शनिवार, 25 मई 2024

"ककन मठ"

 

"ककन मठ"








7 अप्रैल 2024 को मुझे अपने परिवार के साथ मध्य प्रदेश मे  मुरैना जिले के सिंघोनिया कस्बे के पास स्थित प्राचीन मंदिर ककनमठ जाने के सौभाग्य प्राप्त हुआ। चंबल क्षेत्र मे पंद्रह -सोलह सौ साल पूर्व के इस प्राचीन मंदिरों की एक श्रंखला विध्यमान हैं जिसे ककन मठ नाम से जाना जाता है। ऐसा माना जाता हैं कि कच्छपघात राजा कीर्तिराज ने अपनी रानी ककनवती की इच्छानुरूप इस शिव मंदिर का निर्माण कराया था। इस अनोखे मंदिर की वास्तु गुर्जर प्रतिहार शैली पर निर्मित हैं। कुछ इतिहासकारों का मत हैं कि 115 फुट ऊंचे इस मंदिर को गुर्जर प्रतिहार शासकों ने 9वी-10वी सदी मे कराया था। स्थानीय लोगो के बीच ऐसी किवदंती भी है कि यह मंदिर शिव गणों अर्थात भूतों ने रातों रात इसका निर्माण कराया था और दिन होते ही इसे ऐसी ही अवस्था मे भूतों ने छोड़ दिया, इसलिए इस आधे-अधूरे मंदिर के भग्नावशेष वैसे ही हालत मे अपूर्ण निर्माण के संकेत देते हुए पड़े हैं।  कुछ लोग इसे भूतों का मंदिर भी कह कर संबोधित करते हैं।। एक विशाल चबूतरे के ऊपर मंदिर का निर्माण किया गया हैं। चबूतरे  पर निर्मित इस मंदिर की संरचना को देख ऐसा लगता हैं कि मंदिर के शिखर पर रक्खे विशालकाय पत्थर अब गिरे-तब गिरे!! ऐसे सैकड़ों नक्काशीदार और बगैर नक्काशी के  सादा पत्थर मंदिर के मंडप के उपर दिखाई दे जाते हैं जो मंदिर की आंतरिक रचना को आकार देने के लिये लगाए गए थे और जिनके बाहरी आकार को देने के लिये नक्काशी दर पाषाण युक्त पत्थरों के लगाया जाना था पर अधूरे निर्माण के कारण ये अपूर्ण बनी  स्थिति मे पड़े हैं।   मंदिर के शिखर पर भी ऐसी सैकड़ों आधी अधूरी संरचनायेँ एक के उपर एक सहज ही दृष्टिगोचर हो जाती हैं और लगता हैं कि हवा के एक झोके से भरभरा कर गिर पड़ेंगी।  लेकिन आज से पन्द्रा-सोलह सौ वर्ष पूर्व के अद्भुद वास्तु को देख कर हमे अपने पूर्वजों के इंजीन्यरिंग, तकनीकि ज्ञान कौशल पर फख्र करने  के पर्याप्त और समुचित कारण होने पर गर्व हैं, किस तरह, कैसे  और किस तकनीकि से उस काल मे विशाल काय पत्थरों को सैकड़ों फुट ऊंचे शिखर के निर्माण मे ऊपर  चढ़ाया होगा? बगैर किसी धातु के उपयोग और सीमेंट जैसे किसी मसाले के बिना  पत्थरों को एक के ऊपर एक वास्तुशास्त्र की अनोखी तकनीकि का  उपयोग कर बनाया गया होगा जो जो अद्भुद और बेमिसाल है और प्रशंसनीय भी!! मंदिर के अर्धवृत्ताकार परिक्रमा पथ पर मंडप की दिशा मे यक्ष, किन्नर और अप्सराओं की सुंदर श्रंगार युक्त प्रतिमाएँ देखते ही बनती हैं। मंदिर के हजारों भग्नावशेष मंदिर परिसर मे चारों ओर बिखरे पड़े हैं। पुरातत्व विभाग इन  पड़े हुए भग्नावशेष को पुनः प्रतिस्थापित करने का प्रयास कर रहा हैं। पूरा मंदिर मंडप और गर्भग्राह ज्योमिति का अद्भुद और उत्तम नमूना हैं।  मंदिर परिसर के चारों ओर प्राकृतिक रूप से शांत और सुकून भरे माहौल मे मोरों, पशु पक्षियों का कलरव को  आप महसूस कर सकते हैं। शनीचरी मंदिर के पास जंगलों मे नील गाय भी आपको दिखाई दे जाएगी।           

इस आधे-अधूरे मंदिर को देखने पर ऐसा नहीं लगता कि हजारों सालों से चौकोर पाषाण स्तंभो पर टिके  इस मंदिर मे तमाम अंधी, तूफानों और भूकंपों के बावजूद  कदाचित ही कोई पत्थर का टुकड़ा गिरा हो!! ये विशालकाय स्तंभो से युक्त मंदिर के प्रवेश मंडप मे से होकर आप कुछ सीढ़ियाँ चढ़कर मंदिर के गर्भ गिरह मे प्रवेश करते हैं जहां भगवान शिव की प्रतिमा शिवलिंग के रूप मे प्रतिष्ठित हैं। हमलोगो ने भी शिव अभिषेक कर शिव की आराधना और अर्चना कर शिव को प्रणाम किया।

जहां एक ओर केंद्रीय पुरातत्व विभाग ने अपने दायित्वों का निर्वहन ककनमठ के रखरखाव समुचित तरीके से किया हैं पर मध्य   प्रदेश सरकार के समुचित  प्रचार-प्रसार के अभाव एवं पर्यटन विभाग के ढुलमुल रवैये के कारण यहाँ आने वाले पर्यटकों की संख्या सीमित हैं। इस लालफ़ीताशाही का उल्लेख मैंने अपने ब्लॉग दिनांक 11 दिसम्बर 2018 मे गढ़ कुंडार का किला (https://sahgalvk.blogspot.com/2018/12/blog-post_11.html) मे भी किया था। तब से हालत ज्यों-के-त्यों बने हैं।  यही कारण है कि इन प्राचीन विश्व धरोहर पर सामान्य नागरिक सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं। इस अनुछुए पर्यटन स्थल ककनमठ  के चारों ओर दूर दूर तक अभी सिर्फ खेत खलिहान ही दिखाई देते हैं। यध्यपि पुरातत्व विभाग ने मंदिर परिसर के अंदर  पर्याप्त साफ-सफाई को बनाए रक्खा है। पीने के पानी की व्यवस्था के साथ पर्याप्त संख्या मे पेड़ों, वृक्षों के माध्यम से हरियाली को बनाए रक्खा हैं। पर खान-पान की अन्य व्यवस्था का पूर्णतः  अभाव हैं। यहाँ जाने के पूर्व बेहतर हैं आप अपने साथ चाय पानी की व्यवस्था स्वयं करके चले। मुरैना से  सिङ्घोनिया तक बस का साधन मिल तो जाएगा पर पर साधन सुगम और आराम दायक न होंगे। ग्वालियर से अपने स्वयं के दो पहिया या चार पहिये  वाहन से आसानी से पहुंचा जा सकता हैं। ककनमठ के लिए  कोई सार्वजनिक साधन सीधा ग्वालियर से उपलब्ध नहीं है।  अपने वाहन से जाने पर ये  एक लाभ और हैं कि ककनमठ के साथ साथ आप पुरातत्व की दृष्टि से प्रसिद्ध अन्य चार स्थलों अर्थात शनीचरी मंदिर, बटेश्वर मंदिर श्रंखला, पढ़ावली और मितावली मे स्थित चौसठ योगिनी  मंदिर को भी देख सकते हैं जो एक दूसरे से 1-2 किमी की दूरी पर स्थित हैं और पुरातत्व के दृष्टि से समृद्ध और महत्वपूर्ण हैं और जो अब तक मध्य प्रदेश मे पर्यटन की दृष्टि से अनुछुए पर्यटन स्थल हैं। इन चारों स्थलों का वर्णन मैंने अपने ब्लॉग दिनक 21, 22 और 24  नवम्बर 2019  को अपने चार  ब्लॉगस  (https://sahgalvk.blogspot.com/2019/11/blog-post_21.html) मे किया था।  ग्वालियर से इन स्थलों की दूरी  एक तरफ से लगभग 50-60 किमी होगी जिसे आराम से एक दिन मे कवर किया जा सकता है। इन  सभी  पाँच  पर्यटन स्थल को घूमने का खर्च सिर्फ वाहन व्यय के अलावा  कोई अतिरिक्त  व्यय नहीं हैं।  इसलिए इसे, सस्ता और सरल  पर्यटन भ्रमण भी कहा जा सकता हैं।  अब तो सड़क भी अच्छी बन गयी है रास्ता पक्का और सुगम है। लेकिन ध्यान रहे मई से लेकर जुलाई के मौसम मे इन पर्यटन स्थलों पर जाने से बचे क्योंकि उन दिनों गर्मी का मौसम अपने चरम पर होता हैं और गरम लू के थपेड़े आपकी यात्रा को बाधित कर आपको मुसीवत मे डाल सकते हैं। लेकिन ऐसा भी नहीं है कि यदि आप लू से बचने के समुचित साधन अपना ले, तो घूमने की इस चुनौती को स्वीकार किया जा सकता है। 

विजय सहगल      


बुधवार, 22 मई 2024

"ईरानी राष्ट्रपति के हेलिकोप्टर की दुर्घटना या षड्यंत्र?"

 

"ईरानी राष्ट्रपति के हेलिकोप्टर की  दुर्घटना या षड्यंत्र?"



दुनियाँ को इस खबर ने चौंका दिया कि 19 मई की रविवार की शाम ईरान के राष्ट्रपति इब्राहिम रईसी एक  हेलिकोप्टर हादसे का शिकार हो गये, जब वे अजरबैजान के राष्ट्रपति इल्हाम अलीयेव के साथ ईरान-अजरबैजान की सीमा पर स्थित एक बांध का उदघाटन कर बापस लौट  रहे थे। रईसी के साथ ईरान के विदेश मंत्री होसैन अमीरब्दुल्लाहियन और ईरान सरकार के कुछ वरिष्ठ अधिकारी भी साथ थे, वे सब भी हादसे का शिकार हो गये। तीन हेलिकोप्टरों के  काफिले मे  दो हेलिकोप्टर तो सुरकक्षित, सकुशल बापस पहुँच गये पर तीसरा हेलिकोप्टर जिसमे ईरान के राष्ट्रपति एवं विदेश मंत्री सहित अन्य महत्वपूर्ण व्यक्ति सवार थे लापता हो गया।  ऐसा बताया गया कि खराब मौसम और कोहरे के कारण राष्ट्रपति के हेलिकोप्टर को पहाड़ी इलाके और पेड़ों  से आच्छादित जंगल मे आपातकालीन लेंडिंग कराने के लिये बाध्य होना पड़ा। देर रात तक उनके हेलिकोप्टर की खोज जारी रही। भारत के प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी सहित दुनियाँ के तमाम देशों के राष्ट्रप्रमुखों ने चिंता करते हुए उनकी सलामती के लिये प्रार्थना की। ईरान मे भी इस दौरान वहाँ के नागरिकों ने राष्ट्रपति रईसी के कुशलक्षेम के लिये प्रार्थनाएँ की। रविवार-सोमवार की दरमियानी रात मे बचाव कार्य जारी रहा पर दुर्भाग्यवश 20 मई सोमवार को तुरकिये के बचाव दल के ड्रोन ने इलाके की सटीक लोकेशन के माध्यम से खबर दी कि इस दुर्घटना मे हेलिकोप्टर मे सवार सभी लोग मारे जा चुके हैं। हो सकता है  हेलिकोप्टर दुर्घटना मे इस तरह ईरानी राष्ट्रपति का मारा जाना वास्तव मे कोई तकनीकि या बिगड़े मौसम का  कारण हो पर कहीं न कहीं लोगो के मन मे शंका और अंदेशा है कि इस दुर्घटना के  पीछे इस्राइल की खुफिया एजन्सि मोसाद या अमेरिका की खुफिया एजन्सि सीआईए का हाथ तो नहीं? ईरानी नागरिकों द्वारा जहां एक ओर राष्ट्रपति रईसी के सकुशल होने की प्रार्थनाएँ की जा रही थी वही एक नज़ारा चौकाने वाला था कि कुछ घरों के ऊपर आतिशबाज़ी और पटाके भी चलते देखे गये। ये इस बात का संकेत था कि ईरान के कुछ लोगो ने राष्ट्रपति रईसी की मौत पर खुशियाँ मनाई क्योंकि राष्ट्रपति इब्राहिम  रईसी ईरान के सुप्रीम कट्टरपंथी  लीडर अली खामनेई के  करीबी और विश्वस्त थे।  1988 मे रईसी ने अपने  लगभग पाँच हज़ार राजनैतिक  विरोधियों को शरिया कानून के तहत मौत की सजा सुना कर फांसी पर लटका दिया था। इसके साथ ही रईसी के शासन काल मे ही हजारों ईरानी महिलाओं पर हिजाब थोपने और प्रताड़ित कर सजाएँ दी गयी थी। 2022 मे हिजाब के विरोध मे महसा अमिनी की हिरासत मे मौत पर सारी दुनियाँ मे ईरान के विरोध मे प्रदर्शन हुए थे और संयुक्त राष्ट्र संघ ने भी इस हत्या के लिये ईरान को दोषी ठहराया था। अभी इस बारे मे कयाश ही लगाये जा रहे हैं? जांच के बाद ही स्पष्ट होगा कि ये हादसा था या साजिशन उनकी हत्या की गयी और यदि ऐसा है तो हत्या मे कहीं ईरान की आंतरिक राजनीति का भी तो कहीं इस षड्यंत्र मे कोई हाथ तो नहीं?        

ईरान के राष्ट्रपति इब्राहिम रईसी की एक हैलिकोपटर दुर्घटना मे मारे जाने की खबर से एक बार फिर मिडिल ईस्ट मे खतरे के बादल छा जाने का अंदेशा दुनियाँ को सताने लगा है। विदित हो कि 13 अप्रैल 2024 को ईरान के राष्ट्रपति रईसी ने इस्राइल पर 300 से भी अधिक ड्रोन मिसाइल से हमला  कर सीरिया मे उनके दूतावास पर हुए हमले जिसमे ईरानी रिवॉल्यूशनरी गार्ड्स के दो जनरल मारे गये थे, का बदला लिया था। कुछ वर्ष पूर्व इस्राइल ने ईरानी सेना कम्मांडर सुलेमानी तथा ईरान के एक परमाणु वैज्ञानिक  को भी इस्राइल  ने इसी तरह मिसाइल हमले मे मौत के घाट उतार दिया था। अमेरिका और ब्रिटेन की स्पष्ट चेतावनी के बावजूद ईरान के इस दुस्साहस की, अमेरिका और यूरोपियन देशों ने निंदा की और ईरान पर अनेक प्रतिबंध भी लगाये। तब से ये कयास लगाया जा रहा था कि इस्राइल भी ईरान  के  इस ड्रोन मिसाइल हमले पर प्रतिक्रिया कर बदला अवश्य लेगा। ठीक एक हफ्ते बाद इस्राइल ने ईरान ही नहीं  इराक और सीरिया पर भी  हमला किया लेकिन उस समय राष्ट्रपति रईसी पाकिस्तान मे साही मेहवाननवाजी का आनंद उठा रहे थे। ऐसा लगता थे कि इस्राइल ने बदले की कार्यवाही पूरी कर ली, पर ईरान के राष्ट्रपति का  इस तरह हेलिकोप्टर दुर्घटना मे अचानक से मारा जाना तमाम शंकाओं-कुशंकाओं  की ओर इशारा करता है? अब तक का इतिहास रहा है जब जब इस्राइल पर जिस किसी ने भी हमला किया है इस्राइली खुफिया एजन्सि मोसाद ने अपने दुश्मनों को साम-दाम-दंड-भेद से चाहे वे दुनियाँ के किसी भी क्षेत्र मे छुपे हों, हमला कर अपने दुश्मनों को नेस्तनाबूद कर दिया। विदित हो कि ईरानी राष्ट्रपति रईसी जिस टाइप 412 हेलिकोप्टर मे यात्रा कर रहे थे वह कभी अमेरिका से खरीदा गया था, जब ईरान के संबंध अमेरिका से अच्छे थे। ईरान द्वारा अमेरिका की चेतावनी के बावजूद, इस्राइल पर इस दुस्साहसिक  हमले को भी इस हेलिकोप्टर दुर्घटना मे, सीआईए के हाथ होने के शंका जताई जा रही हैं, क्योंकि ये हेलिकोप्टर अमेरीकन यंत्रों और तकनीकि से सुसज्जित था। ईरान ने इस्राइल पर हमला कर दुनियाँ को ये जतलाने का प्रयास किया था कि वह इस्राइल सहित अमेरिका की भी परवाह किये बिना बेखौफ हो इस्राइल पर हमला कर सकता है।  

फिलिस्तीन, सीरिया, ईरान या इराक पर हुए आक्रमण इस बात को दर्शाती हैं कि अमेरिका की अनदेखी कर कोई भी देश अब भी दुनियाँ मे अमेरिका के  वर्चस्व को चुनौती नहीं दे सकता। ईरानी राष्ट्रपति के हेलिकोप्टर दुर्घटना मे हुई मौत से यदि ये सिद्ध हो जाता हैं कि इस घटना मे इस्राइली खुफिया एजेंसी मोसाद या अमेरीकन खुफिया एजेंसी सीआईए संलिप्त है तो मिडिल ईस्ट के खड़ी देशों के जबर्दस्त प्रीतिक्रिया संभावित होगी और इसके दुनियाँ पर क्या दुष्परिणाम होंगे कहना कठिन है? लेकिन ये निश्चित है कि दुनियाँ अभी उक्रेन-रूस युद्ध और इस्राइल-फिलिस्तीन युद्ध से उबर भी नहीं पायी थी जो  मध्य पूर्व के देश इस्राइल -ईरान के बीच इस नयी चुनौती से जूझने मे अपनी शक्ति और ऊर्जा व्यय करेगा। विश्व राजनीति मे इस्राइल-ईरान सहित दुनियाँ के अन्य देश भी, कहीं प्रतिशोध, प्रतिहिंसा की आग मे सुलग कर दुनियाँ को अपनी चपेट मे न ले लें, इस आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता।         

विजय सहगल

शनिवार, 18 मई 2024

"दाना पानी"

 

"दाना पानी"









आमतौर पर सनातनी हिन्दू परंपरा मे पशु पक्षियों के सहित गाय की सेवा को एक आवश्यक धार्मिक कृत मान एक अति महत्वपूर्ण और पुण्य का काम माना गया हैं। जिसके संस्कार हर भारतीय को बचपन से ही अपने परिवारों से प्राप्त हो जाते हैं।   मध्यम वर्गीय शहरों, छोटे गाँव और कस्बों के प्रायः  हर घर मे आज भी खाना बनाते समय पहली रोटी गाय के लिए बनाकर उसे खिलाने की परंपरा है।  हमारे घर मे बचपन से मै देखता आया था कि इसी रिवाज का पालन मेरी माँ भी खाना पकाते समय पहली रोटी गाय के लिए बना कर निकालती थी और मेरी धर्मपत्नी भी इसी अनुक्रम को बनाए रखते हुए गाय की रोटी  के साथ फल और सब्जी आदि के छिल्के या बच रहे अन्य खाद्य पदार्थों को एकत्रित कर गाय को खिलाने का क्रम बनाए रखा हैं जिसका जिक्र मैंने 29 मई 2021 के अपने ब्लॉग "सकरन" ( https://sahgalvk.blogspot.com/2021/05/blog-post_29.html )  मे किया था। गर्मी के मौसम मे बाज़ारों, बस स्टैंड और रेल्वे स्टेशन पर आज भी, लोगो को मटके का ठंडा पानी पिलाने के अलावा पशुओं-पक्षियों को दाना डालना और मिट्टी के  सकोरों मे पानी भरकर रखना प्रायः हर भारतीय परिवारों के संस्कारों मे  एक परंपरा के रूप मे आज भी विध्यमान हैं।    

ग्वालियर मे यूं तो गर्मी की शुरुआत फरवरी मार्च से ही हो जाती है और ग्रीष्म ऋतु का ये सिलसिला सितम्बर-अक्टूबर तक चलता हैं अर्थात साल के 8-9 माह यहाँ तीव्र उष्ण का मौसम रहता हैं। अप्रैल के एक दिन जब मै अपने पड़ौसी और मित्र संजय पांडे के साथ खाली समय मे गप्प बाजी मे बैठा था। गायों के लिए एक सीमेंट की टंकी का विचार मन मे अचानक ही आया और चर्चा हुई। तब संजय ने दाना पानी संस्था का जिक्र किया। संजय, इस संस्था के प्रमुख श्री राज चड्ढा जी से परिचित थे। संजय ने बताया कि चड्ढा जी के फ़ेस बुक पेज पर यदि टंकी की डिमांड रखे तो वे कुछ दिनों मे टंकी भेज देते हैं। हाथ कंगन को आरसी क्या? मैंने तुरंत ही अपने मोबाइल से फ़ेस बुक पर न केवल राज चड्ढा जी (Raj Chaddha) के नाम को फ़ेस बुक पर सर्च कर फ्रेंड रेक़ुएस्ट भेजी बल्कि लगे हाथ एक सीमेंट टंकी की मांग पशु-पक्षियों को पीने के पानी की व्यवस्था हेतु कर दी। नियमानुसार मैंने अपना नाम, पता, मोबाइल नंबर भी कमेंट बॉक्स मे लिख भेजा।  मुझे मोबाइल पर सुनिश्चित करते हुए चड्ढा जी ने उस ऑटो वाले को भाड़े के रूप मे 100 रुपए का भुगतान करने का निर्देश दिया जो टंकी मेरे घर तक पहुंचेगा।     जान कर प्रसन्नता हुई कि 2-3 दिन बाद 13 अप्रैल 2024 को  दोपहर लगभग 4 बजे मेरे घर के बाहर ऑटो वाला मुझे आवाज दे रहा था। जिसमे एक सीमेंट की टंकी रक्खी थी। ऑटो वाले ने बताया कि वह काफी देर से आपका मोबाइल ट्राइ कर रहा है जो नो रिप्लाइ आ रहा हैं। दरअसल सेवानिवृत्ति के बाद अपने दैनिक क्रम मे आराम करने के कारण दोपहर 3.30 से 5.00-5.15 तक मोबाइल को डू नोट डिस्टर्ब मोड पर रख कर आराम करता हूँ। जब मोबाइल देखा तो 7 मिस कॉल पड़े हुए थे। मुझे बहुत ही आत्मग्लानि और खेद हुआ क्योंकि मेरी लापरवाही के कारण ऑटो वाले को  अप्रैल की कड़ी धूप मे परेशान होना पड़ा। मैंने उस ऑटो ड्राईवर से अपनी गलती के लिए अनेक बार क्षमा प्रार्थना की और सौजन्य वश ठंडे पानी के लिये पूंछा लेकिन शायद परेशानी और भावावेश के कारण उसने पानी के लिये माना कर दिया। समाज के वंचित वर्ग द्वारा हम जैसे तथाकथित गणमान्य व्यक्तियों  को उनकी गलती के बावजूद कुछ शिकायत न कर सकने  के संकोच के कारण ऐसा व्यवहार स्वाभाविक ही था। ऑटो ड्राईवर ने टंकी के साथ हमारी फोटो लेने की औपचारिकता के बाद, हमारी कृतज्ञाता  स्वीकार किये बिना और भाड़े के 100 रुपए लिए बगैर  चले जाना अनजाने मे हुई  मेरी  अदयालुता और लापरवाही को स्पष्ट दर्शा रहा था।

ग्वालियर मे प्रायः हर मुहल्ले, हर क्षेत्र और अन्य सार्वजनिक जगहों पर सड़कों के किनारे पशुओं के लिए सीमेंट की टंकी मे पानी भरा दिखलाई पड़ जाएगा। 40-50 लीटर की इन सीमेंट टंकियों मे लाल या हरे रंग के बड़े-बड़े शब्दों मे "दाना-पानी" लिखा दिखाई देगा साथ ही संस्थान का नाम जिसने पशुओं के लिये इस टंकी के निर्माण मे आर्थिक  सहयोग प्रदान  किया।   इन पानी की टंकियों से जब निरीह मूक पशु ग्वालियर की भीषण गर्मी मे जहां तापमान 48-49 डिग्री तक पहुँच जाता हो, पानी पीते हुए देखता हूँ तो मन को बड़ा सुकून मिलता है तो अंदाज़ा लगाया जा जा सकता हैं कि उस मूक पशु की आत्मा को कितनी तृप्ति मिली होगी। यूं तो पानी पीने वाले पशुओं श्वान, भैंस और गाड़ीयों मे जोते  जा रहे घोड़े और बैल हैं पर  बहुतायत संख्या गाय, बैलों की ही होती है जो प्रायः हर गली मुहल्ले मे विचरते नज़र आ जाएंगे। निश्चित तौर पर दाना-पानी संस्था इस पुनीत कार्य मे सीमेंट टंकी देकर परोक्ष रूप से  कार्य कर रही है लेकिन जिन व्यक्तियों ने इन सीमेंट टंकियों को अपने  घरों या व्यापारिक संस्थानों द्वारा इन टंकियों को रखवाया है और इन टंकियों मे नित्य साफ सफाई कर जल भरते है,  वे सेवा भावी व्यक्ति भी इस पवित्र काम मे प्रत्यक्ष रूप से साधुवाद  के पात्र हैं।  

इस घटनाक्रम के बाद मै श्री राज चड्ढा जी के संपर्क मे आया जो मार्च अप्रैल से लेकर जून जुलाई के लगभग 4 महीनों के हर रविवार को अपनी संस्था दाना-पानी के माध्यम से भिन्न भिन्न जगह मिट्टी के संकोरे और उनमे पक्षियों के दाने का एक पैकेट रख लोगो को मुफ्त मे वितरित करते हुए पक्षियों और पर्यावरण को बचाने का संदेश देते हैं। उनके इस कार्य मे ग्वालियर के प्रबुद्ध महिलाएं और पुरुष सहयोग करते है। 18 अप्रैल को मेरे निवास के नजदीक स्थित शारदा बाल ग्राम मे जब मुझे उनके इस कार्यक्रम की जानकारी हुई तो मै भी व्यक्तिगत रूप से उनसे मिला, उनके कार्यक्रम मे शामिल हुआ और उनके व उनके साथियों के इस पुनीत कार्य मे सहभागी होने पर सभी को अपने घर आमंत्रित किया। तब से ये सिलसिला लगातार जारी है, हर रविवार को मै भी एक कार्यकर्ता की तरह राज चड्ढा जी की दाना पानी संस्था मे सहभागी बन उनका सहयोगी और सदस्य बन गया। इस संस्था के विषय मे कुछ और अधिक जानकारी की चाह मे 12 मई 2024 को मैंने परिवार सहित उनके न्यू सिटी सेंटर स्थित आवास पर मिलने का निश्चय किया।

1947 मे ग्वालियर आकार वसने एवं स्वतंत्र भारत के विभाजन की विभीषिका से पीढ़ित चड्ढा जी ने बताया कि पर्यावरण और पशु पक्षियों को बचाने की इस मुहिम को उन्होने 22 फरवरी 20212 को अपने सीमित साधनों से शुरू किया जिसमे उनकी अर्धांग्नि अदरणीय भाभी जी का भी महत्वपूर्ण सहयोग रहा, दरअसल इस दिन उनकी शादी की सालगिरह थी। तब से दाना पानी संस्था ने इस सेवभावी कार्य को आज इस ऊंचाई पर पहुंचाया कि अब तक वे लगभग दो लाख मिट्टी के संकोरों और पक्षियों के दानों के पैकेटों  का वितरण लोगो के बीच कर चुके हैं। पशुओं के लिए लगभग  चार हजार सीमेंट टंकियों का वितरण भी अबतक किया जा चुका है, हर टंकी की लागत  लगभग चार से पाँच सौ रुपए के बीच बैठती है। हर रोज़ नयी नयी जगहों से टंकी की मांग लगातार आ रही हैं। कोई भी सामाजिक और सार्वजनिक कार्य धनाभाव के बिना नहीं किया जा सकता, जब मैंने इस नेक और पवित्र कार्य हेतु धन के स्रोत के बारे मे पूंछा तो चड्ढा जी ने बताया कि नेक नियत और ईमानदारी से किए गये कार्यों मे मुझे धन का अभाव कभी महसूस  नहीं हुआ। लोगो का आर्थिक सहयोग इतना अधिक है कि कई बार उन्हे इसके लिए सविनय मना करना पड़ा। ऐसे कई प्रतिष्ठान, संस्थाएं और व्यक्तियों द्वारा इस सद्कार्य के लिए सहयोग कर इसे लगातार जारी रखने का आग्रह लगातार श्री चड्ढा जी से किया जाता रहा हैं।

बचपन से संघ की पृष्ठभूमि से जुड़े चड्ढा जी, पूर्व प्रधानमंत्री स्व॰ श्री अटल बिहारी बाजपेयी के करीबी मित्रों मे से रहे हैं एवं  ग्वालियर की अनेक सामाजिक संस्थाओं से जुड़े हैं। इसलिए जब आप कभी ग्वालियर आयें और मिट्टी के संकोरे और सीमेंट की टंकियों मे भरे पानी को पीते हुए किसी पशु को देंखे तो पशु, पक्षियों और पर्यावरण की संरक्षा के लिये समर्पित  दना-पानी संस्था और उनके सेवभावी सदस्यों का स्मरण अवश्य करना।

विजय सहगल            

शनिवार, 11 मई 2024

इत्रदान (मातृ दिवस पर विशेष)

 

आज मातृ दिवस पर पुनः अम्माँ का स्मरण हो आना स्वाभाविक हैं। आज अम्माँ को इस नाश्वर संसार से विदा हुए लगभग एक वर्ष होने को है लेकिन शायद ही कोई दिन बीता हो जब ऐसा लगता, काश अम्माँ का साथ कुछ और दिन मिलता!! कुछ और कदम साथ चलते!!, कुछ और बात करते!! लेकिन ऐसा हो न सका!!!!

संकट तो हर किसी की ज़िंदगी के एक आवश्यक कारक रहे है पर माँ ने हम  बच्चों को इन संकटों से संघर्ष कर उबरने की जो शक्ति दी वो अमूल्य थी। माँ तुझे शत-शत नमन्। आज का आलेख अपनी माँ को समर्पित करते हुए उन्हे नमन करते हैं।              

 







"इत्रदान"

घर मे एक सुंदर, चाँदी का इत्रदान था। जिसे साल मे एक बार दिवाली के दिन लक्ष्मी पूजा मे तो अवश्य ही देखते थे। इत्र दान हमारे परिवार की विरासत का एक नायाब अनोखा नमूना जो था। लगभाग 500 ग्राम शुद्ध चाँदी की चमचमाती गोल प्लेट के मध्य मे एक छोटी  नक्काशीदार कटोरी जिसके उपर मोर के आकार का ढक्कन लगा था जो कटोरी मे रक्खे इत्र की सुगंध को अपने अंदर समेटे रहता था। जैसे ही इत्रदान के ढक्कन को खोला जाता इत्र की गंध पूरे वातावरण को अपनी भीनी-भीनी खुशबू से महका देता था। चाँदी की प्लेट, इत्रदान के कटोरिनुमा पात्र और उसके ढक्कन मे इतनी बारीक चाँदी की नक्काशी की गयी थी, जो किसी भी देखने वाले का मन मोह लेती। गोल  प्लेट के चारों ओर हरे, लंबे मोतियों जिनकी संख्या सौ से ज्यादा होगी,  को चाँदी के तारों से इस तरह पिरो कर बांधा  गया था कि थोड़े से हिलने या  हवा के हल्के झोंके से उन मोतियों की आपस मे टकराहट से  उनमे सुरीले संगीत की स्वरलहरियाँ सुनाई देती थी। ऐसे ही हरे मोतियों की एक लड़ी चाँदी की कटोरी के चारों ओर भी लगाया गया था। मै बचपन मे दीवाली पूजन के समय  अपने घर पर इस इत्रदान और उसके मोतियों की झिलमिलाहट को घंटों निहारा करता था।

दीवाली पूजन के अलावा इत्रदान को किसी की शादी-विवाह बगैरह आदि के शुभ अवसरों पर ही तिजोड़ी से निकाला जाता था। जब कोई रिश्तेदार या कुटुंबीजन इत्र दान की प्रशंसा करते हुए अपने बच्चे की शादी-सगाई या लगुन आदि मे इत्रदान की मांग करता   तो माँ सहित परिवार के चेहरों पर एक अलग चमक और  खुशी दिखाई देती और इत्रदान को देने मे एक अलग ही सुख, चैन और आत्मिक खुशी  का अनुभव करते। उन दिनों शादी विवाह आदि मे अतिथितियों के  स्वागत की परंपरा उनके वस्त्रों पर इत्र लगा कर और  उनको फूलों की माला पहना कर की जाती थी।   जब चाँदी के इत्रदान से मेहमानों का स्वागत किया जाता तो वे न केवल इत्र की महक से अपितु चाँदी के मनोहारी इत्रदान को देख प्रसन्नता का अनुभव करते। ऐसे अवसरों पर इत्रदान सोने पे सुहागा का काम करता।  चाँदी के इत्रदान की बनावट थी ही इतनी सुंदर कि उसमे रखे इत्र से आगंतुकों  के स्वागत मे चार चाँद लग जाते।

माँ की बड़ी इच्छा थी के अपने बच्चों की शादी, सगाई आदि पर इत्रदान से अपने होने वाले रिशतेदारों का स्वागत करते लेकिन सभी भाई बहिन अभी उम्र इतने छोटे थे कि ऐसे अवसर आने मे अभी काफी वक्त था, इस कारण अपने कुटुंबजनों के बच्चों के आनंद कारज मे ही वो अपने बच्चों का सुख अनुभव करती। कुटुंब के, ऐसे ही परिवार की बेटी की शादी मे इत्रदान की मांग की गायी तो मना करने का सवाल ही न था। लगुन, सगाई के अलावा शादी मे बरातियों के स्वागत मे भी इत्रदान का भरपूर उपयोग किया गया, घर की शादी जो थी। शादी मे शामिल सभी मानदानों ने जहां एक ओर बारतियों के स्वागत की भूरि-भूरि प्रशंसा की वही इत्रदान की बड़ाई और सराहना मे कोई कंजूसी नहीं की। समधियाने से मिले ऐसे बड़प्पन और प्रशस्ति मिलना से जहां एक ओर परिवार के लोग खुश थे  वहीं दूसरी ओर,  विशेषकर इत्रदान की महिमगान ने इसकी सार्थकता और अम्माँ के आत्मसम्मान को कुछ और ऊंचा उठा दिया था।  शादी बड़ी धूम धाम से शादी हुई और देर रात तक चले इस आयोजन के बाद फेरे मे शामिल कुछ लोगो के अलावा  घर के सभी लोग थक हार कर उनींदे हो जिसको जहां जगह मिली एक-एक कर निंद्रा देवी के आगोश मे सो गए।    

शादी की इस आपा धापी मे न तो माँ को इत्रदान बापस लेने की  याद रही  और न ही रिश्तेदार ने उसे बापस करने का जिक्र किया। दरअसल वे इत्रदान को बापस भी किस मुंह से करते क्योंकि उनके एक आवारा लड़के, जिसे हर तरह के नशे-पत्ते के शौक  ने अपनी गिरफ्त मे ले लिया था,  ने शादी के बाद उस इत्रदान को चुरा कर बाज़ार मे बेच जो दिया था। माँ तो कुछ महीनों तक इत्रदान की इस घटना को भूल चुकी थी और रिश्तेदार  लंबे समय तक इत्रदान की इस घटना को दबाकर भुला देने मे ही भलाई मान रहे थे, पर अचानक एक दिन माँ को न जाने अपने परिवार की इस अनोखी विरासत रूपी इत्रदान की याद हो आई, बगैर एक क्षण गवाएं उन्होने अपने रिश्तेदार से इत्रदान बापस न करने का उलाहना दिया।

अब क्या था, काटो तो खून नहीं, संबंधी के स्याह चेहरे का रंग उड़ा हुआ था। न नुकुर की कोई गुंजाइस  न थी। बेटे की आवारागर्दी ने उन्हे एक ऐसे संकट मे डाल दिया था। लज्जा और शर्म के मारे उनसे कोई जवाब देते न बना। अति मूल्यवान इत्रदान को उस निर्लज्ज ने कौड़ियों के भाव बेंच कर हमारे घर की उस अमूल्य धरोहर को ही नहीं बेंचा अपितु हमारी माँ के सपनों को भी तार-तार कर चकनाचूर कर दिया। माँ ने अपनी सारी ज़िंदगी बहुत संघर्ष किया था अपने घर की मूल्यवान वस्तु का इस तरह छीना जाने से उन्हे लंबे समय तक कष्ट देता रहा, जिसकी चर्चा वे गाहे-बगाहे करती रहीं।

मै जनता हूँ माँ ने अपने बच्चों की खुशी के  लिये जो संपने सँजोएँ थे वे उस दिन काँच के टुकड़ों की तरह चूर-चूर हुए होंगे? लेकिन माँ ने, इत्रदान से परे  हम बच्चों  के भविष्य के लिये जो नये-नये सपने गढ़े! वे उस इत्रदान के सपनों से कहीं बहुत आगे, और अच्छे, कुछ  और बड़े थे। "बीती   ताह विसार दे, आगे की सुधि लेय" की नीति सिद्धान्त पर चलते दिवाली वाले दिन न केवल उन्हे अपितु मुझे भी उस इत्रदान की याद हो आती और मै अपनी यादों के अताह सागर मे डुबकी लगाकर आज भी हिलोरों के बीच संघर्ष करता हुआ किनारे आने की नाकामयाब कोशिश करता हूँ।

विजय सहगल

ताडबंद हनुमान मंदिर, सिकंदरबाद

  

"श्री ताड़बंद वीरांजनेय स्वामी मंदिर, हैदराबाद"








पुराने हैदराबाद स्थित सिकंदरबाद स्थित सड़क के ठीक किनारे श्वेत रंग के  दक्षिण भारतीय शैली मे भगवान वीरांजनेय स्वामी मंदिर का विशाल प्रवेश द्वार स्वतः ही भक्तों का ध्यानाकर्षित करता हैं। मंदिर के बड़े दरवाजे और उनके दोनों ओर द्वारपालों की प्रतिमा हर आने वाले हनुमान भक्त का स्वागत करती प्रतीत होती हैं। दरवाजों से जैसे ही हम लोगो ने मंदिर मे प्रवेश किया दूर एक छोटे से मंडप मे भगवान  वीरांजनेय स्वामी के दूरस्थ अद्भुद दर्शन होते है। दर्शनार्थियों की छोटी सी लाइन के कारण मै अपनी वारी की प्रतीक्षा करने लगा। हम उत्तर भारतीय हाथ जोड़ सिर झुका कर भगवान की आराधना के  विपरीत दक्षिण भारत के लोग किसी भी मंदिर मे सबसे पहले दोनों हाथो को क्रॉस करते हुए कानों पर उँगलियों लगा कर कुछ हल्का झुक कर प्रणाम की मुद्रा मे ईश्वर आराधन करते हैं। आशय दोनों का ही एक हैं कि हे परमेश्वर हम आपके श्री चरणों मे झुक कर आपको नमन करते हैं। आप ही इस जगत के स्वामी और पालक हैं। आपको नमन, बारम्बार नमन हो!! कुछ लोगो की ऐसी मान्यता है कि ये रामायण काल का वही सिद्ध और पवित्र स्थान है जहां भगवान श्रीराम ने ताड़ के वृक्षो की ओट मे सुग्रीब के भाई  बाली का वध कर सुग्रीब को उसका छीना गया राज्य बापस दिलाया था।        

मंदिर परिसर के मध्य मे स्थित एक छोटे से पहाड़  मे भगवान वीर हनुमान की स्वयंभू विग्रह के साथ साथ श्री विनायक की भी स्वयंभू प्रतिमा मौजूद हैं। यह अपनी तरह का एक मात्र मंदिर हैं जहां एक ही चट्टान पर भगवान वीरांजनेय और श्री विनायक भगवान की स्वयंभू प्रतिमाएँ एक साथ मौजूद हैं जहां हजारों की संख्या भक्तगण अपनी मनोकामनाओं को पूरा करने हेतु भगवान से आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। जिस मंदिर मे  भगवान राम भक्त, राम दूत हनुमान मौजूद हों वहाँ भगवान श्री राम की उपस्थिती न हो ऐसा संभव नहीं। परिसर मे ही भगवान श्रीराम माता सीता और श्री लक्ष्मण जी का सुंदर विग्रहों का  मंदिर भी स्थापित किया गया हैं। मंदिर परिसर मे भगवान शिव, श्री गणेश, देवी पार्वती, भगवान विष्णु और सूर्य देव पंचानन के रूप मे स्थापित किए गये हैं। नवग्रहों के साथ नागों के स्वामी नागेन्द्र भी इसी परिसर मे स्थापित किए हैं। एक सबसे विलक्षण और अद्भुद चाँदी से जड़ित उष्ट्र अर्थात ऊंट की प्रतिमा को देख आश्चर्य हुआ जो मंदिर परिसर के ठीक वीरांजनेय, हनुमान की प्रतिमा के दूसरे सिरे पर स्थापित थी। ऐसा बताया गया कि वीरांजनेय स्वामी का वाहन ऊंट हैं। जिनके दर्शन बड़े ही मंगलकारी और कल्याणकारी हैं। मैंने ऊंट को  वीरांजनेय भगवान हनुमान के वाहन के रूप मे पहली वार देखा। ऊंट के पीछे चाँदी से जड़ित धव्जस्तम्भ भी देखने को मिला जो दक्षिण भारत के प्रायः हर देवालयों की पहचान है। मंदिर मंडप की परिक्रमा के दौरान मैंने देखा जिस चट्टान पर स्वयंभू वीरांजनेय स्वामी और विनायक श्रीगणेश की प्रतिमाएं हैं चट्टान को पिछला हिस्सा उसके मूल रूप मे किसी पहाड़ी की चोटी के रूप मे स्पष्ट  दिखाई दे रहा था। इसे ईश्वर प्रदत्त किसी बरदान के रूप मे ही लिया जाना चाहिये कि पहाड़ी चट्टान के एक तरफ श्री हनुमान और श्री विनायक भगवान के  प्रकृतिक रूप के दर्शन होते हैं और वही दूसरी ओर चट्टान अपने साधारण रूप मे स्थित है। 

मंदिर परिसर के पीछे से जैसे ही बाहर आते हैं भगवान का प्रसाद नमकीन चावल के रूप मे सभी श्रद्धालुओं को वितरित किया जा रहा था। घर से निकले हुए भी 3 घंटे लगभग हो चुके थे स्वादिष्ट प्रसाद को खाकर एक अलग ही तरह का संतोष और तृप्ति का अनुभव हुआ। मंदिर के बाहर मंदिर समिति का कार्यालय और श्रद्धालुओं को रुकने के लिये कमरे बनाये गये हैं। मुझे बताया गया कि कुछ विशेष आयोजनों और सबरीमाला जाने वाले श्रद्धालुओं को 40 दिन के विशेष प्रवास की व्यवस्था भी दक्षिण भारत के हर देवालयों की तरह यहाँ भी होती हैं जिसका विवरण मैंने 30 दिसम्बर 2023 को अपने ब्लॉग https://sahgalvk.blogspot.com/2023/12/blog-post_30.html मे किया था।

हैदराबाद मे  क्रय किये जाने वाला हर दो पहिया या चार पहिया नया  वाहन को हिन्दू धर्मावलंबी ताड़बंद श्री वीरांजनेय स्वामी के मंदिर मे वाहन की विधिवत पूजा अर्चना कराने हेतु आते हैं। 18 जनवरी को भी कुछ नये वाहनों का पूजन मंदिर के पुजारी करा रहे थे। प्रायः मंगलवार या अन्य विशेष पर्वों और त्योहारों पर इन वाहनों की संख्या सैकड़ों मे होती हैं। व्यापारी या उधयोगपति भी बड़े बड़े कमर्शियल वाहनों की पूजा को लाते हैं। ऐसी मान्यता हैं कि ईश्वर के स्नेह आशीर्वाद से किसी दुर्घटना आदि से भगवान हमारी रक्षा करते हैं। प्रायः हर नया वाहन अपने आप ही दिखलाई दे जाता हैं, वाहन की  नंबर प्लेट तो होने का सवाल ही नहीं होता! पर एक पुराने से वाहन और जिस पर वाहन का नंबर पहले से ही था, को  भी पूजन की लाइन मे लगा देख मैंने जिज्ञासावश वाहन स्वामी से पुराने वाहन को पूजा मे लाने का प्रयोजन पूंछा? उसने कुछ संकोच के साथ बताया कि वाहन की सर्विस कराने के बाद लाया हूँ। मेरे बात चीत के दौरान मेरे मित्र गणेश सुब्रमनियम मुझे लगातार घूरे चले जा रहे थे। बातचीत के पश्चात उन्होने बताया कुछ वाहन स्वामी जब पुराना वाहन खरीदते है तो भी वे वीरांजेनेय स्वामी से आशीर्वाद लेने हेतु तथा पिछले वाहन स्वामी की त्रुटियों के प्रयाश्चित किया जा सके।   पुराने वाहनों के संकट   निवारण हेतु भी लोग यहाँ मंदिर मे पूजा हेतु आते हैं। मुझे अपने आप पर बड़ा क्रोध और आत्मग्लानि का अनुभव हुआ कि क्यों कर मेरे मन मे ऐसा विचार नहीं आया। अब मुझे भी उस व्यक्ति द्वारा उत्तर देते समय असमंजस और संकोच का कारण समझ आया। मैंने काफी देर तक अपराधबोध से ग्रसित हो अपने आप को धिक्कारते हुए मन ही मन उस व्यक्ति से अनजाने मे हुई त्रुटि के लिये खेद व्यक्त किया और ईश्वर से प्रार्थना की कि उस व्यक्ति के सभी मनोरथ पूर्ण करें।

श्रीवीरांजनेय स्वामी भगवान हनुमान को बारंबार नमन।

विजय सहगल            

सोमवार, 6 मई 2024

धन संपत्ति का कोंग्रेसी पुनर्वितरण एवं विरासत टैक्स

 

 

"धन संपत्ति का कोंग्रेसी पुनर्वितरण एवं विरासत टैक्स"




इन दिनों भारतीय राजनीति के चुनावी वर्ष 2024 मे हर व्यक्ति की संपत्ति का एक्सरे कर संपत्ति, धन और स्वर्णाभूषणों का पुनर्वितरण जैसी क्रांतकारी कदम और  "विरासत टैक्स" जैसे मुद्दों  की चर्चा ज़ोरों पर है। 7 अप्रैल 2024 को कॉंग्रेस के युवा नेता राहुल गांधी ने हैदराबाद की एक चुनावी रैली मे देश की संपत्ति और धन के पुनर्वितरण हेतु अपनी नीति और नियत को स्पष्ट करते हुए कहा कि:-

"सत्ता मे आने पर "हम  देश का एक्सरे कर देंगे, दूध का दूध, पानी का पानी हो जायेगा", "अल्पसंख्यकों को पता चल जायेगा की इस देश मे उनकी भागीदारी कितनी है"। "उसके बाद हम देश का फ़ाइनेंशियल और इंस्टीट्यूटशनल सर्वे करेंगे"। "ये पता लगायेंगे कि हिंदुस्तान का धन किसके हाथ मे है"। "इस ऐतिहासिक कदम के बाद के बाद हम क्रांतिकारी काम शुरू करेंगे"!! "जो आपका हक बनता है वो आपके लिए आपको देने का काम करेंगे।"

राहुल गांधी के इस ब्यान के बाद विवाद तो होना ही था। क्या एक वर्ग के लोगो से संपत्ति को छीन कर दूसरे वर्ग को देने की नीति से समाज मे अशांति, उग्रता और विक्षोभ नहीं फैलायेगी? खुद प्रधान मंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने अपनी चुनावी सभाओं मे कॉंग्रेस की इस "माओवादी" सोच के विरुद्ध देश के लोगो को आगाह किया। मोदी ने  राहुल गांधी की एक्सरे वाली इस सोच को विस्तृत व्याख्या करते हुए कॉंग्रेस द्वारा लोगों के घर, कृषि भूमि, बैंक जमा, स्वर्ण आभूषणों के साथ महिलाओं के स्त्रीधन और मंगल सूत्र तक पर काँग्रेस की गिद्ध दृष्टि के विरुद्ध सचेत किया। क्या कॉंग्रेस की इस तरह की सोच से देश के आर्थिक विकास के दृष्टिकोण को हतोत्साहित करने को बल नहीं मिलेगा? क्या राहुल गांधी की इस तरह की माओबादी सोच से लोगों मे अकर्मण्यता, निष्क्रियता,  आलसी और अलालीपन की मानसिकता  को बढ़ावा नहीं मिलेगा? एक ओर, जब बगैर कुछ किये ही लोगो को दूसरों की संपत्ति मे हिस्सा मिलेगा तो वे क्यों कर नौकरी, सेवा, व्यापार, कृषि या   औध्योगिक उत्पादन  के लिये श्रम करेंगे, वहीं दूसरी ओर उध्योग्पति और पूंजीपति क्यों कर व्यापार या उध्योग मे अपने धन और पूंजी को निवेशित करेंगे? जबकि उनकी उनकी आय का एक बहुत बड़ा हिस्सा संपत्ति के पुनर्वितरण या टैक्स के रूप मे सरकार ले लेगी? इस मार्क्सवादी और लेनिन वादी सोच ने ही रूस सहित सोवियत संघ और विश्व का बड़ा अहित किया।                 

भाजपा ने कॉंग्रेस पर  विरासत टैक्स  की संकल्पना को अपना  चुनावी एजेंडा के तौर पर  अपनाने का आरोप लगाया हैं। चुनावी फायदे के लिये विरासत टैक्स का ये  सगूफ़ा  इसलिये छोड़ा गया क्योंकि कॉंग्रेस और गांधी परिवार के 82 वर्षीय कुलगुरु और इंडियन ओवरसीज कॉंग्रेस के चेयरमेन, सेम पित्रोदा (सत्यनारायण गंगाराम पित्रोदा) ने 26 अप्रैल को अमेरिका मे विरासत टैक्स की तर्ज़ पर  ये विचार प्रकट किये  कि अमेरिका सहित अन्य देशों मे लगने वाले विरासत टैक्स को भारत मे भी लागू किया जाय, जिससे सरकार को एक बड़ी धनराशि टैक्स के रूप मे प्राप्त होगी, पर कॉंग्रेस ने तुरंत ही सेम पित्रोदा के "विरासत टैक्स" वाले  विचार से अपने आपको अलग करते हुए, विरासत टैक्स को सेम पित्रोदा का अपना निजी विचार बतला कर, उनसे अपना पल्ला झाड़ते हुए बचने का प्रयास किया।

विरासत  टैक्स के तहत आप या आपके पूर्वजों द्वारा जो संपत्ति या धन आपको प्राप्त हुआ या जो जायदाद या धन आप अपनी संतानों के लिये छोड़ जायेंगे उसमे 45% ही आपको या आपकी संतानों को प्राप्त होगा शेष 55% धन विरासत टैक्स के रूप मे आप से छीन लिया जायेगा। भाजपा के वरिष्ठ नेता और प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने अपनी चुनावी सभाओं मे ये भी आरोप लगाया कि 1953 से  जारी इस विरासत टैक्स को तत्कालीन कॉंग्रेस सरकार के प्रधानमंत्री स्व॰ राजीव गांधी ने अपने कार्यकाल मे सन 1985 मे सिर्फ  इसलिये समाप्त किया था क्योंकि वे अपनी माँ स्व॰ श्रीमती इन्दिरा गांधी से विरासत मे मिले धन,  संपत्ति और स्वर्ण आभूषणों पर लगने वाले टैक्स को देने से  बचना चाहते थे!! उन दिनों विरासत टैक्स की दर 85% थी।  सवाल उठना लाज़मी हैं कि श्री राजीव गांधी द्वारा 1985 मे इस विरासत टैक्स को बापस लेने के पूर्व 1953 से जिन लोगों से विरासत टैक्स की बसूली की गयी क्या उनके साथ अन्याय नहीं हुआ? और जब 1985 मे इस विरासत टैक्स को समाप्त किया जा चुका है तो आज काँग्रेस के राजर्षि सेम पित्रोदा से प्रभावित  राहुल गांधी, संपत्ति के पुनर्वितरण को अपने चुनावी घोषणा पत्र 2024 मे  इस टैक्स को शुरू करने क्या आवश्यकता हो आयी?

ये बात सही है कि संपत्ति और धन के पुनर्वितरण नीति का काँग्रेस के घोषणा पत्र मे उल्लेख नहीं हैं इसिलिये काँग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खडगे, जय राम रमेश सहित सारे काँग्रेस दल के नेता मोदी को झूठा बताते हुए चुनौती दे रहे कि वह बताएं कि काँग्रेस के घोषणा पत्र मे इसका उल्लेख कहाँ किया गया हैं? लेकिन ये बात भी उतनी ही सही हैं कि काँग्रेस के लोग बताएं कि मोदी ने कब 15 लाख रुपए देश के हर नागरिक को देने का वादा कब किया? या भाजपा द्वारा 400 सीटें लाने पर संविधान बदलने, आरक्षण समाप्त करने का कहाँ उल्लेख किया? कहावत हैं कि प्यार और युद्ध मे सब जायज हैं!! भाजपा को संविधान मे परिवर्तन करना होता तो अपने पिछले दो कार्यकाल मे भी ऐसा कर सकती थी? और जो संविधान संशोधन  हुए वे सारे निजी स्वार्थ से परे देश हित  मे लिये गये थे जिनमे अन्य दलों का सहयोग था फिर वो चाहे धारा 370 का समाप्त करना हो या लोक सभा और विधान सभाओं मे आरक्षण को पुनः दस वर्ष के बढ़ाना, वस्तु और सेवा कर (जीएसटी) को लागू करना, या लेह लद्दाख को केंद्र शासित करने की घोषणा जैसी मुख्य मुद्दे शामिल है। इसके विपरीत कॉंग्रेस ने कर्नाटक मे पिछड़े वर्ग, अनुसूचित जाति और अनुसूचित जन जाति के आरक्षण कोटे मे 4 प्रतिशत की कटौती कर ये कोटा मुस्लिमों के  लिये आरक्षित कर धर्म के आधार पर आरक्षण की शुरुआत की है जो संविधान की मूल भावना के विपरीत है। अब देश के नागरिकों को समझना होगा कि देश के संविधान के स्वरूप और भावना से कौन खिलवाड़ कर रहा है?   

जिस तरह कॉंग्रेस ने विरासत टैक्स पर सेम पित्रोडा के विचार से अपने आपको अलग कर लिया, क्या उसी तरह काँग्रेस मे हिम्मत हैं कि राहुल गांधी के संपत्ति और धन को अल्पसंख्यकों को वितरित करने के विचार से अपने आपको अलग कर सके? कदापि नहीं!! क्योंकि राहुल गांधी की  घोषणा ही कॉंग्रेस मे सर्वोच्च घोषणा होती है, जिसे कोई चुनौती नहीं दे सकता!! जो राहुल गांधी कहेंगे वही कॉंग्रेस के लिये ब्रह्मवाक्य होगा! फिर उसका उल्लेख कॉंग्रेस के घोषणा पत्र मे हो या न हो!! सवाल ये उठता है कि यदि कॉंग्रेस सत्ता मे आयी तब  राहुल गांधी की सोच और विचार के अनुसार एक वर्ग से एकत्रित संपत्ति और धन के बंटवारे का आधार क्या  होगा? महात्मा गांधी की मनसा के विरुद्ध  जिस कॉंग्रेस ने अपने स्वार्थ के लिये देश का बंटवारा स्वीकार कर लिया उससे एकत्रित धन के न्याय पूर्वक  बँटवारे की उम्मीद कैसे की जा सकती है?  जो एक विचारणीय प्रश्न है।

विजय सहगल