"दाना
पानी"
आमतौर पर सनातनी हिन्दू परंपरा मे पशु
पक्षियों के सहित गाय की सेवा को एक आवश्यक धार्मिक कृत मान एक अति महत्वपूर्ण और
पुण्य का काम माना गया हैं। जिसके संस्कार हर भारतीय को बचपन से ही अपने परिवारों
से प्राप्त हो जाते हैं। मध्यम वर्गीय शहरों,
छोटे गाँव और कस्बों के प्रायः हर घर मे
आज भी खाना बनाते समय पहली रोटी गाय के लिए बनाकर उसे खिलाने की परंपरा है। हमारे घर मे बचपन से मै देखता आया था कि इसी
रिवाज का पालन मेरी माँ भी खाना पकाते समय पहली रोटी गाय के लिए बना कर निकालती थी
और मेरी धर्मपत्नी भी इसी अनुक्रम को बनाए रखते हुए गाय की रोटी के साथ फल और सब्जी आदि के छिल्के या बच रहे
अन्य खाद्य पदार्थों को एकत्रित कर गाय को खिलाने का क्रम बनाए रखा हैं जिसका
जिक्र मैंने 29 मई 2021 के अपने ब्लॉग
"सकरन" ( https://sahgalvk.blogspot.com/2021/05/blog-post_29.html
) मे
किया था। गर्मी के मौसम मे
बाज़ारों, बस स्टैंड और रेल्वे
स्टेशन पर आज भी, लोगो को मटके का ठंडा
पानी पिलाने के अलावा पशुओं-पक्षियों को दाना डालना और मिट्टी के सकोरों मे पानी भरकर रखना प्रायः हर भारतीय
परिवारों के संस्कारों मे एक परंपरा के
रूप मे आज भी विध्यमान हैं।
ग्वालियर मे यूं तो गर्मी की शुरुआत फरवरी
मार्च से ही हो जाती है और ग्रीष्म ऋतु का ये सिलसिला सितम्बर-अक्टूबर तक चलता हैं
अर्थात साल के 8-9 माह यहाँ तीव्र उष्ण का मौसम रहता हैं। अप्रैल के एक दिन जब मै
अपने पड़ौसी और मित्र संजय पांडे के साथ खाली समय मे गप्प बाजी मे बैठा था। गायों
के लिए एक सीमेंट की टंकी का विचार मन मे अचानक ही आया और चर्चा हुई। तब संजय ने
दाना पानी संस्था का जिक्र किया। संजय,
इस संस्था के प्रमुख श्री राज चड्ढा जी से परिचित थे। संजय ने बताया कि चड्ढा जी
के फ़ेस बुक पेज पर यदि टंकी की डिमांड रखे तो वे कुछ दिनों मे टंकी भेज देते हैं।
हाथ कंगन को आरसी क्या? मैंने तुरंत ही अपने
मोबाइल से फ़ेस बुक पर न केवल राज चड्ढा जी (Raj Chaddha)
के नाम को फ़ेस बुक पर सर्च कर फ्रेंड रेक़ुएस्ट भेजी बल्कि लगे हाथ एक सीमेंट टंकी
की मांग पशु-पक्षियों को पीने के पानी की व्यवस्था हेतु कर दी। नियमानुसार मैंने
अपना नाम, पता,
मोबाइल नंबर भी कमेंट बॉक्स मे लिख भेजा।
मुझे मोबाइल पर सुनिश्चित करते हुए चड्ढा जी ने उस ऑटो वाले को भाड़े के रूप
मे 100 रुपए का भुगतान करने का निर्देश दिया जो टंकी मेरे घर तक पहुंचेगा। जान
कर प्रसन्नता हुई कि 2-3 दिन बाद 13 अप्रैल 2024 को दोपहर लगभग 4 बजे मेरे घर के बाहर ऑटो वाला मुझे
आवाज दे रहा था। जिसमे एक सीमेंट की टंकी रक्खी थी। ऑटो वाले ने बताया कि वह काफी
देर से आपका मोबाइल ट्राइ कर रहा है जो नो रिप्लाइ आ रहा हैं। दरअसल सेवानिवृत्ति
के बाद अपने दैनिक क्रम मे आराम करने के कारण दोपहर 3.30 से 5.00-5.15 तक मोबाइल
को डू नोट डिस्टर्ब मोड पर रख कर आराम करता हूँ। जब मोबाइल देखा तो 7 मिस कॉल पड़े
हुए थे। मुझे बहुत ही आत्मग्लानि और खेद हुआ क्योंकि मेरी लापरवाही के कारण ऑटो
वाले को अप्रैल की कड़ी धूप मे परेशान होना
पड़ा। मैंने उस ऑटो ड्राईवर से अपनी गलती के लिए अनेक बार क्षमा प्रार्थना की और
सौजन्य वश ठंडे पानी के लिये पूंछा लेकिन शायद परेशानी और भावावेश के कारण उसने
पानी के लिये माना कर दिया। समाज के वंचित वर्ग द्वारा हम जैसे तथाकथित गणमान्य
व्यक्तियों को उनकी गलती के बावजूद कुछ
शिकायत न कर सकने के संकोच के कारण ऐसा
व्यवहार स्वाभाविक ही था। ऑटो ड्राईवर ने टंकी के साथ हमारी फोटो लेने की
औपचारिकता के बाद, हमारी कृतज्ञाता स्वीकार किये बिना और भाड़े के 100 रुपए लिए
बगैर चले जाना अनजाने मे हुई मेरी अदयालुता
और लापरवाही को स्पष्ट दर्शा रहा था।
ग्वालियर मे प्रायः हर मुहल्ले,
हर क्षेत्र और अन्य सार्वजनिक जगहों पर सड़कों के किनारे पशुओं के लिए सीमेंट की
टंकी मे पानी भरा दिखलाई पड़ जाएगा। 40-50 लीटर की इन सीमेंट टंकियों मे लाल या हरे
रंग के बड़े-बड़े शब्दों मे "दाना-पानी" लिखा दिखाई देगा साथ ही संस्थान
का नाम जिसने पशुओं के लिये इस टंकी के निर्माण मे आर्थिक सहयोग प्रदान
किया। इन पानी की टंकियों से जब निरीह मूक पशु
ग्वालियर की भीषण गर्मी मे जहां तापमान 48-49 डिग्री तक पहुँच जाता हो,
पानी पीते हुए देखता हूँ तो मन को बड़ा सुकून मिलता है तो अंदाज़ा लगाया जा जा सकता
हैं कि उस मूक पशु की आत्मा को कितनी तृप्ति मिली होगी। यूं तो पानी पीने वाले
पशुओं श्वान, भैंस और गाड़ीयों मे
जोते जा रहे घोड़े और बैल हैं पर बहुतायत संख्या गाय,
बैलों की ही होती है जो प्रायः हर गली मुहल्ले मे विचरते नज़र आ जाएंगे। निश्चित
तौर पर दाना-पानी संस्था इस पुनीत कार्य मे सीमेंट टंकी देकर परोक्ष रूप से कार्य कर रही है लेकिन जिन व्यक्तियों ने इन
सीमेंट टंकियों को अपने घरों या व्यापारिक
संस्थानों द्वारा इन टंकियों को रखवाया है और इन टंकियों मे नित्य साफ सफाई कर जल
भरते है, वे सेवा भावी व्यक्ति भी इस पवित्र काम मे
प्रत्यक्ष रूप से साधुवाद के पात्र
हैं।
इस घटनाक्रम के बाद मै श्री राज चड्ढा जी के
संपर्क मे आया जो मार्च अप्रैल से लेकर जून जुलाई के लगभग 4 महीनों के हर रविवार
को अपनी संस्था दाना-पानी के माध्यम से भिन्न भिन्न जगह मिट्टी के संकोरे और उनमे
पक्षियों के दाने का एक पैकेट रख लोगो को मुफ्त मे वितरित करते हुए पक्षियों और
पर्यावरण को बचाने का संदेश देते हैं। उनके इस कार्य मे ग्वालियर के प्रबुद्ध
महिलाएं और पुरुष सहयोग करते है। 18 अप्रैल को मेरे निवास के नजदीक स्थित शारदा
बाल ग्राम मे जब मुझे उनके इस कार्यक्रम की जानकारी हुई तो मै भी व्यक्तिगत रूप से
उनसे मिला, उनके कार्यक्रम मे
शामिल हुआ और उनके व उनके साथियों के इस पुनीत कार्य मे सहभागी होने पर सभी को
अपने घर आमंत्रित किया। तब से ये सिलसिला लगातार जारी है,
हर रविवार को मै भी एक कार्यकर्ता की तरह राज चड्ढा जी की दाना पानी संस्था मे
सहभागी बन उनका सहयोगी और सदस्य बन गया। इस संस्था के विषय मे कुछ और अधिक जानकारी
की चाह मे 12 मई 2024 को मैंने परिवार सहित उनके न्यू सिटी सेंटर स्थित आवास पर
मिलने का निश्चय किया।
1947 मे ग्वालियर आकार वसने एवं स्वतंत्र
भारत के विभाजन की विभीषिका से पीढ़ित चड्ढा जी ने बताया कि पर्यावरण और पशु
पक्षियों को बचाने की इस मुहिम को उन्होने 22 फरवरी 20212 को अपने सीमित साधनों से
शुरू किया जिसमे उनकी अर्धांग्नि अदरणीय भाभी जी का भी महत्वपूर्ण सहयोग रहा,
दरअसल इस दिन उनकी शादी की सालगिरह थी। तब से दाना पानी संस्था ने इस सेवभावी
कार्य को आज इस ऊंचाई पर पहुंचाया कि अब तक वे लगभग दो लाख मिट्टी के संकोरों और
पक्षियों के दानों के पैकेटों का वितरण
लोगो के बीच कर चुके हैं। पशुओं के लिए लगभग
चार हजार सीमेंट टंकियों का वितरण भी अबतक किया जा चुका है,
हर टंकी की लागत लगभग चार से पाँच सौ रुपए
के बीच बैठती है। हर रोज़ नयी नयी जगहों से टंकी की मांग लगातार आ रही हैं। कोई भी
सामाजिक और सार्वजनिक कार्य धनाभाव के बिना नहीं किया जा सकता,
जब मैंने इस नेक और पवित्र कार्य हेतु धन के स्रोत के बारे मे पूंछा तो चड्ढा जी
ने बताया कि नेक नियत और ईमानदारी से किए गये कार्यों मे मुझे धन का अभाव कभी
महसूस नहीं हुआ। लोगो का आर्थिक सहयोग
इतना अधिक है कि कई बार उन्हे इसके लिए सविनय मना करना पड़ा। ऐसे कई प्रतिष्ठान,
संस्थाएं और व्यक्तियों द्वारा इस सद्कार्य के लिए सहयोग कर इसे लगातार जारी रखने
का आग्रह लगातार श्री चड्ढा जी से किया जाता रहा हैं।
बचपन से संघ की पृष्ठभूमि से जुड़े चड्ढा जी,
पूर्व प्रधानमंत्री स्व॰ श्री अटल बिहारी बाजपेयी के करीबी मित्रों मे से रहे हैं
एवं ग्वालियर की अनेक सामाजिक संस्थाओं से
जुड़े हैं। इसलिए जब आप कभी ग्वालियर आयें और मिट्टी के संकोरे और सीमेंट की
टंकियों मे भरे पानी को पीते हुए किसी पशु को देंखे तो पशु,
पक्षियों और पर्यावरण की संरक्षा के लिये समर्पित
दना-पानी संस्था और उनके सेवभावी सदस्यों का स्मरण अवश्य करना।
विजय सहगल







4 टिप्पणियां:
It is the best sewa that we can do for the living beings and earn a lot of credits in our Karma accounts.
Ranjeet Singh, Noida
You are doing social work I m very much impressed to you
बहुत बहुत साधुवाद..
Nice work dear sir
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