"ककन
मठ"
7 अप्रैल 2024 को मुझे अपने परिवार के साथ मध्य प्रदेश मे मुरैना जिले के सिंघोनिया कस्बे के पास स्थित प्राचीन मंदिर ककनमठ जाने के सौभाग्य प्राप्त हुआ। चंबल क्षेत्र मे पंद्रह -सोलह सौ साल पूर्व के इस प्राचीन मंदिरों की एक श्रंखला विध्यमान हैं जिसे ककन मठ नाम से जाना जाता है। ऐसा माना जाता हैं कि कच्छपघात राजा कीर्तिराज ने अपनी रानी ककनवती की इच्छानुरूप इस शिव मंदिर का निर्माण कराया था। इस अनोखे मंदिर की वास्तु गुर्जर प्रतिहार शैली पर निर्मित हैं। कुछ इतिहासकारों का मत हैं कि 115 फुट ऊंचे इस मंदिर को गुर्जर प्रतिहार शासकों ने 9वी-10वी सदी मे कराया था। स्थानीय लोगो के बीच ऐसी किवदंती भी है कि यह मंदिर शिव गणों अर्थात भूतों ने रातों रात इसका निर्माण कराया था और दिन होते ही इसे ऐसी ही अवस्था मे भूतों ने छोड़ दिया, इसलिए इस आधे-अधूरे मंदिर के भग्नावशेष वैसे ही हालत मे अपूर्ण निर्माण के संकेत देते हुए पड़े हैं। कुछ लोग इसे भूतों का मंदिर भी कह कर संबोधित करते हैं।। एक विशाल चबूतरे के ऊपर मंदिर का निर्माण किया गया हैं। चबूतरे पर निर्मित इस मंदिर की संरचना को देख ऐसा लगता हैं कि मंदिर के शिखर पर रक्खे विशालकाय पत्थर अब गिरे-तब गिरे!! ऐसे सैकड़ों नक्काशीदार और बगैर नक्काशी के सादा पत्थर मंदिर के मंडप के उपर दिखाई दे जाते हैं जो मंदिर की आंतरिक रचना को आकार देने के लिये लगाए गए थे और जिनके बाहरी आकार को देने के लिये नक्काशी दर पाषाण युक्त पत्थरों के लगाया जाना था पर अधूरे निर्माण के कारण ये अपूर्ण बनी स्थिति मे पड़े हैं। मंदिर के शिखर पर भी ऐसी सैकड़ों आधी अधूरी संरचनायेँ एक के उपर एक सहज ही दृष्टिगोचर हो जाती हैं और लगता हैं कि हवा के एक झोके से भरभरा कर गिर पड़ेंगी। लेकिन आज से पन्द्रा-सोलह सौ वर्ष पूर्व के अद्भुद वास्तु को देख कर हमे अपने पूर्वजों के इंजीन्यरिंग, तकनीकि ज्ञान कौशल पर फख्र करने के पर्याप्त और समुचित कारण होने पर गर्व हैं, किस तरह, कैसे और किस तकनीकि से उस काल मे विशाल काय पत्थरों को सैकड़ों फुट ऊंचे शिखर के निर्माण मे ऊपर चढ़ाया होगा? बगैर किसी धातु के उपयोग और सीमेंट जैसे किसी मसाले के बिना पत्थरों को एक के ऊपर एक वास्तुशास्त्र की अनोखी तकनीकि का उपयोग कर बनाया गया होगा जो जो अद्भुद और बेमिसाल है और प्रशंसनीय भी!! मंदिर के अर्धवृत्ताकार परिक्रमा पथ पर मंडप की दिशा मे यक्ष, किन्नर और अप्सराओं की सुंदर श्रंगार युक्त प्रतिमाएँ देखते ही बनती हैं। मंदिर के हजारों भग्नावशेष मंदिर परिसर मे चारों ओर बिखरे पड़े हैं। पुरातत्व विभाग इन पड़े हुए भग्नावशेष को पुनः प्रतिस्थापित करने का प्रयास कर रहा हैं। पूरा मंदिर मंडप और गर्भग्राह ज्योमिति का अद्भुद और उत्तम नमूना हैं। मंदिर परिसर के चारों ओर प्राकृतिक रूप से शांत और सुकून भरे माहौल मे मोरों, पशु पक्षियों का कलरव को आप महसूस कर सकते हैं। शनीचरी मंदिर के पास जंगलों मे नील गाय भी आपको दिखाई दे जाएगी।
इस आधे-अधूरे मंदिर को देखने पर ऐसा नहीं
लगता कि हजारों सालों से चौकोर पाषाण स्तंभो पर टिके इस मंदिर मे तमाम अंधी,
तूफानों और भूकंपों के बावजूद कदाचित ही
कोई पत्थर का टुकड़ा गिरा हो!! ये विशालकाय स्तंभो से युक्त मंदिर के प्रवेश मंडप
मे से होकर आप कुछ सीढ़ियाँ चढ़कर मंदिर के गर्भ गिरह मे प्रवेश करते हैं जहां भगवान
शिव की प्रतिमा शिवलिंग के रूप मे प्रतिष्ठित हैं। हमलोगो ने भी शिव अभिषेक कर शिव
की आराधना और अर्चना कर शिव को प्रणाम किया।
जहां एक ओर केंद्रीय पुरातत्व विभाग ने अपने
दायित्वों का निर्वहन ककनमठ के रखरखाव समुचित तरीके से किया हैं पर मध्य प्रदेश सरकार
के समुचित प्रचार-प्रसार
के अभाव एवं पर्यटन विभाग के ढुलमुल रवैये के कारण यहाँ आने वाले पर्यटकों की
संख्या सीमित हैं। इस लालफ़ीताशाही का उल्लेख मैंने अपने ब्लॉग दिनांक 11 दिसम्बर 2018
मे गढ़ कुंडार का किला (https://sahgalvk.blogspot.com/2018/12/blog-post_11.html)
मे भी किया था। तब से हालत ज्यों-के-त्यों बने हैं। यही कारण है कि इन प्राचीन विश्व धरोहर पर
सामान्य नागरिक सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं। इस अनुछुए पर्यटन स्थल ककनमठ के चारों ओर दूर दूर तक अभी सिर्फ खेत खलिहान
ही दिखाई देते हैं। यध्यपि पुरातत्व विभाग ने मंदिर परिसर के अंदर पर्याप्त साफ-सफाई को बनाए रक्खा है। पीने के
पानी की व्यवस्था के साथ पर्याप्त संख्या मे पेड़ों,
वृक्षों के माध्यम से हरियाली को बनाए रक्खा हैं। पर खान-पान की अन्य व्यवस्था का पूर्णतः
अभाव हैं। यहाँ जाने के पूर्व बेहतर हैं
आप अपने साथ चाय पानी की व्यवस्था स्वयं करके चले। मुरैना से सिङ्घोनिया तक बस का साधन मिल तो जाएगा पर पर
साधन सुगम और आराम दायक न होंगे। ग्वालियर से अपने स्वयं के दो पहिया या चार
पहिये वाहन से आसानी से पहुंचा जा सकता
हैं। ककनमठ के लिए कोई सार्वजनिक साधन
सीधा ग्वालियर से उपलब्ध नहीं है। अपने
वाहन से जाने पर ये एक लाभ और हैं कि
ककनमठ के साथ साथ आप पुरातत्व की दृष्टि से प्रसिद्ध अन्य चार स्थलों अर्थात
शनीचरी मंदिर, बटेश्वर मंदिर श्रंखला,
पढ़ावली और मितावली मे स्थित चौसठ योगिनी
मंदिर को भी देख सकते हैं जो एक दूसरे से 1-2 किमी की दूरी पर स्थित हैं और
पुरातत्व के दृष्टि से समृद्ध और महत्वपूर्ण हैं और जो अब तक मध्य प्रदेश मे
पर्यटन की दृष्टि से अनुछुए पर्यटन स्थल हैं। इन चारों स्थलों का वर्णन मैंने अपने
ब्लॉग दिनक 21, 22 और 24 नवम्बर 2019
को अपने चार ब्लॉगस (https://sahgalvk.blogspot.com/2019/11/blog-post_21.html)
मे किया था। ग्वालियर से इन स्थलों की
दूरी एक तरफ से लगभग 50-60 किमी होगी जिसे
आराम से एक दिन मे कवर किया जा सकता है। इन
सभी पाँच पर्यटन स्थल को घूमने का खर्च सिर्फ वाहन व्यय
के अलावा कोई अतिरिक्त व्यय नहीं हैं। इसलिए इसे,
सस्ता और सरल पर्यटन भ्रमण भी कहा जा सकता
हैं। अब तो सड़क भी अच्छी बन गयी है रास्ता
पक्का और सुगम है। लेकिन ध्यान रहे मई से लेकर जुलाई के मौसम मे इन पर्यटन स्थलों
पर जाने से बचे क्योंकि उन दिनों गर्मी का मौसम अपने चरम पर होता हैं और गरम लू के
थपेड़े आपकी यात्रा को बाधित कर आपको मुसीवत मे डाल सकते हैं। लेकिन ऐसा भी नहीं है
कि यदि आप लू से बचने के समुचित साधन अपना ले,
तो घूमने की इस चुनौती को स्वीकार किया जा सकता है।
विजय सहगल

























