"नाथुला दर्रा", सिक्किम
रविवार 13 नवम्बर 2022 को प्रातः
जब सिक्किम के जुलूक गाँव से भारत चीन सीमा पर स्थित नाथुला पास जाने के लिए
प्रस्थान किया तो एक अलग रोमांच और उत्साह था। चीन सीमा पर डटे अपने भारतीय सेना
के जवानों के साहस और शौर्य को गलवान घाटी मे देख व सुन चुके थे। आज उन वीर सपूतों से रु-ब-रु होने की
कल्पना से ही मन उत्साहित था। जुलूक मे रात्रि मे पड़ी वर्फ ने इस उत्साह को दुगना
कर दिया था। समुद्र तल से 14140 फुट की ऊंचाई पर स्थित नाथुला पास जुलूक से से लगभग
43 किमी॰ दूर था, जबकि हम आधे रास्ता तय
कर बाबा हरभजन के पुराने मंदिर के दर्शन कर चुके थे जहां से नाथुला दर्रा अब मात्र
20-25 किमी॰ दूर रह गया था। इस वर्फ़ीले पहाड़ी रेगिस्तान मे हल्की ताजी वर्फ से कार,
सड़क पर फिसल रही थी। हमारे कार के सारथी श्री बाल कृष्ण जी ने जब खराब मौसम की
आशंका व्यक्त की तो मन एक अदृश्य डर से ग्रसित हो गया कि नाथुला दर्रे की यात्रा
मे कहीं कोई विघ्न न आ जाये? लेकिन ईश्वर का
शुक्र था कि मौसम ज्यादा नहीं बिगड़ा। यहाँ ये बताना आवश्यक है कि इस स्थान पर
सिर्फ भारतीय नागरिकों को ही जाने के अनुमति है वो भी आवश्यक परमिट ले कर पर विदेशी
पर्यटकों को यहाँ जाने की अनुमति नहीं है। याद रहे परमिट के लिए पहचान पत्र के रूप
मे वोटर कार्ड और पासपोर्ट ही मान्य है,
आधार कार्ड को पहचान के लिए स्वीकार नहीं किया जाता है।
लेकिन एक समस्या और थी कि प्रायः 99% पर्यटक
गंगटोक से ही नाथुला पहुँचते है जबकि हम विपरीत दिशा से चल कर नाथुला होकर गंगटोक
पहुँच रहे थे। राज्य सरकार की नीतियों के
चलते कुछ विशेष प्रकार के वाहनों को ही नाथुला पास जाने की अनुमति होती है। छोटे
परिवार या कम संख्या वाले पर्यटकों को वाहनों का ज्यादा किराया देना पड़ता है। आप
अपने निजि वाहन या किराये के वाहन होने के बावजूद नाथुला जाने के लिए बुलेरों,
सूमों या सफारी जैसे वाहनों के साथ ही जाना होगा। गंगटोक या जुलूक से चीन सीमा पर
स्थित नाथुला तक सड़क बहुत ही अच्छी है पक्की डम्मर की बनी है। दर्रे की तलहटी मे
कार पार्किंग की बहुत बड़ी जगह सेना द्वारा पर्यटकों को उपलब्ध कराई गयी है। एक
विकसित और सशक्त भारत की तस्वीर को देख मन प्रसन्न हो गया। अप्रैल से ओक्टूबर-नवम्बर
तक मौसम नाथुला घूमने के लिए उत्तम रहता है,
सर्दियों मे वर्फ़ वारी के कारण नाथुला भ्रमण मे व्यवधान हो सकता है।
नाथुला पास के प्रवेश द्वार पर हल्की सर्दी
थी मौसम खुला हुआ था ठंडी हवाओं के बावजूद सूर्य देव अपनी पूरी क्षमताओं के साथ
सूर्य रश्मियों की चका-चौंध विखेर रहे थे जिससे सर्दी का प्रकोप,
सुखद और सुहावना हो गया था। पार्किंग स्थल
से लगभग सौ-सवा सौ सीढ़ियाँ चढ़ कर भारत चीन सीमा पर जाना था। तलहटी से दूर पहाड़ों
पर भारत-चीन सीमा पर भारतीय धव्ज को हवा मे लहराते देख मन उत्साह से उत्तेजित हो
रहा था। ठंड से चुभती हवाओं के बावजूद दूर दूर तक फैली ऊंची चोटियों पर भारतीय
सैनिकों को देश की सीमाओं की रक्षा मे तत्पर खड़े देखना जोश और उमंग बढ़ाने वाला था।
जहां एक ओर चीनी सेना के बैरक दिखाई दे रहे थे वही उनके सामने बने सुरक्षा बुर्ज पर
डटें भारतीयह सैनिकों को देख हमारे सहित हजारों पर्यटक उत्साहित हो भारत माता की
जय के नारों से भारतीय सैनिकों के जोश और उमंग को बढ़ा रहे थे। घाटी से चल कर
भारत-चीन सीमा पर जाने के लिए अभी,
आधी सीढ़ियाँ ही चढ़ी थी कि गरम-गरम समोसे और जलेबी की खुशबू आयी तो देखा एक जगह चाय,
समोसे और जलेबी लेने वाले लोगो की भीड़ लगी थी। पर्यटकों को सीमा पर सुबह-सुबह
गरम-गरम नाश्ता सेना के जवानों द्वारा उपलब्ध कराया जा रहा था। शांति काल मे सेना
के जवानों द्वारा सीमा की सुरक्षा के साथ नागरिकों के प्रति अपने सामाजिक दायित्व
के प्रति ऐसा समर्पण और सेवा कदाचित ही किसी देश की सेना द्वारा किया जाता हों!!
हमे अपनी सेना और अपने भारतीय होने पर गर्व है!!
यहाँ से अब हम अपने अगले पढ़ाव भारत चीन सीमा
की ओर अग्रसर थे। कुछ ही मिनटों पर पर हम उस जगह पर थे जहां से चीन सीमा एक हाथ की
दूरी पर थी। पहाड़ की चोटी को समतल कर पक्का सीमेंटेड कॉरीडोर बनाया गया था। नाथुला
पास उन तीन केन्द्रों मे से एक है जहां भारत चीन सीमा के सैनिकों की आधिकारिक बैठके
होती है। जिस कारण से कॉरीडोर के दोनों ओर
बड़े-बड़े और ऊंचे भवनों का निर्माण किया गया है ताकि दोनों देशो के सैनिक अधिकारी उन
भवनों मे मीटिंग आदि कर सकें। सैकड़ों की संख्या मे पर्यटक कौतूहल और उत्सुकता से कॉरीडोर
के एक सिरे से दूसरे सिरे तक चहल कदमी कर रहे थे। वहाँ पर तैनात कुछ सेना अधिकारी
अनुशासन बनाये रखने को तैनात थे। सीमा पर पास-पास सीमा के दोनों ओर एक काँटे दार तार की फेंसिंग के माध्यम
से भारत चीन सीमा को विभाजित किया गया था। सभी पर्यटकों को सेना अधिकारी चीनी सेना
के तारों को न छूने और फोटो न लेने के लिए आगाह कर रहा था जो महज एक-दो फुट की दूरी
पर थी। ये एक संवेदन शील इलाका था और किसी
भी नागरिक की जरा सी लापरवाही गंभीर मामला बन सकती थी। चीन और भारत के तल्ख और
तनाव भरे होने के कारण यहाँ तैनात सैनिक अधिकारियों की ज़िम्मेदारी कठिन और गहन थी।
थोड़ी सी असावधानी से खतरा बड़ा हो सकता था फिर भी सभी पर्यटक अनुशासन मानते हुए
निडर और निर्भीक होकर भारतीय सीमा मे कौतूहल भरी नज़रों से चारों ओर देख और भ्रमण
कर रहे थे। चीन सीमा की तरफ चीनी सरकार और उनके शासकों की चीनी नागरिकों को "सीमित
स्वतन्त्रता" की झलक यहाँ भी देखने को मिली। जहां एक ओर भारतीय सीमा मे चारों तरफ हजारों-हज़ार पर्यटक दिखाई दे रहे थे
और सीमा पर हर रोज की तरह एक उत्सव जैसा माहौल था वही चीनी सीमा पर एक भी पर्यटक
का दिखाई न देना चीनी सैनिकों द्वारा
आंपने नागरिकों पर कठोर नियंत्रण को दर्शा रहा था। सीमा पर दोनों ओर बने भवनों मे
भी चीनी सेना के पक्ष के लोग यदा कदा दिखाई दे जाते पर भारतीय सीमा मे लोग
उत्सुकता पूर्वक भारतीय सेना के अधिकारियों से जिज्ञासा भरे सवाल कर उनसे मिलने और
बात करने को उत्सुक थे। लेकिन उपर कॉरीडोर मे फोटो न लेने देने की कसक प्रत्येक
पर्यटक के मन मे थी और उनके चेहरे पर स्पष्ट रूप से देखी जा सकती थी। देश की अन्य सीमाओं
की तरह यहाँ ऐसा क्यों था नहीं मालूम?
हो सकता है सुरक्षा कारणों से ऐसा हो!! यध्यपि कॉरीडोर के नीचे घाटी मे फोटो लेने
की खुली छूट सभी को थी। इस कसक को सभी पर्यटक सीढ़ियों से नीचे उतर कर अपने मोबाइल
से सेल्फ़ी और फोटो ले कर पूरी कर रहा था। लगभग एक घंटे की सुहावनी धूप मे नाथुला
पास स्थित भारत चीन सीमा पर बिताए अपने अविस्मरणीय क्षणों को अपनी स्मृतियों मे सँजोएँ हम अपने
सह-यात्रियों सहित नीचे उतरे।
नीचे उतर कर हम लोगो ने उस पक्के गलियारे को
भी देखा जो भारत चीन सीमा को एक बड़े लोहे के जंगले वाले दरवाजे से विभाजित कर रहा
था। भारत चीन के बीच 80% व्यापार नाथुला दर्रे के रास्ते पर स्थित इस दरवाजे के
माध्यम से होता था। पुराने समय मे तिब्बत-भारत के बीच यह मार्ग सिल्क रूट कहलाता
था जहां से अन्य वसुओं के साथ मुख्यतः सिल्क धागे और सिल्क कपड़े का व्यापार होता था।
1962 के चीन युद्ध के बाद से इस व्यापार मार्ग को बंद कर दिया गया था। ज्ञात हुआ
कि 2006 से सीमित संख्या मे चीन से व्यापार कुछ सीमित समय हेतु आज भी जारी है।
पुनः एक बार सिक्किम के शेष भाग की यात्रा करने
और दुबारा पुनः नाथुला दर्रे के भ्रमण की
आशा मन मे पाले हमने गंगटोक के लिए प्रस्थान किया।
विजय सहगल





1 टिप्पणी:
हमारे गांव से परिचित इंटेलिजेंस ब्यूरो में थे तब वह सिक्किम तथा नाथुला दर्रा और लद्दाख के बारे बताते थे पर सहगल जी ने नाथुला दर्रा का दर्शन भी करा दिया जो काबिले तारीफ है
दिलीप कुमार नेगी
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