शनिवार, 6 जुलाई 2024

नेता प्रतिपक्ष- राहुल गांधी, एक फ्लोप्प शो

 

"नेता प्रतिपक्ष- राहुल गांधी, एक फ्लोप्प शो"





1 जुलाई 2024 को राहुल गांधी द्वारा संसद मे राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव मे दिया गया भाषण उनके  नेता प्रतिपक्ष के रूप मे पहली परीक्षा थी।  बड़े खेद का विषय रहा कि संसद भवन मे दिया गया उनका भाषण संसदीय मर्यादाओं और परमपराओं के पैमाने पर खरा नहीं उतरा। अपने 20 साल के राजनैतिक अनुभव के बावजूद उनका आचरण अनैतिक, अमर्यादित और अपरिपक्व ही कहा जायेगा। राहुल गांधी के व्यवहार, शिक्षा-सांस्कृति की थोड़ी बहुत भी समझ रखने वाले किसी भी व्यक्ति को संसद मे उनके आचरण को देख कदाचित ही   कोई अचरज हुआ होगा!! क्योंकि उनके दायित्वहीन, अपरिपक्व और बचकाने व्यवहार से पूरा देश परिचित है। ऐसा प्रतीत होता हैं राहुल गांधी अभी भी चुनावी मोड मे हैं। भाषण के दौरान भाजपा और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर व्यक्तिगत छींटाकशी और आरोप प्रत्यारोप देख कर ऐसा प्रतीत हो रहा था कि वे अभी तक चुनावी मोड से बाहर नहीं निकले?

भाषण की शुरुआत उन्होने संविधान की प्रति लहराते हुए, "जय संविधान" कहकर की जो वे चुनाव 2024 के दौरान अपनी चुनावी रैलियों मे अक्सर करते आए थे। बक़ौल राहुल गांधी, "इसकी हमने रक्षा की हैं"!! काश!, उन्होने श्रीमती इन्दिरा गांधी द्वारा 1975 मे देश पर आपात काल थोप कर संविधान की हत्या पर भी दो शब्द  कह कर अफसोस प्रकट किया होता तो संविधान की रक्षा का वक्तव्य ज्यादा सार्थक नज़र आता? पूरे भाषण के दौरान सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच अनेकों बार टकराव की स्थिति उत्पन्न हुई। उन्होने भाजपा द्वारा पिछले दस वर्षों के दौरान उनके बंगले को खाली कराने, दो साल की सजा सहित आदिवासियों, अल्पसंख्यकों मीडिया पर लगातार हमले का दोषी ठहराया। राहुल गांधी द्वारा भगवान शिव, ईसा मसीह, गुरु नानक, इस्लाम, बौद्ध और जैन धर्म के प्रतीकों के चित्र दिखाते हुए उनमे दर्शायी  अभय मुद्रा को कॉंग्रेस के सिंबल बताते हुए इसे  सत्य, अहिंसा से जोड़ कर कॉंग्रेस के चुनाव चिन्ह की व्याख्या की। अन्य सांसद सदस्यों और स्पीकर के बार बार आग्रह के बावजूद कि किसी भी तरह के चित्र या प्रतीकों को संसद मे दिखाना नियमों का उल्लंघन हैं फिर भी वे न केवल उनकी सलाह और आग्रह को नज़रअंदाज़ करते रहे अपितु, स्पीकर द्वारा उनको  चित्रों को न दिखालाये जाने पर स्पीकर का  मखौल भी उड़ाया। न जाने कौन से और कैसे तर्क-वितर्क दे कर और सारे धर्मों  की शिक्षाओं का उल्लेख कर "डरो मत, डराओ मत" का जाप करते रहे। काश! उन्होने भगवान शिव द्वारा समुद्र मंथन से निकले विष रूपी बुराइयों के गरल  को अपने गले मे धारण करने की शिक्षा से कुछ सीख लेते लेकिन उन्होने अपने श्रीमुख से लगातार विषवमन कर, अपनी सोची समझी रणनीति के तहत, सारे हिंदुओं पर आरोप लगाते हुए शब्दशः ये कहा कि, "जो लोग अपने आप को हिन्दू कहते हैं वे चौबीस घंटे हिंसा हिंसा हिंसा, नफरत, नफरत नफरत, असत्य, असत्य असत्य, फैलाते हैं। उनका ये आरोप भी कि, आप हिन्दू हो ही नहीं? काश!, राहुल गांधी अपने कुतर्कों   को त्याग कर, सनातन और हिन्दू धर्म की सांस्कृति, सभ्यता और संस्कार के बारे मे 131 वर्ष  पूर्व शिकागो मे स्वामी विवेकानन्द द्वारा दिये अपने उदभोदन से कुछ सीख लेकर हिंदुओं की सहिष्णुता, सार्वभौमिक और समावेशी होने के स्वरूप से कुछ शिक्षा ग्रहण करते और "गर्व से कहो हम हिन्दू हैं" का दम भरते। इस दौरान प्रधानमंत्री ने हस्तक्षेप कर राहुल गांधी द्वारा सभी हिंदुओं को हिंसक बतलाने को गंभीर विषय बतला कर आपति करना और गृह मंत्री द्वारा इस विषय मे राहुल गांधी से माफी मांगने की बात भी शोर शराबे की बीच  कही गयी। लेकिन राहुल गांधी द्वारा अपने  गैर जिम्मेदारान ब्यान  के बावजूद उनके चेहरे पर कोई सिकन नज़र नहीं आयी।

एक सामान्य शिष्टाचार के तहत, संसद मे सांसदों  द्वारा हमेशा सभापति  की ओर मुखातिब होकर संबोधित करने की परंपरा है। सभापति महोदय के बार-बार याद दिलाने के बावजूद,  राहुल गांधी ने अपने पूरे भाषण के दौरान इस सामान्य शिष्टाचार की  अनुपालना मे दिल्चस्पी  नहीं दिखाई, वे अधिकतर समय आसंदी की ओर पीठ कर अपने दल के सदस्यों को संबोधित  करते रहे, जो अत्यंत निंदनीय व्यवहार था।      

अपनी भारत जोड़ो यात्रा के दौरान एक हास्यास्पद उदाहरण दे उन्होने  बताया कि उनको एक महिला ने बताया कि उसका पति उसे मारता हैं क्योंकि वो उसे खाना बना कर नहीं देती!! जब राहुल ने पूंछा कि खाना बना कर क्यों नहीं देती? तो उसने कहा महंगाई के कारण वो राशन नहीं खरीद सकती। उन्हेने कहा ऐसी,  हजारों महिलाएं हैं जो इस कारण अपने पतियों से मार खाती हैं। राहुल गांधी का इस  दृष्टांत को  सत्यता की कसौटी पर कसने के लिए समाज शास्त्र और मनो विज्ञान के   विध्यार्थियों और शोधार्थियों को शोध करने की अवश्यकता हैं? राहुल गांधी द्वारा अग्निवीर योजना के एक सिपाही की ड्यूटी के दौरान हुई सहादत पर  उसे कुछ भी आर्थिक सहायता न दिये जाने के झूठ पर रक्षा मंत्री द्वारा प्रतिवाद करते हुए बताया गया कि ऐसे प्रत्येक अग्निवीर सिपाही के शहीद होने पर एक करोड़ की धनराशि प्रदान की जाती हैं। राहुल गांधी द्वारा  किसानों को उनकी कृषि उपज पर एमएसपी न दिये जाने के सवाल पर कृषि मंत्री शिवराज सिंह के प्रतिवाद के कारण एक बार फिर उनके झूठ का पर्दाफाश हुआ।  उन्होने सतही तौर पर नोटबंदी, नीट, मणिपुर, बेरोजगारी जैसे मुद्दे जरूर उठाये पर उनके वक्तव्य  मे कोई गांभीर्य दूर दूर तक कहीं दिखाई नहीं दिया।

विपक्षी दल के नेता राहुल गांधी द्वारा सभापति ओम बिड़ला पर माइक बंद करने और मोदी से झुक कर हाथ मिलाने जैसे अत्यंत निजी आरोप लगा कर उनका उपहास उड़ाना इस बात को परिलक्षित करते  हैं कि राहुल गांधी का व्यवहार और उन्हे  मिले संस्कार, अनैतिकता  और अमर्यादिता की पराकाष्ठा थे।  सभापति द्वार इस संदर्भ मे राहुल गांधी को ये कहना कि मैंने आपको पूर्व मे भी अवगत कराया था कि माइक का कंट्रोल उनके पास नहीं रहता, बार बार ऐसे आरोप लगाना उचित नहीं। प्रधानमंत्री से हाथ मिलाने पर ओम बिड़ला जी का ये कथन कि, वह अपने से बड़ों को झुक कर मिलते वक्त अपने संस्कारों और सांस्कृति का पालन करते हैं, भी राहुल गांधी को भारतीय संस्कार, शिक्षा-दीक्षा, और अनुशासन प्रभावित न कर सका। मुझे याद नहीं कि भारतीय परंपरा और रीतिरिवाज के तहत किसी सार्वजनिक मंच या कार्यक्रम मे  राहुल गांधी ने कभी किसी प्रौढ़ व्यक्ति या महिला के चरण छूए हों?  

कहना अतिशयोक्ति न होगी कि राहुल गांधी द्वारा प्रतिपक्ष के नेता के रूप मे उनका पहला भाषण, भाषा और व्यवहार, इस बात का ध्योतक हैं कि एक संवैधानिक पद पर उनकी नियुक्ति के बाद  भी  उनके आचरण और व्यवहार मे परिपक्वता, ज़िम्मेदारी, गांभीर्य का अभाव भविष्य मे भी उनके आचरण मे  रहने वाला हैं। इस आधार पर ये निर्णय निकालना अतिरंजना न होगा कि आने वाले पाँच सालों मे संसद का स्वरूप कैसा होगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का देश के  आर्थिक  विकास के एजेंडे को लागू करने मे प्रतिपक्ष द्वारा  उत्पन्न  कठिनाइयों का सामना कदम कदम पर करना पड़ेगा।        

विजय सहगल

1 टिप्पणी:

बेनामी ने कहा…

वैसे राहुल गांधी और विपक्ष से संसद की मर्यादा पालन करने उम्मीद करना बेकार है। आपने बिल्कुल सही तरीके से लिखा है। साधुवाद सहगल जी।