शुक्रवार, 26 मई 2023

उम्मीदों का टूटना

उम्मीदों का टूटना (स्व. श्री पी. डब्ल्यू आराधे )

ज़िंदगी मे कभी ऐसा भी होता है जब हम किसी यात्रा या किसी से मिलने के लिये पूरी तैयारी के साथ जाते है और कुछ रुकावट आ जाती है हम पुनः उस रुकावट को दूर कर पुनः उस मंजिल पर जाने का प्रयास करते है लेकिन .................।
बात 1996 के दरम्यान की है। मेरी पोस्टिंग रायपुर, छत्तीसगढ़ मे थी। नई शाखा होने के कारण शाखा का व्यवसाय बढ़ाना था। नये नये क्षेत्रों मे नये नये लोगो से मिलना हमारा प्रयास रहता था। कल्लेक्टोरेट के आसपास कोई व्यक्ति या संस्था हमसे अछूती नहीं रही होगी जिससे हमने संपर्क न किया हो। इस संपर्क अभियान के तहत मै महानदी सिंचाई परियोजना के कार्यालय भी गया जो शंकर नगर चौराहे के पास ही था। यध्यापि सिंचाई विभाग मे विभिन्न विभागो और उनके अधिकारियों की कोई विशेष रुचि बैंकिंग सेवाओं में न थी इसलिए कोई खास प्रतिक्रिया भी नहीं मिली, किन्तु वित्त विभाग के एक अधिकारी ने हमे ध्यान से सुना। हमने बैंक से संबन्धित सेवाओं को उनको बताया। उन्होने हमे सारे स्टाफ के वेतन खातों को बैंक मे खोलने का भरोसा दिया। कुछ दिनो बाद ही मैंने देखा बह सज्जन हमरी शाखा मे वेतन का चैक एवं सभी स्टाफ की वेतन लिस्ट लेकर हमारी शाखा मे आ गये। उन सज्जन का नाम श्री पी. डब्लू. आराधे था जो सिचाई विभाग मे वित्त अधिकारी थे। यू तो बैंक मे अनेकों व्यक्तियों से मुलाक़ात हुई किन्तु आराधे जी से परिचय कुछ अलग था। उनसे हुई हर मुलाक़ात पर संबंध प्रगाढ़ होते रहे। कुछ महीनो बाद उन्होने सेवानिव्रत्ती से प्राप्त राशि को भी हमारे बैंक मे जमा कराया। हमारा उनके घर आना जाना होता रहा। उनके घर के बगल मे ही श्री अरुण गवई जी का घर था जो श्री आराधे जी के बहिनोई थे। इन दोनों परिवारों से हमारा घनिष्ठ संबंध रायपुर प्रवास के दौरान बना रहा। उन्होने सेवानिव्रति पश्चात अपने गाँव मे कुछ भैसे पाल ली थी। एक व्यक्ति उनकी देख भाल के लिये रखा हुआ था, जो सुबह - शाम उन के घर दूध पहुंचता था। बह सेवानिव्रत समय आदि के बारे मे प्रायः हमसे चर्चा करते और हमे अपने गाँव औरे घर आमंत्रित करते। एक दिन मुझे परिवार सहित उनके घर पहली बार जाने का सौभाग्य मिला, जितने सौम्य और सरल आराधे जी थे वैसे ही उनकी पत्नी, अतिथि सत्कार और आवभगत करना उनका सरल स्वभाव था. उस दिन उन दोनों ने हमारी मेहमानवाजी मे कोई कसर बाकी न छोड़ी। घर के दूध से बनी रवड़ी और पूरंपूरी (एक स्वादिष्ट महाराष्ट्रीय व्यंजन) जो मुझे बेहद पसंद थे, खिलाया. उस स्वादिष्ट खाने का स्वाद यादों मे आज भी ताजा हैं। सं 2000 मे हमारा रायपुर से स्थांतरण हो गया। सं 2000-2010 तक विभिन्न स्थानो मे प्रवास के वाद कुछ ऐसा सुयोग बना की हमारी पोस्टिंग 2010 मे भोपाल प्रा. का. मे होगई। रायपुर और वहाँ के लोगो की यादें हमेशा दिल मे बसी रही। वमुश्किल एक-सवा साल बाद पुनः मेरे पोस्टिंग बैंक प्रादेशिक निरीक्षण कार्यालय भोपाल कर दी गई। यह पदस्थापना महलों में चलने वाले दुरभिसंधि और षड्यंत्रों का उदहारण था जहां कामचोर अफसर चापलूसी में पारंगत हो सिर्फ कार्यालय को अपनी नीच राजनीति का अखाड़ा बना ट्रांसफर पोस्टिंग के दाव पेंच चलाते थे.  

इस परि र्तन हेतु मानसिक रूप से  मैं तैयार नहीं था फिरभी नौकरी तो नौकरी है, करनी थी, परिवर्तन को स्वीकार करना पड़ा। इस परिवर्तन को स्वीकार करने मे हमारे घर गायत्री परिवार का एक टेबल कलेंडर ने बड़ा मार्ग दर्शन किया और
मदद की उस कलेंडर मे बहुत ही सुंदर-सुंदर कुटेशन लिखे है जो शक्ति प्रेरणा और ऊर्जा से ओतप्रोत है, उनमे से एक है कि "सुखी रहने के दो ही राश्ते है अवश्यकताये कम करे और परिस्थित्यों से समझौता करें"। इस पदस्थपना के दौरान जहाँ हमे एक ओर अनेकों दिन घर के बाहर रहना पड़ता तो वहीँ दूसरी ओर हमे न केवल अपने पुराने सम्बन्धों को पुनः मजबूत करने का मौका मिला बल्कि कई शाखाओं मे निरीक्षण के दौरान नये नये लोगो से मिलने एवं नये नये स्थानो को देखने का सौभाग्य मिला। रायपुर और अन्यत्र हमारे मित्रों और शुभ चिंतकों से हमारे संपर्क एवं संबंध आज भी है और उन सुंदर स्थानो, नगरों की छवि आज भी हमारे अन्तर्मन मे विध्यमान है। जगदलपुर, जबलपुर, बेमेतरा, महासमुंद, उज्जैन, सतना, मंदसौर, जमशेदपुर, लुधियाना और अन्य अनेक शहरों की यात्रा हमारे मन मै आज भी ताजा है, यदि इस विभाग मे मेरी पदस्थपना न रही होती तो इन स्थानो का भ्रमण और वहाँ के लोगो से मिलना, निश्चित ही नही होता।

 रायपुर मे विभिन्न शाखाओं के दौरे के समय हमने श्री आराधे जी से लगभग 16-17 साल बाद पुनः मिलने का मन बनाया और मै तिलक नगर (कॉलोनी का शायद यही नाम था) मे पैदल भ्रमण करते हुए लोगो से पूछते हुए उनके घर तक पहुंचा क्योंकि इस 16-17 सालों मे रायपुर और आराधे जी की कॉलोनी मे आमूल चूल परिवर्तन आगया था। इन सालों मे रायपुर राजधानी बनने के बाद जबरदस्त बदलावो और विकास के दौर से होता हुआ विकसित शहर का प्रतीक बन चुका था। जब हम ने आराधे जी के घर मे प्रवेश किया तो घर मे ताला लगा हुआ था। हमे मालूम था उनके बगल मे श्री गवई जी के मकान है और हमने उनके घर मे दस्तक दी तो गवई साहब से भी मुलाक़ात न हो सकी बह भी कही रायपुर से बाहर गये हुए थे। जब उनके परिवार के सदस्य से श्री आराधे जी के बारे मे पूंछा तो पता चला कि उनकी पत्नी का देहांत हो गया है अतः बह अपने बेटे के पास प्रायः जबलपुर ही रहते है, जो जबलपुर के एक प्रसिद्ध बकील है.  
पुनः एक बार जबलपुर शाखा दौरे पर मेरी ईच्छा श्री आराधे जी से हुई, शाखा का कार्य समाप्त कर मैंने हमारे साथी श्री सौमेन्द्र भट्टाचर्य के साथ श्री आराधे जी के पुत्र के घर उनसे मिलने गया जो उस समय जबलपुर हाई कोर्ट मे जज थे। एक लंबे समय बाद किसी पुराने मित्र से मिलने की खुशी दिल मे अंदर ही अंदर उमड़ रही थी। मै खुश भी हो रहा था कि चलो रायपुर मे उन से मिलना नहीं हुआ परन्तू ईश्वर ने जबलपुर दौरे के बहाने उन से मिलने की राह बना दी। मै उनके पुत्र के बंगले पर पहुंचा और दरवाजे पर खड़े गार्ड को अपना परिचय देते हुए उसे अपना विजिटिंग कार्ड दिया और उससे माननीय जज साहब के पिता जी से मिलने की इच्छा जताई। उसने कुछ आश्चर्य और शक भारी निगाहों से देखा हमे लगा शायद उसे हम कोई संदिग्ध व्यक्ति लग रहे हों या शायद इस तरह अजनबी व्यक्तियों से न मिलने देने के निर्देश हों, पुनः उसको बताया की हम 15-16 साल से एक दूसरे के परिचित हैं हमे उन से व्यक्तिगत तौर पर मिलना चाहते हैं, मुझे  माननीय  जज  साहब से किसी तरह का आधिकारिक या गैराधिकारिक कार्य नहीं है, आप उन्हे हमारा परिचय दे दीजिये यदि वह  किसी कारण   वश नही मिलना चाहेंगे है तो कोई बात नही हमे बता दीजयेगा? हमे लगा शायद उम्र के इस पढ़ाव पर अस्वस्थता के चलते न मिलने जुलने के लिये मजबूर होंगे? मुझे गार्ड की चुप्पी और तीखी निगाहे पिन की तरह चुभ रही थी। उसने बड़ी नम्रता और शालीनता पूर्वक धीरे से कहा की उनका देहांत 2-3 साल पहले हो गया!! एक सन्नाटा सा हमारे मन मस्तिष्क पर छा गया। ऐसे उत्तर की उम्मीद हमे कदापि नहीं थी। सहसा गार्ड कि बातों से दिल मे एक गहरी टीस उठी, ऐसा लगा की एक खुली आँखों से देख रहा सपना काँच के टुकड़ो की तरह बिखर गया हो। मैं बगैर किसी प्रत्युत्तर के वहां से वापस चला आया.  मुझे श्री पी. डब्लू. आराधे जी की यादों और उस गार्ड के बारे मे अपनी सोच पर, आत्मग्लानि के भाव ने उस रात सोने नहीं दिया।

विजय सहगल

7 टिप्‍पणियां:

बेनामी ने कहा…

सही बात बहुत कम लोगों से ऐसे रिश्ते बनते हैं जो हमारे दिलों में जगह बना लेते हैं जिनको बुलाया नहीं जा सकता ऐसे ही हम बहुत सारे अधिकारी प्रादेशिक निरीक्षण कार्यालय में तैनाती पर यही लगता था कहां भेज दिया परन्तु यह ऐसा तैनाती है जहां से हमें नये नये जगह और नये नये सहयोगियों से मिलने का मौका और उनके साथ अनुभवों को साझा करने का अवसर मिलता है जो सेवानिवृत्त होने के बाद अक्सर ख्यालों में आते रहते हैं
दिलीप कुमार नेगी दिल्ली

बेनामी ने कहा…

Very true
It is life we don’t know about the next moment and life is very short
ए. एस. अहलूवालिया, दिल्ली

Surinder Pal Bhatia ने कहा…

प्रिय विजय जी, आपकी भाषा पर कमांड अत्यंत सराहनीय है और किसी भी अनुभव को साँझा करने की आपकी शैली पड़ने वाले के अंतर्मन को छू लेती है। आपको कोटि कोटि साधुवाद ।

Surinder Pal Bhatia ने कहा…

नेगी जी, आपने बिल्कुल सही कहा ।

बेनामी ने कहा…

क्या अंदाज़े बयां है सहगल साहिब। आपका ब्लॉग पड़ने वाले के अंतर्मन को छू जाता है। आप अपने ऐसे सभी संस्मरणो को एक पुस्तक के रूप में प्रकाशित करवाएं ऐसी मेरी अभिलाषा है👍👍👍👌👌👌👏👏👏👏
S P BHATIYA, नई दिल्ली

बेनामी ने कहा…

भाटिया साहब का कहना सही है भाटिया साहब का भी हिन्दी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं पर अच्छी पकड़ है सहगल जी और भाटिया साहब के कमेंट्स अच्छी भाषा शैली के कारण दो तीन बार पढ़ने का मन करता है
दिलीप नेगी दिल्ली

बेनामी ने कहा…

भाटिया सहाब, आपके उत्साहवर्धन हेतु हार्दिक आभार. आपके शब्द मेरे लिए ऊर्जा के श्रोत हैं जो हमे प्रेरणा प्रदान करते रहेंगे, धन्यवाद