शुक्रवार, 22 सितंबर 2023

श्रीनू

 

"मिस्टर श्रीनू"






12 सितम्बर 2023 को अपने हैदराबाद प्रवास की कालावधि मे  हैदराबाद विश्वविध्यालय और राष्ट्रीय डेयरी विकास निगम, के बीच स्थित, ओल्ड बॉम्बे रोड के किनारे, प्रातः भ्रमण के दौरान एक  स्ट्रीट फूड विक्रेता को देखा, जो बड़े जतन से टीवीएस एक्सएल100  मोपेड  के उपर अपनी अस्थाई दुकान पर स्वल्पाहार के रूप मे दक्षिण भारतीय व्यंजनों यथा इडली, बड़ा, पुंगलू, उत्तपम, के साथ गरम गरम सांभर, और तीन तरह की चटनी को  अपने ग्राहकों को बड़े ही सम्मान और समर्पण के साथ परोस रहा था। मैंने दक्षिण भारत मे प्रायः देखा है कि टीवीएस कंपनी की इस मोपेड़ को छोटे तवके के मजदूर, किसान और व्यापारी अपनी आवश्यकता के अनुरूप मोपेड मे परिवर्तन कर अपने उपयोग  मे लाते हैं। यहाँ भी इस नवयुवक ने  मोपेड़ के पीछे लगे लोहे की जाली के अंदर स्टील के छोटे बड़े वर्तनों मे विभिन्न स्नेक्स को ढक्कन से बंद कर रक्खा हुआ था ताकि सभी वस्तुए ताजी और गरम रह सके। यही नहीं उसने अपने इस अस्थाई स्टाल  पर वो सारी उपयोग मे आने वाली वस्तुओं को बड़े ही करीने और साफ सफाई के साथ रक्खी हुई थी जो एक आदर्श खाने की गुमटी  पर होना चाहिए। उसने अपनी मोपेड़ के सहारे एक बड़ी बैगनी छतरी लगाई हुए थी जो उसके खाने की वस्तुओं को धूप और  पेड़ों के उपर से आने वाली धूल और पत्तियों से बचा रही थी। व्यंजनों से निकालने वाली सुंदर  महक ने न चहते हुए भी मेरी भूख को बढ़ा दिया। उस नौजवान ने  जहां एक ओर पीने के पानी के लिए स्वच्छ आरओ वॉटर की बॉटल को एक किनारे रक्खा था वही दूसरी ओर काले जरीकेन मे हाथ धोने का पानी और कचरा एकत्रित करने के लिए एक डस्ट्बिन भी रक्खी हुई थी। कुल मिला का हरे भरे पेड़ों की छाँव मे ग्राहकों को स्वादिष्ट स्वल्पाहार के साथ प्रकृति के निकट होने का अहसास और फील, सोने पर सुहागा का काम कर रहा था।

मैं जैसे ही अपनी जिज्ञासा और उत्सुकता वश उस नौजवान के पास बात करने के लिए पहुंचा, उसने बड़ी तत्परता से पेड़ों के पत्तों की प्लेट हाथ मे लेते हुए हमारे ऑर्डर की प्रतीक्षा की। लेकिन जब हमने उससे सिर्फ उसके बारे मे बात करने की इच्छा व्यप्त की तो वह कुछ समझ न सका। मैंने भाषा के संवाद हीनता को महसूस कर अँग्रेजी मे नाम पूंछा तो उसने अपनी अनिभिज्ञता प्रकट करते हुए तेलगु मे कुछ कहा जो मै न समझ सका। इस सब के बावजूद  उस नौजवान के चेहरे उलझन या तनाव के भाव न होकर ग्राहक सेवा मे तत्पर एक व्यवसायी की  मुस्कान के भाव स्पष्ट देखे जा सकते थे। मेरी इस समस्या को वहीं खड़े एक युवक चंदु, जो वही नाश्ता कर रहा था ने तुरंत ही मेरे बिना किसी आग्रह के स्वयं ही दुभाषिए के रूप मे संवाद हीनता की समस्या को आसान कर दिया। छोटी सी गुमटी चला रहे लगभग 40 वर्षीय नवयुवक ने अपना नाम श्रीनु बताया। अपनी परंपरागत पढ़ाई को धनाभाव मे पूरी न कर पाने का दर्द उसके चेहरे पर जरूर था पर शासन या समाज से  बेरोजगारी की शिकायत से परे, उसने  ईमानदारी से  मेहनत, लगन और परिश्रम के साथ स्वल्पाहार के व्यापार करने का निश्चय किया। नवयुवक श्रीनू की  इस मुहिम मे उसकी पत्नी ने भी अपनी  माँ से परंपरागत रूप से मिली "पाक और रसोई कला" का उपयोग एक सहभागी के रूप मे किया। पिछले 12-13 वर्ष के कठिन श्रम और समर्पण से आज उसका व्यापार अच्छा चल रहा हैं। उसने बताया कि वह सारी वस्तुओं के समाप्त होने या 11.30 बजे तक, जो भी पहले हो अपना रेस्टुरेंट बंद कर देता है। मेरे पूंछने  पर उसने बताया कि व्यंजनों को बनाने के लिए उसकी पत्नी और वे  रात मे ही आवश्यक तैयारी कर प्रातः लगभग चार बजे उठ कर व्यंजन बनाने मे लग जाते है। श्रीनु प्रातः सात बजे के पूर्व विश्व विध्यालय रोड पर स्थित अपने ठिये (स्थान) पर अपनी दुकान सजा लेता है।

श्रीनु इस जगह से लगभग 6-7 किमी॰ दूर  अपने छोटे से घर मे अपनी पत्नी के साथ रहते हैं। उनके परिवार मे एक बेटा और एक बेटी है। बेटा कम्प्युटर विज्ञान विषय मे इंजीन्यरिंग मे तीसरे वर्ष की पढ़ाई कर रहा है और बेटी इंटर्मीडिएट क्लास मे अध्यनरत् है। जब मैंने महज जानकारी और जिज्ञासा के चलते उससे पूरे दिन की कमाई के बारे मे पूंछा तो उसने हाथ जोड़ कर आसमान की ओर देखते हुए ईश्वर के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करते हुए बड़े शर्मीले अंदाज़ मे संकोच के साथ बताया कि उसे  दिन भर मे  लगभग 1000/- - 1500/- के बीच मे आय हो जाती है जिसमे उसकी आवश्यकताओं की पूर्ति हो जाती है और कुछ थोड़ी बहुत बचत भी कर लेता  है।

श्रीनु के दक्षिण भारतीय व्यंजनों की मुक्तकंठ से प्रशंसा करते हुए जहां एक ओर श्रीनु से बिदा ली वहीं भाषा की संवाद हीनता का समाधान करने, हमारे दुभाषिए और अनुवादक श्री चंदु गिल्लेल्ला जो इंफ़ोसिस कंपनी हैदराबाद मे कार्यरत हैं को भी हार्दिक धन्यवाद कर उनके उज्ज्वल भविष्य की कामना की।

यहाँ इस बात का उल्लेख करना आवश्यक है कि जहां आज कल रोजगार के लिए सरकार और शासन को कोसने और बुरा भल्ला कहने का चलन चल पड़ा है वही श्रीनु जैसे नवयुवक बगैर उलाहने और शिकवे शिकायत के श्रीमद्भगवत गीता के कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन........ के भाव से स्वयं ही अपना रास्ता गढ़ते हुए देश के आर्थिक विकास मे अपना योगदान दे रहे है जो सरहनीय और प्रशंसनीय है।       

विजय सहगल
 
            

3 टिप्‍पणियां:

बेनामी ने कहा…

Good research at grassroots level to know the reality
Rajendr Singh Noida

बेनामी ने कहा…

*प्रस्तुत प्रसंग आत्मनिर्भर भारत अभियान का ज्वलंत उदाहरण है।बगैर वित्तीय सहायता के स्वरोजगार का आरंभ करना प्रशंसनीय व अनुकरणीय है।*
*दुःख की बात है कि हमारे देश में जरूरतमंद को अपेक्षाकृत सरकारी योजनाओं का लाभ कम ही मिल पाता है।और जिन्हे मिलता है वो इसका सदुपयोग नहीं करते।बैंकों से ऋण लेने की प्रक्रिया अब भी सरलीकृत नहीं हुई है। अशिक्षित,वंचित,दलित व गरीब की पहुँच से बैंक अब भी बाहर हैं।बैंकों से अपेक्षाएँ तो बहुत की जाती हैं लेकिन पर्याप्त स्टाफ उपलब्ध नहीं होता।*
*भारत विकसित राष्ट्र तभी बन सकता है जब जातिगत भेदभाव का समूल नाश हो परन्तु इसे जीवित रखने,इसको पालन-पोषण करने का कार्य सभी राजनीतिक दल भली-भांति कर रहे हैं।*
सुरेन्द्र सिंह कुशवाहा, ग्वालियर

बेनामी ने कहा…

कुशवाहा जी
आप सही कह रहे आज भी छोटे लोन के लिए लोगों को बैंक के कई चक्कर काटने पढ़ते हैं.
जाति व्यवस्था आज सबसे बड़ी बुराई के रूप मे है बैसे आज की नई पीढ़ी ने काफी हद तक समाप्त करने की शुरुआत कर दी है लेकिन आज हमे कमजोर वर्ग के साथ खड़े होने की आवश्यकता है.
हमेशा की तरह आपकी सुन्दर टिप्पणी हेतु आभार 🙏🙏