शनिवार, 24 फ़रवरी 2024

मच्छरदानी

 

"मच्छरदानी"






मेरा मानना है कि जिस तरह "पहिये" का आविष्कार मानव सभ्यता के विकास का पहला चमत्कार था उसी तरह अविकसित मानव सभ्यता मे मच्छरदानी का आविष्कार मानव सभ्यता के लिये एक अनमोल उपहार था। मै नहीं जनता कि मच्छरदानी के इस महान आविष्कारक का क्या नाम था और कौन था? झाँसी मे बचपन और कॉलेज स्तर तक घर मे मच्छर तो थे पर इनकी वसाहट इतनी ज्यादा नहीं थी कि मच्छर दानी की आवश्यकता महसूस लगी हो। इनकी कम संख्या के कारण शहर मे घनी आबादी और घरों का एक दूसरे से लगा होना था। खुली जगह, नाले या बाग बगीचे नाम मात्र को भी न थे। मच्छरदानी मात्र फिल्मों मे बिशेषतः बंगाली पृष्टभूमि मे बनी फिल्मों मे देखने को मिलती थी। कमरे मे पड़े डबल बेड के चारों कोनो मे लोहे के पाइप स्थायी एवं टिकाऊ रूप से लगे रहते थे जो कुलीन बंगाली भद्रलोक का फिल्मी चित्रण कराता था अन्यथा मच्छरदानी को देखने और इसके व्यापार विनमय का क्रम शहरों मे कम ही देखने को मिलता था।

बैंक की सेवा मे जब पहली बार लखनऊ प्रवास पर आया तो भाई साहब जो पहले से ही लखनऊ मे सेवारत थे के साथ रहा। उन दिनों भाई साहब तो क्या पूरा लखनऊ  मच्छरों के अतिवाद से पीढ़ित था।  स्व॰ श्री दलजीत सिंह बालिया जी के आलम बाग स्थित बड़े से बंगले के एक कमरे को हम लोगो ने पहला आश्रय स्थल बनाया। सर्दियों मे तो कंबल, रज़ाई ओढ कर, सोने मे मच्छरों की उपस्थिती एवं उत्पीढन का ज्यादा अनुभव न हुआ पर गर्मियों मे बालिया जी के बड़े से बंगले मे मच्छरों की उपस्थिती और उत्पीढन  का अहसास लखनऊ मे फरवरी-मार्च मे होने लगा था। उन दिनों पहली बार लाल डिब्बे मे फिनिट की तीखी गंध वाले द्रव्य को लाल पम्प से कमरे मे छिड़काव किया था। मरने वाले मच्छरों को सैकड़ों-हजारों  की संख्या मे पहली बार इकट्ठा देखा था। एकाध दिन के प्रभाव के बाद फिर वही "ढांक के तीन पात" मच्छर पुनः अपनी नयी सेना के साथ हमले को तैयार!! थक हर कर पहले एक फिर दूसरी मच्छरदानी अमीनाबाद के गणेश गंज से खरीदी।   

उन दिनों मच्छरदानी लगाने मे भी बड़ी अटर लगती थी। मच्छरदानी के साथ उसको लगाने के लिए चार बड़े-बड़े डंडे भी लगाने पड़ते थे। मच्छरदानी को लगाना अपने आप मे ही एक बड़ा झंझट था तो उसके डंडे लगाना भी किसी आफत से कम न था। पहले तो चारों डंडों मे मच्छरदानी के चारों छोर को इस तरह बांधों कि उनकी ऊंचाई चारों ओर से समान हो, कहीं से ऊंची-नीची हुई तो मच्छरों की बिना रोक टोक मच्छरदानी मे प्रवेश आपके किए कराये पर पानी फेर देता, फिर डंडों को चारपाई या फोल्डिंग पलंग के दोनों सिरहानों पर क्रॉस करते हुए अँग्रेजी के एक्स अक्षर की तरह फँसाना होता था ताकि डंडों का संतुलन आड़े-और खड़े मे संतुलित रहे। लेकिन कहते हैं न, मेहनत का फल मीठा होता हैं, जब रात मच्छरदानी लगाने के श्रमसाध्य काम के बाद जो चैन की नींद आती थी उसकी तो बस कल्पना ही की जा सकती थी और भूल से भी यदि रात मे पानी पीने की मात्रा औसत से ज्यादा हुई तो पृकृति तो शरीर मे जल की मात्रा का संतुलन बनाने के लिए  अपना काम करेगी ही। लघु शंका के लिए मच्छरदानी से निकले नहीं कि, मच्छरदानी के बाहर घात लगाकर, आपका खून पीने बैठे, इन दुष्ट मच्छरों की फौज मच्छरदानी मे प्रवेश के होड़ लगाए रहती। दो-चार मच्छर भी अवैध प्रवासी के रूप मे यदि मच्छरदानी मे प्रवेश के  प्रयास मे सफल हुए तो आपको  चैन की  नींद तो आने  से रही!,  अपितु आपके रक्त का पान करने से, अंदर प्रवेश कर गये मच्छरों की कद-काठी और रूप रंग मे हृष्ट-पुष्टता तो स्पष्ट नज़र आती थी। हालत ये हो जाते थे कि सुर्ख लाल रंग का मच्छर आपके खून पीने के बाद उड़ने तक से लाचार हो कर ऐसे उड़ते थे मानों एक अँग्रेजी शराब की पूरी  बोतल  का नशा कर लिया हो!! उस मच्छर को छूने भर की देर होती थी कि आपका खून आपके हाथों मे बापस कर दुनियाँ को अलबिदा कर जाता,  मानों अपने उद्धार के लिए आपके हाथों के स्पर्श का ही इंतज़ार कर रहा हों।      

राजे महराजों को वेशक मच्छरदानी लगाने और निकालने मे कोई  श्रम न करना पड़ता हो, पर हर सुबह उठने के बाद मच्छरदानी को निकालना भी  किसी कठिन श्रम से कम न था। पहले मच्छरदानी अलग करों फिर डंडों को हटाओं और विस्तर, चारपाई को अपने अपने स्थान पर स्थापित करों। कुछ लोग बेशक मच्छरदानी के विकल्प के रूप मे हिट, कछुआ छाप या मुर्गा छाप अगरबत्ती लगा कर, कुछ ओडोमौस क्रीम का लेपन या नीम की पट्टियों को जला कर मच्छर से छुटकारा पाने का प्रयास करते थे। कुछ लोग तो मिट्टी का तेल ही शरीर पर लगा कर मच्छरों से बचने का प्रयास करते, पर मेरा मानना हैं कि  मच्छरदानी का कोई विकल्प नहीं हैं।  इस मच्छरदानी की इस विकास यात्रा मे भी देश, काल और पात्र के अनुसार परिवर्तन हुए। जहां पहले सूती धागे की मच्छरदानी होती थी, मच्छरदानी मे प्राकृतिक हवा का प्रवेश और निकासी कम होने से खुले आसमान के नीचे सोने के कारण मौसम की मार तो रहती थी पर समय के साथ जब प्लास्टिक की मच्छरदानी आयी तो इस मुसीबत से छुटकारा मिला और गर्मियों की रात मे जो चैन की नींद मिलती उसका कहना ही क्या? जैसे "अवयशयकता आविष्कार की जननी हैं"  उसी तरह कमरों एसी, पखों और कूलर के आगमन कारण, मच्छरदानी के डंडों का स्थान मच्छरदानों के चारों कोनो मे पतली रस्सी या सूतली ने ले ली जिनको कमरे मे चार स्थानों मे कील या हुक ने ले ली और इस तरह डंडों की समस्या का  समाधान हो गया। यूं तो आधुनिक युग मे मच्छरदानी भी अनेक आकार-प्रकार की आने लगी पर देशी चौकोर मच्छरदानी का जबाब आज भी नहीं हैं।

एक बार आलमबाग स्थित लखनऊ मे हमारे रिश्तेदार आ पहुंचे गर्मी का समय था। नौकरी नई  थी। कूलर, एसी पंखा तो था नहीं, बाहर खुले मे सोने का चलन था। फोल्डिंग पलंग की जुगाड़ तो हो गयी पर मच्छरदानी की जुगाड़ न हो पायी। प्रवास 3-4 दिन का था। पहली रात मे उनकी हालत खराब हो गयी, मच्छरों ने डंक मार-मार कर छटाक, पाव खून तो पी ही लिया होगा, सारी रात सो न सके!  अगले दिन हमने एक ही मच्छरदानी को खड़े मे न लगा कर आड़े मे लगाया ताकि हम दोनों का सिरहाना, और पेट  तो मच्छरदानी से ढंका रहे और पैरों को  चादर से ढँक कर किसी तरह मच्छरों के आतंक से बचने का प्रयास किया।    

बाद के सालों मे बैंक के अपने सेवा काल मे, मै जहां जहां भी रहा मच्छरदानी मेरे जीवन का अभिन्न हिस्सा बन गयी। लखनऊ के बाद, सागर, ग्वालियर, भोपाल, रायपुर पोरसा यहाँ तक कि दिल्ली मे भी मच्छरों के प्रकोप से मै अछूता न रहा और इन सभी जगहों मे मच्छरदानी का उपयोग करता रहा। निरीक्षणालय मे बैंक कार्य हेतु जब भी प्रवास पर बाहर जाना होता तो मै होटल वाले से सुनिश्चित कर लेता कि मच्छर न हों यदि ऐसा न होता तो सर्दियों मे भी एसी या पूरी स्पीड से पंखे को चलाना पक्का कर लेता। अब तो हालात ये हो गये कि घर के बाहर यदि कहीं जाना पड़ जाए तो रात की नींद मे मच्छरों के व्यवधान की आशंका हमेशा बनी रहती हैं और अगर रात की चैन की नींद न मिले तो अगला दिन पूरा बेकार हो जाता हैं। इसलिए मच्छरदानी अब मेरे जीवन का हिस्सा बन गयी। 1956 की फिल्म फंटूस मे किशोर कुमार के उस गाये गीत को शायद मच्छरों के आतंक के बाद ही गीतकार ने गीत मे ये शब्द पिरोये होंगे  ऐसा मेरा विश्वास है :-

दुखी मन मेरे, सुन मेरा कहना।  

जहां नहीं चैना, वहाँ नहीं रहना।                 

2009-10 मे जब मुझे मेरे बेटे ने अपने अमेरिका प्रवास के बारे मे बताते हुए कहा कि अमेरिका मे मच्छर नहीं हैं तो मेरे मुँह से अनायास ही निकाल पड़ा,  धन्य हैं वो देश और वहाँ के बैज्ञानिक और सरकारें जिन देशो मे मच्छर नहीं हैं। लेकिन जब  बेटे ने बताया कि वहाँ मच्छर तो नहीं लेकिन खटमल की समस्या से अमेरिका त्रस्त है तो निराशा से मन का चौंकना स्वाभाविक था। पहले लगाता था कि मच्छर  किसी भी व्यक्ति और देश के विकास मे बहुत बड़ी बाधा हैं, लेकिन जब आर्थिक और औध्योगिक रूप से विकसित होते हुए भी अमेरिका खटमलों को नियंत्रित नहीं कर सका तो लगा, शायद आदर्श स्थिति दुनियाँ मे कहीं नहीं हो सकती,  कुछ न कुछ तो समस्याएँ सभी जगह होंगी ही। तब  समझौता वादी दृष्टिकोण मे  ही शायद समस्या का हल छुपा हो! मच्छर के उत्पात से मानव जाति के उत्पीढन की इस  समस्या  के बीच, सामंजस्य मे मच्छरदानी, एक अनुपम उदाहरण हैं। जियो और जीने दो!!

विजय सहगल

बुधवार, 21 फ़रवरी 2024

इलैक्टोराल बोंड्स पर सर्वोच्च निर्णय

 

"इलैक्टोराल बोंड्स पर सर्वोच्च निर्णय"





देश के सर्वोच्च न्यायालय ने 15 फरवरी 2024 को एक बार पुनः सिद्ध कर दिया कि भारतीय संसंद द्वारा ऐसे किसी भी कानून को मंजूर नहीं किया जा सकता जो देश की लोकतान्त्रिक व्यवस्था मे भ्रष्टाचार को एक कानूनी अमलीजामा पहना, वैधानिक मान्यता प्रदान करे!! पाँच जजों की संविधान न्याय पीठ मे मुख्य नयाधीश श्री डीवाई चंद्रचूड़ सहित जस्टिस संजीव खन्ना, जस्टिस बीआर गवई, जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस मनोज मिश्रा शामिल थे। ये फैसला भारतीय लोकतन्त्र के इतिहास मे स्वर्ण अक्षरों से अंकित किया जायेगा। भारतीय राजनैतिक दलों को इलेक्टोराल बोंड्स के माध्यम से दिये जाने वाले चुनावी चंदे को सुप्रीम कोर्ट के पाँच जजों वाली बेंच ने एक राय से निरस्त करते हुए स्टेट बैंक को नए चुनावी बॉन्ड जारी न करने और वित्त विधेयक के माध्यम से लागू चुनावी बॉन्ड योजना से 12 अप्रैल 2019 से अब तक खरीदे चुनावी बॉन्ड का विस्तृत ब्योरा निर्वाचन आयोग को 6 मार्च 2024 तक देने का निर्देश दिया हैं। पाँच जजों की न्याय पीठ ने चुनाव आयोग को भी निर्देशित किया हैं कि वह चुनावी बॉन्ड के माध्यम से प्राप्त चुनावी चंदे की जानकारी यथा चंदा देने वाले का विवरण  और लाभान्वित राजनैतिक दल, धन राशि का विस्तृत विवरण चुनाव आयोग की वेव साइट पर प्रदर्शित सार्वजनिक करें।

अब देश की आम नागरिकों के इस बात की जानकारी हो सकेगी कि भारतीय राजनीति के विभिन्न दलों के युद्धाभिलाषी, चतुर खिलाड़ियों को किन किन औध्योगिक घरानों से कितनी कितनी धन राशि चुनावी संग्राम मे  विजयी प्राप्त करने हेतु मिली हैं। न्यायालय का मानना था कि इस बॉण्ड के माध्यम से असीमित चंदा देकर कंपनी और औध्योगिक घराने, चुनावी प्रक्रिया को प्रभावित भी कर सकते हैं!! माननीय न्यायालय का ये भी मानना था कि इलेक्टोराल बॉण्ड योजना संविधान के अनुच्छेद-19 (1)(ए) का उल्लंघन हैं ये योजना, मुक्त और पारदर्शी चुनाव को प्रभावित कर रही थी जिसके कारण सूचना के अधिकार और विचारों की अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता के  अधिकार का भी उल्लंघन हो रहा था। इस योजना से मतदाताओं के अधिकार का भी हनन हो रहा था। जहां एक ओर स्वतंत्र और निर्दलीय प्रत्याशी चुनावी समर के लिये अपनी निजी आय से चुनाव लड़ने के लिये बाध्य है, वही इस असंवैधानिक चुनावी बॉण्ड योजना मे वे ही दल लाभान्वित होते जो लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 की धारा 29ए के तहत पंजीकृत हो और जिन्हे विधान सभा या लोक सभा के चुनावों मे कम-से-कम 1% वोट मिले हों!! इस तरह यो चुनावी बॉण्ड देश के राष्ट्रीय और क्षेत्रीय दलों यथा  कॉंग्रेस, भाजप, बसपा, समाजवादी पार्टी, टीएमसी, एनसीपी, राजद, जेडीयू, एआईडीएमके, डीएमके, नेशनल कॉन्फ्रेंस, शिवसेना या अन्य दलों   को ही लाभान्वित करता है शेष  99.99% निर्दलीय सामान्य भारतीय नागरिकों को चुनाव लड़ने हेतु ये योजना समानता के अधिकार से वंचित कर भ्रष्टाचार और काला बाजारी को बढ़ावा देती हैं जिसे निरस्त कर सर्वोच्च न्यायालय ने उचित ही किया।

जैसा कि विदित था सुप्रीम कोर्ट के चुनावी बॉण्ड योजना के निरस्तीकरण पर राजनैतिक महारथियों की प्रतिक्रिया आनी स्वाभाविक थी। प्राप्त आंकड़ों के अनुसार वित्त वर्ष 2017-18 से 2022-23 तक सत्ताधारी दल भाजप को सबसे अधिक 6566 करोड़ की धनराशि प्राप्त हुई। काँग्रेस को इस योजना मे 1123 करोड़, टीएमसी को 1093 करोड़, बीजेडी को 774 करोड़, डीएमके को 617 करोड़ रुपए परोक्ष रूप से काली कमाई के रूप मे प्राप्त हुए। कुल मिलाकर रुपए 13431 करोड़ के बॉण्ड इस यौजना मे देश के विभिन्न राजनैतिक दलों को प्राप्त हुए जो चिंता का विषय हैं।  इस यौजना का सर्वाधिक लाभ देश या प्रदेश के सत्ताधारी दलों को मिला हैं। भाजप जो अपने आपको सुचिता और सत्य के पैमाने पर अन्य राजनैतिक दलों से अलग अनुशासित दल मानती है कैसे इस चुनावी बॉण्ड रूपी पाप मे भागीदार हुई? कल ट्वीटर और अन्य सोश्ल माध्यमों पर  राहुल गांधी सहित कॉंग्रेस के अन्य नेताओं ने नरेंद्र मोदी सरकार के इस चुनावी बॉण्ड योजना पर सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के बाद हमला करते हुए, इलेक्टोराल बॉण्ड को रिश्वत और कमीशन लेने का माध्यम बताया!! नरेंद्र मोदी सरकार पर आरोप लगाते समय आर्यश्रेष्ठ श्री राहुल गांधी ये भूल गए कि इस भ्रष्ट चुनावी बॉण्ड योजना मे स्वयं काँग्रेस ने 1123 करोड़ रूपये प्राप्त किये!! माननीय राहुल क्या स्पष्ट करेंगे कि चुनावी बॉण्ड से प्राप्त 1123 करोड़ की यह धनराशि क्या "रिश्वत और कमीशन" नहीं हैं? बेशक भाजप चुनावी बॉण्ड के माध्यम से मिली धन राशि रूपये 6566 करोड़ के मुक़ाबले काँग्रेस को मिली धनराशि रूपये 1123 करोड़ से काफी कम है? पर रिश्वत, कमीशन रूपी ये चोरी तो चोरी ही हैं!! फिर, चोरी चाहे, छोटी हो या बड़ी?  इस असंवैधानिक निरस्त की गयी योजना की  लूट मे देश की सभी पंजीकृत राजनैतिक पार्टियां शामिल हैं, कहना अतिसन्योक्ति न होगी कि भारतीय राजनीति के इस  "हमाम मे सभी नंगे हैं"। राहुल गांधी को ये याद रखना होगा कि काँच के घरों मे रहने वाले दूसरों के घरों पर पत्थर नहीं फेंका करते!! क्या ही अच्छा होता कि उन्होने  भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) की तरह इस चुनावी बॉण्ड से एक पैसे का लाभ न लिया होता?

इस चुनावी बॉण्ड के विरुद्ध न्यायालय मे वाद दायर करने वालों मे  कम्यूनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) प्रशंसा और बधाई की पात्र है जिसने इस काली चुनावी योजना को सुप्रीम कोर्ट मे चुनौती दी और इस योजना से एक पैसे का भी लाभ नहीं लिया।  इसमे कोई दो राय नहीं कि साधारणतः आज भी कम्यूनिस्ट पार्टी के लोगो मे ईमानदारी देश की अन्य राजनैतिक दलों के मुक़ाबले कहीं ज्यादा हैं। मुझे अच्छी तरह याद है कि 1997 मे भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी के महासचिव स्व॰ एबी वर्धन को उनके  रायपुर प्रवास पर, मै  अपनी छोटी, नॉन एसी मारुति 800 से रायपुर एयर पोर्ट से शंकर नगर लाया था। आज आवश्यकता इस बात की है कि देश के समस्त राजनैतिक दल, कम्यूनिस्ट पार्टी मार्क्सवादी की तरह आत्मचिंतन और आत्ममंथन कर खर्चीली चुनाव व्यवस्था मे भ्रष्टाचार और कालाबाजारी के विरुद्ध एकजुट हो लड़ाई  करें।  

विजय सहगल   

रविवार, 18 फ़रवरी 2024

ओबीसी का अवसान

 

"ओबीसी का अवसान"




आज फिर 19 फरवरी का दिन हम सब के परमप्रिय, हमारी ज़िंदगी के अभिन्न हिस्सा रहे, लाडले  ओरिएंटल बैंक ऑफ कॉमर्स का स्थापना दिवस हैं। 1943 मे आज ही के दिन पंजाब प्रांत के लाहौर (अब पाकिस्तान) मे  अपनी स्थापना के वर्ष से, जब हम बैंक के इतिहास पर दृष्टिपात करते हैं तो ओरिएंटल बैंक ऑफ कॉमर्स का वृतांत संघर्षों और चुनौतियों से परिपूर्ण रहा। अपनी स्थापना के चार वर्ष बाद जब देश  1947 मे, स्वतन्त्रता के सूरज की लालिमा प्रकाशमान हो रही थी तब ओरिएंटल बैंक को भी लाखों-लाख देश वासियों के साथ विभाजन की विभीषिका के  दंश झेलने के लिये बाध्य होना पड़ा। स्वतन्त्रता के बाद अपनी आठ शाखाओं मे से सिर्फ दो शाखाओं के साथ ओबीसी को अपना प्रधान कार्यालय लाहौर से अमृतसर लाना पड़ा। बैंक के तत्कालीन चेयरमेन लाला करम चंद थापर के दूरदृष्टिकोण के कारण पाकिस्तान की बंद  शाखाओं के ग्राहकों की  बैंक के खातों मे जमा पूंजी के  एक एक पैसे का भुगतान कर बैंक ने देश मे बैंकिंग के नए आयाम प्रस्तुत किए।

1970 से 1976 का समय ओरिएंटल बैंक के लिये चुनौतीपूर्ण रहा। इस दौरान अपने अस्तित्व को बचाने के  लिये बैंक को बड़े संघर्ष करने पड़े। एक दौर तो ऐसा भी आया जब बैंक, अपनी वार्षिक लेखाबंदी मे मात्र 175/- रुपए का लाभ ही निकाल पाया। ये दौर  ओरिएंटल बैंक के इतिहास का सबसे कठिन समय था, जब बैंक के हिस्सेदार थापर समूह ने इतने कम लाभ के कारण बैंक को बेचने/बंद करने  का अप्रिय निर्णय लेने के लिए विवश होना पड़ा। ऐसे आड़े और कठिन दौर मे तत्कालीन बैंक के समस्त अधिकारी और कर्मचारियों तथा बैंक यूनियन के तत्कालीन नेतृत्वकारी साथियों ने आगे आकार बैंक प्रबंधन को भरोसा दे,  बैंक के कारोबार मे एक जुट होकर, जी-जान से जुट कर, एक बार पुनः बैंक को बचा कर, बैंक को, संकटों के बादल से मुक्त कराया। इस कठिन दौर ने बैंक मे एक नयी कार्य सांस्कृति को जन्म दिया। समान्यतः भारतीय बैंक के इतिहास और विशेषतः ओरिएंटल बैंक के प्रबंधन और अधिकारी कर्मचारियों के बीच पनपी इस कार्य सांस्कृती को ओबीसी सांस्कृती के नाम से निरूपित किया। बैंक के प्रबंधन और कर्मचारियों के बीच इस आपसी सौहार्द ने आगे चल कर बैंक की बुनियाद को एक मजबूत आधार प्रदान किया। ओरिएंटल बैंक का राष्ट्रीयकरण अन्य 5 बैंकों  के साथ  15 अप्रैल 1980 को किया गया, तब कुल 20 राष्ट्रीयकृत बैंकों  मे ओबीसी का स्थान 19वे नंबर पर था। ओरिएंटल बैंक के इतिहास मे एक पल ऐसा भी आया जब बैंक की गैर निष्पादनकारी आस्तियाँ ज़ीरो थी और बैंक को  अनेक व्यापारिक पैमानों के आधार पर देश का नंबर एक बैंक होने का गौरव भी प्राप्त हुआ। ये ओरिएंटल बैंक ऑफ कॉमर्स का स्वर्णिम काल था। 1993 मे 20 राष्ट्रीकृत बाँकों मे, ओरिएंटल बैंक ऑफ कॉमर्स को शेयर मार्केट मे अपना पहला आईपीओ आम जनता के बीच लाने का गौरव प्राप्त हुआ।

70 के दशक के ओरिएंटल बैंक के स्वर्णिम काल के पश्चात जब एक ओर  बैंक अपनी  नई ऊंचाइयों को छूने का प्रयास कर रहा था वहीं दूसरी ओर यूनियन और प्रबंधन के कुछ स्वार्थी, मौका परस्त सदस्य, बैंक  की कार्यप्रणाली के अंदर ओबीसी कल्चर को क्षति पहुंचाने मे कामयाब रहे। जहाँ  एक वक्त प्रबंधन और यूनियन के बीच का जो  आपसी सौहार्द, साहचर्य और सौजन्य बैंक के आड़े समय संकट से निकालने मे बैंक की धरोहर थी, वही इसी आपसी बंधुत्व, भाईचारा और मैत्री भाव, बैंक के संकट से उबरने के बाद, बैंक के स्टाफ के बीच ट्रान्सफर, पोस्टिंग और प्रमोशन मे पक्षपात का  कारण बना, जिसने बैंक के अंदर भ्रष्टाचार, भाई भतीजा बाद और चोर दरबाजे से चपरासी के रूप मे नेताओं और प्रबंधन के रिशतेदारों की सैकड़ो की  संख्या मे भर्ती के रूप मे  बैंक पर  बड़ा आघात भी किया। प्रबंधन और बैंक यूनियन का एक ही सिक्के के दो पहलू होने ने भी बैंक की कार्य सांस्कृति को बड़ी क्षति पहुंचाई। प्रबंधन और बैंक यूनियन के साथ  किसी बैंक स्टाफ की पसंद-नापसंद यूनियन और बैंक प्रबंधन की पसंद-नापसंद बन गयी। एक वक्त तो ऐसा आया जब प्रबंधन और यूनियन मे  किसी एक से नजदीकी और घनिष्ठता ने खुशामद, चापलूसी, चाटुकारिता जैसी कार्य सांस्कृति को बढ़ावा  दिया, वहीं दूसरी ओर किसी बैंक  अधिकारी या कर्मचारी की प्रबंधन/यूनियन से दुश्मनी या मतभेद ने उस स्टाफ को बैंक मे कहीं का नहीं छोड़ा अर्थात उस स्टाफ की सुनवाई न  तो कभी प्रबंधन ने सुनी और न ही यूनियन ने ऐसे स्टाफ की कभी सुधि ली।  ऐसे लोगो का बैंक की छद्म नीतियों की आड़ मे कदम-कदम पर उत्पीढन किया गया।

जिस तरह कॉंग्रेस ने देश की स्वतन्त्रता कराने के संघर्ष की कीमत के रूप मे निजी स्वार्थ, बेईमानी और भ्रष्टाचार के रूप मे कदम कदम पर कीमत बसूली, ठीक उसी राह पर चल कर ओबीसी के उच्च प्रबंधन और यूनियन  के अखिल भारतीय नेता द्व्य और अन्य क्षेत्रीय छुटभैये नेताओं ने भी बैंक को बिकने/बंद करने से बचाने की कीमत के रूप मे बैंक के संसाधनों की भरपूर लूट की। आश्चर्य होता है कि बैंक के राष्ट्रीकरण के पूर्व और पश्चात बैंक मे पिछले दरबाजे से तमाम नियम और शर्तों को दर किनार कर चपरासी के रूप मे सैकड़ों भर्तियाँ कीं  और ये खेल, राष्ट्रीकरण के दशकों बाद तक भाई भतीजा और आर्थिक कदाचार, भ्रष्टाचार  के रूप मे जारी रहा। कुछ अपुष्ट खबरों के अनुसार इस घोटाले मे जमीन की लिखा-पढी  ठीक उसी तरह की गयी जैसे रेल भर्ती घुटाले मे लालू परिवार पर नौकरी के बदले जमीन का घोटाला आजकल सुनाई दे रहा हैं। अब इस घोटाले मे नौकरी के बदले जमीन के ट्रान्सफर  की सीख, बैंक के नेताओं ने लालू से सीखी या लालू ने बैंक नेताओं से सीखी कहना मुश्किल हैं??   

राष्ट्रीकरण के बाद, बदले परिदृश्य मे, उच्च प्रबंधन ने अधिकारी-कर्मचारी यूनियन के बीच फूट-डालो और राज करो (दिवाईड अँड रूल) नीति के तहत दोनों को आपस मे लड़ा कर अपना उल्लू सीधा किया। दुर्भाग्य से एक समय ओबीसी कल्चर का दम भरने वाले बैंक के अधिकारी और कर्मचारी  नेताओं का एक दूसरे को नीचा दिखाने की क्षुद्र दंभ, तुच्छ अहम और छद्म अहंकार ने बैंक की कार्य सांस्कृति का अपूरणीय अहित कर बैंक के अधिकारी और कर्मचारियों के बीच गहरी खाई खोदी!! मुझे याद हैं उन दिनों जब बैंक के आपसी विलय की बात चलती थी तब बैंक स्टाफ का एक पक्ष, जो यूनियन और प्रबंधन की चाटुकारिता मे रत था, ने हमेशा ओबीसी कल्चर मजबूती का पक्ष लिया और सदा ही बैंक के विलय का विरोध किया, वहीं दूसरी ओर ऐसे बैंक स्टाफ जिनका बैंक प्रबंधन और यूनियन मे कोई धनी धोरी नहीं था और जिसने कदम कदम पर ट्रान्सफर, पोस्टिंग और प्रमोशन मे पक्षपात, भाई भतीजा बाद को देखा, हमेशा बैंक के विलिनीकरण की कामना करता रहा!!, और जो  सदा, इस दोआयमी, दोगली नीति को कोसते हुए  बैंक के विलय के पक्ष मे खड़े रहते। चंबल की एक शाखा मे एक लिपिक साथी जिसने बैंक परीक्षा सीएआईआईबी के दोनों पार्ट पास करने  के बावजूद विशेष सहायक के प्रमोशन से वंचित  कर कैसे यूनियन और प्रबंधन ने मिलकर एक भ्रष्ट व्यक्ति को सुपरबाइजर का प्रमोशन दिया जिसको आगे चल कर बेईमानी और भ्रष्टाचार के कारण बैंक की सेवाओं से बर्खास्त किया गया। ऐसे अनेकों किस्से बैंक मे अखिल भारतीय स्तर पर हर साल किए जाते रहे। ऐसे अन्यायी और अनाचार भरे माहौल मे योग्य स्टाफ जिनका बैंक मे कोई माई-बाप नहीं था, उनकी चित्कार  बैंक मे "नक्कार खाने मे तूती की आवाज" वाली कहावत को चरितार्थ करती रही!! अधिकारी यूनियन के एक महारथी ने तो स्वच्छंदता और स्वेच्छाचारिता की सारी सीमाएं तोड़ अपने निजी उपयोग  हेतु यूनियन के खर्चे पर लाखों रुपए की एक बड़ी चार पहिया कार खरीदी, जिसके पेट्रोल और ड्राईवर के वेतन व्यय, आदि के खर्चों का वहन भी यूनियन के चंदे से किया जाता था!!  भारतीय बैंक  यूनियनों  के इतिहास मे पैसे का ऐसा खुला  दुर्पयोग शायद ही कभी, कहीं अन्यत्र देखने को मिला हो??

ओरिएंटल बैंक शायद,  बैंक के बाहरी झंझावातों से लड़ कर अपना अस्तित्व बचा लेता पर बैंक अपने ही प्रबंधन के कुछ उच्च पदस्थ अधिकारियों के भ्रष्टाचार के कारण  और बैंक की यूनियन नेताओं का अपने सदस्यों के प्रति गैर जिम्मेदारान व्यवहार के कारण ओबीसी का अवसान तय कर दिया था और  जिसे सरकार की बैंकों के विलिनीकरण नीति ने आसान कर दिया। इस तरह  ओरिएंटल बैंक जैसे एक प्यारे संस्थान का अवसान बैंक के ही चंद लोगो के कुकृत्य के कारण,  ऐसे समय हुआ जबकि बैंक मजबूत स्थिति मे था। किसी शायर ने अपने ही लोगो द्वारा अपने ही घर को आग लगाने पर क्या खूब लिखा हैं, जो ओबीसी के अवसान पर सटीक बैठती हैं :-

दिल के फफोले जल उठे, सीने के दाग से।

इस घर को आग लग गई घर के चिराग से॥          

 

शायद आज ओरिएंटल बैंक, अपने स्थापना दिवस पर बेबसी, बेकसी और विवशता पर आँसू बहाते हुए सोच  रहा होगा कि:- 

 

मुझे अपनों ने मारा, गैरों मे कहाँ दम था।

मेरी कश्ती वहाँ डूबी, जहाँ पानी बहुत कम था॥

 

विजय सहगल

        

शनिवार, 10 फ़रवरी 2024

12वी फ़ेल

 

"12वी फ़ेल" फिल्मी समीक्षा"



15 अगस्त 1947 मे देश की स्वतन्त्रता के बाद से ही संघ लोक सेवा आयोग द्वारा आयोजित  देश की सबसे बड़ी और सबसे सम्मानजनक सेवा भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस) एवं भारतीय पुलिस सेवा (आईपीएस) मे शामिल और सफल होने का सपना  हर भारतीय युवा के मन मे हमेशा से रहा है। इसमे कोई भी शक और संशय  नहीं कि इस अहम सेवा मे सफल व्यक्ति को असीमित और व्यापक शक्तियों के माध्यम से एक अलग पहचान मिलती है। 

इन दिनों निर्माता, निर्देशिक विनोद विधु चोपड़ा द्वारा लिखित फिल्म 12वी फ़ेल फिल्म की चारों तरफ चर्चा हैं। यह फिल्म अनुराग त्रिपाठी द्वारा लिखित किताब "12th फ़ेल" पर आधारित हैं जिसमे एक ऐसे संघर्ष शील युवक के जीवन पर आधारित  सत्य घटना को चित्रित किया गया जिसने अपनी  आर्थिक निर्धनता और गरीबी के बावजूद अपने, कठिन परिश्रम और संघर्ष पूर्ण जीवन से देश की सबसे कठिन पर सम्मानित और प्रतिष्ठित परीक्षा संघ लोक सेवा की  भारतीय पुलिस सेवा मे  सफलता हांसिल कर देश के युवाओं के समक्ष एक अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत किया, जिसमे कदाचित विरले लोग ही इस चुनौती पूर्ण परीक्षा मे सफलता की सीढ़ी  चढ़ कर अपना लक्ष्य हांसिल करते हैं।  पर्दे पर चंबल, मुरैना के युवा भापुसे के अधिकारी मनोज शर्मा की भूमिका के रूप मे विक्रांत मैसी एवं उनकी प्रेमिका श्रद्धा के रूप मे अभिनय मेधा शंकर ने बखूबी किया हैं। 

फिल्म 12वी फ़ेल ने मुझे इसलिए भी आंशिक रूप से प्रेरित किया क्योंकि जिस चंबल इलाके मे स्थित  मुरैना-ग्वालियर के संघर्षशील युवा एवं जुझारू किरदार, 12वी फ़ेल,  मनोज शर्मा को दिखाया गया, वो ही क्षेत्र मुरैना-अम्बाह-पोरसा, मेरी भी दशकों तक कर्म भूमि रहे  और दुर्भाग्य से मै भी 12वी मे एक बार फ़ेल हुआ था!! लेकिन समय और परिस्थिति के अनुसार मेरे सपने और संघर्ष दोनों ही बहुत छोटे और सहज थे जो मुझे बैंक के लिपिक पद, पर  ले गये। चंबल के मुरैना-भिंड   क्षेत्र के लोगो मे  स्वाभिमान और आत्मसम्मान कूट-कूट कर भरा हैं, जिसकी परिणति एक ओर जहां, बहुतायत लोगो की पदस्थापना  देश की सेना और सुरक्षा बलों मे देखने को मिलती  हैं, वहीं दूसरी ओर देश, धर्म, जाति और पूर्वजों की आन-वान और शान की खातिर अपना सब कुछ दांव पर लगाने  मे  पीछे न रहने मे देखने को मिलती है, फिर भले ही इसके लिये प्राण ही क्यों न देना पड़े!! दुर्भाग्य से अनेकों बार जर, जोरू और जमीन या छोटी-छोटी बातों के झगड़ों  मे हिंसा और हत्या यहाँ आम बात हैं। चंबल क्षेत्र मे 'डकैतों' की समस्या के मूल मे यही एक मुख्य कारण रहा है!! पूरे देश मे जब किसान हताशा या निराशा मे अत्महत्या करते हैं तब चंबल नदी के बीहड़ों मे रहने वाले लोग विपरीत और प्रतिकूल परिस्थितियों मे 'हत्या' कर बीहड़ों के बागी बन जाते हैं!! फिर बेशक  दुनियाँ के लोग उन्हे दस्यु या डाँकू कहती  रहें? रक्षा और अति आत्मरक्षा की इन्ही भावनाओं के कारण यहाँ के लोगो का हमेशा से, सेना या सुरक्षा बलों और उसकी बर्दी के प्रति एक अतिरिक्त आकर्षण रहा है जिसके लिये चंबल के लोग जुनून की हद तक जा सकते हैं। शायद इन्ही अतृप्त या अपूर्ण इक्षाओं के वशीभूत इस क्षेत्र के कुछ लोग अपने बच्चों का नाम कलेक्टर सिंह, तहसीलदार सिंह या कर्नल सिंह रखते हैं।   

जहां एक ओर परिवार की गरीबी, पिता की ईमानदारी पर उत्पीड़न और भाई के जुगाड़ से स्वरोजगार पर विधायक के गुर्गों का कुठराघात ने ही शायद 12वी फ़ेल के नायक मनोज शर्मा की  इसी लगन और दीवानगी ने उसे संघ लोक सेवा की परीक्षा उत्तीर्ण करने की प्रेरणा दी हो? वर्दी का जादू और उसकी गर्वोक्ति यहाँ ऐसा सिर चढ़ कर बोलती  हैं कि आईपीएस तो दूर पुलिस का एक साधारण कांस्टेबल की  वर्दी उसमे साहस और शौर्य को दुगना महसूस करा देता हैं फिर सेना और सुरक्षा बालों के ओहदे पर नियुक्त सेना नायकों का क्या कहना। लेकिन वही दूसरी ओर इस क्षेत्र के लोगो का पुलिस के इत्तर सेना और अन्य सुरक्षा बलों के प्रति सम्मान, श्रद्धा और प्रतिष्ठा आज भी ज्यादा हैं। समाज मे प्रत्यक्ष रूप से भले ही पुलिस विभाग मे कार्यरत लोगो का वेशक  लिहाज़ होता हो पर  चंबल क्षेत्र मे सेना, बीएसएफ़, आईटीबीपी, सीआईएसएफ़ मे कार्यरत लोगो का सम्मान पुलिस सेवा के किसी बड़े अधिकारी से कहीं ज्यादा हैं। यही कारण हैं जब 12वी फ़ेल नायक का पिता अपने पुत्र के  भारतीय पुलिस सेवा मे चुने जाने पर अपने गाँव के  विरोधी को सिर्फ ये जतलाने के लिये घर से निकलते हुए ये कहना कि,  "तैने एक आईपीएस के बाप से पंगा लेके ठीक नाय करो?" उसकी  साधारण सोच को दर्शाता हैं?  

मैंने अपनी बैंक सेवा के दौरान एक जिले मे  स्थित कलेक्टर कार्यालय मे शाखा प्रबन्धक के रूप मे लगभग 5 साल, देश की इन दो  सर्वोच्च सेवा, आईएएस, और आईपीएस के अधिकारियों की सेवा और शक्ति को नजदीक से देखा हैं। मेरा मानना हैं कि इन दो बड़ी सेवाओं के पद मे जितनी शक्ति, निहित है शायद ही किसी दूसरी सेवा मे हो!! यदि आईएएस सेवाओं पर पदस्थ लोगो ने देश की स्वतन्त्रता के बाद ईमानदारी और सत्य निष्ठा से काम किया होता तो देश के आम लोगो के साथ ही समाज के गरीब, दबे-कुचले और पिछड़े लोगो का ये रूप देखने को न मिलता जो आज देखने को मिलता हैं? आम लोगो के कल्याण की योजनाओं का कार्यान्वयन यदि सुचारु और निष्कपटता से किए गये होते तो आज भारत विकसित राष्ट्रों मे गिना जाता। यदि आईपीएस अधिकारियों ने कदाचित अपनी सेवाओं की कर्तव्य पालना ठीक तरीके से की होती तो देश मे आतंकवाद, गुंडागर्दी, नक्सलवाद जैसी समस्याएँ शायद ही देखने को मिलती?? देश मे आज कानून-व्यवस्था का ऐसा अधोपतन शायद ही देखने को मिलता?        पर देश का दुर्भाग्य है कि राजनैतिज्ञों से मिली साँठ गांठ के कारण इन दोनों ही सेवाओं के लोगो को मिली असीमित शक्ति और सामर्थ्य ने देश मे बेईमानी, भ्रष्टाचार को ऐसा बढ़ावा मिला कि देश मे नैतिक और चारित्रिक मूल्यों  का ऐसा पतन हुआ कि देश को अधोगति, अवनति की परिणति देखने को मिली। ऐसे कितने दंपति  होंगे जिनके भाग्य मे  एक आईपीएस के माँ-बाप होना लिखा हो? काश, मनोज शर्मा आईपीएस मे सफल होने के संघर्ष और श्रम के साथ वास्तविक जीवन मे ऐसा कुछ करके एक आदर्शा उदाहरण स्थापित कार पाते जो आम लोगो मे आज एक मिशाल होता? पर दुर्भाग्य वे अपने इस कठिन संघर्ष मे ऐसा कोई दृष्टांत रख पाते तो इस फिल्म की सार्थकता और संघर्ष को एक नया आयाम मिलता? लेकिन दुःखद ये रहा कि 12वी  फ़ेल के अभिनेता फिल्म के एक दृश्य मे अपने आपको साधारण व्यक्ति की सोच दिखाने से रोक न सके।   वे फिल्म के एक सीन मे अपने  आईपीएस होने की गर्वोक्ति से नहीं बच सके जब वे उस दृश्य मे,  थानेदार द्वारा अपने एक मित्र की अवैध हिरासत पर तमाम कानूनी धाराओं को उद्धृत कर आईपीएस के रूप मे पहला पत्र उस थानेदार के सस्पेंशन का साइन करने की धमकी देकर करते हैं? बैसे  फिल्म 12वी फ़ेल के नायक मनोज शर्मा  की,  परीक्षा मे नकल के अभाव मे फ़ेल होने की "स्वीकारोक्ति", इस फिल्म का चरमोत्कर्ष थी।

जहां तक इस फिल्म के कथानक, संवाद और निर्देशन की बात हैं विधु विनोद चोपड़ा फिल्म के हीरो की आईपीएस बनने के संघर्ष, श्रम, लगन और दीवानगी को उकेरने मे पूरी तरह सफल हुए इसमे कोई संशय नहीं हैं। लेकिन सत्य घटना पर आधारित इस फिल्म के रियल हीरो  मनोज शर्मा कदाचित आईपीएस मे सफल होने के बाद अपने वास्तविक सरकारी सेवा मे  कुछ ऐसे मानदंड और उदाहरण स्थापित करते जिससे समाज के सामान्य मानवी भी उनके माता-पिता की तरह गर्व महसूस करता, तो कुछ और बात होती? पूरी  फिल्म का एकांश भी यदि मनोज शर्मा द्वारा एक भारतीय पुलिस सेवा को मिली अपनी असीम शक्तियों की सहायता से अपने गाँव के ही बेरोजगार युवाओं को कुछ रास्ता दिखा पाते तो फिल्म 12वी फ़ेल की सार्थकता पूर्ण हो सकती थी।  

पर वास्तविक जीवन मे ऐसा न होने के कारण मनोज शर्मा का संघ लोक सेवा के माध्यम मे आईपीएस मे सफल होने का संघर्ष एक सामान्य संघर्ष हो कर रह गया।

विजय सहगल                     

शनिवार, 3 फ़रवरी 2024

राहुल की न्याय यात्रा, अरुणाचल से शुरू न करने पर बवाल और सवाल?

 

राहुल की न्याय यात्रा, अरुणाचल से शुरू न करने पर बवाल और सवाल?


 


15 जनवरी 2024 को कॉंग्रेस के युवा नेता ने एक बार फिर अपने आपको स्थापित करने हेतु एक नई यात्रा, न्याय यात्रा शुरू की हैं। न्याय यात्रा जैसे जैसे आगे बढ़ रही है बैसे बैसे इसके औचित्य और उपयोगिता पर सवाल उठने लगे हैं? यात्रा के पक्ष मे काँग्रेस, हज़ार तर्क देकर इसे समय की आवश्यकता, देश की ज्वलंत समस्याओं को उठाने का मुद्दा या मोदी सरकार की मणिपुर सहित अन्य विषयों पर असफलता बतलाकर इस यात्रा को न्यायोचित ठहराने का प्रयास बता रही हैं। राहुल गांधी की इस न्याय यात्रा की शुरुआत देश के भोर के सूरज की रोशनी वाले पहाड़ो की भूमि के रूप मे लोकप्रिय, देश का सबसे दूरस्थ राज्य अरुणाचल प्रदेश से शुरू न  कर, मणिपुर से शुरू करने पर राजनैतिक दलों ने सवाल खड़े किए हैं?? राहुल गांधी द्वारा काँग्रेस की न्याय यात्रा अरुणाचल प्रदेश से शुरू न करने के पीछे  गांधी परिवार और काँग्रेस की, चीनी नेताओं और चीनी रिपब्लिक पार्टी से प्रीति और प्रतिबद्धता सर्वविदित हैं। देश अच्छी तरह से जानता हैं कि चीनी सरकार लंबे समय  से तिब्बत से लगे भारतीय राज्य अरुणाचल प्रदेश को चीन का हिस्सा बताने का दावा करता आ रहा हैं। चीनी सरकार  भारत के अभिन्न अंग रहे अरुणाचल को चीन का हिस्सा बताने का कुत्सित और छद्म  प्रयास करती रही हैं।  ऐसे किसी भी चीनी प्रयास को  भारत सरकार हमेशा अस्वीकार करती रही हैं।  राहुल गांधी ये अच्छी तरह जानते हैं कि वे राजीव गांधी फ़ाउंडेशन को मिले चीनी चंदे के कारण, वे, चीनी सरकार और चीनी नेताओं की नाराजगी मोल नहीं ले सकते, तभी तो जहां एक ओर राहुल गांधी ने अपनी न्याय यात्रा की शुरुआत अरुणाचल से शुरू न कर मणिपुर से की है ताकि चीनी सरकार को अरुणाचल पर, विरोध के इस धर्म संकट से उबार सके एवं वही  दूसरी ओर राजीव गांधी फ़ाउंडेशन को चीनी सरकार से प्राप्त फ़ंड  के लिए अपनी कृतज्ञता प्रकट कर सके?  

इसकी बानगी, सोश्ल मीडिया "एक्स" (ट्वीटर) पर देखने को तब मिला जब चीन के आधिकारिक समाचार पत्र ग्लोबल टाइम्स के ओफिसियल ट्वीटर अकाउंट के, उस ट्वीट से मिली जिसमे चीनी राष्ट्रपति शी जिन पिंग द्वारा काँग्रेस नेता राहुल गांधी को न्याय यात्रा की शुरुआत अरुणाचल से शुरू न कर मणिपुर से शुरू करने एवं अरुणाचल पर चीनी संप्रभुता का सम्मान करने  के लिए राहुल गांधी और कॉंग्रेस का धन्यवाद ज्ञपित किया है। यध्यपि कुछ लोगो ने इस ट्वीट की जांच कर झूठा बता कर, खारिज किया है? फिर भी क्या कूट नीति का ये  तक़ाज़ा नहीं हो सकता, कि चीनी सरकार अपने  विचारों को प्रकाशित के बाद उसका  ही खंडन कर झूंठा बताने का प्रयास न कर रही हो? वे ऐसा कर,  क्या  इस कहावत को सही चरितार्थ नहीं कर रहे कि, "साँप भी मर जाय और लाठी भी न टूटे?"

काँग्रेस और राहुल गांधी सहित पूरे गांधी परिवार के मन मे चीन और चीनी सरकार के लिए हमेशा एक उदार भावना रही हैं, वे ऐसे किसी भी कार्य या मुद्दे को नहीं उठाएंगे जिसमे  चीनी सरकार की नाराजगी मोल लेने का खतरा हो?  उनकी यही नीति और उदार भावना,  हमेशा भारतियों के मन मे शंका को जन्म देती रही हैं।  एक बार पहले भी 2017 मे चीन से डोकलाम विवाद के तनाव के बीच राहुल गांधी की  चीनी राजदूतों से दबी-छुपी मुलाक़ात, विवाद का विषय रही हैं, तब भी काँग्रेस ने ऐसी किसी भी मुलाक़ात से इंकार किया था, लेकिन स्वयं चीनी दूतावास द्वारा जारी फोटो से जिसका पर्दाफाश हुआ था। गांधी परिवार और काँग्रेस का चीनी सरकार के प्रति नरम रवैया, हमेशा से  कॉंग्रेस के मूल  मे रहा हैं।  सितम्बर 2013 मे काँग्रेस सरकार के तत्कालीन रक्षा मंत्री श्री ए के एंटनी की  संसद मे इस स्पष्ट स्वीकरोक्ति को कैसे नज़रअंदाज़ किया जा सकता हैं, जिसमे उन्होने सीमावर्ती क्षेत्रों मे बुनियादी ढांचा खड़ा न करने को एक भारी चूक के रूप मे स्वीकारा था।    

तब आज क्या देश को ये जानने का हक नहीं हैं कि काँग्रेस और राहुल गांधी ने अपनी न्याय यात्रा देश के पूर्वी छोर अरुणाचल प्रदेश से क्यों शुरू नहीं की? कॉंग्रेस ये तर्क दे सकती हैं कि मणिपुर इस समय पूर्वोत्तर राज्यों मे एक ज्वलंत समस्या के रूप मे खड़ा हैं। मणिपुर  के लोग कानून-व्यवस्था  की समस्या के  समाधान की बाँट जोह रहे हैं? शायद काँग्रेस मणिपुर की समस्या को देश के सामने रखने के अपने एजेंडे पर कार्य कर रही हो? लेकिन न्याय यात्रा तो अरुणाचल से भी शुरू कर के,  मणिपुर होते हुए आगे बढ़ा सकते थे? और मणिपुर की ज्वलंत समस्या को देश के सामने ला सकते थे? बेशक कॉंग्रेस और राहुल गांधी, चीनी मुख पत्र  ग्लोबल टाइम्स के काल्पनिक या छद्म सवाल का जबाव न दे  पर काँग्रेस के युवा ह्रदय सम्राट राहुल गांधी को भारतीय राजनैतिक दलों द्वारा न्याय यात्रा की शुरुआत अरुणाचल प्रदेश से शुरू न करने के सवाल पर अपनी सफाई अवश्य प्रेषित नहीं करनी चाहिये?

विजय सहगल