"मच्छरदानी"
मेरा
मानना है कि जिस तरह "पहिये" का आविष्कार मानव सभ्यता के विकास का पहला चमत्कार
था उसी तरह अविकसित मानव सभ्यता मे मच्छरदानी का आविष्कार मानव सभ्यता के लिये एक
अनमोल उपहार था। मै नहीं जनता कि मच्छरदानी के इस महान आविष्कारक का क्या नाम था
और कौन था? झाँसी मे बचपन और कॉलेज स्तर तक घर मे मच्छर तो थे पर इनकी वसाहट इतनी
ज्यादा नहीं थी कि मच्छर दानी की आवश्यकता महसूस लगी हो। इनकी कम संख्या के कारण
शहर मे घनी आबादी और घरों का एक दूसरे से लगा होना था। खुली जगह, नाले या बाग बगीचे नाम मात्र को भी न थे। मच्छरदानी मात्र फिल्मों मे
बिशेषतः बंगाली पृष्टभूमि मे बनी फिल्मों मे देखने को मिलती थी। कमरे मे पड़े डबल
बेड के चारों कोनो मे लोहे के पाइप स्थायी एवं टिकाऊ रूप से लगे रहते थे जो कुलीन
बंगाली भद्रलोक का फिल्मी चित्रण कराता था अन्यथा मच्छरदानी को देखने और इसके
व्यापार विनमय का क्रम शहरों मे कम ही देखने को मिलता था।
बैंक
की सेवा मे जब पहली बार लखनऊ प्रवास पर आया तो भाई साहब जो पहले से ही लखनऊ मे
सेवारत थे के साथ रहा। उन दिनों भाई साहब तो क्या पूरा लखनऊ मच्छरों के अतिवाद से पीढ़ित था। स्व॰ श्री दलजीत सिंह बालिया जी के आलम बाग
स्थित बड़े से बंगले के एक कमरे को हम लोगो ने पहला आश्रय स्थल बनाया। सर्दियों मे
तो कंबल, रज़ाई ओढ कर, सोने मे मच्छरों की उपस्थिती एवं
उत्पीढन का ज्यादा अनुभव न हुआ पर गर्मियों मे बालिया जी के बड़े से बंगले मे
मच्छरों की उपस्थिती और उत्पीढन का अहसास लखनऊ
मे फरवरी-मार्च मे होने लगा था। उन दिनों पहली बार लाल डिब्बे मे फिनिट की तीखी
गंध वाले द्रव्य को लाल पम्प से कमरे मे छिड़काव किया था। मरने वाले मच्छरों को
सैकड़ों-हजारों की संख्या मे पहली बार इकट्ठा
देखा था। एकाध दिन के प्रभाव के बाद फिर वही "ढांक के तीन पात" मच्छर
पुनः अपनी नयी सेना के साथ हमले को तैयार!! थक हर कर पहले एक फिर दूसरी मच्छरदानी
अमीनाबाद के गणेश गंज से खरीदी।
उन
दिनों मच्छरदानी लगाने मे भी बड़ी अटर लगती थी। मच्छरदानी के साथ उसको लगाने के लिए
चार बड़े-बड़े डंडे भी लगाने पड़ते थे। मच्छरदानी को लगाना अपने आप मे ही एक बड़ा झंझट
था तो उसके डंडे लगाना भी किसी आफत से कम न था। पहले तो चारों डंडों मे मच्छरदानी के
चारों छोर को इस तरह बांधों कि उनकी ऊंचाई चारों ओर से समान हो, कहीं से ऊंची-नीची
हुई तो मच्छरों की बिना रोक टोक मच्छरदानी मे प्रवेश आपके किए कराये पर पानी फेर देता, फिर डंडों को चारपाई या फोल्डिंग पलंग के दोनों सिरहानों पर क्रॉस करते हुए
अँग्रेजी के एक्स अक्षर की तरह फँसाना होता था ताकि डंडों का संतुलन आड़े-और खड़े मे
संतुलित रहे। लेकिन कहते हैं न, मेहनत का फल मीठा होता हैं, जब रात मच्छरदानी लगाने के श्रमसाध्य काम के बाद जो चैन की नींद आती थी उसकी
तो बस कल्पना ही की जा सकती थी और भूल से भी यदि रात मे पानी पीने की मात्रा औसत से
ज्यादा हुई तो पृकृति तो शरीर मे जल की मात्रा का संतुलन बनाने के लिए अपना काम करेगी ही। लघु शंका के लिए मच्छरदानी से
निकले नहीं कि, मच्छरदानी के बाहर घात लगाकर, आपका खून पीने बैठे, इन दुष्ट मच्छरों की फौज मच्छरदानी
मे प्रवेश के होड़ लगाए रहती। दो-चार मच्छर भी अवैध प्रवासी के रूप मे यदि मच्छरदानी
मे प्रवेश के प्रयास मे सफल हुए तो आपको चैन की नींद
तो आने से रही!, अपितु आपके रक्त का पान करने से, अंदर प्रवेश कर गये मच्छरों की कद-काठी और रूप रंग मे हृष्ट-पुष्टता तो स्पष्ट
नज़र आती थी। हालत ये हो जाते थे कि सुर्ख लाल रंग का मच्छर आपके खून पीने के बाद उड़ने
तक से लाचार हो कर ऐसे उड़ते थे मानों एक अँग्रेजी शराब की पूरी बोतल का
नशा कर लिया हो!! उस मच्छर को छूने भर की देर होती थी कि आपका खून आपके हाथों मे बापस
कर दुनियाँ को अलबिदा कर जाता, मानों अपने उद्धार के लिए आपके हाथों के स्पर्श का
ही इंतज़ार कर रहा हों।
राजे
महराजों को वेशक मच्छरदानी लगाने और निकालने मे कोई श्रम न करना पड़ता हो, पर हर सुबह
उठने के बाद मच्छरदानी को निकालना भी किसी
कठिन श्रम से कम न था। पहले मच्छरदानी अलग करों फिर डंडों को हटाओं और विस्तर, चारपाई को अपने अपने स्थान पर स्थापित करों। कुछ लोग बेशक मच्छरदानी के विकल्प
के रूप मे हिट, कछुआ छाप या मुर्गा छाप अगरबत्ती लगा कर, कुछ ओडोमौस क्रीम का लेपन या नीम की पट्टियों को जला कर मच्छर से छुटकारा
पाने का प्रयास करते थे। कुछ लोग तो मिट्टी का तेल ही शरीर पर लगा कर मच्छरों से बचने
का प्रयास करते, पर मेरा मानना हैं कि मच्छरदानी का कोई विकल्प नहीं हैं। इस मच्छरदानी की इस विकास यात्रा मे भी देश, काल और पात्र के अनुसार परिवर्तन हुए। जहां पहले सूती धागे की मच्छरदानी होती
थी, मच्छरदानी मे प्राकृतिक हवा का प्रवेश और निकासी कम होने
से खुले आसमान के नीचे सोने के कारण मौसम की मार तो रहती थी पर समय के साथ जब प्लास्टिक
की मच्छरदानी आयी तो इस मुसीबत से छुटकारा मिला और गर्मियों की रात मे जो चैन की नींद
मिलती उसका कहना ही क्या? जैसे "अवयशयकता आविष्कार की जननी
हैं" उसी तरह कमरों एसी, पखों और कूलर के आगमन कारण, मच्छरदानी के डंडों का स्थान
मच्छरदानों के चारों कोनो मे पतली रस्सी या सूतली ने ले ली जिनको कमरे मे चार स्थानों
मे कील या हुक ने ले ली और इस तरह डंडों की समस्या का समाधान हो गया। यूं तो आधुनिक युग मे मच्छरदानी भी
अनेक आकार-प्रकार की आने लगी पर देशी चौकोर मच्छरदानी का जबाब आज भी नहीं हैं।
एक
बार आलमबाग स्थित लखनऊ मे हमारे रिश्तेदार आ पहुंचे गर्मी का समय था। नौकरी नई थी। कूलर, एसी पंखा तो था नहीं, बाहर खुले मे सोने का चलन था। फोल्डिंग पलंग की जुगाड़ तो हो गयी पर मच्छरदानी
की जुगाड़ न हो पायी। प्रवास 3-4 दिन का था। पहली रात मे उनकी हालत खराब हो गयी, मच्छरों ने डंक मार-मार कर छटाक, पाव खून तो पी ही लिया
होगा, सारी रात सो न सके! अगले दिन हमने एक ही मच्छरदानी को खड़े मे न लगा कर
आड़े मे लगाया ताकि हम दोनों का सिरहाना, और पेट तो मच्छरदानी से ढंका रहे और पैरों को चादर से ढँक कर किसी तरह मच्छरों के आतंक से बचने
का प्रयास किया।
बाद
के सालों मे बैंक के अपने सेवा काल मे, मै जहां जहां भी रहा मच्छरदानी मेरे
जीवन का अभिन्न हिस्सा बन गयी। लखनऊ के बाद, सागर, ग्वालियर, भोपाल, रायपुर पोरसा
यहाँ तक कि दिल्ली मे भी मच्छरों के प्रकोप से मै अछूता न रहा और इन सभी जगहों मे मच्छरदानी
का उपयोग करता रहा। निरीक्षणालय मे बैंक कार्य हेतु जब भी प्रवास पर बाहर जाना होता
तो मै होटल वाले से सुनिश्चित कर लेता कि मच्छर न हों यदि ऐसा न होता तो सर्दियों मे
भी एसी या पूरी स्पीड से पंखे को चलाना पक्का कर लेता। अब तो हालात ये हो गये कि घर
के बाहर यदि कहीं जाना पड़ जाए तो रात की नींद मे मच्छरों के व्यवधान की आशंका हमेशा
बनी रहती हैं और अगर रात की चैन की नींद न मिले तो अगला दिन पूरा बेकार हो जाता हैं।
इसलिए मच्छरदानी अब मेरे जीवन का हिस्सा बन गयी। 1956 की फिल्म फंटूस मे किशोर कुमार
के उस गाये गीत को शायद मच्छरों के आतंक के बाद ही गीतकार ने गीत मे ये शब्द पिरोये
होंगे ऐसा मेरा विश्वास है :-
दुखी मन मेरे, सुन मेरा कहना।
जहां नहीं चैना, वहाँ नहीं
रहना।
2009-10 मे जब मुझे मेरे बेटे ने अपने अमेरिका प्रवास के बारे मे बताते हुए कहा कि अमेरिका मे मच्छर नहीं हैं तो मेरे मुँह से अनायास ही निकाल पड़ा, धन्य हैं वो देश और वहाँ के बैज्ञानिक और सरकारें जिन देशो मे मच्छर नहीं हैं। लेकिन जब बेटे ने बताया कि वहाँ मच्छर तो नहीं लेकिन खटमल की समस्या से अमेरिका त्रस्त है तो निराशा से मन का चौंकना स्वाभाविक था। पहले लगाता था कि मच्छर किसी भी व्यक्ति और देश के विकास मे बहुत बड़ी बाधा हैं, लेकिन जब आर्थिक और औध्योगिक रूप से विकसित होते हुए भी अमेरिका खटमलों को नियंत्रित नहीं कर सका तो लगा, शायद आदर्श स्थिति दुनियाँ मे कहीं नहीं हो सकती, कुछ न कुछ तो समस्याएँ सभी जगह होंगी ही। तब समझौता वादी दृष्टिकोण मे ही शायद समस्या का हल छुपा हो! मच्छर के उत्पात से मानव जाति के उत्पीढन की इस समस्या के बीच, सामंजस्य मे मच्छरदानी, एक अनुपम उदाहरण हैं। जियो और जीने दो!!
विजय
सहगल












