शुक्रवार, 28 जुलाई 2023

देशी जड़ी बूटी, दवाखाना

"देशी जड़ी बूटी, दवाखाना"

आज दिनांक 25 जुलाई 2023 एक खुशनुमा मौसम मे प्रातः भ्रमण के दौरान दूरी का अहसास तब हुआ जब सड़क किनारे के सूचना पटल ने तमिलनाडू बार्डर शुरू होने का संदेश दिया। कर्नाटक के बेंगलुरु स्थित यह  सीमाई इलाका हमारे प्रवास के पास ही था। एक निर्माणाधीन मंदिर से मैंने सड़क किनारे एक पुरानी चौदह सीटर बस को देखा जिसमे पुरानी जड़ी बूटियों और आयुर्वेदिक दवाओं को दवाखाने का आकार दिया गया था। जिसके बाहर एक टेंट मे आगंतुक मरीजों के लिए बैठने का इंतजाम किया गया था। हम और आप  इस तरह के दवाखाने प्रायः हर शहरों के बाहर सड़क किनारे बचपन से देखते आए है। इन दवाखानों मे प्राचीन आयुर्वेदिक जड़ी बूटियों के माध्यम से लोगो का इलाज़ किया जाता रहा है। इन दवाखानों का संचालन एक विशेष आदिवासी समुदाय द्वारा सारे भारत के शहरों मे किया जाता है।

मुझे याद है झाँसी मे बचपन मे स्कूल आते जाते समय रानी महल के सामने स्थित मैदान   मे रंग बिरंगे कपड़ो से बने टेंट मे ये आयुर्वेदचार्य एक छोटे  लाउड स्पीकर पर कुछ इस तरह जड़ी बूटियों के बारे मे बताया करते थे। "बाबू ये है कामरगट्टा, सिर मे दर्द हो, घुटने मे दर्द हो, कमर मे दर्द हो, आइए इस दर्द का शर्तियाँ इलाज़ हमारे पास है!! आदि, आदि।   ये जड़ी बूटी विभिन्न आकार, प्रकार और रंगो की सूखी हुई जडों, तने और फलों के रूप मे दृष्टिगोचर होती थी।  राजस्थानी साफा सिर पर बांधे ये जानकार अपनी जड़ी बूटियों का प्रचार प्रसार और  बिक्री उन दिनों किया करते थे। आज इन लोगो की  गाड़ी को देख कर इन के बारे मे ज्यादा जानने  की इक्छा से इनके टेंट की ओर बढ़ गया और बचपन के उन दिनों की जिज्ञासा के समाधान का प्रयास किया।        

आयुर्वेद की इन प्रकृतिक जड़ी बूटियों और आयुर्वेदिक दवाओं का ज्ञान, परंपरागत रूप से एक पीढ़ी से  दूसरी को अपने अनुभव सांझा करने के रूप मे देखी। इस दवाखाने के मुखिया श्री अमर सिंह आयुर्वेद के अपने ज्ञान और अनुभव को अपने दोनों बेटों श्री बबलू सिंह और श्री अमर सिंह के साथ हुसूर रोड, तमिलनाडू  पर स्थित अपने दवाखाने मे सांझा कर रहे थे। टेंट के बाहर कन्नड और तमिल भाषा के साथ लोगो का ध्यानकर्षण हेतु आकर्षक फोटोओं के साथ  पोस्टर लगाए गए थे। चलते फिरते दवाखाने की टेंपू ट्रेक्स नुमा बस के पीछे एक छोटे टेंट मे रहवास के लिए इनका आवास था। जहां अमर सिंह अपने पोते के साथ बैठे थे। टेंट के एक ओर गैस चूल्हा और कुछ खाना पकाने के बर्तन भाड़े रक्खे थे। दो फोल्डिंग पलंग के साथ लगे स्टूल पर बात चीत की मनसा से मै भी उनके पास बैठ गया। उन्होने बताया कि हमारे जड़ी-बूटी के इस खानदानी व्यवसाय के पितामह वैद्य  श्री धन्वन्तरी थे। ऐसी किवदंती है कि जब धन्वन्तरी वैद्य जंगलों से निकलते तो जड़ी बूटियाँ उनसे बात करती थी और उनमे समाहित  विभिन्न बीमारियों मे उनकी उपयोगिता से उनको अवगत कराती थी। बाद के समय मे लुक़मान हकीम का भी जड़ी बूटी से इलाज़ के किस्से कहानी भी सुनाये जाते रहे। किस्से कहानी कुछ भी हों पर ये सत्य है कि जड़ी बूटी के इन जानकारों के पास सैकड़ों सालों से परंपरागत रूप से प्राप्त इस ज्ञान पर शोध करने और इन लोगो के संरक्षण की महति आवश्यकता है। सरकार को इन आयुर्वेदिक जड़ी बूटी के जानकारों के ज्ञान और अनुभव को पुस्ताकार रूप मे लिपिवद्ध करने की आवश्यकता है ताकि ये ज्ञान लुप्त प्राय न हो जाय।

जब उनके जीवन यापन हेतु खाने पीने की वस्तुओं पर चर्चा हुई तो उन्होने बताया आसपास के गाँव से हफ्ते दस दिन का राशन वे लोग ले आते है इस हेतु एक मोटर साइकल उनके पास है। जंगली घास और कटीली बाड़ के बीच कभी कभी आँधी और बरसात मे उनके टेंट को टूटने नष्ट होने का दर्द उनके चेहरे से स्पष्ट दिखाई दे रहा था। कच्ची और सूखी घास फूस की जमीन से प्रायः साँप आदि निकलने का अंदेशा लगातार बना रहता है इस हेतु नाग देवता का पूज्य चबूतरा को इन्होने ने टेंट के एक ओर बना रक्खा था जिसकी पूजा उनका परिवार नित्य प्रति करता है।  खाना बदोश ज़िंदगी के कारण बच्चे शिक्षा-दीक्षा से वंचित रह जाते है। सरकार के विकास की कोई योजना कभी इस तक शायद ही पहुँच पाती हो। कठिनाइयों और अभावों के बावजूद  भी देश मे हो रहे विकास और राजनैतिक घटना क्रम की जानकारी ये डिश टीवी के माध्यम से अपने टेंट मे प्राप्त करते रहते है वो भी सरकार सी बिना किसी शिकवे और शिकायत के।

बातचीत मे अमर सिंह और उनकी पत्नी संतोली ने बताया मैसूर के पास स्थित चामुंडा देवी उनकी कुलदेवी है। आज कल शिक्षा के महत्व की पहचान उनके समाज मे भी होने लगा  है अतः उनके परिवार के कुछ  सदस्य नागपुर के पास स्थित गाँव मे रह रहे है। 8-10 वर्ष की आयु मे बच्चों की शिक्षा दीक्षा हेतु वे अपने भाई बंधुओं के पास छोड़ देते है। जड़ी बूटी के इस व्यापार और व्यवसाय से आय के बारे मे पूंछने पर अमर सिंह ने बताया कि गुजर वसर हेतु आवश्यक धनराशि ईश्वर की कृपा से मिल जाती है लेकिन इस हेतु संघर्ष काफी कठिन है। जोड़ो और घुटनों के दर्द के साथ गठियाँ, मिर्गी, कमर दर्द के इलाज़ ये जड़ी बूटियों से करते है, शुगर, माइग्रेन और ब्लड प्रैशर का इलाज़ भी इनकी जड़ी बूटियों मे समाहित है पर इसकी प्रामाणिकता पर शोध करने के सार्थक प्रयासों की सरकार से अपेक्षा तो बनती ही है। उन्होने बताया इन जड़ी बूटियों पर महाराष्ट्र के भुसावल मे एक शोध संस्थान कार्यरत है जो श्रहनीय है।  अमर सिंह जी के अनुसार त्वचा, यौन रोगों और यौन रोगो से संबन्धित अन्य विषयों की दवाओं से रोगों के इलाज़ की विशेषज्ञता मे ये सिद्धहस्त हैं। इनकी आय का एक बड़ा इस विशेषज्ञता से ही प्राप्त होता है।  

अमर सिंह के छोटे सुपुत्र सतपाल ने हमे उनकी बस मे रक्खी जड़ी बूटियों से अवगत कराया, जिनको काँच की शीशियों मे सहेज कर रक्खा गया था। सतावर, मूसली, स्केम्बर, त्रिफला, बड़ी इमली, अश्वगंधा, मुलैठी, ब्राह्मी, हरिद्रा आदि जड़ीबूटियों से हमारा परिचय कराया। आज के युग मे चिकित्सा  विज्ञान मे अत्याधुनिक मशीनों और दवाओं के प्रचलन के बावजूद अपने बजूद को कायम  रखने की कोशिश मे अमर सिंह जैसे लोगो के  जड़ीबूटियों और आयुर्वेदिक दवाओं  को संरक्षित और सुरक्षित रखने  के प्रयासों की सराहना की जानी चाहिए उनकी  ये कोशिश प्रशंसनीय है। 

विजय सहगल

   









शनिवार, 22 जुलाई 2023

"India" v/s "Indi Alliance" अर्थात आँख के अंधे नाम नयन सुख

 

"India" v/s "Indi Alliance"

अर्थात  आँख के अंधे नाम नयन सुख

भारतीय राजनीति मे मसख़रों की कोई कमी नहीं है। अभी हाल ही मे विपक्ष के 26 दलों ने मिल कर एक गठबंधन बनाया और उसे नाम दिया "इंडियन नेशनल डेव्लपमेंट इंक्लूसिव एलाइंस" अर्थात इंडिया। इंडिया गठबंधन के नाम से विपक्षी दलों के सदस्य इसलिए अति प्रसन्न और प्रफ़्फुलित है मानों उनके मन की मुराद पूरी हो गयी!! उन्हे गठबंधन का नाम India  अर्थात इंडिया नाम रख लेने से राष्ट्रियता और राष्ट्र भक्ति का लाइसेन्स मिल गया हो। क्या उन्होने देश के मतदाताओं को वेबकूफ समझ रखा है?

इस संदर्भ मे मैं अपने सेवाकाल मे चंबल मे घटे एक वाक़या सांझा करना चाहता हूँ। जब अपने संस्थान के व्यावसायिक हितों की खातिर मै एक गाँव मे एक परिवार से मिलने गया जो गाँव के गणमान्य व्यक्ति थे और लोग उन्हे मुखिया जी कह कर पुकारते थे। बातचीत मे मुखिया जी  ने बतलाया कि उनके दो बेटे है एक कलेक्टर है और दूसरा तहसीलदार। यह सुन, मेरे मन मे उस परिवार और मुखिया जी  के प्रति सम्मान, आदर और गहरा हो गया। मै कुछ अतरिक्त सावधान था कि परिवार के मुखिया, जिसका एक बेटा कलेक्टर और दूसरा तहसीलदार है के आदर और  मान सम्मान मे कहीं कोई कमी न रह जाये!! जब मैंने मुखिया जी से उनकी पोस्टिंग आदि के बारे मे पूंछा? तो मुखिया जी ने आवाज दे कर उन दोनों को हमारे सामने बुला कर खुद ही बात करने के लिये कह दिया। दोनों की शक्ल सूरत, उनके आचार व्यवहार को जिज्ञासा से देख, फिर भी मैंने अपना परिचय दिया। तो उन दोनों मे से एक ने अपना नाम "कलेक्टर सिंह" और दूसरे ने "तहसीलदार सिंह" बता सामने पड़ी खटिया  पर बैठने का आग्रह किया। घटना की वास्तविकता पहचानने मे मुझे ज्यादा देर नहीं लगी!! हक़ीक़त से परिचित होने पर मुझे अपने आप पर मन ही मन  हँसी आयी कि बेशक मुखिया जी बच्चों को कलेक्टर और तहसीलदार न बना सके पर उनके नाम कलेक्टर और तहसीलदार रखने से तो कोई उन्हे नहीं रोक सका। कुछ ऐसी ही कथा, व्यथा 26 राजनैतिक दलों के गठबंधन की भी है जो India जैसा मान सम्मान और आचरण भले ही न रख पाया हो पर "इंडिया" नाम रखने से उन्हे कौन रोक सकता है? अब तो "India" गठबंधन के कुछ सदस्यों को लगे हाथ अपने नाम के आगे "प्रधानमंत्री" शब्द भी लगा लेना चाहिये ताकि जीते जी उनके मन की ख्वाहिस तो कम से कम पूरी हो जाए!! और  वे लोगों को बता सके कि वे "India" के प्रधानमंत्री फलां-फला है!! या वे India के प्रधानमंत्री सुश्री फलां-फला हैं!! वैसे महान शायर गालिब ने अपने काल जयी शेर मे यों  हूँ ही नहीं कहा होगा कि  -

हम को मालूम है जन्नत की हक़ीक़त लेकिन ।

दिल के ख़ुश रखने को, "गालिब" ये ख़्याल अच्छा है ॥    

इंडिया गठबंधन के दल ये मान कर चल रहे हैं, मानों अब कोई भी "इंडिया" शब्द के कारण उनके विरुद्ध कोई वक्तव्य या विरोध नहीं कर सकता। वे मान कर ऐसे चलते है जैसे प्राचीन समय मे विदेशी आक्रांता युद्ध के समय गायों, महिलाओं या धार्मिक प्रतीकों  को युद्ध के समय आगे कर दिया करते थे तब विरोधी राजा अपनी धर्म और सांस्कृति के रक्षार्थ और सांस्कृति के प्रति समर्पण और सम्मान के कारण  बगैर लड़े या अपने प्रतीकों को बचाने के फेर मे ही पराजित हो जाते थे। भीरु और कायर शत्रु और आक्रांता,  भारतीय राजाओं के मानोभावों और भावनाओं से खिलवाड़ कर युद्ध मे कभी महिलाओं, गाय या धर्म चिन्हों को आगे कर छद्म और कुटिल नीति से पराजित कर दिया करते थे। वे जानते थे कि यहाँ के राजाओं की  धर्म के प्रति आस्था और  समर्पण से कैसे नाजायज फायदा उठाया जाएँ। आज इंडिया का ये गठबंधन कुछ उसी राह पर चल कर सदियों पुराने "कपट" और "कुटिलताओं" की चाल चलकर देश के मतदाताओं को भ्रांत और भ्रमित करना चाहता है। लेकिन वे ये नहीं जानते कि आज देश के लोग धर्म भीरु नहीं अपितु जागरूक और सजग हो गए है। वे "Indi Alliance" और "India" मे फर्क करना जान गए है। वे इंडिया के पीछे के इस गठबंधन के सदस्यों की बदनीयति  को अच्छी तरह पहचानते  है और  इन की कारगुजारियों के झांसे मे अब आने वाले नहीं है।

पहले देश के राजनैतिक दल अपने दल के नाम के साथ  "भारतीय", "राष्ट्रीय" या "इंडियन"  शब्द लगा कर राष्ट्र और राष्ट्र भक्ति से अपने आप को जोड़ता था पर इन दलों ने तो अब राष्ट्र के नाम से ही गठबंधन बना लिया। मानों अब देश के मतदाता "इंडिया" शब्द के कारण उनको मत और समर्थन देने के लिये नैतिक दृष्टि से बाध्य हो गएँ हों? भारतीय मतदाता अब परिपक्व हो चुके हैं वे जानते है कि सच्चा इंडिया सच और ईमानदारी की खातिर खड़ा है जबकि-:

"Indi Alliance" मे लालू यादव जैसे सजायाफ्ता अपराधी है!

"Indi Alliance" मे आप पार्टी जैसे लोग शामिल है जिनके उपमुख्यमंत्री और मंत्री जेल मे है।

"Indi Alliance" भ्रष्टाचार के आरोप मे पूरा का पूरा गांधी परिवार जमानत पर है।

"Indi Alliance" मे बंगाल के भ्रष्ट मंत्रियों के घर से करोड़ो रुपए नगदी बरामद होने  की घटना को कौन भूल सकता है।

"Indi Alliance" मे एक जाति विशेष की राजनीति करने वाले परिवार से देश के लोग भलीभाँति परिचित है।

"Indi Alliance" मे धारा 370 की आड़ मे दशकों तक अब्दुल्ला और मुफ़्ती परिवार ने अपने निजी स्वार्थ और हितों की खातिर जम्मू कश्मीर के लोगो को विकास से दशकों तक वंचित रक्खा।

"Indi Alliance" मे हिंदुओं के तथाकथित पैरोकार शिव सेना सत्ता की ख़ातिर अपने धुर विरोधियों से हाथ मिला सकते हैं।

"Indi Alliance" मे 1975 मे देश मे लोकतन्त्र की हत्या का प्रयास करने वाली वाली काँग्रेस के आपात काल का समर्थन करने वाली भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी भी इस गठबंधन का हिस्सा है।    

देश के लोग "India" और "Indi Alliance" के  फर्क को जानते है और गहराई से India और "Indi Alliance" के लोगो के चाल चरित्र और चेहरे के अंतर को मानते, जानते और समझते है।

काँग्रेस के लिए इंडिया शब्द के नाम का दुर्पयोग करना कोई अनूठी या अनोखी बात नहीं है। 1975  मे इन्दिरा गांधी द्वारा देश पर आपातकाल की घोषणा के बाद काँग्रेस के एक चाटुकार नेता डी के बरुआ ने उन दिनों एक नारा दिया था "India is Indira", "Indira is India" अर्थात इन्दिरा (गांधी) ही भारत है और भारत ही इन्दिरा है। वास्तव मे ये किसी व्यक्ति विशेष की वैसी ही आत्मप्रवंचना थी जैसे पुराने जमाने मे चारण भाट कवि अपने राजा की शान मे कसीदे पढ़ते थे। डी के बरुआ द्वारा "इन्दिरा गांधी" की तुलना "भारत" से करना कुछ ऐसी ही खुशामद और चाटुकारता की पराकाष्ठा थी। लेकिन कटु सच ये था कि श्रीमती इन्दिरा गांधी तो परलोकगमन कर गईं पर भारत देश आज भी "अजर", "अमर" है और अनंत काल तक रहेगा। आज  कुछ ऐसी ही  आत्ममुग्धता विपक्षी दलों ने अपने गठबंधन का नाम "इंडिया" रख कर प्रदर्शित की है। वैसे गांधी उपनाम रख कर अपने आप को महात्मा गांधी से जोड़ने के ऐसे ही छल प्रपंच और  छद्म प्रयास  से  भ्रम फैलाने का प्रयास आज भी गांधी परिवार कर रहा है।      

आने वाले 2024 मे देश मे पार्लियामेंट के चुनाव तो होंगे ही और देश के मतदाता अपने मताधिकार से "India"  के  लोकतन्त्र को तो अवश्य एक बार मजबूत कर  जिताएंगे ही पर "Indi Allaince" का ऊंट किस करवट बैठेगा ये तो समय ही बताएगा??            

 

विजय सहगल        

शनिवार, 15 जुलाई 2023

नाथुला दर्रा, सिक्किम

 

"नाथुला दर्रा", सिक्किम

 








रविवार 13 नवम्बर 2022 को प्रातः जब सिक्किम के जुलूक गाँव से भारत चीन सीमा पर स्थित नाथुला पास जाने के लिए प्रस्थान किया तो एक अलग रोमांच और उत्साह था। चीन सीमा पर डटे अपने भारतीय सेना के जवानों के साहस और शौर्य को गलवान घाटी मे देख व  सुन चुके थे। आज उन वीर सपूतों से रु-ब-रु होने की कल्पना से ही मन उत्साहित था। जुलूक मे रात्रि मे पड़ी वर्फ ने इस उत्साह को दुगना कर दिया था। समुद्र तल से 14140 फुट की ऊंचाई पर स्थित नाथुला पास जुलूक से से लगभग 43 किमी॰ दूर था, जबकि हम आधे रास्ता तय कर बाबा हरभजन के पुराने मंदिर के दर्शन कर चुके थे जहां से नाथुला दर्रा अब मात्र 20-25 किमी॰ दूर रह गया था। इस वर्फ़ीले पहाड़ी रेगिस्तान मे  हल्की ताजी वर्फ से कार, सड़क पर फिसल रही थी। हमारे कार के सारथी श्री बाल कृष्ण जी ने जब खराब मौसम की आशंका व्यक्त की तो मन एक अदृश्य डर से ग्रसित हो गया कि नाथुला दर्रे की यात्रा मे कहीं कोई विघ्न न आ जाये? लेकिन ईश्वर का शुक्र था कि मौसम ज्यादा नहीं बिगड़ा। यहाँ ये बताना आवश्यक है कि इस स्थान पर सिर्फ भारतीय नागरिकों को ही जाने के अनुमति है वो भी आवश्यक परमिट ले कर पर विदेशी पर्यटकों को यहाँ जाने की अनुमति नहीं है। याद रहे परमिट के लिए पहचान पत्र के रूप मे वोटर कार्ड और पासपोर्ट ही मान्य है, आधार कार्ड को पहचान के लिए स्वीकार नहीं किया जाता है।

लेकिन एक समस्या और थी कि प्रायः 99% पर्यटक गंगटोक से ही नाथुला पहुँचते है जबकि हम विपरीत दिशा से चल कर नाथुला होकर गंगटोक पहुँच रहे थे।  राज्य सरकार की नीतियों के चलते कुछ विशेष प्रकार के वाहनों को ही नाथुला पास जाने की अनुमति होती है। छोटे परिवार या कम संख्या वाले पर्यटकों को वाहनों का ज्यादा किराया देना पड़ता है। आप अपने निजि वाहन या किराये के वाहन होने के बावजूद नाथुला जाने के लिए बुलेरों, सूमों या सफारी जैसे वाहनों के साथ ही जाना होगा। गंगटोक या जुलूक से चीन सीमा पर स्थित नाथुला तक सड़क बहुत ही अच्छी है पक्की डम्मर की बनी है। दर्रे की तलहटी मे कार पार्किंग की बहुत बड़ी जगह सेना द्वारा पर्यटकों को उपलब्ध कराई गयी है। एक विकसित और सशक्त भारत की तस्वीर को देख मन प्रसन्न हो गया। अप्रैल से ओक्टूबर-नवम्बर तक मौसम नाथुला घूमने के लिए उत्तम रहता है, सर्दियों मे वर्फ़ वारी के कारण नाथुला भ्रमण मे व्यवधान हो सकता है।  

नाथुला पास के प्रवेश द्वार पर हल्की सर्दी थी मौसम खुला हुआ था ठंडी हवाओं के बावजूद सूर्य देव अपनी पूरी क्षमताओं के साथ सूर्य रश्मियों की चका-चौंध विखेर रहे थे जिससे सर्दी का प्रकोप, सुखद  और सुहावना हो गया था। पार्किंग स्थल से लगभग सौ-सवा सौ सीढ़ियाँ चढ़ कर भारत चीन सीमा पर जाना था। तलहटी से दूर पहाड़ों पर भारत-चीन सीमा पर भारतीय धव्ज को हवा मे लहराते देख मन उत्साह से उत्तेजित हो रहा था। ठंड से चुभती हवाओं के बावजूद दूर दूर तक फैली ऊंची चोटियों पर भारतीय सैनिकों को देश की सीमाओं की रक्षा मे तत्पर खड़े देखना जोश और उमंग बढ़ाने वाला था। जहां एक ओर चीनी सेना के बैरक दिखाई दे रहे थे वही उनके सामने बने सुरक्षा बुर्ज पर डटें भारतीयह सैनिकों को देख हमारे सहित हजारों पर्यटक उत्साहित हो भारत माता की जय के नारों से भारतीय सैनिकों के जोश और उमंग को बढ़ा रहे थे। घाटी से चल कर भारत-चीन सीमा पर जाने के लिए अभी, आधी सीढ़ियाँ ही चढ़ी थी कि गरम-गरम समोसे और जलेबी की खुशबू आयी तो देखा एक जगह चाय, समोसे और जलेबी लेने वाले लोगो की भीड़ लगी थी। पर्यटकों को सीमा पर सुबह-सुबह गरम-गरम नाश्ता सेना के जवानों द्वारा उपलब्ध कराया जा रहा था। शांति काल मे सेना के जवानों द्वारा सीमा की सुरक्षा के साथ नागरिकों के प्रति अपने सामाजिक दायित्व के प्रति ऐसा समर्पण और सेवा कदाचित ही किसी देश की सेना द्वारा किया जाता हों!! हमे अपनी सेना और अपने भारतीय होने पर गर्व है!!          

यहाँ से अब हम अपने अगले पढ़ाव भारत चीन सीमा की ओर अग्रसर थे। कुछ ही मिनटों पर पर हम उस जगह पर थे जहां से चीन सीमा एक हाथ की दूरी पर थी। पहाड़ की चोटी को समतल कर पक्का सीमेंटेड कॉरीडोर बनाया गया था। नाथुला पास उन तीन केन्द्रों मे से एक है जहां भारत चीन सीमा के सैनिकों की आधिकारिक बैठके होती है। जिस कारण से कॉरीडोर के  दोनों ओर बड़े-बड़े और ऊंचे भवनों का निर्माण किया गया है ताकि दोनों देशो के सैनिक अधिकारी उन भवनों मे मीटिंग आदि कर सकें। सैकड़ों की संख्या मे पर्यटक कौतूहल और उत्सुकता से कॉरीडोर के एक सिरे से दूसरे सिरे तक चहल कदमी कर रहे थे। वहाँ पर तैनात कुछ सेना अधिकारी अनुशासन बनाये रखने को तैनात थे। सीमा पर पास-पास सीमा के दोनों ओर  एक काँटे दार तार की फेंसिंग के   माध्यम से भारत चीन सीमा को विभाजित किया गया था। सभी पर्यटकों को सेना अधिकारी चीनी सेना के तारों को न छूने और फोटो न लेने के लिए आगाह कर रहा था जो महज एक-दो फुट की दूरी पर थी। ये एक संवेदन शील  इलाका था और किसी भी नागरिक की जरा सी लापरवाही गंभीर मामला बन सकती थी। चीन और भारत के तल्ख और तनाव भरे होने के कारण यहाँ तैनात सैनिक अधिकारियों की ज़िम्मेदारी कठिन और गहन थी। थोड़ी सी असावधानी से खतरा बड़ा हो सकता था फिर भी सभी पर्यटक अनुशासन मानते हुए निडर और निर्भीक होकर भारतीय सीमा मे कौतूहल भरी नज़रों से चारों ओर देख और भ्रमण कर रहे थे। चीन सीमा की तरफ चीनी सरकार और उनके शासकों की चीनी नागरिकों को "सीमित स्वतन्त्रता" की झलक यहाँ भी देखने को मिली। जहां एक ओर भारतीय सीमा मे  चारों तरफ हजारों-हज़ार पर्यटक दिखाई दे रहे थे और सीमा पर हर रोज की तरह एक उत्सव जैसा माहौल था वही चीनी सीमा पर एक भी पर्यटक का दिखाई न  देना चीनी सैनिकों द्वारा आंपने नागरिकों पर कठोर नियंत्रण को दर्शा रहा था। सीमा पर दोनों ओर बने भवनों मे भी चीनी सेना के पक्ष के लोग यदा कदा दिखाई दे जाते पर भारतीय सीमा मे लोग उत्सुकता पूर्वक भारतीय सेना के अधिकारियों से जिज्ञासा भरे सवाल कर उनसे मिलने और बात करने को उत्सुक थे। लेकिन उपर कॉरीडोर मे फोटो न लेने देने की कसक प्रत्येक पर्यटक के मन मे थी और उनके चेहरे पर स्पष्ट रूप से देखी जा सकती थी। देश की अन्य सीमाओं की तरह यहाँ ऐसा क्यों था नहीं मालूम? हो सकता है सुरक्षा कारणों से ऐसा हो!! यध्यपि कॉरीडोर के नीचे घाटी मे फोटो लेने की खुली छूट सभी को थी। इस कसक को सभी पर्यटक सीढ़ियों से नीचे उतर कर अपने मोबाइल से सेल्फ़ी और फोटो ले कर पूरी कर रहा था। लगभग एक घंटे की सुहावनी धूप मे नाथुला पास स्थित भारत चीन सीमा पर बिताए अपने अविस्मरणीय क्षणों  को अपनी स्मृतियों मे सँजोएँ हम अपने सह-यात्रियों सहित नीचे उतरे।

नीचे उतर कर हम लोगो ने उस पक्के गलियारे को भी देखा जो भारत चीन सीमा को  एक बड़े  लोहे के जंगले वाले दरवाजे से विभाजित कर रहा था। भारत चीन के बीच 80% व्यापार नाथुला दर्रे के रास्ते पर स्थित इस दरवाजे के माध्यम से होता था। पुराने समय मे तिब्बत-भारत के बीच यह मार्ग सिल्क रूट कहलाता था जहां से अन्य वसुओं के साथ मुख्यतः  सिल्क धागे और सिल्क कपड़े का व्यापार होता था। 1962 के चीन युद्ध के बाद से इस व्यापार मार्ग को बंद कर दिया गया था। ज्ञात हुआ कि 2006 से सीमित संख्या मे चीन से व्यापार कुछ सीमित समय हेतु आज भी जारी है।

पुनः एक बार सिक्किम के शेष भाग की यात्रा करने और दुबारा पुनः  नाथुला दर्रे के भ्रमण की आशा मन मे पाले हमने गंगटोक के लिए प्रस्थान किया।

विजय सहगल  

 

          

रविवार, 9 जुलाई 2023

होसूर-तमिलनाडू

 

होसूर-तमिलनाडू









बेंगुलुरु मे लगभग दो माह का प्रवास समाप्ती पर था। सरजापुर मे प्रायः बात बात पर तामिलनाडु स्थित होसूर का नाम लोगो के जुबान पर सुन कर 9 अप्रैल 2023 को मैंने होसूर जाने के निश्चय किया जो मेरे आवास से 21 किमी दूर था। यूं तो साधारणत: भारतीय परिवारों मे वरिष्ठ नागरिकों को मोटरसाइकल से घूमने की आज़ादी नहीं मिलती पर उस दिन होसूर (जिला कृष्णगिरी-तमिलनाडू)  से सब्जी लाने के मेरे एलान पर परिवार मे सहमति बनी कि चलो घर का एक आवश्यक काम साथ मे निपट जाएगा। 21 किमी॰ जाना और आना तथा एक घंटे की घुम्मकड़ि कुल दो घंटे के अनुमान के साथ मैंने घर से प्रातः 7 बजे प्रस्थान किया। पर घर के बाहर कोहरे सा मौसम देख लगा कि गर्म हुड की जैकिट  पहन लेना उचित होगा। इस आशय से मैंने जैकिट को पहन घर से प्रस्थान किया। मेरा अनुमान ठीक था अन्यथा जैकिट के बिना 21 किमी॰ के सफर मे सर्दी से घिग्घी बंध गयी होती।   

अनुमान से परे बेंगलुरु के सरजापुर से मात्र 6-7 किमी॰ ही निकले थे कि तमिलनाडू की सीमा आरंभ का बोर्ड देख थोड़ा रोमांच हुआ कि जमीन पर खिंची सीमा की रेखा के पार कितना कुछ बदल जाता है। राज्य स्तरीय कानून, टैक्स आदि के साथ प्रांत, भाषा, सांस्कृति के बदलाब को स्पष्ट रूप देखा और महसूस किया जा सकता था। सड़क और भी चौड़ी और साफ सुथरी थी। कोहरा और घना हो चुका था। पूरे छह मार्गी राष्ट्रीय राजमार्ग के किनारे मंथर गति से मोटरसाइकल की यात्रा जारी थी। कुछ गाँव और कस्बों से निकलते हुए अंततः अब हम होसूर शहर मे  प्रवेश कर रहे थे जिसके उपर से  मैसूर-कन्या कुमारी राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या 44 रूपी फ़्लाइ ओवर का द्वार दिखाई दे रहा था। होसूर तमिलनाडू का एक छोटा पर महत्वपूर्ण औध्योगिक केंद्र भी है जहां टीवीएस, अशोक लीलैंड, टाइटन, टाटा इलेक्ट्रॉनिक्स एवं अन्य बड़ी कंपनियों की फ़ैक्टरि और कारखाने है।  

फ़्लाइ ओवर के नीचे से निरुद्देश्य शहर की एक सड़क को पकड़ उसके अंतिम छोर तक जाने का निर्णय लिया। चंद मिनटों शहर की मुख्य सीमा से लगे  होसूर रेल्वे स्टेशन पर अपनी उपस्थिती दर्ज कर "अकड़ बकड़ बंबे बोल........ कर बाइक को दूसरी दिशा मे मोड दिया। मुख्य सड़क से लगभग दो सौ मीटर दूर बाएँ एक  दिशा की  ओर मोड़ दिया। देख कर सुखद आश्चर्य हुआ राजस्थान समाज द्वारा नवनिर्मित भव्य "आई माता मंदिर" जो सुंदर नक्काशी लिये संगमरमर के पत्थर से निर्मित था। धार्मिक और आध्यात्मिक भावों से निर्मित मंदिर के प्रवेश द्वार मे प्रवेश करते ही एक सफ़ेद संगमरमर के पत्थरों से निर्मित वर्गाकार चबूतरे पर स्थित  भव्य और आकर्षक मंदिर का भवन दिखाई दिया। संगमरमर के फर्श पर हरे, पीले और नीले रंग के  वेल बूटे को उकेरा गया था। वर्गाकार चबूतरे पर चढ़ने के लिये बैसी ही नक्काशी सीढ़ियों पर की गयी थी। पास ही रंगीन मोर को लकड़ी की कलात्मक सज्जा से माता के  प्रतीक चिन्ह को सीढ़ियों के किनारे लगा कर रक्खा गया था। प्रांगण मे प्रवेश के बाद हम मंदिर के मुख्य मंडप मे खड़े थे। मंडप के आँगन के चारों ओर संगमरमर के स्तंभों पर बहुत बारीक नक्काशी की गई थी। श्री आई माता के दरबार को बहुत करीने से सजाया गया था। देवी माता के मंदिर के एक ओर भगवान गणेश और दूसरी ओर राधा-कृष्ण की सुंदर भव्य प्रीतिमायेँ विराजित थी। माता के चरणों मे अपना शीश नवा कर और प्रसाद ग्रहण कर अब हम यायावरी हेतु अगले पढ़ाव के ओर चल दिये।

मुख्य बाज़ार के बीच मे ही श्री शूलगिरी आंजनेय भगवान श्री  हनुमान जी की एक भव्य विशाल काय  प्रतिमा  स्थापित थी। जिसके ठीक सामने भगवान कृष्ण को समर्पित प्राचीन कृष्ण मंदिर था। जहां पर लगातार श्रद्धालुओं की भीड़ दर्शन के मंदिर मे आ रही थी। मैंने भी इस भव्य और प्राचीन मंदिर के दर्शन के साथ दाल-चावल के प्रसाद का लाभ लिया। उक्त मंदिर का वास्तु-स्थापत्य काफी पुराना और दक्षिण भारतीय शैली के रूप मे निर्मित था। भगवान कृष्ण और राधा के दर्शन से मन और दर्शन  पश्चात चावल रूपी प्रसाद से उदर तृप्त हो गया।

अब बारी थी लगभग 800 वर्ष पूर्व निर्मित होसूर के प्रसिद्ध चंद्र चूड़ेश्वर मंदिर जो भगवान शिव और माता पार्वती को समर्पित भगवान शिव के दर्शन की।  मंदिर जो शहर के एक सिरे पर पहाड़ी पर निर्मित है और प्रायः शहर के हर स्थल से दिखाई देता है। राष्ट्रीय राजमार्ग के नीचे से होकर दाहिने तरफ की सड़क जो पहाड़ी पर स्थित शिव मंदिर की ओर जाती है। मंदिर के प्रवेश द्वार को सड़क के आर पार आकर्षक ढंग से रंग बिरंगी देवी देवताओं की प्रीतिमाओं से सुसज्जित किया गया है। पक्की डामर रोड मंदिर तक बनी है आप अपने या पब्लिक वाहन से मंदिर तक पहुँच सकते है। वर्गाकार रूप मे निर्मित मंदिर का विशाल प्रांगण बाहर से गेरुई और सफ़ेद रंग की पट्टियों से पेंट किया हुआ है। मंदिर के लंबे परिकृमा पथ बनाया हुआ है जिस पर  विशेष पर्वों के समय श्रद्धालु प्रवेश और निकास द्वार से आते जाते है पर सामान्य दिनों मे सहजता पूर्वक मंदिर के दर्शन किए जा सकते है। मंदिर के प्रवेश द्वार मे प्रवेश करते ही  प्राचीन पाषाण स्तंभों से निर्मित भव्य मंदिर के दर्शन होते है। मंदिर मे पूर्व दिशा की तरफ से दर्शन हेतु प्रवेश के पूर्व अन्य देवी देवताओं के छोटे छोटे मंदिर स्थित है जिनके दर्शन का लाभ भी श्रद्धालु लेते चलते है। मंदिर के मुख्य मंडप मे स्थित शिव मंदिर के दर्शन हेतु श्रद्धालुओं की लाइन लगी थी। मै भी अपनी बारी की प्रतीक्षा हेतु इंतजार कर रहा था। मंदिर के द्वार के समीप भगवान शिव की अत्यंत मनोहारी और आकर्षक प्रतिमा के दर्शन अप्रितम थे। फूलों और स्वर्ण आभूषणों से भगवान शिव और माता पार्वती का श्रंगार किया गया था। मंदिर मे धूप दीप की महक मन को प्रसन्न कर आनंद देने वाली थी। भगवान के स्वरूप के दिव्य और भव्य दर्शन इतने चित्ताकर्षण थे कि उनके दर्शन मात्र से मै अपनी सुधि-बुधि खो बगैर किसी अरदास के बापस आ गया। शायद ये देवाधिदेव का संकेत था कि मै उनके स्नेह आशीर्वाद  हेतु दुबारा दर्शन करने आऊँ! मंदिर प्रांगण मे ही वासू और उसकी पत्नी ईश्वरीय से मुलाक़ात हुई जो बड़ी तन्मयता से मंदिर परिसर की सफाई मे रत थे। मैंने उन दोनों की उनके सफाई के कार्य हेतु प्रशंसा कर कहा, कि सच्चे अर्थों मे तुम दोनों ही ईश्वर के भक्त हों जो मंदिर परिसर को साफ सुथरा रख मंदिर की पवित्रता, दिव्यता और भव्यता मे चार चाँद लगाते हों!! मैंने अपने  भाव भंगिमा और इशारों से उनको अपने विचारों से अवगत कराने की कोशिश की पर शायद भाषा की संवाद हीनता के कारण वे दोनों हमारी बात को नहीं समझ सके। लेकिन पास ही प्रसाद और स्वल्पाहार के दुकानदार से जब मैंने निवेदन कर उन सफाई कर्मी युगल को अपने मंतव्य को उनकी तमिल भाषा मे बतलाने को कहा, जिसे सुन कर दोनों पतिपत्नी कृतज्ञता के भाव से विभोर थे। जिसको उनके चेहरों पर संतुष्टि की मुस्कान से सहज ही समझा जा सकता था। कदाचित ही कभी किसी ने उनके कार्य की इस तरह प्रशंसा की थी। जब मैंने वासू से एक सेल्फी लेने का अनुरोध किया जो उन्होने सहर्षता पूर्वक स्वीकार कर इशारों से आभार व्यक्त कर धन्यवाद दिया।

मंदिर के निकास द्वार पर एक भव्य और विशाल निर्माणाधीन रचना देखी जो शायद मंदिर के प्रवेश द्वार की तरह रही थी। बापसी मे मंदिर की पहाड़ी से होसूर शहर के आकाशीय दर्शन मनोहारी थे। बापसी मे रास्ते मे पड़ने वाले अन्य मंदिरों के दर्शन करते हुए रास्ता बदल कर एक तालाब के निकट पहुंचे जो पहाड़ी से तो सुंदर दीख रहा था पर निकट के दर्शन इस कहावत  को चरितार्थ कर रहा था कि "दूर के ढ़ोल सुहावने, पास के ढप-ढप होयें!!

बापसी मे मुरगन जी के हाथ ठेले पर रुके बिना नहीं रह सका जो पके हुए पीले कटहल की बिक्री 120/- रूपये प्रति किलो की दर से कर रहे थे। खरीदने के पूर्व मैंने एक छोटे पीले कटहल के  टुकड़े का स्वाद लेने का निवेदन किया। उन्होने एक छोटे टुकड़े को मेरी ओर बढ़ाते हुए खाने का आग्रह किया। मैंने पहली बार इस तरह पके हुए कटहल का स्वाद लिया जो मीठा और थोड़ा आम का स्वाद लिये था। कच्चे कटहल की तरह उसमे कोई चिपचिपाहट नहीं थी। एक पाव पके कटहल को मैंने पैक करा कर मुरगन जी को धन्यवाद ज्ञपित किया।

होसूर शहर मे ही एक अन्य जगह पर काले और पील रंग के छोटे नारियल की तरह के फल को देख मै पुनः रुका। जो ताड़ फल था। जिसके बारे मे बचपन मे अच्छी राय नहीं रखता था। इसके रस से ताड़ी अर्थात एक तरह की देशी शराब की नकारात्मक कल्पना मेरे जेहन मे बनी थी। मैंने पहली बार इस फल का स्वाद चखा जो बड़े सिंघाड़े के आकार की तरह था जिसमे शीतल रस भरा था  जो प्रिय न सही लेकिन अप्रिय भी नहीं था। लोग बड़ी मात्रा मे इस फल को नारियल की तरह छिल्वा कर उसमे निकलने वाले 3 या 4 फलों को पैक करा रहे थे। मैंने भी एक फल को खाया और एक को पैक करा कर बैग मे रक्खा।

अब तक 3 घंटे के अनुमान से अलग  छह घंटे हो चुके थे। मोबाइल कनेक्टिविटी की समस्या के चलते घर के लोगों से  संपर्क ने हो पाने के कारण परेशानी और बड़ गयी, जिसका अहसास घर पहुँचने पर लानत-मलानत से हुई।  खुशी इस बात की थी कि होसूर से लाई सब्जी-भाजी, फल के साथ पका हुआ कटहल और ताड़ के फल ने उनके क्रोधाग्नि  को शांत करने मे बड़ी महत्वपूर्ण भूमिका अदा की।                   

विजय सहगल