सहस्त्र
धारा,
महेश्वर (म॰ प्र॰)
हमारे पुराणों मे ऐसी कथा हैं कि महेश्वर के
पास स्थित सहस्त्र धारा, वही स्थान हैं जहां हैहय वंश के श्रेष्ठ अधिपति
राजा कार्तवीर्य अर्जुन जिन्हे
सहस्त्रबाहु अर्जुन और सहस्त्रार्जुन के नाम
से भी जाना जाता हैं जिनकी राजधानी महिष्मती नर्मदा नदी के तट पर थी,
ने अपनी सहस्त्र बाहुओं से लंकाधिपति राजा
रावण और नागों के राजा कार्कोटक को
परास्त कर बंदी बनाया था। इसलिए ऐसी
किवदंती हैं कि महेश्वर की यात्रा बिना सहस्त्र धारा के दर्शन किए बिना पूरी नहीं
होती। आइये आपको इस सहस्त्रधारा के दर्शन कराते हैं।
दिनांक 21 मार्च 2025 को मेरा अपनी
ग्वालियर-हैदराबाद सड़क यात्रा के बीच महेश्वर एक पढ़ाव था। जब गूगल मैप पर मैंने
मध्य प्रदेश पर्यटन निगम के नर्मदा रिज़ॉर्ट से सहस्त्रधारा का रास्ता ढूंढा तो
थोड़ा भ्रमित था क्योंकि गूगल शस्त्रधारा तक के कुल रास्ते 5.7 किमी रास्ते का कुछ रास्ता
लगभग 0.4 किमी पैदल बता रहा था। जब घाट के समीप तक कार से पहुंचे तो दूर दूर तक नर्मदा
नदी कहीं दिखाई नहीं दी। वहाँ स्थित चाय नाश्ते के दूकानदारों ने बतलाया कि नर्मदा
नदी की हजारों धाराओं अर्थात सहस्त्रधाराओं के दर्शन के लिए आगे 350 मीटर की यात्रा
पैदल करनी होगी। मध्यप्रदेश के खरगौन जिले
मे स्थित महेश्वर से लगभग छह किमी दूर सहस्त्र धारा नर्मदा नदी के तट से 350 मीटर
पैदल, पथरीली रास्ते से होकर जाता हैं। जिसमे 3-4
फुट ऊंची नीची चट्टानों से होकर जाना होता हैं जिसके बीच मे कहीं कहीं नर्मदा नदी
की छोटी छोटी धाराओं को भी लांघना पड़ता हैं। धाराएँ 1-2 फुट से लेकर 10-12 फीट से अंततः नदी के बीच मे सैकड़ों फुट लंबी
विकराल धारा मे परिवर्तित हो जाती हैं,
जिसमे गिर रहे पानी की गर्जना दूर से ही सुनाई देती है और पहाड़ों से गिरने वाली
पानी की हजारों धारायें को पास से देखना जितना सुंदर और अद्भुद है वहीं मध्य मे
स्थित मुख्य धारा का गर्जन के साथ नीचे गिरते पानी के रौद्र रूप का दर्शन कराता हैं। 100-150
मीटर चौड़ी नर्मदा नदी की दूध की तरह सफ़ेद हजारों धाराएँ इस स्थल से निकलती हैं। जिधर
देखें आपको सिर्फ माँ नर्मदा नदी की धाराएँ ही धाराएँ नज़र आती हैं।
शुरू शुरू मे तो मात्र चट्टानों की पत्थरीली
क्षृंखलाओं पर चलकर बड़े उत्साह से आगे बढ़े। कुछ और सहयात्री भी आसपास की चट्टानों पर
चलते हुए आगे बढ़ते नज़र आए पर जैसे जैसे आगे बढ़े नर्मदा की छोटी छोटी धाराओं ने रास्ते
मे अवरोध पैदा कर दिये। धाराएँ कोई बहुत चौड़ी और गहरी नहीं थी पर दो तीन कदम आगे बढ़ने
मे पानी के नीचे लगे पत्थरों पर फिसलन भरी काई ने रास्ता कठिन करना शुरू कर दिया। कदम
सम्हाल सम्हाल कर रखते हुए जैसे तैसे आगे बढ़े। एकाध बार तो सामने बाली चट्टान काफी
नजदीक होने के कारण उछल कर पार कर ली लेकिन ये सिलसिला ज्यादा नहीं चल सका। पानी की
एक बोतल और छोटी तौलिया (गीले पैर पौंछने के
लिए) तो पहले ही से थी,
पर पानी की छोटी छोटी धाराओं की संख्या बढ्ने के कारण बार बार जूते मोजे पहनने उतारने
के क्रम को बंद कर, जूते मोजों को भी हाथ मे लेने पड़ गया। जैसे जैसे मुख्य धारा के
पास पहुँचते गए हिम्मत तो कम होना स्वाभाविक था पर उत्साह मे कोई कमी न थी। अब तक आधे
से अधिक दूरी तय कर हम मुख्य धारा के करीब आ गए थे। बड़े वेग से नर्मदा नदी की धाराएँ
चारों तरफ से नीचे गिरती स्पष्ट नज़र आ रही थी। बड़ा ही सुंदर,
आकर्षक और सुखदायक दृश्य था। बचपन मे कभी राजा भागीरथ द्वारा आसमान से धरती पर गंगा नदी के अवतरण और देवधिदेव भगवान शंकर द्वारा
गंगा के वेग को अपनी जटाओं मे समाहित करते हुए गंगा के वेग को कम करने की कहानी सुनी
थी, आज नर्मदा नदी के बैसे ही रूप के दर्शन हो रहे थे। नर्मदा की हजारों
धाराएँ बड़े वेग से पहाड़ों की गहराई मे ऐसे गिर रही थी मानों शिवजी की जटाओं मे समाकर
नीचे शांत वेग से गुजरात के खंभात की खाड़ी की ओर मे बह रही हो।
यदि सहयात्री के रूप मे कुछ मित्र या साथी आज
होते तो शायद कुछ कदम और नजदीक जाकर नर्मदा मैया की सहस्त्र धाराओं के दर्शन हो जाते।
लेकिन यहाँ इस चेतावनी का भी उल्लेख करना आवश्यक है कि पिछले 10 वर्षों मे सहस्त्रधारा
मे 250 से भी ज्यादा लोगो की मौत इसमे डूबने
से हो चुकी हैं। अब तक हिम्मत जबाब दे चुकी
थी बापसी का रास्ता भी उतना तय करना था जैसा कि आते मे किया था,
पर अब तक ताकत और हिम्मत के साथ उत्साह मे भी कमी आने लगी थी। कुछ फोटो और एक वीडियो
बनाने के बाद बापसी का क्रम शुरू किया। कदम दर कदम बढ़ाते हुए बापसी मे हाथ मे जूते
और पानी की बोतल भी बोझ सा लगने लगा था। उठा-धराई मे छोटी तौलिया कब और कहाँ छूट गयी
या गिर गई, पता ही नहीं चला। नदी के एक छोटी धारा को पार करते समय पानी की बोतल भी हाथ से छिटक कर नर्मदा नदी की एक धारा मे
बहने लगी। बिसलरी या रेल नीर की पानी की बोतल
होती तो कोई बात न होती, पर पानी टपर वेयर
की बोतल मे था इसलिए श्रीमती जी बोतल को बहता देख ब्याकुल होकर उस ओर देखने लगी मानों
उसे पकड़ने का प्रयास मे आगे बढ़ना चाहती हो। मैंने तुरंत ही बोतल को पकड़ने के किसी भी
प्रयास को मना करते हुए बोतल के माया मोह से दूर रहने के लिए आगाह किया। मै जनता था
कि बोतल पकड़ने की इस हड़बड़ी मे कहीं फिसलन भरे पत्थरों पर फिसल कर कोई और अनर्थ न हो
जाय। सौभाग्य से 8-10 कदम बहने के बाद बोतल पत्थरों के बीच मे अटक गयी,
फिर मैंने आहिस्ता आहिस्ता उस टपर-वेयर की बोतल को बापस उठा ही लिया।
तट पर बापस आकर एक कड़क चाय पीना तो लाज़मी था। मेवालाल दंपति
ने बढ़िया चाय और ताज़े केले चिप्स का नमकीन खिला कर हम दोनों को उत्साह और ऊर्जा से
भर दिया। इस तरह सहस्त्र धारा की एक यादगार यात्रा समाप्त कर हम महेश्वर की संध्या
देखने के लिए देवी अहिल्या घाट की ओर बापस हो लिए।
विजय सहगल



























