शुक्रवार, 26 जुलाई 2024

कॉंग्रेस सांसद, चरणजीत चन्नी द्वारा खालिस्तान का समर्थन

 

"कॉंग्रेस सांसदचरणजीत चन्नी  द्वारा खालिस्तान का समर्थन!!"




दिनांक 25 जुलाई 2024 का दिन संसद के इतिहास मे बड़ा दुर्भाग्यपूर्ण दिन था जब प्रथम बार जालंधर से कॉंग्रेस के चुने गये सांसद और पूर्व मुख्यमंत्री  चरणजीत सिंह चन्नी जैसे संवैधानिक पदासीन व्यक्ति द्वारा संसद मेमोदी सरकार पर अघोषित आपातकाल का आरोप लगते हुएखालिस्तान अलगाववादीपुलिस थाने/पुलिस पर हमला  और देश के विरुद्ध संघर्ष छेड़ने के आरोप मे अप्रैल 2023 से असम के डिब्रूगढ़ जेल मे राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम मे बंद नवनिर्वाचित सांसद  अमृतपाल सिंह का  पक्ष लेते हुए इसे अभिव्यक्ति की आज़ादी का हनन बताते हुए उस अतिवादी के पक्ष मे खड़े नज़र!! जिस आतंकवादी भिंडरवाले को अपना आदर्श बताने वाला अमृतपाल सिंह के समर्थन मे खड़े कॉंग्रेस के सांसद चरणजीत सिंह चन्नी ने एक बार फिर इतिहास को दोहराते हुए कॉंग्रेस की उस विघटन कारी नीति की याद दिला दी जिसने अपनी स्वार्थी सत्ता को कायम रखने के लिये भिंडरवाले जैसे आतंकवादी का पोषण कर उसको  बढ़ावा देकर उसके ही विचारों के  अतिवादियों द्वारा  हमारे देश की एक महान प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी  की हत्या कर उन्हे,  हमसेअसमय  छीन लिया था।  जिस समय चरणजीत सिंह चन्नी अलगाववादी अमृतपाल सिंह के पक्ष मे संसद मे भाषण दे रहे थेकॉंग्रेस के सांसद मेजे थपथपा कर उनका उत्साह वर्धन कर रहे थे। चन्नी के लोकसभा मे वक्तव्य के दौरान और बाद मे भी कॉंग्रेस के विपक्ष के नेता राहुल गांधी या कॉंग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खडगे या श्रीमती सोनिया गांधी का ऐसा  कोई ब्यान नहीं आया जिसमे चन्नी के ब्यान की निंदा की गयी हो या उससेअसहमति जताई हो?  तब क्या ये माना जाये कि कॉंग्रेस पार्टी एक अलगाववादीदेश विरोधी अमृतपाल सिंह  के समर्थन मे ठीक वैसे ही खड़ी है जैसे आज से चार दशक  पूर्व भिंडरावाले के पक्ष मे खड़ी थी?

चरणजीत सिंह चन्नी यहीं नहीं रुके अपितु पंजाब के तत्कालीन मुख्यमंत्री स्वर्गीय बेअंत सिंह की सहादत पर छुद्र राजनीति करते हुए उनके पौत्र और भारत सरकार के मंत्री रबनीत सिंह बिट्टू पर कटाक्ष करते हुए कहा किआपके दादाजी श्री बेअंत सिंह शहीद हुए थेलेकिन वे उस दिन नहीं मरे थेवे उस दिन मरे जब आपने (बिट्टू ने) कॉंग्रेस छोड़ी थी!! आतंकवाद मे स्व॰ बेअंत सिंह के बलिदान को कॉंग्रेस से जोड़ कर बताने की उनकी अधम सोच ने न केवल देश के लिये  उनके बलिदान को तुच्छ और ओछा कर दिया अपितु अलगाववादी अमृतपाल सिंह के साथ खड़े दिखने पर कॉंग्रेस सांसद चरणजीत सिंह चन्नी ने,   देश के लिये आत्मोसर्ग हुई पूर्व प्रधानमंत्री की शहादत को भी महत्वहीन और छोटा करने का पाप किया हैं। देश की आतंकवादअलगाववाद और अतिवाद की नीतियों  के विरुद्ध इन नेताद्वय का ये सर्वोच्च बलिदान था  जिसे ये देश कभी नहीं भूल सकता। जिस कॉंग्रेस ने स्व॰ इन्दिरा गांधीस्व॰ राजीव गांधी और सरदार बेअंत सिंह जैसे नेताओं को आतंकवाद की क्रूर और अमानवीय हत्याओं का दंश झेला हो उसके माननीय सांसद चरणजीत सिंह चन्नी द्वारा एक अलगाव वादी की अभिव्यक्ति की आज़ादी का खुले आम समर्थन पर,  कॉंग्रेस के किसी भी जिम्मेदार नेता द्वारा निंदा न करना तो दूर की बात अपितु मौन धारण कर चुप्पी साध लेना इस बात को इंगित करता हैं कि उन्होने अपने नेताओं की शहादत से कुछ शिक्षा ग्रहण नहीं की अन्यथा चरणजीत सिंह चन्नी के इस शर्मनाक और गैरजिम्मेदार वक्तव्य के लिये उनके विरुद्ध समुचित कार्यवाही करते। वर्तमान कॉंग्रेस के संगठन की नीतियों पर अब तो ये स्पष्ट सवाल उठने लगे हैं कि वे मोदी सरकार को  सत्ताच्युत करने के लिये देशद्रोहियोंअलगाववादियों   और अतिवादियों के समर्थन और साथ देकर किसी भी हद तक गिर सकते हैं जो देश के लिये बड़ा  भयावह और चिंता का विषय हैं?

चरणजीत सिंह चन्नीपंजाब के वही तत्कालीन मुख्यमंत्री हैं जिन्होने 5 जनवरी 2022 भटिंडा से फिरोजपुर जा रहे प्रधानमंत्री के काफिले की सुरक्षा मे भारी चूक की थी जब पंजाब मे आंदोलन कारी किसानों ने एक फ़्लाइ ओवर पर उनका रास्ता रोक दिया था। उस दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की जान का खतरा उत्पन्न हो गया था और जिसकी ज़िम्मेदारी लेना तो दूर उल्टा पीएमओ कार्यालय को दोषी ठहराते हुए अपनी ढिठाई प्रदर्शित करते हुए  चोरी और सीनाजोरी की थी। राजनैतिक जानकारों का ये मानना हैं कि चरणजीत सिंह चन्नी के विरुद्ध अलगाववादीअमृतपाल सिंह के पक्ष मे की गयी टिप्पड़ी पर कॉंग्रेस कोई कार्यवाही नहीं करेगीक्योंकि राहुल गांधीश्रीमती सोनिया गांधी से उनकी निकटता इसी से जगजाहिर होती हैं कि पंजाब के तत्कालीन वरिष्ठ  कॉंग्रेस मुख्यमंत्री कैपटन अंमरिंदर सिंह को हटाकर चरणजीत सिंह चन्नी की पंजाब के मुख्यमंत्री के रूप मे  ताजपोशी की गयी थी।   

इस विषय मे राहुल गांधी का 18वी लोकसभा के प्रथम सत्र मे विपक्ष के नेता के रूप मे जो रवैया देखने को मिला वह इस बात की पुष्टि करता हैं कि लोकसभा चुनाव 2024 मे कॉंग्रेस और उसके सहयोगी दलों को अपनी स्पष्ट पराजय और मोदी सरकार और उसके सहयोगियों को  साफ  जनादेश को नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी पचा नहीं पाये हैं अन्यथा संसद मे  प्रधानमंत्री के धन्यवाद प्रस्ताव का उत्तर देते समय उनके पूरे भाषण के दौरान विपक्ष के माननीय,  संसद के गलियारे लगातार हल्ला गुल्ला कर उनके भाषण मे व्यवधान उत्पन्न न करते। यहीं तक होता तब भी ठीक था लेकिन राहुल गांधी ने जिस तरहकानाफूसी कर  असम के सांसद गोगोई के माध्यम से मणिपुर और अन्य साथी माननिय सांसदों को हाथ पकड़-पकड़ कर जबर्दस्ती लोकसभा के गलियारे मे प्रधानमंत्री के भाषण मे व्यवधान उत्पन्न करने के लिये खीचते नज़र आयेजो  राहुल गांधी का नेता प्रतिपक्ष की भूमिका और उसके आचरण के सर्वथा विपरीत थानिंदनीय और निरर्थक और अनैतिक भी था। लोक सभा मे नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के  इस दुराचरण पर लोक सभा के सभापति द्वारा जिन शब्दों और भावों के माध्यम से उनके आचरण के विरुद्ध झिड़का और निंदा की वह किसी भी माननीय पुरुष के स्वाभिमान और सम्मान के मानमर्दन की पराकाष्ठा थी।  काश! राहुल गांधी को अपने अपयशअपकीर्ति और अनादर का रंच मात्र भी भान होतायूं तो राहुल गांधी अपने आप को श्रीमद्भगवत गीता का ज्ञानी परिभाषित करते हैंतो उन्हे श्रीमद्भगवत गीता के अध्याय 2 के श्लोक 44 का सार अच्छी तरह से मालूम होगा जिसके अनुसार

अकीर्तिं चापि भूतानि कथयिष्यन्ति तेऽव्ययाम्।
संभावितस्य चाकीर्तिर्मरणादतिरिच्यते।।2.34।। अर्थात

सब लोग तेरी बहुत कालतक रहने वाली अपकीर्ति का भी कथन करेंगे और माननीय पुरुष के लिये अपकीर्ति मरण से (भी) बढ़कर हैं।  

लेकिन खेद और अफसोस हुआ कि माननीय नेता प्रतिपक्ष को अपने किये गये दुराचरण के लिये  उनके कान पर जूँ तक नहीं रेंगी!!

विजय सहगल    

 

शनिवार, 20 जुलाई 2024

यूपी की काँवड़ यात्रा मे रेहड़ी, पटरी वालों की पहचान की अनिवार्यता"

 

"यूपी की काँवड़ यात्रा मे रेहड़ी, पटरी वालों की पहचान की अनिवार्यता"





इन दिनों उत्तर प्रदेश मे श्रावण (सावन) मास मे  आरंभ हो रही काँवड़ यात्रा, इस समय यूपी सरकार के उस आदेश से विवादों के घेरे मे हैं जिसके तहत काँवड़ यात्रा के मार्ग मे पड़ने वाले सभी रेहड़ी, पटरी, खोमचे और ठेले वालों को अपनी पहचान का प्रदर्शन बड़े बड़े शब्दों मे मुख्य स्थान पर  प्रदर्शित करने को कहा गया हैं। इस आदेश के तहत खोमचे, रेहड़ी पटरी वाले खाद्य सामाग्री और पेय पदार्थों के  बिक्रेताओं के मालिक, संचालकों  का नाम और व्यवसाय का उल्लेख करना आवश्यक किया गया हैं। रही सही कसर उत्तराखंड  की धामी सरकार ने भी यूपी की योगी सरकार की तर्ज़ पर उत्तराखंड मे भी रेहड़ी, पटरी  वाले संचालकों को अपनी पहचान और व्यवसाय की  प्रदर्शन को अनिवार्यता ने आग मे घी का काम कर दिया। उत्तर प्रदेश सहित देश भर की राजनैतिक दलों द्वारा अपनी अपनी तरह से यूपी की आदित्य योगी सरकार के इस आदेश की व्याख्या कर विरोध प्रकट किया। कॉंग्रेस महासचिव प्रियंका वाड्रा ने इस आदेश को भारतीय संविधान मे हर नागरिक को जाति, धर्म, भाषा के भेदभाव से परे, मिले अधिकारों का हनन बताया। उन्होने इसे विभाजनकारी आदेश बता कर निंदा की। बीएसपी प्रमुख मायावती ने इसे असंवैधानिक और चुनावी लाभ का एक स्टंट बताया। सपा प्रमुख अखिलेश यादव, एआईएमआईएम प्रमुख असुद्दीन ओवैसी, कॉंग्रेस के अजय राय, कपिल सिब्बल, शिवसेना के संजय राऊत आदि ने इस धार्मिक भेदभाव बताकर निंदा की है। ये तो रही देश के राजनैतिक दलों की प्रितिक्रिया का एक पहलू।

यहाँ ये स्पष्ट करना लाज़मी हैं कि कॉंग्रेस की मनमोहन सिंह सरकार ने "खाद्य सुरक्षा और मानक अधिनियम 2006 के नियम के अंतर्गत हर स्ट्रीट वेंडर, हाथ ठेला और रेहड़ी पटरी वाले व्यवसायीयों  के लिये ये आवश्यक किया गया है कि वे उस लाइसेन्स को बड़े आकार मे प्रदर्शित करें, जिसमे व्यवसाय, व्यवसायी का नाम, पता, लाइसेन्स नंबर आदि लिखा हुआ होगा। कॉंग्रेस की मनमोहन सरकार के इस अधिनियम को तत्कालीन सपा सरकार के मुख्य मंत्री मुलायम सिंह यादव ने भी उसे उत्तर प्रदेश मे लागू किया था। तब विपक्षी गठबंधन के इन आरोपों मे  कोई दम  नहीं दिखाई देती कि योगी सरकार के,  पहचान को प्रदर्शित करने वाले आदेश सांप्रदायिक और धर्म के आधार पर विभाजन कारी हैं। एक कानून को राज्य मे पुनर्स्थापित करना कहाँ से असंवैधानिक हो सकता है? पुनः ये आदेश कोई मुस्लिम व्यवसायी या रेहड़ी पटरी वालों पर ही नहीं हिन्दू या अन्य संप्रदायों पर भी लागू किए जा रहे हैं है तब भेदभाव का प्रश्न कहाँ खड़ा होता हैं? मेरा तो ये मानना हैं कि इस तरह की पहचान को प्रदर्शित करने वाले आदेश को पूरे देश मे समान रूप से  लागू किया जाना चाहिये, जो उपभोक्ताओं के अधिकारों को संरक्षित करने मे एक महत्वपूर्ण कदम सबित होगा। दुकानदार व्यवसायी या अन्य रेहड़ी पटरी वाले प्रायः आज भी मिठाई या अन्य वस्तु के साथ गत्ते के डिब्बे के बजन को शामिल कर, कम तौल कर ग्राहक के साथ धोखा धड़ी करते हैं, घट तौली अर्थात वस्तुओं की तौल मे हेराफेरी की घटनाएँ आम हैं। कबाड़ी, रद्दी वालों  की तराजू के एक पलड़े पर यदि हाथी और दूसरे पर मेमने को रक्खे तो भी हाथी का बजन कम बतलाएगा!! जब इन्शुरेंस बैंक, सरकारी या अन्य बड़े व्यापारिक  संस्थानों मे शिकायत निवारण की प्रिक्रिया के तहत संस्थान प्रमुख का  नाम, मोबाइल या फोन नंबर और पता लिखना अनिवार्य है तो बड़े व्यापारिक संस्थान या छोटे रेहड़ी पटरी पर इसे क्यों लागू नहीं  किया  जाना  चाहिये? मेरा मानना हैं कि सड़क, परिवहन, सरकारी और सार्वजनिक हित के निर्माण कार्यों करने वाले ठेकेदारों के नाम के साथ उन सरकारी अधिकारियों के नाम और  मोबाइल नंबर भी उन स्थानों पर प्रदर्शित होना चाहिये जिनके मातहत निर्माण कार्य किए गए हों ताकि किसी मे त्रुटि, या तय  मानकों के पालन करने मे हुई कोताही की शिकायत आम जन सरकार और उनके अधिकारियों को कर संके। शिकायत निवारण के तहत उपभोकताओं के संरक्षण हेतु ये आवश्यक हैं कि  इस आदेश को पूरे देश मे समान रूप से लागू किया जाय, फिर वह संस्थान चाहे खाद्य सामाग्री या कपड़ा, बिजली, सीमेंट या अन्य व्यवसाय  का ही क्यों न हो। यदि ये नियम लागू होंगे तो उन व्यापारियों और व्यक्तियों के विरुद्ध  खराब खाद्य पदार्थ, कम तौल की शिकायत, घटिया वस्तुओं के साथ-साथ व्यापार, विनमय मे अनुचित व्यवहार या दुर्व्यवहार के लिये, उनकी पहचान के आधार पर, उनके विरुद्ध समुचित कानूनी और आपराधिक कार्यवाही सरलता से की जा सकेगी, इसके साथ ही ऐसे समाज द्रोहियों के चेहरे आम जनों के बीच  बेनकाब हो सकेंगे।

जब इस्लाम  धर्म के लोगो को एक ही जानवर के मांस को खाने के पूर्व ये जानने का अधिकार हैं कि उस जानवर का वध किस तरीके से किया गया अर्थात  झटके से या हलाल कर काटा गया, तब आखिर हमारे शाकाहार  खानपान मे हमारी आस्था, विश्वास और सुचिता बनाये रखने वाले की पहचान, जानने का हमे अधिकार क्यों नहीं होना चाहिये? यदि शाकाहार मे वही वर्तन और  तेल/घी प्रयोग किया गया जिसमे पहले मांसाहार बनाया गया तो ये शाकाहारियों के विरुद्ध भौतिक और वैचारिक हिंसा ही है जिसे तुरंत रोका जाना चाहिये।  यदि शाकाहार व्यक्तियों की उक्त भावनाओं को अनदेखा किया जाएगा तो उन्हे हक हैं कि वे उन संस्थानों का बहिष्कार करें फिर चाहे ऐसे होटल और रेस्ट्रा हिन्दू, मुस्लिम या अन्य  मतावलंबियों द्वारा चलाये जा रहे हों? सनातन धर्मी श्रवण मास के पवित्र माह मे अपने दैनिक जीवन मे न केवल मन, वाणी और कर्म मे अपितु अपने रहन सहन और खान पान मे, व्रत और उपवास मे स्वयं सात्विक्ता और पवित्रता बनाये रखते हैं तो हमे भी उनकी आस्था और विश्वास को ठेस पहुंचाने का कोई हक नहीं। छद्म प्रतीकों, नामों, चित्रों और छवियों की आड़ लेकर भोजन बनाते समय शाकाहारी  वस्तुओं और संसाधनों की अनदेखी कर   अपने व्यापार व्यवसायों को चलाना उपभोक्ताओं के साथ बैसी ही धोखाधड़ी हैं जैसे हलाल मांसाहारी सेवन करने वाले को छल कपट से झटका का मांस परोसना या शाकाहारी व्यक्ति को झूठ और फरेब द्वारा उसी वर्तन और तेल/घी मे   मांसाहार को पका कर परोसना। । पहचान छुपा कर छद्म कारोबार करना कायरता और कमजोरी की निशानी हैं, ऐसे लोगो के विरुद्ध समुचित कार्यवाही करना आवश्यक हैं जो अपनी पहचान छुपा कर ग्राहकों की भावनाओं को आहत करते है।

मैं भोपाल के हमीदिया रोड के  उस मुस्लिम व्यवसायी को जनता हूँ जिसने बगैर अपनी पहचान छिपाये मावा की जलेबी के बिक्रय मे अपनी एक अनूठी मिशाल बनाई। मैंने भी उसकी स्वादिष्ट जलेबी का स्वाद लिया हैं। झाँसी मे बड़ा बाज़ार के उस मुस्लिम व्यवसायी, भारतीय गज़क भंडार  को शहर का हर व्यक्ति जनता हैं जो तिल की कुटि हुई गज़क बनाता हैं और उस गज़क के स्वाद की उत्तमता के  सैकड़ों लोग मुरीद हैं। ऐसे अनेक उदाहरण हर छोटे बड़े गाँव, कस्बों मे मिल जाएंगे जिन्होने अपनी मेहनत, ईमानदारी और अपने उत्पाद की गुणवत्ता के बल बूते लोगों ने अपनी पहचान बनाई। ये एक भ्रम हैं कि पहचान छुपा कर आप अपने व्यवसाय मे कोई कीर्तिमान स्थापति कर संकेंगे? यदि आप अपने व्यवसाय को ईमानदारी, मेहनत और गुणवत्ता की कसौटी पर कस श्रेष्ठता स्थापित करते हैं तो कोई ताकत आपको सफल व्यवसायी होने से नहीं रोक सकती फिर चाहे आप हिन्दू हों या मुस्लिम, सिक्ख हों या ईसाई।     

रेल्वे स्टेशन पर प्रायः वस्तुओं की तय कीमत से अधिक बसूली पर वेंडर के  दुकान पर रेल अधिकारियों के नंबर अंकित करने की बाध्यता से दूकानदारों पर अंकुश लगा हैं। मुझे याद हैं ग्वालियर और उज्जैन के मिठाईवालों के विरुद्ध मिठाई की तौल मे  डिब्बे की तौल शामिल करने पर मुझे दुकानदार का नाम या मोबाइल नंबर की जानकारी के अभाव मे पुलिस के समक्ष बड़ी मशक्कत करनी पड़ी थी। फल-सब्जी, पेट्रोल की माप तौल पर सवाल उठाने  पर दुकानदार और व्यवसायी आज भी लड़ने, मारपीट पर उतारू हो जाते हैं। ऐसे उद्दंड दूकानदारों के विरुद्ध पुलिस मे शिकायत या कानूनी कार्यवाही मे, पहचान को प्रदर्शित करने वाला ये आदेश उपभोक्ताओं के संरक्षण मे काफी मददगार सवित होगा जिसे समान रूप से सारे देश मे तत्काल लागू किया जाना चाहिये।  

विजय सहगल                              

सोमवार, 15 जुलाई 2024

राष्ट्रपति मसूद पेज़ेश्कियान - नये ईरान का आगाज़ ?

 

राष्ट्रपति मसूद पेज़ेश्कियान - नये ईरान का आगाज़ ?



ये लिखते हुए अतिरंजना न होगी कि ईरान की जनता ने 6 जुलाई को देश के राष्ट्रपति के रूप मे एक उदारवादी नेता मसूद पेज़ेश्कियान को राष्ट्रपति के रूप मे चुन कर एक इतिहास रचने का साहस किया। ईरान के 9वें राष्ट्रपति के निर्वाचन का ये चुनाव ईरान के  पूर्व कट्टरपंथी राष्ट्रपति इब्राहिम रईसी की संदिग्ध परिस्थितियों मे हेलिकोप्टर दुर्घटना मे मौत के बाद किया गया। "नए  ईरान" को हिजाब की बाध्यता से मुक्ति के आश्वासन और  आवाहन का ईरानी जनता ने सुधारवादी नेता और पेशे से हृदय रोग विशेषज्ञ मसूद पेज़ेश्कियान को जहां एक ओर ईरान के राष्ट्रपति के रूप मे अपना भरपूर समर्थन देकर चुना वहीं दूसरी ओर उनके प्रतिद्वंदी सईद जलीली को दूसरे चरण की वोटिंग मे  30 लाख से भी अधिक  मतों के अंतर से परास्त किया। ईरान की  चुनाव प्रणाली की इस व्यवस्था का के अंतर्गत यदि किसी प्रत्याशी को 50 प्रतिशत से कम मत प्राप्त होते हैं तो शीर्ष दो प्रत्याशियों के बीच द्व्तिय चरण के चुनाव मे विजेता का निर्णय किया जाता हैं न कि पहले चरण के चुनाव मे बहुमत प्राप्त प्रत्याशी को?

मसूद पेज़ेश्कियान ने अपने चुनावी अभियान मे ईरान के अनिवार्य हिजाब कानून मे ढील देने और अमेरिका सहित पश्चिमी देशों से संबंध बेहतर बनाने का वादा किया था।  विदित हो कि  13 सितम्बर 2022 को ईरानी मॉरल पुलिस द्वारा 22 वर्षीय  ईरानी युवती महसा अमिनी की पीट पीट कर इसलिए हत्या कर दी थी क्योंकि उसने ईरान मे महिलाओं के अनिवार्य हिजाब कानून का उल्लंघन किया था। महसा अमिनी की हत्या पर ईरान सहित दुनियाँ मे हिजाब के विरोध मे तीव्र आंदोलन हुए थे। ईरान मे देश के नागरिकों ने और महिलाओं ने अपने बाल कटवा कर हिजाब का विरोध किया था, हिजाब के विरुद्ध इस  आंदोलन को   ईरान की कुख्यात  मॉरल पुलिस द्वारा सैकड़ो लोगो की गिरफ्तारी, हत्या और फांसी की सजा दे कर कुचलने के इस मानवाधिकार विरोधी, कट्टरपंथी प्रयास का ईरान सहित दुनियाँ मे कडा विरोध किया गया था। यहीं कारण था कि कट्टरवादी सोच के पूर्व राष्ट्रपति इब्राहिम रईसी की संधिग्ध  हैलिकोप्टर दुर्घटना मे मौत पर, धार्मिक रूप से कट्टरवादी सोच के बावजूद अनेकों जगह पर फटाके फोड़ कर और आतिशबाज़ी चला कर  खुशी प्रकट की गयी थी।    

मसूद पेज़ेश्कियान का ईरान के राष्ट्रपति चुने जाने पर भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बधाई देते हुए ईरान और भारत के लोगों और क्षेत्र के लाभ के लिए मधुर और दीर्घकालिक, द्विपक्षीय सम्बन्धों को मजबूत करने के लिए साथ  मिलकर काम करने की आशा जतलाई। भारत और ईरान  के लिए रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण चाबहार बन्दरगाह पर  ध्यानाकर्षण रहेगा। भारत ने चाबहार बन्दरगाह के विकास के लिए 12 करोड़ डॉलर देने का वादा किया हैं। जहां एक ओर साउदी अरब प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान और रूसी राष्ट्रपति पुतिन ने ईरानी राष्ट्रपति को बधाई दी हैं वहीं इसके विपरीत अमेरिका ने ईरानी राष्ट्रपति के चुनावों की आलोचना करते हुए इन चुनावों को न तो स्वतंत्र और न ही निष्पक्ष बताया। अमेरिका ने दावा किया कि मसूद पेज़ेश्कियान को राष्ट्रपति चुनने मे इस्लामी गणराज्य का  मानवाधिकारों के रुख मे कोई बदलाब नहीं आयेगा। 

पिछले कट्टरपंथी राष्ट्रपति इब्राहिम रईसी या अन्य पिछली सरकारों के कट्टरपंथिय राष्ट्र प्रमुखों  का शासन इस बात का घ्योतक हैं कि ईरान मे शिया शासन प्रणाली और देश के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की किंचितमात्र  अनदेखी कर, ईरान मे सरकार और शासन की कल्पना असंभव है। इस बात को नवनिर्वाचित राष्ट्रपति मसूद पेज़ेश्कियान के इस वक्तव्य से भली भांति समझा जा सकता हैं जिसमे उन्होने अपने चुनावी प्रचार के दौरान जहां एक ओर हिजाब की अनिवार्यता मे ढील, देश के आर्थिक विकास के लिए पश्चिमी देशों से अपने सम्बन्धों मे सुधार के साथ, शिया शासन प्रणाली मे बिना किसी मौलिक परिवर्तन के वादे के साथ ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई को देश के सभी नीतिगत मामलों मे अंतिम निर्णायक मानने का वचन दिया हैं। एक बड़े ही मार्मिक और हृदयस्पर्शी संदेश मे मसूद पेज़ेश्कियान ने देश की जनता से आवाहन किया कि सुधारवादी सोच का ये कठिन रास्ता आपके सहयोग के बिना आसान नहीं होगा। मै वचन देता हूँ कि मै कभी आपको इस रास्ते पर अकेला नहीं छोड़ूँगा पर आप भी मुझे अकेला मत छोड़िएगा!! ऐसे वादे  इस बात की ओर इंगित करते  हैं कि नए राष्ट्रपति मसूद पेज़ेश्कियान की सुधारवादी, उदारवादी और विकसवादी  राह इस्लामिक ईरान मे इतनी आसान न होगी, फिर भी उम्मीद की  जानी चाहिये कि मसूद पेज़ेश्कियान के राष्ट्रपति चुने जाने के बाद ईरान मे स्थायित्व और उदरवादी सरकार अपने पूर्ववर्तिय कट्टरवादी शासकों के विपरीत एक सर्वसमावेशी और सर्वसम्मत नीतियों को लागू कर सकेगी जहां कट्टरपंथ, रूढ़िवाद, दक़ियानुसी  और अनुदार सोच का कोई स्थान नहीं होगा। पर ईरानी राजनीति के जानकारों का मानना हैं कि ईरान मे सारी नीतियाँ और शक्तियाँ देश के  राष्ट्रपति के पास अंतर्निहित नहीं हैं अपितु सर्वोच्च शिया धार्मिक नेता एवं उनके नियंत्रिण वाली शक्तिशाली संस्थाओं के पास निहित हैं। अतः नवनिर्वाचित राष्ट्रपति मसूद पेज़ेश्कियान की हिजाब सहित घरेलू या विदेशी उदारवादी  नीतियों को सर्वोच्च नेता अली खामेनेई की सहमति के बिना लागू करना कदाचित ही संभव होगा?       

विजय सहगल           

शनिवार, 6 जुलाई 2024

नेता प्रतिपक्ष- राहुल गांधी, एक फ्लोप्प शो

 

"नेता प्रतिपक्ष- राहुल गांधी, एक फ्लोप्प शो"





1 जुलाई 2024 को राहुल गांधी द्वारा संसद मे राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव मे दिया गया भाषण उनके  नेता प्रतिपक्ष के रूप मे पहली परीक्षा थी।  बड़े खेद का विषय रहा कि संसद भवन मे दिया गया उनका भाषण संसदीय मर्यादाओं और परमपराओं के पैमाने पर खरा नहीं उतरा। अपने 20 साल के राजनैतिक अनुभव के बावजूद उनका आचरण अनैतिक, अमर्यादित और अपरिपक्व ही कहा जायेगा। राहुल गांधी के व्यवहार, शिक्षा-सांस्कृति की थोड़ी बहुत भी समझ रखने वाले किसी भी व्यक्ति को संसद मे उनके आचरण को देख कदाचित ही   कोई अचरज हुआ होगा!! क्योंकि उनके दायित्वहीन, अपरिपक्व और बचकाने व्यवहार से पूरा देश परिचित है। ऐसा प्रतीत होता हैं राहुल गांधी अभी भी चुनावी मोड मे हैं। भाषण के दौरान भाजपा और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर व्यक्तिगत छींटाकशी और आरोप प्रत्यारोप देख कर ऐसा प्रतीत हो रहा था कि वे अभी तक चुनावी मोड से बाहर नहीं निकले?

भाषण की शुरुआत उन्होने संविधान की प्रति लहराते हुए, "जय संविधान" कहकर की जो वे चुनाव 2024 के दौरान अपनी चुनावी रैलियों मे अक्सर करते आए थे। बक़ौल राहुल गांधी, "इसकी हमने रक्षा की हैं"!! काश!, उन्होने श्रीमती इन्दिरा गांधी द्वारा 1975 मे देश पर आपात काल थोप कर संविधान की हत्या पर भी दो शब्द  कह कर अफसोस प्रकट किया होता तो संविधान की रक्षा का वक्तव्य ज्यादा सार्थक नज़र आता? पूरे भाषण के दौरान सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच अनेकों बार टकराव की स्थिति उत्पन्न हुई। उन्होने भाजपा द्वारा पिछले दस वर्षों के दौरान उनके बंगले को खाली कराने, दो साल की सजा सहित आदिवासियों, अल्पसंख्यकों मीडिया पर लगातार हमले का दोषी ठहराया। राहुल गांधी द्वारा भगवान शिव, ईसा मसीह, गुरु नानक, इस्लाम, बौद्ध और जैन धर्म के प्रतीकों के चित्र दिखाते हुए उनमे दर्शायी  अभय मुद्रा को कॉंग्रेस के सिंबल बताते हुए इसे  सत्य, अहिंसा से जोड़ कर कॉंग्रेस के चुनाव चिन्ह की व्याख्या की। अन्य सांसद सदस्यों और स्पीकर के बार बार आग्रह के बावजूद कि किसी भी तरह के चित्र या प्रतीकों को संसद मे दिखाना नियमों का उल्लंघन हैं फिर भी वे न केवल उनकी सलाह और आग्रह को नज़रअंदाज़ करते रहे अपितु, स्पीकर द्वारा उनको  चित्रों को न दिखालाये जाने पर स्पीकर का  मखौल भी उड़ाया। न जाने कौन से और कैसे तर्क-वितर्क दे कर और सारे धर्मों  की शिक्षाओं का उल्लेख कर "डरो मत, डराओ मत" का जाप करते रहे। काश! उन्होने भगवान शिव द्वारा समुद्र मंथन से निकले विष रूपी बुराइयों के गरल  को अपने गले मे धारण करने की शिक्षा से कुछ सीख लेते लेकिन उन्होने अपने श्रीमुख से लगातार विषवमन कर, अपनी सोची समझी रणनीति के तहत, सारे हिंदुओं पर आरोप लगाते हुए शब्दशः ये कहा कि, "जो लोग अपने आप को हिन्दू कहते हैं वे चौबीस घंटे हिंसा हिंसा हिंसा, नफरत, नफरत नफरत, असत्य, असत्य असत्य, फैलाते हैं। उनका ये आरोप भी कि, आप हिन्दू हो ही नहीं? काश!, राहुल गांधी अपने कुतर्कों   को त्याग कर, सनातन और हिन्दू धर्म की सांस्कृति, सभ्यता और संस्कार के बारे मे 131 वर्ष  पूर्व शिकागो मे स्वामी विवेकानन्द द्वारा दिये अपने उदभोदन से कुछ सीख लेकर हिंदुओं की सहिष्णुता, सार्वभौमिक और समावेशी होने के स्वरूप से कुछ शिक्षा ग्रहण करते और "गर्व से कहो हम हिन्दू हैं" का दम भरते। इस दौरान प्रधानमंत्री ने हस्तक्षेप कर राहुल गांधी द्वारा सभी हिंदुओं को हिंसक बतलाने को गंभीर विषय बतला कर आपति करना और गृह मंत्री द्वारा इस विषय मे राहुल गांधी से माफी मांगने की बात भी शोर शराबे की बीच  कही गयी। लेकिन राहुल गांधी द्वारा अपने  गैर जिम्मेदारान ब्यान  के बावजूद उनके चेहरे पर कोई सिकन नज़र नहीं आयी।

एक सामान्य शिष्टाचार के तहत, संसद मे सांसदों  द्वारा हमेशा सभापति  की ओर मुखातिब होकर संबोधित करने की परंपरा है। सभापति महोदय के बार-बार याद दिलाने के बावजूद,  राहुल गांधी ने अपने पूरे भाषण के दौरान इस सामान्य शिष्टाचार की  अनुपालना मे दिल्चस्पी  नहीं दिखाई, वे अधिकतर समय आसंदी की ओर पीठ कर अपने दल के सदस्यों को संबोधित  करते रहे, जो अत्यंत निंदनीय व्यवहार था।      

अपनी भारत जोड़ो यात्रा के दौरान एक हास्यास्पद उदाहरण दे उन्होने  बताया कि उनको एक महिला ने बताया कि उसका पति उसे मारता हैं क्योंकि वो उसे खाना बना कर नहीं देती!! जब राहुल ने पूंछा कि खाना बना कर क्यों नहीं देती? तो उसने कहा महंगाई के कारण वो राशन नहीं खरीद सकती। उन्हेने कहा ऐसी,  हजारों महिलाएं हैं जो इस कारण अपने पतियों से मार खाती हैं। राहुल गांधी का इस  दृष्टांत को  सत्यता की कसौटी पर कसने के लिए समाज शास्त्र और मनो विज्ञान के   विध्यार्थियों और शोधार्थियों को शोध करने की अवश्यकता हैं? राहुल गांधी द्वारा अग्निवीर योजना के एक सिपाही की ड्यूटी के दौरान हुई सहादत पर  उसे कुछ भी आर्थिक सहायता न दिये जाने के झूठ पर रक्षा मंत्री द्वारा प्रतिवाद करते हुए बताया गया कि ऐसे प्रत्येक अग्निवीर सिपाही के शहीद होने पर एक करोड़ की धनराशि प्रदान की जाती हैं। राहुल गांधी द्वारा  किसानों को उनकी कृषि उपज पर एमएसपी न दिये जाने के सवाल पर कृषि मंत्री शिवराज सिंह के प्रतिवाद के कारण एक बार फिर उनके झूठ का पर्दाफाश हुआ।  उन्होने सतही तौर पर नोटबंदी, नीट, मणिपुर, बेरोजगारी जैसे मुद्दे जरूर उठाये पर उनके वक्तव्य  मे कोई गांभीर्य दूर दूर तक कहीं दिखाई नहीं दिया।

विपक्षी दल के नेता राहुल गांधी द्वारा सभापति ओम बिड़ला पर माइक बंद करने और मोदी से झुक कर हाथ मिलाने जैसे अत्यंत निजी आरोप लगा कर उनका उपहास उड़ाना इस बात को परिलक्षित करते  हैं कि राहुल गांधी का व्यवहार और उन्हे  मिले संस्कार, अनैतिकता  और अमर्यादिता की पराकाष्ठा थे।  सभापति द्वार इस संदर्भ मे राहुल गांधी को ये कहना कि मैंने आपको पूर्व मे भी अवगत कराया था कि माइक का कंट्रोल उनके पास नहीं रहता, बार बार ऐसे आरोप लगाना उचित नहीं। प्रधानमंत्री से हाथ मिलाने पर ओम बिड़ला जी का ये कथन कि, वह अपने से बड़ों को झुक कर मिलते वक्त अपने संस्कारों और सांस्कृति का पालन करते हैं, भी राहुल गांधी को भारतीय संस्कार, शिक्षा-दीक्षा, और अनुशासन प्रभावित न कर सका। मुझे याद नहीं कि भारतीय परंपरा और रीतिरिवाज के तहत किसी सार्वजनिक मंच या कार्यक्रम मे  राहुल गांधी ने कभी किसी प्रौढ़ व्यक्ति या महिला के चरण छूए हों?  

कहना अतिशयोक्ति न होगी कि राहुल गांधी द्वारा प्रतिपक्ष के नेता के रूप मे उनका पहला भाषण, भाषा और व्यवहार, इस बात का ध्योतक हैं कि एक संवैधानिक पद पर उनकी नियुक्ति के बाद  भी  उनके आचरण और व्यवहार मे परिपक्वता, ज़िम्मेदारी, गांभीर्य का अभाव भविष्य मे भी उनके आचरण मे  रहने वाला हैं। इस आधार पर ये निर्णय निकालना अतिरंजना न होगा कि आने वाले पाँच सालों मे संसद का स्वरूप कैसा होगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का देश के  आर्थिक  विकास के एजेंडे को लागू करने मे प्रतिपक्ष द्वारा  उत्पन्न  कठिनाइयों का सामना कदम कदम पर करना पड़ेगा।        

विजय सहगल