"यूपी
की काँवड़ यात्रा मे रेहड़ी,
पटरी वालों की पहचान की अनिवार्यता"
इन दिनों उत्तर प्रदेश मे श्रावण (सावन) मास
मे आरंभ हो रही काँवड़ यात्रा,
इस समय यूपी सरकार के उस आदेश से विवादों के घेरे मे हैं जिसके तहत काँवड़ यात्रा
के मार्ग मे पड़ने वाले सभी रेहड़ी, पटरी,
खोमचे और ठेले वालों को अपनी पहचान का प्रदर्शन बड़े बड़े शब्दों मे मुख्य स्थान पर प्रदर्शित करने को कहा गया हैं। इस आदेश के तहत
खोमचे, रेहड़ी पटरी वाले खाद्य सामाग्री और पेय
पदार्थों के बिक्रेताओं के मालिक,
संचालकों का नाम और व्यवसाय का उल्लेख
करना आवश्यक किया गया हैं। रही सही कसर उत्तराखंड
की धामी सरकार ने भी यूपी की योगी सरकार की तर्ज़ पर उत्तराखंड मे भी रेहड़ी,
पटरी वाले संचालकों को अपनी पहचान और
व्यवसाय की प्रदर्शन को अनिवार्यता ने आग
मे घी का काम कर दिया। उत्तर प्रदेश सहित देश भर की राजनैतिक दलों द्वारा अपनी
अपनी तरह से यूपी की आदित्य योगी सरकार के इस आदेश की व्याख्या कर विरोध प्रकट
किया। कॉंग्रेस महासचिव प्रियंका वाड्रा ने इस आदेश को भारतीय संविधान मे हर
नागरिक को जाति, धर्म,
भाषा के भेदभाव से परे, मिले अधिकारों
का हनन बताया। उन्होने इसे विभाजनकारी आदेश बता कर निंदा की। बीएसपी प्रमुख
मायावती ने इसे असंवैधानिक और चुनावी लाभ का एक स्टंट बताया। सपा प्रमुख अखिलेश
यादव, एआईएमआईएम प्रमुख असुद्दीन ओवैसी,
कॉंग्रेस के अजय राय, कपिल सिब्बल,
शिवसेना के संजय राऊत आदि ने इस धार्मिक भेदभाव बताकर निंदा की है। ये तो रही देश
के राजनैतिक दलों की प्रितिक्रिया का एक पहलू।
यहाँ ये स्पष्ट करना लाज़मी हैं कि कॉंग्रेस
की मनमोहन सिंह सरकार ने "खाद्य सुरक्षा और मानक अधिनियम 2006 के नियम के
अंतर्गत हर स्ट्रीट वेंडर, हाथ ठेला और
रेहड़ी पटरी वाले व्यवसायीयों के लिये ये
आवश्यक किया गया है कि वे उस लाइसेन्स को बड़े आकार मे प्रदर्शित करें,
जिसमे व्यवसाय, व्यवसायी का नाम,
पता, लाइसेन्स नंबर आदि लिखा हुआ होगा। कॉंग्रेस
की मनमोहन सरकार के इस अधिनियम को तत्कालीन सपा सरकार के मुख्य मंत्री मुलायम सिंह
यादव ने भी उसे उत्तर प्रदेश मे लागू किया था। तब विपक्षी गठबंधन के इन आरोपों
मे कोई दम नहीं दिखाई देती कि योगी सरकार के, पहचान को प्रदर्शित करने वाले आदेश सांप्रदायिक
और धर्म के आधार पर विभाजन कारी हैं। एक कानून को राज्य मे पुनर्स्थापित करना कहाँ
से असंवैधानिक हो सकता है? पुनः ये आदेश
कोई मुस्लिम व्यवसायी या रेहड़ी पटरी वालों पर ही नहीं हिन्दू या अन्य संप्रदायों
पर भी लागू किए जा रहे हैं है तब भेदभाव का प्रश्न कहाँ खड़ा होता हैं?
मेरा तो ये मानना हैं कि इस तरह की पहचान को प्रदर्शित करने वाले आदेश को पूरे देश
मे समान रूप से लागू किया जाना चाहिये,
जो उपभोक्ताओं के अधिकारों को संरक्षित करने मे एक महत्वपूर्ण कदम सबित होगा।
दुकानदार व्यवसायी या अन्य रेहड़ी पटरी वाले प्रायः आज भी मिठाई या अन्य वस्तु के
साथ गत्ते के डिब्बे के बजन को शामिल कर,
कम तौल कर ग्राहक के साथ धोखा धड़ी करते हैं,
घट तौली अर्थात वस्तुओं की तौल मे हेराफेरी की घटनाएँ आम हैं। कबाड़ी,
रद्दी वालों की तराजू के एक पलड़े पर यदि
हाथी और दूसरे पर मेमने को रक्खे तो भी हाथी का बजन कम बतलाएगा!! जब इन्शुरेंस
बैंक, सरकारी या अन्य बड़े व्यापारिक संस्थानों मे शिकायत निवारण की प्रिक्रिया के
तहत संस्थान प्रमुख का नाम,
मोबाइल या फोन नंबर और पता लिखना अनिवार्य है तो बड़े व्यापारिक संस्थान या छोटे
रेहड़ी पटरी पर इसे क्यों लागू नहीं किया जाना चाहिये?
मेरा मानना हैं कि सड़क, परिवहन,
सरकारी और सार्वजनिक हित के निर्माण कार्यों करने वाले ठेकेदारों के नाम के साथ उन
सरकारी अधिकारियों के नाम और मोबाइल नंबर
भी उन स्थानों पर प्रदर्शित होना चाहिये जिनके मातहत निर्माण कार्य किए गए हों
ताकि किसी मे त्रुटि, या तय मानकों के पालन करने मे हुई कोताही की शिकायत
आम जन सरकार और उनके अधिकारियों को कर संके। शिकायत निवारण के तहत उपभोकताओं के
संरक्षण हेतु ये आवश्यक हैं कि इस आदेश को
पूरे देश मे समान रूप से लागू किया जाय,
फिर वह संस्थान चाहे खाद्य सामाग्री या कपड़ा,
बिजली, सीमेंट या अन्य व्यवसाय का ही क्यों न हो। यदि ये नियम लागू होंगे तो उन
व्यापारियों और व्यक्तियों के विरुद्ध खराब खाद्य पदार्थ,
कम तौल की शिकायत, घटिया वस्तुओं के साथ-साथ
व्यापार, विनमय मे अनुचित व्यवहार
या दुर्व्यवहार के लिये, उनकी पहचान के
आधार पर, उनके विरुद्ध समुचित कानूनी
और आपराधिक कार्यवाही सरलता से की जा सकेगी,
इसके साथ ही ऐसे समाज द्रोहियों के चेहरे आम जनों के बीच बेनकाब हो सकेंगे।
जब इस्लाम धर्म के लोगो को एक ही जानवर के मांस को खाने के
पूर्व ये जानने का अधिकार हैं कि उस जानवर का वध किस तरीके से किया गया अर्थात झटके से या हलाल कर काटा गया,
तब आखिर हमारे शाकाहार खानपान मे हमारी
आस्था, विश्वास और सुचिता बनाये रखने वाले की पहचान,
जानने का हमे अधिकार क्यों नहीं होना चाहिये?
यदि शाकाहार मे वही वर्तन और तेल/घी प्रयोग
किया गया जिसमे पहले मांसाहार बनाया गया तो ये शाकाहारियों के विरुद्ध भौतिक और वैचारिक
हिंसा ही है जिसे तुरंत रोका जाना चाहिये। यदि शाकाहार व्यक्तियों की उक्त भावनाओं को अनदेखा
किया जाएगा तो उन्हे हक हैं कि वे उन संस्थानों का बहिष्कार करें फिर चाहे ऐसे होटल
और रेस्ट्रा हिन्दू, मुस्लिम या अन्य मतावलंबियों द्वारा चलाये जा रहे हों?
सनातन धर्मी श्रवण मास के पवित्र माह मे अपने दैनिक जीवन मे न केवल मन,
वाणी और कर्म मे अपितु अपने रहन सहन और खान पान मे,
व्रत और उपवास मे स्वयं सात्विक्ता और पवित्रता बनाये रखते हैं तो हमे भी उनकी आस्था
और विश्वास को ठेस पहुंचाने का कोई हक नहीं। छद्म प्रतीकों,
नामों, चित्रों और छवियों की आड़ लेकर भोजन बनाते समय
शाकाहारी वस्तुओं और संसाधनों की अनदेखी कर
अपने
व्यापार व्यवसायों को चलाना उपभोक्ताओं के साथ बैसी ही धोखाधड़ी हैं जैसे हलाल मांसाहारी
सेवन करने वाले को छल कपट से झटका का मांस परोसना या शाकाहारी व्यक्ति को झूठ और फरेब
द्वारा उसी वर्तन और तेल/घी मे मांसाहार को पका कर परोसना। । पहचान छुपा कर छद्म
कारोबार करना कायरता और कमजोरी की निशानी हैं,
ऐसे लोगो के विरुद्ध समुचित कार्यवाही करना आवश्यक हैं जो अपनी पहचान छुपा कर ग्राहकों
की भावनाओं को आहत करते है।
मैं भोपाल के हमीदिया रोड के उस मुस्लिम व्यवसायी को जनता हूँ जिसने बगैर अपनी
पहचान छिपाये मावा की जलेबी के बिक्रय मे अपनी एक अनूठी मिशाल बनाई। मैंने भी उसकी
स्वादिष्ट जलेबी का स्वाद लिया हैं। झाँसी मे बड़ा बाज़ार के उस मुस्लिम व्यवसायी,
भारतीय गज़क भंडार को शहर का हर व्यक्ति जनता
हैं जो तिल की कुटि हुई गज़क बनाता हैं और उस गज़क के स्वाद की उत्तमता के सैकड़ों लोग मुरीद हैं। ऐसे अनेक उदाहरण हर छोटे बड़े
गाँव, कस्बों मे मिल जाएंगे जिन्होने अपनी मेहनत,
ईमानदारी और अपने उत्पाद की गुणवत्ता के बल बूते लोगों ने अपनी पहचान बनाई। ये एक भ्रम
हैं कि पहचान छुपा कर आप अपने व्यवसाय मे कोई कीर्तिमान स्थापति कर संकेंगे?
यदि आप अपने व्यवसाय को ईमानदारी, मेहनत और गुणवत्ता
की कसौटी पर कस श्रेष्ठता स्थापित करते हैं तो कोई ताकत आपको सफल व्यवसायी होने से
नहीं रोक सकती फिर चाहे आप हिन्दू हों या मुस्लिम,
सिक्ख हों या ईसाई।
रेल्वे स्टेशन पर प्रायः वस्तुओं की तय कीमत
से अधिक बसूली पर वेंडर के दुकान पर रेल
अधिकारियों के नंबर अंकित करने की बाध्यता से दूकानदारों पर अंकुश लगा हैं। मुझे
याद हैं ग्वालियर और उज्जैन के मिठाईवालों के विरुद्ध मिठाई की तौल मे डिब्बे की तौल शामिल करने पर मुझे दुकानदार का
नाम या मोबाइल नंबर की जानकारी के अभाव मे पुलिस के समक्ष बड़ी मशक्कत करनी पड़ी थी।
फल-सब्जी, पेट्रोल की माप तौल पर
सवाल उठाने पर दुकानदार और व्यवसायी आज भी
लड़ने, मारपीट पर उतारू हो जाते हैं। ऐसे उद्दंड
दूकानदारों के विरुद्ध पुलिस मे शिकायत या कानूनी कार्यवाही मे,
पहचान को प्रदर्शित करने वाला ये आदेश उपभोक्ताओं के संरक्षण मे काफी मददगार सवित
होगा जिसे समान रूप से सारे देश मे तत्काल लागू किया जाना चाहिये।
विजय सहगल


3 टिप्पणियां:
कानून और नियम सबके लिए है तो धर्म जाति भाषा की बात केवल बहुसंख्यक के मसलों में ही विपक्षियों के द्वारा क्यों की जाती है
बहुत सुंदर और सही विश्लेषण । एक कहावत कही गयी है ग़रीब की जोरू गाँव भर की भौजाई । हिन्दुओं की सदाशयता के कारण हिन्दुओं के अपने धर्मानुसार कार्यकलाप पर हर राजनैतिक दल उँगली उठाने लगता है। धर्मनिरपेक्षता के नाम पर दुष्ट हिन्दू अपने ही धर्म पर उँगली उठा कर अन्य धर्मावलंबियों की चमचागिरी कर नेता बनने का प्रयास करते हैं ।
मेरी समझ में तो सब रेडी और दुकानदारों को लाइसेंस लेना चाहिए कमेटी को फ़ीस देकर और अपना पंजीकरण करवा कर।केवल यात्रा के दौरान और रास्ते पर ही नहीं। पुलिस नेता और कमेटी वाले इन ग़रीबों को लूटते है।ग्राहक को जिस से समान लेना है वो उसके ऊपर छोड़ दो। बग़ैर लाइसेंस किसी को सड़क पर मत आने दो। यात्रा के मार्ग पर मीट शराब को बंद कर दो
रंजीत सिंह, नोएडा
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