शनिवार, 27 सितंबर 2025

नेपाल-क्रांति, पहली महिला पीएम के समक्ष बड़ी चुनौतियाँ

 

"नेपाल-क्रांति, पहली महिला पीएम के समक्ष बड़ी चुनौतियाँ"





नेपाल की ओली सरकार द्वारा अपने देश  मे व्याप्त भ्रष्टाचार के चलते  सोश्ल मीडिया पर लगाए प्रतिबंध के फलस्वरूप, 8 सितंबर 2025 को नेपाल के युवाओं मे उपजी क्रोधाग्नि से  नेपाल की संसद, सुप्रीम कोर्ट और अन्य अनेक सरकारी कार्यालयों और सरकार के प्रधान मंत्री सहित अन्य मंत्रियों के निजी निवास, व्यापारिक प्रतिष्ठान और अन्य अनेक संस्थान जल उठे। उनकी राह मे आने वाली हर वो चीज आग की लपटों मे घिर गयी, फिर वो चाहें संसद मे रक्खे पेपर, दस्तावेज़ या फिर  फर्नीचर, वाहन या दिखावटी सामान। आंदोलनकारी संसद से टेबल और कुर्सी तक लूट कर ले गये। आंदोलित युवाओं ने इसे जेन-ज़ी (ऐसी नेतृत्वकारी जेनरेशन, जिसका जन्म 1995 और 2010 के बीच हुआ हो) की क्रांति बतलाया। नेपाल की राजधानी काठमांडू सहित नेपाल के अनेक शहरों जैसे पोखरा, विराटनगर, धरान, दमक  के आक्रोशित  नौजवानों के  इस  स्वस्फूर्त आंदोलन ने पूरे नेपाल मे अराजकता, अव्यवस्था और अस्तव्यतस्ता की स्थिति उत्पन्न कर दी। ये ऐसे आंदोलनकारी युवा थे जो  इंटरनेट के युग मे पले बढ़े थे और जिन्होने सोश्ल मीडिया से ही अपनी शिक्षा, पहचान, कारोबार और सामाजिक रिश्ते बनाये। आंदोलन के दौरान, हिंसा और आगजनी के शुरुआती दौर मे पुलिस बलों के लाठी और अश्रु गैस के बलप्रयोग से आंदोलन विस्तृत और  व्यापक हो उठा। सेना की तैनाती के साथ कर्फ़्यू लगाना पड़ा। प्रदर्शनकारियों के  हिंसक विरोध और अनियंत्रित भीड़ के चलते, देखते ही देखते गोली मारने के आदेश दिये गये। इस अप्रिय स्थिति मे 19 लोगों की मौत और तीन सौ से ज्यादा लोगों के घायल होने  ने, आग मे घी का काम किया। 

सूचना मंत्रालय मे पंजीकरण न करवाने की बजह से 3 सितम्बर को नेपाल सरकार द्वारा  सोश्ल मीडिया के मंच फ़ेस बुक, इंस्टाग्राम, युट्यूब, एक्स, और व्हाट्सप्प जैसे 26 सोश्ल मीडिया ऐप्प्स पर प्रतिबंध के चलते युवाओं की पढ़ाई-लिखाई और अन्य सूचना संचार के अभाव मे संवाद हीनता की स्थिति पैदा हो गयी, जिसने  युवाओं को  क्रोध, रोष और गुस्से से भर दिया। हॉस्पिटल मे पहुंचे हताहतों को देखकर डॉक्टर्स और अन्य नर्सिंग स्टाफ भी सकते मे आ गये जब उन्होने देखा कि मृत आंदोलनकारी युवाओं के सीने और सिर मे गोलियां लगी हैं। प्रधानमंत्री के पी शर्मा ओली की हठधर्मिता ने, नेपाल के राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग और अन्य गणमान्य, प्रभावशाली लोगों का सरकार को  संयम बरतने के आग्रह को  भी अनसुना कर दिया गया। सरकार और नौकरशाही मे व्याप्त भ्रष्टाचार का आलम ये था कि सरकार के मंत्रियों और उनके  परिवार जनों तथा रिशतेदारों  द्वारा विलासता पूर्ण जीवन शैली की घटनाओं ने, बेरोजगारी, मेहंगाई और कदम कदम पर भ्रष्टाचार से जूझ रहे नेपाल के युवाओं और आम नागरिकों को उद्वेलित और उत्तेजित कर दिया।

नेपाल लंबे वक्त से राजनैतिक अस्थिरता, भ्रष्टाचार, बेरोजगारी, भाई-भतीजा वाद जैसे नाजुक हालातों से गुजर रहा है। दुर्भाग्य देखिये कि 2008 मे इन्ही मुद्दों पर नेपाल की राजशाही को हटा कर लोकतान्त्रिक व्यवस्था को स्थापित किया था लेकिन सत्रह साल के लंबे काल खंड के बावजूद स्थितियाँ और परिस्थितियाँ जस के तस रहीं। नेपाल के भोले भाले  लोगों की विडंबना पर दृष्टिपात करें तो   उनकी  आकांक्षा और अभिलाषाए आज भी मृग मरीचिका के समान उन से कोसों दूर प्रतीत होती हैं।  वे आज तक राजशाही और लोकशाही के भ्रष्टाचार रूपी  दो  पाटों के बीच पिस  रहे हैं अन्यथा क्या कारण थे कि 17 वर्षों  के लोकतान्त्रिक व्यवस्था मे  14 सरकारें नेपाल की जन भावनाओं पर खरी नहीं उतरी।      

आंदोलन कारी युवाओं की मांग है कि नेपाल सरकार द्वारा सभी प्रतिबंधित सोश्ल मीडिया मंचों से प्रतिबंध हटाये। भ्रष्टाचार के विरुद्ध समुचित कार्यवाही हो। युवाओं की आवाज सुनी जाएँ। लोकतन्त्र और अभिव्यक्ति की आज़ादी बहाल हो। युवाओं की मांग है कि बेहतर शिक्षा, रोजगार और सरकार मे पारदर्शिता हो। जबकि सरकार का कहना था कि ये सोश्ल मीडिया बिना अनुमति चल रहे हैं, फर्जी खातों के कारण अपराध बढ़ने और कानून व्यवस्था की स्थिति उत्पन्न और राष्ट्रीय सम्मान, सुरक्षा और समाज मे शांति, सौहार्द खतरे मे है।  नेपाल के गृह मंत्री ने तो 8 सितम्बर को ही इस्तीफा दे दिया था। 9 सितम्बर को भी जारी रहे हिंसक प्रदर्शन के बीच मे आंदोलनकारी युवाओं की सोश्ल मीडिया से प्रतिबंध हटाने की मांग को मानने के बावजूद  प्रधानमंत्री के पी शर्मा ओली सरकार के स्तीफ़े की मांग पर प्रदर्शनकारी डटे रहे। नेपाल के राष्ट्रपति रामचंद्र पौडेल, प्रधानमंत्री ओली  और सेना की शांति और संयम बरतने की अपील का भी आंदोलनकारियों पर कोई असर नहीं हुआ। जब अनियंत्रित भीड़ प्रधानमंत्री के स्तीफ़े की मांग को लेकर उनके कार्यालय मे घुसी, तो हारकर प्रधानमंत्री के पी शर्मा ओली ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया। प्रधानमंत्री ओली,  सौभाग्य शाली रहे कि सेना उन्हे बमुश्किल बचा कर हेलीकाप्टर से सुरक्षित स्थान पर ले गयी। लेकिन पूर्व प्रधानमंत्री, शेर बहादुर देऊबा को लहूलुहान कर मारपीट की तस्वीरे विचलित करने वाली थी। उन्मत्त भीड़ द्वारा वित्तमंत्री विष्णु पौडेल  को सड़क पर दौड़ा दौड़ा कर पीटने के दृश्य खीझ पैदा कर रहे थे, लेकिन एक अन्य पूर्व प्रधानमंत्री खाला नाथ खनल की पत्नी श्रीमती राज्यलक्ष्मी चित्रकार की  उनके घर मे आगजनी से हुई मृत्यु दिल दहलाने वाली थी। सुरक्षा की दृष्टि को देखते हुए, हिंसक आंदोलन के दौरान नेपाल की राजधानी काठमांडू से आने व जाने वाली सभी  हवाई उड़ाने रद्द कर दी गयी। मंगलवार को ही आंदोलनकारियों ने नेपाल कॉंग्रेस के दफ्तर और अन्य वामपंथी दलों के कार्यालयों मे भी आग लगा दी। कोटेश्वर मे तीन पुलिस अधिकारियों की बड़ी बेरहमी से हत्या कर दी गयी।

जेन-ज़ी आंदोलन की पृष्ठभूमि शांतिपूर्ण प्रदर्शन की थी यही कारण था कि पहले दिन सारे आंदोलन कारी अपनी स्कूल ड्रेस मे थे एवं अपने स्कूल बैग और किताबों के साथ आये थे।  आंदोलन शांतिपूर्ण था पर अचानक हिंसक बारदातें शुरू हुई और पुलिस के हथियारों की लूट, जेल से खूंखार कैदियों का भागना, व्यापारिक संस्थानों मे लूटपाट और विश्वप्रसिद्ध पशुपति नाथ मंदिर मे तोड़ फोड़ के प्रयास इस बात की ओर इशारा करते हैं कि आंदोलन मे कुछ विध्वंसकारी और असामाजिक तत्वों की घुसपैठ से इंकार नहीं किया जा सकता।        

नेपाल मे हुई हिंसक क्रांति और सत्ता परिवर्तन पर, यहाँ भारत मे, इंडि गठबंधन के कुछ नेता यहाँ  भी इसी तरह के आंदोलन से मोदी सरकार को सत्ताच्युत कर सत्ता पाने के हसीन सपने देखने लगे। जिसमे कॉंग्रेस के छुट  भैये नेताओं और  शिवसेना उद्धव गुट के संजय राऊत सबसे आगे थे। बैसे इन नेताओं के ये  सपने पिछले दिनों,  श्रीलंका, बांग्लादेश मे हुए सत्ता परिवर्तन के समय भी, ऐसे ही उद्गार व्यक्त किए थे, शायद उनको इस भारतीय लोकोक्ति की जानकारी नही रही, कि "कौआ के कोसे ढ़ोर नहीं मरते"!! नेपाल मे भड़की हिंसा और अशांति के बीच भारत लगातार नेपाल के घटनाक्रम पर अपनी पैनी निगाह बनाए हुए है। भारत सरकार ने भी नेपाल के लोगों से शांति और सद्भाव से समाधान निकालने की अपील की है। इसी बीच भारत-नेपाल सीमा पर अलर्ट जारी किया है और सीमा सुरक्षा बलों द्वारा  लगातार चौकसी बरती जा रही है।   

नेपाल के युवाओं के दो दिन के आंदोलन से ही, प्रधानमंत्री के पी शर्मा ओली के इस्तीफे  से हुए  रिक्त स्थान की भरपाई हेतु सेना प्रमुख की अगुआई मे चली चर्चा मे जेन-ज़ी के नेतृत्व मे ही आपस मे फूट पड़ गयी और वे परस्पर ही लड़ाई झगड़े करने लगे। रैपर से काठमांडू के मेयर बने बालेन्द्र शाह, नेपाल सुप्रीम कोर्ट की पूर्व प्रधान न्यायधीश सुशीला कार्की और लाइट मेन के नाम से मशहूर कुलमान घीसिंग के बीच प्रधानमंत्री पद के लिए कड़ा मुक़ाबला हुआ और अंततः लंबी जद्दो-जेहद और विचार विमर्श के बाद, सर्वसम्मति से सुशीला कार्की  के नाम पर आम  सहमति बनी। 12 सितम्बर को शपथ ग्रहण के पश्चात उन्होने नेपाल मे छह माह के अंदर नई सरकार के लिये चुनाव करवाने की घोषणा की। दो दिन मे पूरे देश मे संसद, सुप्रीम कोर्ट सहित अन्य सरकारी कार्यालयों मे हुई आगजनी और लूटपाट के बाद पूरे नेपाल मे युवाओं और नौजवानों की आकांक्षाओं और अभिलाषाओं को पूरा करते हुए नेपाल मे  शांति कायम कर देश की कानून व्यवस्था को  सामान्य बनाना, नई प्रधानमंत्री सुशीला कार्की के लिए एक बड़ी चुनौती होगी। समय की कसौटी पर वे कितनी कामयाब होंगी ये आने वाला समय ही बताएगा।   

विजय सहगल                                           

शनिवार, 20 सितंबर 2025

एलोरा की गुफाएँ, महाराष्ट्र

"शिव को समर्पित एलोरा की गुफाएँ, महाराष्ट्र"







 


महाराष्ट्र राज्य के छत्रपति संभाजी नगर स्थित एलोरा गुफाओं की गुफा संख्या 16, जिसे कैलाशनाथ मंदिर के रूप मे जाना जाता है, मे प्रवेश करते ही  अंदर का दृश्य देख कर, अनायास! ही  मुँह से निकल पड़ा,  आश्चर्य!, अद्भुत!!,  अद्वतीय!!!, अलौकिक!!!, अकल्पनीय!!! एवं अविस्मरणीय!!!॰ 735-737 के मध्य मे राष्ट्र कूट नरेश दंतिदुर्ग के काल खंड मे इन गुफाओं के निर्माण की रूप रेखा बनी और निर्माण कार्य का श्रेय कृष्ण राय प्रथम (सन 757-773)   के काल मे शुरू हुआ। 200 साल मे श्रमिकों की 20 पीढ़ियों द्वारा निर्मित इस वास्तु रचना को देख कर वरबस ही संत कबीर का वो दोहा याद हो आया :-

"सब धरती कागज करूँ, लेखनी सब बनराय।

सात समुद्र की मसि करूँ, गुरु गुण लिखा न जाय।।" अर्थात यदि सारी धरती को कागज बना  लूँ, सारे वृक्षों को कलम बनायेँ और सारे समुद्र को स्याही मान, गुरु के गुणों का वर्णन करें, तब भी उनके गुणों को लिखने मे ये वस्तुओं कम पड़ जाएंगी। यहाँ मै गुरु के गुणों  की जगह  एलोरा स्थित इस कैलाशनाथ मंदिर की भव्यता, दिव्यता और सुंदरता के वर्णन करने की धृष्टता कर रहा हूँ। मेरा मानना है कि किसी भी भाषा के शब्दों के जितने भी अलंकार, एलोरा गुफाओं की इस कैलाशनाथ मंदिर की गुफा के वास्तु निर्माण की  सौंदर्यता, सुरूपता एवं मनोहरता को देख कर लिखे जाएँ, कम पड़ेंगे। मैंने उस देश, काल और परिस्थिति को दृष्टिगत,  ऐसी अद्भुत वास्तु निर्माण अपनी  ज़िंदगी मे अब तक पहले  नहीं देखा, जिसमे एक पहाड़ को काट कर पूरे मंदिर की विशाल रचना का निर्माण किया गया हो। भगवान शिव को समर्पित इस मंदिर का निर्माण श्रमिकों के कठिन परिश्रम की उन पीढ़ियों को जाता हैं जिन्होने एक पहाड़ को उपर से नीचे की तरफ काटकर तथा उसी पहाड़ को बाहर से अंदर की ओर गढ़कर ढाल कर शिवालय का रूप दिया गया है, जो बेमिसाल, बेजोड़ है। एलोरा की इन 37 गुफाओं को  विश्व धरोहर का दर्जा प्राप्त है जो न केवल महाराष्ट्र के लिए अपितु सारे भारत के लोगों के  लिये गर्व और सम्मान की बात है। 

पूरे देश मे स्थित 12 ज्योतिर्लिंग मे 12वें ज्योतिर्लिंग घृष्णेश्वर मंदिर से मात्र 1.5-2 किमी॰ दूर स्थित एलोरा गुफाएँ 34 गुफाओं का समूह है जिसमे हिन्दू और जैन मंदिरों तथा  बौद्ध मठों मे इन  धर्मों के आरध्यों की मूर्तियाँ, पूजा स्थल आदि  बनाये  गये  हैं। हर गुफा अपने स्थापत्य और वास्तु की बारीक कलात्मकता की दृष्टि से बेजोड़ और अनोखी हैं,  लेकिन इस मे कोई दोराय नहीं कि गुफा क्रमांक 16, कैलाशनाथ मंदिर अपनी अनूठी नक्काशी, बेमिसाल वास्तु निर्माण और दक्षता-पूर्ण स्थापत्य मे अतुलनीय है। पुरातत्व विभाग द्वारा लगभग 2 किमी॰ क्षेत्र मे फैली इन गुफाओं का रखरखाव बहुत ही अच्छी तरह से किया गया हैं। गर्मी और उमस भरे मौसम के बावजूद हरे-भरे घास के मैदान और समपर्क पथ, साफ-सुथरे हैं। जगह जगह पेड़ों की छाँव मे बैठने की उत्तम व्यवस्था है। ठंडे पानी और प्रसाधन की उत्तम व्यवस्था है। पर्यटकों के भ्रमण के लिए एक गुफा से दूसरी गुफा मे जाने के लिए बैटरी वाहन उपलब्ध है।

कैलाशनाथ मंदिर अर्थात गुफा क्रमांक 16 लगभग एलोरा गुफाओं के मध्य मे स्थित है। भगवान शिव को समर्पित यह गुफा दुनियाँ की सबसे बड़ी, एक अखंड शिला उत्खनन है।  यध्यपि इस गुफा का प्रवेश द्वार अन्य गुफाओं की तरह ही असाधारण बना हुआ है, जिसके दोनों ओर अप्सराओं की नृत्य करती प्रतिमाओं को उकेरा गया है। लेकिन इस शिवालय मे प्रवेश करते ही एक अनूठे शिवलोक के दर्शन होते है मानों हम किसी स्वपन लोक मे पहुँच गए है। प्रवेश कक्ष को पार करते ही, बरामदे दूसरे सिरे पर पद्मासन मे बैठी देवी गजलक्ष्मी की सुंदर नयनाभिरम प्रतिमा के दर्शन होते है, जिनके दोनों ओर सूँड उठाये अभिवादन कर,  चारों  गजराज देवी के प्रति अपना सम्मान, श्रद्धा और आदर प्रकट करते हुए खड़े है साथ ही उनके दोनों ओर गंधर्व गदा के साथ खड़े हैं। पूरे मंदिर मे इसी तरह की नक्काशीदार देवी-देवताओं, यक्षों, किन्नरों, गन्धर्वों, नृत्य करती अप्सराओं और अन्य हिन्दू पौराणिक कथाओं और प्रसंगों को दर्शाती प्रतिमाएँ चारों तरफ देखने को मिलेंगी। इन प्रतिमाओं मे शिव-पार्वती के विवाह रावण का कैलाश पर्वत को हिलाने का प्रयास को दिखती मूर्तियाँ महत्वपूर्ण हैं। गजलक्ष्मी प्रतिमा के काफी पीछे और उपर भगवान शिव का मुख्य मंदिर है। यह पूरा दो मंज़िला मंदिर एक रथ के आकार मे बना है जिसके चारों ओर खुला गलियारा है तथा गलियारे के दूसरी ओर तीन मंज़िला कवर्ड बरामदा बना है। ऐसा प्रतीत होता है कि रथ, खुले गलियारे के मध्य मे खड़ा हो। मंदिर के तीनों तरफ रथ को खींचते अनेक हथियों की हाथीकद प्रतिमाएँ एवं कहीं कहीं सिंह वाहनी भी दिखलाई देती है। गलियारे की दूसरे किनारे पर उपर की ओर ऊंची पहाड़ की शिला चारों ओर स्पष्ट दिखलाई पड़ती कि ये पूरा कैलाश मंदिर पहाड़ को ऊपर से नीचे की ओर काट कर बनाया गया है। पहाड़ी शिला के नीचे चारों ओर तीन मंज़िला बड़े बड़े हाल बने हैं जिनके बीच बीच मे बड़े बड़े पाषाण स्तंभों से बरामदे की छत्तों को सहारा दिया गया हैं। सोच और देख कर आश्चर्य और अचंभा होता हैं कि उस काल के श्रमिकों का वास्तु निर्माण कला का ज्ञान और कौशल कितना  उन्नत, उत्कृष्ट और विकसित रहा  होगा,  कि इतने अप्रितिम, अद्भुत लोक का निर्माण किया। गलियारे के प्रवेश द्वार के बाएँ और दायें दोनों ओर, समान रूप से एक-एक  चौकोर पाषाण स्तम्भ जिसपर बारीक नक्काशी की गयी है खड़े हैं। इन दोनों ओर के स्तम्भों  के नजदीक ही दो गजराज हथियों की प्रतिमाएँ बनी थी, जिन पर मौसम का प्रभाव स्पष्ट दिखलाई पड़  रहा था, क्योंकि प्रतिमाएँ, बरसात, धूप और हवाओं के प्रभाव से अपने रूप और रंग मे बदलाव से अछूती नहीं थी।

मुख्य मंदिर मे प्रवेश के लिए हम सीढ़ियों से पहली मंजिल पर स्थित शिव मंदिर के लिए पहुंचे। जूते चप्पल निकाल कर जैसे हमने मंदिर के रंग मंडप मे प्रवेश किया जो एक विशाल सभागार की तरह था। जिसमे अनेकों पत्थर के चौकोर और ऊंचे स्तम्भ बनाए गए थे। कक्ष मे रोशनी की कमी थी। प्राकृतिक प्रकाश से ही जो थोड़ी बहुत रोशनी आ रही थी उसी से रंगमंडप की शोभा देखने को मिली।  पुरातत्व भवनों की सुरक्षा की दृष्टि से इलेक्ट्रिक लाइट की व्यवस्था नहीं की गयी थी। पाषाण स्तम्भ पर भी उसी तरह नक्काशी की गयी थी जैसे कैलाश मंदिर के खिड़की, दरवाजे, आले और मेहरावों मे की गयी थी। आगे मंदिर के गर्भ गृह मे एक विशाल शिवलिंग विराजित था। विभाग ने यहाँ बैटरी से चालित प्रकाश की व्यवस्था कर रक्खी थी ताकि श्रद्धालु शिवलिंग के दर्शन कर सकें।

दर्शन पश्चात मंदिर के मुख्य द्वार के सामने एक कक्ष मे स्थित  शिव के वाहन नंदी के दर्शन कर अब हम गुफा के मुख्य प्रवेश द्वार के उपर बनी छत्त पर थे जहां से मंदिर के दोनों ओर बने तीन मंज़िला बरामदे और दीप स्तम्भ तथा  हाथी के प्रतिमाओं के पीछे बना खुला गलियारा दूर दूर तक एक विहंगम दृश्य उत्पन्न कर रहा था। इस छत्त से गुफा के बाहर के बगीचे, पेड़ पौधे और हरी घास के मैदान भी सुंदर दिखाई दिये।

कैलाश मंदिर के पश्चात हम लोग गुफा संख्या 15 से 0 की ओर बढ़े। उनमे कुछ गुफाएँ साधारण थी, कुछ गुफाओं मे जैन तीर्थंकरों की अद्भुत प्रतिमाएँ और कुछ मे भगवान बुद्ध, अपनी ध्यान की मुद्रा मे नज़र आये। हर गुफा मे ऐसी अनेक नक्काशीदार प्रतिमाएँ, बड़े बड़े सभा कक्ष  और पूजा घर बने हुए थे।  दीवारों पर जातक कथाओं को उकेरा गया था। कुल मिला कर एलोरा गुफाओं मे हमारे शिल्पियों की स्थापत्य  कला, पुराने वास्तु  कौशल कदम कदम पर देखने को मिला जो दुनियाँ मे इकलौता हैं लेकिन गुफा क्रमांक 16 कैलाश मंदिर एक अद्भुत, अकल्पनीय वास्तु निर्माण था। एक बार हर भारतीय को 12वें ज्योतिर्लिंग घृष्णेश्वर के दर्शन के साथ एलोरा गुफाओं के दर्शन अवश्य करना चाहिए।

 

विजय सहगल                        

 


रविवार, 14 सितंबर 2025

अमेरिकी टेरिफ़ को चुनौती देंगे हाथी और ड्रैगन?

"अमेरिकी टेरिफ़ को चुनौती देंगे हाथी और ड्रैगन?"







20 जनवरी 2025 को जबसे 79 वर्षीय डोनाल्ड ट्रम्प, अमरीका के दूसरी बार  राष्ट्रपति चुने जाने पर पूरी दुनियाँ को, अमेरकी  टेरिफ़ वार की जंग मे उलझा दिया। दुनियाँ में महाशक्ति होने की प्रतिष्ठा  जो पूर्व राष्ट्रपतियों ने  सालों मे हांसिल की थी, ट्रम्प के आने के बाद बैसी छवि अब उनकी नहीं रही। आज के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने दुनियाँ के सबसे परिपक्व लोकतन्त्र होने  के अपने महाशक्ति होने का रुतबा, बड़प्पन और कुलीनता को भुलाते हुए एक चतुर लेकिन काइयाँ व्यापारी के रूप मे अपनी छवि को गढ़ लिया जो 24 घंटे सातों दिन हर मिलने, जुलने, आने-जाने वालों से अपनी टैरिफ की तराजू दिखा कर, मोल-तोल करने मे मशगूल है। उन्हे अपने देश के इतिहास की मर्यादाएं और नैतिकताओं से कोई सरोकार नहीं। डोनाल्ड ट्रम्प विश्व के सभी छोटे-बड़े देशों से व्यापार मे अमेरिका के टैरिफ और टैक्स लगाने मे इतने मशगूल हो गए कि वे अपने मित्रों और शत्रुओं में, सहयोगियों और असहयोगियों के बीच के अंतर की भी समझ खो बैठे है, अन्यथा क्या कारण हो सकते हैं कि रूस से तेल खरीदने पर तर्कों-वितर्कों  से परे  कुतर्कों का सहारा लेकर भारत जैसे देश पर टैरिफ और उस पर पैनल्टी लगा कर 50% का  टैक्स लगा दिया। उन्हे शायद अनुमान नहीं था कि आज का भारत,  बदला हुआ भारत है जो किसी महाशक्ति की धौंस-डपट, धमकी या  दबाव मे आये बिना परस्पर समानता, सहभागित और स्वाभिमान मे विश्वास करता है।              

पाकिस्तान और अन्य ऐसे ही देशों ने अपने आत्मसम्मान को तिलांजलि दे कर अमेरिका की व्यापार और आर्थिक नीतियों के समक्ष, उसके आगे घुटने टेकते हुए अपने देशो के नागरिकों के हितों की कीमत पर सम्झौता कर लिया। उन्हे ऐसी ही कुछ  उम्मीद मोदी सरकार से रही होगी लेकिन आपदा मे अवसर की नीति पर चलते हुए नरेंद्र मोदी सरकार ने पूरी तरह संयत शांतचित्त से 280 करोड़ की आबादी वाले विश्व की दो सबसे बड़े देश, भारत और चीन  को एक बार विश्व के बिगड़े आर्थिक हालातों के बीच,  पुनः चीन के तियानजिन शहर मे 31 अगस्त से 1 सितंबर 2025 को होने वाले 25वें शंघाई सहयोग संगठन (SCO) के शिखर सम्मेलन के  मंच पर एकसाथ ला खड़ा किया। दोनों  देशों के एक साथ आने से न केवल इनके बीच पारस्परिक सौहार्द और संबंध तो बढ़ेंगे ही अपितु वैश्विक और क्षेत्रीय परिस्थितियों मे  भी विशेष परिणाम देखने को मिलेंगे। दरअसल मोदी सरकार ने अमेरिका की मदांध टैरिफ नीति को भाँपते तथा  ऑपरेशन सिंदूर मे राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के बड़बोले पन के चलते, पिछले साल ही भारत चीन संबंधों को सामान्य बनाने की रणनीति पर कार्यारंभ कर दिया था। विदेशमंत्री और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार की वार्ताओं और मुलाकातों मे गलवान घाटी मे झड़प के बाद सीमा पर तनाव मे कमी लाने मे मिली सफलता, भारत चीन व्यापार, हवाई सेवा एवं वीजा सेवा पर सहमति, भविष्य के द्विपक्षीय समझौतों पर सहमतियाँ बनी। पूरे विश्व की निगाहें भी भारत चीन की इस मीटिंग पर थीं कि कैसे विश्व की दो बड़ी आर्थिक शक्तियाँ अपने असहमति के क्षेत्रों से परे आपसी मुद्दों के समाधान के लिए सहमत हो सकती हैं। मुलाक़ात के बाद, दोनों देशों के अलग अलग बयान इस बात को उद्धृत कर रहे थे कि अब दोनों देश एक नये रास्ते पर बढ़ रहे है। दोनों देशों ने आपसी मतभेद को विवाद का रूप न देने पर भी चर्चा हुई। दोनों देश निवेश के मामले पर भी सहमति बनाते दिखे। इस सबके बावजूद सीमा पर चीन की विश्वसनीयता,  भारत चीन के संबंधों पर सबसे बड़ी चुनौती रहेगी। दोनों देशों को इस बात का ध्यान रखना होगा,  कहीं सीमा पर आपसी सहमति और विश्वास मे कमी  इस रास्ते की बड़ी बाधा न बने? 

इस मंच से रूस के राष्ट्रपति पुतिन की सहभागिता ने गुड़ मे घी का काम करते हुए इस मंच को और भी महत्वपूर्ण बना दिया। प्रधानमंत्री मोदी ने बड़े ही स्पष्ट तरीके से अपने विचार रखते हुए SCO की नई परिभाषा गढ़ी। उन्होने इस्की व्याख्या  सुरक्षा, कनेक्टीविटी और अवसरों के रूप मे की। उन्होने परोक्ष रूप से चीन पाकिस्तान कॉरीडोर के पाक अधिकृत कश्मीर से निकालने पर टिप्पड़ी करते हुए कनेक्टीविटी मे दूसरे देशों की सार्वभौमिकता और क्षेत्रीय अखंडता  का सम्मान करने की हिदायत दी। ऑपरेशन सिंदूर पर पाकिस्तान के आतंकवादियों को खुले समर्थन पर अपनी अस्वीकार्यता प्रकट करते हुए आतंकवाद पर दोहरे मानदंडों पर अपना रोष प्रकट किया। अतकवादियों के मददगारों और समर्थकों को भी आतंकवादी घोषित करने की मांग सहित उक्त बातों को भी शंघाई सहयोग संगठन के संयुक्त घोषणा पत्र मे शामिल होने की कूटिनीति को  भारत की बहुत बड़ी सफलता माना जा रहा है।      

SCO के शिखर सम्मेलन मे भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और  रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की मुलाक़ात भी विश्व के मीडिया रिपोर्ट मे छाई रही।  मोदी ने रूस और भारत के संबंधों पर प्रकाश डालते हुए इसे कठिन से कठिन दौर मे कंधे से  कंधे मिलाकर चलने से उद्धृत किया। उन्होने कहा कि दोनों देशों  के संबंध न केवल दोनों देशों के नागरिकों अपितु वैश्विक शांति, स्थिरता और समृद्धि के लिए भी महत्वपूर्ण हैं। रूस और भारत के बीच हुई इस वार्ता का मुख्य उद्देश्य आर्थिक, वित्तीय और ऊर्जा क्षेत्रों मे दोनों पक्षों के बीच सहयोग बढ़ाना था। ऊर्जा क्षेत्र मे रूस से सस्ती दरों से पेट्रोलियम पदार्थों की महत्वपूर्ण खरीद शामिल है, जो भारत अमेरिका के बीच व्यापार समझौते मे, टैरिफ युद्ध का मुख्य  कारण बनी। वार्ता के पश्चात  रूसी राष्ट्रपति पुतिन का भारतीय प्रधानमंत्री के लिए दस मिनिट इंतज़ार करना और बाद मे राष्ट्रपति पुतिन की ऑरिस लिमोजीन  कार से  प्रधानमंत्री मोदी का एक साथ जाना और एक घंटे  तक एक दूसरे से अनौपचारिक  बातचीत को भी विश्व मंच ने कौतुकता से देखा। मीडिया मे चल रही चर्चा मे इस वार्ता को बेहद संवेदनशील, महत्वपूर्ण  गोपनीय वार्ता बताया।  जिसकी किसी को अब तक कोई जानकारी नहीं। शायद राष्ट्रपति पुतिन और प्रधानमंत्री मोदी ने इस कार को गोपनीय वार्ता के लिए इसलिये चुना क्योंकि वो इसे रूस से लाये थे और जो किसी भी  जासूरी यंत्रो और  प्रणाली से सुरक्षित है।

शंघाई सहयोग संगठन मे भारत, रूस चीन के एक साथ खड़े नज़र आने को अमेरिका के न्यूयार्क टाइम्स समाचार पत्र ने  भी, राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के लिए चिंता का सबब बताया। पत्र का कहना था कि ट्रम्प का भारत पर 50% टैरिफ के निर्णय ने भारत अमेरिका के व्यापार को बुरी तरह प्रभावित किया है। अमेरिका का यह निर्णय कहीं अमेरिका के लिए उल्टा न पड़ जाएँ? बैसे अमेरिका मे भी ट्रम्प के इस निर्णय का विरोध हो रहा है। अमेरिका स्थित फेडरल रिजर्व के गवर्नर जेरोम पॉवेल ने कहा है कि टेरिफ़ की बृद्धि से मुद्रास्फीति बढ़ सकती है, और आर्थिक गतिविधियां धीमि पढ़ सकती है, बेरोजगारी का खतरा बढ़ सकता है। डोनाल्ड ट्रम्प के टैरिफ के फैसले को पिछले दिनों यूएस अपील कोर्ट ने भी अवैध और गैरकानूनी बताया है। इस निर्णय से डोनाल्ड ट्रम्प काफी नाराज़ हैं और उन्होने इस निर्णय के विरुद्ध यूएस सुप्रीम कोर्ट मे अपील के लिए दरवाजा खटखटाया है। ऐसा नहीं है कि अमेरिका के इस टैरिफ से सिर्फ भारत को ही नुकसान है, अमेरिका मे मंदी का खतरा मंडराने लगा है, भारत रूस और चीन का एक साथ विश्व मंच पर आना इस खतरे को   और मजबूत करता है। अब ऐसा प्रतीत हो रहा  हैं कि दुनियाँ के देशों मे वर्चस्व की लड़ाई और तेज होगी कदाचित  दुनियाँ की  महाशक्तियों के क्रम मे भरी उलट फेर संभव  हो? कहीं अमेरिका को विश्व मे अपने, नंबर एक होने के अहसास से वंचित होना पड़  जाए?  भारत ने भी अन्य नये देशों से निर्यात व्यापार की संभावनाएं शुरू कर दी हैं ताकि अमेरिका से होने वाले निर्यात के नुकसान की भरपाई इन देशों के निर्यात से की जा सके।

विजय सहगल               


शुक्रवार, 5 सितंबर 2025

समुद्रतटीय, सड़क यात्रा- मेंगलुरु से उडुपी

 

"समुद्रतटीय, सड़क यात्रा- मेंगलुरु से उडुपी"











अनेक बार कुछ ऐसी यात्राएं होती है जो यादगार हो ताउम्र मन मस्तिष्क पर अमिट छाप छोड़ जाती हैं। कुछ ऐसी ही यात्राओं मे अपनी कार से, नई दिल्ली स्थित राष्ट्रपति भवन के  के गेट से नॉर्थ और साउथ ब्लॉक से गुजर कर, विजय चौक से होते हुए इंडिया गेट तक जाना मेरा प्रिय शगल, शौक था। जिसे मैंने अपने दिल्ली प्रवास के दौरान कई बार किया। अभी पिछले दिनों 8 जुलाई 2025 को ऐसी ही मनोरंजक यात्रा को फिर से  करने का सौभाग्य मिला, जब मेंगलुरु से उडुपी की 56 किमी॰ की यात्रा राष्ट्रीय राजमार्ग से न कर समुद्र तटीय छोटी, संकरी  ग्रामीण सड़कों से होकर अपने निजी टाटा नेक्सोन से मालपे ब्रिज होकर उडुपी जाने का मौका मिला। बेंगलुरु मे इस यात्रा की तैयारी मैंने 8-10 पहले से कर ली थी। यात्रा के पढ़ाव और समुद्र तटीय गाँव के नाम भी एक पेपर पर नोट कर लिए थे। बैसे गूगल पर यात्रा का मार्ग  तो राष्ट्रीय राजमार्ग क्रमांक 66 (जो कि कन्याकुमारी को कोची होकर पनवेल से जोड़ता है) से होकर दिखा रहा था। लेकिन हमारी इच्छा तो थी कि इस शानदार राष्ट्रीय राजमार्ग को छोड़ कर समुद्र तटीय इलाके की ग्रामीण सड़कों से होकर उडुपी पहुंचे, जो समुद्र तट  से लगी इन छोटी और संकरी सड़कों से होकर गुजरती हैं। इन सड़कों के एक तरफ तो दूर दूर तक नज़र आने वाले समुद और दूसरी तरफ ग्रामीड़ घरों, नारियल के वृक्षों और कहीं कहीं तो एक तरफ समुद्र और दूसरे तरफ समुद्र मे मिलने वाली नदी के मध्य मे से होकर गुजरती हैं। लेकिन पेपर पर बनाई गयी योजना और धरातल के यथार्थ मे उतरी योजना के बीच जमीन आसमान का अंतर होने के कारण सारा प्लान फ़ेल होते दिखा। दरअसल हुआ यूं कि जब हमने कर्नाटक के मेंगलुरु के पास स्थित समुद्र तटीय गाँव को गूगल मैप मे डाला तो वह एक गाँव से दूसरे गाँव तक जाने के लिए बार-बार हमे राष्ट्रीय राजमार्ग 66 पर भेज देता, इसलिए जो योजना हमने समुद्र तटीय यात्रा के लिए बनाई थी वह धरातल पर धरी की धरी रह गयी।

लेकिन मै भी कहाँ हिम्मत हारने वाला था। मेंगलुरु से कुछ किमी नेशनल हाइवे पर चलने के बाद मैंने कार को रोक कर एक ग्रामीण से पश्चिमी दिशा मे जा रही एक संकरी सड़क के बारे मे पूंछा कि यहाँ से समुद्र तट कितनी दूर हैं? उसने बताया समुद्र तट यहाँ से लगभग 1 किमी॰ ही दूर हैं। मैंने बिना कुछ सोचे विचारे, कार को पश्चिमी दिशा मे समुद्र तट की ओर मोड़ दिया। सड़क पतली जरूर थी लेकिन ठीक ठाक थी और विपरीत दिशा से आ रहे ऑटो, कार और छोटे वाहन आसानी से क्रॉस हो रहे थे। मेरे उल्लास, उमंग और उत्साह की  सीमा उस समय न रही जब मैंने कुछ मिनटों की कार ड्राइव के बाद सामने हिलोरें मारती समुद्र की ऊंची ऊंची लहरों को सामने पाया। कुछ समय तक तो मै कार को एक तरफ खड़ा कर, समुद्र को निहारता रहा। मैं गर्जना करती समुद्र की लहरों की दहाड़, लहरों के गरजन और अठखेलियों के शोर मे कहीं गहरे तक डूब गया। कुछ समय बाद वहाँ नजदीक ही बैठे कुछ ग्रामीण लोगों से जब मैंने पूंछा कि समुद्र के किनारे जाने वाली ये संकरी सड़क कहाँ तक जाती हैं? लोग सज्जन और सरल थे, भाषा की कोई समस्या नहीं थी। उन ग्रामीणों ने प्रीतिप्रश्न करते हुए पूंछा कि आपको जाना कहाँ है? मैंने अपने मन्तव्य व्यक्त करते हुए कहा कि मेरी प्राथमिकता समुद्र तटीय सड़क मार्ग से होकर उडुपी तक यात्रा करना हैं, जिसमे दूरी, समय या खर्च कोई बाधा नहीं। हमारा उद्देश्य मात्र समुद्र के किनारे जा रही तटीय यात्रा को उपयोग करते हुए आनंद उठाना है। अपने उद्देश्य को स्पष्ट करने पर उन ग्रामीणों ने बतलाया कि ये सड़क उडुपी तक जाएगी लेकिन इसकी स्थिति ऐसे ही संकरी, पतली रहेगी, सड़क कभी गाँव के अंदर और अधिकतर समुद्र तट के समानान्तर जाएगी। बीच बीच मे कहीं कहीं, थोड़ी टूटी या खराब हो सकती है। ट्रेफिक शांत, बहुत ज्यादा वाहनों की आवाजाही नहीं मिलेगी। आप आराम से मालपे ब्रिज होकर मुख्य भूमि से उडुपी तक जा सकते हैं।               

अब क्या था स्थानीय नागरिकों की सलाह शिरोधार्य कर, मै आगे बड़ा। कुछ दूर चला ही था कि एक शानदार नज़ारा मेरे सामने था। कमल के फूल पर पद्मासन लगाये, ध्यान मुद्रा मे विराजित भगवान बुद्ध की एक सुंदर प्रतिमा समुद्र तट पर बनी थी। पीछे कुछ दूरी पर, ऊंची ऊंची समुद्र की लहरें  हिलोरें लेते हुए मन को सुकून और शांति प्रदान कर रहीं थी। प्रतिमा के सामने ही सड़क के पार एक शानदार रिज़ॉर्ट बना हुआ था, जो शायद किसी धनाढ्य व्यक्ति का प्रतीत हो रहा था। समुद्र तट भी साफ सुथरा था। काफी देर तक हम समुद्र तट पर चहल कदमी करते रहे। इच्छा तो थी कि एक दिन का प्रवास इस रिज़ॉर्ट मे कर लिया जाय पर एक तो,  इस आशय का कोई सूचना पटल नहीं दिखलाई दिया और आगे की यात्रा का कार्यक्रम भी पूर्व निश्चित होने के कारण ऐसा करना संभव नहीं था। कुछ आगे आधुनिक वास्तु का एक अनोखा मॉडल देखने को मिला। किसी कलाकार ने एक घड़े को आधा झका हुआ बनाया था शायद वो संदेश दे रहा था कि ईश्वर द्वारा प्रदत्त समुद्र से मिलने वाले प्राकृतिक धन-सम्पदा रत्न और उपहार निरंतर मानव जाति को प्राप्त होते रहे। रास्ते मे दुपहिया वाहन के साथ, एकाध कार भी नज़र आयी, लेकिन कर्नाटक राज्य परिवहन निगम की एक बस को देखकर प्रसन्नता हुई कि समुद्रतटीय ग्रामीण इलाकों मे भी राज्य सरकार, आम नागरिकों को सार्वजनिक वाहन सुविधा उपलब्ध करा अपने सामाजिक दायित्वों का निर्वहन बखूबी कर रही है।

आगे बच्चों के लिये बने पार्क मे लगे झूलों और फिसल पट्टी को देख अच्छा लगा कि गाँव के बच्चे भी सुबह शाम शायद इस मनोरंजक सुविधाओं का उपयोग करते हों, जगह जगह छोटी-मोटी किराने, गोली विसकुट, कोल्ड ड्रिंक की दुकाने तो थी, पर हरे नारियल पानी, पीने की मेरी! चाहत पूरी न हो सकी। शायद इसका कारण पर्यटकों का समुद्र तटीय सड़कों  से आना-जाना, रहा हो। शायद अधिकतर पर्यटक समुद्र तट से 1-1.5 किमी॰ दूर, समांतर चल रहे सर्वसुविधा सम्पन्न राष्ट्रीय राज मार्ग क्रमांक 66 पर चलना ज्यादा पसंद करते हों।

आगे सड़क समुद्र तट से मुड़कर ग्रामीण इलाके की ओर मुड़ गयी, लेकिन मैंने कार का चलाना  सड़क की पश्चिम दिशा मे,  समुद्र तट की ओर ही रक्खा। आगे, सड़क किनारे एक सुंदर आकर्षक रंगों से रंगे मंदिर को देख मै अनायास रुक कर मंदिर को देखने लगा! हम पति पत्नी मंदिर की साज-सज्जा को निहारने लगे। छोटे से गाँव मे किसी  परदेशी प्रवासी को देख एक ग्रामीण महिला भी स्वागत भाव से, हमारे पास आयी।  कुछ ही देर मे एक नौजवान भी पास आ गया। औपचारिक अभिवादन के बाद बातचीत का सिलसिला शुरू हो गया। लड़के ने अपना नाम गुरु प्रसाद  सालियान और महिला ने अपना नाम सम्मभवी बतलाया। उन्होने बतलाया हमारे गाँव मट्टू, जिला उडुपी का  ये मंदिर भगवान राम-सीता और हनुमान को समर्पित हैं। दोपहर मे मंदिर बंद रहता हैं। गुरु ने मंदिर खोल कर दर्शन कराने का प्रस्ताव भी किया लेकिन मैंने तय नियमों का पालन करने का आग्रह कर दोबारा उसके गाँव आने का वादा किया। सालियान ने अयोध्या, काशी, प्रयाग दर्शन की अपनी इच्छा को बतलाया। मैंने भी उसे अयोध्या यात्रा के दौरान ग्वालियर प्रवास पर आने का निमंत्रण दिया। लोग अच्छे, मिलनसार, संस्कारित  और सरल थे।

यात्रा का क्रम यूं ही आगे बढ़ रहा था समुद्र तट के बाद एक जगह तो ऐसी स्थिति बनी कि सड़क के एक तरफ उफनता समुद्र और दूसरी ओर शांत भाव से उद्यावरा, जिसे स्वर्णा  नदी भी कहते है, बह रही थी और बीच सड़क पर, मै कार ड्राइव करते हुए अपनी  अविस्मरणीय यात्रा प्रसंगों को, अपने मन रूपी खजाने मे सहेजते हुए आगे बढ़ता चला जा रहा था। स्कूलों, पंचायत और ग्रामीण स्वास्थ्य केन्द्रों से होते हुए अंत  मे हम मालपे ब्रिज पर आ पहुंचे, जो इस समुद्री तट पर बसे ग्रामीण भूमि को मुख्य भूमि, उडुपी से जोड़ता है। पुल पर चारों ओर नदी के इस मुहाने को देख मैंने एक छोटा विडियो भी बनाया जिसके दूसरी सिरे पर मछ्ली मारने वाले छोटे जहाजों की मरम्मत का यार्ड था। अब तक हम मालपे ब्रिज को पार कर उडुपी की ओर बढ़ लिये जो यहाँ से 5-6 किमी दूर था। इस तरह मैने  समुद्र तट के किनारे यात्रा करने की अपनी  इच्छा, आकांक्षा और अभिलाषा को पूरा करते हुई अपनी अविस्मरणीय यात्रा को विराम दिया।

विजय सहगल