"रौंटा"
हमे याद है बचपन मे जब पड़ौस के मैदान मे हम
बच्चे क्रिकेट खेलते थे तो प्रायः खेल खेल मे कभी मतभेद,
लड़ाई झगड़ा होना आम बात थी। नो
बॉल, आउट,
रन आउट जैसे मुद्दे जैसे तैसे आपस मे ही
बच्चे बहस बाजी कर क्रिकेट के निर्णय बहुमत के आधार पर कर लेते थे। खेल मे बैट की
अति महत्वपूर्ण भूमिका सर्विदित है जो हमलोगो की पहुँच से बाहर था। जो बालक बैट
लेकर हमारे खेल को जीवंत बनाता था एक बार
जब खेलने आया तो पहली ही गेंद पर आउट हो गया। उसने प्रतिवाद किया लेकिन उपस्थित
मंडली ने बहुमत के आधार पर उसको आउट करार दे दिया। पता नहीं उस दिन क्यों उसने इसे
अपनी प्रतिष्ठा का प्रश्न बना और फिर बैट भी उसी का था,
सभी बच्चे उसके बैट से खेले और चौके छक्के लगाये पर उसे पहली बॉल पर आउट कर दिया जो उसे स्वीकार नहीं था। इस सबके
बावजूद शक्ति संतुलन उसके विरोध मे था खेल मे उसके बैट के योगदान को भी नकार दिया।
उसे अपनी असफलता कतई स्वीकार नहीं थी। हम सभी छोटे बाल वृंद के समक्ष ही आउट होने
वाले बच्चे ने अंतिम हथियार के रूप मे रोना,
विलखना चालू कर दिया। विलाप की आवाज जब उसके घर मे माँ ने सुनी तो दौड़ी दौड़ी उस
छोटे से मैदान मे पहुँच गई जो स्वाभाविक ही था। पर इसके साथ साथ उसके पिताजी,
चाचा जी ताऊ जी, भी मैदान मे दौड़े चले
आये तो हम सभी बच्चों के सिट्टी-पिट्टी गुम हो गई और हम सभी बचाव की मुद्रा मे आ
गये। सच और झूठ का भान हम सभी को था पर पहली बॉल पर आउट होने बाले बच्चे का सीना
उसकी माँ, पिताजी,
ताऊ चाचा के आने से फिर से चौड़ा हो गया और मन मार कर हम लोगो को उसे फिर से कुछ
देर धाम देनी पड़ी। उसे नोट आउट करार दिया गया। हम लोग मन ही मन मौन थे क्योंकि
उसके सभी रिश्तेदार सामने जो खड़े थे। लेकिन अगली बार जब हम बच्चे फिर से खेलने
इकट्ठा हुए तो सभी उसे "रौंटा" कहके चिढ़ाते थे। विशेषकर जब वह बैटिंग
करता तो "रौंटे को आउट मत करना" वरना रोने लगेगा! कह के चिढ़ाते थे।
वे बचपन की नासमझी भरी बाते पर न जाने क्यों आज के किसान आंदोलन देख फिर उस बचपन के मंजर की याद आ गई। बचपन मे जिस बच्चे ने कभी पराजय ने देखी/सीखी हो और वह जब पहली गेंद पर आउट हो जाये तो दहाड़ मार कर रोने लगे तो समझ आता है पर अपने आप को नेता घोषित करने वाले जब ऐसा व्यवहार करे तो समझ से परे है? मेरा दृढ़ विश्वास है कि वेशक वे नेता जी "विलाप, क्रंदन, रौने से उपजी संजीवनी के कारण लोगो की पुनः सहानभूति देख भले ही खुश हो ले पर क्या सारी दुनियाँ उन्हे उसी "रौंटे" बालक की तरह नहीं देख रही होगी??
वेशक वे सार्वजनिक मंचों पर इसे स्वीकार न
करे लेकिन मन ही मन इस हताशा, निराशा भरी
पराजय पर अवश्य पछता नहीं रहें होंगे?
जमीन से उठे और जुड़े नेताओं ने अनासक्त
भाव से आंदोलनों को लड़ा और जिया है वे अच्छी तरह जानते है कि हर आंदोलन की परिणाम
"विजयी भव" हो आवश्यक नहीं। नेता यदि संघर्षों की आग मे तप कर निकले
होते और यदि अपनी ताकत, बहदुरी पर भरोसा
होता तो असफलताओं पर दुबारा उठ खड़े हो
संघर्षों की राह पर बढ्ने का जज्बा रखते और "रोने" जैसे आचरण पर न उतरते। कदाचित
"मुंह मे चाँदी की चम्मच ले कर पैदा हुए" नेताओं से इससे विलग आचरण की उम्मीद करना व्यर्थ है।
विजय सहगल


















