"सनातन से पूर्वाग्रह"
दिनांक 03 सितम्बर 2023 को चेन्नई मे तमिलनाडू सरकार के खेल मंत्री और वहाँ के मुख्यमंत्री श्री एम के स्टालिन के पुत्र उदय निधि स्टालिन ने सनातन धर्म की तुलना मच्छर, मलेरिया और डेंगू बीमारी से करते हुए उसके उन्मूलन की बात कही हैं। सनातन धर्म, अध्यात्म और सांस्कृति के एक मुख्य केंद्र तमिलनाडू, जहां देव सांस्कृति, संस्कृत और सनातन संस्कार की छाप वहाँ के देवालयों से निकल कर पूरे देश मे प्रचारित और प्रसारित हुई है वहाँ की सरकार के एक जिम्मेदार मंत्री से देश के बहुसंख्यक सनातन हिन्दू आबादी को आहत करने वाले ब्यान की उम्मीद नहीं की जा सकती थी। अपनी संकीर्ण सोच, अल्प बुद्धि और अल्प ज्ञान के बशीभूत उदय निधि स्टालिन अपने किसी ज्ञान-कौशल, योग्यता के आधार पर मंत्री पद हांसिल करने वाले व्यक्ति नहीं है अपितु चाँदी की चम्मच लेकर अपने मुख्य मंत्री पिता श्री एम के स्टालिन के घर पैदा हुए व्यक्ति है जो अपने पिता के पुत्र मोह की बदौलत सरकार मे मंत्री पद पाने वाले एक ऐसे गुणहीन, अनुपयुक्त, अयोग्य पुत्र हैं जिनमे परंपरागत भारतीय परिवारों से मिली शिक्षा और संस्कारों का पूर्णतः अभाव है अन्यथा ऐसे व्यक्ति को सनातन धर्म के अपमान पर मंत्री परिषद की जगह किसी मानसिक आरोग्यशाला मे होना चाहिए थी। इस घटना मे काँग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री मल्लिकार्जुन खडगे के पुत्र प्रियांक खडगे और कर्नाटक के गृह मंत्री जी परमेश्वर के बयानों ने आग मे घी का काम कर इस ईर्ष्याग्नि को और भी प्रज्ज्व्लित किया। इन सभी मलिन और कुटिल व्यक्तियों की एक मात्र योग्यता सनातम धर्म के प्रति ईर्ष्या और पूर्वाग्रह ही है जिसके कारण इन्हे सरकार मे मंत्री पद की प्राप्ति पुत्र मोह के रूप मे हुयी है।
मै उदयनिधि
स्टालिन के बारे मे दावे के साथ कह सकता हूँ कि कदाचित ही उन्हे सनातन धर्म के बारे
मे क॰ख॰ग॰ का ज्ञान भी हो!! सनातन धर्म मे समानता के बारे मे श्रीमद्भगवत गीता के
अध्याय 18 का श्लोक संख्या 41 मे स्पष्ट ढंग से व्याख्या करते हुए भगवान श्री कृष्ण कहते है :-
ब्राह्मणक्षत्रियविशां शूद्राणां च परंतप।
कर्माणि प्रविभक्तानि स्वभावप्रभवैर्गुणैः।।18.41।।
अर्थात
हे परंतप!
ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्यों के तथा शूद्रों के कर्म "स्वभाव" से
उत्पन्न गुणों द्वारा विभक्त किये गये हैं।
एक नहीं अनेकों
जगह पर इस बात को उद्धृत किया गया है कि सनातन धर्म मे वर्ण व्यवस्था जन्मगत/जातिगत
आधार पर न होकर स्वभाव के अनुसार विभक्त की गयी है। जैसे जो
व्यक्ति "अन्तः करण का निग्रह, इंद्रियों का दमन, धर्म पालन के लिए कष्ट सहना, आंतरिक शुद्धता, वेद, शास्त्र का पठन पाठन, ईश्वर
मे श्रद्धा रखने वाला है तो वह ब्राह्मण का स्वाभाविक कर्म है (अध्याय 18/42)। ठीक
इसी तरह शूर वीरता,
तेज, धैर्य और युद्ध से न पलायन करने वाला किसी भी गोत्र या
जाति मे उत्पन्न व्यक्ति क्षत्री ही मानने योग्य है (अध्याय 18/43)। श्रीमद्भगवत
गीता के अध्याय 18 के श्लोक 44 और 45 मे भी वैश्य और परिचार्यतामक परिचार्यात्मक
स्वभाव बाले व्यक्तियों का उल्लेख किया गया। इससे स्पष्ट है कि सनातन धर्म मे वर्ण
व्यवस्था जन्म या जाति आधारित न होकर स्वाभाविक गुणों के आधार पर है।
हजारों वर्षों से
हमारे देश पर कुषाण, हूण, शक, अरब, तुर्क, मंगोल और मुगलों सहित अनेक विदेशी आक्रांताओं तथा अंग्रेज़ शासकों ने भारतीय सनातन सांस्कृति
पर आक्षेप और आक्रमण कर विरूपित और विक्रत
किया और जो वर्तमान मे वर्ण शंकर से उत्पन्न राजे रजवाड़ों की अधम मानसिकता वाली
सोच के प्रतिनिधि उदय निधि, प्रियांक खडगे, जी परमेश्वर जैसे लोगो द्वारा आज भी
जारी है। जो विदेशी और विधर्मी आक्रांता सहस्त्रों
साल से सनातन धर्म को विद्रूपित करने के
प्रयास मे निष्फल रहे और जो अनादि काल से चली आ रही सत्य सनातन सांस्कृति को न मिटा पाये और जिनका आज कोई नाम लेवा नहीं हैं।
सनातन सांस्कृति के उन्मूलन वाली ऐसी ही घृणित, अपवित्र और
कलुषित मानसिकता की सोच वाले स्टालिन, खडगे और जी॰ परमेश्वर की तो विसात ही क्या हैं?
लॉर्ड मैकाले की
शिक्षा पद्धति मे पोषित उदय निधि हों या
प्रियांक खडगे पर सनातनी संस्कार और शिक्षा एवं इसके पवित्र साहित्य मे निहित अध्यात्म विध्या मे ये सभी अशिक्षित, अनपढ़ और
अनजान हैं। इन आसुरी और पैशाचिक सोच के लोगो ने न केवल सनातन धर्म मे समानता और सामाजिक न्याय पर प्रश्न खड़े किये
हैं अपितु सनातन की एक मनगढ़ंत परिभाषा को
गढ़ा है? समानता और न्याय के अनगिनत प्रसंग हमारे पवित्र
ग्रन्थों मे भरे पड़े है। निषाद राज, केवट और भगवान श्री राम
के संवाद से कौन भारतीय परिचित नहीं है। हनुमान जी द्वारा भगवान श्री राम और सुग्रीव की मित्रता
को हर सनातन धर्मी श्रद्धा भाव से स्मरण करता है। माँ शबरी के निश्छल प्रेम के
दर्शन भगवान श्री राम का आथिति सत्कार मे जूठे बेर खिलाने के मार्मिक प्रसंग, हर भारतीय की आँखों को नम कर देने वाला है। देवी अहिल्या को अपने चरणों से स्पर्श कर, उद्धार करने की कथा भारतीय जनमानस मे आदर और सम्मान के साथ कही और सुनाई जाती
है। "आदि ऋषि बाल्मीकी" द्वारा रचित संस्कृत महाकाव्य रामायण एवं
गोस्वामी तुलसी दास द्वारा रचित रामचरित मानस समान रूप से हर सनातनी हिन्दू द्वारा
नित्य पूजित और पठनीय ग्रंथ हैं। कृष्ण सुदामा के मिलन का प्रसंग एक राजा द्वारा
अपने बाल सखा से मिलने के लिए नंगे पैर दौड़े आने की कथा सामाजिक समरसता और समानता
का सर्वोच्च उदाहरण से क्या हम अनिभिज्ञ है?
भारतीय पौराणिक
उपनिषद मे उल्लेखित "सर्वे भवन्तु सुखिनः......." अर्थात सभी सुखी हों, सभी निरोगी हों, सभी का
जीवन मंगलमय हों कोई भी दुःख का भागी न हों, की कल्पना सिर्फ
सनातन धर्म मे ही परिलक्षित होती है। कदाचित ही किसी सभ्यता और संप्रदाय के
ग्रन्थों मे ऐसा भाव हो जो सनातन धर्म के महोपनिषद
मे वर्णित "वसुधैव कुटुंबकम्" अर्थात सारी धरती ही मेरा परिवार है के
भाव से परिपूर्ण हो। वेदों के आदर्श वाक्य "अतिथि देवो भवः" अर्थात
"अतिथि देवता तुल्य है!" का भाव सनातन धर्म की आत्मा और प्राण है। भला, स्टेलिनों, खडगों और परमेश्वरों को ये न दिखाई दे
तो इसे इनकी अज्ञानता और अशिक्षा ही कहा जाएगा। अगर सनातन धर्म मे नयी सोच और नए
विचारों का अभाव होता तो शायद ही श्रीमद्भगवत गीता जैसे महान ग्रंथ की रचना हो
पाती जिसमे भगवान श्री कृष्ण की वाणी का समावेश है। सनातन धर्म के इस पवित्र ग्रंथ
का राज्याश्रय के बिना जितनी भाषाओं मे अनुवादित और अनूदित किया गया है शायद ही
किसी धर्मग्रंथ का किया गया हों। इसके साथ ही वेदों, उपनिषदों, रिचाओं, सूत्र ग्रन्थों, पुराणों, स्मृतियों और शिव, विष्णु, ब्रह्मा, राम, कृष्ण जैसे देवताओं की शिक्षाओं पर नित्य नवीन रचनाओं एवं अनगिनीत
ग्रन्थों की रचना कैसे होती? भक्तकवि सूरदास, रैदास, मीराबाई, कबीर दास
और दक्षिण भारत के कवि कंबर, नयनार और अलवर ने सनातन धर्म के
सदसाहित्य को समृद्ध किया है।
यहाँ इस बात का
उल्लेख करना आवश्यक है कि सनातन के मूल मे मानवीय जीवन और एक शास्त्र सम्मत आदर्श जीवन के पहलुओं का समावेश
करता हैं जो आज भी उतने ही प्रासंगिक है जो हजारों साल पहले थी। श्रीमद्भगवत गीता
इसका सर्वश्रेष्ठ उदाहरण है। इस पवित्र ग्रंथ की शिक्षाएं धर्म, भाषा, प्रांत से परे पूरी मानवता पर समान रूप से लागू होती है। कैसे भगवान श्री
कृष्ण ने महाभारत के युद्ध मे शोक और विषाद से परिपूर्ण वीर योद्धा अर्जुन द्वारा
रण भूमि मे शस्त्रों को त्याग युद्ध न करने के निश्चय को शास्त्र सम्मत एवं सत्य
के लिए युद्ध करने की प्रेरणा और शिक्षाएं दी। वे
शिक्षाएं आज भी सामान्य मानवी के
जीवन मे जीने की कला का मार्ग प्रशस्त करती हैं। सामान्य विषयों से हट कर श्रीमद्भगवत गीता मे अध्यात्म विध्या के माध्यम
से उन विषयों को छुआ गया है जो उदय निधि स्टालिन, प्रियांक
खडगे और जी परमेश्वर जैसे साधारण बुद्धि वालों
की समझ से परे हैं। आइये श्रीमदभगवत के कुछ श्लोकों के अर्थों की चर्चा करें जो
हजारों साल पहले भी उतने सार्थक थे जैसे आज भी है:--
जो दुःखों की
प्राप्ति मे जो उद्वेग न हो, सुखों मे निःस्पृह हो,
जिसके राग, भय क्रोध नष्ट हो गये हों वो स्थिर बुद्धि कहा
गया है (गीता अध्याय 2/56)। क्या ऐसी
शिक्षा किसी काल मे भी बदली जा सकती है?
जिस प्रकार गणित
या विज्ञान के किसी एक सूत्र की तरह प्रतिपादित किया जाता है उसी
तरह क्रोध से उत्पन्न मूढ़भाव वाले व्यक्ति को "अशांतश्य कुतः सुखम"
अर्थात शांति रहित मनुष्य को सुख कैसे मिल सकता है? (अध्याय2 श्लोक63से 66)
"अशांत और सुख" की परिभाषा के बारे मे इस सार्वकालिक शिक्षण को कैसे किसी भाषा, प्रांत, जाति और धर्म मे बांधा जा सकता है?
ज्ञान विज्ञान से
तृप्त, इंद्रियों पर विजय प्राप्त एक आदर्श योगी जिसके लिए मिट्टी, पत्थर और सोना (स्वर्ण) समान हो (अध्याय 6 श्लोक 8) की कल्पना संसार मे
मात्र सनातन सांस्कृति की सर्वोत्तम शिक्षा है जो वर्तमान मे भी उतनी सच्ची है
जितनी पहले थी।
श्रीमद भागवत गीता
मे मानव जीवन मे आने वाली हर चुनौती, संघर्ष, संशय
और समस्या के समाधान और उसके हर पहलू पर प्रकाश डाला गया है फिर वह चाहे
निष्काम कर्म (2/47), आत्मतत्व (2/23),
त्याग (18/4-6), ज्ञान (18/20-22),
कर्म(18/23-25), कर्ता 18/26-28),
बुद्धि(18/30-32), धृति (धारण शक्ति) (18/33-35), सुख (18/37-39), दान, हवन-यज्ञ, भोजन तथा अन्य अनेक विषयों का
उल्लेख भी श्रीमद्भगवत गीता मे किया गया है। इतने विशाल और विस्तृत विषयों पर
व्याख्या उदय निधि स्टालिन जैसे लोगो की सोच और समझ से परे है, तब कैसे वे अधिकार पूर्वक सनातन धर्म की व्याख्या कर सकते है? सनातन धर्म की निंदा करने वाले इन कुलघातियों के वर्णसङ्कर वंशजों के बारे मे हजारों वर्ष पूर्व ही श्रीमद्भगवत
गीता मे उल्लेख किया था (अध्याय 1 श्लोक 38 से 43) जो आज भी प्रासगिक हैं। ऐसे
सत्ता स्वार्थ मे मदांध विक्षिप्त चित्त व्यक्तियों की जितनी भी कड़ी निंदा और
भर्त्स्ना की जाए कम है।
विजय सहगल


2 टिप्पणियां:
बहुत सुंदर शब्दों और शैली में आपने इन विधर्मियों की आरती उतारी है । उदयनिधि तो पारिवारिक परंपरा से तमिलनाडु के वोट बैंक के आधार पर इस तरह के बयान देकर राजनीति साधने की कोशिश कर रहा है । मुझे तो लगता है राहुल गांधी की शह पर उदयनिधि ने इस तरह का बयान दिया और कांग्रेसी खरगे-पड़गे जैसे चमचे बयानबाज़ी में कूद पड़े । मुस्लिम धर्म के विरुध्द यह बयानबाज़ी करते हैं क्योंकि जानते हैं कि इसकी सज़ा सर तन से जुदा है जिसका सनातन धर्म में अभाव है । भय बिन होय न प्रीत इन वेवकूफो की बयानबाज़ी का मूल है।
आदरणीय सहगल जी,
इन सनातन विरोधी धूर्त मानसिकता वाले दुष्टों पर कोई उपदेश काम करने वाला नहीं।
जब तक इनका सामाजिक बहिष्कार व उचित दंड का प्रयोग नहीं किया जायेगा तब तक ये लोग कहाँ मानने वाले है।
फिर भी आपका प्रयास स्तुत्य है।
सादर,
राजेन्द्र सिंह, ग्वालियर
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