शुक्रवार, 28 अप्रैल 2023

बेहट" (संगीत सम्राट तानसेन की जमस्थली, ग्वालियर)"

 

"बेहट" (संगीत सम्राट तानसेन की जमस्थली, ग्वालियर)"







पिछले दिनों ग्वालियर मे 19 दिसम्बर 2022 से 23 दिसम्बर 2022 तक विश्व संगीत समागम "तानसेन समारोह" सम्पन्न हुआ। इस विश्व प्रसिद्ध संगीत समारोह के मूल मे महान संगीतज्ञ श्री तानसेन अर्थात रामतनु पांडे है जिनका जन्म सन 1506 मे ग्वालियर से लगभग 40 किमी दूर बेहट नमक ग्राम मे हुआ था। मध्य प्रदेश शासन के सांस्कृतिक और पर्यटन  विभाग द्वारा हर साल दिसम्बर माह मे त्रिदिवसीय तानसेन समारोह के  आखिरी दिन की सभा का आयोजन  तानसेन के सम्मान मे उनकी जन्म और साधना स्थली बेहट मे किया जाता है। इस छोटे से दिखने वाले गाँव मे हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत की  विश्व प्रसिद्ध हस्तियाँ कार्यक्रम प्रस्तुत कर संगीत सम्राट तानसेन के प्रति अपना सम्मान और श्रद्धा सुमन  अर्पित करते है।

पिछले अनेकों वर्षो के सोच विचार के बाद आज दिनांक 29 जनवरी 2023 को इस पवित्र स्थान पर जाने का कार्यक्रम बना। अपने परिवार के साथ ग्वालियर से शुरू हुई इस यात्रा ने शहरों के  यातायात की भीड़भाड़ से मुक्त शानदार सड़क ने यात्रा को और भी  सुगम और सरल बना दिया था। गाँव की संकरी गलियों से होकर दूसरे छोर पर झिलमिल नदी के किनारे है तानसेन की साधना स्थली बेहट मे स्थित शिव मंदिर। तानसेन समारोह और तानसेन की जन्मस्थलि होने के कारण यहाँ तक का पहुँच मार्ग न केवल पक्का है बल्कि मुख्य स्थल मे गेरुए पत्थर का एक  बड़े आकार का प्रवेश द्वार बनाया गया है। प्रवेश द्वार के सामने ही एक चबूतरा बना है ऐसा कहा जाता है कि तानसेन इसी चबूतरे पर बैठ संगीत की साधना करते थे। पूरा प्रांगण ऊंचे ऊंचे पेड़ो से आच्छादित था। प्रांगण के किनारे किनारे झिलमिल नदी की शांत धारा प्रवाहमान थी। बायीं तरफ कुछ सीढ़ियाँ चढ़ कर उस पवित्र मंदिर की ओर बढ़े तो सहसा ही एक छोटे मंदिर को देख आश्चर्य चकित हो गया। चमत्कारिक रूप से एक तरफ झुके हुए इस शिव मंदिर को देख ऐसा लगा मानों वास्तु निर्माण के दोष के दौरान ये मंदिर एक तरफ झुका होगा। पर मंदिर के सेवादार श्री संजीव शर्मा ने इस मंदिर के इतिहास पर प्रकाश डाला जो बड़ा दिल्चस्व था। इस मंदिर के शिवलिंग की एक विशेषता और है कि यहाँ स्थित शिव पिंडी  उन गिने चुने शिवलिंगों मे से एक है जिसका आकार गोलाकार न होकर चौकोर है।

उन्होने बताया इस मंदिर मे हमारे पूर्वज तानसेन के जन्म से पूर्व से भी  परंपरागत रूप से सेवा करते आ रहे है। किवदंती के अनुसार गाँव के समृध्शाली श्री मकरंद पांडे के कोई संतान न थी। वे झिलमिल नदी के किनारे स्थित इस शिव मंदिर मे संतान की अभिलाषा से नित्य भगवान शिव का दूध से अभिषेक करते  थे। भगवान के स्नेह  आशीर्वाद से उन्हे सन 1506 मे  पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई जिसका नाम उन्होने रामतनु पांडे रक्खा पर दुर्भाग्य से गूंगा होने के कारण वह बोल नहीं सकता था। जिह्वा के तन्तु,  तालु से चिपके होने के कारण एवं  बोल न पाने के कारण  लोग उन्हे "तन्ना" या "तनुआ" (गूंगा) कह कर बुलाते थे। मंदिर के पुजारी ने उन्हे भी पंचानन महादेव शिव का अभिषेक करने की सलाह दी। शिव कृपा से एक दिन उन्हे आभास हुआ कि एक अदृश्य शक्ति ने उन्हे कुछ मांगने को कहा। बोल न सकने के कारण उन्होने अपने गले पर हाथ फेरा!! उस अप्रत्यक्ष शक्ति ने ज़ोर से चीखने के संकेत देने पर तनुआ ने पूरी ताकत से आवाज निकाली!! तब चमत्कारित ढंग से आसमान से एक बिजली कौंधी जिसके कारण मंदिर का भवन  एक ओर झुक गया। अब रामतनु बोल सकता था। तब उसने ईश्वर से आग्रह कर गले मे ऐसे सुरीले स्वर का आशीर्वाद मांगा जो न पहले कभी हुआ हो और न आगे भविष्य मे कभी होगा। भगवान शिव से  मनवांछित फल मिलने के कारण अब रामतनु पांडे अपनी सुरीले स्वर के बजह से न केवल ग्रामीणों अपितु पशु पक्षियों को भी अपने सुरीली आवाज से आकर्षित करने लगे। कालांतर मे बेहट के रामतनु पांडे  उर्फ तनुआ अब तानसेन थे।

तानसेन की प्रारम्भिक संगीत शिक्षा मथुरा के स्वामी हरिदास के सनिध्य मे हुई। अपनी सुरीली तान के कारण उनकी ख्याति दिन व दिन बढ्ने लगी। अपनी संगीत साधना को और निखारने के कारण ग्वालियर राजदरबार के महान शास्त्रीय संगीत उस्ताद मोहम्मद  गौस के सनिध्य मे संगीत की राग-रागनियाँ का ज्ञान प्राप्त किया। वे ग्वालियर के तत्कालीन राजा मान सिंह तोमर के राजदरबार मे दरबारी गायक रहे। कहते है कि राजा मान सिंह तोमर की रानी मृगनयनी की संगीत मे अभिरुचि के दौरान उनकी सेविका हुसैनी से प्यार हो गया और बाद मे उस स्त्री से तानसेन का विवाह हो गया इसलिए संगीत के घरानों मे तानसेन की संगीत विध्या और गायन शैली को "हुसैनी घराना" भी कहा जाता है। कालांतर मे संगीत गायन की  उनकी यश पताका से भाव विभोर होने के कारण  रीवा नरेश रामचन्द्र ने उन्हे अपने राज दरबार मे नियुक्त करने का आमंत्रण दिया। रीवा नरेश के दरबार मे एक बार अकबर ने तानसेन को सुना तो उन्होने रीवा नरेश से आग्रह कर तानसेन को अपने दरबार मे बुला कर अपने नवरत्नों मे शामिल कर लिया। कहा जाता है कि संगीत सम्राट तानसेन के गायन, आलाप और तान से राग-रागनियाँ साक्षात प्रकट हो जाती थी। एक बार अकबर की  हठ के कारण तानसेन से दीपक राग गाने का आग्रह किया। निश्चित समय पर जिस  एकाग्रता और तन्मयता से जैसे जैसे तानसेन  इस राग का आलाप बढ़ाते गए बैसे बैसे वातावरण का तापमान बढ़ता गया। उपस्थित श्रोता पसीने से तर-वतर होने लगे और दरबार मे  रखे दीपक स्वतः ही जल उठे और महल मे आग की लपटे दिखाई देने लगी। पुनः राग मेघ मल्हार का आलाप देने पर बरसात की बूंदों से आग पर काबू पाया गया।

प्राचीन बरगद के पेड़ के नीचे निर्मित इस झुके हुए इस चमत्कारिक शिव मंदिर के दोनों ओर दो दालान बने हुए है। पंडित जी ने बताया कि इन दालनों का निर्माण अकबर द्वारा तानसेन की जन्मस्थली बेहट की यात्रा  के दौरान कराया गया था।

तानसेन की मृत्यु 26 अप्रैल 1586 को दिल्ली  हुई, ऐसा कहा जाता है कि उनकी शवयात्रा मे अकबर के साथ उनके सभी दरबारी भी शामिल हुए थे। संगीत सम्राट तानसेन की समाधि उनके गुरु मोहम्मद गौस के मकबरे के पास ही बनाई गयी। उनके समाधि स्थल के पास स्थित मैदान मे ही प्रति वर्ष दिसम्बर माह मे उनकी याद मे विश्व प्रसिद्ध संगीत समागम मनाया जाता है। मुझे याद है मेरे ग्वालियर प्रवास के दौरान शायद 1990-91 मे मै पहली बार अपने कार्यालीन सहयोगी विनोद अग्रवाल  के साथ  तानसेन समारोह मे शामिल हुआ था। उस समारोह मे विश्व के महान शास्त्रीय संगीत  गायक स्व॰ भीमसेन जोशी को तानसेन पुरुस्कार से सम्मानित किया गया था। उस  देर रात समारोह मे पंडित भीम सेन जोशी का वो सुरीला भजन

"जो भजे हरि को सदा............., जो भजे हरि को सदा.........."

"वो ही परम पद पाएगा..........., वो ही परम पद पाएगा..........." मेरी मधुर  स्मृतियों मे आज भी अच्छी तरह अक्षुण्ण है।

 

तब से आज तक तानसेन समारोह की भव्यता और दिव्यता मे काफी अंतर आ चुका है। आज का समारोह संगीतिज्ञों और श्रोताओं की सुख सुविधाओं से परिपूर्ण है लेकिन पुराने समय और आज के समय मे भी ग्वालियर के संगीत प्रेमी बिना किसी अपेकक्षा और आकांक्षा के इस समारोह की प्रतीक्षा बड़े बेसब्रि और अधीरता से करते है।     

बेहट ग्राम मे झिलमिल नदी के मुहाने पर स्थित शिवमंदिर के अलौकिक दर्शन भाव विभोर करने वाले थे। संगीत सम्राट रामतनु पांडे उर्फ तानसेन की जन्मस्थली का भ्रमण मुझ जैसे संगीत के अनिभिज्ञ और अनगढ़  श्रोता के लिए यह स्थान श्रद्धा और आदर रखता हो तब   पारंगत संगीतज्ञों और विदुषी गायकों के लिए सम्राट तानसेन की जन्म और साधना स्थली बेहट  किसी तपस्थली और तीर्थ स्थल से कम न होगी। संगीत सम्राट तानसेन को हमारा नमन। बारम्बार नमन हो!!     

विजय सहगल

                     

रविवार, 23 अप्रैल 2023

सिल्क रूट - गंगटोक (सिक्किम)

 

"सिल्क रूट - गंगटोक (सिक्किम)"









12 नवम्बर 2022 को हमारा कार्यक्रम सिक्किम के एक मात्र औध्योगिक नगर एवं सिक्किम का  प्रवेश द्वार  रंगपो से  जुलूक गाँव होकर नथुला पास जाने का था। पिछले रात की थकान के बाद एक अच्छी नींद लेने के बाद हम लोग प्रातः छह बजे उठ तो गए पर जल्दी प्रस्थान के चक्कर मे प्रातः भ्रमण को स्थगित कर नहाने धोने की तैयारी मे लग गए। जब तैयार होकर होटल छोड़ने के लिए हम लोग होटल बीटल वैली के काउंटर पर सामान के साथ पहुंचे तो काउंटर पर उपस्थित युवती ने अपनी आकर्षक  मुस्कान के साथ प्रातः वंदन कर होटल मे ठहरने और सुविधाओं के बारे मे पूंछा। मेरे द्वारा 1200/- रुपए मे होटल मे एक अच्छे स्टे के लिए उसे धन्यवाद दिया। जब उसने अपने होटल के ट्री हाउस और हैंगिंग वे ब्रिज के घूमने के बारे मे पूंछा जिसके बारे मे मेरे द्वारा  अपनी अनिभिज्ञता प्रकट करने पर उसने एक बार उसके होटल के गार्डेन, वे ब्रिज, ट्री हाउस देखने का विशेष आग्रह किया जिसको मैंने स्वीकार कर अपने सामान को काउंटर पर ही छोड़ पार्क की ओर प्रस्थान किया।

विशेष तौर पर पेड़ों के तने के उपर बने कमरे, होटल वीटल वैली की विशेषता थी। जिन पर छोटी-छोटी सीढ़ियों के माध्यम कमरे के भोजन कक्ष और वही से छोटे लकड़ी और लोहे के तारों के ब्रिज के माध्यम से शयन कक्ष तक पहुंचा जा सकता था। कुछ अन्य रूम, झोपड़ी नुमा वातानुकूलित कमरों को पेड़ों के बीच बनाया हुआ था जो देखने मे सुंदर लग रहे थे। बच्चों के लिए खिलौना गाड़ी, ट्रेन भी रक्खी थी । इस सुंदर वातावरण मे बच्चों को मिलने वाली खुशी का अंदाज़ सहज ही लगाया जा सकता था। इन सब से हट  कर ऊंचाई पर बने लोहे के तारों पर झूल रहे अनेक वे ब्रिज होटल का मुख्य आकर्षण थे, जिसके रोमांच ने मुझे विशेष रूप से आकर्षित किया।  जमीन से लगभग 20 फुट से लेकर 70-80 फुट की ऊंचाई पर विभिन्न  पेड़ों के बीच लोहे के तारों की सहायता से  बनाए गए ब्रिज पर चलना रोमांच भरपूर  और  चुनौती पूर्ण था। यध्यपि  कुछ समय पूर्व  गुजरात के मोरवी मे इसी  तरह के एक बड़े  झूला पुल के टूट कर नदी मे गिरने की घटना हो चुकी थी इसलिये  मेरी श्रीमती जी पहले तो इन झूला पुलों पर जाने से इंकार करती रहीं पर मैं इस साहस और चुनौती  पूर्ण  परीक्षा पास करने के लिए उत्साहित और उत्सुक था। मेरे साहस, हिम्मत और दिलेरी को देख कर वह भी मेरे  पीछे पीछे पेड़ों की सीढ़ियाँ चढ़ने लगी। फिर क्या था कुछ डर और झिझक के बाद उसमे भी बहादुरी आ गयी और हम लोग उस बीटल वैलि के इस साहसिक खेल पार्क मे लगभग एक-डेढ़ घंटे तक झूलते पुलों  पर  साहसिक गतिविधियों करते रहे।

सुबह का वक्त था बगैर नाश्ता किए निकले थे एक छोटे कस्बे रोंगली मे चाय नाश्ते के लिए रुके एक छोटे से रेस्टुरेंट मे समोसा, कचौड़ी गरम उपलब्ध थी जो स्वाद मे भी ठीक ही थी। ताजा स्पंजि रसगुल्ले ने स्वल्पाहार पर विराम लगा कुछ देर मुंह का  मीठा स्वाद बनाये रक्खा।   सिक्किम मे सरकार और लोग पर्यावरण के मामले मे काफी जागरूक और संवेदनशील है इसलिए यहाँ 2 लीटर से छोटी कोई भी पानी की बोतल बिक्री के लिये किसी भी दुकान पर उपलब्ध नहीं होती। आदेश की अवेहलना पर पुलिस द्वारा जुर्माने की सख्त कार्यवाही होती है। पर्यटक और पानी बिक्री करने वाले व्यापारी, दोनों  से जुर्माना बसूला जाता है। जब मैंने दुकानदार से 2 लीटर पानी की बोतल चाही तो बोतल होने के बावजूद दुकानदार ने नहीं दी। कारण पूंछने पर उसने जो कहा वो चिंतनीय था। उसने कहा हम बिहार के दूकानदारों को पाँच लीटर से नीचे बोतल बेचने पर भी पुलिस धमकाती है और परेशान करती है। यदि ऐसा है तो सिक्किम प्रशासन के लिये आत्मचिंतन का विषय होना चाहिये?

आगे रास्ते मे एक बहुत ही सुंदर और शानदार झरना "पधमचीन" देखने को मिला। जो ऊंचे पहाड़ों से एक पतली धारा के रूप मे अवतरित हो पानी की फुहारे दूर दूर तक विखेर रहा था। पहाड़ों की चोटियों से निकला पानी जब नीचे एकत्रित हो आगे वह रहा था तो एक दम काँच की तरह साफ और पारदर्शी था। सड़क से निकलने वाले वाहन मे बैठे लोग इस पानी को पीने के लिये भर रहे थे। खनिज पदार्थों से युक्त ये साफ पानी प्रकृति प्रदत्त अमूल्य उपहार हम सब को निशुल्क उपलब्ध हो रहा था। इच्छा  तो थी खुली और चमकदार  धूप स्नान के साथ झरने से निकाल रहे शीतल और शुद्ध पानी से स्नान कर लिया जाये पर आप तो जानते ही है भारत के गृह मंत्रालय की मर्जी के बिना पत्ता भी नहीं हिल सकता तो मै तो एक छोटा अकिंचन व्यक्ति जो ठहरा!! पर हाँ झरने के किनारे बन रही गरमा गरम मैगी का लोभ संभरण न कर सका और बहते पानी के बीच एक बड़ी चट्टान पर बैठ कर धूप के साथ मैगी खाने का एक अवस्मरणीय  आनंद जरूर  उठाया।

अब हमारी अगली मंजिल थी तिब्बत से सिल्क के व्यापार के रास्ते के एक पढ़ाव "जुलूक" गाँव तक पहुँचने की थी।  प्राचीन भारत मे देश के राजे रजवाड़ों, व्यापारियों और धन सम्पन्न परिवारों मे सिल्क और उसके कपड़े के आकर्षण किसी से छुपा नहीं है। उन दिनों चीन ही एक मात्र देश था जहां से सिल्क धागे और उसके अन्य उत्पाद भारत मे इसी रास्ते आते थे जिसका उल्लेख उल्लेख प्राचीन साहित्य और किस्से कहानियों मे काफी मिलता है। जुलूक गाँव इस सिल्क व्यापार के रास्ते का एक अहम पढ़ाव था, जहां भारतीय और चीनी  व्यापारी कुछ विश्राम,  विराम के पश्चात अपनी आगे की यात्रा करते थे। लगभग 700 लोगो की आबादी वाले   इस जुलूक गाँव से नथुला दर्रा लगभग 45 किमी॰ दूर स्थित है जो चीन की सीमा से लगा हुआ है। मुख्य सड़क से नीचे पैदल उतर कर हम लोग एक स्थानीय होम स्टे मे रुके। स्थानीय निवासियों द्वारा संचालित होम स्टे देश, काल के अनुसार ठीक था। शाम की चाय, रात्री भोजन और प्रातः के ताजे और गरम  स्वल्पाहार ने इस होम स्टे की सार्थकता पूर्ण रूपेण सिद्ध कर दी। सूरज ढलते ही सर्दी ने अपना प्रकोप दिखाना शुरू कर दिया जिसने हमे विस्तर के अंदर रहने को मजबूर कर दिया। विस्तर मे ही खाने के बाद न्यनतम जल से आचमन और हस्त प्रक्षालन कर की ठंडी से जूझते हुए विस्तर मे ही मुंह ढँक कर ऐसे सोये कि प्रातः छह बजे बाद ही विस्तर छोड़ा। सारी रात निस्तब्ध शांति के बीच कभी कभार श्वान के भौंकने की आवाज सुनाई दे जाती अन्यथा गाँव मे  मुर्गे की वांग से सुबह की जगाहट हुई। सर्दी इतनी थी कि दीर्घ और लघु संकाओं के निवारण पश्चात जल की कुछ बूंदे शरीर पर छिड़क अपने शरीर को पवित्रता के भाव से स्नान कर आगे की यात्रा के लिये प्रस्थान किया।

प्रातः होम स्टे की संचालिकाओं से उनके सुंदर आथित्य और स्वादिष्ट भोजन के लिये धन्यवाद ज्ञपित कर जब आगे बढ़े तो रात मे गिरी  हल्कि फुल्कि बर्फ रास्ते मे दिखाई दी। एक ही पहाड़ के सर्पीले रास्ते से होकर लगभग 13-14 किमी॰ का रास्ता तय करना एक सुखद रोमांच देने वाला था। पहाड़ी रास्ता इसलिये और भी सुंदर दिखाई दे रहा था क्योंकि पहाड़ी रस्तों से दायें-बाएँ होते हुए, एक  सड़क के ऊपर दूसरी और दूसरी के ऊपर तीसरी सड़क स्पष्ट नज़र आ रही थी। जब पहाड़ की चोटी पर पहुँच नीचे का विहंगम दृश्य देखा तो खुशी का ठिकाना न रहा। सारी सड़के एक के नीचे एक लहराती बलखाती नज़र आयी। समुद्र ताल से लगभग ग्यारह हजार फुट की ऊंचाई पर स्थित लगभग 28-30 हेयर पिन कर्ब दिखाई दे रहे थे। प्रकृति और मानव निर्मित ये सुंदर नज़ारा पहाड़ी के शीर्ष चोटी से दिखाई दे रहा था। काफी कोशिश के बावजूद मै  अपने मोबाइल कैमरे से सड़क के  10-12 मोड़ को ही कैद कर सका।

इस पहाड़ी के उच्चतम बिन्दु पर स्थित थंबी व्यू पॉइंट से कंचनजंगा की चोटियों के मनोहारी दृश्य अप्रितम और अद्व्तिय थे। प्रकृति द्वारा हिमालय की कंचनजंगा चोटी  के श्रंगार पर सूर्य की सुनहरी रश्मियों का प्रकाश सोने पर सुहागा की कहावत को चरितार्थ कर रहा था, जो देखते ही बनता था। यध्यपि जुलूक यात्रा मेरे भ्रमण कार्यक्रम मे नहीं थी पर मेरे वाहन के  सारथी श्री बालकिसन अधिकारी के सुझाव और निर्देशानुसार जुलूक गाँव के भ्रमण को आखिरी वक्त शामिल किया। यहाँ के लिये आवश्यक परमिट की व्यवस्था भी बालकिशन जी ने कर, इस  सिल्क रूट पर स्थित जुलूक गाँव की यात्रा को एक अवस्मरणीय यात्रा बना दिया।

विजय सहगल                 

                    

शुक्रवार, 7 अप्रैल 2023

किसी जाति का अपमान, लोकतन्त्र की लड़ाई कैसे

 

"किसी जाति का अपमान, लोकतन्त्र की लड़ाई कैसे?"

 





23 मार्च 2023 को काँग्रेस के पूर्व अध्यक्ष एवं वर्तमान मे वयनाड से सांसद श्री राहुल गांधी को देश की एक पिछड़ी जाति "मोदी"  को अपमान जनक गाली देने के मानहानि मामले मे सूरत, (गुजरात) के एक न्यायालय ने दो वर्ष की सजा दी, जिसके कारण उन्हे लोकसभा की सदस्यता से वंचित होना पड़ा!! हालांकि न्यायालय ने उसके आदेश के विरुद्ध ऊंची अदालत मे ले जाने हेतु कुछ ही मिनटों मे उनको  जमानत भी  दे दी। सवाल ये उठता है कि राहुल गांधी ने 2019 मे  किसी जाति विशेष के लाखों लाख व्यक्तियों को अपने भाषण मे "चोर" कह, अपमान जनक टिप्पड़ी से क्यों आहत किया?

इस हेतु हम सब को अपने-अपने बचपन मे झांकना होगा! जब स्कूल मे पढ़ने वाले अपने सहपाठियों और मित्रों से किसी बात पर मतभेद या झगड़ा हो जाने पर सारे लोग एक दूसरे को नीचा दिखाने के लिये किसी भी हद तक असंयत हो, गाली गलौज, अनर्गल मिथ्या आरोप और रिश्तों को तार-तार करने वाले ब्यानों से बाज़ नहीं आते थे, इस दौरान कभी कभी अकारण ही मारपीट भी कर देते थे। हफ्ते दस दिन के बाद फिर खेलने और आपसी बातचीत मे बड़े ही सहज और मिलनसार हो जाते थे। बचपन से किशोर अवस्था मे से होकर जब हम सभी मित्र अपनी युवावस्था मे मिले  तो अपनी वेवकूफी और मूर्खता पर खूब हँसते थे। क्योंकि समय के अनुसार हमारी सोच और आपसी व्यवहार, वर्ताव  मे परिपक्वता आ चुकी थी जो समय के साथ जीवन मे होने वाले बदलाव मे स्वाभाविक थी, पर बड़ा खेद और अफसोस है कि समय के साथ जो गंभीरता और प्रौढ़ता अधिकतर लोगो मे आ जाती  है, वो परिपक्वता जीवन के 52 वसंत देखने के बाद भी  श्री राहुल गांधी मे आज तक नहीं आ पायी। इसका एक मात्र कारण उच्च धनाढ्य कुल मे चाँदी की चम्मच लेकर पैदा हुए, बड़े नाज़ों नखरे मे पले पढे बच्चों मे होना स्वाभाविक था। पर, यदि अधिकतर भारतीय मध्यम वर्गीय परिवारों मे पले बढ़े बच्चों की तरह हम बच्चों की  ढिटाई पर हमारे माँ बाप की तरह राहुल के परिवार के लोगो ने, उनके भी कान खींचे होते या एकाध चपत लगाई होती तो शायद उनका ऐसा स्वभाव न होता।

राजनीति मे राजनैतिक दलों और उनके नेताओं मे मतभेद होना स्वभाविक है। दलों की  अपने नीतियों और कार्यक्रमों मे मतांतर होना साधारण बात है। इन विषयों पर वाद-विवाद, मतभेद या असहमति होना भी लाज़मी है, पर इन विचार-विभिन्नता के चलते हम किसी विपक्षी के लिंग, जाति, धर्म या संप्रदाय पर कटाक्ष कर शब्दों के माध्यम से उसको अपमानित या तिरिष्कृत  करें तो ये न केवल नैतिक दृष्टि से अपितु कानूनी आधार पर भी अनैतिक है!!, अपराध है!! अन्यथा सूरत के न्यायालय द्वारा उनको बार बार शब्दों, भाषणों या व्यवहार से किसी पिछड़ी जाति को अपमानित करने, गाली देने के अपराध पर उनसे क्षमा-याचना के सुझाव को बारंबार नज़र अंदाज़ करना उनकी हठधर्मिता, अपने आपको औरों से श्रेष्ठ सावित करने की उनकी मानसिकता का ही परिचायक नहीं तो और क्या था? ऐसा नहीं था कि सूरत के माननीय न्यायाधीश का  क्षमा-याचना प्रस्ताव स्वीकारने का सुझाव, उनका पहला प्रस्ताव होता? इससे पूर्व 2018 मे "राफेल" लड़ाकू विमान के मुद्दे पर उन्होने सूप्रीम कोर्ट मे क्षमा याचना कर मामले से छुटकारा पाया था। "चौकीदार चोर है" के अपने वक्तव्य पर भी 2019 मे राहुल गांधी ने माफी मांगी थी। कदाचित सूरत कोर्ट मे भी यदि राहुल माफी मांग लेते तो शायद उन्हे संसद की सदस्यता से वंचित न होना पड़ता और न ही उनकी इतनी फजीती होती! अपने अहंकार और श्रेष्ठता के भाव से ग्रसित होने के कारण वीर सावरकर और संघ सहित  अन्य  मानहानि के ऐसे मामलों मे देश के विभिन्न न्यायालयों मे उनके विरुद्ध वाद लंबित है जिनका समाधान होना अभी शेष है।    

दिनांक 03 अप्रैल 2023 को सूरत के न्यायालय के आदेश के विरुद्ध सेशन कोर्ट से मिली जमानत के बाद उनका ये कहना कि "यह मित्रकाल के विरुद्ध लोकतन्त्र को बचाने लड़ाई है", और "सत्य ही मेरा अस्त्र"!!, उनका घमंड,  दंभ, और एक बचकानी हरकत ही कहा जायेगा अन्यथा देश की एक पिछड़ी जाति को गाली देना, उसके लाखों लाख सदस्यों को अपमानित करने से "कौन से लोकतन्त्र को बचाने की लड़ाई" माननीय "आर्य श्रेष्ठ!!" श्री राहुल गांधी लड़ रहे है? अपने आपको "श्रीमद्भगवत गीता" का पाठक बताने वाले "श्रेष्ठी" राहुल गांधी क्या बताएँगे कि किसी जाति विशेष को आवेश और अशांत मन से "मान भंग" करना कौन सा "धर्म" या  "शास्त्र विहित  लड़ाई" है? समाज के एक  दबे कुचले वर्ग को "चोर" कह अपमानित कर, वे,  "सत्य" के कौन से "अस्त्र" को परिभाषा करना चाहते है?  किसी जाति विशेष को गाली निकालना "लोकतन्त्र की लड़ाई" या "सत्य का अस्त्र" नहीं अपितु उनको बचपन मे मिले उनके कुसंस्कार  और कालांतर मे पुख्ता हुआ उनका अहंकार, हठधर्मिता, उद्दंडता और अशिष्टता ही है?

कॉंग्रेस के प्रौढ़ और परिपक्व अध्यक्ष श्री मल्लिकार्जुन खड़गे भी न जाने किस  भीष्म प्रतिज्ञा के बशीभूत, हस्तिनापुर के राज सिंहासन के प्रति बचनबद्ध हो, काँग्रेस का हित त्याग, श्री राहुल गांधी की एक जाति विशेष के अपमान और तिरिष्कार रूपी हठधर्मिता के साथ खड़े है? तब फिर काँग्रेस के दूसरे चाटुकार नेताओं से कैसे अपेक्षा की जा सकती है कि वे राहुल गांधी को सद् मार्ग की राह दिखाने की हिमाकत कर सके!! चाहिये तो ये था कि काँग्रेस के प्रति सच्ची निष्ठा, समर्पण और वफादारी रखने वाले  राजनैतिक युद्धाभिलाषी  वरिष्ठ नेतागण मिल बैठ, राहुल गांधी को, उनके द्वारा,  समाज के पिछड़ी जाति को कोसने के कृत्य पर क्षमा याचना करा, एक अविवादित विषय को विवादित बनाने के मामले को रफा दफा कर काँग्रेस की  नीतियों और कार्यक्रमों के बलबूते जनता के समक्ष अपना पक्ष रख लोकतान्त्रिक तरीके से अपनी राजनैतिक महत्वाकांक्षा की लड़ाई लड़ते!!, लेकिन हा!! दुर्भाग्य!!, ऐसा प्रतीत होता है कि काँग्रेस रूपी कुएं मे मानों भांग पड़ी है जिसके जल का सेवन कर सारे कोंग्रेसी नशे मे मस्त हो, काँग्रेस का अच्छा-बुरा त्याग सिर्फ और सिर्फ एक व्यक्ति श्री राहुल गांधी के अनुचित और उच्छृंखल आचरण के बावजूद, उनके प्रति अपनी प्रतिवद्धता, भक्ति और अनुराग  जताने की दौड़ और  चाटुकारिता, चापलूसी  मे  दूसरों से ज्यादा श्रेष्ठ साबित करने की होड़ मे लगे है।

एक वक्तव्य मे श्री राहुल गांधी को मैंने कहते सुना है कि उन्होने भगवत गीता पढ़ी है, तब सालों साल के संस्कार, सोच और धृति (धारण शक्ति)  से मजबूत हुई  उनकी बुद्धि के बारे मे श्रीमद्भगवत गीता से एक श्लोक को मै, उद्धृत कर रहा हूँ जो कदाचित उनके स्वभाव पर सटीक बैठता है, जिससे वे सहमत हों या न हों पर उससे वे भलिभांति परिचित अवश्य होंगे:-

अधर्मं धर्ममिति या मन्यते तमसाऽऽवृता।
सर्वार्थान्विपरीतांश्च बुद्धिः सा पार्थ तामसी ।।अध्याय 18 ,श्लोक 32।।  अर्थात

हे अर्जुन! जो तमोगुण से घिरी हुई बुद्धि अधर्म को (भी), "यह धर्म है" ऐसा मान लेती है तथा (इसी प्रकार अन्य) सम्पूर्ण पदार्थ को भी विपरीत मान लेती है, वह बुद्धि तामसी है।

श्री राहुल जी द्वारा न केवल, देश की एक पिछड़ी जाति को समूहिक रूप से गाली दे, अपमानित करने के "अधर्म" को ही "श्रेयस्कर" धर्म बतलाना अपितु उसको न्यायोचित ठहराने  का कुत्सित प्रयास करना ही, न्यायालय मे उनके आपराधिक कृत्य मे सजा का कारण बना, फिर श्री राहुल गांधी से उम्र की इस दहलीज़ पर अपने स्वभाव मे बदलाव की अपेक्षा कैसे की जा सकती है।

विजय सहगल