"गुप्तकालीन
ईंटों का पुरातन मंदिर, भीतरगाँव,
कानपुर"
पिछले
दिनों मैराथन यात्राओं के कारण रविवार को साप्ताहिक ब्लॉग लिखने से रह गया लेकिन 15
दिवसीय इस यात्रा मे अनेकों नए शहर और उनके नये धार्मिक/पर्यटन स्थलों का भ्रमण मुझे
नये ब्लॉग, यात्रा वृतांत लिखने के लिये प्रेरित करेगा। इसी कड़ी मे प्रस्तुत है एक अनछुए
मंदिर का विवरण जो पर्यटन की दृष्टि से अभी कम लोकप्रिय है।
यूं
तो कानपुर महानगर मे अनेकों बार आना जाना हुआ पर 4 नवंबर 2025 को मै अपने दृढ़
निश्चय के साथ ही कानपुर आया था कि इस बार कानपुर से लगभग 30-35 किमी॰ दूर भीतरगाँव
मे स्थित 5वी शती के गुप्त कालीन, ईंटों से बने अद्भुत मंदिर का भ्रमण अवश्य
करूंगा। भारत के स्वर्ण युग कहे जाने वाले चन्द्र गुप्त प्रथम से विष्णुगुप्त तक
के शासकों का काल 320 ईस्वी से 550 ईस्वी
तक रहा जिसमे कला, साहित्य, विज्ञान और
वास्तु निर्माण मे अद्भुत अकल्पनीय कार्य हुए। इनके ही काल के दौरान भीतरगाँव स्थित
इस स्थल पर टेरकोटा की ईंटों से बना ये गुप्तकालीन मंदिर अत्यंत दर्शनीय और सुंदर है।
मैंने ईंटों की बारीक नक्काशी का एक अन्य मंदिर को अपने छत्तीसगढ़ पदस्थापना के दौरान सिरपुर (जिला रायपुर, बसना) मे स्थित लक्षमण मंदिर 1998-99 मे देखा था। कहा जाता हैं कि इस गुप्त कालीन लक्ष्मण मंदिर को भी पहले कच्ची ईंटों से बनाया
गया था और फिर पूरे मंदिर को आवा लगा कर उसी तरह पकाया गया था जैसे कच्ची ईंटों को
पकाने के लिए आग मे तपा कर पकाया जाता था।
कानपुर
महानगर की आपा-धापी और दौड़ भाग भरी ज़िंदगी से निकलते हुए जब हम रमईपुर औधोगिक
क्षेत्र से निकल कर भीतरगाँव के शांत और ग्रामीण इलाके मे पहुंचे तो अलग ही सुकून
और शांति का अनुभव किया। जब हम अपने
परिवार के साथ भीतरगाँव मे पहुंचे तो एक अदृश्य डर और कल्पना के कारण, गाँव मे
घनी आबादी और बाजार के बीच मे इस प्राचीन मंदिर को देखना एक चिंता मिश्रित अलग
अनुभव था। लेकिन इस छोटे से मैदान मे बने मंदिर को पुरातत्व विभाग द्वारा मंदिर के
रख रखाव को देख कर सुखद अनुभव किया। मंदिर के परिसर की साफ सफाई के बीच ईंटों से
बने इस मंदिर को देखना एक विलक्षण अनुभव था। सूरज की स्वर्णिम किरणों से सुहागा
रंग की ईंटों पर पड़ रही चमक सोने पर सुहागा की कहावत को चरितार्थ कर रहीं थी। हरी
घास के मैदान के बीच 36X47 फीट आयताकार परिसर मे बना लगभग 68
फीट ऊंचा मंदिर अपनी आभा, चमक और तेज के कारण अत्यंत ही आकर्षक और सुंदर लग
रहा था। पूर्वोन्मुख इस भव्य मंदिर का द्वार एक अर्ध वलयाकार आर्क की आकृति लिए था
जिसमे 18X9X3 इंच की ईंटों से बनाया गया था। 4-5 सीढ़ियाँ चढ़ कर मंदिर के गर्भ गृह मे पहुंचा
जा सकता हैं। लेकिन जाली दर गेट मे ताला डला होने के कारण अंदर जाना वर्जित था।
यध्यपि 15X15 फुट के मंदिर के वर्गाकार गर्भ गृह मे कभी कोई
मूर्ति रही हो, पर
अभी कोई मूर्ति या निर्माण नहीं था। मंदिर के अंदर मे सिवाय इस दरवाजे के
कहीं कोई खिड़की या अन्य दरवाजा नहीं था लेकिन आर्क की आकृति के ऊपर ईंटों से बने
त्रिकोणीय दीवार के बजन को सहन करने की वास्तु तकनीकि को देख आश्चर्य, विस्मय और अचंभा तो होता ही है कि चौथी-पाँचवीं शती मे भी हमारे देश का
वास्तु निर्माण कितना उन्नत, विकसित और उत्कृष्ट रहा होगा।
भीतरगाँव
का ये मंदिर टेराकोटा ईंटों से बना एक मात्र पुरातन हिन्दू मंदिर है जो आज भी अपने
भव्य और जीवंत रूप मे विराजमान हैं, निश्चित ही पुरातत्व विभाग को इस
महत्वपूर्ण योगदान के लिए प्रशंसा करनी होगी। मंदिर की चारों दीवारों पर जहां नीचे
6-7 फीट तक सामान्य ईंटों का आधार देकर चबूतरा
बनाया गया था, उसके ऊपर चारों तरफ आयताकार आलों पर हिन्दू
देवी देवताओं, सनातनी कथाओं को टेराकोटा मे उपयोग होने वाली
कच्ची मिट्टी से निर्मित कर आग मे तपा कर मंदिर मे लगाया गया पर दुर्भाग्य से
आक्रांताओं लुटेरों ने इन मूर्तियों को विरूपित कर अपभ्रष्ट कर दिया। लेकिन हिन्दू देवी देवताओं और उनके स्वरूपों को उनकी
चित परिचित रूप और शैली से उन आकृतियों को
पहचान करना कठिन नहीं था। भगवान विष्णु द्वारा वामन अवतार मे उपयुक्त बौने ब्राहमण
और हाथ मे छत्री को देख कर अनुमान लगाना कथित नहीं कि ये भगवान विष्णु के वामन
अवतार का प्रसंग हैं। चार भुजा धारी माँ दुर्गा की मूर्ति स्वयं ही अपने रूप का
वर्णन करती प्रतीत होती हैं। नर और नारायण के रूपों का संदेश देती मूर्ति भी मंदिर
की एक दीवार मे देखी जा सकती हैं। भगवान के
बराह अवतार रूप को एक फ्रेम मे उत्क्रीण किया गया था। एक विरूपित मूर्ति मे रावण
द्वारा माँ सीता का झोपड़ी से हरण और जटायु की उपस्थिती को दर्शाया गया हैं।
देवधिदेव भगवान श्री गणेश की विकृत की गयी मूर्ति को लंबोदर की सूढ़ से बड़ी आसानी
से पहचाना जा सकता हैं। कहने का तात्पर्य हैं इन विधर्मी आक्रांताओं की अपवित्र कोशिशें
भी सनातन स्वरूपों,
संस्कारों और सांस्कृति को नहीं मिटा सके।
इन मूर्तियों के दोनों ओर षटकोणीय स्तंभों के ऊपर और नीचे अर्धगोलाकार बारीक
नक्काशी को उकेरना टेराकोटा की इस अद्भुत वास्तु कला की पराकाष्ठा रही होगी।
मंदिर
की दीवारों पर ईंटों से बने हाथी, शेर और
अन्य प्रतीकों को भी बड़ी बारीकी से उकेरा गया हैं। ईंटों से बने छज्जे, आले
और कंगूरों को बहुत ही शानदार ढंग से बनाया गया हैं। मंदिर की दीवारों के ऊपरी सतह
पर एक के उपर एक अनेकों आर्क का निर्माण मंदिर के निर्माण को एक शानदार ज्योमिति
रूप प्रदान करता हैं जिसे देख कर तत्कालीन वास्तु निर्माण मे पारंगत हमारे
श्रमिकों और कारीगरों की कला देखते ही बनती हैं।
जहां
एक ओर पुरातत्व विभाग के कर्मचारी श्री शाही द्वारा मंदिर के बारे मे हम पर्यटकों
को विस्तृत विवरण देना उनकी कर्तव्य
परायणता को दर्शाता है जो आज के समय मे कम देखने को मिलता है वहीं दूसरी ओर कानपुर जैसे महानगर मे इतने प्राचीन भव्य मंदिर
के दर्शन के लिए पर्यटकों का आभाव होना इस
बात की ओर इशारा करता हैं कि शासन और सरकार के उत्तरदायी अधिकारियों द्वारा अपने
कर्तव्यों मे कोताही करते हुए सार्थक पहल
और प्रचार प्रसार नहीं किया जा रहा हैं जो निश्चित ही चिंता का विषय है। आप अब जब कभी
कानपुर जाएँ तो भीतरगाँव के इस गुप्तकालीन मंदिर के दर्शन करना न भूले।
विजय
सहगल







3 टिप्पणियां:
*What a beautiful description of a temple from the Gupta era situated at Bhitargaon near Kanpur! Literally, it is a very tough job to write a travelogue about a temple in a place that is not so popular as a tourist destination. Your minute observations are incredible, and I know that it is very difficult to collect information about such temples located in rural areas! I can't stop commending your passion and dedication to your hobby and your venture of visiting various places. In your current write-up, you mentioned the Laxman temple of Sirpur, near the capital of Chhattisgarh I.e.Raipur. In 1975, I had an opportunity to visit that place along with my late father and his colleagues. We were told that the Laxman temple is an exception since Laxman was like a shadow of Prabhu Ram Ji. But alone, Laxman Ji's temple is just one in the country. A lot of thanks to you for refreshing my memories from more than fifty years ago...!*
👍👍👍👍👍🌹🙏🌹👌👌👌👌👌
Surrender Singh Kushwah, Gwalior
Very Beautiful Description 👍👍
राम राम जी की आप बहुत भोगोलिक जानकारी देते हैं
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