"दशहरा/विजयदश्मी"
22 जनवरी 2024 का दिन भारत सहित दुनियाँ के हर
सनातन हिन्दू के लिए एतिहासिक रूप से यादगार दिन था। जब हमारी आस्था और विश्वास के
प्रतीक मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम के जन्मस्थल अयोध्या मे राम लला की प्राण
प्रतिष्ठा सम्पन्न माननीय प्रधान मंत्री श्री नरेंद्र मोदी द्वारा की गयी। मुझे याद
है बचपन मे राम लीला के मंचन मे एक प्रसंग के दौरान जब भगवान श्री राम माता सीता के
साथ, अपने पिता स्व॰ राजा दशरथ के देहावसान पर पिंड
दान के पूर्व अपने कुल पुरोहित की खोज मे उनसे अपने पूर्वजों के नाम बताने का आग्रह
करते हैं, तब जिस पुरोहित के पास रघुकुल के पूर्वजों का विवरण सही
था उसी अपने कुल पुरोहित से उन्होने अपने पिता का श्राद्ध और पिंडदान संस्कार करवाया
था। इसी कुल वंशावली का स्मरण ने हमे पिछले दशहरे की याद ताजा करा दी।
24 अक्टूबर 2023 का दशहरा पिछले कई वर्षों
के दशहरे से कुछ हट कर था। यूं भी इस बार
22 अक्टूबर 2023 की दुर्गा अष्टमी का पर्व,
मेरे जीवन मे एक मील का पत्थर की तरह था जिसके उत्साह और उमंग की खुमारी अब तक
नहीं उतरी थी। त्योहारों के इस मौसम मे दशहरे त्योहार का अपना एक अलग महत्व होता
हैं। रामलीला के मंचन के आखिरी दिन रावण
वध,
विजयदश्मी के रूप मे अच्छाई के प्रतीक भगवान राम की इस युद्ध मे विजयी और
बुराई के प्रतीक रावण के अंत को दशहरे पर्व के रूप मे मनाने की परंपरा सदियों
पुरानी हैं। झाँसी शहर मे विजयदश्मी का
उत्साह और उमंग तो देखते ही बनता हैं जिसे हम बचपन से देखते और महसूस करते आए हैं।
दशहरे के पान की एक ऐसी ही परंपरा का चलन
बुंदेलखंड के खत्री समाज, झाँसी मे था जिसका उल्लेख मैंने दिनांक 14 अक्टूबर 2021 को अपने ब्लॉग "एक विलुप्त दशहरा" के
रूप किया था। किस तरह सौ साल से भी अधिक समय से चली आ रही परंपरा का अंत कुछ तो शहर
के विस्तार और विकास तथा कुछ समाज के
लोगो की संकुचित मानसिकता के कारण पिछले लगभग एक-दो
दशक से बंद हो गयी थी जिसका अफसोस मै और मेरी
तरह अपनी पुरातन परंपरा और सांस्कृति मे विश्वास रखने की सोच वाले कुछ लोगो को
हमेशा विशेषतः दशहरा वाले दिन रह रह कर शूल की तरह चुभता था। लेकिन 21 अक्टूबर 2023 को अष्टमी के पूर्व कुलदेवी की पूजा के लिए आए
अपने चचेरे भाई श्री हरी सहगल, जिन्हे हम लोग
प्यार से हरी भैया कहते हैं, के समक्ष
विजयद्श्मी पर समाज मे पान उठाने या लेने की परंपरा को एक बार पुनः एक सीमित
क्षेत्र मे शुरू करने का आग्रह किया,
तो उन्होने उसे सहर्ष स्वीकार कर कार्यान्वयन की रूप रेखा तैयार करने की पहल भी
शुरू कर दी। मैं नहीं जानता कि हमारे पूर्वज यहाँ
कब आए लेकिन एक क्षेत्र के आसपास,
अगल-बगल और आमने-सामने हमारे ही कुटुंब के बंधुओं के निवास हैं और घरों की बनावट और 5-6 फुट
मोटी दीवार के आधार/आसार इस बात की ओर
इंगित करते हैं कि इन का निर्माण एक शतक से भी पूर्व का रहा होगा। हरी भैया का
प्रभाव और व्यवहार न केवल हमारे कुटुंबियों पर अपितु समाज के विभिन्न वर्गो मे एक सम्मानीय
रूप से गणमान्य व्यक्ति का रहा हैं।
दशहरा
पर्व के प्रतीक "पान" को हर घर
से ग्रहण करने की तैयारी के पूर्व पानी की
टंकी के सीमित क्षेत्र मे स्थित समाज के
बंधुओं के एक-एक घर मे व्यक्तिगत रूप से
संपर्क कर उन से बंद हुई पान की परंपरा को एक बार फिर से शुरू करने का आग्रह दशहरे
के दिन करने का आग्रह किया। किसी भी श्रेष्ठ परंपरा या परिपाटी को समाप्त,
बंद करना या तोड़ना आसान हैं पर समाज के लोगो को जोड़ने की प्रथा का आरंभ,
अक्सर कठिन होता हैं। भैया के संपर्क,
प्रभाव और आग्रह से कुटुंब के लोगो ने एक स्वर मे अपनी सहमति दिखाई और 24 दिसंबर
2023 को रात्रि 8.30 बजे विजयदश्मी के पर्व पर पान लेने की 18-20 वर्षों से बंद,
परंपरा को शुरू करने का निश्चय किया।
24 दिसम्बर 2023 को दशहरा के पर्व को रात्रि 8.30 बजे पानी की टंकी
क्षेत्र के कुटुंबियों के सारे घरों के
सदस्यों ने एकत्रित होकर हर घर मे एक-एक कर चलना शुरू किया और थाली मे रक्खे सादा
पान के पत्ते को सभी सदस्यों ने एक-एक कर ग्रहण किया और उस घर के सभी सदस्यों को
दशहरे की शुभ कामनाएँ प्रेषित की। जिन बुजुर्ग और वरिष्ठ जनों को उम्र संबन्धि
लाचारी के चलते लंबे समय से मिल पाना संभव नहीं हुआ था,
उन लोगो से दशहरे के दिन समाज के सभी लोगो ने स्नेह वंदन और चरण वंदन किया एवं नयी
पीढ़ी के जिन बच्चों से अनेक सदस्य नाम और शक्ल
से परिचित नहीं थे, न केवल उनसे परिचित हुए
अपितु उन बच्चों को स्नेह आशीर्वाद भी दिया और इस तरह एक दूसरे से मिल कर शुभ कामनाएँ प्रेषित की जो इस पर्व की
एक महत्वपूर्ण उपलब्धि थी।
जहां एक ओर क्षेत्र के सभी लोगो का क्रम से
सभी घरों मे जा कर परिवार के सभी लोगो का अभिवादन और अभिनंदन कर खुशियों का सांझा
करना दिल को प्रसन्न और आनंद को भाव विभोर
करने वाले क्षण थे वहीं दूसरी ओर समाज की
सौ साल से भी पुरानी रीतिरिवाज और परंपरा के स्वाभिमान को पुनर्जीवित और
पुनर्स्थापित करने से उपजी खुशी,
सुख, आनंद के पलों के साक्षी होने और गौरान्वित करने वाले क्षण भी थे। विजयदश्मी पर्व
के मिलन कार्यक्रम के अंत मे क्षेत्र के सभी पुरुष और महिलाओं ने निवास पर एकत्रित
होकर स्वल्पाहार के साथ अपने पूर्वजों का स्मरण किया। हमारे आदि पूर्वज स्व॰ मिरजू
दाऊ द्वारा एक शतक पूर्व निर्मित कराये श्री राम जानकी मंदिर जिसे हम सभी "घर
का मंदिर" के नाम से स्मरण करते हैं को याद किया। वंश के श्रेष्ठ और प्रसिद्ध
पूर्वजों की स्मृति को आपस मे जाना-जनवाया और प्रतिवर्ष विजयदश्मी पर ऐसे आयोजन को जारी रखने का संकल्प लिया। यहाँ
इस बात का उल्लेख करना आवश्यक हैं कि ये सारे कुटुंबी जन हमारे पूर्वजों की दस
पीढ़ी से भी पुरानी पीढ़ियों के सदस्य हैं। वंश वेल के नाम सहित पूर्वजों के नाम का लिखित
रिकॉर्ड हमारे भाई प्रदीप सहगल के पास हैं जिसमे आज निश्चित तौर पर लगभग सौ से भी
अधिक सदस्य होंगे जो देश के विभिन्न शहरों मे स्थापित हो चुके हैं। मेरा मानना है कि
ऐसी वंश वेल (फॅमिली ट्री) सनातनी हिन्दू धर्म मे आम हैं जिनका अवलोकन प्रायः चारों
तीर्थों यथा रामेश्वरम, जगन्नाथ पूरी,
द्वारकधीश और बद्रीनाथ के पुरोहितों के पास
उपलब्ध तो रहते ही हैं और जो समय समय पर परिवार के किसी सदस्य के उस तीर्थ स्थान की
यात्रा पर जाने पर आध्यतन करवाते रहते हैं। लेकिन ये परंपरा भी पिछले कुछ दशकों से
तीर्थ यात्रा मे अपने कुल पुरोहितो से संपर्क न साधने से कम होता जा रहा हैं। इसलिये
समय की आवश्यकता है कि हर सनातनी हिन्दू को अपने परिवार के फॅमिली ट्री को अपनी आने
वाली संतानों को लिखित रूप मे सुपुर्द कर रघुकुल परंपरा को आगे बढ़ाने का कार्य करना
अपना दायित्व मानना चाहिए।
विजय सहगल
















