"रुटियाँ और खटियाँ"
नाम- नामालूम
पिता का नाम - नामालूम
जाति - नामालूम
ग्राम/कस्बा - नामालूम
जिला - रिकार्ड
जी हाँ, यही उपर्युक्त सूचना का एक अंश जो हमारी आगे वाली लाइन मे बैठे आपस मे बात कर रहे उन दो सज्जन से मैं सुन सका। घटना 2018 मे हरिद्वार के शिविर मे शामिल अनेकों शिवरार्थियों के बीच मध्याहन भोजन के बाद के समय एक बुजुर्ग सज्जन जो शायद अपनी आपबीति अपने बगल मे बैठे सज्जन के साथ सांझा कर रहे थे। मैं उन दोनों के ठीक पीछे बैठा उनकी बातचीत सुन रहा था। आपबीती सुना रहे बुजुर्ग सज्जन की उम्र लगभग 75-80 के आसपास रही होगी। उनके चेहरे पर उनकी वेदना का दर्द स्पष्ट देखा जा सकता था। हरिद्वार प्रवास के दौरान घटी उक्त घटना को मैं आप लोगो के साथ सांझा करना चाहूँगा। बातचीत जारी थी वह बुजुर्ग सज्जन पिछले 3-4 दिन से हरिद्वार मे रहने की ठौर तलाश कर रहे थे। अकेले की बजह से किसी ने अपना घर नहीं दिया। आश्रम मे कमरा किराया 5000 रूपय प्रति माह और खाना पीना बिजली अलग। तभी उन्हे शांतिकुंज हरिद्वार के बारे मे पता चला, उनको 2-3 दिन के लिये यहाँ रुकने की निशुल्क व्यवस्था हो गयी। तभी किसी परिचित के माध्यम से 9 दिवसीय शिविर की सूचना उन्हे मिली और इस तरह वे 9 दिवसीय शिविर मे हमारे सहभागी हो गये अर्थात उन्हे हरिद्वार मे 9 दिन के लिये रहने का अश्रय मिल गया। उनका शिविर मे शामिल होने के साथ साथ आश्रय स्थल तलाशने का प्रयास जारी रहा। उन्होने जो दर्द अपने बगल मे बैठे व्यक्ति से सांझा किया उसने हमे समाज मे टूट रहे परिवारों और उनके बीच पिस रहे बुजुर्ग व्यक्तियों की मनोदशा, अकेले पन और उम्र के आख़री पढ़ाव मे होने बाली परेशनियों पर सोचने को मजबूर कर दिया। वह बुजुर्ग सज्जन किसी भी कीमत पर अब घर लौटने को तैयार नहीं थे। ऐसा नहीं था कि उनके परिवार मे और कोई सदस्य नहीं था। दो शादीशुदा बेटे-बहुए, चार नाती और दो नातिन का भरा-पूरा परिवार था। बच्चे ज्यादा पढे-लिखे नहीं थे। खुद फौज से सेवानिव्रत्त 24000/- रूपय मासिक पेंशन पा रहे थे। पत्नी का देहांत हो गया था। रोज-रोज की आपस मे बहुओं से होने वाली कलह से दुखी थे। खेती की जमीन को बच्चों मे बाँट दिया था फिर भी बेटों मे पैसों की लिये आपस मे झगड़ा कम नहीं हुआ, इसी क्लेश से मुक्ति का मार्ग उन्हे शांति की चाह मे हरिद्वार खींच लाया। तुम्हारे बेटे, नाती-नातिन तुम्हें याद कर के तुम्हें वापस नहीं बुलायंगे, दूसरे सज्जन ने उन बुजुर्ग सज्जन से पूछा। बुजुर्ग सज्जन जिनकी आँखें नम थी पर पूरी कोशिश के बाद भी आँखों मे उठे सैलाब को भरसक कोशिश के बावजूद भी वे उन आंसुओं को रोक न सके, उनके दिल मे उठ रही टीस ने मुझे भीतर तक झकझोर दिया। उन्होने अपनी भाषा मे जब कहा कि "बेटे क्यों याद करेंगे उनकी तो रूठियाँ (रोटी) बची और खटियाँ (चारपाई/जगह) बची !!
सत्रह के बाद बुजुर्ग सहचर को कहां आश्रय मिला, लेकिन समाज में बुजुर्ग सहचर के साथ हो रहे इस तरह के व्यवहार ने मुझे झकझोर दिया। हम इतने बेगारट , बेहया और बेशरम कैसे हो गए ? हमारी संवेदनाएं इतनी प्यारी हो कर मर गईं कि हम अपने बड़े मां-बाप को उम्र के इस आखिरी पाव में दो घंटे की रोटी और सुख शांति भी नहीं दे सकते ? ताकि वे अपने , इस जीवन यात्रा के अंतिम आख़री को , शांति अंक पूरा भी करें , न कर आकर्षण ?
विजय सहगल

4 टिप्पणियां:
श्री सहगल जी आपके द्वारा वेदना का जो मार्मिक विश्लेषण किया गया है उससे मन अत्यंत विचलित हुआ l शायद यह कलयुग का ही प्रभाव है l निश्चित है इस पाप का फल संतानो को भुगतना पड़ेगा, प्रभु सब हिसाब-किताब रखेंगे l
आज बुजुर्ग की स्थिति सोचनीय है लेकिन हम बुजुर्ग भी जिम्मेदार है जब तक हम जीवित है हमें अपनी सल्तनत अपने पास रखें और जो हमारा ध्यान रखें उसको दे लेकिन हम इतने मतलबी है कि ध्यान कोई भी कर लेकिन अपना धन अपने सन्तान को देंगे एक सत्य घटना सुधा नारायण मूर्ति ने लिखी एक बुजुर्ग को उन्होंने अपने वृद्ध आश्रम में रखा लेकिन वह मरते समय अपना धन अपने पुत्र को दे गया वाह रे पुत्र मोह
Dr cpgupta
It is bitter truth these days and you have presented in such a way that it pains to read such cases.
I S Kadian
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