रविवार, 28 जनवरी 2024

रघुकुल नन्दन श्री राम

"दशहरा/विजयदश्मी"




22 जनवरी 2024 का दिन भारत सहित दुनियाँ के हर सनातन हिन्दू के लिए एतिहासिक रूप से यादगार दिन था। जब हमारी आस्था और विश्वास के प्रतीक मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम के जन्मस्थल अयोध्या मे राम लला की प्राण प्रतिष्ठा सम्पन्न माननीय प्रधान मंत्री श्री नरेंद्र मोदी द्वारा की गयी। मुझे याद है बचपन मे राम लीला के मंचन मे एक प्रसंग के दौरान जब भगवान श्री राम माता सीता के साथ, अपने पिता स्व॰ राजा दशरथ के देहावसान पर पिंड दान के पूर्व अपने कुल पुरोहित की खोज मे उनसे अपने पूर्वजों के नाम बताने का आग्रह करते हैं, तब जिस  पुरोहित के पास रघुकुल के पूर्वजों का विवरण सही था उसी अपने कुल पुरोहित से उन्होने अपने पिता का श्राद्ध और पिंडदान संस्कार करवाया था। इसी कुल वंशावली का स्मरण ने हमे पिछले दशहरे की याद ताजा करा दी।          

24 अक्टूबर 2023 का दशहरा पिछले कई वर्षों के दशहरे से कुछ हट  कर था। यूं भी इस बार 22 अक्टूबर 2023 की दुर्गा अष्टमी का पर्व, मेरे जीवन मे एक मील का पत्थर की तरह था जिसके उत्साह और उमंग की खुमारी अब तक नहीं उतरी थी। त्योहारों के इस मौसम मे दशहरे त्योहार का अपना एक अलग महत्व होता हैं। रामलीला के मंचन के आखिरी  दिन रावण वध,  विजयदश्मी के रूप मे अच्छाई के प्रतीक भगवान राम की इस युद्ध मे विजयी और बुराई के प्रतीक रावण के अंत को दशहरे पर्व के रूप मे मनाने की परंपरा सदियों पुरानी हैं।  झाँसी शहर मे विजयदश्मी का उत्साह और उमंग तो देखते ही बनता हैं जिसे हम बचपन से देखते और महसूस करते आए हैं।

दशहरे के पान की एक ऐसी ही परंपरा का चलन बुंदेलखंड के खत्री समाज, झाँसी  मे था जिसका उल्लेख  मैंने दिनांक 14 अक्टूबर 2021 को  अपने ब्लॉग "एक विलुप्त दशहरा" के रूप किया था। किस तरह सौ साल से भी अधिक समय से चली आ रही परंपरा का अंत कुछ तो शहर के विस्तार और विकास तथा कुछ  समाज के लोगो की संकुचित मानसिकता के कारण पिछले लगभग एक-दो   दशक से बंद हो गयी थी जिसका अफसोस मै और मेरी तरह अपनी पुरातन परंपरा और सांस्कृति मे विश्वास रखने की सोच वाले कुछ लोगो को हमेशा विशेषतः दशहरा वाले दिन रह रह कर शूल की तरह चुभता  था। लेकिन 21 अक्टूबर 2023 को  अष्टमी के पूर्व कुलदेवी की पूजा के लिए आए अपने चचेरे भाई श्री हरी सहगल, जिन्हे हम लोग प्यार से हरी भैया कहते हैं, के समक्ष विजयद्श्मी पर समाज मे पान उठाने या लेने की परंपरा को एक बार पुनः एक सीमित क्षेत्र मे शुरू करने का आग्रह किया, तो उन्होने उसे सहर्ष स्वीकार कर कार्यान्वयन की रूप रेखा तैयार करने की पहल भी शुरू कर दी। मैं नहीं जानता कि हमारे पूर्वज यहाँ  कब आए लेकिन एक क्षेत्र के आसपास, अगल-बगल और आमने-सामने हमारे ही कुटुंब के बंधुओं के  निवास हैं और घरों की  बनावट और 5-6 फुट मोटी दीवार के आधार/आसार  इस बात की ओर इंगित करते हैं कि इन का निर्माण एक शतक से भी पूर्व का रहा होगा। हरी भैया का प्रभाव और व्यवहार न केवल हमारे कुटुंबियों पर अपितु समाज के विभिन्न वर्गो मे एक सम्मानीय  रूप से गणमान्य व्यक्ति का रहा हैं।

 दशहरा पर्व के प्रतीक  "पान" को हर घर से ग्रहण करने की तैयारी के  पूर्व पानी की टंकी के सीमित  क्षेत्र मे स्थित समाज के बंधुओं के एक-एक  घर मे व्यक्तिगत रूप से संपर्क कर उन से बंद हुई पान की परंपरा को एक बार फिर से शुरू करने का आग्रह दशहरे के दिन करने का आग्रह किया। किसी भी श्रेष्ठ परंपरा या परिपाटी को समाप्त, बंद करना या तोड़ना आसान हैं पर समाज के लोगो को जोड़ने की प्रथा का आरंभ, अक्सर कठिन होता हैं। भैया के संपर्क, प्रभाव और आग्रह से कुटुंब के लोगो ने एक स्वर मे अपनी सहमति दिखाई और 24 दिसंबर 2023 को रात्रि 8.30 बजे विजयदश्मी के पर्व पर पान लेने की 18-20 वर्षों से बंद, परंपरा को शुरू करने का निश्चय किया।

24 दिसम्बर 2023 को  दशहरा के पर्व को रात्रि 8.30 बजे पानी की टंकी क्षेत्र के कुटुंबियों के  सारे घरों के सदस्यों ने एकत्रित होकर हर घर मे एक-एक कर चलना शुरू किया और थाली मे रक्खे सादा पान के पत्ते को सभी सदस्यों ने एक-एक कर ग्रहण किया और उस घर के सभी सदस्यों को दशहरे की शुभ कामनाएँ प्रेषित की। जिन बुजुर्ग और वरिष्ठ जनों को उम्र संबन्धि लाचारी के चलते लंबे समय से मिल पाना संभव नहीं हुआ था, उन लोगो से दशहरे के दिन समाज के सभी लोगो ने स्नेह वंदन और चरण वंदन किया एवं नयी पीढ़ी के जिन  बच्चों से अनेक सदस्य नाम और शक्ल से परिचित नहीं थे, न केवल उनसे परिचित हुए अपितु उन बच्चों को स्नेह आशीर्वाद भी दिया और इस तरह एक दूसरे से  मिल कर शुभ कामनाएँ प्रेषित की जो इस पर्व की एक महत्वपूर्ण उपलब्धि थी।

जहां एक ओर क्षेत्र के सभी लोगो का क्रम से सभी घरों मे जा कर परिवार के सभी लोगो का अभिवादन और अभिनंदन कर खुशियों का सांझा करना दिल को प्रसन्न और आनंद को  भाव विभोर करने वाले  क्षण थे वहीं दूसरी ओर समाज की सौ साल से भी पुरानी रीतिरिवाज और परंपरा के स्वाभिमान को पुनर्जीवित और पुनर्स्थापित  करने से उपजी खुशी, सुख, आनंद के पलों के साक्षी होने और  गौरान्वित करने वाले क्षण भी थे। विजयदश्मी पर्व के मिलन कार्यक्रम के अंत मे क्षेत्र के सभी पुरुष और महिलाओं ने निवास पर एकत्रित होकर स्वल्पाहार के साथ अपने पूर्वजों का स्मरण किया। हमारे आदि पूर्वज स्व॰ मिरजू दाऊ द्वारा एक शतक पूर्व निर्मित कराये श्री राम जानकी मंदिर जिसे हम सभी "घर का मंदिर" के नाम से स्मरण करते हैं को याद किया। वंश के श्रेष्ठ और प्रसिद्ध पूर्वजों की स्मृति को आपस मे जाना-जनवाया और प्रतिवर्ष विजयदश्मी पर  ऐसे आयोजन को जारी रखने का संकल्प लिया। यहाँ इस बात का उल्लेख करना आवश्यक हैं कि ये सारे कुटुंबी जन हमारे पूर्वजों की दस पीढ़ी से भी पुरानी पीढ़ियों के सदस्य हैं। वंश वेल के नाम सहित पूर्वजों के नाम का लिखित रिकॉर्ड हमारे भाई प्रदीप सहगल के पास हैं जिसमे आज निश्चित तौर पर लगभग सौ से भी अधिक सदस्य होंगे जो देश के विभिन्न शहरों मे स्थापित हो चुके हैं। मेरा मानना है कि ऐसी वंश वेल (फॅमिली ट्री) सनातनी हिन्दू धर्म मे आम हैं जिनका अवलोकन प्रायः चारों तीर्थों यथा रामेश्वरम, जगन्नाथ पूरी, द्वारकधीश और बद्रीनाथ  के पुरोहितों के पास उपलब्ध तो रहते ही हैं और जो समय समय पर परिवार के किसी सदस्य के उस तीर्थ स्थान की यात्रा पर जाने पर आध्यतन करवाते रहते हैं। लेकिन ये परंपरा भी पिछले कुछ दशकों से तीर्थ यात्रा मे अपने कुल पुरोहितो से संपर्क न साधने से कम होता जा रहा हैं। इसलिये समय की आवश्यकता है कि हर सनातनी हिन्दू को अपने परिवार के फॅमिली ट्री को अपनी आने वाली संतानों को लिखित रूप मे सुपुर्द कर रघुकुल परंपरा को आगे बढ़ाने का कार्य करना अपना दायित्व मानना चाहिए।   

विजय सहगल                    

         


बुधवार, 17 जनवरी 2024

डूबती काँग्रेस को, शंकराचार्य का सहारा

 

"डूबती काँग्रेस को, शंकराचार्य का सहारा"





इन दिनों काँग्रेस का चारों पीठों की शंकराचार्यों के प्रति सम्मान और आदर देखते ही बनता है। सनातन धर्म के इन मठों के आचार्य प्रमुखों के प्रति श्रद्धा, सत्कार और प्रशस्ति शायद ही काँग्रेस ने कभी सार्वजनिक मंचों से व्यक्त की हो। एक प्रैस कॉन्फ्रेंस मे काँग्रेस के प्रवक्ता पवन खेड़ा ने ढोंग और पाखंड की हदें पार कर दी, जब अपने वक्तव्य के दौरान, उन्होने  जितनी बार भी "शंकराचार्य" शब्द का उच्चारण किया, हर बार उनके प्रति बगुला भक्ति भाव प्रदर्शित करने हेतु   अपने दोनों हाथों से कान को छुआ। आज जो काँग्रेसी प्रवक्ता पवन खेड़ा, अधूरे मंदिर निर्माण का आड़ लेकर सनातन धर्म मे शंकराचार्यों की सर्वोच्च सत्ता का कथन करते नहीं अघाये, क्या उन्हे याद नहीं कि काँग्रेस के सत्तासीन रहते, कांची मठ के 70 वर्षीय  शंकराचार्य स्व॰ जयेन्द्र सरस्वती को हत्या के एक झूठे मुकदमे मे तमिलनाडू पुलिस ने गिरफ्तार कर जेल भेजा था? काँग्रेस उस समय क्यों मौन थी? उन दिनों उनके साथ एक दुर्दांत अपराधी से भी वदतर व्यवहार किया गया था। विदित हो कि 11 नवंबर 2004 मे, चार पीठों मे से एक दक्षिण भारत के कर्नाटक राज्य के चिकमंगलूर जिले मे स्थित श्रेंगेरी पीठ के शंकराचार्य स्वामी जयेन्द्र सरस्वती को हत्या के एक झूठे मामले तमिलनाडू पुलिस ने हैदराबाद से गिरफ्तार किया था।  9 साल की ज़लालत भरे व्यवहार के बाद 2013 मे अदालत ने उन्हे सभी आरोपों से मुक्त कर ससम्मान रिहा किया था। यहाँ यह लिखना अतिशयोक्ति न होगी कि उस समय केंद्र मे कॉंग्रेस शासित श्री मनमोहन सिंह की सरकार थी और उन दिनों श्रीमती सोनिया गांधी की  सत्ता मे  सर्वोच्च शक्ति से कौन वाकिफ नहीं था।

कॉंग्रेस का  सनातन धर्म और हिन्दू  साधू, संतों के प्रति छद्म प्रेम, कूट आस्था और मिथ्या  विश्वास की एक बानगी और देखिये जब इन्होने संत महात्माओं के अहिंसक और लोकतान्त्रिक मांगों पर कुठराघात कर गोली चलवाई थी। सारा देश इस बात से भली-भाँति परिचित है कि श्रीमती इंद्रा गांधी की कॉंग्रेस सरकार के शासन काल मे 7 नवंबर 1966 को,  संत स्वामी  श्री करपात्री जी महाराज के नेतृत्व मे, गौ हत्या पर प्रतिबंध की मांग को लेकर संसद के बाहर प्रदर्शन कर रहे साधू संतों के ऊपर गोलियां चलवाई थी। लोगो का कहना हैं कि इस घटना मे अनेकों साधुओं की हत्या हुई थी। अपने वक्तव्य मे कोंग्रेसी प्रवक्ता ने श्रीराम मंदिर के अपने बहिष्कार को न्यायोचित ठहराते हुए, चारों पीठों के शंकरचार्यों  के उस तथाकथित वक्तव्य को उद्धृत किया कि अधूरे बने मंदिर मे भगवान की प्राण प्रतिष्ठा शास्त्र सम्मत नहीं है। आदरणीय शंकरचार्यों के तथाकथित  वक्तव्यों की  आड़ लेकर दरअसल काँग्रेस, सनातन धर्मलांबियों से,  मंदिर के बहिष्कार के अपने निर्णय से, 'मुंह छुपाने' का असफल प्रयास, ठीक उसी तरह कर रही हैं जैसे डूबते को तिनके का सहारा!! जब चारों शकरचार्यों के मनगढ़ंत वक्तव्यों पर विवाद बढ़ा  तो शृंगेरी शारदा पीठ और द्वारका शारदा पीठ की ओर से ब्यान आया कि उन के मठों से राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा के विरोध के आरोप मनगढ़ंत और झूठे हैं। कॉंग्रेस के इस आरोप, कि अधूरे मंदिर मे प्राण प्रतिष्ठा शास्त्रीय नहीं है के खंडन मे देश के अनेकों धर्माचार्यों और धर्मगुरुओं तथा मंदिर निर्माण के इंजीनियर सोमपुरा बंधुओं ने सोमनाथ मंदिर और अंबाजी मंदिर के फोटो सहित उदाहरण  देकर अयोध्या मे राम मंदिर के गर्भ गृह मे भगवान के विग्रह की प्राण प्रतिष्ठा को  शास्त्र सम्मत ठहराया है। मंदिर के शिखर पर कलश की स्थापना मंदिर की पूर्णता का प्रतीक होगा जो भविष्य मे किया जा सकता हैं।  दरअसल कॉंग्रेस की समस्या ये हैं कि सत्ता प्राप्ति हेतु यदि वे मोदी विरोध करें या धर्म सम्मत तर्क दे तो किसी को कोई आपत्ति नहीं, लेकिन येन केन प्रकारेण, सत्ता की छटपटाहट मे यदि ये मनगढ़ंत, छद्म और कुतर्क दे कर राजद्रोह, धर्मद्रोह या देशद्रोह कर सनातन धर्म के इस दिव्य और भव्य राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा कार्यक्रम मे अनावश्यक, झूठे और मनगढ़ंत  अबरोध पैदा करें  तो ये दुःखद और दुर्भाग्य पूर्ण हैं।            

यूं भी, आदि शंकराचार्य और उनके द्वारा स्थापित चार पीठों ने  अपने आपको  सनातन धर्म की शिक्षाओं और धर्मग्रंथों के चिंतन मनन और सनातन धर्म की पताका को ऊंचा रख, फैलाने, फलने फूलने तक ही सीमित रक्खा। इन पीठों ने सनातन धर्म के विचार भिन्नता और अभिमत से अपने आप को दूर रक्खा हैं। आदि शंकराचार्य ने अपने जन्म 788 विक्रमी संवत (1235 ईसा वर्ष पूर्व) से जीवन पर्यंत  भारतीय दर्शन और सनातन धर्म के धर्म ग्रन्थों, वेद, उपनिषद  आदि के भाष्य का लेखन कर  सनातन धर्म के ग्रन्थों को अक्षुण रख एक महान और सरहनीय काम किया। हिन्दू धर्म के पवित्र ग्रन्थों, वेदों, पुराण और उपनिषदों के पठन पाठन हेतु उन्होने सारे देश का भ्रमण उपरांत चार पीठों एवं सनातनी धर्मावलम्बियों हेतु चारों दिशाओं मे चार धाम यथा पूरब मे जगन्नाथ पूरी, दक्षिण मे रामेश्वरम, पश्चिम मे  द्वारका  एवं उत्तर मे बद्रीनाथ  की स्थापना की, जिन्हे प्रत्येक हिन्दू चारधाम के नाम से जनता हैं और जीवन मे एक बार इन तीरथों की यात्रा की अभिलाषा अपने मन मे रखता हैं एवं इन तीर्थों की यात्रा  करना अपना पवित्र धार्मिक कर्तव्य मानता हैं, तब काँग्रेस द्वारा चारों शंकरचार्यों का नाम लेकर अयोध्या मे राम मंदिर की प्राणप्रथिष्ठा मे हिन्दू धर्म के मानने वालों मे भ्रम फैलाने का कार्य अनैतिक और अधार्मिक हैं, जो निंदनीय भी हैं। आज आवश्यकता, इस बात की हैं कि इन ऐतिहासिक क्षणों को सारे देश वासियों के साथ जाति, धर्म और प्रांत से परे सभी  राजनैतिक दलों को  उत्साह, उमंग और हर्षोल्लास के साथ शांति पूर्वक मनाना चाहिये।

जय श्री राम।

विजय सहगल

सोमवार, 15 जनवरी 2024

पोंगल शुभाकांक्षलु, (పొంగల్ శుభాకాంక్షలు మరియు శుభాకాంక్షలు)

 

पोंगल शुभाकांक्षलु, (పొంగల్ శుభాకాంక్షలు మరియు శుభాకాంక్షలు)

हैदराबाद मे अंतराष्ट्रीय पतंग और मिष्ठन उत्सव की धूम










इन दिनों पूरे भारत मे रवि फसल के आगमन पर मकर संक्रांति पर्व मनाया जा रहा हैं। देश के विभिन्न भागों मे इस पर्व को अलग अलग नाम से पुकारा जाता हैं जो कि रवि फसल अच्छे धन-धान्य पर ईश्वर के प्रति धन्यवाद ज्ञापित करने का उत्सव है। पंजाब मे इसे लोहड़ी, उत्तर भारत मे संक्रांति या मकर संक्रांति, पूर्वोत्तर मे विहु, दक्षिण मे पोंगल, भोगी पोंगल और उत्तरायणी नामों से पुकारते हैं। इस उत्सव मे विभिन्न प्रान्तों के अपने पारंपरिक रीतिरिवाज और परिधानों के साथ स्थानीय  सांस्कृति के दर्शन स्पष्ट रूप से दिखाई देते हैं। जनवरी 14 एवं 15 2024 को,  3 दिन तक चलने वाले इस सामाजिक उत्सव पोंगल या संक्रांति के साथ हैदराबाद के  पतंग और मिष्ठान उत्सव मे शामिल होने और उसे करीब से देखने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।

पोंगल के पूर्व भगवान शिव के वाहन नंदी को  विभिन्न रंग-बिरंगी पोषकों मे सजा कर मेढक जिले से आये दो आदिवासी युवा रामूजी, और राजू के साथ जा रहे बैलों से हुई। अपने परंपरागत वस्त्रों मे सुसज्जित बैलों को देखना एक दिव्य अनुभूति देने  वाला था, साथ ही दोनों युवाओं द्वारा वध्य यंत्र वीणा (बीन) या शहनाई पर लोक गीत और लोक संगीत की ध्वनि मन को मोहने वाली थी। इन दोनों युवाओं के बीन पर लोक संगीत की धुन और "मालेष" तथा  "लक्ष्मण" नाम के बैलों के पैरों मे बंधे घुंघरू संगीत की ऐसी मधुर स्वर लहरियाँ सुना रहीं थी कि मानों किसी दिव्य लोक मे विचरण कर रहे हों।

यूं तो दक्षिण भारत मे शुभ-मंगल के प्रतीक के रूप मे हर घर मे रोज ही रंगोली  बनायी जाती हैं पर आज विशेष अवसर संक्रांति या पोंगल के अवकाश के कारण भी  लोगो मे एक अतिरिक्त  उत्साह था। आज संक्रांति के दिन 15 जनवरी 2024 को अपने आवास के चारों तरफ, लगभग एक  घंटे, निरुद्देश्य भ्रमण के दौरान मैंने देखा, लगभग हर घर या हाउसिंग सोसाइटी के सामने हल्दी के पीले पानी से साफ-सफाई की जा रही थी। मुझे लगता हैं कि पुराने जमाने मे गाँव-कस्बों के कच्चे मिट्टी के घरों मे, किसी भी तीज-त्योहार या धार्मिक उत्सवों  के पूर्व घरों को गाय के गोबर से लिपाई पुताई का स्थान अब शहरों मे हल्दी के पानी से साफ-सफाई ने ले लिया हैं। हल्दी का पीला रंग गाय के गोबर से जमीन को लीपने का आभास जो देता हैं। इस पीले रंग की पृष्ठभूमि पर  सुंदर-सुंदर रंगोली बनायी गयी थी। कुछ जगह रंगोली सिर्फ चावल के आटे से सफ़ेद रंग मे लाइनों की ज्योमिति आकार और कुछ जगह  बिन्दुओं की सहायता से वृत्ताकार, अर्ध वृत्ताकार, चौकोर या वर्गाकार रूप मे बनायी गयी थी। इन आकृतियों को देख कर रेखा गणित की याद हो आना लाज़मी था। लेकिन अधिकतर घरों मे पोंगल के त्योहार के कारण, एक से एक सुंदर रंग बिरंगी रंगोली बनायी जा रही थी। इन रंगोलियों के विषय प्रायः फल, फूल, पत्तियाँ, पक्षी तो थे ही पर अनेकों जगह पतंग की रंगोली ने मन मोह लिया। हर घरों की महिलाएं और बच्चे इस रंगोली बनाने मे मशगूल थे। लगभग हर रंगोली के मध्य मे गाय के गोबर से विषम संख्या मे छोटे छोटे त्रिभुजाकार आकृति रक्खी गयी थी जिनमे घास के तिनकों को रोपा गया था। लोगो ने बताया कि ये तिनके और गोबर की आकृति घरों मे नकारात्मक शक्तियों के प्रवेश को रोकने की प्रतीक हैं। एक हाउसिंग सोसाइटी मे महिलाएं पारंपरिक लकड़ी के चूल्हे मे आग की स्थापना कर पीतल की भगौनी मे रक्खे दूध को समूहिक रूप से स्थापित कर रही हैं। उन लोगो के कथानुसार पोंगल के इस शुभावसर पर पवित्र अग्नि को चूल्हे मे प्रज्वलित कर वे चावल की खीर बना रहे हैं जिसका प्रसाद सभी लोगो को ईश्वर के आशीर्वाद के रूप मे वितरित किया जाएगा।      

मकर संक्रांति पर देश के अनेक हिस्सों मे त्योहार के परंपरागत रीतिरिवाज के अतिरिक्त पतंग उड़ाने की परंपरा हैं। अहमदाबाद, दिल्ली के अतिरिक्त  हैदराबाद, बेंगलुरु और अन्य स्थानों पर भी ये परंपरा है। हैदराबाद मे भी इन दिनों दो दिवसीय अंतर्राष्ट्रीय पतंग और मिष्ठान उत्सव की शुरुआत हुई। इस पतंग और मिष्ठन उत्सव ने मुझे भी आकर्षित किया जिसके वशीभूत मैंने भी हाइटेक सिटी मेट्रो स्टेशन से परेड ग्राउंड तक, हैदराबाद की मैट्रो मे बैठ कर अपने दिल्ली प्रवास मे, दिल्ली मैट्रो की यादें ताज़ा कीं। सौभाग्य से दोनों ही मैट्रो ब्लू लाइन की थी पर मेट्रो  ट्रेन मे इतनी कम भीड़ देख कर अनुमान लगाना कठिन न था कि यहाँ की मैट्रो लाइन को शायद "हैदराबाद की लाइफ लाइन" बनने मे अभी काफी लंबा फ़ासला तय करना पड़ेगा?

परेड ग्राउंड पर तो मानों पतंगो की बाढ़ आयी लगती दिखी। जितने मानव सिर मुंड दूर दूर तक दिखाई दिये उनसे भी ज्यादा पतंगे आसमान पर जहां दिखाई दे रही थी। रेलि-पटरी पर जगह जगह पतंगों की बिक्री, मांजे और सादा धागों की चर्खियाँ ऐसी याद दिला रहे थे जैसे दिल्ली के पहाड़ गंज या  कॅनाट प्लेस मे  चाट-पकौड़ी के खोमचे दिखाई देते हों। लोगो, विशेषकर बच्चों मे पतंग का जबर्दस्त क्रेज़ था। लेकिन उम्मीद के परे फुटकर बिक्री मे पतंगों का रूप रंग परंपरागत पतंगों जैसा ही था। बस अंतर ये था कि पुरानी पतंगे कागज की थी और आज उसकी जगह प्लास्टिक और पन्नी ने ले ली। परेड ग्राउंड के एक सिरे पर चारों तरफ लोहे की जालियों से घेर कर बहुत बड़े क्षेत्र को घेरा गया था, जिसमे सामान्य जनता का प्रवेश वर्जित था। इस ग्राउंड मे देश विदेश से आये पतंगबाजों को उनकी अद्भुद और अनोखी पतंगों के प्रदर्शन हेतु आरक्षित रक्खा गया था जो कि इस उत्सव के आकर्षण का मुख्य केंद्र था। जाली के चारों ओर हजारों  की  संख्या मे दर्शक विभिन्न आकार और भांति-भांति की रचना, बनावट की पतंगों का प्रदर्शन को देख रहे थे। पैराशूट के आकार की एक रंग बिरंगी पतंग जिसके बीच मे बड़ा छेद था और जिसको सम्हालने के लिये 6-8 लोग लगे थे आकर्षण का मुख्य केंद्र लगी। काले वनमानुष की आकृति वाली पतंग भी लोगो विशेषकर बच्चों को लुभा रही थी। कोबरा, ऑक्टोपस, मोटू हाथी, मिक्की, डोनाल्ड डक और डोरेमेन जैसे मिलते जुलते पात्रो की पतंगों को देख बच्चे ज्यादा रोमांचित थे। इन सबसे अलग नीले आकाश मे हनुमान की मुद्रा मे हाथ जोड़े रंग बिरंगी पतंग सभी के आकर्षण का केंद्र थी। एक पतंग उपर या नीचे जाते उड़ती कम पर सरसराहट के साथ आवाज ज्यादा निकाल रही थी। तीन पतंगों को  एक साथ उड़ता देख मुझे अपने बचपन की याद हो आयी जब मैंने पाँच पतंगों को एक साथ बांध कर उड़ाया था।

अब तक चलते चलते काफी देर हो चुकी थी और धूप की चुभन भी अधिक थी तब कदम स्वतः ही ऊर्जा की चाह और पंडाल की छाँव के लिये मिष्ठन उत्सव के पंडाल की ओर बड़े जहां सैकड़ों की संख्या मे पंडाल लगे थे जिन पर विभिन्न तरह के मिष्ठन की प्रदर्शनी और बिक्री हो रही थी। पंजाब की लस्सी, बंगाल का छैना, दिल्ली की बालूशाही, यूपी गुजिया, इमारती और जलेबी को देख के दिल तो ललचाया पर शुगर और डाईबीटीज़  इस की इजाजत नहीं दे रहे थे पर फिर भी मन से विद्रोह कर आखिर हमने गुजिया और ड्राइ फ्रूट लड्डू और आमरस मिठाई का रसास्वादन किया आखिर ऊर्जा तो लेने ही थी।

इस तरह हैदराबाद का मकर संक्रांति, पोंगल उत्सव मेरी सुंदर और सुखद स्मृतियों मे सादा के लिये अंकित हो गया।

विजय सहगल   

 

    

शुक्रवार, 12 जनवरी 2024

राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा और कॉंग्रेस का बहिष्कार

 

"राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा और कॉंग्रेस का बहिष्कार!!"





इन दिनों सारे देश मे अयोध्या मे भगवान श्री राम के मंदिर के उद्घाटन और भगवान के बाल रूप  के विग्रह की प्राण प्रतिष्ठा की चर्चायेँ चारों ओर सुनाई और दिखाई दे रही हैं मानों  सारा देश राम मय हो गया हो। हो भी क्यों न 500 साल के लंबे संघर्ष के बाद 22 जनवरी 2024 को वो दिन आया है जब भगवान श्री राम अपनी जन्मभूमि मे अपने भव्य और दिव्य मंदिर  मे प्रतिष्ठित होंगे। इस दिन सारे देश मे हर्षोल्लास के बीच एक बार फिर दीपावली जैसा आयोजन होगा जैसे त्रेता युग मे वनवास के उपरांत भगवान श्रीराम अपनी भार्या माता जानकी और  अपने अनन्य भक्त श्री हनुमान के साथ अयोध्या पधारे थे। उन दिनों अयोध्या वासियों को श्री राम के स्वागत के लिये किसी ने आमंत्रित नहीं किया था अपितु ये आमंत्रण स्वस्फ़ूर्त था, कुछ ऐसी ही स्वांतः सुखाय, स्वस्फ़ूर्त भावनाएं देश के आम जनमानस के मन मे आजकल  उमड़ रहीं है जिसकी परिणति 22 जनवरी 2024 को देखने को मिलेगी।

खेद और अफसोस है कि काँग्रेस का आज इस कार्यक्रम मे शामिल न होने और इस कार्यक्रम का बहिष्कार करने का निर्णय बेहद ही दुर्भाग्यपूर्ण हैं। अयोध्या मे 22 जनवरी 2024 को श्री राम मंदिर के प्राण प्रतिष्ठा कार्यक्रम मे कॉंग्रेस नेत्री श्रीमती सोनिया गांधी, काँग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खडगे एवं अधीर रंजन के  बॉयकॉट ने थोड़ा चौंकाया जरूर पर कोई आश्चर्य नहीं हुआ, क्योंकि काँग्रेस ने  तो सदा से ही देश के बहुसंख्यक हिन्दू और सनातन धर्मलाम्बियों के  विरोध मे कोई कोर कसर नहीं छोड़ी, जिसकी परिणति,  काँग्रेस का सुप्रीम कोर्ट मे वह शपथ पत्र हैं जिसमे उसने भगवान राम को एक काल्पनिक पात्र बताया था।      

लेकिन देश के इस ऐतिहासिक मंगल और पवित्र अवसर पर भी कुछ विघ्नसंतोषी राजनैतिक दल के महारथी, अपने संकुचित और पूर्वाग्रही सोच के चलते, क्षुद्र राजनीति करने से बाज नहीं आए। श्री राम मंदिर के शुभारंभ अवसर पर आयोजन समिति के  आमंत्रण को लेकर अपनी कुटिल राजनीति शुरू कर दी। जब तक आमंत्रण पत्रिका नहीं मिली थी, तब इन लोगो ने  घड़ियाली आँसू बहा कर बुलावा न आने का उलाहना देते  रहे और जब निमंत्रण पत्र प्राप्त हो गया तो अपने कुत्सित राजनैतिक स्वार्थों के वशीभूत कार्यक्रम से किनारा करने की तरकीबें ढूंढने मे लगे हैं। अगर इन आर्यश्रेष्ठों के दिलों मे स्वराष्ट्र,  स्वधर्म और स्वाभिमान की लेश मात्र भी भावनाएं होती तो, बिना किसी आमंत्रण के इस यज्ञाहूति मे अपने कर्तव्यों के समर्पण का बोध कराने हेतु सदा  तत्पर रहते? देश मे होने वाले राष्ट्रीय पर्वों, महापर्वों और सांस्कृतिक क्रियाकलापों यथा पवित्र तीर्थ यात्राओं, पूर्ण कुम्भ और अर्ध कुंभों के पवित्र स्नानों पर कौन किसको आमंत्रण देता हैं? इसके बावजूद भी ऐसे धार्मिक अवसरों पर बिना किसी आमंत्रण और निमंत्रण के सनातन धर्मी अपना धार्मिक दायित्व समझ,  देश के दूर-दराज़ स्थित गाँव, कस्बों, शहरों और महानगरों से करोड़ो करोड़ लोग पवित्र तीर्थ स्थलों पर एकत्रित होकर धर्मलाभ कैसे  लेते।                      

देश की सबसे पुरानी राजनैतिक पार्टी काँग्रेस जिसकी बुनियाद  "गांधी के रामराज्य" की कल्पना से प्रेरित रही, कैसे राममन्दिर के राह मे, काँग्रेस ने हमेशा कोर्ट कचहरियों मे कानूनी  रोड़े अटकाये और अबरोध खड़े किये जिससे सारा देश वाकिफ है। स्वतन्त्रता के बाद से दशकों तक देश पर शासन करने वाली पार्टी काँग्रेस ने तुष्टि करण और हर स्तर पर कुशासन और अराजकता के चलते  देश के बहुसंख्यक समाज को हमेशा दोयम दर्जे के  नागरिक की तरह व्यवहार किया जिसका नतीजा आज उसे भुगतना पड़ रहा है। काँग्रेस के दिग्विजय सिंह अपनी अनर्गल और असंयत वक्तव्यों के चलते राम मंदिर के विग्रहों पर सवाल उठा कर असहजता और अनिश्चितता फैलाने का प्रयास कर रहे हैं। काँग्रेस के एक नेता बी के हरिप्रसाद ने तो बीजेपी पर राममन्दिर के उद्घाटन के पूर्व दंगों की आशंका व्यक्त कर दी? उनकी सूचना के इस गंभीर  आधार की जांच सरकार को करानी चाहिये? कहीं ये भी तो मंदिर की प्राण प्रतिष्ठिता के पूर्व अशांति फैलाने का एक घिनौना प्रयास तो नहीं है? 

इंडि गठबंधन के सारे दल और उनके अपरिपक्व नेता अपने बचकाने वक्तव्यों से सनातन धर्म आपत्तीजनक आरोप लगा कर राममन्दिर के इस पवित्र कार्यक्रम मे विघ्न डालने का कुप्रयास कर रहे हैं। कभी वे हिन्दू धर्म को धोखा बतला कर  और कभी ",मंदिर का मतलब मानसिक गुलामी का मार्ग बतला" कर अपनी मूढ़ता और अज्ञानता का परिचय दे कर देश के माहौल को खराब करने का कुत्सित प्रयास कर रहे हैं। सारी दुनियाँ और देश से अपनी वजूद की लड़ाई लड़ने वाले वामपंथी दलों के सूरमा, छद्म धर्मनिरपेक्षता और  तुष्टीकरण के चलते अपने चेहरों पर नकली नकाब ओढ़ कर श्री राम मंदिर के शुभारंभ पर बहुसंख्यकों के इस बड़े सांस्कृतिक और धार्मिक समारोह से दूरी बनाकर क्या उनका अनादर नहीं कर रहे? क्या विभिन्न धर्मावलम्बियों मे इस तरह की भेद-भाव पूर्ण नीति भारतीय लोकतान्त्रिक नीतियों के अनुरूप है?

एनसीपी का एक मंदबुद्धि नेता हिंदुओं की भावनाओं को आहत कर उन्हे मांसाहारी बतलाने की असमय, अपवित्र कोशिश कर रहा हैं। अधम और घृणास्पद  सोच का धनी ये एनसीपी नेता अपने आप को कृषि वैज्ञानिक मान अपने कुतर्कों से सिद्ध करने का यह प्रयास किया कि राम के वनवास के समय चावल पैदा ही नहीं होते थे? शायद इस अज्ञानी ने सनातन धर्म के सभी क्रिया कलापों और संस्कारों मे कदम कदम पर मस्तक पर चन्दन और अक्षत से तिलक करने  के उल्लेख के बारे मे कुछ पढ़ा होता तो सनातन धर्म को आहत करने के  इस तरह के कुप्रयास न किये होते।

हैदराबाद संसदीय सीट से यूं तो एआईएमआइएम के प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी हैं जो  स्वयं  कानून के एक विख्यात वैरिस्टर हैं लेकिन सुप्रीम कोर्ट की पाँच जजों की एकमत से  सबूतों और गवाहों के आधार मे मंदिर के पक्ष मे निर्णय दिये जाने के बावजूद, मुस्लिम युवाओं को निर्णय के खिलाफ भड़काने का कोई मौका नहीं छोड़ते। लेकिन सूचना विज्ञान के इस युग मे पढ़ी लिखे कम्प्युटर सेवी मुस्लिम  युवा उनके झांसे मे अब आने वाले नहीं हैं।

स्वामी प्रसाद मौर्य जैसे नेता, जो रामचरित मानस की एक चौपाई/छंद  को लिखने की बात तो दूर उसे बिना किसी त्रुटि के ठीक से पढ़ भी ने सके वो विक्षिप्त चित्त मानसिकता और नकारात्मक सोच का धनी नेता, गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा रचित रामचरित मानस की चौपाई मे संशोधन करने  का अनर्गल आग्रह करता है!! मै नहीं जनता स्वामी प्रसाद  किस धर्म या संप्रदाय को मानते है? लेकिन एक बात सूरज की तरह सत्य हैं कि जब वे सनातन हिन्दू धर्म के "सत्व" और "मर्म" को  इस जीवन मे नहीं समझ सके तो अन्य धर्मों के "सारांश" या "सार" को अपने इस शेष, अल्प  जीवन मे तो क्या समझ पाएंगे?    

आशा की जानी चाहिये कि भारत की सनातनी सांस्कृति, सभ्यता  और देश की अस्मिता के प्रतीक भगवान राम के मंदिर की प्राण प्रतिष्ठिता के इस पवित्र और भव्य कार्यक्रम मे राजनैतिक, धार्मिक और जाति भेद से परे सारे देश को एक साथ खड़े होंगे। यदि इसके बावजूद ये राजनैतिक दल अपनी अधम सोच से बाज नहीं आये तो देश की 140 करोड़ जनता आने वाले 2024 के चुनावों मे इन्हे ऐसा सबक सिखायेगी, जिसकी सीख उन्हे दशकों तक याद रहेगी।

विजय सहगल   

शनिवार, 6 जनवरी 2024

अडानी समूह पर सुप्रीम फैसला

 

"अडानी समूह पर सुप्रीम फैसला"





ये अनैतिकता की पराकाष्ठा ही कही जायेगी कि ये जानते हुए भी, राहुल गांधी और काँग्रेस ने अपनी न समझी और अज्ञानता के वशीभूत अमेरिका की कंपनी हिडनबर्ग की जनवरी 2023 की उस छद्म और झूठी रिपोर्ट पर विश्वास कर अपने ही देश के एक बहुत बड़े औद्योगिक घराने, अडानी समूह पर शेयर मूल्यों मे हेराफेरी का  अनर्गल आरोप लगा कर न केवल अडानी समूह अपितु इस समूह मे निवेशित  साधारण शेयर निवेशकों  को भारी आर्थिक नुकसान पहुंचाया। देश के विरुद्ध मौद्रिक षड्यंत्र मे  जिस अमेरिकन कंपनी हिडन बर्ग ने देश के आर्थिक तंत्र को तहस-नहस करने के प्रयास किया, उसकी निजी स्वार्थ और निजी  लाभ हेतु बदनियती, कुत्सित  स्वार्थ और घिनौनी साज़िश को तो समझा जा सकता हैं पर उसमे काँग्रेस और  राहुल गांधी की सहभागिता अत्यंत दुर्भाग्य पूर्ण रही। अमेरिकन कंपनी हिडन बर्ग की विश्वसनीयता सारी दुनियाँ मे संदिग्ध और संदेहास्पद रही हैं। इस कंपनी का मुख्य ध्येय ही दुनियाँ के शेयर मार्केट मे लिस्टिड कंपनीयों की बारे मे छिद्रान्वेषण कर ब्लैकमेलिंग करना हैं। शेयर बाज़ार के बारे मे थोड़ी-बहुत जानकारी रखने वाले जानकार इस बात से अच्छी तरह बकिफ होंगे कि ये हिडन बर्ग कंपनी अनेकों बार दुनियाँ की तमाम कंपनीयों के बारे मे झूठी रिपोर्ट प्रकाशित करने के पूर्व कंपनी के शेयर्स की शॉर्ट सेल्लिंग कर मुनाफा कमाती रही हैं। इस कंपनी ने अडानी समूह की कंपनीयों के साथ भी इसी षड्यंत्र कारी नीतियों का उपयोग कर षड्यंत्र पूर्वक करोड़ो रुपए कमाये। एक बाहरी, विदेशी कंपनी,  हिडन बर्ग के दुर्भावनापूर्ण आरोपों से तो  एक बार निपटा जा सकता था, पर बदनीयत से प्रेरित इस कूट षड्यंत्र मे काँग्रेस पार्टी की सहभागिता से ये संकट गहरा हो गया जिसमे देश के लाखों, छोटे निवेशकों को भरी नुकसान हुआ।  हमारे देश की इस कहावत कि "घर का भेदी लंका ढ़ावे" को काँग्रेस ने सही से चरितार्थ कर दिया!! यूं भी किसी शायर ने क्या खूब लिखा हैं-:

"मुझे अपनों ने मारा, गैरों मे कहाँ दम था।"

"मेरी कश्ती वहाँ डूबी, जहां पानी बहुत कम था॥"

 

जनवरी 2023 से कल तक, काँग्रेस और राहुलगांधी ने अपने राजनैतिक हित लाभ के लिए देश और दुनियाँ के हर मंच और हर चुनावी सभाओं मे ने केवल अडानी समूह पर मन गढ़ंत और झूठे  आरोप लगाये अपितु नरेंद्र मोदी सरकार को अप्रत्यक्ष रूप से इस समूह की सहायता और संलिप्तता के कुटिल और दुर्भावनापूर्ण आरोप लगाये। लगभग एक साल से देश और दुनियाँ मे अडानी समूह और देश को बदनाम करने वाले कॉंग्रेस के इस कूटप्रबंध पर अंततः 3 जनवरी 2024 को माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने अडानी समूह-हिडन बर्ग केस मे आगे कोई भी एसआईटी, सीबीआई या किसी भी अन्य ऐजन्सि से जांच कराने से साफ इंकार कर दूध का दूध और पानी का पानी कर दिया। देश का सबसे पुराने राजनैतिक दल के शीर्ष नेतृत्व द्वारा देश के औद्योगिक समूहों के विरुद्ध इस तरह के गैर जिम्मेदारा आचरण ने, न केवल दुनियाँ मे देश की छवि को आहत किया अपितु स्वयं काँग्रेस और राहुल गांधी के बहुत अहित किया। सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने शेयर मार्केट को नियंत्रित करने वाली एजन्सि सेबी के प्रति न केवल विश्वास जताते हुए, हिडन बर्ग के 24 आरोपों मे से 22 आरोपों पर सेबी की रिपोर्ट को सही माना अपितु  शेष दो मामलों की रिपोर्ट को भी तीन माह के अंदर निपटाने का आदेश दे, अडानी समूह को कानून के उल्लंघन से इंकार कार क्लीन चिट देते हुए किसी भी गड़बड़ी या हेराफेरी से इंकार किया।

एक ऐसी कंपनी जिसकी बुनियाद ही दुनियाँ के शेयर मार्केट मे कंपनियों की छद्म रिपोर्ट तैयार कर पैसा कमाना हैं। कैसे, काँग्रेस जैसी राजनैतिक पार्टी के अपरिपक्व नेता, झूठी और संदिग्ध रिपोर्ट के आधार पर  देश के आर्थिक ढांचे को तहसनहस करने के प्रयास मे शामिल हो सकते  हैं?

अडानी समूह के प्रमुख गौतम अडानी द्वारा एक साल की  ज़लालत, अपमान  और तिरस्कार के बाद,  अपने ट्वीटर एकाउंट पर, सुप्रीम कोर्ट के फैसले का स्वागत करते हुए "सत्य मेव जयते" लिख अपनी यथार्थ भावनाओ को उद्धृत किया जो समीचीन हैं। पर काँग्रेस के एक वरिष्ठ और बुद्धिजीवी नेता जय राम रमेश का प्रत्युत्तर ट्वीट अत्यंत खेद जनक और दुर्भाग्य पूर्ण है। उन्होने सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर ही सवाल खड़े करते हुए लिखा है कि "व्यवस्था से छेड़छाड़ करने वाले लोगों को "सत्यमेव जयते" बोलते हुए, सुनते हैं तो, सच हज़ार बार मरता है"। काँग्रेस और राहुल गांधी द्वारा, अडानी समूह को, अपने झूठे और अनर्गल आरोपों से, एक साल तक संकट मे डालने वाले आरोपों पर प्रायश्चित करना तो दूर, सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर प्रश्न खड़ा करना, क्या सरासर "चोरी और सीना जोरी" नहीं है?

औद्योगिक क्रांति के माध्यम से रोजगार देने का दम भरने वाली कॉंग्रेस के राहुल गांधी ने पिछले एक दशक मे  औद्योगिक घरानों और कंपनीयों से पूर्वाग्रह रखने मे कोई कोर कसर नहीं छोड़ी। 2014 मे सत्ता गँवाने के बाद से राहुल गांधी ने हर सभा, हर मंच पर देश के दो औद्योगिक समूहों, अडानी और अंबानी पर देश का पैसा लूट कर अपनी जेब मे डालने के अनेकों आरोप लगाये। राहुल गांधी के, लूट के पैसे को अडानी की जेब मे डाले जानी वाली धनराशि,  समय, स्थान और उनकी याददाश्त  के अनुरूप अनेकों बार  बदलती रही।   पश्चिमी बंगाल मे कभी ऐसे ही आरोप लगा, टाटा कंपनी को भी नीचा दिखाने के प्रयास कर, सिंगूर से टाटा नैनो कार के कारखाने को बंद  कर, सिंगूर के स्थानीय लोगो को रोजगार और विकास के अवसरों से वंचित कर ममता सरकार ने क्या हांसिल किया था? सारा देश इस घटना को  जानता हैं। देश मे औद्योगिक जगत मे हताशा और निराशा का वातावरण उत्पन्न कर कैसे देश मे औद्योगिक क्रांति लायी जा सकती हैं? आज अडानी या अंबानी अपने सारे कारखाने, संस्थान या कारोबार को यदि  समाप्त कर दे, तो उनका तो शायद कुछ न बिगड़े लेकिन इन कारखानों, फैक्ट्रियों के बंद होने से देश के करोड़ो युवाओं, नौजवानों और स्थानीय  लोगों को  प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से रोजगार के कितने अवसरों से वंचित होना पड़ेगा, देश के आर्थिक विकास कितना  नुकसान पहुंचेगा, इसकी भयावह कल्पना ही की जा सकती है?

देश के छोटे, मँझोले और बड़े  उद्धोगपतियों और औद्योगिक समूहों का देश के आर्थिक विकास मे महतवपूर्ण योगदान हैं। आज आवश्यकता इस बात की हैं कि देश के औद्योगिक नीतियों और धंधों को दशकों से शासन की लाल फ़ीताशाही और नौकरशाही के चंगुल से मुक्त करा, देश मे  सरल, सहज और मित्रवत औद्योगिक नीतियाँ बनाने की, ताकि देश मे व्यापारिक और औद्योगिक क्रांति लायी जा सके।  इसके लिए आवश्यक है कि राजनैतिक दल भी देश के उदद्योग धंधों, व्यापारिक संस्थानों और कलकारखानों के मालिकों को भी सम्मान और प्रतिष्ठा की  दृष्टि से देखेँ!! बैसे ही  इन व्यापारिक संस्थानों से  भी अपेक्षा की जाती है के वे देश के क़ानूनों का कड़ाई से पालन, सच्चाई और ईमानदारी से करें। आशा की जानी चाहिये कि सुप्रीम कोर्ट का ये फैसला  अडानी-हिंडन  बर्ग के मामले मे सेबी के स्टैंड को सही ठहराते हुए ईमानदारी, कानून सम्मत एवं  नियम पूर्वक व्यापार करने वाले संस्थानों को कानूनी संरक्षण और सुरक्षा प्रदान कर, एक नई दिशा दिखाएगा।          

 

विजय सहगल