हैं।

राज्य सभा, सभापति श्री जगदीप धनखड़ ने जब किसी विषय पर समाजवादी  सांसद, को बोलने के लिये आमंत्रित करते हुए कहा, सदस्यों इस मुद्दे पर श्रीमती जया अमिताभ बच्चन आखिरी वक्ता होंगी", मेडम, कृपया बोलें!! इसके बाद जया बच्चन जब  बोलने के लिये खड़ी हुई और उन्हे जिस विषय पर जो बोलना था उसके इत्तर जो बोला उसको सुनकर न केवल राज्यसभा के सभापति, राज्यसभा के सारे सदस्य और टीवी पर देख रहे लाखों करोड़ो दर्शक हतप्रभ रह गए!! उन्होने कहा, सर, मै जया अमिताभ बच्चन बोलना चाहती हूँ, मै कलाकार हूँ! बॉडी लैड्ग्वेज समझती हूँ! एक्स्प्रेश्न समझती हूँ, और सर, मुझे माफ करिएगा, मगर आपका टोन (बोलने का लहजा) हमे अस्वीकार हैं!! आप सभापति के आसन पर आसीन हैं!! राज्य सभा मे कुछ क्षणों के लिये तो मानों सन्नाटा छा गया!! प्रतिक्रिया स्वरूप सत्ता पक्ष के लोगो ने भी प्रतिवाद किया। सभापति का  भी प्रत्युत्तर भी अपेक्षित था। सभापति ने जया बच्चन से आग्रह पूर्वक कहा आप बैठ जाइये!, कृपया बैठ जाइये!! तब उन्होने बड़े धैर्य और सम्मान से कहा, जया जी, आपने अपने जीवन मे बड़ी ख्याति और सम्मान अर्जित किया हैं लेकिन आपको पता होगा कि एक अभिनेता, निर्देशक के तहत कार्य करता है!! आप वहाँ से वो सब नहीं देख सकती जो मै यहाँ हर दिन, देखता हूँ। मै अपनी सीमा से परे सदस्यों का ध्यान रखता हूँ और आप मेरे बोलने का लहजे पर बात करती हैं? बस बहुत हुआ!! आप कोई भी हों, आप एक विख्यात और यशस्वी व्यक्ति है, पर आपको सदन की गरिमा का सम्मान करना होगा!! इस प्रकरण मे ये बात याद रखने की हैं कि सभापति ने तो जया बच्चन को आमंत्रित किया था राज्यसभा मे बोलने को लेकिन जया बच्चन ने अपने विचार रखना तो दूर सीधे ही सभापति के  बोलने के लहजे पर अकारण, असमय और अनावश्यक रूप से घृणित और अपमानित टिप्पड़ी कर दी? बड़ा खेद और अफसोस हैं कि जया बच्चन ने  बिना किसी आधार के बेबुनियाद और अनर्गल टिप्पड़ी कर, न केवल सभापति का अनादर और अपमान किया है अपितु हमारे देश के उपराष्ट्रपति का निरादर और तिरिस्कार किया। उन्हे ये याद रखना होगा कि श्री जगदीप धनखड़ कोई व्यक्ति के रूप  मे नहीं अपितु दुनियाँ के सबसे बड़े लोकतन्त्र के दूसरे सबसे बड़े संवैधानिक पदासीन, उपराष्ट्रपति पद का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं और जया बच्चन ने सभापति की गरिमा, शान और मर्यादा का ही नहीं सारे देश का अपमान किया हैं, उन्हे तुरंत ही सभापति से क्षमा मांगना चाहिये अन्यथा राज्य सभा को उनके विरुद्ध कठोर से कठोर कार्यवाही करना और आवश्यकता पड़ने पर उन्हे कठोरतम दंड के रूप मे  सदन से निलंबित किया जाने पर नहीं झिझकना चाहिये।

यदि किसी विषय पर कभी उन्हे लगा होता कि सभापति के बोलने का लहजा अनुचित है तो उन्हे तभी शालीनता पूर्वक उनसे अपना  प्रतिवाद दर्ज़ कराना चाहिये था? कल की घटना मे तो सभापति ने शालीनता और सम्मान पूर्वक उन्हे सदन को संबोधित करने के लिये आमंत्रित किया था, फिर तथाकथित किसी पुरानी घटना से जोड़कर इस तरह के अनैतिक आरोप लगाना पूरी तरह अनावश्यक और अनुचित थे। सदन मे बोलने के अपने नियम और परम्पराएँ है। सभापति को भी सदन का सुचाररूप से संचालन के लिये सदन द्वारा प्रदत्त शक्तियों का उपयोग करना आवश्यक हैं, सैकड़ों की संख्या मे उपस्थित सदस्यों का भी ये नैतिक और वैधानिक कर्तव्य हैं कि सदन, अनुशासित ढंग से चले, फिर जया बच्चन या मल्लिकार्जुन खडगे क्यों चाहते हैं कि सदन उनकी इच्छा या आकांक्षा या उनकी मर्जी से चले? यदि मतभिन्नता है तो लोकतन्त्र के तहत विपक्ष को सदन से बहिर्गमन  का अधिकार तो मिला ही है?     

जब से लोकसभा 2024 के चुनावो मे मोदी के एनडीए गठबंधन को 3॰O मे मिली जीत को कॉंग्रेस सहित इंडि गठबंधन के लोग अब तक पचा नहीं पा  रहे हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि विपक्षी दलों के नेता एक पूर्वनियोजित लक्ष्य की प्राप्ति हेतु दोनों सदनों मे समान रूप से आसंदी के विरुद्ध कोई न कोई षड्यंत्र कर रहे हैं अन्यथा लोकसभा के सभापति के विरुद्ध भी इसी तरह का अजेंडा न चलाते? लोकसभा मे भी लोकसभा अध्यक्ष के श्री ओम बिड़ला के उपर राहुल गांधी, अखिलेश यादव और अन्य इंडि गठबंधन के नेताओ द्वारा बार-बार पक्षपात पूर्ण आरोप लगाना, उनका निरादर, तिरस्कार और अवज्ञा, न की जाती। राज्य सभा मे भी उसी नक्शे कदम पर चलते हुए जया बच्चन ने भी वही आख्यान और अभियान  चलाया!! कॉंग्रेस इस समय येन केन प्रकारेण किसी भी तरह सत्ता के बिना मछ्ली की तरह तड़प रही हैं। उन्हे उम्मीद थी कि इस लोकसभा के चुनाव मे भ्रामक और छद्म प्रचार के बल बूते वो सत्ता मे आ जाएंगे लेकिन वे इस कूटप्रबंध मे कामयाब न हो सके?

उक्त प्रकरण मे विपक्षी दलों के वॉक आउट के पश्चात सदन के बाहर जया बच्चन का जो  आचरण देखने को मिला वह तो मर्यादाओं की सभी सीमा को लांघ  गया। सदन के बाहर प्रेस और मीडिया को संबोधित करते लिये उन्होने पुनः दोहराया कि सभापति के  बोलने का लहजा ठीक नहीं था। सभापति की ओर इशारा करते हुए उन्होने कहा कि सदन के बाहर वे आम  सांसदों की तरह एक सांसद हैं। वे हमारे कोई अन्नदाता नहीं हैं। अपने सांसद होने का इतना अहंकार और दंभ?  भारत के उपराष्ट्रपति के पदासीन व्यक्ति को आम सांसद बतलाना उनकी सीमित, संकुचित और संकीर्ण सोच को दर्शाता हैं।  आगे सभापति श्री  जगदीप धनखड़ द्वारा उनसे (जया बच्चन से) माफी की मांग से नीचे कोई सम्झौता न करना उनके मानसिक दिवालियापन की चरम सीमा थी। जया बच्चन द्वारा स्वयं अपने दुर्व्यवहार के लिये, सभापति से माफी मांगने की बजाय सभापति से माफी की मांग करना!! ये तो वही बात हो गयी कि, "चोरी और सीना जोरी" या "उल्टा चोर कोतवाल को डांटे"। 

सभापति के साथ अपनी बेअदबी और बदमिजाजी को बड़ी सफाई से न्यायोचित ठहराते हुए उन्होने प्रेस कॉन्फ्रेंस मे नेता प्रतिपक्ष के साथ दुर्व्यवहार और महिलाओं के साथ अनुचित व्यवहार का मुद्दा भी जोड़ दिया ताकि राज्यसभा मे सभापति को बोले, अपने अमर्यादित, अनैतिक और अशोभिनीय व्यवहार पर पर्दा डाला जा सके। अपने सम्बोधन मे स्वयं को कलाकार बतलाने पर जया बच्चन जी को कोई आपत्ति नहीं थी लेकिन सभापति महोदय द्वारा उन्हे सेलिब्रिटी कहने पर एतराज था और इसे महिलाओं के आत्मसम्मान से जोड़ कर अपने आपको निरीह महिला की तरह पेश करने के छद्म आरोप सभापति पर लगाना, क्या स्यम जया बच्चन द्वारा  महिलाओं के  ही अपमान को नहीं दर्शाता?

जया बच्चन 2004 से अर्थात पिछले 20 वर्षों से समाजवादी पार्टी की राज्य सभा सदस्य हैं। बदमिजाजी के सिबाय उनका कोई उल्लेखनीय योगदान राज्य सभा मे नहीं रहा। उन जैसे वरिष्ठ सदस्य से अपेक्षा थी कि वे अपने व्यवहार से कोई ऐसा उदाहरण प्रस्तुत करती जो एक नज़ीर के रूप मे उल्लेख किया जाता लेकिन दुर्भाग्य से वे ऐसा नहीं कर सकी? काँच के महलों मे रहने वालों को लोगों पर पत्थर नहीं फेंकना चाहिये, इस किवदंती के दृष्टिगत आज आवश्यकता इस बात की हैं कि सत्ताधारी दल और विपक्ष को आपस मे मिलबैठ कर संसद को दोनों सदनों  को बिना किसी पूर्वाग्रह के चलाने के लिये सभापति का सहयोग करना चाहिये ताकि देश का लोकतन्त्र और मजबूत होकर दुनियाँ मे एक उदाहरण बन सके।

विजय सहगल