"चुक्खू भाई साब!!"
साठ-सत्तर
के दशक मे प्रायः छोटे कस्बे या वस्ती मे छोटे
छोटे मुहल्ले हुआ करते थे। मुहल्लों मे त्योहारों, पर्वो या यूं ही ठांड़े-बैठे
बगैर किसी प्रतियोगिता के ही प्रतिद्वंदता हो जाती थी। कब हंसी-ठिठोली या कोई छोटी
सी बात मे मान-प्रतिष्ठा का सवाल खड़ा हो लड़ाई झगड़े मे तब्दील हो जाये नहीं कहा जा सकता था। ऐसे मे मुहल्ले के बलशाली, शूरवीर और दिलेर व्यक्तियों की बड़ी पूंछ परक होती थी और उन्हे सम्मान की
दृष्टि से देखा जाता था। ऐसे ही साहसी और निडर व्यक्ति उस मुहल्ले के वास्तविक
"हीरो" हुआ करते थे। प्रायः हर मुहल्ले मे ऐसे व्यक्ति हुआ करते थे जो
अपने स्वभावगत लक्षणों से अपने मुहल्ले के बच्चों,
बड़े-बुजुर्गों, महिलाओं के स्वाभिमान की रक्षा के लिये हमेशा
तत्पर हो आगे खड़े नज़र आते, बिलकुल "शक्तिमान" की तरह! जरूरत और आवश्यकता पड़ने पर उन्हे
लड़ाई-झगड़े या मार-पिटाई से भी परहेज़ नहीं रहता। उनके लिये "मुहल्ला" और
"मुहल्ला वासियों" की प्रतिष्ठा ही, उनके "आन-वान-शान" का सवाल हुआ करती
थी। बचपन मे मेरे मुहल्ले मे एक ऐसे ही शक्तिमान रूपी पात्र हुआ करते थे जिनकी उपस्थिती मे हम बच्चों का समूह अपने आप
को शेर समझता था और जिन्हे मुहल्ले के सभी लोग "चुक्खू" भाई साब कहा
करते थे। चुक्खू भाई साब कद काठी मे एकदम दुबले पतले और छोटे थे पर थे बड़े
स्फूर्तिवान, दिलेर और बहादुर। मैंने एक-दो अवसरों पर दूसरे मुहल्ले के 2-4 लोगों से बहस मुसाहिबरे मे उनकी दिलेरी और स्फूर्ति
को देखा था जब उनसे हाथापाई की नौबत आयी!!
अपने आक्रामक रुख और दहाड़ती आवाज मे 2-4 लोग का भी उनके सामने टिकना मुश्किल हो
जाता था।
हमारे
परिवार को जब कभी तालबेहट जाना होता जहां मेरी बुआ और एक चाचा रहते थे, तो बस मे एक
अलग ही रुतबा रहता क्योंकि चुक्खू भाई साब बस ऑपरेटर यूनियन मे कार्यरत थे और आवश्यकता के
अनुरूप बस मे मुफ्त यात्रा हो जाती थी। उन दिनों चिट्ठी भेजने/पहुँचने मे हफ़्तों
लग जाते लेकिन चुक्खू भाई साहब के माध्यम से चिट्ठी, तार की
तेजी से बस के ड्राईवर के हाथ से कुछ ही घंटों मे तालबेहट पहुँच जाती थी। वे हरफनमौला
थे कोई व्यवसाय हो या कारीगरी वे कठिन परिश्रमी की तरह हर काम मे अपना हाथ आजमाने
से पीछे नहीं हटते। वे मौसम और समय के हिसाब से पूरी मेहनत और लगन के साथ अनेक
व्यवसाय मे भी अपना हाथ आजमाते। दीपावली पर आतिशबाज़ी हो या होली पर रंगों से संबन्धित काम या गर्मी मे
कोंछाभांवर के मटके हों सावन के महीने मे राखी हर काम पर उनकी अच्छी पकड़ रहती।
फिल्मों का पहले दिन पहला शो शायद ही उनसे कभी छूटता था।
सड़क
पर गोली-कंचा, गिल्ली-डंडा, टीपो या पिट्ठू (आजकल का सितोलिया)
खेलते या कबड्डी की दौड़ भाग के दौरान प्रायः हम बच्चों की गलती के बावजूद साइकल से
टक्कर हो जाती तो फिर साइकल वाले को साइकल न चलाने के उलहाने दे झगड़ा करना आम बात
थी। "चोरी और सीना जोरी" के तहत
उनसे झगड़ना या झूमा झटकी करना हम बच्चों की आदत मे सुमार था। प्रतिद्वंदी से कमजोर
पड़ने पर चुक्खू भाई साब रूपी तुरुप का इक्का हमारे पास हमेशा मौजूद रहता था। चुक्खू
भाई साब मे एक खास बात थी कि लड़ाई झगड़े मे तो वे हम बच्चों के साथ हमारे पक्ष मे खड़े
होते पर पीछे हम लोगो को डांटना और शैतानी ने करने की सख्त हिदायत देना भी नहीं भूलते।
होली
त्योहार के हफ्ते भर पहले से लकड़ी, कंडा, घास बेचने वालों से होली जलाने की
सामाग्री की बसूली हो या गाँव से आ रही बैलगाड़ियों से 5-10 पैसे की बसूली
हम बच्चे अपना हक समझते थे। उन दिनों लोग भी उदारमना, सदाशय
कृपालु स्वभाव के होते थे, कुछ लोग हम बच्चों की हठ! और
शरारतों!! को नज़रअंदाज़ कर चंदा दे देते थे पर कुछ लोग प्रतिवाद कर चंदा नहीं भी
देते थे। जब कभी वाद-विवाद बढ़ता और लड़ाई झगड़े की नौबत आती तो हम बच्चों का परोक्ष
रूप से चुक्खू भाई साब पर भरोसा रहता था और चुक्खू भाई साब येन केन प्रकारेण हम
बच्चों के पक्ष मे खड़े नज़र आते।
एक
बार होलिका दहन हेतु लकड़ी इकट्ठा करने हम बच्चे घर से थोड़ी दूर स्थित नारायण बाग
चले गये जहां लकड़ी बहुतायत मे पड़ी रहती थी। 10-12 साल के 5-6 बच्चों ने नारायण बाग
मे खजूर के एक कटे पड़े का एक 6-7 फुट लंबे
पेड़ को देख हम लोग उसे होलिका दहन के लिये उचित मान लुढ़काते हुए ले
जाने लगे। तभी बाग का एक चौकीदार ने आकर हम बच्चों को रोक लिया और खजूर के पेड़ को
ले जाने पर पूंछ तांछ शुरू कर दी, उसके हाथ मे पेड़ों की टहनियाँ काटने का एक छोटा
सरौता (cutter) था। हम ये अंदेशा नहीं था कि इस तरह बाग से लकड़ी ले जाना
गैर कानूनी है। हम तो ये मान कर चल रहे थे कि होली के त्योहार पर एक अनुपयोगी पेड़
को ले जाने मे कोई हर्ज़ नहीं होगा! जब गार्ड से अनुनय-विनय की तो वो तो हमे अपने
बाग अधीक्षक के सामने पेश करने की धमकी देने लगा। वह ये भी कह रहा था कि पेड़ों की
चोरी करने वालों के वह इस सरौते से हाथ काट देगा!! हम बच्चे तो घबड़ा गये। ये
क्या!! होम करते हाथ जलने की कहावत तो सुनी थी पर यहाँ तो होली जलाने पर हाथ काटने
की नौबत आ गयी!! हम बच्चों मे से एक बच्चे
को खुसुर-फुसुर कर इशारे से घर की ओर दौड़ाया।
घर भी नारायण बाग से एक-डेढ किमी॰ दूर था। चुक्खू भाई साब और मोहन किताब वाले को
जैसे ही खबर मिली वे साइकल से दौड़ते-भागते पहुंचे। इस
दौरान मै डर के मारे, बार-बार उस गार्ड के सरौते को देख कर
आँख बंद कर लेता!! हम बच्चों का तो बुरा हाल था। चुक्खू भाई साहब को देखते ही बच्चे रोने-चिल्लाने लगे। उनसे हाथ काटने
से बचाने की गुहार लगाई!! इसी बीच बाग के एक दो कर्मचारी भी आ चुके थे। सौभाग्य से
एक व्यक्ति उनके जानने वाला था। तब हम बच्चों की जान मे जान आयी। जब उनको पता चला
कि ये खजूर का पेड़ होलिका दहन हेतु ले जा रहे है तो अधिकारियों ने बिना कोई आपत्ति
के ले जाने की अनुमति दे दी लेकिन भविष्य
मे बिना पूर्व अनुमति के इस तरह कृत्य करने से आगाह किया।
जैसे
तैसे उस खजूर के पेड़ को लुढ़काते हुए हम
लोग 2-3 घंटे मे घर पहुंचे। पहले तो कुछ लोगो ने भय दिखाया कि होली जलाने को पुलिस
से परमिशन लेनी होगी? कुछ ने कहा चौराहे पर ही पावर हाउस मे कहीं होली से आग न लग जाये!! तमाम
किन्तु परंतु के बीच अंततः चुक्खू भाई
साहब और मुहल्ले के अन्य लोगो के रहते हम लोगो ने पहली बार,
घास की मंडी मे जलने वाली पारंपरिक होली
से अलग, मुरली मनोहर मंदिर तिराहे पर अपने मुहल्ले की होली जलायी थी!! जो आज तक हमे याद है और याद है वे
चुक्खू भाई साब जो बचपन मे हम बच्चे के साथ शक्तिमान की तरह खड़े रहते थे !!
विजय
सहगल


3 टिप्पणियां:
भूली बिसरी यादों का आनन्द ही अलग है।
Bahut khoob bhai sahab.. Aapke kisso aur yaado ko prastut karne ka andaaz bahut nirala evam rochak hai..
🙏vijay bhai aap ki bhuli bisri bate ko naman🙏
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