बैसे तो प्रचलित यात्रा के साधनों जैसे कार, रेल, हवाई जहाज़, पानी के जहाज़ से यात्रा करने का अवसर काफी मिलते रहे है। परन्तू मालगाड़ी (Goods Train) की वो यात्रा अविस्मरणीय एवं रोमांच कारी रही जो शायद मैंने 1989-90 मे ग्वालियर से झाँसी के बीच एक बार की थी। हुआ यों था की मुझे किसी कारणबश ग्वालियर से झाँसी जाना पड़ गया। मेरी पोस्टिंग उस समय नया बाज़ार शाखा मे थी। स्टेशन पर आए तो ज्ञात हुआ की किसी भी गाड़ी की संभावना अगले 2-3 घंटे तक ग्वालियर आने की नहीं है। कोई तकनीकि कारण रहा था । कुछ नया करने या जानने के स्वभाव के कारण यध्यपि कई बार परेशानी उठानी पड़ती है फिर भी कुछ नया चाहने या अनुभव करने के लिये कुछ रिस्क लेना हमे अच्छा लगता रहा है । उस दिन भी ये ही कैलक्युलेशन हमारे दिमाक मे चल रही थी। ग्वालियर प्लेटफोरम पर एक मालगाड़ी झाँसी के लिये चलने को तैयार थी। मैंने पीछे मालगाड़ी के गार्ड के डिब्बे की तरफ तेजी से रुख़ किया। मै ये सोचता हुआ जा रहा था कि जब 2-3 घंटे कोई ट्रेन यहाँ आने की संभावना नहीं है तो ये मालगाड़ी बगैर किसी बाधा के झाँसी डेढ़ -दो घंटे मे पहुँचा ही देगी । क्योंकि इस दौरान किसी मेल-एक्सप्रेस से इसके पिटने की संभावना न के बराबर थी । हमे 3 घंटे इंतज़ार के बाद डेढ़ घंटे की यात्रा से ये विकल्प ज्यादा अच्छा लगा। बैसे भी झाँसी-ग्वालियर के बीच हमे चार साल का डेलि पैसेंजरी का अनुभव रहा था। हमने गार्ड साहब से अपने संपर्को का उपयोग कर निवेदन किया और मै मालगाड़ी मे गार्ड के डिब्बे मे बैठ गया।
मेरे साथ मे रेल्वे के एक-दो स्टाफ और भी आ गये। मालगाड़ी के डिब्बे तो प्रायः हर व्यक्ति ने देखे ही होंगे। सुविधाओं का सर्वथा आभाव। लाइट-की व्यवस्था डिब्बे मे नहीं होती तो पंखे का तो सवाल ही नहीं उठता। टॉइलेट भी डिब्बे मे नहीं होती टट्टी-पेशाव आने का मतलब स्वच्छ भारत अभियान की अवेहलना या अवाज्ञा था। सिर्फ गार्ड के बैठने के लिये एक छोटा सा चौकोर 2x2 फुट की लोहे की शीट, उसके सामने इतनी ही छोटी सी लोहे की ही टेबल नुमा डेस्क जिसमे उनके कागज/रजिस्टर आदि रखने के लिये जगह थी ताकि आवश्यक लिखा पड़ी वह उस पर कर सके। साथ मे गार्ड साहब के एक बड़ी सी लोहे की बिशेष प्रकार की पेटी या बॉक्स होता साथ मे पानी की एक बोतल। पेटी जो अंदर से अलग-अलग कई खानो मे विभक्त रहती जिसमे अलग-अलग उनके काम आने बाले सामान जैसे- लाल-हरी झंडी, रात के लिये मध्यम आकार का लाल-हरे काँच से युक्त लैम्प, मिट्टी का तेल रखने के लिये छोटी शीशी, ड्रेस, कुछ व्यक्तिगत कपड़े एवं राशन का सामान एवं कुछ रेडीमेड नाश्ता, सीटी आदि। क्योंकि रेल्वे के गार्ड की ड्यूटि कभी कभी 1-2 दिन से ज्यादा भी हो जाती है इसलिये ये सब आवश्यक सामान उनको हमेशा अपने साथ रखना पड़ता है।
खैर मालगाड़ी ने अपने गंतव्य की ओर प्रस्थान किया। हमने पीछे की तरफ साफ कर अपना स्थान ग्रहण कर फर्श पर बैठ गया। ट्रेन के आखरी डिब्बे मे तो पहले भी कभी बैठे थे परन्तू मालगाड़ी के चारों ओर से खुले आखरी डिब्बे मे बैठने का रोमांच कुछ अलग था। मालगाड़ी तेजी के साथ आगे बढ़ती है और पीछे छोड़ती जाती मीलों लंबी समांतर पटरियाँ जो कभी एक दूसरे के निकट नहीं आती। तेज गति से पीछे छूटते पेड़-पौधे, मानव, जीव, जन्तु जो सांय-सांय करती हवा के साथ छोटे और छोटे होते हूए आंखो से ओझल हो जाते। क्रॉसिंग के पार जैसे ही गाड़ी आगे वढ्ती लाइन के दोनों ओर इंतजार कर रही भीड़ का वो द्र्श्य अद्भुत होता जब वे सभी गाड़ी निकलने के तुरंत बाद लाइन के आर पार आते जाते दिखाई देते। इन्ही सब नज़ारो को देखते हुए हमारी यात्रा आगे बढ़ रही थी हम 70-80% से ज्यादा दूरी तय कर चुके थे।
अचानक मालगाड़ी की गति कुछ धीमी होती चली गई। दतिया स्टेशन आने बाला था। हमे यात्रा करते हुए लगभग 1.30 घंटा हो चुका था। हमे अपने निर्णय पर और अपने अनुमान पर मन ही मन खुशी हो रही थी कि हम अपने गंतव्य पर शीघ्र पहुँच जायेंगे । मालगाड़ी की लंबाई अछी ख़ासी थी गाड़ी दतिया स्टेशन पर अचानक ठहर गई। गाड़ी के गार्ड का डिब्बा दतिया क्रॉसिंग गेट के पास सड़क के नजदीक था। डिब्बे मे बैठे गार्ड और उनके अन्य साथियों ने गेट के पास बमुश्किल 30-40 कदम पर स्थित चाय की दुकान पर चाय पीने का प्लान बना मुझे भी औपचारिक निमंत्रण दिया, जिसे मैंने आभार सहित विनम्रता पूर्वक इसलिए मना कर दिया कि एक तो गार्ड साहब का अहसान कि उन्होने मुझे गाड़ी मे बैठने की अनुमति दी और उपर से चाय का खर्चा भी कराऊँ। अब डिब्बे मे मै और एक रेल सुरक्षा बल का जवान ही था। इसके बाद जो हुआ उसकी कल्पना मैंने नहीं की थी। गार्ड और उनके साथी चाय की दुकान पर पहुचते उसके पहले ही अचानक इंजिन ड्राईवर ने एक तेज सीटी दी और मालगाड़ी चला दी। मैंने सोचा कम से कम ड्राईवर गार्ड साहब का इंतजार तो करेगा? परंतु माल गाड़ी फिर रुकी ही नहीं। तुरंत ही गार्ड साहब लाल झंडी लहराते डिब्बे के पीछे पीछे दौड़े, पर गाड़ी चली तो ऐसी चली कि चलती चली गई और गार्ड साहब पीछे और पीछे, बहुत पीछे छूटते चले गये। मैंने कभी इस स्थिति की कल्पना नहीं की थी, मुझे ऐसा लगा मानो हम बगैर पायलट के हवाई जहाज़ मे उड़ रहे हों। कुछ अनिष्ट की आशंका मन मे होने लगी। बगैर गार्ड के उस गाड़ी की यात्रा मे हमे ऐसा लगा मानो हम मांझी के बिना नाव पर सवारी के बीच मँझधार मे यात्रा कर रहे हों। अब हमे भगवान की तरह उस सुरक्षा बल के सिपाही पर ही भरोसा था । रेल सुरक्षा बल के जवान को कुछ रेल सिस्टम के बारे मे जानकारी थी उसने वेकूय्म को रिलीज़ कर गाड़ी के ब्रेक लगा कर रोकने की कोशिश की पर उस जवान का यह प्रयास व्यर्थ गया। गाड़ी नहीं रुकी। गार्ड के गाड़ी मे न होने की सूचना अगले स्टेशन करारी पर दे दी गई इसलिये अगले स्टेशन करारी पर गाड़ी रुकी और एक कर्मचारी गार्ड के डिब्बे मे लाल-हरी झंडी लिये आया तो हमारी जान मे जान आयी और इस तरह उस दिने हम एक अनोखी यादगार और कभी न भूलने वाली यात्रा कर अपने गंतव्य झाँसी पहुँचे।
उस दिन रह रह कर मेरे मन मे एक ही विचार घूमता रहा कि मालगाड़ी के ड्राईवर ने बगैर गार्ड के हरी झंडी दिये गाड़ी कैसे चला दी? अगर इस तरह कोई अनहोनी घटना घट जाती और इस संबंध मे कोई जांच होती तो गार्ड साहब यही कहते कि हमारे लाल झंडी दिखाने के बावजूद ड्राईवर ने गाड़ी चला दी और ड्राईवर साहब ये कहते कि गार्ड के हरी झंडी दिखाने पर ही हमने गाड़ी चलाई!। शायद भगवान भी इसका निर्णय नहीं कर पाते कि आखिर गार्ड और ड्राईवर मे गलती किसकी थी और सही कौन था ?? साक्ष्यों के अभाव मे कभी ये सिद्ध ही नहीं हो पाता कि गार्ड और ड्राईवर ने किसको किस रंग की झंडी दिखाई थी??
विजय सहगल,


