शनिवार, 11 मई 2024

इत्रदान (मातृ दिवस पर विशेष)

 

आज मातृ दिवस पर पुनः अम्माँ का स्मरण हो आना स्वाभाविक हैं। आज अम्माँ को इस नाश्वर संसार से विदा हुए लगभग एक वर्ष होने को है लेकिन शायद ही कोई दिन बीता हो जब ऐसा लगता, काश अम्माँ का साथ कुछ और दिन मिलता!! कुछ और कदम साथ चलते!!, कुछ और बात करते!! लेकिन ऐसा हो न सका!!!!

संकट तो हर किसी की ज़िंदगी के एक आवश्यक कारक रहे है पर माँ ने हम  बच्चों को इन संकटों से संघर्ष कर उबरने की जो शक्ति दी वो अमूल्य थी। माँ तुझे शत-शत नमन्। आज का आलेख अपनी माँ को समर्पित करते हुए उन्हे नमन करते हैं।              

 







"इत्रदान"

घर मे एक सुंदर, चाँदी का इत्रदान था। जिसे साल मे एक बार दिवाली के दिन लक्ष्मी पूजा मे तो अवश्य ही देखते थे। इत्र दान हमारे परिवार की विरासत का एक नायाब अनोखा नमूना जो था। लगभाग 500 ग्राम शुद्ध चाँदी की चमचमाती गोल प्लेट के मध्य मे एक छोटी  नक्काशीदार कटोरी जिसके उपर मोर के आकार का ढक्कन लगा था जो कटोरी मे रक्खे इत्र की सुगंध को अपने अंदर समेटे रहता था। जैसे ही इत्रदान के ढक्कन को खोला जाता इत्र की गंध पूरे वातावरण को अपनी भीनी-भीनी खुशबू से महका देता था। चाँदी की प्लेट, इत्रदान के कटोरिनुमा पात्र और उसके ढक्कन मे इतनी बारीक चाँदी की नक्काशी की गयी थी, जो किसी भी देखने वाले का मन मोह लेती। गोल  प्लेट के चारों ओर हरे, लंबे मोतियों जिनकी संख्या सौ से ज्यादा होगी,  को चाँदी के तारों से इस तरह पिरो कर बांधा  गया था कि थोड़े से हिलने या  हवा के हल्के झोंके से उन मोतियों की आपस मे टकराहट से  उनमे सुरीले संगीत की स्वरलहरियाँ सुनाई देती थी। ऐसे ही हरे मोतियों की एक लड़ी चाँदी की कटोरी के चारों ओर भी लगाया गया था। मै बचपन मे दीवाली पूजन के समय  अपने घर पर इस इत्रदान और उसके मोतियों की झिलमिलाहट को घंटों निहारा करता था।

दीवाली पूजन के अलावा इत्रदान को किसी की शादी-विवाह बगैरह आदि के शुभ अवसरों पर ही तिजोड़ी से निकाला जाता था। जब कोई रिश्तेदार या कुटुंबीजन इत्र दान की प्रशंसा करते हुए अपने बच्चे की शादी-सगाई या लगुन आदि मे इत्रदान की मांग करता   तो माँ सहित परिवार के चेहरों पर एक अलग चमक और  खुशी दिखाई देती और इत्रदान को देने मे एक अलग ही सुख, चैन और आत्मिक खुशी  का अनुभव करते। उन दिनों शादी विवाह आदि मे अतिथितियों के  स्वागत की परंपरा उनके वस्त्रों पर इत्र लगा कर और  उनको फूलों की माला पहना कर की जाती थी।   जब चाँदी के इत्रदान से मेहमानों का स्वागत किया जाता तो वे न केवल इत्र की महक से अपितु चाँदी के मनोहारी इत्रदान को देख प्रसन्नता का अनुभव करते। ऐसे अवसरों पर इत्रदान सोने पे सुहागा का काम करता।  चाँदी के इत्रदान की बनावट थी ही इतनी सुंदर कि उसमे रखे इत्र से आगंतुकों  के स्वागत मे चार चाँद लग जाते।

माँ की बड़ी इच्छा थी के अपने बच्चों की शादी, सगाई आदि पर इत्रदान से अपने होने वाले रिशतेदारों का स्वागत करते लेकिन सभी भाई बहिन अभी उम्र इतने छोटे थे कि ऐसे अवसर आने मे अभी काफी वक्त था, इस कारण अपने कुटुंबजनों के बच्चों के आनंद कारज मे ही वो अपने बच्चों का सुख अनुभव करती। कुटुंब के, ऐसे ही परिवार की बेटी की शादी मे इत्रदान की मांग की गायी तो मना करने का सवाल ही न था। लगुन, सगाई के अलावा शादी मे बरातियों के स्वागत मे भी इत्रदान का भरपूर उपयोग किया गया, घर की शादी जो थी। शादी मे शामिल सभी मानदानों ने जहां एक ओर बारतियों के स्वागत की भूरि-भूरि प्रशंसा की वही इत्रदान की बड़ाई और सराहना मे कोई कंजूसी नहीं की। समधियाने से मिले ऐसे बड़प्पन और प्रशस्ति मिलना से जहां एक ओर परिवार के लोग खुश थे  वहीं दूसरी ओर,  विशेषकर इत्रदान की महिमगान ने इसकी सार्थकता और अम्माँ के आत्मसम्मान को कुछ और ऊंचा उठा दिया था।  शादी बड़ी धूम धाम से शादी हुई और देर रात तक चले इस आयोजन के बाद फेरे मे शामिल कुछ लोगो के अलावा  घर के सभी लोग थक हार कर उनींदे हो जिसको जहां जगह मिली एक-एक कर निंद्रा देवी के आगोश मे सो गए।    

शादी की इस आपा धापी मे न तो माँ को इत्रदान बापस लेने की  याद रही  और न ही रिश्तेदार ने उसे बापस करने का जिक्र किया। दरअसल वे इत्रदान को बापस भी किस मुंह से करते क्योंकि उनके एक आवारा लड़के, जिसे हर तरह के नशे-पत्ते के शौक  ने अपनी गिरफ्त मे ले लिया था,  ने शादी के बाद उस इत्रदान को चुरा कर बाज़ार मे बेच जो दिया था। माँ तो कुछ महीनों तक इत्रदान की इस घटना को भूल चुकी थी और रिश्तेदार  लंबे समय तक इत्रदान की इस घटना को दबाकर भुला देने मे ही भलाई मान रहे थे, पर अचानक एक दिन माँ को न जाने अपने परिवार की इस अनोखी विरासत रूपी इत्रदान की याद हो आई, बगैर एक क्षण गवाएं उन्होने अपने रिश्तेदार से इत्रदान बापस न करने का उलाहना दिया।

अब क्या था, काटो तो खून नहीं, संबंधी के स्याह चेहरे का रंग उड़ा हुआ था। न नुकुर की कोई गुंजाइस  न थी। बेटे की आवारागर्दी ने उन्हे एक ऐसे संकट मे डाल दिया था। लज्जा और शर्म के मारे उनसे कोई जवाब देते न बना। अति मूल्यवान इत्रदान को उस निर्लज्ज ने कौड़ियों के भाव बेंच कर हमारे घर की उस अमूल्य धरोहर को ही नहीं बेंचा अपितु हमारी माँ के सपनों को भी तार-तार कर चकनाचूर कर दिया। माँ ने अपनी सारी ज़िंदगी बहुत संघर्ष किया था अपने घर की मूल्यवान वस्तु का इस तरह छीना जाने से उन्हे लंबे समय तक कष्ट देता रहा, जिसकी चर्चा वे गाहे-बगाहे करती रहीं।

मै जनता हूँ माँ ने अपने बच्चों की खुशी के  लिये जो संपने सँजोएँ थे वे उस दिन काँच के टुकड़ों की तरह चूर-चूर हुए होंगे? लेकिन माँ ने, इत्रदान से परे  हम बच्चों  के भविष्य के लिये जो नये-नये सपने गढ़े! वे उस इत्रदान के सपनों से कहीं बहुत आगे, और अच्छे, कुछ  और बड़े थे। "बीती   ताह विसार दे, आगे की सुधि लेय" की नीति सिद्धान्त पर चलते दिवाली वाले दिन न केवल उन्हे अपितु मुझे भी उस इत्रदान की याद हो आती और मै अपनी यादों के अताह सागर मे डुबकी लगाकर आज भी हिलोरों के बीच संघर्ष करता हुआ किनारे आने की नाकामयाब कोशिश करता हूँ।

विजय सहगल

2 टिप्‍पणियां:

बेनामी ने कहा…

No one can take place of mother

Deepti Datta ने कहा…

बहुत सुन्दर वर्णन..