रविवार, 27 अक्टूबर 2024

भारत-चीन, वास्तविक नियंत्रण रेखा समझौता

 

"भारत-चीन, वास्तविक नियंत्रण रेखा समझौता"



15-16 जून 2020 की रात पूर्वी लद्दाख की गलवान घाटी मे भारत और चीन के बीच हुई हिंसक झड़प को हर भारतीय अभी भी नहीं भूला है जब इस खूनी संघर्ष मे हमारे देश के 20 बहादुर सैनिकों ने अपने प्राणों की  आहुति दे भारत माता के मस्तकाभिमान को झुकने नहीं दिया। भारत और चीन के बीच ये अब तक की सबसे हिंसक झड़प थी। इस संघर्ष मे कर्नल संतोष बाबू सहित 20 वीर सैनिक शामिल थे जिनहोने अपने देश के लिये अपने प्राणों का सर्वोच्च बलिदान दे  देश की रक्षा की। सारे देश ने अपने इन बीर सपूतों के इस बलिदान को नम आँखों से याद किया था। इस संघर्ष मे चीन के भी अनेक सैनिक मारे गये थे लेकिन उन चीनी सैनिकों का दुर्भाग्य देखिये कि अपने देश के लिये बलिदान के बावजूद उनके देश और परिवार के लोग   अपने सपूतों के बलिदान को याद भी न कर सके क्योंकि चीनी सरकार ने चीनी सैनिकों की संख्या को छिपाया और मात्र चार सैनिकों की मौत को स्वीकार  किया।  हालांकि आस्ट्रेलियाई समाचार पत्र "द क्लैक्सन" के अनुसार इस संघर्ष मे चीन के कम से कम 42 सैनिक मारे गये थे, तभी से भारत और चीन के बीच ये सीमा गतिरोध कायम हो गया था।

भारत के विदेश सचिव विक्रम मिस्त्री ने बताया कि इस गतिरोध को दूर करने हेतु दोनों देशों के  सैनिक और राजनयिक स्तर की  अनेक दौरों की वार्ताएं हुई और अंततः 21 अक्टूबर  2024 को रूस के कजान शहर मे  ब्रिस्क देशों की बैठक के दौरान एक बड़ी खबर सामने आई कि भारत और चीन के बीच पूर्वी लद्दाख मे, वास्तविक सीमा रेखा पर चल रहे गतिरोध का समाधान निकलता दिखाई दे रहा है। इस समझौते के हो जाने पर भारत और चीन की सेनाएँ जून 2020 की स्थिति के अनुसार सीमा  पर गश्त लगाएगी जैसा कि पहले से होता आ रहा  था। सूत्रों के अनुसार पूर्वी लद्दाख क देपसांग और डेमचॉक क्षेत्र मे जहां दोनों देशों की सेनाओं ने  गश्ती का रास्ता रोका हुआ था, अब  पुनः एक दूसरे के सेनाएँ 2020 की स्थिति के अनुसार गश्त कर सकेंगी। गलवान घाटी मे दोनों देशों की झड़प के बाद देपसांग और डेमचॉक क्षेत्र के कुछ क्षेत्रों मे चीनी सेनाओं ने गश्ती मार्ग को रोक दिया था इसके जवाब मे भारतीय सेनाओं ने भी अन्य दूसरे क्षेत्रों के गश्ती मार्ग मे अबरोध खड़े कर चीनी और भारतीय सेनाएँ एक दूसरे के सामने खड़ी हुई थी। ऐसा पहली बार हुआ था जब भारतीय सेनाओं ने चीनी सेनाओं को ललकारते हुए पहली बार टक्कर देते हुए उनके  सामने खड़ी थीं। कुछ क्षेत्र ऐसे भी थे जहां अबरोधों के चलते दोनों देशों की सेनाएँ गश्त नहीं कर सकती थी। पेङ्गोंक एरिया, गलवान और गोगरा और हॉट स्प्रिंग क्षेत्र के इस बफर जोन मे भी अब पेट्रोलिङ्ग शुरू होने की संभावना है जैसा की 2020 के पूर्व की स्थिति मे था। भारत और चीन के बीच हो रहे इस समझौते पर ये तो निश्चित है कि यदि सही और सकारात्मक सोच के साथ और समुचित तरीके से प्रयास किए जाये तो बड़े से बड़ा  विवाद को बातचीत से सुलझाया जा सकता है।  

भारत और चीन के बीच होने वाले इस समझौते से राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर तमाम प्रतिक्रियाएँ आना स्वाभाविक थी। देश के अंदर विपक्ष द्वारा आये दिन चीन के सीमा विवाद पर मनगढ़ंत आरोप प्रत्यारोप लगा कर देश को भ्रमित करने के इरादों पर अब  पानी फिर जाएगा। वहीं दूसरी  ओर अमेरिका के वैश्विक वर्चस्व पर काफी नकारात्मक प्रभाव पड़ने वाला है, क्योंकि एक ओर जहां अमेरिका ने जिस तरह यूक्रेन को रूस के साथ हुए  युद्ध मे बीच मझधार मे छोड़ दिया  और  वर्बादी के कगार पर पहुंचा दिया वहीं इज़राइल के  फिलिस्तीन, ईरान और लेबनान के साथ हुए युद्ध मे भी कोई महत्वपूर्ण भूमिका नहीं निभा सका। अमेरिका की  विश्व राजनैतिक  पटल पर इन आरोपों के चलते उसकी विश्वसनीयता मे भी भारी कमी आयी वही दूसरी ओर रूस ने चीन के साथ भारत के सीमा विवाद के समाधान मे अपरोक्ष रूप से महत्वपूर्ण भूमिका निभा कर एक सच्चे मित्र का परिचय दिया। रूस ने अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर यूक्रेन के साथ युद्ध मे अपनी अपनी छवि मे हुए ह्रास को भारत और चीन के बीच होने वाले इस सीमा समझौते मे अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाने  के कारण अपनी प्रासंगिकता को विश्व मे पुनः  एक बार स्थापित कर दिया।  

मंगलवार दिनांक 22 अक्टूबर 2024 को चीन के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता लिन जियांग ने भी सुनिश्चित किया कि दोनों देश एक समाधान पर पहुँच गये है।  कूटनैतिक स्तर पर उच्च विदेशी अधिकारियों के निर्देश पर लगातार चली इन वार्ताओं से दोनों देशों की सीमा क्षेत्र के मामलों के लिये परामर्श और समन्वय के लिये बनी कार्यकारी समिति  (डबल्यूएमसीसी) की अनेक बैठके हुई। कोशिशें सैनिक स्तर पर ही नहीं राजनयिक स्तर पर भी चल रही थी। चीनी पक्ष का कहना था कि भारत चीन के बीच पूर्ण सीमा समझौते   के पूर्व  उन द्विपक्षीय मुद्दों पर समहमति और सम्झौते पर आगे बढ़ना चाहिये जिन पर सहमति हो चुकि है, लेकिन भारत का स्पष्ट मत था जब तक वास्तविक सीमा रेखा पर 2020 के पहले कि स्थिति कायम नहीं हो जाती तब तक दोनों देशों के सम्बन्ध सामान्य नहीं हो सकते। इस स्पष्टोक्ति  ने भी चीन को इस समझौते पर आने को मजबूर किया। इन अनेक स्तरीय वार्ताओं के दौर की मीटिंग के पश्चात ब्रिस्क देशों की मीटिंग मे रूस के  कजान शहर  मे शामिल होने आ रहे चीन और भारत देश के प्रमुखों के बीच  इस संधि पर हस्ताक्षर होने की संभावनायेँ  बनी। इसके बावजूद सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र दुवेदी ने इस समझौते पर अपनी प्रितिक्रिया देते हुए सही कहा कि चीन के समझौते के बावजूद भारत सतर्क है। यहाँ यह कहना अतिसन्योक्ति न होगी कि भारत सरकार ने बड़ी चतुराई से, धैर्य और कूटनैतिक रणनीति के तहत बिना किसी युद्ध, धमकी और वैश्विक दबाव के, चीनी सरकार को समझौते के लिये मजबूर कर दिया और ये सिद्ध कर दिया कि ये 21वी शताब्दी का बदला हुआ भारत है जिसको ताकत के बल पर झुकाया नहीं जा सकता।

विजय सहगल

       

      

शनिवार, 19 अक्टूबर 2024

छार दुआरी के हनुमान

"छार दुआरी के हनुमान"












अपने घर झाँसी से ओरछा तो प्रायः आना जाना होता रहता हैं। मेरा मानना हैं कि ओरछा (जिला निवाड़ी, मध्य प्रदेश) सबसे सुंदर, सबसे छोटा, सरल  और सबसे सस्ता धार्मिक पर्यटन स्थल हैं जहां पर आप ऐतिहासिक किला, छतरियाँ, और पवित्र राम राजा सरकार का मंदिर के साथ बेतवा नदी के सुंदर प्राकृतिक मनोहारी घाट को देख सकते है और सावधानी बर्तते हुए स्नान भी कर सकते  हैं। चूंकि ओरछा, झाँसी से इतना नजदीक है तो कभी ठहरने और रहने का सौभाग्य तो नहीं मिला पर खानपान और प्रवास भी अन्य शहरों के मुक़ाबले सस्ता है। मैंने अपने ब्लॉग दिनांक 6 जुलाई 2019 मे इस विश्व प्रिसिद्ध धरोहर का उल्लेख किया था (https://sahgalvk.blogspot.com/2019/07/orcha.html) दिनांक 13 अक्टूबर 2024 को ओरछा दर्शनों के पश्चात ओरछा मंदिर से 5-6 किमी दूर स्थित पवित्र पुरातन मंदिर छारदुआरी हनुमान मंदिर के दर्शन का सौभाग्य प्राप्त हुआ। ऐसी मान्यता हैं कि राम दूत श्री हनुमान, राम राजा मंदिर धाम की सुरक्षा करते हैं। राम राजा मंदिर के पीछे स्थित पक्के  मार्ग से इस स्थान तक पहुंचा जा सकता है। जैसे ही ओरछा ग्राम का परिकोटा समाप्त होता हैं एक एकल मार्गीय है जो छोटे से जंगल से होकर गुजरता हैं। रास्ता पक्का हैं जो ओरछा ग्राम से होकर गुजरने वाले मार्ग से छारदुआरी पहुंचाता है। एक छोटे ग्रामीण परिवेश और रहन सहन के दर्शन आप इस दौरान  कर सकते हैं।  शनिवार और मंगलवार को यहाँ काफी संख्या मे झाँसी, दतिया, निवाड़ी से लोग छारदुआरी हनुमान मंदिर के दर्शनार्थ आते हैं।

ऐसी किवदंती है कि बुंदेले राजा वीर हरदौल के भाई पहाड़ सिंह जू देव ने गायों की रक्षा हेतु अपने मंत्रियों और सभा सदों की एक बैठक मे गायों की रक्षा हेतु एक संकल्प  इस स्थल पर लिया था। मंत्रियों की सलाह पर रामदूत हनुमान के जय घोष और स्मरण करते हुए उन्होने गायों की रक्षा करते हुए विजय श्री हांसिल की। इस घटना के बाद महल मे रक्खी भगवान हनुमान की प्रतिमा को उसी स्थल पर प्राण प्रतिष्ठा की गयी जहां पर गायों की रक्षा का संकल्प लिया गया था। ऐसा कहा जाता है कि प्रतिमा की स्थापना के समय मंदिर की दीवार द्वार तक तो बिना किसी अवरोध के बन गयी, पर द्वार के उपर जब दीवार का निर्माण दिन मे किया गया वो रात मे छार-छार होकर गिर गयी। कुछ दिनों तक यही सिलसिला चलता रहा। दिन मे दीवार बनाई जाती और रात मे दीवार छार-छार (छोटे छोटे टुकड़े टुकड़े) होकर स्वतः गिर जाती। एक दिन सेनापति ने जब स्वयं जाग कर, रहस्य जानने की कोशिश की पर उन्हे कोई नहीं मिला। इस रहस्यमय घटना की जानकारी होने पर राजा ने स्वयं उपस्थित होकर क्षमा प्रार्थना कर पूजा पाठ कराया। इसलिए ही इस मंदिर का नाम छार दुआरि के हनुमान नाम पड़ा। पुजारी श्री अवधेश पांडे ने बताया कि 9 फुट ऊंची दक्षिणाभिमुख हनुमान प्रतिमा इस क्षेत्र की एक मात्र प्रतिमा है जिसमे श्री हनुमान के शांत रूप के दर्शन होते हैं।

प्रशासन और श्रद्धालुओ द्वारा मंदिर प्रांगण मे निर्माण कार्य कराया हैं इस कारण श्रद्धालु सहजता से मंदिर परिसर मे आकार भगवान राम दूत हनुमान को अपने श्र्द्धा सुमन अर्पित कर अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति हेतु  नमन और वंदन करते हैं।

मंदिर से लगभग 50 मीटर दूर एक प्राचीन बावड़ी है जिसका निर्माण 17वी शती ई॰ मे हुआ था। राज्य पुरातत्व विभाग के अनुसार उक्त प्राचीन बावड़ी जिसकी लंबाई 35 मीटर एवं चौड़ाई 17 मीटर हैं। चार मंज़िला बावड़ी मे विशाल जल राशि का संग्रहण आज भी देखा जा सकता हैं। वरसाती जल एवं भूमि गत जल के संग्रहण का प्राचीन अद्भुद नमूना यहाँ जीवंत देखा जा सकता हैं। चूना और गारे से निर्मित दुमंजिला इमारत मे लोहे के प्रवेश द्वार करते हैं एक छोटा सा बराण्डा है। दालान मे प्रवेश करते ही बावड़ी का एक शानदार दृश्य दिखलाई पड़ता है। 9-10 सीढ़ियाँ उतरते ही एक खुला आयताकार आँगन और उनके तीनों तरफ बनी दल्लान एक सुंदर नज़ारा प्रस्तुत करती हैं जो प्राचीन वास्तु का एक नायाब नमूना है। आँगन के बीचों बीच बनी सीढ़ियाँ बावड़ी की ओर नीचे की तरफ ले जाती है जिसमे उपर तक पानी भरा है। यह पूरी बावड़ी पाँच मंज़िला है, तीन मंजिल उपर एवं शेष दो मंजिल जल मे डूबी हुई है।  

मुख्य दरवाजे के एकदम सामने आँगन मे बनी छोटे दरवाजों से निर्मित दालान मे जैसे ही प्रवेश करते हैं दो-ढाई फुट ऊंची  कलात्मक पत्थरों की चहर दीवारों से निर्मित अष्टाकर कुएँ की आकृति इस बावड़ी की सुंदरता मे चार चाँद लगा देता है। दल्लान और अष्टाकार आकृति के बीच बने पाट पर खड़े होकर सारे दृश्य को देखना एक अद्भुद अनुभव था। ऐसा बताया गया कि आसपास के खेतों मे सिंचाई का प्रबंध भी इस बावड़ी से होता है। आबादी न के बराबर है। कुछ  सब्जी, चाय और मंदिर के प्रसाद, फल, फूल की दुकानों के अलावा अन्य आबादी शाम के बाद अपने अपने घरों मे बापस चली जाती है।  लेकिन चारों ओर का दृश्य शांत और सुकून देने वाला है।

मंदिर से निकले फल, फूल जैसे अपशिष्ट के निस्तारण के पूर्व उन्हे एक गड्ढे मे एकत्रित कर निस्तारण हेतु रखने को देख अच्छा लगा। पूरे मंदिर परिसर मे साफ सफाई देख प्रसन्नता हुई। बुंदेलखंड क्षेत्र मे जंगली फल कचरी का उपयोग सर्वविदित है। इस फल को शादी-विवाह या अन्य धार्मिक उत्सवों मे परोसा जाता है। इस फल को काटकर, सूखा कर तेल मे तल कर खाने-खिलाने  का चलन हैं।  कचरी को चार भाग मे काट कर, सूखा कर स्थानीय लोगो द्वारा विक्रय किया जा रहा था। श्रीमती जी ने बगैर एक पल गवाएं उस महिला की पूरी कचरियाँ खरीद ली जो वह बिक्री के लिए लायी थी।

इस तरह एक सुखद और शांत धार्मिक स्थल छार-दुआरी के हनुमान के परिवार के साथ दर्शन एक यादगार यात्रा थी। बोलो, रामदूत हनुमान की जय!! पवनसुत हनुमान की जय!!

विजय सहगल           


शनिवार, 12 अक्टूबर 2024

पहिया

 

"पहिया"





पहिया मानव और मानवता के विकास की पहली सीढ़ी थी, जिसे पचपन मे हमने समाज शास्त्र मे किसी कक्षा मे पढ़ा था, लेकिन इसके पहले ही पहिये ने हमारी ज़िंदगी मे प्रवेश कर लिया था। मुझे अच्छी तरह याद हैं झाँसी मे हमारे मुहल्ले के हमउम्र हर  लड़कों के पास एक पहिया था जिसे एक डंडे की सहायता पहिये को आगे की ओर धकेलते हुए हम अपने मुहल्ले और उसके आसपास की गली-कूँचों मे चलाया करते थे। आज से साठ-सत्तर के दशक के पूर्व मध्यम परिवार मे जन्मे हर उस बच्चे के बचपन मे सामना अवश्य ही पहिये से पड़ा होगा। आज की पीढ़ी को तो शायद पहिया चालन का ज्ञान ही न हो, पर हमारी पीढ़ी या साठ सत्तर के दशक के आसपास  जन्मे बच्चों के अनेक खेलों मे  एक प्रिय शगल या शौक पहिया चलाना भी था। बचपन के उन दिनों, पहिया चलाने से मिलने वाले आत्मिक सुख को शब्दों मे ब्यान नहीं कर सकते। हमारे मुहल्ले के हर घर मे बच्चों के माता-पिता इस पहिया चालन को बड़ी ही हिकारत की दृष्टि से देख इस शौक को गली के आवारा और गंदे बच्चों का खेल बता हमेशा डांटते और फटकारते थे। उनके पास इस बात के  समुचित कारण भी थे क्योंकि शुरू शुरू मे पहिये का संतुलन बनाने और नियंत्रित करने की कला नहीं आयी थी इसलिए कभी कभी पहिया, सड़क किनारे बनी मल-मूत्र की गंदी नालियों मे घुस कर गंदा हो जाता था, और उसको  बगैर एक सेकंड गवाए तुरंत ही अपने  हाथों से निकाल कर, चलाने के लिए तैयार कर लेते थे। साफ सफाई का,  आज के बच्चों की तरह, हैंड वॉश या साबुन से हाथ धोने  के चोचले उन दिनों दूर दूर तक नहीं थे। सड़कों पर डंडे की सहायता से पहिये को घुमाते हुए न जाने किस धुन मे घर से दूर निकल जाते थे। पहिये को चलाने मे लागने वाली  एकाग्रता और उसके घूमने मे लगने वाला  ध्यानाकर्षण से, कब न्यूटन के गति के नियम से बंध दूरी, समय, गति और वेग को बगैर जाने समझे पहिये को चलाने मे निपुणता हांसिल कर ली थी। जैसे नवजात पक्षी अपने पंखों की सहायता से खुले आकाश मे उड़ान भरते थे कुछ ऐसे ही पंख, पहिये ने हमारे बचपन को लगा दिये थे जिसका अहसास घर से दूर निकल, खुले आकाश मे उड़ने से कम न था। पहिया चलाने की धुन ऐसी कि अंडर बीयर पहने, बगैर जूते चप्पल के घर से दूर  1-2 किमी  निकाल जाते, जब पहिया चलाने का नशा उतरता तो अपने पहनावे का होश आता कि कहीं कोई पहचान वाला देख न ले बरना घर पर शिकायत हुई तो अच्छी तरह से मरम्मत पक्की। उन दिनों शहर ने ऑटो युग मे प्रवेश नहीं किया था, स्कूटर-कार यदा कदा ही देखने को मिलती थी  सिवाय नगर पालिका के  कचरा भरने की ट्रक के सड़कों पर गाडियाँ न के बराबर थी। साइकल का जमाना था गाँव से आने वाली बैल गाडियाँ ट्रांसपोर्ट का मुख्य साधन थी।  अनेकों बार अपनी धुन मे पहिया चलाने के कारण पहिया बैल गाड़ी के बीच से उसके  नीचे चला जाता था और कभी कभी  साइकल चलाने वालों से टक्कर हो जाती। एकाध बार हाथ पैरों मे इस कारण चोट भी लगी, लेकिन हम बच्चों के डांटने की बजाय अड़ौस पड़ौस के बड़े लोग साइकल बालों को भला-बुरा कह, कभी कभी उन की मार पिटाई भी कर देते थे।  

पहियों के बर्गीकरण से उत्साह मे कभी-कभी कमी हो जाती थी। पहली बार पहिये से सामना साइकल के टायर से हुआ जो पड़ौस मे स्थित भगवनदास साइकल वाले के दुकान से बड़ी सहजता से मिल जाता  था। लेकिन जब मुहल्ले के दूसरे अन्य साथियों के पास कार या मिनी ट्रक  के टायर के केंद्र की तरफ से काट कर निकाले गोल मजबूत पहिये को देख कर जो रंज होता।  तब उदासी  और बढ  जाती थी, जब कोई दूसरा साथी साइकल के स्टील रिम को लेकर पहिया चलाने साथ निकलता। उस स्टील रिम वाले पहिये के चलने से निकली सुरीली ध्वनि संगीत की किसी स्वर लहरी से कम न होती। उन दिनों बचपन मे एक ही ख्वाइश थी कि इस साइकल टायर के पहिये से छुटकारा मिले और साइकल के रिम न सही पर मजबूत रबर का पहिया चलाने को  तो मिल ही जाय? 

जब मुहल्ले मे ही जूते निर्माण करने वाली दुकान से  रबर का मजबूत पहिया मिला तो खुशी का ठिकाना न रहा। मुझे उस पहिये का हुलिया आज भी याद है कि किस तरह उस पहिये को बाएँ कंधे पर लटका कर, दायें हाथ मे डंडा लेकर मै कुछ बैसी ही विजयी मुद्रा मे खड़ा था मानों कोई हॉकी का खिलाड़ी किसी मैच मे जीतने के बाद अपनी हॉकि के साथ विजयी मुद्रा मे  खड़ा होता है। पहिया चलाने की खुशी उस दिन दुगनी हो जाती जब साइकल के स्टील रिम का बगैर स्पोक्स का पुराना पहिया चलाने को मिल जाता था। जब डंडे से  स्टील रिम के टकराने से निकली प्रतिध्वनि शरीर मे एक नई स्फूर्ति और नयी ऊर्जा का संचार कर देती थी। उस संगीतमय लय और ताल के सहारे कभी कभी 1-2 किमी की पहिया यात्रा का पता नहीं चल पाता। पता जब चलता जब अहसास होता कि पहिया चलाते चलाते हम घर से कितने दूर निकल आये। कभी कभी तो हमारी मित्र मंडली समूह मे अपने घर से एक मील छह फ़र्लांग दूर स्थित सखी के महावीर मंदिर चले जाते और मंदिर के भोग प्रसाद ग्रहण कर पहिया चलाते हुए ऐसे घर बापस आते मानों हिमालय पर्वत की एवरेस्ट चोटी को फतह कर बापस आ रहे हों। पहिया चालन मे उस लड़के को ही पारंगत और प्रवीण माना जाता था जो धीमी और तेज गति, सड़क की ढलान और चढ़ाई के बावजूद, पहिये के बगैर गिरे, बगैर रुके, निरंतर चला कर अपनी मंजिल पर पहुंच कर ही रुकता था।     

उन दिनों लगभग एक-सवा फुट ब्यास का  एक  ठोस स्टील का छोटा पहिया, जैसा कि आज कल डिस्क ब्रेक स्कूटर और मोटर साइकल मे लगा होता है, जिसमे अनेकों छोटे-छोटे छेद रहते थे,  भी चलन मे था जिसको एक दूसरे मुहल्ले का बच्चा लकड़ी मे लगी एक पतले तार की छड़ी से चलाते हुए निकलता। आज ऐसा प्रतीत होता है कि ऐसा पहिया भारी मशीनरी के बुश के रूप मे स्तेमाल होता था जो घर के पास कबाड़ी की दुकान मे उन दिनों दिखलाई दे जाता था। दूसरे मुहल्ले के बच्चे उस स्टील के पहिये को  सीधे खड़े होकर तार की  छड़ी के छोर से, जो यू की शेप मे मुड़ी रहती पर आगे की ओर दबाव बना कर पहिये के पीछे पीछे दौड़ लगते। लोहे के तार और लोहे के पहिये की रगड़ से उत्पन्न ध्वनि, कुछ ऐसे निकलती थी मानो कोई छुरी-चाकू या कैंची पर धार धरने की मशीन से उत्पन्न होती है। बचपन मे उस पहिये को चलाने की बड़ी ख्वाइश थी जो आज तक भी अधूरी है। बचपन मे पहिये के वर्गीकरण से अपनी बालक बुद्धि उसके आर्थिक स्थिति का अनुमान लगता। सबसे नीचे स्तर पर साइकल के टायर का स्थान था। रबर का मजबूत पहिया दूसरी और साइकल के स्टील रिम का पहिया चलाने वाले बालक को धनाढ्य मानता था। और स्टील के छोटे छेद वाले पहिये को मुड़े तार से चलाने वाला तो अंबानी अदानी की श्रेणी मे आता था। उन दिनों,  मन मे बड़ी इच्छा थी कि काश स्टील के छेद वाले पहिये का स्वामी हो सकूँ और उसको चला सकूँ?       

लिखने मे कहीं कोई अतिसन्योक्ति न होगी कि पहिये के बिना विकास कि कल्पना भी मुमकिन नहीं। आज पहिये के विकास ने इतनी ऊँचाइयाँ हांसिल कर ली है कि मजदूर वर्ग अपनी मांगों को पूरा करने के लिए ऐसे नारे लगता हैं, मांगे पूरी नहीं हुई तो देश का चक्का जाम करेंगे......

विजय सहगल                         

मंगलवार, 8 अक्टूबर 2024

जलेबी फैक्ट्री

 

"जलेबी फैक्ट्री - भारत के आर्थिक विकास का मील का पत्थर?"






1 अक्टूबर 2024 का दिन भारत के  इतिहास मे स्वर्ण अक्षरों से लिखा जायेगा जब भारतीय राष्ट्रीय कॉंग्रेस के युवा हृदय सम्राट राहुल बाबा ने हरियाणा के गोहाना से देश को एक नई राह दिखा कर भारत के औध्योगिक विकास मे जलेबी फैक्ट्री के माध्यम से जलेबी मिठाई को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिला कर, पचास हज़ार से भी ज्यादा  रोजगार प्रदान करने के मार्ग प्रशस्त किया। स्वतन्त्रता के बाद भारत के नीतिनियंताओं, योजना निर्माण कर्ताओं, नौकर शाहों की वही पुरानी, घिसी पिटी सोच से हठ कर एक नए रोजगार मूलक आविष्कार का सृजन को अपनी बहन प्रियंका गांधी के माध्यम से देश को सांझा करते हुए उन्होने कहा कि उन्होने ऐसी जलेबी ज़िंदगी मे पहली बार खायी  और एक डिब्बा प्रियंका के लिए लेकर आने का वादा  किया क्योकि अन्य भारतियों की तरह उसे जलेबी बहुत प्रिय है। उन्होने गोहाना के मातूराम हलवाई के मेहनत और खून पसीने की तारीफ करते हुए उसकी एक सौ कारीगरों की हलवाई की  दुकान को पचास हजार कर्मचारियों की बड़ी जलेबी फैक्ट्री मे परिवर्तित करने के अमूल्य सुझाव दिये जो उनकी वैज्ञानिक, विकासोन्मुख सोच को दर्शाता है। काश! स्वतंत्रता के बाद हमारे राजनेताओं की ऐसी दूरदृष्टि और उन्नत सोच होती, तो हम अमेरिका, चीन से भी आगे निकल, आज विश्व मे  नंबर एक की अर्थव्यवस्था, वर्षों पहले हो चुके होते? वास्तव मे इन प्रतिभासम्पन्न, प्रतिभावान, गुणवान और बुद्धिमान भाई-बहिन की, भारत के विकास के लिये,  कितना सुंदर रोड मैप हैं, कितनी उन्नतशील  नीतियाँ और कितने विकाशील कार्यक्रम हैं, प्रशंसा करे बिना नहीं रहा जा सकता!, एक चाय बेचने और बनाने वाला तो कभी सोच भी नहीं सकता। बैसे विडियो मे जब राहुल गांधी मातूराम की जलेबी को गोहाना से होते हुए पूरे देश और फिर अमेरिका, जापान के बाद दुनियाँ के अन्य देशों मे निर्यात की बात कर रहे तो मंच पर बैठे सांसद, दीपेन्द्र हुड्डा एवं अन्य लोगों की शक्ल देखने लायक थी, राहुल गांधी का जलेबी फैक्ट्री वाला ब्यान, गले की हड्डी की तरह न उगलते बन रहा था न निगलते!!    

राहुल गांधी ने, एक साधारण स्थानीय  जलेबी को देश मे हीं नहीं अपितु अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर जो  ख्याति दिलायी, उसको  देश कभी भूल नहीं सकता।    सैकड़ों सालों से देश मे जलेबी बनाने वाले हलवाई जो नहीं सोच सके, राहुल गांधी जैसे  नौजवान युवा नेता ने मिनटों मे जलेबी फैक्ट्री की सोच को विकसित कर, उसे कार्य रूप मे  परणित कर दिया!! धन्य है ऐसा देश और धन्य है ऐसी  धरा जिसने राहुल गांधी जैसे नौनिहाल को अपने मिट्टी के आगोश मे पाला पोषा  और बड़ा किया!! ऐसा प्रतीत होता हैं कि राहुल गांधी की प्रतिभा, ज्ञान और कौशल को विपक्षी दलों ने कम करके आँका, अन्यथा जलेबी की फैक्ट्री वाली उनकी सोच, उनकी प्रतिभा और ज्ञान के अनुसार तो, "होनहार बिरवान के होत  चीकने पात" वाली कहावत को चरितार्थ कर रहे थे।    

जब गोहना जैसे छोटे से कस्बे मे  मगतू राम जैसे हलवाई की दुकान से जलेबी की फैक्ट्री स्थापित कर पचास हजार लोगो को रोजगार दिया जा सकता है तब  सारे उत्तर भारत मे स्थित हजारों लाखों जलेबी की दुकान से कितने व्यक्तियों को रोजगार दिया जा सकता है, इसकी कल्पना सहज ही की जा सकती है? भारत के औध्योगिक विकास मे जलेबी निर्माण फैक्ट्री  की परिकल्पना एक महान वैज्ञानिक आविष्कार ही था, कहा नहीं जा सकता जलेबी फैक्ट्री खोज, इस वर्ष के आर्थिक विषय मे, नोबल पुरुस्कार के लिये न चुन लिया जाय? 

बहुत से गुणिजनों का कहना हैं और अन्य बहुत से श्रेष्ठी वर्ग का मानना है कि, राहुल जी को भारतीयता और जलेबी के बनाये जाने का  बुनियादी ज्ञान ही नहीं हैं? जलेबी तो हलवाई की दुकान पर गर्म-गर्म खाई जाती हैं, कभी फैक्ट्री मे नहीं बनाई जाती?  फिर उसको देश के कोने कोने या विदेशों मे कैसे निर्यात किया जा सकता हैं? उन माननीयों का कहना तो ठीक हैं पर ये साधारण सोच हैं,  राहुल गांधी  की सोच अत्यंत उच्च और आध्यात्मिक हैं। वे श्रीमद्भगवत गीता के जानकार हैं। तभी तो गीता के अध्याय 12 के श्लोक 18 को उद्धृत करते हुए उनका मानना हैं कि जिस तरह, शत्रु-मित्र, मान-अपमान, सर्दी-गर्मी, सुख-दुःख मे हमे आसक्ति रहित और सम होना चाहिये, उसी तरह जलेबी को गर्म या ठंडा खाने से भी कोई फर्क नहीं पड़ता!!, फिर भले ही ठंडी जलेबी एक दिन, एक हफ्ते या एक माह बाद भी क्यों न खायी जाय?

इसी भाषण मे उन्होने मातूराम हलवाई की फैक्ट्री मे 50 हजार लोगो के रोजगार सृजन के पश्चात मोदी जी पर आरोप लगाया कि मोदी जी उसे लोन नहीं देंगे वे सारा लोन अंबानी और अडानी को देंगे। जैसे महाभारत मे अभिमन्यु को चक्रव्यूह मे फंसाया था बैसे मातूराम को नोटबंदी और जीएसटी के चक्रव्यूह मे फंसाया!! लेकिन लगता है गोहाना का मातूरम हलवाई, राहुल गांधी के जलेबी फैक्ट्री के झांसे मे नहीं फंसा अन्यथा उसकी गोहाना मे जो थोड़ी बहुत चल रही हलबाई की दुकान को जलेबी फैक्ट्री मे बदलने  मे बो हाल हो जाता जैसे, "धोबी का कुत्ता घर का न घाट का" ।       

राहुल गांधी के दिल मे देश के विकास के लिए नित नए नए आइडिया आते रहते हैं।  लोग उनके मसखरे पन  जैसे,  कभी आलू से सोना बनाने की यौजना, कभी राजस्थान की कुम्भ राम लिफ्ट इरीगेशन योजना को, कुंभकरण लिफ्ट इरीगेशन योजना बोलना, आटे को लीटर मे मापना,  कोका कोला कंपनी वाले को एक शिकंजी बेचने वाला बतलाना, मैकडॉनल्डस को ढाबा चलाने वाला, प्रधानमंत्री के बाहर जाने  को, प्रधानमंत्री बार मे जाते है बतलाना, उनकी प्रतिभा, ज्ञान, कौशल और शिक्षा के पराक्रम को दर्शाता है पर साधारण सोच के व्यक्ति को उनकी प्रतिभा, योग्यता को  समझ पाना कठिन ही नहीं असंभव है? बैसे जलेबी फैक्ट्री के बारे मे राहुल गांधी कितने गंभीर थे उनके उस आँख मारने के एक्शन से समझा जा सकता हैं जो  उन्होने संसद मे किया था, कुछ बैसा ही एक्शन उन्होने गोहाना की सभा मे भी, जलेबी की फैक्ट्री को उद्धृत करते हुए भी  किया। बड़ी कठिनाई के बाद उन दोनों फोटो को संलग्न कर रहे है।  लेकिन कॉंग्रेस मे हो रहे  चमत्कार को इस बात के लिये तो नमस्कार करना  ही पड़ेगा कि उसने  दुनियाँ की इस कहावत को झूठा सिद्ध कर दिया कि,  "काठ  की हांडी बार-बार नहीं चढ़ती"।

विजय सहगल      

रविवार, 6 अक्टूबर 2024

हसन नसरल्ला की मौत-हिज्बुल्ला के अंत की शुरुआत?

हसन नसरल्ला की मौत-हिज्बुल्ला के अंत की शुरुआत?

 



जब शुक्रवार दिनांक 27 सितम्बर 2024 को इज़राइली  प्रधानमंत्री बेंजामिन  नेतनयाहू ने संयुक्त राष्ट्र महासभा की बैठक को संबोधित करते हुए, ईरान को सख्त और साफ लहजे मे चेतावनी देते हुए कहा, "अगर तुम हम पर हमला करोगे तो हम भी तुम पर हमला करेंगे, ईरान मे ऐसी कोई भी जगह नहीं हैं जो इज़राइली सेना की पहुँच से दूर हैं और ये बात  समस्त मध्य पूर्व का  भी सच है। मै एक और संदेश दे रहा हूँ कि हम (इज़राइल) निश्चित ही जीत रहे हैं!! यूएनओ के संबोधन के चंद घंटों के बाद ही इज़राइल ने एक सटीक  हवाई हमले मे अपने सबसे बड़े दुश्मनों मे से एक आतंकी संगठन हिज्बुल्लाह के प्रमुख हसन नसरल्लाह को मार गिराया। न्ययार्क से ही अपनी सेना को हिज्बुल्लाह के प्रमुख हसन नसरल्लाह को मारने के, दिये आदेश की भनक अमेरिका के राष्ट्रपति बाइडन को भी नहीं लगी। इस हमले मे नसरल्लाह के  साथ उसके लगभग 100 अन्य साथी कम्मांडर भी इस अप्रत्याशित हमले मे बेमौत मारे गये। 64 वर्षीय लेबनानी नागरिक नसरल्लाह ने फरवरी 1992 से सितम्बर 2024 अर्थात अपनी हत्या तक शिया मुस्लिम राजनैतिक दल और आतंकवादी समूह हिज्बुल्लाह के महासचिव के रूप मे कार्य किया। 1982 मे जब इज़राइल ने लेबनान पर आक्रमण किया था तब ही हिज्बुल्लाह संगठन अस्तित्व मे आया। एक शिया मुस्लिम आतंकी गठन होने के कारण इसके प्रमुख  हसन नसरल्लाह पर अनेकों सुन्नी मुस्लिमों की हत्या के आरोप लगे हैं, यही कारण है कि सुन्नी बाहुल्य प्रमुख देश सऊदी अरब सहित अन्य सुन्नी शासक देशों ने नसरल्ला की मौत पर कोई प्रितिक्रिया नहीं दी।  इस घटना के  दो माह  पूर्व इज़राइल ने हमास आतंकी संगठन के प्रमुख इस्माइल हानिया को भी ठीक इसी तरह, ईरान स्थित उसके सुरक्षित ठिकाने पर एक मिसाइल हमले मे मार गिराया था। ईरान ने हर बार की तरह अपने पोषित आतंकी संगठन के मुखिया की हत्या पर इज़राइल से बदला लेने की कसमें तो  खाई पर कभी सीधे कार्यवाही नहीं की लेकिन इस बार उसने इज़राइल पर सीधा हमला करके मध्य पूर्व के क्षेत्र मे अशांति की शुरुआत तो कर ही दी है। भले ही इस विषय पर लोगों के वैचारिक मत भिन्नता हो सकती है लेकिन एक बात बिल्कुल स्पष्ट हैं कि दुनियाँ मे मात्र इज़राइल ही एक ऐसा देश हैं जिसने अपने दुश्मनों को दुनियाँ के किसी भी कोने से ढूंढ निकाल कर मौत के घाट उतार दिया। इज़राइली सेना का ईरान मे डर और दहशत का माहौल इस तरह हैं कि ईरान के सर्वोच्च नेता आयतुल्ला अली खामेनेई भी हिज्बुल्लाह प्रमुख नसरल्ला के हवाई हमले मे मारे जाने के बाद किसी अज्ञात और सुरक्षित ठिकाने पर चले गये, यूं भी ईरान के आंतरिक हालात इस समय अच्छे नहीं हैं और कभी भी ईरानी जनता मे अशांति और अंसन्तोष की चिनगारी भड़क सकती है।  यूं भी इज़राइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतनयाहू पिछले दिनों ईरानी जनता को सीधे संभोधित करते हुए भड़काने की कोशिश की।  ईरानी सरकार की आलोचना करते हुए उन्होने कहा कि, ईरान को  अपनी जनता की बिल्कुल   भी चिंता नहीं, हम आपके साथ खड़े हैं, ईरान ने  बेवजह युद्ध मे पैसा खर्च कर अपने देश को आर्थिक संकट मे डाल दुनियाँ मे  अराजकता फैला रहा  है।   

मजबूत राजनैतिक इच्छा शक्ति के अभाव मे यमन, फिलिस्तीनी और लेबनान जैसे देश, दो पाटों के बीच घुन की तरह पिस रहे हैं।  इज़राइल मे अशांति फैलाने वाले देश, यमन मे हूति विद्रोहियों, लेबनान मे हिज्बुल्ला नामक दहशत गर्दों और फिलिस्तीन मे हमास जैसे आतंक वादियों को ईरान द्वारा पोषित और पराश्रय देने के कारण इन संगठनों ने अपने ही देश मे एक समानान्तर फौज खड़ी कर ली हैं। इन आतंकवादियों का एक मात्र मकसद इज़राइल के विरुद्ध सशस्त्र, हिंसक  संघर्ष कर उसके अस्तित्व को समाप्त करना हैं। इस हेतु शिया मुस्लिम बाहुल्य  ईरान सरकार, आर्थिक रूप से भरपूर सहायता दे रही हैं। हिज्बुल्लाह, हूति और हमास जैसे आतंकी संगठनों के कारण, कमजोर राजनैतिक इच्छा शक्ति के चलते यमन, लेबनान और फिलिस्तीन  देशों मे अशांति और अराजकता के चलते वहाँ के नागरिकों को आए दिन कठिनाइयों और परेशानियों का सामना करना पड़ता हैं और इज़राइली हमलों के कारण इन देशों के आम जनों को अपनी जान गवानी पड़ती हैं और अनेकों लोगो को अकारण घायल होने का संताप भुगतना पड़ता हैं।

एक बात तो तय है, शिया मुस्लिम बाहुल्य ईरान, इज़राइल से दुश्मनी की आड़ मे अपने हितों को साध रहा हैं और वह इज़राइल से स्वयं युद्ध न कर हिज्बुल्लाह, हमास और हूति जैसे आतंकियों को बलि का बकरा बना रहा है। इज़राइल के विरुद्ध संघर्ष मे न तो ईरान अपनी जमीन और न ही अपनी जनता को सीधे युद्ध मे धकेले बिना लेबनान, फिलिस्तीन और यमन के नौजवानों को शामिल करवा कर  सिर्फ अपने धन और संसाधनों का दुर्पयोग कर, दुनियाँ मे अशांति, अराजकता और उपद्रव करवाना चाहता हैं, इसका ही नतीजा हैं कि आतंकी संगठन हिज्बुल्ला के मुखिया नसरल्ला, हमास के प्रमुख  इस्माइल हानिया जैसे आतंकी और उनके सैकड़ों लड़ाके मारे जा चुके है। इसी क्रम मे इज़राइल का अब अगला लक्ष्य यमन के हूति विद्रोहियों को नेस्तनाबूद करना है और शीघ्र ही वह इस प्रयोजन को प्राप्त करने मे कामयाब भी हो सकता है।  

आज आवश्यकता इस बात की है कि संयुक्त राष्ट्र संघ को ईरान और इज़राइल के बीच इस विकराल होती, युद्ध रूपी समस्या मे तुरंत हस्तक्षेप कर शांति प्रयासों को आगे बढ़ाने का प्रयास  चाहिये और अगले संभावित  विश्वयुद्ध को रोकने के सार्थक प्रयास करने चाहिये  अन्यथा दो भागों मे विभाजित हो रहे विश्व के लिये ये युद्ध, मानवता के विनाश का काला अध्याय साबित न हो।

 विजय सहगल