मै एक बार शताब्दी एक्सप्रेस से ग्वालियर की
किसी शाखा का निरीक्षण कर भोपाल आ रहा था।
घटना 2011-2012 की रही थी। मेरी पोस्टिंग उस समय भोपाल स्थित प्रादेशिक निरीक्षालय
मे थी। ट्रेन मे पेपर पढ़ने के बाद हमने चश्मे को सीट और खिड़की के बीच बाली खाली जगह पर रख दिया कि अभी फिर से मैगजीन या पेपर
पढ़ने के लिये चश्मे की जरूरत पड़ेगी कौन बार बार उसे बैग से निकलेगा, सोचा चलते समय इसको बैग या पेंट मे रख लूँगा,
चूंकि चश्मा मै सिर्फ पढ़ने के लिये ही
इस्तेमाल करता था। प्रादेशिक कार्यालय भोपल मे हमारे मित्र श्री अनिल जैन ने एक
बार मुझे सुझाव दिया कि हम लोग 8-9 घंटे
कम्प्युटर पर कार्य करते है अतः आप ये काँच के लेंस के चश्मे की जगह अच्छी कंपनी
का प्रोग्रेसिव लेंस का चश्मा लगाओ,
जिससे आप को काम करने मे आसानी रहेगी बजन मे हल्के होने के कारण कान,
नाक पर दबाब एवं तनाव भी कम रहेगा। उन दिनो टाइटन वर्ल्ड पर चश्मे की सेल भी लगी
थी। हमने भी मौके का फायदा उठाते हुए टाइटन का एक चश्मा खरीद लिया जिसकी उस समय
कीमत 3000-3500 के लगभग थी जो हमे तभी भी काफी
महंगी लगी थी। इसलिये चश्मे के इस्तेमाल और सुरक्षा मे मै अतरिक्त सावधानी वर्तता था। लेकिन हमने
प्रायः ऐसा देखा है जब किसी कार्य को आप
अतरिक्त सावधानी और सुरक्षा पूर्वक करते है तो उस कार्य के करने मे प्रायः गलती हो
जाती है। उस दिन भी ऐसा ही हुआ,
हमने सोचा जब ट्रेन से उतरेंगे तो चश्मे को उठा लेंगे। ट्रेन अपनी गति से आगे बढ़ती
रही हम खिड़की से बाहर सुंदर जंगल,
नदी,
पहाड़ो के नजारे देखते रहे और भोपाल कब पहुँच गये पता ही नही चला। भोपाल आते ही मै
अपना समान ले कर ट्रेन से बाहर आ गया। नई दिल्ली-भोपाल शताब्दी ट्रेन मे अक्सर
देखने मे आता है कि ट्रेन मे आते या जाते समय कोई न कोई ग्वालियर या झाँसी का परिचित मिल ही जाता है क्योंकि ट्रेन का बही
रैक नई दिल्ली बापस जाता है और ग्वालियर, झाँसी से आने बाले और
ग्वालियर झाँसी जाने बाले प्लेटफॉर्म पर ही मिल जाते है। उतरते समय मुझे हमारे एक मित्र विजय गुप्ता जी
भी उस दिन अचानक भोपाल प्लेटफॉर्म पर मिल
गये जो उसी ट्रेन से झाँसी बापस जा रहे
थे। गुप्ता जी से कुछ समय बात कर मै शालीमार गार्डन,
कोलार रोड स्थित अपने घर की ओर चल दिया। अपने चश्मे से बेखबर जब मै लगभग 18-19 कि. मी. दूर अपने घर पहुंचा,
जैसा कि मेरी आदत है ऑफिस या बाहर से घर आकार
मै अपना सामान जो मेरी पेंट/शर्ट मे रहता है घर आने पर कपड़े चेंज करते समय सामान
जैसे पर्स,चश्मा,
पेन,
कंघा,
रुमाल,
चाबी आदि अपनी अलमारी मे रखता हूँ। उस दिन भी जब मैंने अपना
पर्स,
कंघा,
पेन,
निकाला तो हमे अहसास हुआ कि मै अपना चश्मा तो ट्रेन मे भूल आया हूँ। अब कुछ समय तो
मै हतप्रभ हो कर किंकर्तव्यविमूढ़ की स्थिति मे था कि मुझे क्या करना चाहिये?
जानते हुए भी मैंने कैसी बेबकूफी करदी,
क्यों नहीं चश्मे को तुरंत ही बैग या पेंट की जेब मे रखा,
मुझे अपनी गलती पर बड़ा अफ़्सोस हो रहा था। बेमतलब मे तीन-साड़े तीन हजार का नुकसान
हो गया। चश्मा बनवाए हुए भी ज्यादा समय नाही हुआ था। अचानक अपने को नियंत्रित करके
हमे याद आया कि हमारे मित्र गुप्ता जी भी उसी ट्रेन से बापस झाँसी जा रहे है उनसे
संपर्क करना चाहिये?
यध्यापि ट्रेन को प्रस्थान किये हुए लगभग 2 घंटे हो चुके थे पर ट्रेन झाँसी नही पहुंची थी। मैंने गुप्तजी को
फोन लगाया। ट्रेन की सुपर फास्ट गति के कारण दो तीन बार कोशिश के बाद फोन लगा,
हमने उन्हे सारी घटना बताई,
अपना कोच नंबर और सीट नंबर भी बताया। उनको कोच मे सेवा कर रहे लड़कों से तुरंत
संपर्क कर चश्मे के बारे मे पता करने का
निवेदन किया। मुझे चश्मा मिलने की कुछ उम्मीद जागी।
गुप्ता जी की सीट किसी अन्य कोच मे थी।
कष्ट उठाते हुए गुप्ता जी जब उस कोच मे पहुँचे जिसमे मै बैठा था। बहाँ से
जब गुप्ता जी का फोन आया तो शंका मिश्रित ख़ुशी से मैंने फोन उठाया तो उन्होने जो
घटना क्रम बताया तो सुन कर काफी निराशा हुई। गुप्ता जी ने बताया की उस कोच मे काम
कर रहे लड़के ने बताया "चश्मा तो मिला था लेकिन रेल्वे के एक अफसर कोच खाली
होने के बाद सफाई के दौरान कोच मे आये थे उनके किसी मिलने बाले का मोबाइल खो गया
था,
जो उसी कोच मे उस दिन यात्रा कर रहे थे। जब उस अफसर ने कोच के उस लड़के से मोबाइल फोन के बारे मे पूंछ-ताछ की तो
उसने उन्हे मोबाइल फोन के मिलने के बारे मे अपनी अनिभिग्यता बताते हुए चश्मे के
मिलने की जानकारी दी और वह चश्मा उन्होने अपने पास रख लिया। अब मन ही मन मै सोचने
लगा की मिली हुई चीज़ फिर हाथ से फिसल गई।
मै चश्मे की उधेड़-बुन मे ही उलझा रहा। एक बारगी तो लगा शायद चश्मे का न मिलना ही भाग्य
मे लिखा होगा छोड़ो जो नुकसान होना था हो गया पर अचानक दिमाक मे आया कि हमे
चश्मे को ढूड्ने का प्रयास तो करना ही
चाहिये।
मन मे विचार आया कि जिन सज्जन का मोबाइल
खोया है बे जरूर मोबाइल खोने की रिपोर्ट पुलिस मे दर्ज़ करायेंगे,
क्योंकि सुरक्षा कि द्रष्टि से ऐसा करना आवश्यक होता है। मै बगैर कुछ देरी किये रेल्वे स्टेशन भोपाल के
लिये रवाना हुआ। स्टेशन हमारे घर से काफी दूरी पर था,
लगभग 1 घंटे मे जैसे ही मै स्टेशन पर प्लेटफॉर्म न. 1 पर स्थित आर. पी. एफ़. थाने पर पहुँच कर जब ड्यूटि पर तैनात सिपाही से
मोबाइल खोने की रिपोर्ट के बारे मे पूंछा तो उसने मोबाइल खोने की ऐसी किसी भी
रिपोर्ट आने से माना किया जब मैंने उससे किसी व्यक्ति द्वारा चश्मा जमा करने के बारे मे
पूंछा तो उसने कुछ मुस्कराते हुए कहा श्रीमान,
आज के समय मे भी आप उम्मीद करते है कि कोई
मिली चीज़ भी जमा कराने आयेगा?
एक बार पुनः हताशा हाथ लगी फिर भी निराश न
होते हुए मै जी. आर. पी. थाने पहुंचा और मोबाइल खोने या चश्मा जमा करने की रिपोर्ट के बारे मे जानकारी ली वहाँ पर भी
निराशा हाथ लगी। पूरी तरह न उम्मीद होकर मैंने हार मन ली और एक अंतिम प्रयास के
रूप मे प्लेटफॉर्म पर स्थित मुख्य निकासी गेट पर स्थित पुलिस चौकी पर मोबाइल खोने
या चश्मे के पाने की सूचना के बारे मे पूंछा वहाँ से भी नकारात्मक उत्तर प्राप्त
हुआ। अब मैंने प्लेटफॉर्म न. 1 पर स्थित टिकिट चेकिंग ऑफिस,
स्टेशन मास्टर ऑफिस,
उप स्टेशन अधीक्षक ऑफिस,
बुकिंग ऑफिस,
रेल पुंछ-ताछ सेवा,
विद्धुत मैंटेनेंस ऑफिस मे एक एक कर चश्मा मिलने के बारे मे जानकारी जुटाई परन्तू
कोई लाभ नही हुआ और प्रत्येक ऑफिस मे हमे "न" मे जानकारी मिली । मन ही
मन,
बार बार मै उस ऑफिसर को कोस रहा था कि काश
वो रेल्वे ऑफिसर कोच अटेंडेंट को न मिलता तो चश्मा गुप्ता जी के माध्यम से तो मिल
जाता?
पर शायद चश्मा जान हार था सो चला गया?
अब एक आर. एम. एस. एवं पार्सल ऑफिस के अलावा
एक-दो ऑफिस और शेष थे हमने इन्हे भी संपर्क करने का निश्चय किया। जब मै सी. एंड डबल्यू.
कार्यालय मे पहुंचा और अपने चश्मे को शताब्दी एक्सप्रेस मे खोने की बात का
जिक्र किया तो उस कार्यालय के बाबू ने जो उत्तर दिया जिसे सुनकर मेरी ख़ुशी का ठिकाना नही रहा। उस बाबू ने बताया
कि हमारे साहब को एक चश्मा मिला तो है वह चश्मा साहब ने अलमारी मे रख दिया है बे
अभी आते है तब तक आप इंतजार करें। एक उम्मीद की किरण फिर दिखलाई दी लेकिन लगता है
सफलता अभी पूरी तरह नही मिली थी। 15-20 मिनिट इंतजार के बाद श्री पटेल (पूरा नाम
मै भूल गया) जी कार्यालय मे आये तो बाबू ने मेरा परिचय कराते हुए चश्मे की बात बताई। जब हमने चश्मे की कंपनी टाइटन और कवर का रंग काला बताते हुए पटेल साहब
को घटना बताई तो उन्होने अलमारी से चश्मे को निकाल कर दिखाया। चश्मा मेरा ही था
जिसे देख कर जो प्रसन्नता हुई उसको बयां
करना मुश्किल है। उन्होने सारा घटना चक्र सुना हमे चाय पिलाई और चश्मा हमारे
सुपुर्द कर दिया। उन्होने बताया कि उनके एक परिचित भी उसी कोच से भोपाल आये थे उनका मोबाइल ट्रेन
मे खो गया था उसकी छान-बीन करने हेतु वह उस कोच मे आये थे उस दौरान ट्रेन मे
साफ-सफाई चल रही थी,
जब मैंने उस लड़के से मोबाइल फोन के बारे मे पूंछा तो उसने बताया कि एक चश्मा मिला
है जिसे मैंने उससे ले कर अपने पास रख लिया और जिसे अब मै आपके सुपुर्द कर रहा
हूँ। बेशक एक साधारण सी वस्तु जिसका मूल्य कम या नगण्य था
पर कठिन मेहनत के बाद उसे हासिल करने मे
जो ख़ुशी मिली बह अनमोल थी।
विजय सहगल

1 टिप्पणी:
बहुत सुंदर शब्दों में आपने चश्मे की दास्तान सुनाई रोमांच अंत तक बनाये रक्खा । चश्मा मिलने की बधाइयाँ ।
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