"श्री शैलम, श्री
मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग"
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सितम्बर 2023 का दिन मेरे लिये आंध्र प्रदेश के जिला कर्नूल मे स्थित सनातन सांस्कृति के पवित्र और महत्वपूर्ण 12
ज्योतिर्लिंग मे से एक, कृष्णा नदी के तट पर स्थापित श्री शैलम या श्री मल्लिकार्जुन शिव मंदिर के दर्शन जहां एक ओर प्रसन्नता और
आनंद देने वाला था वही दूसरी ओर भावनाओं के उद्वेग मे अपनी स्वर्गीय माँ के स्मरण के भी क्षण थे जिनको याद कर मन दुःख और
आत्मग्लानि से भरा था। पिछले वर्ष जब मुझे बेटे की आईएसबी,
मुहाली मे कैम्पस सलैक्शन के दौरान पहली पदस्थपना, हैदराबाद की
सूचना मिली तो मै बेहद खुश था क्योंकि मेरी दो ख्वाइश पूरी होने जा रही थीं। पहली
दिली तमन्ना तो 85-86 वर्षीय मेरी माँ की थी
कि उन्हे हैदराबाद के पास स्थित श्री शैलम ज्योतिर्लिंग के दर्शन कराऊँ। दूसरी, उनकी इस कामना मे मेरा भी एक हित निहित था कि मै अपनी माँ को इस तीर्थ
यात्रा के बहाने दिल्ली या ग्वालियर से हैदराबाद की हवाई यात्रा कराऊँ क्योंकि
उन्होने कभी हवाई यात्रा नहीं की थी, यध्यपि उन्होने कभी
हवाई यात्रा का इच्छा या उत्सुकता प्रकट नहीं की थी। परिस्थितियाँ पूर्णतः अनुकूल
थी पर हा!! दुर्भाग्य कि माँ की श्री शैलम
तीर्थ की यात्रा की अभिलाषा और उनको हवाई
यात्रा कराने की मेरी इच्छा को मै पूरा
करा पाता कि 18 जून 2023 के उस मनहूस दिन, काल के क्रूर
हाथों ने माँ को मुझ से छीन लिया, उनका देहावसान
हो गया!! मुझे इस बात का दुःख! और अफसोस! पूरे जीवन भर रहेगा कि मै अपनी माँ को, भगवान श्री शैलम तीर्थ
के दर्शन और हवाई यात्रा कराने की इच्छा को पूर्ण न करा सका। काश मैंने मैंने संत कबीर
की उन पंक्तियों के सार को गंभीरता से लिया होता:-
काल करे से आज करें, आज करे सो
अब।
पल मे प्रलय होएगी, बहुरि करेगा कब॥
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सितम्बर 2023 को जब मैंने परिवार सहित प्रातः छह बजे हैदराबाद से श्री शैलम
ज्योतिर्लिंग के दर्शन के लिये टैक्सी से प्रस्थान किया तो रह रह कर मुझे
"अम्माँ" की याद आती रही कि काश कुछ माह पूर्व श्री शैलम तीर्थ की
यात्रा का कार्यक्रम बनाया होता तो माँ आज हम लोगो के साथ तीर्थ दर्शन का लाभ ले रहीं
होती। पर होनी को टाला न जा सका!! हैदराबाद से लगभग सवा दो सौ किमी॰ की दूरी और
लगभग छह घंटे की यात्रा के बाद हम लोग 12.30 बजे श्री शैलम पहुँच गये। हैदराबाद
के शानदार आठ लेन के बाहरी रिंग रोड की 40 किमी॰ की
यात्रा के राष्ट्रीय राज मार्ग के पश्चात राज्य का दो लेन के राजमार्ग के
दोनों ओर दूर दूर तक सघन हरे पेड़ों से
आच्छादित वनों के
बीच श्री शैलम टाइगर अभ्यारण से होकर यात्रा
करना सुखद था। जगह जगह बाघ, लकड़बग्घा, तेंदुआ, हिरण, चीतल, चिंकारा के बड़े बड़े सूचना पट तो लगे मिले
लेकिन इनमे से किसी एक के रु-ब-रु दर्शन तो दूर उनकी परछाईं भी न दिखाई दी, हाँ बंदरों की उपस्थिती लगातार सड़क के दोनों ओर अवश्य नज़र आती रही। लगभग
70 किमी॰ पक्की डम्मर रोड पर जंगल के बीच
यात्रा प्रकृति और मानव के बीच सामंजस का अनुपम उदाहरण थी। तेलंगाना और आंध्रा की
सीमा को जोड़ता कृष्णा नदी पर बनाया गया पाताल गंगा
पन बिजली बांध का बिहंगम दृश्य मन को मोहने वाला था। यहाँ से अब श्री शैलम
महादेव मंदिर लगभग 25 किमी॰ शेष रह जाता है।
श्री
शैलम तीर्थ एक छोटे से पर व्यवस्थित तरीके से बसे कस्बे की तरह था। साफ सुथरा, चौड़ी पक्की
सड़के और जगह जगह सुंदर पूजा और उपहारों से सजी दुकाने,
खाने-पीने और चाय-कॉफी के दुकाने लगभग 24 घंटे खुली रहती है। अब सबसे पहले मंदिर
के दर्शन और ठहरने की व्यवस्था के बारे मे सूचना एकत्रित करना था क्योंकि 7-8 घंटे
की मानसिक और शारीरिक यात्रा के पश्चात कुछ आराम करने की भी इच्छा मन मे बलवती हो
रही थी। मंदिर परिसर के मुख्य गेट पर ही दर्शन से संबन्धित सूचना मिल गयी। भाषा की
थोड़ी समस्या के बावजूद मंदिर स्टाफ और सुरक्षा कर्मियों का रुख सहयोगात्मक था।
मंदिर मे होने वाले नित्य पूजा आरती, रुद्रभिषेक, काल सर्प योग पूजा आदि के शुल्क निर्धारित थे। निशुल्क दर्शन, शीघ्र
दर्शन, अतिशीघ्र दर्शन के अतिरिक्त स्पर्शदर्शनम की भी
व्यवस्था थी जिसके के लिए निर्धारित शुल्क 150/-, 300/-, एवं 500/- रुपए देकर लाइन मे शामिल हुआ जा सकता था। इस हेतु प्रवेश द्वार
के पास ही टिकिट काउंटर बने हुए थे। लेकिन स्पर्शदर्शनम के लिए ऑन लाइन बुकिंग
कराना आवश्यक था। आप अपने से स्वयं या प्रवेश द्वार के बाज़ारों मे कुछ अतिरिक्त
शुल्क देकर पहचान पत्र के साथ इस सुविधा का लाभ ले सकते हैं। हम लोगो को 500 रुपए
प्रति दर्शनार्थी के हिसाब से रात्रि 8 बजे के टिकिट प्राप्त हुए। अब थोड़ा ठहरने
की व्यवस्था की चर्चा कर लें। चूंकि हम
लोगो ने पूर्व मे ही होटल/गेस्ट हाउस आदि बुक
नहीं किए थे इस लिए थोड़ी असुविधा का सामना करना पड़ा। श्री शैलम मंदिर ट्रस्ट की
वेवसाइट से आप यात्रा के पूर्व या वहाँ पहुँच कर उनके केंद्रीय नियंत्रण कार्यालय
से गेस्ट हाउस/रूम बूक करा सकते है। एसी (12-14 सौ दो बेड रूम) और नॉन एसी रूम (800/-
दो बेड रूम) की व्यवस्था उचित दर पर उपलब्ध थी। लेकिन गर्मी और उमस के कारण मंदिर
ट्रस्ट मे एसी रूम उपलब्ध नहीं थे। पर निजी होटल, धर्मशाला
मे भी बाजिब दाम पर दोनों तरह के रूम उपलब्ध थे। एक धर्मशाल मे एसी रूम की व्यवस्था
2500/- मे हो गयी। कुछ घंटे विश्राम और भोजन के बाद शाम को सात बजे हम सभी मंदिर द्वारा निर्धारित वस्त्र यथा
महिलाओं के लिए सलवार, कुर्ता या धोती और पुरुषों के लिए
भारतीय परवेश लुंगी, धोती, कुर्ता या
पयजामा, शर्ट धारण
कर श्री शैलम ज्योतिर्लिंग के दर्शन हेतु निर्धारित स्थान पर पहुँच गए।
2 एकड़ मे फैले मंदिर प्रांगड़ को ऊंची ऊंची
दीवारों के माध्यम से घेरा गया है और चारों दिशाओं मे दक्षिण भारतीय वास्तु शैली मे विशाल प्रवेश द्वार बनाए गए है
जिसके केंद्र मे भगवान श्री शैलम का स्वर्ण पत्रों से जड़ित शिखर को बनाया गया है। मुख्य मंदिर के प्रवेश
द्वार पर टिकिट आदि की जांच और सुरक्षा जांच के पश्चात एक प्रतीक्षालय
मे लगभग आधा घंटे के इंतजार के बाद दर्शनार्थियों के समूह को कतारवद्ध रूप से मंदिर
मे दर्शनार्थ हेतु ले जाया गया। लंबी स्टील रेलिंग मे दायें बाए घूमते हुए जब
मंदिर के प्रवेश द्वार पर पहुंचे जिसके दरवाजों पर चाँदी का खूबसूरत नक्काशी दार
पत्र चढ़ाया गया था। जिसमे जगह जगह शिव लिंग को करीने से उकेरा गया था। दरवाजे से
प्रवेश करते ही बारह पत्थर के नक्काशी दार स्तंभों के बीच शिव वाहन नंदी
की विशाल बैठी हुई प्रतिमा स्थापित थी जिनका मुंह शिव ज्योतिर्लिंग की तरफ
था। दर्शनार्थी नंदी के दोनों ओर दो लाइन मे विभक्त हो मंदिर की तरफ बढ़ रहे थे। इस
मंडप के बाद पुनः एक इतने ही बड़े मंडप मे एक भजन मंडली ढोलक, तबले, हारमोनियम मजीरे और झांझर की ताल पर बड़े ही सुंदर लय और ताल मे शिव भजन
गा रहे थे। इसी बीच भक्तों की दोनों लाइन धीमी गति से ज्योतिर्लिंग के दर्शनार्थ
आगे बढ़ रही थी। मंडली मे शामिल एक समान भगवा वस्त्र धारी गायकों ने अपने भजनों से शिवलिंग के दर्शन की आतुरता, आवेग और उद्वेग को कुछ कम कर दिया था।
कुछ
ही मिनटों मे अब हम मंदिर के मुख्य मंडप के प्रवेश द्वार पर थे जिनके उपर चाँदी की
परतों को चढ़ाया कर सुसज्जित किया गया था। जिसके शीर्ष पर भगवान गणेश की प्रतिमा
स्थापित की गयी थे। इस मंडप मे प्रवेश करते ही सामने साक्षात श्री शैलम ज्योतिर्लिंग
विराजमान थे। चूंकि मंदिर के कक्ष छोटा था और एक बार मे 5-6 दर्सनार्थी से ज्यादा
प्रवेश नहीं कर सकते थे। यहाँ इस बात का उल्लेख करना आवश्यक है कि "स्पर्श दर्शनम" व्यवस्था जैसा कि नाम
से स्पष्ट है कि प्रत्येक श्रद्धालु को एक बार भगवान श्री शैलम के दर्शन के
साथ-साथ माथा टेक कर स्पर्श करने और नमन
करने की अनुमति थी। इस बजह से दर्शन मे थोड़ा समय लग रहा था। इस वास्तविकता से अवगत
होने पर उपस्थित भक्त समुदाय मे भगवान महादेव श्री शैलम के दर्शन की आतुरता, उत्सुकता
और अधीरता को और बढ़ा दिया था। अब जैसे ही
मैंने अपने परिवार के साथ मंदिर कक्ष मे प्रवेश किया तो हम सभी ज्योतिर्लिंग के
दर्शन कर कुछ सेकण्ड्स के लिए अपनी सुधि-बुधि खो बैठे। चार-पाँच दर्शनार्थीयों के
प्रवेश करते ही किसी ने ठीक सामने से, किसी ने बाएँ और किसी
ने दाहिनी तरफ से भगवान शिव का मस्ताकाभिषेक कर नमन किया पर मैंने बड़े ही संयत और
शांत चित्त हो सामने के विपरीत दिशा मे बाएँ दिशा से प्रवेश कर भगवान श्री शैलम को नतमस्तक हो प्रणाम किया और
अपनी माँ को नम आँखों से स्मरण करते हुए
भगवान शिव से उनकी आत्मा को शांति और कल्याण की कामना करते हुए प्रदक्षिणा की। कुछ
ही सेकण्ड्स पश्चात आने वाले दर्शनार्थियों के लिए मंदिर कक्ष से भगवान श्री शैलम
का स्मरण करते मैने बाहर की ओर प्रस्थान किया। पृथ्वी से लगभग आठ अंगुल उपर ऊंचे उठे
स्वयंभू भगवान श्री शैलम के दर्शन और स्पर्श अद्भुत, शक्ति
और ऊर्जा का संचार करने वाले थे। भगवान श्री मल्लिकार्जुन/श्री शैलम के वो दर्शन
अद्भुत, अविस्मरणीय और चिरस्मरणीय हैं। मंदिर के मुख्य मंडप
के चारों ओर खुले विशाल प्रांगण की परधि पर विभिन्न देवालयों मे सहस्त्र लिंगेश्वर, अर्ध नारीश्वर, वीरमद, उमा
महेश्वर, और ब्रह्मा के मंदिर स्थापित किए गए है। एक तरफ
यज्ञशाला और गौशाला का निर्माण किया गया हैं।
अंत मे मंदिर के अंतिम छोर पर सीढ़ियो के ऊपर से पूरे मंदिर प्रांगड़ के भव्य
दर्शन मन को प्रसन्न करने बाले थे। यहीं से माता भ्रमराम्बा देवी के दर्शन पश्चात
मंदिर परिसर के बाहर स्थित लड्डू प्रसाद काउंटर से प्रसाद लेकर मंदिर से प्रस्थान किया। शेष अगले अंक ......2
मे॰
विजय
सहगल




3 टिप्पणियां:
ज्योतिर्लिंग महादेव श्री शैलम मल्लिकार्जुन के दर्शन हेतु अतिआवश्यक जानकारी बहुत उपयोगी है दर्शनार्थियों हेतु लाभदायक विवरण। आप एवम आपके परिवार पर भगवान भोलेनाथ की कृपा हमेशा बनी रहे।
भाईसाब, चरण स्पर्श। आप का यात्रा वृत्तांत पढ़कर पूज्या अम्माजी के साथ साथ भगवान भोले नाथ जी के प्रत्यक्ष दर्शन प्राप्त हुए हैं। आपकी लेखन विशेषज्ञता सदैव आपके प्रति श्रद्धा भाव में बढ़ोतरी करती है।🙏🏿
अखिलेश समाधिया, झांसी
आदरणीय सहगल जी,
श्री शैलम तीर्थ का वर्णन पढ़कर मन भाव विभोर हो गया।
भगवान महादेव माता जी को अपने चरणों में स्थान दें।
धन्यवाद, सहगल जी
राजेन्द्र सिंह, ग्वालियर
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