"श्री ताड़बंद
वीरांजनेय स्वामी मंदिर, हैदराबाद"
पुराने हैदराबाद स्थित सिकंदरबाद स्थित सड़क
के ठीक किनारे श्वेत रंग के दक्षिण भारतीय
शैली मे भगवान वीरांजनेय स्वामी मंदिर का विशाल प्रवेश द्वार स्वतः ही भक्तों का
ध्यानाकर्षित करता हैं। मंदिर के बड़े दरवाजे और उनके दोनों ओर द्वारपालों की प्रतिमा
हर आने वाले हनुमान भक्त का स्वागत करती प्रतीत होती हैं। दरवाजों से जैसे ही हम
लोगो ने मंदिर मे प्रवेश किया दूर एक छोटे से मंडप मे भगवान वीरांजनेय स्वामी के दूरस्थ अद्भुद दर्शन होते
है। दर्शनार्थियों की छोटी सी लाइन के कारण मै अपनी वारी की प्रतीक्षा करने लगा।
हम उत्तर भारतीय हाथ जोड़ सिर झुका कर भगवान की आराधना के विपरीत दक्षिण भारत के लोग किसी भी मंदिर मे
सबसे पहले दोनों हाथो को क्रॉस करते हुए कानों पर उँगलियों लगा कर कुछ हल्का झुक
कर प्रणाम की मुद्रा मे ईश्वर आराधन करते हैं। आशय दोनों का ही एक हैं कि हे
परमेश्वर हम आपके श्री चरणों मे झुक कर आपको नमन करते हैं। आप ही इस जगत के स्वामी
और पालक हैं। आपको नमन, बारम्बार नमन
हो!! कुछ लोगो की ऐसी मान्यता है कि ये रामायण काल का वही सिद्ध और पवित्र स्थान
है जहां भगवान श्रीराम ने ताड़ के वृक्षो की ओट मे सुग्रीब के भाई बाली का वध कर सुग्रीब को उसका छीना गया राज्य
बापस दिलाया था।
मंदिर परिसर के मध्य मे स्थित एक छोटे से पहाड़
मे भगवान वीर हनुमान की स्वयंभू विग्रह के
साथ साथ श्री विनायक की भी स्वयंभू प्रतिमा मौजूद हैं। यह अपनी तरह का एक मात्र
मंदिर हैं जहां एक ही चट्टान पर भगवान वीरांजनेय और श्री विनायक भगवान की स्वयंभू
प्रतिमाएँ एक साथ मौजूद हैं जहां हजारों की संख्या भक्तगण अपनी मनोकामनाओं को पूरा
करने हेतु भगवान से आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। जिस मंदिर मे भगवान राम भक्त,
राम दूत हनुमान मौजूद हों वहाँ भगवान श्री राम की उपस्थिती न हो ऐसा संभव नहीं।
परिसर मे ही भगवान श्रीराम माता सीता और श्री लक्ष्मण जी का सुंदर विग्रहों का मंदिर भी स्थापित किया गया हैं। मंदिर परिसर मे
भगवान शिव, श्री गणेश,
देवी पार्वती, भगवान विष्णु और सूर्य
देव पंचानन के रूप मे स्थापित किए गये हैं। नवग्रहों के साथ नागों के स्वामी
नागेन्द्र भी इसी परिसर मे स्थापित किए हैं। एक सबसे विलक्षण और अद्भुद चाँदी से
जड़ित उष्ट्र अर्थात ऊंट की प्रतिमा को देख आश्चर्य हुआ जो मंदिर परिसर के ठीक वीरांजनेय,
हनुमान की प्रतिमा के दूसरे सिरे पर स्थापित थी। ऐसा बताया गया कि वीरांजनेय
स्वामी का वाहन ऊंट हैं। जिनके दर्शन बड़े ही मंगलकारी और कल्याणकारी हैं। मैंने
ऊंट को वीरांजनेय भगवान हनुमान के वाहन के
रूप मे पहली वार देखा। ऊंट के पीछे चाँदी से जड़ित धव्जस्तम्भ भी देखने को मिला जो
दक्षिण भारत के प्रायः हर देवालयों की पहचान है। मंदिर मंडप की परिक्रमा के दौरान
मैंने देखा जिस चट्टान पर स्वयंभू वीरांजनेय स्वामी और विनायक श्रीगणेश की
प्रतिमाएं हैं चट्टान को पिछला हिस्सा उसके मूल रूप मे किसी पहाड़ी की चोटी के रूप
मे स्पष्ट दिखाई दे रहा था। इसे ईश्वर
प्रदत्त किसी बरदान के रूप मे ही लिया जाना चाहिये कि पहाड़ी चट्टान के एक तरफ श्री
हनुमान और श्री विनायक भगवान के प्रकृतिक
रूप के दर्शन होते हैं और वही दूसरी ओर चट्टान अपने साधारण रूप मे स्थित है।
मंदिर परिसर के पीछे से जैसे ही बाहर आते
हैं भगवान का प्रसाद नमकीन चावल के रूप मे सभी श्रद्धालुओं को वितरित किया जा रहा
था। घर से निकले हुए भी 3 घंटे लगभग हो चुके थे स्वादिष्ट प्रसाद को खाकर एक अलग
ही तरह का संतोष और तृप्ति का अनुभव हुआ। मंदिर के बाहर मंदिर समिति का कार्यालय
और श्रद्धालुओं को रुकने के लिये कमरे बनाये गये हैं। मुझे बताया गया कि कुछ विशेष
आयोजनों और सबरीमाला जाने वाले श्रद्धालुओं को 40 दिन के विशेष प्रवास की व्यवस्था
भी दक्षिण भारत के हर देवालयों की तरह यहाँ भी होती हैं जिसका विवरण मैंने 30 दिसम्बर
2023 को अपने ब्लॉग https://sahgalvk.blogspot.com/2023/12/blog-post_30.html
मे किया था।
हैदराबाद मे क्रय किये जाने वाला हर दो पहिया या चार पहिया
नया वाहन को हिन्दू धर्मावलंबी ताड़बंद
श्री वीरांजनेय स्वामी के मंदिर मे वाहन की विधिवत पूजा अर्चना कराने हेतु आते
हैं। 18 जनवरी को भी कुछ नये वाहनों का पूजन मंदिर के पुजारी करा रहे थे। प्रायः
मंगलवार या अन्य विशेष पर्वों और त्योहारों पर इन वाहनों की संख्या सैकड़ों मे होती
हैं। व्यापारी या उधयोगपति भी बड़े बड़े कमर्शियल वाहनों की पूजा को लाते हैं। ऐसी
मान्यता हैं कि ईश्वर के स्नेह आशीर्वाद से किसी दुर्घटना आदि से भगवान हमारी
रक्षा करते हैं। प्रायः हर नया वाहन अपने आप ही दिखलाई दे जाता हैं,
वाहन की नंबर प्लेट तो होने का सवाल ही
नहीं होता! पर एक पुराने से वाहन और जिस पर वाहन का नंबर पहले से ही था,
को भी पूजन की लाइन मे लगा देख मैंने
जिज्ञासावश वाहन स्वामी से पुराने वाहन को पूजा मे लाने का प्रयोजन पूंछा?
उसने कुछ संकोच के साथ बताया कि वाहन की सर्विस कराने के बाद लाया हूँ। मेरे बात
चीत के दौरान मेरे मित्र गणेश सुब्रमनियम मुझे लगातार घूरे चले जा रहे थे। बातचीत
के पश्चात उन्होने बताया कुछ वाहन स्वामी जब पुराना वाहन खरीदते है तो भी वे
वीरांजेनेय स्वामी से आशीर्वाद लेने हेतु तथा पिछले वाहन स्वामी की त्रुटियों के
प्रयाश्चित किया जा सके। पुराने वाहनों के संकट निवारण हेतु भी लोग यहाँ मंदिर मे पूजा हेतु
आते हैं। मुझे अपने आप पर बड़ा क्रोध और आत्मग्लानि का अनुभव हुआ कि क्यों कर मेरे
मन मे ऐसा विचार नहीं आया। अब मुझे भी उस व्यक्ति द्वारा उत्तर देते समय असमंजस और
संकोच का कारण समझ आया। मैंने काफी देर तक अपराधबोध से ग्रसित हो अपने आप को
धिक्कारते हुए मन ही मन उस व्यक्ति से अनजाने मे हुई त्रुटि के लिये खेद व्यक्त
किया और ईश्वर से प्रार्थना की कि उस व्यक्ति के सभी मनोरथ पूर्ण करें।
श्रीवीरांजनेय स्वामी भगवान हनुमान को बारंबार
नमन।
विजय सहगल






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