रविवार, 31 जनवरी 2021

रौंटा

 

                        "रौंटा"




हमे याद है बचपन मे जब पड़ौस के मैदान मे हम बच्चे क्रिकेट खेलते थे तो प्रायः खेल खेल मे कभी मतभेद, लड़ाई झगड़ा होना आम बात थी। नो बॉल, आउट, रन आउट जैसे मुद्दे  जैसे तैसे आपस मे ही बच्चे बहस बाजी कर क्रिकेट के निर्णय बहुमत के आधार पर कर लेते थे। खेल मे बैट की अति महत्वपूर्ण भूमिका सर्विदित है जो हमलोगो की पहुँच से बाहर था। जो बालक बैट लेकर हमारे खेल को जीवंत बनाता था  एक बार जब खेलने आया तो पहली ही गेंद पर आउट हो गया। उसने प्रतिवाद किया लेकिन उपस्थित मंडली ने बहुमत के आधार पर उसको आउट करार दे दिया। पता नहीं उस दिन क्यों उसने इसे अपनी प्रतिष्ठा का प्रश्न बना और फिर बैट भी उसी का था, सभी बच्चे उसके बैट से खेले और चौके छक्के लगाये पर उसे पहली बॉल पर  आउट कर दिया जो उसे स्वीकार नहीं था। इस सबके बावजूद शक्ति संतुलन उसके विरोध मे था खेल मे उसके बैट के योगदान को भी नकार दिया। उसे अपनी असफलता कतई स्वीकार नहीं थी। हम सभी छोटे बाल वृंद के समक्ष ही आउट होने वाले बच्चे ने अंतिम हथियार के रूप मे रोना, विलखना चालू कर दिया। विलाप की आवाज जब उसके घर मे माँ ने सुनी तो दौड़ी दौड़ी उस छोटे से मैदान मे पहुँच गई जो स्वाभाविक ही था। पर इसके साथ साथ उसके पिताजी, चाचा जी ताऊ जी, भी मैदान मे दौड़े चले आये तो हम सभी बच्चों के सिट्टी-पिट्टी गुम हो गई और हम सभी बचाव की मुद्रा मे आ गये। सच और झूठ का भान हम सभी को था पर पहली बॉल पर आउट होने बाले बच्चे का सीना उसकी माँ, पिताजी, ताऊ चाचा के आने से फिर से चौड़ा हो गया और मन मार कर हम लोगो को उसे फिर से कुछ देर धाम देनी पड़ी। उसे नोट आउट करार दिया गया। हम लोग मन ही मन मौन थे क्योंकि उसके सभी रिश्तेदार सामने जो खड़े थे। लेकिन अगली बार जब हम बच्चे फिर से खेलने इकट्ठा हुए तो सभी उसे "रौंटा" कहके चिढ़ाते थे। विशेषकर जब वह बैटिंग करता तो "रौंटे को आउट मत करना" वरना रोने लगेगा! कह के चिढ़ाते थे।

वे बचपन की नासमझी भरी बाते पर न जाने क्यों आज के किसान आंदोलन देख फिर उस बचपन के मंजर की  याद आ गई। बचपन मे जिस बच्चे ने कभी पराजय  ने देखी/सीखी हो और वह जब पहली गेंद पर आउट हो जाये  तो दहाड़ मार कर रोने लगे तो समझ आता है पर अपने आप को नेता घोषित करने वाले जब ऐसा व्यवहार करे तो समझ से परे है? मेरा दृढ़ विश्वास है कि वेशक वे नेता जी "विलाप, क्रंदन, रौने  से उपजी संजीवनी के कारण लोगो की  पुनः सहानभूति देख भले ही खुश हो ले पर क्या  सारी दुनियाँ उन्हे उसी "रौंटे" बालक की तरह नहीं  देख रही होगी?? 

वेशक वे सार्वजनिक मंचों पर इसे  स्वीकार न करे लेकिन मन ही मन इस हताशा, निराशा भरी पराजय पर अवश्य पछता नहीं रहें होंगे? जमीन से उठे और जुड़े नेताओं ने  अनासक्त भाव से आंदोलनों को लड़ा और जिया है वे अच्छी तरह जानते है कि हर आंदोलन की परिणाम "विजयी भव" हो आवश्यक नहीं। नेता यदि संघर्षों की आग मे तप कर निकले होते और यदि अपनी ताकत, बहदुरी पर भरोसा होता तो  असफलताओं पर दुबारा उठ खड़े हो संघर्षों की राह पर बढ्ने का जज्बा रखते और  "रोने" जैसे आचरण पर न उतरते। कदाचित "मुंह मे चाँदी की चम्मच ले कर पैदा हुए" नेताओं से इससे  विलग आचरण की  उम्मीद करना व्यर्थ है।


विजय सहगल                     

शनिवार, 30 जनवरी 2021

बुरान्सखंडा (पहला पढ़ाव-हरिद्वार)

 

"बुरान्सखंडा (पहला पढ़ाव-हरिद्वार)"






संक्रांति वाले दिन 14 जनवरी 2021 को मै ट्रैवल ग्रुप ऑफ इंडिया के एक एकत्रीकरण मे कॅनाट प्लेस नई दिल्ली मे शामिल हुआ था। 45-50 लोगो से तब मुलाक़ात हुई थी,  वहीं तब पता चला था कि ग्रुप का बुरान्सखंडा जाने का कार्यक्रम है पर सीट सारी पहले ही बुक हो चुकी थी। ग्रुप प्रमुख श्री कटारिया से भी उसी मीटिंग मे मुलाक़ात हुई थी। मैंने उन्हे कह रखा था कि कोई भी संभावना हो तो मुझे भी साथ चलने का मौका दे। सौभाग्य से चलने के दो दिन पूर्व कुछ लोगो का कार्यक्रम मे किन्ही आवश्यक कारणों से जाना स्थगित हो गया था। श्री कटारिया जी की सूचना आई कि यदि चलना है तो आवश्यक शुल्क तुरंत जमा करा अपनी विचारधीन सीट को कन्फ़र्म कराएं। मैंने तुरंत ही रात 10-11 बजे पैसे भेज अपना स्थान सुरक्षित कराया एवं धन प्रेषण की सूचना दी। कटारिया जी ने पूंछा आप कैसे बुरान्सखंडा पहुंचेंगे। चूंकि  कार्यक्रम के मुताबिक सभी सदस्यों को बुरान्सखंडा अपने साधन से पहुँचना था। मैंने बताया ट्रेन से देहरादून पहुँच जाऊंगा वहाँ से कोई साधन देख लेंगे। दिल्ली की मीटिंग मे ग्रुप की चर्चा मे एक "टेग लाइन" सुनी थी "दोस्ती पक्की पर खर्चा अपना अपना"। अच्छा लगा था क्योंकि धन संबंधी पारदर्शिता आपसी प्रेम सद्भाव को बनाए रखने मे एक अहम भूमिका निभाता है एवं जो आपसी निष्ठा और विश्वास की बुनियाद भी है। उन्होने प्रस्ताव भी दिया कि यदि आप चाहें तो एक सदस्य अपने कार से दिल्ली से ही बुरान्सखंडा जायेंगे आप उनके साथ सीट सांझा कर  सकते है। पाँच अन्य लोग भी साथ मे होंगे। जो भी यात्रा व्यय होगा आप लोग आपस मे सांझा कर लेना। अंधे को क्या चाहिये दो आंखे, इससे अच्छा क्या प्रस्ताव हो सकता था। मैंने तुरंत ही हाँ भर दी। तब मुझे लगा कि ग्रुप मुखिया के नाते श्री कटारिया जी मे कुछ विशेष तो है जो एक मुझ जैसे अपरचित, नए सदस्य का भी इतना ख्याल रखा। लेकिन ये तो उनका सहज  स्वभाव ही था जो यात्रा के दौरान सभी सदस्यों के साथ मैंने देखा।

यात्रा वाले दिन हमारी कार के छः सहयात्रियों का एक व्हाट्सप उप ग्रुप बना दिया ताकि दिल्ली से प्रस्थान के लिए हम आपस मे अपना प्रोग्राम तय कर ले। श्री पुष्कर रावत जी जिनकी कार मे हम लोग जा रहे थे हमारा नेतृत्व कर रहे थे। कार मे 62 वर्षीय मै सबसे वरिष्ठ एवं 17-18 वर्षीय समीर सबसे छोटा था बाकी के चार सदस्य दोनों के वीच के वय के थे। प्रातः छः बजे आनंद बिहार से ईश्वर को स्मरण कर अपने प्रथम पढ़ाव हरिद्वार के लिये प्रस्थान किया। कुछ डर था किसान आंदोलन के कारण कोई बाधा उत्पन्न न हो? पर ऐसा कुछ नहीं हुआ।

200 किमी॰ तक की हरिद्वार यात्रा पुष्कर जी के कुशल कार चालन के कारण बगैर किसी अवरोध और बाधाओं के पूरी हुई। इस यात्रा के दौरान हमारे अन्य यात्री श्री तुषार जी जो युवा सहयात्री समीर के पिता श्री थे एवं जमशेदपुर से आये ग्रुप सदस्य श्री रिंकू गर्ग थे। एक अन्य सदस्य श्री शरद हम लोगो के साथ बाद मे हरिद्वार से शामिल हुए। अपने प्रथम पढ़ाव हरिद्वार तक की लगभग 5 घंटे की यात्रा मे आपसी बातचीत, विचार विमर्श के बाद हमे ऐसा महसूस हो रहा था कि हम सभी यात्री एक दूसरे से सालों पूर्व से परिचित हों। यात्रा मे सभी एक दूसरे की आवश्यकताओं चिंताओं को ध्यान कर एक ऐसी निकटता अनुभव कर रहे जो प्रायः घनिष्ठ मित्र एक दूसरे की करते हों। पुष्कर जी इस कार ग्रुप के प्रमुख के नाते उस स्प्रिंग की तरह थे जो फैलने पर वरिष्ठ के साथ सिकुड़ने पर अनुज के साथ और मध्यम स्थित मे युवाओं के साथ अपना सामंजस्य बड़ी आसानी से स्थापित कर लेते।

हरिद्वार मे होटल गंगा व्यू मे रुकने के पहले से ही व्यवस्था थी। रूम मे सामान रख हम सभी ने हर की पौढ़ी की तरफ प्रस्थान किया। तुषार जी एवं उनका बेटा काफी लंबे अंतराल के बाद हरिद्वार आ रहे थे। श्री रिंकू जी भी पहली बार ही आये थे।  पुष्कर जी यध्यपि अपने पैतृक निवास पर हरिद्वार होकर ही जाते रहे पर हर की पौढ़ी पर आने का संयोग नही हुआ। गंगा नदी की अविरल तीव्र धारा को देख सभी आनंद और उत्साह से सरावोर थे। पौढ़ी के पूर्व एक दो  घाटो पर फोटोग्राफी कर ग्रुप एवं  खुद की  सुनहरी यादों को  मोबाइल एवं कैमरे मे कैद किया। इसके साथ साथ किशोर समीर ने हरिद्वार के प्रसिद्ध खान पान को गूगल पर ढूंढ कर उन दुकानों की भी तलाश की। हरिद्वार की पतली छोटी गलियों मे शीघ्र ही त्यागी जी की मथुरा की प्रसिद्ध रबड़ी की दुकान से रबड़ी की शुरुआत की। प्रकाश की कुल्फी भी का रसास्वादन भी इस क्रम मे हुआ। यद्यपि जैन साहब के "कांजी वड़ा" तलाशने मे कठिनाई हुई लेकिन "मेहनत करने वालों की हार नहीं होती" की नीति पर कांजी वड़े, चाट एवं गोलगप्पे आखिर पा ही लिये।

मनसा देवी मंदिर के दर्शन हेतु उड़न खटोले की सेवायें ले माता के दरबार मे हाज़िरी लगाई। और आज के अंतिम पढ़ाव "हर की पौढ़ी" पर गंगा माँ की आरती के लिये एक अच्छे स्थान को निशाना बना लगभग चार बजे गंगा जल का आचमन कर उस स्थान पर ही सभी लोगो ने डेरा जमा बैठ गये। आरती मे अभी काफी वक्त था रावत जी ने अपने कैमरे का ट्राइपॉड सेट किया और हम सभी आपस मे गपियाते, बतियाते चर्चा करते रहे। मै पहले भी अनेकों बार हर की पौढ़ी पर गंगा आरती मे शामिल हुआ पर उस दिन एक उल्लेखनीय बात जो मैंने देखी की गंगा नदी का पानी इतना स्वच्छ निर्मल आसमानी नीला एवं साफ था कि घाट पर स्थित नदी की नीचली सीढ़ियों की तली एक दम साफ दीख रही थी। मुझे लगता है कि ये सरकार की निर्मल गंगा अभियान  का प्रभाव ही था जिसके लिये सरकार को बधाई देना तो लाज़मी था।

ठीक छः बजे गंगा मैया की जय कारों के साथ नयनभिराम आरती के दृश्य से आँखे नहीं हट रही थी। विशाल आरती की छवि कलकल बहती नदी मे बहुत ही सुंदर प्रतीत हो रही थी। बीच नदी मे एक काले बगुले को भोजन की तलाश मे विचरते देखना इस बात का गवाह था की गंगा के स्वच्छ, अविरल, निर्मल धारा से मानव ही नहीं प्रकृति के जलचर भी आनंद और उत्साह महसूस कर रहे हों। गंगा सेवा समिति के स्वयं सेवक भी घाट को साफ सफाई रख कर भक्तों को सुव्यवस्थित तरीके से बैठा कर अपने सेवा भाव को दर्शित कर रहे थे। लगभग एक घंटे की आरती की छटा से सभी अपने को धन्यभागी मान माँ गंगा की धारा मे नत मस्तक थे। अपने उपर गंगा जल की छींटे मार शरीर और मन को पवित्र कर हमने अपने गंतव्य की ओर प्रस्थान किया ताकि अगले दिन बहुत सवेरे बुरान्सखंडा की ओर प्रस्थान किया जा सके।

 

विजय सहगल      

                           

गुरुवार, 28 जनवरी 2021

सुरकुंडा देवी मंदिर, धानौल्टी, उत्तराखंड

 

"सुरकुंडा देवी मंदिर, धानौल्टी, उत्तराखंड"








पिछले दिनों 14 जनवरी 2021 को सीपी, दिल्ली मे ट्रैवल ग्रुप ऑफ इंडिया (टीजीआई) के एक कार्यक्रम मे जाना हुआ था। ये किसी एफ़बी पर किसी  ग्रुप मे मेरी पहली मीटिंग थी। सोचा न था इतने अच्छे लोग एकसाथ एक जगह मिलेंगे। श्री राकेश कटारिया जी के नेत्रत्व मे संचालित ग्रुप की ये पहली मुलाक़ात एक यादगार मुलाक़ात रही। ग्रुप की बुरांसखंडा मे सरकुंडा देवी मंदिर की  यात्रा का निमंत्रण मिलने पर जिज्ञासा मिश्रित उत्साह था क्योंकि मै पहली बार किसी ट्रवल्लर्स ग्रुप मे यात्रा पर जा रहा था।    

मेरी एक कमी है स्वादिष्ट भोजन मे मिष्ठान ग्रहण करने के बाद मै कोई चाय, कॉफी, पान, पान मसाला या माउथ फ्रेसनर नहीं लेता ताकि मुंह मे  स्वादिष्ट मिष्ठान का स्वाद देर तक बना रहे। कुछ ऐसा ही संयोग इस यात्रा मे रहा कि सरकुंडा देवी मंदिर के नयनभिराम छवि उस सुखद मिष्ठान की तरह मै अपने मन मे देर तक रखना चाहता था। यही कारण है कि यात्रा के  अंतिम पढ़ाव का वर्णन  लिखने की शुरुआत पहले कर रहा हूँ।  यात्रा के आरंभ का विवरण  अगली कड़ी के रूप मे बाद मे प्रस्तुत करेंगे।

गणतन्त्र दिवस के पवित्र दिन 26 जनवरी 2021 की प्रातः 10 बजे के लगभग ट्रैवलर्स ग्रुप ऑफ इंडिया के कारवां ने वुरांसखंडा से सुरकुंडा देवी मंदिर के दर्शन हेतु प्रस्थान किया। हमारे कार रूपी रथ मे मेरे सहित छः रथी सवार थे और सारथी के रूप मे श्री पुष्कर रावत जी थे  जिनकी रथ संचालन की दक्षता की जितनी भी प्रशंसा की जाये कम है।      

पौराणिक कथानुसार भगवान शिव की पत्नी सती ने यज्ञ मे भगवान शिव को आमंत्रित न करने के कारण अपने प्राणों की  आहुति दे दी थी। किवदंती है कि ये वो पवित्र स्थान है जहां पर सती का सिर गिरा था। ऐसी मान्यता है कि सुरकुंडा देवी के इस  मंदिर मे माँ के दर्शन से भक्तों की मनो कामनाएँ पूर्ण होती है। इन्ही श्रद्धा, विश्वास और समर्पण के भाव लिये हम लोग अपने ग्रुप के अन्य सदस्यों के साथ मंदिर के प्रवेश द्वार पर जा पहुंचे। ग्रुप चर्चा मे बताया गया था कि प्रवेश द्वार से मंदिर की दूरी लगभग डेढ़ कि॰मी॰ है। कुछ सहयात्रियों ने हम लोगो के साथ प्रवेश द्वार तक की यात्रा तो की पर अपनी मंदिर तक चढ़ने की असमर्थता के वशीभूत  नीचे से ही सरकुंडा माँ के श्री चरणों मे प्रणाम कर चाय की दुकान पर ही सभी के बापसी आने तक अपना डेरा डाले रहे।

लेकिन प्रवेश द्वार की सीढ़ियाँ चढ़ने पर ही मैंने  अपनी क्षमता का अंकलन कर लिया और बहादुरी से निर्णय लिया कि पैदल मंदिर तक चढ़ना हमारे बूते की बात नहीं और कुछ दूरी पर ही उपलब्ध घोड़े की सहायता लेने के निर्णय मे एक पल की भी देरी नहीं की। मेरा निर्णय मेरी उम्र और क्षमता के अनुरूप सही था क्योंकि मंदिर तक पहुँचने का मार्ग सीमेंट से बना तो था पर काफी ऊंचाई लिये हुएँ था कहीं कहीं ऊबड़ खाबड़ भी था जो हम जैसे उम्रदराज लोगो के लिये कठिन चढ़ाई लिये हुए था। घोड़े के मालिक ने मुझे घोड़े पर  पर सवार किया।  मुझे ये जानकार प्रसन्नता थी कि मेरे सारथी श्री केशव सिंह जी है।  जब बासुदेव भगवान  श्री कृष्ण जिसके रथी हों उनका  भवसागर के पार होना निश्चित है तो फिर सरकुंडा देवी के दर्शन हेतु जिस घोड़े के मालिक साक्षात श्री केशव मेरे साथ थे  तो मंदिर की यात्रा तो सफल होने ही थी। घोडा अपने तय मार्ग से उपर चढ़ रहा था। रास्ते मे ऊंची ऊंची सीमेंट की बेढब सीढ़िया और कहीं बड़े बड़े गड्ढे की बाधाओं को घोड़े ने बड़ी आसानी से पार कर लिया। घोड़े के रथी श्री केशव कभी दायें खिसक कर बैठने तो कभी आगे झुक कर बैठने का निर्देश देते, कभी घोड़े को चाबुक का भय दिखा मंथर गति से उपर चढ़ने का निर्देश देते। घोड़े की सफल सवारी पश्चात अब मंजिल सामने ही थी। मै पूर्व मे गौरी कुंड से केदारनाथ मंदिर तक का 12-13 किमी॰ ट्रेक कर चुका था पर ये डेढ़ दो किमी॰ की चढ़ाई काफी खड़ी, ऊंची व कठिन थी।  

यात्रा मे यध्यपि नौजवान, बच्चों, पुरुष महिलाओं के साथ साथ कुछ प्रौढ़ भी मंदिर तक चढ़ने के हौसले के साथ आगे बढ़ रहे थे। एक नौजवान तो एक पोलियो ग्रस्त युवा को अपनी पीठ पर बैठा चढ़ने के प्रयास के मार्मिक दृश्य को देख मेरा हृदय करुणा से भर गया। पोलियो ग्रस्त युवा का उस नौजवान से क्या रिश्ता था, वो उस युवा का दोस्त था, भाई था या कोई और मै नहीं जानता पर ये निश्चित था कि उसने अपनी  दोस्ती या भाई के रिश्ते बड़ी सिद्दत और समर्पण के साथ निभाया। ऐसे दोस्ती या भाईचारे प्रायः देखने को नहीं मिलती! ऐसे रिश्ते को  मेरा नमन। एक और युवा को साइकिल के साथ पहाड़ की चढ़ाई करते देख भी युवा पीढ़ी के बहादुराना कृत को देख देश के सुखद, सुनहरे व उज्ज्वल  भविष्य को देख खुशी हुई।

मंदिर मे प्रवेश करते ही विशाल प्रांगण मे सूर्य की स्वर्णिम प्रभा मे प्रकाशित एवं  स्वर्ण आभा से चमकता पाँच मंजिला सुरकुंडा देवी का भवन नयनभिराम था। बौद्ध शैली मे बना ये भव्य, विशाल  मंदिर अत्यंत ही आकर्षित एवं सुंदर था। मंदिर के सामने दूर हिमालय पर्वत की हिमाच्छादित चोटियाँ देवलोक का आभास करा रही थी। बर्फ से लदी चोटियाँ ऐसा आभास करा रही थी मानों स्वर्ग  से दुग्ध की धाराएँ फूट नदी के रूप मे आवेग के साथ  पृथ्वी पर आने को आतुर हों।

लंबी कतारों मे अपनी बारी की प्रतीक्षा करता हुआ धीरे धीरे आगे बढ़ा। माँ सुरकुंडा देवी के प्रति आस्था, श्रद्धा एवं विश्वास लोगो के चेहरे पर साफ दिखाई देता था। माँ सुरकुंडा देवी के दर्शन की अभिलाषा एवं आकांक्षा के उत्साह ने  मंदिर आने तक की थकावट लोगो के  चेहरे से तिरोहित हो चुकी थी। मंदिर मे माँ सुरकुंडा देवी के दर्शन मन और हिर्दय को आनंद देने वाले थे। माँ के चरणों मे दंडवत कर अपने भाग्य को धन्य एवं कृतार्थ मानता हुआ मंदिर से बापस चल दिया। मंदिर प्रांगण की  एक पूरी परिक्रमा कर बापस अपने गंतव्य के लिये धीरे धीरे पहाड़ से उतरता हुआ चल दिया  जो चढ़ने के मुक़ाबले अनेकों गुना आसान और सरल था।

जय माँ सुरकुंडा देवी की-जय!!

 

विजय सहगल                           

 

शनिवार, 23 जनवरी 2021

मै झाँसी की रानी बोल रही.....

पिछले दिनों 9 जनवरी को किले के मैदान झाँसी पर ब्लॉग (https://sahgalvk.blogspot.com/2021/01/blog-post_8.html) लिखा था, पर दिल मे उठी टीस अभी शांत भी न हुई और शब्द बन के पुनः बिखर गये जिन्हे समेट कर आपके सामने रख रहे है। -विजय सहगल







"मै झाँसी की रानी बोल रही....."

हे कृतघ्न राज्यवासी मेरे,
मै झाँसी की रानी बोल रही।
"मैदान किले" के हालत पे,
घुट आँसू आँखों घोल रही॥

तुमको निज गौरव ज्ञान नहीं,
झाँसी का अभिमान नहीं।
जिसकी खातिर बलिदान हुई,
उस माटी का अपमान वहीं?
घर के लोगो का ढीठपना,
ऐसा होगा रोका भी न गया?
पर बूढ़े सहज सयाने थे,
इस ढीठपने टोका भी न गया?
माना संग्राम पुराना था,
सन सत्तावन की माटी मे।
पर, खड़ी आज भी प्राचीरे
बन गवाह किले की घाटी मे।

बेशक उस आँगन, न आते।
न फूल "चौक" चढ़ा जाते॥
कीचड़ कचरे से सराबोर।
मल, मूत्र, मैल, विचरत ढोर॥
जिस आँगन वीर समाते थे।
मुक्ति दिवस मनाते थे॥
हा! शील, शोक, शर्म, लज्जा,
"विपदा" का मेघ घना काला।
मेरे प्यारे से आँगन को,
कचरे का ढेर बना डाला?

जीते जी मै कहती ही रही,
"मै अपनी झाँसी नहीं दूँगी"।
धोखा दे "गोरन" छीन लई,
ले पुनर्जन्म लड़ूँगी मै॥
सन् सत्तावन से भटक रही,
नगरी की गलियाँ न्यारी हैं।
माँ हूँ, धिक्कार नहीं सकती,
"झाँसी प्राणों", जो प्यारी है॥
दुनियाँ मे डंका बजा दिया,
जब "गोरन", झाँसी "रार" भई। (गोरन= अंग्रेज़)
हा! "दुर्दैव" हमारा था,
"रानी" घर मे ही हार गई॥

"सौगंध तुम्हें"!, इस आँगन की,
"मर्यादा" पर मुँह खोलो?
"मर्दानी" इतिहास लिखूँगी फिर,
हे मौन "बुंदेले हर बोलो??
हे मौन "बुंदेले हर बोलो??

विजय सहगल

मंगलवार, 19 जनवरी 2021

सीएनबीसी आवाज", "स्टॉक 20-20 धोखाधड़ी

 

"सीएनबीसी आवाज", "स्टॉक 20-20 धोखाधड़ी"




पिछले दिनों भारतीय शेयर बाज़ार को नियंत्रित करने बाली सबसे बड़ी संस्था ने दिनांक 13 जनवरी 2021 को अपने एक आदेश के तहत रिलायंस इंडस्ट्रीज़ के स्वामित्य वाला प्रमुख टीवी चैनल सीएनबीसी आवाज पर एक रिपोर्ट प्रस्तुत की (https://www.sebi.gov.in/enforcement/orders/jan-2021/interim-order-dated-january-13-2021-in-the-matter-of-cnbc-awaaz-stock-20-20-show-co-hosted-by-mr-hemant-ghai_48743.html)। इस आदेश के तहत इस चैनल द्वारा आयोजित कार्यक्रम स्टॉक 20-20 के माध्यम से धोखाधड़ी के एक मामले पर एक बड़ा  खुलासा किया। उक्त कार्यक्रम सीएनबीसी आवाज टीवी के एंकर श्री हेमंत घई द्वारा संचालित किया जाता रहा था। इस धोखाधड़ी मे  हजारों  दर्शक जो चैनल एवं उसके एंकर के विश्वासघात के शिकार हो अपनी मेहनत की कमाई को गवा बैठे। घोटाले मे शामिल धनराशि का  आंकलन  करोड़ो रूपये की राशि के रूप मे हो सकता है।  

घोटाले का तरीका सेबी ने अपनी वैबसाइट पर इस तरह बताया। दर्शको के साथ धोखा धड़ी को सेबी ने इस एंकर हेमंत घई उनकी माँ  एवं पत्नी  के शेयर की प्रविष्टियों पर 1 जनवरी 2019 से 20 मई 2020 के बीच के समयान्तराल मे पैनी निगाह रक्खी तो इस धोखाधड़ी का खुलासा हुआ। अब तक उक्त धोखाधड़ी से इस परिवार ने लगभग तीन करोड़ की रकम की कमाई सामने आयी है। सेबी द्वारा तो जांच 1 जनवरी 2019 से की गई, धोखा धड़ी कब से की जा रही थी कहा नहीं जा सकता। धोखाधड़ी के इस मामले के तहत चैनल के सोमवार से शुक्रवार तक नित्य प्रातः  चलने वाले स्टॉक 20-20 कार्यक्रम मे दर्शको को  कुछ कंपनी के शेयरों को खरीदने या बेचने की सलाह दी जाती थी। दर्शक, चैनल एवं होस्ट श्री हेमंत घई की अनुशंसा पर वे शेयर खरीद या बेच देते थे और उसी दिन उनको बापस बेच कर मुनाफा कमाते थे पर अनेकों बार अनुशंसा विफल होने पर घाटा उठाने के लिए निवेशक वाध्य भी होते थे। ठीक इसी तरह शेयर मार्केट बंद होने के पूर्व एक अन्य कार्यक्रम के तहत शेयर  "आज ख़रीदों कल बेचों" (बीटीएसटी)  या "आज बेचों कल ख़रीदों" (एसटीबीटी) के तहत कंपनियों के शेयर खरीदने/बेचने की अनुशंसा करते थे। इन कार्यक्रमों मे एक चलताऊ वैधानिक चेतावनी भी सामान्य लोगों हेतु  प्रचारित/प्रसारित की जाती थी कि "निवेश बाज़ार के जोखिमों के अधीन होता है, कृपया निवेश के पूर्व अपने विशेषज्ञ की सलाह ले",। यहाँ तक तो तब भी ठीक था। पर धोखा धड़ी की शुरुआत तब होती थी जब एंकर हेमंत घई जिन कंपनियों के शेयर को खरीदने की अनुशंसा शेयर मार्केट के खुलने के पूर्व करता था उन मे से एकाध कंपनी के शेयर वो अपनी पत्नी और माता जी के नाम एक दिन पहले ही खरीद लेता था और जब दूसरे दिन उसकी शेयर खरीदने की अनुशंसा टीवी पर प्रसारित होती तो हम जैसे दर्शक उन शेयर की खरीद शुरू कर देते जिससे उन शेयर के दाम बढ़ना शुरू हो जाते इसी बीच उनकी पत्नी एवं माँ के नाम एक दिन पहले खरीदे गये शेयरों को बाज़ार मे बेच कर मोटा मुनाफा कमा लिया जाता। चैनल के दर्शकों के पैसे की कीमत पर धोखा धड़ी कर ये मोटा मुनाफा हेमंत घई एवं उनके परिवार  द्वारा कमाया गया।   

धोखाधड़ी के इस मामले मे देश के एक प्रमुख औध्योगिक घराने रिलायंस इंडस्ट्रीज़ के स्वामित्व वाले इस चैनल के कर्मचारी की इस  धोखाधड़ी के बारे मे किसी भी दृश्य श्रव्य या प्रिंट मीडिया ने कोई समाचार प्रकाशित या प्रसारित नहीं किया। अफसोस इस बात का है कि देश मे निकलने वाले राष्ट्रीय/अंतर्राष्ट्रीय या स्थानीय  दैनिक समाचार पत्रों ने भी इस धोखाधड़ी के बारे मे एक लाइन का समाचार भी नहीं प्रकाशित किया। सीएनबीसी आवाज टीवी चैनल  ने अपने कर्मचारी की इस काली करतूत पर खेद जाताना तो दूर उनके कर्मचारी द्वारा आम दर्शको से  करोड़ो रूपये की लूट के इस समाचार को प्रसारित करने मे गुरेज किया। सीएनबीसी आवाज समाचार चैनल ने महज इतनी नैतिकता जरूर दिखाई कि इस न्यूज़ एंकर को दिनांक 14 जनवरी से अपने चैनल से पूर्णतः  अलग कर दिया, अभी ये कहना मुश्किल है कि इस एंकर को हटाया गया या नहीं। कोई कानूनी कार्यवाही की गई या नहीं इसकी सूचना भी चैनल ने अपने प्रसारण मे नहीं की।    

जो न्यूज़ ब्रोडकास्टिंग एसोशिएशन (mail id:  nba@nbanewdelhi.com) के सदस्य  कल तक टीआरपी के मुद्दे पर "कूकर क़तरव्योंत" कर एक दूसरे पर दोषारोपण करते नहीं थकते थे, आज रिलायंस इंडस्ट्रीज़ जैसे  बड़े औध्योगिक घराने के स्वामित्व वाले  टीवी चैनल पर उसके एंकर द्वारा दर्शकों के साथ किये गये फ़्रौड, घोटाले और धोखाधड़ी पर मौन है मानों उनके "मुँह मे दही जमा" हो? एक मिनिट मे दस, या दस मिनिट मे सौ समाचार दिखाने वाले ये टीवी चैनल गली चौराहे के झगड़े, फसाद पर फिल्म "पीपली लाइफ" के तरह   अनर्गल समाचार दिखा कर अपने आपको देश का जिम्मेदार समाचार चैनल बता "अपने मुँह मियाँ मिट्ठू बन कर" या  "अपनी ही पीठ थपथपाने वाले" ये चैनल  कुछ माह पूर्व "कार्वी स्टॉक ब्रोकिंग द्वारा भी निवेशकों के साथ हुई धोखाधड़ी पर  ये समाचार चैनल ऐसे ही मौन रहे!! हम जैसे निवेशक यूं ही लुटते पिटते रहे, न तो सरकार ने हस्तक्षेप किया और ने ऐसे ज्वलंत मुद्दे पर इन समाचार चैनल्स ने  अपने कर्तव्य का निर्वहन किया।   

मै सरकार और ब्रॉडकास्टिंग कण्टेंट्स कोम्प्लैंट्स काउंसिल (mail id:  ibf@ibfindia.com)से मांग करते है की आपके न्याधिकार के  अधीन आने वाले इन समाचार चैनल को बगैर किसी पक्षपात के निष्पक्षता के साथ जनहित के समाचारों को प्रसारित एवं प्रसारित कर जनता के हितों की रक्षा करने के निर्देश जारी करे। हम ये भी मांग करते है सीएनबीसी आवाज भी उनके कर्मचारी द्वारा की गई धोखाधड़ी के लिये अपने चैनल पर विना शर्त खेद और अफसोस प्रकट करे।

विजय सहगल   

शनिवार, 16 जनवरी 2021

मजबूत हाथ

 

"मजबूत हाथ"

 



बैंक की सेवा मे लगभग उन्तालीस साल के  सेवा काल  के तमाम खट्टे मीठे  अनुभव जीवन की गठरी मे समेटे रखने के साथ ही लगभग इतने साल की  ही अनेकों अनुभूतियाँ बैंक के संगठनों के साथ भी जुड़ी हुई है जिनका यदा कदा स्मरण होना लाज़मी है। कुछ ऐसा संयोग मेरे साथ जुड़ा रहा कि मै सेवा के प्रारंभिक  समय से ही संगठन से जुड़ा रहा। संगठन मे सक्रिय भागीदारी  शायद नहीं रही लेकिन हमारी भागीदारी  निष्क्रिय भी नहीं थी। कहने के तात्पर्य यह है कि संगठन के कार्यों या भागीदारी मे जहां कहीं  भी मै रहा हमारी उपस्थिती अपरिहार्य रही  जिसे उल्लेखनीय वेशक न माना जाये लेकिन नज़रअंदाज़ भी नहीं की गयी। जिसका मुख्य कारण मेरा लखनऊ पदस्थापना के समय श्री यू.सी. बाजपेई, श्री आरपीसिंह, इंदौर के श्री आलोक खरे, रायपुर मे कॉम॰ डी.के. चटर्जी, भोपाल मे श्री वीरू भाई जैसे समर्पित निष्ठावान साथियों से संपर्क, सानिध्य एवं संगठन के प्रति स्वभावगत रुझान रहा। मेरी  ओरिएंटल बैंक के संगठनकारी  शीर्ष नेतृतत्व के सानिध्य और संपर्क के रहते इनके बारे मे राय  हमेशा से अलग रही। मेरा हमेशा से मानना रहा कि हमारे  बैंक की यूनियन अन्य बैंको  या बैकों के  अखिल भारतीय संगठन से एक मायने मे सर्वथा भिन्न रही, वह थी  यहाँ के नेतृत्व कारी नायकों की पाँच सितारा सांस्कृति और संगठनात्मक कार्यों मे भी "फाइव स्टार" रहन सहन। यही कारण रहा कि  मै हमेशा अपने बैंक यूनियन्स  को "रॉयल यूनियन" अर्थात "शाही संगठन" कहा करता रहा।

शायद 1998 की ही बात थी। मुझे याद है कि रायपुर की पदस्थापना के दौरान बैंक कर्मियों के छत्तीसगढ़ मे सर्वोपरि एवं निर्विवाद  नेता कॉम॰ डीके चटर्जी जी का एक बार फोन आया कि श्री ए बी वर्धन, महासचिव भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी का रायपुर प्रवास है जो पोस्ट ऑफिस कर्मचारी संगठन,  रायपुर के किसी कार्यक्रम मे भाग लेने हेतु आ रहे थे। उनको रायपुर हवाई अड्डे से शंकर नगर स्थित गेस्ट हाउस लाने हेतु कार की सेवाये चाही थी। मैंने चटर्जी दादा को बोल रखा था कि कभी भी संगठन के कार्य हेतु आने जाने के लिये मेरी कार की सेवाओं  की आवश्यकता लगे तो निसंकोच ले सकते है। मुझे खुशी थी कि अखिल भारतीय स्तर के कद्दावर नेता श्री ए बी बर्धन को  अपनी साधारण  मारुति 800 मे  बैठाने का मुझे  सौभाग्य प्राप्त हो रहा था। मुझे इस बात का और भी  फख्र था कि अखिल भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी का महासचिव एक नॉन-ए॰सी॰ कार से अप्रैल-मई मे रायपुर की भरी दोपहरी गर्मी  के  मौसम मे हवाई अड्डे से अपने गंतव्य तक 18-20 किमी की यात्रा कर रहा था। वे चाहते तो बड़ी लक्जरी एसी कार की मांग कर सकते थे। लेकिन एक सच्चे मजदूर संगठन के नेता ने वो ही आचरण प्रस्तुत किया जो एक सच्चे मजदूर संगठन से अपेक्षा थी। क्या ओरिएंटल बैंक के अधिकारी/कर्मचारी  संगठन के अखिल भारतीय अध्यक्ष या महासचिव तो दूर की बात है किसी अदने से स्थानीय स्तर के नेता से ये  अपेक्षा की जा सकती थी कि वह सड़ी सी मारुति 800, नॉन-एसी कार मे बैठना भी गवारा करता? मुझे इस बात का घोर आश्चर्य था  कि ओरिएंटल बैंक के अधिकारी संगठन जैसी  एक छोटी इकाई का  एक महासचिव एक शानदार लक्ज़री बड़ी वातानुकूलित कार जिसकी लागत शायद 15-16 लाख थी, अपने संगठनिक  उपयोग के लिये संगठन के खर्चे से ले सकता है!! और जिसके ड्राईवर का वेतन आदि भी संगठन वहन कर सकता है? हमे इस बात पर शक है, कि  अखिल भारतीय बैंक अधिकारी संगठन के महासचिव या इसके पैतृक संगठन भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी के महासचिव भी ऐसी शानदार गाड़ी का उपयोग अपने निजी या सांगठनिक  आवश्यकताओं के लिये करता हो??  कदाचित उक्त मजबूत धारणा के वशीभूत ही मै ओरिएंटल बैंक के अधिकारी संगठन को "शाही संगठन" कहता रहा था।         

राजनैतिक दलों की विलासतापूर्ण जीवन शैली की ये बुराइयाँ हमारे बैंक के अधिकारी संगठन मे भी  विध्यमान हो गई जो हमारे बैंक के संगठन की अधोगति का मुख्य कारण रही। बैंक के स्थानीय शहरी अधिकारी  संगठन से लेकर अखिल भारतीय स्तर के क्षत्रपों मे कुछ को छोड़ कर बगैर किसी सकारात्मक और रचनात्मक कार्य किये पद पर जीवन पर्यंत बने रहने की अप्रितम लालसा ने हमारे बैंक और संगठन का बड़ा अहित किया। इन्होने संगठन की  विलासता पूर्ण शैली पर वर्चस्व बनाये रखने की अपनी आजीवन अभिलाषा  के कारण अखिल भारतीय स्तर से प्रांतीय स्तर की इकाइयों मे "सेकंड लाइन" को कभी प्रोन्नत करने की जहमत ही नहीं उठाई? बल्कि ऐसे किसी भी व्यक्ति के प्रयास को हतोत्साहित किया।  हर स्तर पर पूर्व मे जमे पदधारियों ने सांठगांठ कर हमेशा अपना वर्चस्व बनाये रखने के लिये नौजवान पीढ़ी को संगठन के पास भी नहीं फटकने दिया। नौजवान पीढ़ी को संगठन  मे लाने की कभी कोई कोशिश तो दूर छद्म प्रयास भी नहीं किये।  

ठकुरसुहाती की तर्ज़ पर नेताओं की पीठ सहलाने  बाले और तलुबे का रसास्वादन करने  वालों को ही अपनी टीम मे शामिल किया। अपनी निजी अहम और स्वार्थ पूर्ति के अहंकार ने संगठन के नये नौजवान साथियों एवं आम सदस्यों को संगठन से इतना दूर कर दिया कि संकट के समय आम सदस्यों ने नेताओं से दूरी बना ली जिसके कारण संगठन की संगठनात्मक शक्ति का ह्रास हुआ जो कि सर्वविदित है। अपने चंद चहेते लोगो के हितों के अलावा बैंक के नये नौजवान अधिकारियों से संपर्क न रखने एवं उनके  हितों को नज़रअंदाज़ करने के कारण ही   बैंक के मर्जर के बाद एका एक अधिकतर अधिकारियों द्वारा एआईबीओए को छोड़ कर दूसरी यूनियन मे शामिल होना इसका बड़ा जीवंत ज्वलन उदाहरण है। 

पिछले दिनों दिल्ली पदस्थपना के दौरान मुझे  दिल्ली राज्य  बैंक ऑफिसर एसोशिएशन की सामान्य सभा मे शामिल होने का सौभाग्य मिला। शायद 2017 का साल था। वाईएमसीए सभागार मे सामान्य अधिवेशन का आयोजन किया गया था। मै भी अधिकारी संगठन के सदस्य के नाते उत्सुकता वश कॉन्फ्रेंस मे शामिल होने के  निश्चिय के साथ तय  समय एवं स्थान पर पहुंच गया। अन्य शहरों के मुक़ाबले देश की राजधानी दिल्ली जैसे महानगर मे सदस्यों का उत्साह निष्ठा और समर्पण उल्लेखनीय तो नहीं पर  ठीक ठाक ही कहा जा सकता था। सम्मेलन की शुरुआत शाम के छह सात बजे हुई। हाल के क्षमता के हिसाब से सदस्यों की संख्या लगभग दो सौ के आसपास थी। परंपरा के मुताविक स्वागत आदि की परंपरा के निर्वहन पश्चात  महासचिव की रिपोर्ट आदि की  औपचारिकता भर नज़र आई। कॉम॰ शर्मा के उद्घाटन सम्बोधन उनकी कर्मचारी संगठन के प्रति निष्ठा और समर्पण के अनुरूप था। नई कार्यकरणी के गठन के समय  यहाँ भी सेवा निवृत्त दशकों से पदस्थ पुराने नेतृत्व की पद ने छोड़ने की लालसा स्पष्ट द्रष्टि गोचर हुई। यहाँ भी चुनाव की औपचारिकता भर निभाने की रस्म अदा की जा रही थी।  पूर्व मे गठित कमेटी जिसमे महासचिव एवं अध्यक्ष मंचासीन थे जो दोनों ही  बैंक की सेवा से 7-8 वर्ष पूर्व सेवानिवृत्त हो चुके थे। उनकी  भाषण शैली के मेरे सहित अनेकों साथी मुरीद थे पर इसके अतिरिक्त कभी कोई उल्लेखनीय  रचनात्मक कार्य कभी देखा या सुना हो याद नहीं। संख्या बल ही हमेशा उनके स्थानीय स्तर से राज्य स्तर तक यहाँ तक कि अखिल भारतीय स्तर तक  पहुँचाने मे मुख्य कारक रहा। यहाँ भी महासचिव सहित एक अन्य कॉम॰ जो  प्रेसिडेंट पद के लिये नामित थे। निर्विरोध निर्वाचन की पृक्रिया पूरी होती इसके पूर्व एक कॉम॰ संजय खान जो शायद पीएनबी या सेंट्रल बैंक से थे, तुलनात्मक रूप से काफी यंग थे उन्होने मंच पर आकार सेवानिवृत्त व्यक्तियों द्वारा कमेटी मे उनकी पुनः  पदस्थपना का विरोध किया।

ट्रेड यूनियन मे परिपक्व साथी कॉम महासचिव  का एक रूप मैंने एआईबीओए की चेन्नई स्थित कॉन्फ्रेंस मे पूर्व मे  देख चुका था जहां उन्होने कॉम॰ श्रीधरन का महासचिव पद पर नामांकन का इस विना पर विरोध किया था क्योंकि कॉम॰ श्रीधरन उस समय तक सेवानिवृत्त हो चुके थे। उनकी ओजस्वी वाणी मे  "रिटाइरी-रिटाइरी बापस जाओ" के वो नारे और चेन्नई का वो मंजर हमे आज भी याद है।  आज वही कॉम॰ जो स्वयं भी 6-7 साल पूर्व बैंक सेवा से निवृत्त हो चुके थे लेकिन आज वे दिल्ली राज्य बैंक ऑफिसर असोशिएशन के महासचिव पद के प्रत्याशी थे। एक ही चेहरे पर अनेकों मुखैटों का एक अनुपम उदाहरण मुझे साक्षात सम्मेलन मे देखने को मिला। पर संजय खान के विरोध के कारण कॉम महासचिव का वह ऐतिहासिक सम्बोधन मुझे आज भी याद है। जिसमे उन्होने कॉम॰ संजय खान के विचारों पर कटाक्ष कर उनकी आलोचना ही नहीं की बल्कि स्वयं और कॉम॰ अध्यक्ष  (दोनों ही सेवानिवृत्त) को संगठन के लिये समर्पित एवं निष्ठावान एवं निस्वार्थ साथी बताया। कॉम॰ संजय खान के सेवानिवृत्त साथियों के  चुने जाने पर सवाल पर अपना वचाव करते हुए उन्होने आगे आ कर कहा जिसका भाव ये था "कि  हम कोई पद की लालसा और लालच की बजह से कमेटी मे नहीं आ रहे है बल्कि हम चाहते है कि कमेटी की बागडोर मजबूत हाथों को सौंपे"।  हम ऐसे ही खून पसीने से सींची कमेटी को यूं ही किसी कमजोर नेतृत्व  को नहीं सौंप सकते? हम चाहते है नौजवान साथी आयें पर दुःख है हमे आज कोई ऐसे साथी नज़र नहीं आते जिनके हाथों मे इतनी बड़ी ज़िम्मेदारी सौंप सके? बड़ी तालियाँ पिटी थी हाल मे। घोर आश्चर्य इस बात का था कि ये बाते एक ऐसे वरिष्ठ साथी कह रहे थे जिन्होने कॉम॰ श्रीधरन जैसे व्यक्ति का सेवानिवृत्ति के कारण अध्यक्ष पद पर आसीन होने  का विरोध कर स्वयं एआईबीओ के अध्यक्ष पद पर आसीन हुआ था। यहाँ भी पर्दे के नजदीक संजय खान को मजबूत हाथों के गुर सिखाने की ज़िम्मेदारी लेते हुए कॉम खान  संगठन को  कोई अदना  पद दे वे दोनों पुनः  महासचिव और प्रेसिडेंट के पद पदासीन हो गये/  सत्तारूढ़ हो गये और शायद आज की तारीख मे भी पदासीन हों??

एक मजेदार बात जान कर आपको हैरानी एवं आश्चर्य होगा कि कॉम॰ महासचिव  जैसे रचनात्मक कार्यों, सोच और विचारों तथा संगठनात्मक नीतियों, नियम और कानून  मे आस्था व्यक्त  कर "मजबूत हाथों" बाले कॉम॰ को  दिल्ली राज्य संगठन की बागडोर तीन वर्ष के लिये सौंपी गई थी पर इन माननीय नेतागणों ने हाथ मजबूत करने के प्रयास मे  बगैर किसी चुनावी जनादेश के दिल्ली प्रदेश संगठन को तीन वर्ष की जगह 11 वर्ष तक चलाते  रहे!! इन आठ वर्षों का अवैधानिक कार्यकाल मे  संगठन को तो क्या मजबूत किया होगा पर अपना "मजबूत हाथ" वाला वर्चस्व लगातार ग्यारह साल तक चलाते रहे। उनके त्याग और बलिदान के  "मजबूत हाथ"  पर एक बड़ा सवालिया निशान जरूर था? संगठन के  हाथ मजबूत हुए या नहीं पर  इस अवैधानिक कार्यकाल की अहर्निश सेवा के "हेतु" (कारण) शोध का विषय अवश्य है? शायद अपने यूनियन के दायित्वों के निर्वहन के कारण इन ग्यारह  सालों मे कॉन्फ्रेंस करने की सुध न रही हो??  ऐसे सक्रिय संगठन के समर्पित मजबूत हाथों बाले निष्ठावान कॉमरेड को  लाल सलाम!!!!!!!

विजय सहगल