शनिवार, 29 मार्च 2025

सहस्त्र धारा, महेश्वर (म॰ प्र॰)

 

सहस्त्र धारा, महेश्वर (म॰ प्र॰)













हमारे पुराणों मे ऐसी कथा हैं कि महेश्वर के पास स्थित  सहस्त्र धारा,  वही स्थान हैं जहां हैहय वंश के श्रेष्ठ अधिपति राजा  कार्तवीर्य अर्जुन जिन्हे सहस्त्रबाहु अर्जुन और सहस्त्रार्जुन के नाम  से भी जाना जाता हैं जिनकी राजधानी महिष्मती नर्मदा नदी के तट पर थी, ने अपनी सहस्त्र बाहुओं से लंकाधिपति राजा  रावण और नागों के राजा कार्कोटक  को परास्त कर  बंदी बनाया था। इसलिए ऐसी किवदंती हैं कि महेश्वर की यात्रा बिना सहस्त्र धारा के दर्शन किए बिना पूरी नहीं होती। आइये आपको इस सहस्त्रधारा के दर्शन कराते हैं।     

दिनांक 21 मार्च 2025 को मेरा अपनी ग्वालियर-हैदराबाद सड़क यात्रा के बीच महेश्वर एक पढ़ाव था। जब गूगल मैप पर मैंने मध्य प्रदेश पर्यटन निगम के नर्मदा रिज़ॉर्ट से सहस्त्रधारा का रास्ता ढूंढा तो थोड़ा भ्रमित था क्योंकि गूगल शस्त्रधारा तक के कुल रास्ते 5.7 किमी रास्ते का कुछ रास्ता लगभग 0.4 किमी पैदल बता रहा था। जब घाट के समीप तक कार से पहुंचे तो दूर दूर तक नर्मदा नदी कहीं दिखाई नहीं दी। वहाँ स्थित चाय नाश्ते के दूकानदारों ने बतलाया कि नर्मदा नदी की हजारों धाराओं अर्थात सहस्त्रधाराओं के दर्शन के लिए आगे 350 मीटर की यात्रा पैदल करनी होगी।  मध्यप्रदेश के खरगौन जिले मे स्थित महेश्वर से लगभग छह किमी दूर सहस्त्र धारा नर्मदा नदी के तट से 350 मीटर पैदल, पथरीली रास्ते से होकर जाता हैं। जिसमे 3-4 फुट ऊंची नीची चट्टानों से होकर जाना होता हैं जिसके बीच मे कहीं कहीं नर्मदा नदी की छोटी छोटी धाराओं को भी लांघना पड़ता हैं। धाराएँ 1-2 फुट से लेकर 10-12  फीट से अंततः नदी के बीच मे सैकड़ों फुट लंबी विकराल धारा मे परिवर्तित हो जाती हैं, जिसमे गिर रहे पानी की गर्जना दूर से ही सुनाई देती है और पहाड़ों से गिरने वाली पानी की हजारों धारायें को पास से देखना जितना सुंदर और अद्भुद है वहीं मध्य मे स्थित मुख्य धारा का गर्जन के साथ नीचे गिरते  पानी के रौद्र रूप का दर्शन कराता हैं। 100-150 मीटर चौड़ी नर्मदा नदी की दूध की तरह सफ़ेद हजारों धाराएँ इस स्थल से निकलती हैं। जिधर देखें आपको सिर्फ माँ नर्मदा नदी की धाराएँ ही धाराएँ नज़र आती हैं।

शुरू शुरू मे तो मात्र चट्टानों की पत्थरीली क्षृंखलाओं पर चलकर बड़े उत्साह से आगे बढ़े। कुछ और सहयात्री भी आसपास की चट्टानों पर चलते हुए आगे बढ़ते नज़र आए पर जैसे जैसे आगे बढ़े नर्मदा की छोटी छोटी धाराओं ने रास्ते मे अवरोध पैदा कर दिये। धाराएँ कोई बहुत चौड़ी और गहरी नहीं थी पर दो तीन कदम आगे बढ़ने मे पानी के नीचे लगे पत्थरों पर फिसलन भरी काई ने रास्ता कठिन करना शुरू कर दिया। कदम सम्हाल सम्हाल कर रखते हुए जैसे तैसे आगे बढ़े। एकाध बार तो सामने बाली चट्टान काफी नजदीक होने के कारण उछल कर पार कर ली लेकिन ये सिलसिला ज्यादा नहीं चल सका। पानी की  एक बोतल और छोटी तौलिया (गीले पैर पौंछने के लिए)  तो पहले ही से थी, पर पानी की छोटी छोटी धाराओं की संख्या बढ्ने के कारण बार बार जूते मोजे पहनने उतारने के क्रम को बंद कर,  जूते मोजों को  भी हाथ मे लेने पड़ गया। जैसे जैसे मुख्य धारा के पास पहुँचते गए हिम्मत तो कम होना स्वाभाविक था पर उत्साह मे कोई कमी न थी। अब तक आधे से अधिक दूरी तय कर हम मुख्य धारा के करीब आ गए थे। बड़े वेग से नर्मदा नदी की धाराएँ चारों तरफ से नीचे गिरती स्पष्ट नज़र आ रही थी। बड़ा ही सुंदर, आकर्षक और सुखदायक दृश्य था। बचपन मे कभी राजा भागीरथ द्वारा आसमान से धरती पर  गंगा नदी के अवतरण और देवधिदेव भगवान शंकर द्वारा गंगा के वेग को अपनी जटाओं मे समाहित करते हुए गंगा के वेग को कम करने की कहानी सुनी थी, आज नर्मदा नदी  के बैसे ही रूप के दर्शन हो रहे थे। नर्मदा की हजारों धाराएँ बड़े वेग से पहाड़ों की गहराई मे ऐसे गिर रही थी मानों शिवजी की जटाओं मे समाकर नीचे शांत वेग से गुजरात के खंभात की खाड़ी की ओर मे बह रही हो।

यदि सहयात्री के रूप मे कुछ मित्र या साथी आज होते तो शायद कुछ कदम और नजदीक जाकर नर्मदा मैया की सहस्त्र धाराओं के दर्शन हो जाते। लेकिन यहाँ इस चेतावनी का भी उल्लेख करना आवश्यक है कि पिछले 10 वर्षों मे सहस्त्रधारा मे 250 से भी ज्यादा  लोगो की मौत इसमे डूबने से  हो चुकी हैं। अब तक हिम्मत जबाब दे चुकी थी बापसी का रास्ता भी उतना तय करना था जैसा कि आते मे किया था, पर अब तक ताकत और हिम्मत के साथ उत्साह मे भी कमी आने लगी थी। कुछ फोटो और एक वीडियो बनाने के बाद बापसी का क्रम शुरू किया। कदम दर कदम बढ़ाते हुए बापसी मे हाथ मे जूते और पानी की बोतल भी बोझ सा लगने लगा था। उठा-धराई मे छोटी तौलिया कब और कहाँ छूट गयी या गिर गई, पता ही नहीं चला।  नदी के एक छोटी धारा को  पार करते समय पानी की  बोतल भी हाथ से छिटक कर नर्मदा नदी की एक धारा मे  बहने लगी। बिसलरी या रेल नीर की पानी की बोतल होती तो कोई बात न होती, पर पानी टपर वेयर की बोतल मे था इसलिए श्रीमती जी बोतल को बहता देख ब्याकुल होकर उस ओर देखने लगी मानों उसे पकड़ने का प्रयास मे आगे बढ़ना चाहती हो। मैंने तुरंत ही बोतल को पकड़ने के किसी भी प्रयास को मना करते हुए बोतल के माया मोह से दूर रहने के लिए आगाह किया। मै जनता था कि बोतल पकड़ने की इस हड़बड़ी मे कहीं फिसलन भरे पत्थरों पर फिसल कर कोई और अनर्थ न हो जाय। सौभाग्य से 8-10 कदम बहने के बाद बोतल पत्थरों के बीच मे अटक गयी, फिर मैंने आहिस्ता आहिस्ता उस टपर-वेयर की बोतल को  बापस उठा ही लिया।

तट पर बापस  आकर एक कड़क चाय पीना तो लाज़मी था। मेवालाल दंपति ने बढ़िया चाय और ताज़े केले चिप्स का नमकीन खिला कर हम दोनों को उत्साह और ऊर्जा से भर दिया। इस तरह सहस्त्र धारा की एक यादगार यात्रा समाप्त कर हम महेश्वर की संध्या देखने के लिए देवी अहिल्या घाट की ओर बापस हो लिए।                

विजय सहगल

रविवार, 23 मार्च 2025

हुक्के की गुढ़ गुढ

 

"हुक्के  की गुढ़ गुढ"








11 जनवरी 2025 को अपने गुड़गाँव प्रवास के दौरान प्रातः भ्रमण मे मेरा ध्यान सड़क किनारे लगे एक बोर्ड ने खींचा जिस पर लिखा था हरियाणा देशी तंबाकू हुक्का भंडार। यूं तो हुक्के से परिचय पुराना था हुक्के पर मुहावरे पहले सुन रक्खे थे, पर  हुक्के के क्रय  बिक्रय के साथ उसकी रिपइरिंग, शादी विवाह, पार्टी मे हुक्कों की व्यवस्था करने  आदि का विज्ञापन पहली वार  देख जिज्ञासा वश दुकानदार के पास बातचीत के सिलसिले मे मिला। दुकान मालिक शिवनारायन जो जनवरी की सर्दी से बचाव करते हुए एक तस्सल मे आग जलाने का जतन कर रहे थे। अभिवादन की औपचारिकता करने पर, कहीं उन्हे मेरे ग्राहक होने का भ्रम न हो तो पहले ही हमने अपना घुममकड़ी परिचय देते हुए हुक्का के बारे मे अधिक जानकारी चाहने  का मंतव्य बता दिया ताकि सबेरे सबेरे बोहनी खराब का इल्जाम  न लग जाय। खैर...... । शिवनारायन से बातों का सिलसिला शुरू हुआ तब तक उन्होने तस्सल आग जला कर सर्दी से बचाव का इंतजाम कर लिया था। एक बड़े हुक्के के बारे मे बताते हुए उन्होने बतलाया कि हरियाणा मे हुक्का गाँव देहात की चौपालों, बैठकों, और पंचायतों का एक आवश्यक हिस्सा हैं। सामाजिक धार्मिक और राजनैतिक चर्चाओं मे भी हरियाणा सहित उत्तर प्रदेश के मेरठ, मुजफ्फर नगर नोएडा आदि क्षेत्रों मे भी आपसी,  सामाजिक भाईचारे को बढ़ाने मे सक्रिय भूमिका निभाता हैं। यध्यपि हुक्का पीना भी सिगरेट, तंबाकू की तरह धूम्र पान स्वास्थय के लिये हानिकारक है लेकिन सदियों से प्रचलन मे हुक्का, जाति, धर्म से परे हरियाणा मे आपसी सौहद्र बढ़ाने मे अहम भूमिका निभा रहा हैं।  

लकड़ी या धातु के एक सीधे पाइप के सिरे पर माटी से बनी चिलम लगी होती है जिसमे हुक्के की तंबाकू को भरा जाता हैं जबकि पाइप का निचला सिरा धातु से बने बर्तन मे भरे पानी मे डूबा रहता हैं। उपर की चिलम मे भरी तंबाकू पानी से भरे पात्र मे पाइप के माध्यम से कहीं नीचे न गिरे इसको रोकने के लिये एक मिट्टी की गोली डाल कर उसे रोका जाता है। भारत, तुर्की, अरब, फारस और चीन मे हुई हुक्के की के उत्पत्ति के इस यंत्र ने वेशक धूम मचाई हो पर हरियाणा के गाँव-गाँव  मे इसका चलन इस बात का सबूत है कि ग्रामीण सांस्कृति मे हुक्का ने समरसता बढ़ाने मे बड़ा  महत्वपूर्ण योगदान है। शादी विवाह समारोह मे तो विशेष रूप से हुक्कों की सप्लाइ शिवनारयन द्वारा की जाती  हैं। एक हुक्का 4-5 से लेकर 12-15 लोगों के लिये पर्याप्त रहता हैं। उम्र के हिसाब से समूह बन जाते हैं और 5-6 हुक्के भी शादी विवाह पार्टी आदि मे समूह के अनुसार लगाए जाते हैं। दुकान का एक कर्मचारी हर हुक्के मे तंबाकू, आग, पानी, चिलम भरने आदि की सेवायें दे कर हुक्का पार्टी को  निरंतर सुचारु रूप से चलाने मे सहायक की भूमिका निभाता है।

अब बारी थी 15-20 लीटर के तीन कंटेनर जिसमे तंबाकू रक्खी थी। तंबाकू की तीव्रता के हिसाब से उन्हे तीन भागों मे विभक्त किया गया था। हल्की और मीठी तंबाकू  जिसमे नशे की मात्रा न के बराबर होती है, तीव्रता के अनुसार मध्यम और तेज़ तंबाकू को उनकी तीक्षणता के हिसाब से विभक्त किया जाता हैं।  कीमत का निर्धारण भी हल्की तंबाकू सस्ती और क्रमश: मध्यम और तीक्षण की कीमत होती है। तीनों तरह की तंबाकू मे गन्ने के शीरा को मिलाकर हल्का, नमी युक्त कर दिया जाता है जिससे तंबाकू मे एक विशेष प्रकार का स्वाद और सुगंध पैदा होती हैं। इस खुशबू की तुलना सिगरेट या बीड़ी से निकलने वाले धुआँ से कर सकते  है। तंबाकू से निकलने वाली इस गंध को मैंने सूंघा जो बहुत प्रिय तो नहीं थी। अब बारी थी उस गन्ने के रस को देखने, गंध को सूंघने और स्वाद लेने की जिसे इस तंबाकू मे मिलाया जाता हैं। एक प्लास्टिक के कंटेनर मे सुर्ख काले रंग का द्रव्य भरा था जो देखने मे कुछ कार या स्कूटर के इंजिन के जले हुए तेल या पिघले हुए कोलतार  की तरह था। शिवनारायन ने बतलाया कि ये उत्पाद गन्ने के रस को गर्म कर  गुड बनाते समय उसके उपर उतराने वाले मैल को एकत्रित कर बनाया जाता है। जिसकी गंध तीक्ष्ण और अप्रिय सी लगती हैं। इस रस का स्वाद अति मीठा सड़े हुए फलों की तरह था जिसे स्वादिष्ट तो कदापि नहीं कहा जा सकता।

अब आते हैं हुक्का तैयार करने की विधि पर। तैयार तंबाकू को चिलम मे भर कर उसके उपर लगभग 3 इंच व्यास की गर्म अवतल लेंस के आकार की मिट्टी से बनी डिस्क को रक्खा जाता हैं और उसके उपर थोड़े थोड़े लकड़ी के जलते कोयले के टुकड़े डाल दिये जाते हैं। गर्म कोयले के टुकड़े मिट्टी की डिस्क को लगातार गर्म किए रहते हैं और ये डिस्क धीरे धीरे तंबाकू को जलाती रहती हैं। जैसे ही नीचे लगे पीतल के लोटे नुमा पात्र जिसमे पानी भरा रहता हैं और इस पात्र दे निकले दो पाइप जिसमे एक सीधा पाइप का, एक सिरा जिसमे चिलम लगी होती है और दूसरा जो पीतल के पाइप से जुड़ा होकर पानी मे डूबा रहता है। दूसरा पाइप जो पानी के बाहर होता है उसके दूसरे सिरे पर एक पीतल की खोखली नोब को मुट्ठी मे बांध कर हुक्का पीने वाला मुंह से अंदर की तरफ सांस खींचता है, जिससे गुढ़-गुढ़ जैसी आवाज आती है।   अंदर की तरफ सांस खींचने से हवा जलते कोयले और तंबाकू से  से होकर पाइप से पानी के नीचे से बुलबुले के रूप मे दूसरे पाइप से होती हुई हुक्का पीने वाले के मुंह मे धुआँ के रूप मे प्रवेश करती हैं। इसी धुएँ का स्वाद मुँह मे अनुभव कर हुक्का पीने वाला बापस धुआँ को मुँह से निकाल कर हुक्के के एक चक्र को पूरा करता हैं। यही क्रम एक के बाद दूसरे हुक्का प्रेमी द्वारा दोहराया जाकर, हुक्के के दूसरे सिरे को क्रमशः चारों तरफ बैठे हुक्का प्रेमियों द्वारा दोहराया जाता है। अब बिना हुक्का गुढ़-गूढ़ाए उसका स्वाद बतलाने के पूर्व आवश्यक था हम भी एक-दो कॅश खींच हुक्का गुढ़-गूढ़ाते। फिर क्या था हमने मे हुककि को अपनी मुट्ठी मे पकड़ सांस अंदर को खींची। चिलम से होते हुए तंबाकू का धुआँ मुँह और नाक मे आ गया। हुक्का प्रेमियों से माफी मांगते हुए लिखना चाहते हैं कि उस धुएँ का स्वाद बहुत ही बेढ़व कसैला और वेस्वाद था।  पहले हुक्के के पानी वाले पात्र मे लगे पाइप को दूसरे हुक्का पीने वाले की तरफ बढ़ाने के लिये पूरे हुक्के को घूमना पड़ता था कालांतर मे आवश्यकता आविष्कार की जननी की नीति के तहत एक लंबा  लचीला लेजम की तरह का पाइप लगाने का चलन शुरू हुआ जिसके लिये हुक्के को बगैर खिसकाये मात्र लचीले पाइपे को आसानी से दूसरे की तरफ बढ़ाना आसान हो गया। आधुनिक हुक्के मे पीतल के पात्र के नीचे एक चक्री नुमा बालबेयरिंग की प्लेट लगा दी गयी जिसकी सहायता से हुक्के को किसी भी दिशा मे मोड़ना आसान हो गया। हुक्के मे लगातार शोध और अनुसंधान के एक नये रूप के भी दर्शन गुरुग्राम के  रामपुरा गाँव मे देखने को मिले। सुरेश नमक व्यक्ति के दुकान पर पंचमुखी हुक्का देखने को मिला जिसमे एक ही हुक्के मे पाँच चिलम लगी हुई थे और जो कलात्मकता से  लकड़ी पर उकेरे गये ज्योमिति के चित्रों सुसज्जित था।

हरियाणा मे बुजुर्ग महिलाओं मे भी हुक्के पीने का चलन देखने को कहीं कहीं मिल जाता है। इन बुजुर्ग महिलाओं द्वारा प्रयुक्त इस हुक्के को हुक्की कहा जाता है। हुक्का रूपी धूम्रपान को पीने वाले इस धूम्रपान को स्वास्थय के लिये हानिकारक नहीं मानते क्योंकि इस का धुआँ पानी से होकर मुँह मे आता हैं जबकि सिगरेट, बीड़ी या अन्य तंबाकू के उपत्पाद का धुआँ सीधे मुँह मे जाता हैं जो आगे कैंसर का कारण बनती हैं।  

हैल्थ की दृष्टि से कुछ भी हो जो एक शोध का विषय हो सकता हैं लेकिन  इस बात मे कोई शक नहीं कि हुक्का का कॅश लगाते समय पानी से निकलने वाली गुढ़-गुढ़ की आवाज के हरियाणा वासी दीवाने हैं। शायद हुक्के के महत्व को देखते हुए ही हमारे साहित्यिक भाषा मे हुक्का के उपर मुहावरे भी बने हैं जैसे हुक्का भरना (चापलूसी करना), हुक्का पानी बंद करना (समाज से बहिष्कृत करना), हुक्का गुढ-गुढाना (समय व्यर्थ गँवाना)। हुक्का पीने का चलन हरियाणा सहित पश्चिमी उत्तर प्रदेश मे आपसी भाईचारे, भ्रातृत्व और बंधुत्व को बढ़ावा देकर समाज मे  समरसता, सामंजस्य और मेलजोड़ को बढ़ावा देता है जिसमे कोई शंका संदेह और संशय नहीं है।                

विजय सहगल

शनिवार, 15 मार्च 2025

पटिया वाले बाबा-करह धाम-मुरैना मध्य प्रदेश

 

"पटिया वाले बाबा-करह धाम-मुरैना मध्य प्रदेश"

 












मध्य प्रदेश के मुरैना जिला जहां एक ओर दुर्दांत दस्यु अर्थात डाकूँओं के लिए कुख्यात रहा हैं वही दूसरी ओर  पुरातन काल से ही यहाँ  बड़े सिद्ध महात्मा और साधु हुए है जिनकी यह जिला  तपस्थली रही हैं। जहां एक ओर पोरसा मे नागाजी महाराज, करह या पटिया वाले धाम, बाबा चेतनदास, सिद्धा रामदास महाराज, बाबा देवपुरी, घिरौना धाम, बाबा बालक दास आदि सिद्ध पुरूष और तपस्वी हुए हैं वहीं दूसरी ओर  ग्राम एंति मे ऐतिहासिक शनिचरी मंदिर, बटेश्वर की  मंदिर श्रंखला, गढ़ी पढ़वाली, चौसठ योगिनी मंदिर मितावली और ककनमठ का प्राचीन शिव मंदिर जो पुरातात्विक महत्व के स्थल भी  हैं, अपनी वास्तु और कलात्मकता के लिये जाने जाते है। इन सिद्ध महात्माओं  और इन पवित्र स्थानों का न केवल इस क्षेत्र अपितु दूर दूर के लोगो के बीच  यहाँ के प्रति लोगों  की  गहरी आस्था और विश्वास है अपितु अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति हेतु इन के कर्मक्षेत्रों मे विशेष श्रद्धा  और मान्यता  हैं। यही कारण हैं कि इन धार्मिक स्थलों पर हर रोज हजारों लोग अपनी हाजिरी लगाते हैं। ऐसे ही एक महत्वपूर्ण स्थल जो  आगरा मुंबई राष्ट्रीय राजमार्ग क्रमांक 44 पर ग्वालियर से मुरैना की ओर 40 किमी पर  जाने पर बनमोर से कुछ आगे बाएँ ओर एक रास्ता करह धाम के लिए जाता है। इस करह धाम को बाबा पटिया वाले के नाम से भी लोग पुकारते हैं, शांक नदी के किनारे यह एक पवित्र और पावन स्थान हैं। यूं तो आगरा मुंबई राष्ट्रीय राजमार्ग से सैकड़ों वार आना जाना हुआ पर जिसके दर्शन का सुखद संयोग का सौभाग्य मुझे 10 जनवरी 2025 को अपने परम मित्र अश्वनि मिश्रा के साथ  प्राप्त हुआ।   

ऐसा कहा जाता है कि धनेला गाँव के पास स्थित  करह धाम की स्थापना बाबा चेतनदास की तपस्थली के रूप मे शुरू हुई, इसी तप साधना को उनके शिष्य बाबा  रामदास ने आगे बढ़ाया। बाबा चेतनदास जी ने रामदास बाबा को सिद्ध रामदास के नाम से अलंकृत किया। आज भी बाबा सिद्ध रामदास द्वारा रोपित बरगद का पेड़ उनकी पवित्र  स्मृति को उनके अनुयायि याद करते हैं। ऐसा कहा जाता हैं कि इस वियवान जंगल मे बाबा के पास जंगली पशु शेर, भालू आदि आश्रम मे चले आते थे। यहाँ आने वाले उनके शिष्यों  को इस स्थान पर भोजन प्रसादी के दूध के रूप वितरित किया जाता था इस हेतु सदैव कढ़ाह मे  अग्नि से प्रज्वलित रहा करती थी। यही कढाह बाद मे कड़ाह और कालांतर मे करह नाम से विख्यात हुआ। पुरातन करह को आज भी आश्रम मे सँजो कर रक्खा गया हैं। मेरा अनुमान हैं कि इस करह अर्थात कढाह की क्षमता लगभग तीन हजार लीटर दूध  से भी अधिक  होगी। ऐसे अनेकों करह आश्रम के भंडरगृह मे जहां तहां देखने को मिल जाएंगे।   

करह नामक स्थान को  पवित्र धाम मे बनाने मे  पटिया वाले बाबा राम रतन दास महाराज की महत्वपूर्ण भूमिका रही। बचपन से ही भगवान राम के प्रति अनुराग और भक्ति के कारण करह मे भगवान राम जानकी मंदिर के सामने पड़ी पटिया पर वर्षों  तपस्या करने के कारण वे पटिया वाले बाबा के नाम से प्रसिद्ध हुए।         

मुख्य सड़क के बाएँ तरफ एक बड़ा, भव्य और विशाल  द्वार नज़र आता है जो कराह धाम के पवित्र स्थान का प्रवेश द्वार हैं। कुछ दूरी पर जाते ही सुंदर पीले रंग से पुते एक अन्य प्रवेश द्वार के आते ही अंदर चारों तरफ के भवनों का रंग इसी रंग मे ही रंगा दिखाई दिया। पीले रंग से अधिकतर भवनों के पुते होने पर इस छोटे से कस्बे की भव्यता और सुंदरता और भी आकर्षक और प्रभावशाली नज़र आई। बड़ी पक्के विशाल आँगन मे चारों ओर अलग अलग भवन नज़र आए। एक तरफ धर्मशाला का निर्माण यहाँ आने वाले दर्शनार्थियों के लिए बनाई गयी थी। सामने ही गऊ शाला दिखाई दी। मंदिर के रास्ते मे दोनों तरफ प्रसादी और अन्य पूजन सामाग्री की दुकाने थी साथ ही बच्चों के खिलौने, और अन्य सामान की दुकाने भी थी। पुनः एक ऊंचे बड़े चबूतरे पर एक वटवृक्ष दिखलाई दिया जो कराह धाम के बाबा सिद्ध राम दास जी  महाराज द्वारा रोपित था। दूसरी ओर राम धुन गा रही महिलाओं की बैठक थी। विदित हो कि यह राम धुन भजन पिछले 50 वर्षों से भी अधिक निरंतर अखंड जाप की तरह किया जा रहा है। सिद्ध रामदास जी  महाराज की गद्दी और चरणपादुकायेँ रक्खी हुई थी। सामने ही एक कुआँ बना हुआ था ऐसी मान्यता है कि इस कुएं के जल मे स्नान करने और जल पीने से से कुत्ते काटने के दुष्प्रभाव समाप्त हो जाते हैं। एक महिला अपने साथ इस पवित्र जल को ले कर अपने साथ ले जा रही थी उसने बताया जो लोग कराह धाम आने मे असमर्थ हैं उन तक जल पहुंचाने और पिलाने से भी कुत्ते के काटे का दुष्प्रभाव समाप्त हो जाता हैं। कुएं के चारो तरफ चार हैंड पंप से कुएं का पानी निकाला जा सकता हैं।  पास ही पवनसुत हनुमान के ग्यारह रूपों की एक विशाल प्रतिमा भी महाराज जी द्वारा बनवाई गयी है जो अपने आप मे अकेली और अनोखी है। जगह जगह श्री राम संकीर्तन मंत्र "सीता राम, राधे श्याम" लिखा हुआ था। कराह धाम का सम्पूर्ण वातावरण राम-कृष्ण मय था। मंदिर की एक दीवार की ऊंचाई पर एक डाक विभाग का लाल पोस्ट बॉक्स देख कर आश्चर्य हुआ कि शायद डाक विभाग ने भी चिट्ठी पत्रियों की प्रासंगिकता की समाप्ति को स्वीकार कर लिया है तभी पोस्ट बॉक्स को इतनी ऊंचाई पर लगाया हैं कि साधारण जन तो डिब्बे मे चिट्ठियाँ डाल ही नहीं सकते या पत्रों को डालने के लिए सीढ़ियों की सहायता लेनी होगी। यहाँ के क्षेत्रवासी नए वाहनों की खरीदी पर सबसे पहले करह धाम लाकर वाहनों को संकट से बचाने के लिए यहाँ पूजा करने आते हैं। ऐसे ही एक नवयुवक लवकुश अपने नए ट्रैक्टर के साथ डबरा से पूजा करने महाराज जी के पास आया था।

मंदिर के प्रवेश द्वार के नजदीक ही करह धाम का एक परिक्रमा पथ भी बना है जो पेड़ो और फुलवारियों से आच्छादित है।  पथ मे विभिन्न प्रकार के पक्षियों के साथ बहुतायत मे मोरें भी दिखाई देती है। ऐसा कहा जाता है इन मोरों के कारण ही इस क्षेत्र का नाम मुरैना पड़ा है। पथ मे पटिया वाले बाबा की बैठक, शयन कक्ष, यज्ञ शाला  इत्यादि हैं। रास्ते मे जगह जगह आने वाले श्रद्धालुओं द्वारा  पत्थरों को एक के उपर एक रक्ख कर घरों की आकृति बनाई गयी थी । ऐसी मान्यता है कि जो भक्तगण घर बनाने की अभिलाषा से यहाँ घरों की आकृति बना कर जाते हैं पटिया वाले बाबा उस भगत की मनों कामना पूर्ण करते हैं।  करह धाम मे महाराज की समाधि वाले कमरे मे बहुत से पाँच, सरपंच, परिषद के स्वतंत्र प्रत्याशियों के पोस्टर भी देखने को मिले जो शायद बाबा जी के आशीर्वाद प्राप्त करने हेतु लगाए गए थे।     

अब मै  आपको करह धाम के भंडारगृह के बारे मे अवगत कराना चाहूंग जो कि अति विलक्षण और आश्चर्यचकित करने वाला हैं। भंडार गृह मे घुसते ही बीच पक्के रास्ते के दोनों ओर एक बड़ी कंक्रीट की छत्त के नीचे, लगभग 8-10 फीट वृत्ताकार के 4-4 बड़े बड़े समतल करह, को पक्के सीमेंटेड चूल्हों पर फिक्स कर लगाया गया था। ये विशेष समतल लोहे के कढाहे मालपूए बनाने के लिये उपयोग मे लाये जाते हैं। कराह धाम पर हर वर्ष माघ महीने की पूर्णिमा से फागुन माह की नौमी तक सिया पिय मिलन समारोह मनाया जाता है। इस अवसर पर यहाँ विशाल भंडारे का आयोजन किया जाता हैं और भंडारे मे सिर्फ खीर और मालपूए का प्रसाद वितरण किया जाता हैं,  जिसमे लाखों लोग दूर दूर से शामिल होने के लिए आते हैं, तब की छंटा देखते ही बनती है। खीर बनाने के लिये मालपूए की तरह ही विशाल लेकिन गहरे कढाहे आश्रम के पिछवाड़े बने हुए हैं। इन 7-8  कढ़ाहों मे भी हजारों लीटर दूध मे चावलों को पकाया जाता हैं। फिर बनी हुई खीर को कढाहों के पीछे टाइल्स की हौदियों मे एकत्रित कर आगे भंडारे मे वितरण के लिये भेजा जाता है और उन खाली कढ़ाहों मे फिर से खीर बनाने का सिलसिला नौमी तक निरंतर चलता रहता हैं।           

खीर और मालपूओं को बना कर भंडरगृह मे एकत्रित किया जाता हैं और इस मेले मे निरंतर चल रहे भंडारे मे प्रसादी वितरित की जाती हैं। ऐसे मान्यता हैं कि माघ और फागुन के इस मेले मे यहाँ से निकलने वाली हर बसों मे बैठे यात्री भंडारा ग्रहण करने के पश्चात ही अपना आगे का सफर पूरा करते हैं।

जय बोलो पटिया वाले महराज की जय!!!!

विजय सहगल 

शनिवार, 8 मार्च 2025

यूक्रेन और अमेरिका, एक आलोकप्रिय-असफल वार्ता

 

"यूक्रेन और अमेरिका, एक  आलोकप्रिय-असफल वार्ता"




अमेरिका के वाशिंगटन स्थित व्हाइट हाउस के ओवल ऑफिस मे  शुक्रवार 28 फरवरी  2025 की  देर रात अमेरिका के  राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप, उपराष्ट्रपति  जे॰डी॰ वेंस और यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमिर जेलेंस्की के बीच तीखी नोकझोंक और बहस हुई। दुनियाँ के अनेकों मीडिया कर्मी, पत्रकारों की उपस्थिति मे  दो संप्रभु राष्ट्रों के बीच ऐसी अप्रिय और असफल वार्तालाप, दुनियाँ ने  शायद ही कभी देखी या सुनी हो। डॉनल्ड ट्रंप और वोलोदिमिर जेलेंस्की के बीच हुई इस कूटनीतिक वार्तालाप के दौरान तीखी नोकझोंक, बहस मुसाहिबा और निंदा परनिंदा को, सीधे टीवी प्रसारण के माध्यम से देख, दुनियाँ  को सकते मे डाल दिया। यूक्रेन और रूस के बीच पिछले तीन सालों से चले आ रहे इस युद्ध ने विश्व के अनेक देशों की भूराजनैतिक और आर्थिक स्थिति को बुरी तरह प्रभावित किया है। 

24 फरवरी 2022 को शुरू हुए इस युद्ध मे यूक्रेन के हजारों लोग मारे गये और लाखों लोग विस्थापित होकर शरणार्थियों के रूप मे जीवन यापन कर रहे हैं। इस युद्ध ने यूक्रेन जैसे एक विकसित राष्ट्र को पूरी तरह खंडहर मे तब्दील कर आर्थिक रूप से भी बर्बाद कर दिया। यूक्रेनी राष्ट्रपति वोलोदिमिर जेलेंस्की का अपने  देश की रक्षा की खातिर यूरोप और अमेरिका के NATO संगठन ( उत्तरी अटलांटिक संधि संगठन )  प्रति झुकाव ने रूस और यूक्रेन के बीच शत्रुता के बीज  2014 मे ही वो दिये थे जब यूक्रेन ने इस संगठन मे शामिल होने के प्रयास शुरू कर दिये थे।  रूस ने भी ठीक उसी तरह अपने देश की सुरक्षा की चिंता करते हुए यूक्रेन के नाटो संगठन मे जाने के प्रयास का कडा विरोध किया। दोनों देशों के तर्क अपनी अपनी जगह ठीक हो सकते हैं।  नाटो संगठन अमेरिका, फ्रांस, जर्मनी, कनाडा और ब्रिटेन सहित 32 देशों का एक समूह है जिसकी सुरक्षा नीति के तहत इन सदस्य देशों पर किसी भी दुश्मन देश द्वारा यदि आक्रमण किया जाएगा तो ये आक्रमण उन 32 देशो पर आक्रमण माना जाएगा और 32 सदस्यों वाले  नाटो देशों की सेनाएँ संयुक्त रूप से उस दुश्मन का मुक़ाबला करेंगी। यूक्रेन द्वारा नाटों संगठन की सदस्यता मिलती तो उसे स्वाभाविक रूप से, रूस जैसे शक्तिशाली देश से यूक्रेन की रक्षा के लिये न केवल 32 देशों की सेनाओं का साथ और समर्थन मिलेता  अपितु युद्ध मे आवश्यक उपयोग के आधुनिक हथियार और साजो सामान भी मिल जाता। वही रूस के राष्ट्रपति ब्ल्दिमीर पुतिन  की  ये चिंता भी जायज़  थी, कि यदि यूक्रेन नाटो देशों मे शामिल हो गया तो अमेरिका सहित नाटो देश की सेनाओं की पहुँच रूस की सीमाओं तो हो जायेगी जो कालांतर मे रूस की सुरक्षा के  लिये एक बहुत बड़ा खतरा और चिंता का कारण हो सकता था। जो यूक्रेन कभी रूस का ही हिस्सा था पर इन्ही पूर्वाग्रहों को लेकर यूक्रेन और रूस मे मतभेद इतने गहरा गये कि दोनों के बीच 2014 और 2022 मे युद्ध लड़ने की नौबत आ पहुंची। 2014 मे अमेरिका सहित अन्य देशों के हस्तक्षेप से रूस और यूक्रेन के बीच हुए शांति समझौते के तहत दोनों देशों मे युद्ध विराम समझता हुआ था साथ ही दोनों देशों के युद्ध वंदियों को छोड़ने का भी एक सम्झौता हुआ था लेकिन 2022 मे रूस ने इस समझौते को एक बार पुनः तोड़ कर यूक्रेन पर हमला कर दिया।

2022 से चल रहे इस युद्ध मे यूरोपियन देशों सहित अमेरिका की तत्कालीन बाइडेन सरकार ने यूक्रेन को नाटो संगठन  का सदस्य तो नहीं बनाया लेकिन यूक्रेन को अपना नैतिक समर्थन देते हुए भरपूर सैनिक हथियारों और युद्धक साजो सामान की भरपूर सहायता दी। इन्ही आधुनिक हथियारों, तोपों, टेंकों और अन्य साजो सामान की बदौलत ही रूस जिस युद्ध को तीन  दिनों मे जीत कर यूक्रेन को परास्त करने के सपने देख रहा था उसको तीन वर्षों मे भी नहीं कर पाया। लेकिन जनवरी 2025 मे अमेरिका मे सत्ता परिवर्तन के बाद राष्ट्रपति  डॉनल्ड ट्रंप के सत्ताशीन होते ही सारे समीकरण बदल गये। प्रायः देशों मे सत्ता परिवर्तन के साथ उन देशों की अन्य देशों के साथ विदेश नीतियों मे परिवर्तन देखने को नहीं मिलते लेकिन डॉनल्ड ट्रंप ने "अमेरिका प्रथम" नीति के तहत यूक्रेन मे चल रहे युद्ध मे अमेरिका के संसाधनों को लगाने पर न केवल अपने हाथ खींच लिये अपितु पिछली बाइडन सरकार द्वारा दी गई 350 बिलियन डॉलर की सहायता को उनकी (बाइडन की) मूर्खता निरूपित  कर यूक्रेन से इस सहायता के बदले मे  उसके देश मे मिलने वाले पाँच सौ बिलियन डॉलर की कीमत के दुर्लभ और मूल्यवान  खनिज जैसे  ग्रेफाइट, लिथियम, टाइटेनियम और यूरेनियम जैसे खनिजों पर अमेरिकी  अधिकार के समझौते का दबाव बनाया लेकिन इस समझौते मे यूक्रेन की रूस से  सुरक्षा और रूस द्वारा हड़प की गयी यूक्रेन की भूमि की बापसी की कोई गारंटी सुनिश्चित नहीं की गयी। हद तो तब हो गयी जब रूस यूक्रेन युद्ध के तीसरे साल मे प्रवेश पर 25 फरवरी 2025 को संयुक्त राष्ट्र में लाये गए प्रस्ताव जिसमे रूस की सेनाओं की  यूक्रेन से बापसी की मांग पर, अमेरिका ने अब तक की नीतियों के उलट, रूस के पक्ष मे मतदान किया।  इसी दवाब के अंतर्गत यूक्रेनी राष्ट्रपति वोलोदिमिर जेलेंस्की को अमेरिका राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने समझौते के तहत व्हाइट हाउस मे पिछले शुक्रबार को आमंत्रित किया था। यूक्रेन द्वारा अमेरिका को कीमती खनिज देने के समझौते से एक बात तो  स्पष्ट है कि यदि यूक्रेन को ये समझौता करने के लिये अभी या बाद मे मजबूर होना  पड़ा, तो इससे तो बेहतर था यूक्रेन रूस से ही सम्झौता कर युद्ध न करता तो कम से कम उसके देश की ऐसी दुर्दशा और बर्बादी  तो न होती और इस युद्ध मे उसे बलि का बकरा तो न बनना पड़ता? बदले हुए हालातों मे यूक्रेन की हालत पर यह भारतीय कहावत सटीक बैठती है कि धोबी का कुत्ता घर का न घाट का......। 

अमेरिका से मिनरल समझौते के लिये आए यूक्रेनी राष्ट्रपति वोलोदिमिर जेलेंस्की से वार्ता के दौरान  अमेरिका के राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने जिस अपमान जनक  भाषा और  भाव भंगिमा का प्रदर्शन किया वह दुनियाँ के देशों के लिये एक चेतावनी है कि शक्तिशाली राष्ट्र किस तरह छोटे और कमजोर राष्ट्रों को पहले सहायता के नाम से प्रलोभन देकर अपने जाल मे फँसाते है और अपनी स्वार्थसिद्धि के बाद किस तरह उनका आर्थिक  भयादोहन और शोषण करते हैं? अमेरिका द्वारा यूक्रेन के साथ ज़ोर जबर्दस्ती से खनिज समझौते के लिये दबाव बनाना इस बात का जीता जगता, स्याह उदाहरण है।

यूक्रेन के राष्ट्रपति जेलेंस्की और अमरीकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप वार्ता की वार्ता के दौरान जब यूएस उपराष्ट्रपति जेड़ी वेंस ने बात शुरू करते हुए जेलेंस्की से कहा शांति और प्रगति का रास्ता कूटनीति को जोड़ता है और प्रेसिडेंट ट्रंप यही काम कर रहे हैं। जेलेंस्की ने उनकी बात काटते हुए कहा कि तीन साल पहले रूस ने हम पर हमला कर हमारे भू क्षेत्र को छीना तब किसी ने पुतिन को नहीं रोका? तब आपकी कूटनीति कहाँ थी? आप किस कूटनीति की बात कर रहे श्रीमान जेडी वेन्स? आपका क्या अभिप्राय है? विदित हो कि फरवरी 2022 मे युद्ध विराम के बावजूद रूस ने यूक्रेन पर आक्रमण कर युद्ध शुरू किया था। उपराष्ट्रपति जेडी वेन्स अपने राष्ट्रपति की स्तुति करते हुए कहते है कि मै उस कूटनीति की बात कर रहा हूँ जो आपके देश को विनाश से बचायेगी। आप हमारी बेइज्जती कर रहे है!! अमेरिका मीडिया के सामने हमे दोषी बता रहे है। युद्ध को समाप्त करने के लिये ट्रंप ने पुतिन से बातचीत का रास्ता खोला और तत्काल युद्धविराम की कोशिश की। आपको तो युद्ध लड़ने मे अनेक तरह की मुश्किले आ रही हैं। जेलेंस्की ने प्रत्युत्तर देते हुए कहा कि, युद्ध के समय हर किसी को मुश्किले आती हैं। क्योंकि आप ने कभी युद्ध लड़ा नहीं जब कभी आप युद्ध लड़ेंगे तो आप को महसूस होगा। इतना कहने की देर थी कि ट्रंप को जलेन्स्की की ये बात चुभ गयी और ट्रंप ने ऊंची आवाज मे कहा। हमें ये मत बताइये कि हम क्या महसूस कर रहे हैं। आप उस स्थिति मे नहीं हैं कि हमे ये बात बताये। आपके पास कोई रास्ता नहीं। आप करोड़ो लोगों की ज़िंदगियों से खेल रहे हैं। जेलेंस्की के जबाव ने आग मे घी का काम किया जब  उन्होने  ये कहा कि वे प्रारम्भ से ही अपनी जंग अकेले ही लड़ रहे थे, और इस पर उन्हे  गर्व है। ट्रंप ने क्रोधावेश मे कहा आप अकेले नहीं थे। आप कभी अकेले नहीं थे। हमने आपको एक मूर्ख राष्ट्रपति (बाइडन) के माध्यम से 350 बिलियन डॉलर के युद्धक साजो समान दिये। यूक्रेनी सैनिक बहादुर हैं लेकिन यदि आपके पास हमारे (अमेरिका के ) हथियार न होते तो यह लड़ाई दो हफ्तों  मे खत्म हो जाती। अब तो ट्रंप ने जेलेंस्की को चेताते हुए एक क्लास टीचर की तरह डाँटते हुए कहा कि उनका देश (यूक्रेन) एक बड़े संकट से गुजर रहा है, वे इस युद्ध को नहीं जीत सकते, हमारी बजह से आपके पास इस संकट से निकलने का एक मौका है, इस तरह से बिज़नस नहीं हो सकता। आपको अपना नज़रिया बदलना पड़ेगा। आगे ट्रंप ने जेलेंस्की  को कहा कि आपके पास अब कोई रास्ता नहीं, आप लाखों लोगो की ज़िंदगी से खेल रहे हैं, आप तीसरे विश्व युद्ध का जुआँ खेल रहे हैं, आप के पास सैनिक नहीं हैं यदि आप  युद्ध विराम के लिये मान जाते हैं तो गोलियां बरसनी बंद हो जाती और आपके लोग न मरते। आप जो कर रहे है वह इस देश के लिये अपमानजनक है। आप बिल्कुल  भी आभार प्रकट नहीं कर रहे हैं। जेलेंस्की  ने प्रतिवाद करते हुए अपनी बात पुनः रक्खी की वह अपने देश की सुरक्षा के लिये पक्का आश्वासन चाहते है। और इस तरह दोनों राष्ट्र प्रमुखों की वार्ता टूट कर असफल हो गयी। अमेरिका मे इन बदली हुई राजनैतिक परिस्थितियों मे यूक्रेन के हालात पर किसी शायर की ये पंक्तियाँ खूब याद आती  है- न खुदा ही मिला ना विशाले ए सनम, न इधर के रहे न उधर के रहे।

अब  वार्ता पटरी से उतर गयी थी, फिर तो प्रेसिडेंट डॉनल्ड ट्रंप ने जिन कड़े और सख्त शब्दों का उपयोग किया वो कूटनीति की दुनियाँ मे लंबे समय तक अप्रिय घटना के रूप मे याद किये जायेंगे, वहीं कनाडा और समस्त यूरोपियन देश यूक्रेन के पक्ष मे खड़े हैं जो इस बात को इंगित कर रहा हैं कि आने वाला समय मे  अमेरिका के बदले हुए रुख से न केवल यूक्रेन के लिये अपितु नाटो संगठन की अपनी एकता और संगठन की मजबूती पर भी संकट के बादल  खड़े हो सकते हैं।

विजय सहगल