"देशी
जड़ी बूटी,
दवाखाना"
आज दिनांक 25 जुलाई 2023 एक खुशनुमा मौसम मे
प्रातः भ्रमण के दौरान दूरी का अहसास तब हुआ जब सड़क किनारे के सूचना पटल ने
तमिलनाडू बार्डर शुरू होने का संदेश दिया। कर्नाटक के बेंगलुरु स्थित यह सीमाई इलाका हमारे प्रवास के पास ही था। एक निर्माणाधीन
मंदिर से मैंने सड़क किनारे एक पुरानी चौदह सीटर बस को देखा जिसमे पुरानी जड़ी
बूटियों और आयुर्वेदिक दवाओं को दवाखाने का आकार दिया गया था। जिसके बाहर एक टेंट
मे आगंतुक मरीजों के लिए बैठने का इंतजाम किया गया था। हम और आप इस तरह के दवाखाने प्रायः हर शहरों के बाहर सड़क
किनारे बचपन से देखते आए है। इन दवाखानों मे प्राचीन आयुर्वेदिक जड़ी बूटियों के
माध्यम से लोगो का इलाज़ किया जाता रहा है। इन दवाखानों का संचालन एक विशेष आदिवासी
समुदाय द्वारा सारे भारत के शहरों मे किया जाता है।
मुझे याद है झाँसी मे बचपन मे स्कूल आते
जाते समय रानी महल के सामने स्थित मैदान
मे रंग बिरंगे कपड़ो से बने टेंट मे ये आयुर्वेदचार्य एक छोटे लाउड स्पीकर पर कुछ इस तरह जड़ी बूटियों के बारे
मे बताया करते थे। "बाबू ये है कामरगट्टा,
सिर मे दर्द हो, घुटने मे दर्द हो,
कमर मे दर्द हो, आइए इस दर्द का
शर्तियाँ इलाज़ हमारे पास है!! आदि,
आदि। ये जड़ी बूटी विभिन्न आकार,
प्रकार और रंगो की सूखी हुई जडों, तने और फलों के
रूप मे दृष्टिगोचर होती थी। राजस्थानी
साफा सिर पर बांधे ये जानकार अपनी जड़ी बूटियों का प्रचार प्रसार और बिक्री उन दिनों किया करते थे। आज इन लोगो की गाड़ी को देख कर इन के बारे मे ज्यादा जानने की इक्छा से इनके टेंट की ओर बढ़ गया और बचपन के
उन दिनों की जिज्ञासा के समाधान का प्रयास किया।
आयुर्वेद की इन प्रकृतिक जड़ी बूटियों और
आयुर्वेदिक दवाओं का ज्ञान, परंपरागत रूप से
एक पीढ़ी से दूसरी को अपने अनुभव सांझा
करने के रूप मे देखी। इस दवाखाने के मुखिया श्री अमर सिंह आयुर्वेद के अपने ज्ञान
और अनुभव को अपने दोनों बेटों श्री बबलू सिंह और श्री अमर सिंह के साथ हुसूर रोड,
तमिलनाडू पर स्थित अपने दवाखाने मे सांझा
कर रहे थे। टेंट के बाहर कन्नड और तमिल भाषा के साथ लोगो का ध्यानकर्षण हेतु
आकर्षक फोटोओं के साथ पोस्टर लगाए गए थे। चलते
फिरते दवाखाने की टेंपू ट्रेक्स नुमा बस के पीछे एक छोटे टेंट मे रहवास के लिए इनका
आवास था। जहां अमर सिंह अपने पोते के साथ बैठे थे। टेंट के एक ओर गैस चूल्हा और
कुछ खाना पकाने के बर्तन भाड़े रक्खे थे। दो फोल्डिंग पलंग के साथ लगे स्टूल पर बात
चीत की मनसा से मै भी उनके पास बैठ गया। उन्होने बताया कि हमारे जड़ी-बूटी के इस
खानदानी व्यवसाय के पितामह वैद्य श्री धन्वन्तरी
थे। ऐसी किवदंती है कि जब धन्वन्तरी वैद्य जंगलों से निकलते तो जड़ी बूटियाँ उनसे
बात करती थी और उनमे समाहित विभिन्न
बीमारियों मे उनकी उपयोगिता से उनको अवगत कराती थी। बाद के समय मे लुक़मान हकीम का
भी जड़ी बूटी से इलाज़ के किस्से कहानी भी सुनाये जाते रहे। किस्से कहानी कुछ भी हों
पर ये सत्य है कि जड़ी बूटी के इन जानकारों के पास सैकड़ों सालों से परंपरागत रूप से
प्राप्त इस ज्ञान पर शोध करने और इन लोगो के संरक्षण की महति आवश्यकता है। सरकार
को इन आयुर्वेदिक जड़ी बूटी के जानकारों के ज्ञान और अनुभव को पुस्ताकार रूप मे
लिपिवद्ध करने की आवश्यकता है ताकि ये ज्ञान लुप्त प्राय न हो जाय।
जब उनके जीवन यापन हेतु खाने पीने की
वस्तुओं पर चर्चा हुई तो उन्होने बताया आसपास के गाँव से हफ्ते दस दिन का राशन वे
लोग ले आते है इस हेतु एक मोटर साइकल उनके पास है। जंगली घास और कटीली बाड़ के बीच
कभी कभी आँधी और बरसात मे उनके टेंट को टूटने नष्ट होने का दर्द उनके चेहरे से
स्पष्ट दिखाई दे रहा था। कच्ची और सूखी घास फूस की जमीन से प्रायः साँप आदि निकलने
का अंदेशा लगातार बना रहता है इस हेतु नाग देवता का पूज्य चबूतरा को इन्होने ने
टेंट के एक ओर बना रक्खा था जिसकी पूजा उनका परिवार नित्य प्रति करता है। खाना बदोश ज़िंदगी के कारण बच्चे शिक्षा-दीक्षा
से वंचित रह जाते है। सरकार के विकास की कोई योजना कभी इस तक शायद ही पहुँच पाती
हो। कठिनाइयों और अभावों के बावजूद भी देश
मे हो रहे विकास और राजनैतिक घटना क्रम की जानकारी ये डिश टीवी के माध्यम से अपने
टेंट मे प्राप्त करते रहते है वो भी सरकार सी बिना किसी शिकवे और शिकायत के।
बातचीत मे अमर सिंह और उनकी पत्नी संतोली ने
बताया मैसूर के पास स्थित चामुंडा देवी उनकी कुलदेवी है। आज कल शिक्षा के महत्व की
पहचान उनके समाज मे भी होने लगा है अतः
उनके परिवार के कुछ सदस्य नागपुर के पास
स्थित गाँव मे रह रहे है। 8-10 वर्ष की आयु मे बच्चों की शिक्षा दीक्षा हेतु वे
अपने भाई बंधुओं के पास छोड़ देते है। जड़ी बूटी के इस व्यापार और व्यवसाय से आय के
बारे मे पूंछने पर अमर सिंह ने बताया कि गुजर वसर हेतु आवश्यक धनराशि ईश्वर की
कृपा से मिल जाती है लेकिन इस हेतु संघर्ष काफी कठिन है। जोड़ो और घुटनों के दर्द
के साथ गठियाँ, मिर्गी,
कमर दर्द के इलाज़ ये जड़ी बूटियों से करते है,
शुगर, माइग्रेन और ब्लड प्रैशर का इलाज़ भी इनकी
जड़ी बूटियों मे समाहित है पर इसकी प्रामाणिकता पर शोध करने के सार्थक प्रयासों की
सरकार से अपेक्षा तो बनती ही है। उन्होने बताया इन जड़ी बूटियों पर महाराष्ट्र के
भुसावल मे एक शोध संस्थान कार्यरत है जो श्रहनीय है। अमर सिंह जी के अनुसार त्वचा,
यौन रोगों और यौन रोगो से संबन्धित अन्य विषयों की दवाओं से रोगों के इलाज़ की विशेषज्ञता
मे ये सिद्धहस्त हैं। इनकी आय का एक बड़ा इस विशेषज्ञता से ही प्राप्त होता है।
अमर सिंह के छोटे सुपुत्र सतपाल ने हमे उनकी
बस मे रक्खी जड़ी बूटियों से अवगत कराया,
जिनको काँच की शीशियों मे सहेज कर रक्खा गया था। सतावर,
मूसली, स्केम्बर,
त्रिफला, बड़ी इमली,
अश्वगंधा, मुलैठी,
ब्राह्मी, हरिद्रा आदि जड़ीबूटियों
से हमारा परिचय कराया। आज के युग मे चिकित्सा
विज्ञान मे अत्याधुनिक मशीनों और दवाओं के प्रचलन के बावजूद अपने बजूद को
कायम रखने की कोशिश मे अमर सिंह जैसे लोगो
के जड़ीबूटियों और आयुर्वेदिक दवाओं को संरक्षित और सुरक्षित रखने के प्रयासों की सराहना की जानी चाहिए उनकी ये कोशिश प्रशंसनीय है।
विजय सहगल


















