शुक्रवार, 28 सितंबर 2018

मालगाड़ी


"मालगाड़ी"





बैसे तो प्रचलित  यात्रा के साधनों जैसे काररेलहवाई जहाज़पानी के जहाज़ से यात्रा करने का अवसर काफी मिलते रहे है। परन्तू मालगाड़ी (Goods Train) की वो यात्रा अविस्मरणीय एवं रोमांच कारी रही जो शायद मैंने 1989-90 मे  ग्वालियर से झाँसी के बीच एक बार की थी। हुआ यों था की मुझे किसी कारणबश ग्वालियर से झाँसी जाना पड़ गया। मेरी पोस्टिंग उस समय नया बाज़ार शाखा मे थी। स्टेशन पर आए तो ज्ञात हुआ की किसी भी गाड़ी की संभावना अगले  2-3 घंटे तक ग्वालियर आने की नहीं है। कोई तकनीकि कारण रहा था । कुछ नया करने या जानने के स्वभाव के कारण यध्यपि कई बार परेशानी उठानी पड़ती है फिर भी कुछ नया चाहने या अनुभव करने  के लिये कुछ रिस्क लेना हमे अच्छा लगता रहा है । उस दिन भी ये ही कैलक्युलेशन हमारे दिमाक मे चल रही थी। ग्वालियर प्लेटफोरम पर एक मालगाड़ी झाँसी के लिये चलने को तैयार थी। मैंने पीछे मालगाड़ी के गार्ड के डिब्बे की तरफ तेजी से रुख़ किया। मै ये सोचता हुआ जा रहा था कि जब 2-3 घंटे कोई ट्रेन यहाँ आने की संभावना नहीं है तो ये मालगाड़ी बगैर किसी बाधा के झाँसी डेढ़ -दो घंटे मे पहुँचा ही  देगी । क्योंकि इस दौरान किसी मेल-एक्सप्रेस से इसके पिटने की संभावना न के बराबर थी । हमे 3 घंटे इंतज़ार के बाद डेढ़ घंटे की यात्रा से ये विकल्प ज्यादा अच्छा लगा।  बैसे भी झाँसी-ग्वालियर के बीच हमे चार साल का डेलि पैसेंजरी का अनुभव रहा था। हमने गार्ड साहब से अपने संपर्को का उपयोग कर निवेदन किया और मै मालगाड़ी मे गार्ड के डिब्बे मे बैठ गया। 

मेरे साथ मे रेल्वे के एक-दो स्टाफ और भी आ गये। मालगाड़ी के डिब्बे तो प्रायः हर व्यक्ति ने देखे ही होंगे। सुविधाओं का सर्वथा आभाव। लाइट-की व्यवस्था डिब्बे मे नहीं होती तो पंखे का तो सवाल ही नहीं उठता। टॉइलेट भी डिब्बे मे नहीं होती टट्टी-पेशाव आने का मतलब स्वच्छ भारत अभियान की अवेहलना या अवाज्ञा था। सिर्फ गार्ड के बैठने के लिये एक छोटा सा चौकोर 2x2 फुट की लोहे की शीटउसके सामने इतनी ही  छोटी सी लोहे की ही टेबल नुमा डेस्क जिसमे  उनके कागज/रजिस्टर आदि रखने के लिये जगह थी  ताकि आवश्यक लिखा पड़ी वह उस पर कर सके। साथ मे गार्ड साहब के एक बड़ी सी लोहे की बिशेष प्रकार की पेटी या बॉक्स होता साथ मे पानी की एक बोतल। पेटी जो अंदर से अलग-अलग कई खानो मे विभक्त रहती  जिसमे  अलग-अलग उनके काम आने बाले सामान जैसेलाल-हरी झंडीरात के लिये मध्यम आकार का लाल-हरे काँच से युक्त लैम्पमिट्टी का तेल रखने के लिये छोटी शीशीड्रेसकुछ व्यक्तिगत कपड़े एवं राशन का सामान एवं कुछ रेडीमेड नाश्तासीटी आदि। क्योंकि रेल्वे के गार्ड की ड्यूटि कभी कभी 1-2 दिन से ज्यादा भी हो जाती है इसलिये ये सब आवश्यक सामान उनको हमेशा अपने साथ रखना पड़ता है। 

खैर मालगाड़ी ने अपने गंतव्य की ओर प्रस्थान किया। हमने पीछे की तरफ साफ कर अपना स्थान ग्रहण कर फर्श पर बैठ गया। ट्रेन के आखरी डिब्बे मे तो पहले भी कभी बैठे थे परन्तू मालगाड़ी के चारों ओर से खुले आखरी डिब्बे मे बैठने का रोमांच कुछ अलग था। मालगाड़ी तेजी के साथ आगे बढ़ती है और पीछे छोड़ती जाती  मीलों लंबी समांतर पटरियाँ जो कभी एक दूसरे के निकट नहीं आती। तेज गति से पीछे छूटते पेड़-पौधेमानवजीव,  जन्तु जो सांय-सांय  करती हवा के साथ छोटे और छोटे होते हूए आंखो से ओझल हो जाते। क्रॉसिंग के पार जैसे ही गाड़ी आगे वढ्ती लाइन के दोनों ओर इंतजार कर रही भीड़ का वो द्र्श्य अद्भुत होता जब वे सभी  गाड़ी निकलने के तुरंत बाद लाइन के आर  पार आते जाते दिखाई देते। इन्ही सब नज़ारो को देखते हुए हमारी यात्रा आगे बढ़ रही थी हम 70-80से ज्यादा दूरी तय कर चुके थे। 

अचानक मालगाड़ी की गति कुछ धीमी होती चली गई। दतिया स्टेशन आने बाला था। हमे यात्रा करते हुए लगभग 1.30 घंटा हो चुका था। हमे अपने निर्णय पर और अपने  अनुमान पर मन ही मन खुशी हो रही थी कि हम अपने गंतव्य  पर शीघ्र पहुँच जायेंगे । मालगाड़ी की लंबाई अछी ख़ासी थी गाड़ी दतिया स्टेशन पर अचानक ठहर गई। गाड़ी के गार्ड का डिब्बा दतिया  क्रॉसिंग गेट के पास सड़क के नजदीक  था। डिब्बे मे बैठे गार्ड और उनके अन्य साथियों ने गेट के पास बमुश्किल 30-40 कदम पर स्थित चाय की दुकान पर चाय पीने का प्लान बना मुझे भी औपचारिक निमंत्रण दिया, जिसे मैंने आभार सहित विनम्रता पूर्वक इसलिए मना कर दिया कि एक तो गार्ड साहब का अहसान कि उन्होने मुझे गाड़ी मे बैठने की अनुमति दी और उपर से चाय का खर्चा भी कराऊँ।  अब डिब्बे मे मै और एक रेल सुरक्षा बल का जवान ही था। इसके बाद जो हुआ उसकी कल्पना मैंने नहीं की थी। गार्ड और उनके साथी चाय की दुकान पर पहुचते उसके पहले ही अचानक इंजिन ड्राईवर  ने एक तेज सीटी दी और मालगाड़ी चला दी। मैंने सोचा कम से कम ड्राईवर गार्ड साहब का इंतजार तो करेगा? परंतु माल गाड़ी  फिर रुकी ही नहीं।    तुरंत ही गार्ड साहब लाल झंडी लहराते डिब्बे के पीछे पीछे दौड़े, पर गाड़ी चली तो ऐसी चली कि चलती चली गई और गार्ड साहब पीछे और पीछे, बहुत पीछे छूटते चले गये। मैंने कभी इस स्थिति की कल्पना नहीं की थीमुझे ऐसा लगा मानो हम बगैर पायलट के हवाई जहाज़ मे उड़ रहे हों। कुछ अनिष्ट की आशंका मन मे होने लगी। बगैर गार्ड के उस गाड़ी की  यात्रा मे हमे ऐसा लगा मानो हम मांझी के बिना नाव पर सवारी के बीच मँझधार मे यात्रा  कर रहे हों।  अब हमे भगवान की तरह  उस सुरक्षा बल के सिपाही पर ही भरोसा था । रेल सुरक्षा बल के जवान को कुछ  रेल सिस्टम के बारे मे जानकारी थी उसने वेकूय्म को रिलीज़ कर गाड़ी के ब्रेक लगा कर रोकने की कोशिश की पर उस जवान का यह प्रयास व्यर्थ गया। गाड़ी नहीं रुकी। गार्ड के गाड़ी मे न होने की सूचना अगले स्टेशन करारी  पर दे दी गई इसलिये  अगले स्टेशन करारी पर गाड़ी रुकी और एक कर्मचारी गार्ड के डिब्बे मे लाल-हरी झंडी लिये आया तो हमारी जान मे जान आयी और इस तरह उस दिने हम एक अनोखी यादगार और कभी न भूलने वाली  यात्रा कर अपने गंतव्य झाँसी पहुँचे। 

उस दिन रह रह कर मेरे मन मे एक ही विचार घूमता रहा कि मालगाड़ी के ड्राईवर ने बगैर गार्ड के हरी झंडी दिये गाड़ी कैसे चला दी?  अगर इस तरह कोई अनहोनी घटना घट जाती और इस  संबंध मे कोई जांच होती तो गार्ड साहब यही  कहते  कि  हमारे   लाल झंडी दिखाने के बावजूद  ड्राईवर ने गाड़ी चला दी और ड्राईवर साहब ये  कहते कि  गार्ड के  हरी झंडी दिखाने पर ही हमने गाड़ी चलाई!।   शायद भगवान भी इसका निर्णय नहीं कर पाते कि  आखिर  गार्ड और ड्राईवर मे गलती किसकी थी और सही कौन था ?? साक्ष्यों के अभाव मे कभी ये सिद्ध ही नहीं हो पाता कि गार्ड और ड्राईवर ने किसको किस रंग की झंडी दिखाई थी??

 

विजय सहगल,

 


हाज़िर हो


"हाज़िर हो"

ज़िंदगी मे कभी कुछ ऐसी घटना घट जाती है जो हमेशा याद रहती है। उम्र तो याद नहीं पर शायद 8-9 साल का रहा हूंगा, पापा के मुकदमे की तारीख थी। पापा को जो रेल्वे मे थे छुट्टी न मिलने के कारण मुकदमे की तारीख अटेंड नहीं कर सकते थे मुझे  कोर्ट मे जाने का मौका मिला। वो अनुभव आज भी हमारे अन्तर्मन मे बिल्कुल स्पष्ट है। न्यायालय का शक्त अनुशाशन और नियम कायदों का अनुपालन फिल्मों के माध्यम से पहले ही हमारे ज़ेहन मे था। एक दिन पूर्व उन्होने मुझे और मेरे बड़े भाई प्रदीप को सारी बाते विस्तार से बता दी थी। कब कैसे और क्या करना है अछी तरह बता दिया था। 

गर्मी का समय था कचहरी सुबह की थी।  सुबह 8 बजे हम दोनों भाई कचहरी पहुच गये थे। वादी, प्रतिवादी, मुंशी वकील सभी यहाँ वहाँ एक कमरे से दूसरे कमरे मे आ जा रहे थे। उस उम्र मे मै बड़े लोगो की भीड़ मे एक अदृश्य भय के साथ मैं अपने आप को कहीं गुम महसूस कर रहा था कुछ कुछ "लॉस्ट चाइल्ड" की तरह। हमे आठ आने (पचास पैसे ) दिये गये थे चार आने रिश्वत के रूप मे  पेशगार जी को देने थे एवं चार आने हमे कुछ खाने पीने के लिए दियेगये थे।  हम दोनों भाई  मोर्चा सम्हाले कोर्ट के दरवाजे पर अर्दली की आवाज का इंतज़ार कर रहा था की कब आवाज़ लगे कि " विष्णु नारायण बनाम फलां-फलां,  हाजिर हो"  जैसा कि हमे बताया गया था। पर "हाजिर हो" की आवाज लंच टाइम तक नहीं आई। लंच मे सारा कोर्ट परिसर मानो कैंटीन की तरफ वढ़  रहा था, चाय-पकोड़ी, समोसे-कचोड़ी आदि की आवाजों से कैंटीन गुंजायमान थी। सभी अलसाये से बैठ आराम कर रहे थे।  भूख तो हम दोनों को भी लगी थी परन्तू पैसे का गणित कुछ फिट नहीं बैठ रहा था। चार आने मे दोनों का काम नहीं चल रहा था क्योंकि दूसरे चार आने पेशगार जी को जो देने थे।  यद्यपि  घर मे 5-10 पैसे की चोरी करके चाट पकोड़ी/पानी की टिक्की अनेकों बार खाई होगी परंतु उस दिन  पेशगार जी  चोरी के चार आने मे से 5-10 पैसे चोरी करने की हिम्मत नहीं हुई! कोर्ट का मामला जो ठहरा!! और न्यायधीश भी तो कोर्ट मे बैठे थे, अगर पेशगार जी के पैसों मे कमी कर समोसे/कचोड़ी खाते हुए पकड़े जाते तो? हमारे अन्तः करण मे ये सवाल उठा?  पापा के आदेश मे कमी-बेसी कही और होती तो हम कर भी देते परन्तू पेशगार के रिश्वत के चार आने मे कमी कही मुकदमे को कमजोर न करदे, ये सोच कर डर लगा और हम दोनों भाइयों ने तय किया की पेटपूजा के लिये किसी दूसरे विकल्प पर विचार करे। भूख तो लग रही थी वहाँ देखा,   कुछ बच्चे 10-10 पैसे मे पेट भर पानी पिला रहे है, तब हम दोनों ने डट कर कई छोटे छोटे गिलास पानी अपनी क्षमता से ज्यादा पिये और पुनः मोर्चा सम्हाल "हाजिर हों" की आवाज का इंतजार करने लगे. अचानक कुछ देर बाद अर्दली की आवाज आयी "विष्णु नारायण - xxx हाजिर हो"। हम डरते सहमते कोर्ट के अंदर पेशगार जी के समक्ष हाजिर थे। हमने पूरी निष्ठा और ईमानदारी और न्याय मे अपनी पूरी आस्था और विश्वाश के साथ  पेशगार जी के लिये नियत तय राशि चार आने  को  उन्हे दिया और बताया कि  वकील  साहब आ रहे है और अगली तारीख चाहिए। कागजी खाना पूर्ति के पश्चात अगली तारीख मिल गई जिसे बकील साहब को नोट करा कर हम जैसे एक बहुत बड़े  युद्ध  मे परास्त होकर थके-हारे सिपाही की तरह घर लौटे। कानून का राज बदस्तूर आज भी बैसे ही चल रहा है, "श्री लाल शुक्ल के उपन्यास "राग दरबारी" की तरह जिसमे अपने आपको मै उस लँगड़े की तरह पाता हूँ जो कचहरी मे कभी नकल, कभी बयान और कभी बहस या पैरवी  के लिये पेशी दर पेशी, या तारीख पे तारीख के लिए भटक रहा है ??  

विजय सहगल, 


बुधवार, 26 सितंबर 2018

हमारी जेल यात्रा



""हमारी जेल यात्रा"


 

राजकीय आदर्श विध्यालय झाँसी जहाँ मेरी प्राइमरी शिक्षा पूरी हुई अपने आप मे एक अलग विध्यालय था जो और दूसरे विध्यलयों से उसे अलग रखता था। आज का तो मालूम नहीं लेकिन उस समय हम सब को किताबी ज्ञान के साथ साथ सामाजिक जीवन से जुड़े वास्तविक पहलुओं से परिचय भी कराया जाता था। हमे याद है हमरी चौथी या पाँचवी क्लास मे सामाज शास्त्र के अंतर्गत जहाँ हमे पोस्ट ऑफिस के बारे मे पढ़ाया जाता तथा  पिता या  प्रधानाचार्य को पत्र लिखना सिखाया जाता।  हम सभी बच्चों को पोस्ट ऑफिस के कार्य प्रणाली दिखाने के लिये प्रधान डाकघर झाँसी  भी ले जया गयाजहाँ हम सभी बच्चों को स्वयं पोस्ट कार्डअंतर्देशी पत्र और लिफाफों को न केवल दिखाया गया बल्कि पोस्ट कार्ड भी एक एक कर क्रय कराये गये और उन पर सभी बच्चों को पिता के नाम पत्र भी लिखवाया गया एवं उसे पोस्ट बॉक्स मे पोस्ट कराया गया।  पोस्ट ऑफिस की हर खिड़की की कार्य प्रणाली बताई गई कि कहाँ मनी ऑर्डर किया जाता या पंजीक्रत पत्र जमा होते या कहाँ टेलेग्राम किया जाता है। बेसिक ट्रेनिंग कॉलेज से संबद्ध होने के कारण बी. एड. के शिक्षक हमे खजूर की पत्तियों से हाथ पंखा बनाना या दिवाली मे लगाये जाने बाले कंडील या  अग्गासिये  बनाना सिखाया जाना  भी शिक्षा का एक हिस्सा था। जिन्हे मै आज भी बनाना नहीं भूला हूँ।  हमे कृषि या काष्ठ कला मे से कोई एक विषय का चयन छठी क्लास मे करना होता था जिसे आगे आठवी तक पढ़ाया जाता था। कृषि विषय चुनने के कारण  मैदान मे फूलों के लिये क्यारी बनानाक्यारी की गुड़ाईनिराई वीज रोपना पौध लगानासिंचाई करना  आदि भी हमारी शिक्षा का एक अंग था। फार्म हाउस मे गहूँआलूगोभी आदि की खेती करनागेहूं की  खेती को रहट के माध्यम  से खेतों मे सिचाई करने हेतु  क्लास के  8-10 छात्रों का ग्रुप बैलों की जगह स्वयं लग कर रहट चला कर मस्ती और हास-परिहास करते थे।  जैसा कि प्रायः बच्चों के आपसी झगड़े स्कूल मे हो जाते है उस एक  दिन भी ऐसा हुआ जब  दो छात्रों का आपस मे झगड़ा हुआ। घटना साधारण थी किन्तु उसे कानून व्यवस्था के पाठ से जोड़कर सामाजशास्त्र  का विषय बना  दिया गया कि किस तरह झगड़े का निपटारा कर पुलिस अपराधी को न्ययालय मे केस चला कर अपराधी को सजा दिलाती है और उसे किस तरह जेल की सजा दी जाती है। इस किताबी पाठ को वास्तविक जीवन मे किस तरह लोगो के साथ किया जाता है इस हेतु हम सभी क्लास के बच्चों को जेल भ्रमण कराया गया और इस तरह हमे जीवन के कठोरतम एवं कड़वी सच्चाई से जेल यात्रा के माध्यम से रूबरू कराया गया। उस अविस्मरणीय जेल यात्रा का भय मिश्रित उत्साह का विवरण यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ।

हम सभी क्लास के बच्चे अपने अध्यापको के साथ जिला जेल झाँसी के मुख्य द्वार पर लाइन लगा कर एकत्रित हुये। एक रजिस्टर मे सभी छात्रों की प्रविष्टि करी गयी। लोहे के बहुत बड़े  मुख्य द्वार मे प्रवेश के पूर्व हम सभी छात्रों की बाएँ  हाथ की हथेली पर जेल की एक गोल रबर की मोहर लगाई गई और सख्त हिदायत दी गई की इस रबर सील की छाप मिटना नही चाहिये अन्यथा मिट जाने की दशा मे जेल से  बाहर नहीं आने दिया जायेगा। पूरी जेल भ्रमण के दौरान सभी बच्चों ने हथेली पर लगी सील का पूरा ध्यान रखा ताकि रबर की सील की छाप न मिटे।   सील की ताकत का एहसास आज भी हमे  जीवन के अनेक क्षेत्रों  मे गाहेबगाहे अफसरशाही  के रूप मे अब भी देखने को मिल जाता है। जब सभी बच्चे और अध्यापको का बड़े दरवाजे मे प्रवेश हो गया तो मुख्य दरवाजे पर तैनात बंदूक धारी संतरी ने   ताला लगा कर बंद कर दिया,  तत्पश्चात एक उतना ही बड़ा दरवाजे का ताला खोल कर जेल के प्रांगण  मे प्रवेश कराया गया और पुनः उस दरवाजे को अंदर से बंद कर दिया गया। हमे बताया गया की जेल का मुख्य एवं दूसरा दरवाजा सुरक्षा की द्रष्टि से  दोनों एक साथ नही खोले जाते ताकि कोई भी सीधे बिना बाधा के  जेल से न जा  सके। इस तरह हमारी कौतुहाल पूर्ण  जेल यात्रा शुरू हुई।  

दूसरे मुख्य दरवाजे के साथ ही मुख्य जेल अधिकारी का कार्यालय बना हुआ था। कार्यालय के बगल मे ही एक हाल था जो लोहे की जाली के माध्यम से दो भागो मे विभक्त किया गया था। इस हाल का एक गेट कार्यालय मे तथा जाली के अंदर बाला दूसरा गेट जेल के अंदर खुलता था। इस जगह का इस्तेमाल कैदियों को उनके परिजनो से मुलाक़ात हेतु किया जाता।  

हम सभी बच्चों को पहले बैरकों मे बंद कैदियों से मिलवाया गया जो अपना नाम बता कर अपराध को संक्षेप मे बताते थे। प्रत्येक कैदी को दो-दो कंबल दिये गये थे। एक बैरक मे 6-8 कैदी रखे जाते। कुछ बैरकों मे चारपाई नुमा चबूतरे कैदियों को सोने के लिये बने थे। बैरक के एक कोने मे निस्तारण हेतु शौचालय बनाये गये थे। हर बैरक मे पीने के पानी हेतु मिट्टी के घड़े रखे हुए थे। कुछ कैदी मिल कर जेल मे स्थित कुआं से पानी खींचते नज़र आये जो जेल मे पीने के पानी की व्यवस्था मे लगे थे। हमने जेल मे आटा पीसने बाली बैरक भी देखी जहाँ दो कैदी मिल कर खड़े होकर चार फुट ऊंचे चबूतरे पर बनीघरों मे स्तेमाल की जाने बाली चक्की से आकार मे  कुछ बड़ी चक्की से हाथ से आटा पीस रहे थे।  इस तरह की 15-20 चक्की बैरक मे लगी थी जो सुबह से शाम तक दो-दो  कैदियों द्वारा चलाई जाती एवं जिससे कैदियों को खाने के लिये आटे की पूर्ति की जाती। एक बैरक मे कैदयों को हाथ से कालीन बनाते हुये देखा। इसी तरह मसाला पीसने का कार्य भी हो रहा था। जेल मे ही अंदर सब्जी की खेती करते हुए कुछ कैदी निराई-गुड़ाई का काम कर रहे थे। रसोई का नजारा कुछ अलग था। बड़ी-बड़ी पत्थर की हौदी मे आटा  गूथा जाता। हौदी के किनारे दोनों ओर पाँच छः कैदी  खड़े होकर  हाथों से पानी मिला कर आटा गूथते। उस गुथे हुए आटे को एक ऊंचे (लगभग 4- 4.फुटचवूतरे पर जो लगभग 15-16 फुट लंबा और 5-6 फुट चौड़ा था चार पाँच कैदियों द्वारा बड़े बड़े वेलन की मदद से  आटे को  बेला जाता और लोहे की गोल पत्ती से बने साँचे  की सहायता से  विले हुए आटे पर पटक पटक कर  गोल रोटी के आकार मे काटा जाता। उन कटी हुई गोल रोटियों को बड़ी सी भट्टी के ऊपर मोटे लोहे के बड़े  तबे पर सेका जाताबड़े-बड़े भगौनों मे दाल और सब्जी बनाई जाती। एक समान ड्रेस पहने कैदियों को भोजन और सब्जी थालियों मे दी जाती जैसा कि हम प्रायः फिल्मों मे देखा करते। हर जगह जेल प्रहरी नज़र आते जो जेल की व्यवस्था सुचारु रूप से चलाने मे सहायता करते। जेल परिसर के चारों ओर ऊंची ऊंची निगरानी टावर बनी हुईं थी जिन पर चढ़ कर जेल प्रहरी बंदूकों से सुसज्जितचौवीसों घंटे पहरा देते। आकस्मिक स्थिति से निपटने हेतु एक बहुत बड़ा अलार्म मुख्य दरवाजे के ऊपर लगा था।  जेल मे एक छोटा अस्पताल भी था जहाँ बीमार कैदियों का आवश्यकता पड़ने पर इलाज किया जाता। चहर दीवारी के अंदर कुछ छोटी-छोटी बैरकों बनी थी इन बैरकों मे संगीन अपराधियों को कड़ी निगरानी मे अलग अलग रखा जाता।  जेल यात्रा के अंत मे हम सभी बच्चों को  उस जगह ले जाया गया जिसे हम सभी थोड़ा भय मिश्रित उत्सुकताऔर रोमांच से देखने को व्याकुल थे। जेल के अंदर एक चहर दीवारी से घिरा एक अलग स्थलजिसके चारों ओर घास फूस लगी हुई थी। ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे महीनो से यहाँ कोई आया न हो।   वह था फांसी घर। हमे बताया गया की इस फांसी घर मे पिछले अनेक वर्षों मे कोई फांसी नही हुई। एक बड़ा सा चबूतरा जो 7-8 फुट गहरेनीचे तलघर नुमा कमरे के ऊपर बना था।  जिसके दोनों ओर लोहे के बड़े ऊंचे खंबे लगे थेजिनको ऊपर एक उतने ही मोटे खंबे से दोनों खंबों को जोड़ता  था। बीच मे एक कुंदा जिसके माध्यम से एक मोटी रस्सी गले मे डालने के लिये लटकाई जातीकिन्तु जो उस समय बहाँ नही लगी थी। चबूतरा जो दो लकड़ी के तख्तों से ढका हुआ था और तख्ते नीचे तलघर की ओर खुलते थे। जिसको खोलने का संचालन चबूतरे के पास स्थित लोहे के एक लीवर से किया जाता। हमे जेल कर्मचारियों ने बतलाया गया जब किसी व्यक्ति को फांसी दी  जाती तो उसके गले मे मुंह  पर काला कपड़ा डाल कर रस्सी का मोटा फंदा गले मे डाल लकड़ी के दोनों तख्तों के बीच चेहरा ढक कर खड़ा कर दिया जाता और जल्लाद द्वारा लीवर के खीचते ही तख्ते तलघर की ओर नीचे गिर जाते एवं अपराधी रस्सी से लटक कर, मृत्यु को प्राप्त हो जाता।  ठीक बैसा ही फांसी घर सन 2000 मे हमने सेल्यूलर जेल पोर्ट्ब्लेयर मे अंडमान निकोबार की यात्रा के समय देखा। इस तरह पूरे जेल की यात्रा  कर हम सभी बच्चे बापस मुख्य द्वार से निकल कर एक विशेष और  अविस्मरणीय यात्रा के पश्चात  अपने विध्यालय पहुँचे।

 

विजय सहगल

 

बुधवार, 19 सितंबर 2018

हमारे पापा

- हमारे पापा -

यू तो हर शक्स की ज़िंदगी मे उसके पिता उसके आदर्श पुरुष होते है ऐसा हमारी ज़िंदगी मे भी था। हमे याद है हम जब सभी भाई बहिन छोटे थे हमारे पापा की पोस्टिंग उस समय राजा की मंडी आगरा मे थी। वो वीकेंड मे घर आते थे, यध्यापि मेरी बहुत बात उनसे नहीं होती थी फिर भी मन मे  सुरक्षा का  अहसास और एक अजीब उत्साह एवं खुशी बनी  रहती  थी  की पापा घर मे है। यह अहसास उनके रहने तक जब वो हमारे साथ झाँसी या  ग्वालियर मे रहे और  अंतिम समय मे   जब वो हमारे साथ ग्वालियर मे थे हम महशूस करते रहे। उनका देहांत चलते फिरते अचानक ग्वालियर मे हुआ। उनके देहांत के बाद एक घटना उनके बारे मे हमे श्री सूरन चाचा से ज्ञात हुई जिससे हमे अपने पापा के प्रति सम्मान और भी ऊंचा हो गया जो शायद और अन्य लोगो से उन्हे अलग करता है। श्री सूरन चाचा, श्रीमती रामकली चाची हमारे समाज के अभिन्न अंग है  एवं विशेषता: हमारे परिवार मे हमारे माता पिता की तरह ही सममानीय है जिनके विना हमारी समाज या घर मे कोई भी सुख/दुख: आदि  का कार्य नहीं होता। जिनसे मिल  कर हमे आज भी  हमेशा अपनी माँ/पिता से मिलने की खुशी मिलती है। ईश्वर उन दोनों को दीर्घ आयु एवं स्वस्थ रखे। सूरन चाचा ने जो की शुद्धि के पश्चात बैठक मे हमारे घर  आए जैसे की हमलोगो के यहाँ परंपरा है। उन्होने हमारे पापा की शादी  का एक प्रसंग बताया कि जब तुम्हारे पापा की शादी  ( सं -1953) हुई तो शादी की एक रश्म "कुँवर कलेऊ" होती  है। उसमे वर एवं उसके परिवार के सदस्य  को मंडप मे भोजन कराया जाता है। उकत कार्यक्रम मे परिवार के सदस्यों के अलावा उनके  अभिन्न मित्र श्री गनेशी लाल भी थे, (श्री गनेशी चाचा जीवन पर्यान्त हमारे परिवार के सदस्य रहे) उस जमाने मे रूढ बादिता और जातिबाद काफी था हमारे ननिहाल पक्ष के लोगो को उनके मित्र जो कि समाज के कमजोर वर्ग से थे का "कुँवर कलेऊ" कार्यक्रम मे सबके साथ भोजन करना पसंद नहीं आया और उनलोगों ने उनकी मंडप मे उपस्थिती पर एतराज़ किया। लेकिन हमारे पापा ने अपने मित्र के  विना कुँवर कलेऊ  मे भोजन करने से इंकार कर दिया, हार कर हमारे मामा एवं ननिहाल के परिवार को उनके मित्र को साथ मे वैठा कर उक्त कार्यक्रम को पूरा किया। उनकी उस समय मे भी  प्रगतिशील सोच को हम नमन करते है उनके संस्कार ही हमारे परिवार की आज भी थाती हैं। आज उनका जन्म दिन है हम आज उनको अपनी विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए उनको याद करते है। पापा हम सभी आपको प्यार करते है !!

विजय सहगल