गुरुवार, 29 जून 2023

गीता प्रेस,गोरखपुर से जय रामी रार

 

"गीता प्रेस,गोरखपुर से जय रामी रार "

 





एक बार फिर मोदी विरोध के चलते काँग्रेस के महासचिव जय राम रमेश ने सनातन धर्म के ज्ञान तीर्थ गीता प्रेस गोरखपुर को मिले गांधी शांति पुरुस्कार की तुलना गोडसे से कर अपने आप को संकट मे डाल लिया। गीता प्रेस पर काँग्रेस की इस अनुचित और अनधिकृत टिप्पडी के गंभीर दूरगामी, राजनैतिक दुष्परिणाम देखने को मिल सकते हैं?  एक बार ये पुनः प्रतिपादित हो गया कि आईआईटी जैसे उच्च शिक्षण संस्थानों मे शिक्षित व्यक्ति के विचारों से भी  मूढ़ता की पराकाष्ठा परिलक्षित हो सकती है!! विदित हो कि मोदी के विचारों, कार्यकर्मों मे पूर्वाग्रह रखने के चलते काँग्रेस के वरिष्ठ नेता एवं महासचिव जय राम रमेश ने गीता प्रेस को गांधी शांति पुरुस्कार प्रदान करने पर अपना विरोध प्रकट किया था।

2021 का गांधी शांति पुरुस्कार गीता प्रेस, गोरखपुर  को प्रदान करने की सूचना पर, 18 जून 2023 को काँग्रेस के वरिष्ठ नेता और महासचिव जय राम रमेश की  ट्वीटर पर यह टिप्पड़ी कि, "गीता प्रेस को गांधी शांति पुरुस्कार देना वास्तव मे एक उपहास है", वे कहते है कि, "यह गोडसे और सावरकर को सम्मानित करने जैसा है"। जय राम रमेश की यह  टिप्पड़ी  उनके  मानसिक दिवालियापन को दर्शाती है। गीता प्रेस गोरखपुर को मिले गांधी शांति पुरुस्कार की तुलना गोडसे से करना उनकी अस्थिरचित्त मानसिकता की सोच मे पल रहे नासूर मे भरे मवाद की तरह है जिसका कोई इलाज़ नहीं है। जहां तक वीर सावरकर की बात है तो  भारत की स्वतन्त्रता मे उनके शौर्य, साहस, त्याग और बलिदान के समक्ष  जयराम रमेश एकांश भी नहीं है!! उनकी इस धारणा और विचार की  जितनी भी निंदा और भर्त्स्ना की जाए कम है। गीता प्रेस गोरखपुर के बारे मे उनकी यह टिपपड़ी  एक मूढ़  मानसिकता की सड़ी सोच का प्रतीक है। काश जय राम रमेश ने गीता प्रैस गोरखपुर के मूल उद्देश्यों का गहन न सही, कुछ सतही अध्यन किया और समझा होता।       

राजस्थान मूल की व्यापारी द्व्य श्री जयदयाल गोयनका, श्री हनुमान प्रसाद पोद्दार द्वारा गीता प्रेस की स्थापना 1923 मे की गयी थी। लेकिन उक्त व्यापारी द्व्य द्वारा श्रीमद्भगवत गीता की मूल भावना "निष्काम कर्म" के अनुरूप कार्य करते हुए कभी भी इस संस्थान मे व्यापार नहीं किया। बगैर किसी लाभ की प्रत्याशा के चलते उन्होने इस संस्थान को चलाया। इस संस्थान के प्रबंधन ने कभी अपने निजी लाभ के लिए संस्थान के धन का  उपयोग नहीं किया। स्वयं  कॉंग्रेस जो 1975 मे लोकतन्त्र की हत्या की दोषी है। स्वतन्त्रता के बाद अनेक अवसरों पर कॉंग्रेस नेतृत्व के अनेक शीर्ष नेता भ्रष्टाचार, बेईमानी और आर्थिक घोटाले कर कॉंग्रेस  की नीतियों, सिद्धांतों और विचारों से डिगे हों पर गीता प्रेस गोरखपुर अपने नीतियों और सिद्धांतों पर सदा अडिग रहा, जिसके तहत उसने किसी व्यक्ति, संस्था या सरकारों से किसी भी तरह का कोई आर्थिक अनुदान या लाभ नहीं लिया, यहाँ तक कि अपने प्रकाशनों मे आर्थिक लाभ के लिए कभी भी कोई सरकारी या निजी विज्ञापन स्वीकार नहीं किया। इसी कढ़ी मे गीता प्रेस गोरखपुर को मिले  गांधी शांति प्रतिष्ठान के पुरुस्कार को तो स्वीकार किया पर पुरुस्कार के साथ मिली एक करोड़ रूपये की धनराशि को सविनय अस्वीकार कर दिया। ये होते है, श्रेष्ठी वर्ग के  व्यक्तियों और संस्थानों के उतकृष्ट और अतिउत्तम लक्षण जिसके प्रदर्शन मे काँग्रेस और जय राम रमेश हमेशा चूक करते रहे।

गीता प्रेस गोरखपुर को मिले पुरुस्कार से गांधी शांति पुरुस्कार के ही मान, प्रतिष्ठा और सम्मान मे वृद्धि हुई है, क्योंकि गीता प्रेस द्वारा पिछले एक शताब्दी से भारत ही नहीं विश्व को पाँच हजार ईसा पूर्व भगवान श्री कृष्ण द्वारा अर्जुन को दिये दिव्य संदेश को जन जन तक पहुंचाने का का जो सद्कार्य किया है वो अमूल्य है और जिसका कोई दूसरा उदाहरण देखने को नहीं मिलता। श्रीमद्भगवत गीता के संदेश विश्व की सम्पूर्ण मानवजाति के लिए आज भी उतने ही प्रासंगिक है जितने आज से पाँच हजार वर्ष पूर्व थे। निष्काम कर्म के माध्यम से मानव को जीवन जीने की कला सिखलाने वाला ये एक ऐसा दिव्य और पवित्र ग्रंथ है जिस को  वगैर किसी राजाश्रय के विश्व मे सर्वाधिक भाषाओं मे अनुदित और अनुवादित होने का गौरव प्राप्त है। अनेक विद्वानों, विचारकों, साहित्य के प्रवीण और श्रेष्ठ रचनाकारों ने इस पर अपनी टीका लिखी है। ऐसे निष्काम भाव से सनातन धर्म के  ग्रन्थों का प्रकाशन करने वाली संस्था के बारे मे जय राम रमेश की  ऐसी घिनौनी टिप्पड़ी पर कॉंग्रेस का मौन ये दर्शाने को मजबूर करता है कि इस दल और उसके अनुचरों  की सोच, सनातन धर्म के मानने वालों के प्रति कितनी थोथी और सतही है। काँग्रेस और उनके महारथी नेताओं द्वारा यदा कदा सनातन धर्म और धार्मिक संस्थाओं पर मन्तव्य, टीका और टिप्पड़ियाँ न केवल औचित्यहीन, अनावश्यक और अनपेक्षित है अपितु हिन्दू जन मानस के लिये असहनीय और क्रोधावेश से आहत करने वाली भी हैं। सनातन धर्म के मानने वालों के लिये हमारे चारों तीरथों की ही  तरह गीता प्रेस गोरखपुर भी एक ज्ञान तीर्थ की तरह है जो पिछले एक सौ सालों से सनातन धर्म के महान पवित्र  ग्रन्थों, यथा श्रीमद्भगवत गीता, रामचरित मानस, पुराण, उपनिषद, बालक, बालिकाओं और महिलाओं से संबन्धित 15 भाषाओं की करोड़ो पुस्तकों  का प्रकाशन करने वाला संस्थान है। कल्याण मासिक पुस्तक जैसे सद्साहित्य  की 2॰5 लाख से भी अधिक  प्रतियाँ हर माह, आज भी  प्रकाशित की जाती हैं।           

गांधी से मतैक्य या मत भिन्नता होना गोडसे की विचार धारा होना नहीं है। यदि ऐसा होता तो क्या गांधी जी के उस कथन कि, "अखंड भारत का विभाजन उनकी लाश पर होगा" को अनदेखा कर भारत के बँटवारे को स्वीकार करने वाली काँग्रेस, "गोडसे की विचार धारा" का प्रबल पोषण करने वाला  सबसे बड़ा दल नहीं है?? तब काँग्रेस और श्री जय राम रमेश की विचार धारा कहाँ थी। दुनियाँ के इतिहास मे इतनी सरलता से अपने निजी स्वार्थ के लिए इतना औचित्य हीन बंटवारा कहीं नहीं देखा गया!  तब क्यों न हमे  काँग्रेस को भी "गोडसे की विचारधारा" का बड़ा "पालक" मानना चाहिए जिसने अपनी स्वार्थ सिद्धि के लिये गांधी के निश्चय को अनदेखा कर देश का विभाजन स्वीकार किया जिसमे  करोड़ों लोगों को न केवल अपना घर परिवार और  मातृ भूमि छोड़ने को मजबूर किया अपितु  इस विभीषिका  मे दस  लाख से ज्यादा लोगो को अकारण ही अपने प्राणों की आहूति देनी पड़ी।

काश!!  जय राम रमेश और काँग्रेस द्वारा गीता प्रेस गोरखपुर की आलोचना के पूर्व वहाँ श्रीमद्भगवत गीता की 7.2 करोड़ से अधिक प्रकाशित प्रतियों मे से एक श्लोक का भी सार ग्रहण कर उसका अनुसरण किया होता तो उनका जीवन यूं ही निष्फल न गया होता। भगवान श्री कृष्ण श्रीमद्भगवत गीता के अध्याय 6 के श्लोक 7 मे कहते है कि हे अर्जुन -:

जितात्मनः प्रशान्तस्य परमात्मा समाहितः।
शीतोष्णसुखदुःखेषु तथा मानापमानयोः।।  (6.7)

अर्थात जिसने अपने-आप पर अपनी विजय कर ली है, उस शीत-उष्ण (अनुकूलता-प्रतिकूलता) सुख-दुःख तथा मान-अपमानमें निर्विकार मनुष्यको परमात्मा नित्य प्राप्त हैं।

अभी भी वक्त है गीता प्रैस जैसी सनातन धर्म के आध्यात्मिक और धार्मिक ग्रन्थों के प्रचार, प्रसार के लिए समर्पित संस्थानों पर  कॉंग्रेस और उनके प्रवक्ताओं को अपनी नकारात्मक सोच से परिपूर्ण टीका टिप्पड़ी से बाज आना चाहिए, यही काँग्रेस के हित मे रहेगा!!

विजय सहगल

 

 

बुधवार, 21 जून 2023

अम्माँ नईं रईं

" अम्माँ नईं रईं "






पिछले एक माह पूर्व से मैंने अपनी 87 वर्षीय अम्माँ को बीमारी के बावजूद  लाचार और बेवश होते  नहीं देखा। 12 मई 2023 को जब उनका चेहरा सहित पूरा शरीर पीला पड़ा तो पीलिया की बीमारी की आशंका तो निश्चित थी पर हम सभी इसे साधारण पीलिया ही मान रहे थे जो प्रायः पानी की स्वच्छता या खाने की कारण संभव था। पर खून की जांच मे जब पीलिया का स्तर साधारणतः 1 के विरुद्ध 16-17 पाये जाने की पुष्टि हुई तो आशंका हुई कि ये पीलिया के असामान्य लक्षण हो सकते है?  सीटी सकेन की गहन जांच मे आशंका सच साबित हुई, उनके लिवर (यकृत)  के रास्ते मे ट्यूमर की  रुकावट के कारण पीलिया ने इतना गहन रूप ले लिया था। इसके बावजूद भी उस दिन तक  अम्माँ की हिम्मत और  हौसलों मे कोई कमी नहीं थी। परिवार के सभी सदस्यों ने चिकित्सकों की सलाह पर दिल्ली स्थित लिवर और पित्त शोध संस्थान मे ले जाने का निर्णय लिया।

उनकी इक्छा शक्ति की प्रशंसा करनी होगी कि उस दिन भी तिमंजिला मकान से अपने आप सीढ़ियाँ उतर कर ट्रेन के रात के सफर के बाद जब 16 मई 2023 को उन्हे बसंत कुंज, दिल्ली स्थित लिवर शोध संस्थान ले गये तो स्वयं पैदल चल डॉक्टर को चेक कराया। उस दिन तक भी उनकी ज़िंदादिली और सरल स्वभाव का ये हाल था कि चलते-चलते एक महिला जिसकी शक्ल मेरी सास से मिलती थी, को रोक कर कहा, "बहिन जी आप अन्यथा न लें तो एक बात पूंछे? महिला की स्वीकरोति पर, उन्होने कहा।   "आपकी शक्ल मेरी समधिन से मिलती है," "लेकिन मै हैरान हूँ  कि जब मेरा बेटा और बहू तो मेरे साथ है", "आप अस्पताल मे यहाँ कैसे?"। महिला भी जिंदा दिल और हाजिर जबाब थी, हंस कर बोली, हाँ बहिन जी उम्र के इस पढ़ाव ऐसा भ्रम हो जाता है!!

अस्पताल मे भर्ती होने के बंधन से उन्हे उलझन थी।  यूं भी उन्होने अपने जीवन मे कुरूतियों और अंध विश्वास के विरुद्ध सदैव अपना नकारात्मक  रवैया अपनाया फिर चाहे घर मे पर्दा प्रथा, दहेज प्रथा या छुआ छूत की प्रथा (जिसका उल्लेख मैंने अपने 21 सितम्बर 2019 के  ब्लॉग मे "विनियाँ बाई" के रूप मे किया था https://sahgalvk.blogspot.com/2019/09/blog-post_21.html)॰ सात दिन के  अस्पतालीकरण के दौरान भी जब उनके पेट के बाएँ एवं दायें तरफ  दोनों थैली लगी रही जिनमे यकृत से निकलने वाले अपशिष्ट दृव्य एकत्रित हो रहे थे,  जिनकी मात्रा 800 मिली॰ से 1 लीटर तक प्रतिदिन थी। तब भी उन्हेने अपने बुलंद इरादे और दृढ़ संकल्प शक्ति का परिचय मे एक दिन की भी चूक नहीं की। शारीरिक दुर्बलता के बावजूद अपनी दिनचर्या, दीर्घ और लघु शंका का  निवारण, सहारा लेकर टॉयलेट मे स्वयं किया। इस तरह लगभग 23 दिन तक अस्पताल और घर पर दवाओं, इंजेक्शन, विभिन्न खून की जाँचों और धमनियों के माध्यम से शरीर मे पहुंचाने वाले द्रव्यों से संघर्ष करते हुए अंततः 8 जून 2023 को  लिवर मे मेटेलिक स्टंट्स सेम्स (self expended metelic stunt) का सफल पृत्यारोपड़ कराया।

लेकिन पीलिया के सफल इलाज़ के बावजूद उन्हे जब बुखार के कारण दोबारा लिवर हॉस्पिटल मे दाखला कराया तो उनकी हिम्मत, मनोबल और दृढ़ सकल्प को मैंने पहली बार टूटते देखा और महसूस किया। प्रवास, नौकरी और व्यवसाय मे समय की सीमित उपलब्धता के बावजूद हम भाइयों ने अपनी अपनी तरह से उनकी सेवा शुश्रूषा मे कोई कोर कसर बाकी नहीं छोड़ी, पर बेटियों को अम्माँ से मिली  शिक्षा और संस्कार ने हमारी दोनों बहिनों, भांजी-भांजों और अर्धांगिनी ने पूरे दिल्ली प्रवास के दौरान माँ के खान-पान, दवा, रहन-सहन साफ-सफाई के अतिरिक्त उनके मल-मूत्र के निस्तारण के माध्यम से जो सेवा की उससे हम कभी उऋण नहीं हो सकते।  

हैवि एंटि बाइओटिक दवाइयों के अतिरिक्त प्रभाव के चलते उन्होने खाना पीना कुछ कम कर दिया था। परिवार के लोग कुछ प्यार और दवाब के चलते बारी-बारी से उन्हे कुछ न कुछ खिलाने का अनुनय विनय करते लेकिन उनका एक ही जवाब होता, "हमे नहीं खाना"।  भांजे भाँजियों के प्रयास मे वे ज्यादा कड़ी प्रितिक्रिया न करती पर जब मेरी पत्नी कुछ खिलाने को लाती तो तुरंत कहती, "लो ये जाने कौन सी माया लियाई"। हॉस्पिटल की दाल, खिचड़ी या दलिया उन्हे कतई पसंद न आता। लेकिन जब उन्हे यह कह कर खिलाने के प्रयास करते कि डॉक्टर साहब ने कहा है कि यदि नहीं खाओगी तो हॉस्पिटल से छुट्टी नहीं करेंगे? तब निडरता पूर्वक कह देती, "भाड़ मे गये डॉक्टर, हमे नईं खाने"। तब उनसे विनती करनी पड़ती, "अम्माँ थोड़ा धीरे बोलो", "बदनामी होगी", सब सुन रहे हैं, पर उनकी निश्चल निर्भीकता ताउम्र यूं ही बनी रही।         

सांसरिक माया मोह के चलते जीवन से  अनासक्त विरक्ति कठिन है। अम्मां भी इसका अपवाद न थीं। पिछले कुछ दिनों से सोते-जागते या अचानक नींद से जागते उनके निकट उपस्थित परिवार के सदस्य का हाथ अपने हाथ मे ले  कर भगवान का स्मरण करती। मेरा हाथ अपने हाथ मे लेकर भींच लेती। अंतिम समय मे अपने  दारुण और उदास आंखो से अपनी बीमारी से बचने की विवेचना करती! कातर दृष्टि और दर्द, वेदना के भाव भरे चेहरे से,  कहती, "विजय, हम कैसे ठीक होंगे?, कैसे बचेंगे, मुझे बचा लो?" मैंने उन्हे लगातार दिलासा दिला कर  कहा अम्माँ तुम बेफ़िक्र, सो जाओ? तुम्हें कुछ नहीं होगा! मै हूँ न!,  मै  जाग रहा हूँ!! तुम निश्चिंत हो आराम करो!!, फिर भी वे  एक अदृश्य भय से ग्रसित थीं! इस सब के बावजूद मैंने  उन्हे निश्चिंत हो ईश्वर के अभय की दिलासा दी। जीवन की इस अंतिम संध्या वेला के सत्य से वे भी वाकिफ थी और सत्य से मै भी अवगत था, वश फर्क इतना था कि माँ सच बोल रही थी और मै झूठ बोल उन्हे अभय की झूठी दिलासा दे रहा था। मै आत्मग्लानि और छल वंचना से ग्रसित हो मन ही मन चीत्कार कर रहा था!! अम्माँ, मै इतना निरीह और लाचार था कि तुम्हारे अंतिम समय मे भी तुम्हारी इक्छा पूर्ति करने मे विवश और असहाय  था।

लेकिन होनी टल न सकी, 18 जून 2023 को प्रातः आठ बजे के आसपास "अम्माँ का निधन हो गया।

माँ, मै जानता हूँ कि गोलोक वास से तुम मेरे झूठ और मिथ्याभिमान पर मुझे धिक्कार रही होगी, लेकिन मै  सत्य संभाषण कर रहा हूँ अम्माँ, क्योंकि मै तुम्हें किसी भी कीमत पर खुश और प्रसन्न देखना चाहता था। अम्माँ तुम मेरे होने मे लज्जित महसूस मत होना,  मै जन्म-जन्मांतर से तेरी कोख से जन्म लेना चाहता हूँ क्योंकि मै तुम्हें प्यार करता हूँ, तुम्हें याद करता हूँ।

जैसा कि श्रीमद्भगवत गीता मे भगवान श्री कृष्ण अर्जुन से कहते है :-

तमेव शरणं गच्छ सर्वभावेन भारत।
तत्प्रसादात्परां शान्तिं स्थानं प्राप्स्यसि शाश्वतम् (अध्याय 18 श्लोक 62)  अर्थात

हे! अर्जुन, तू सब प्रकार से उस परमेश्वर की ही शरण मे जा। उस परमात्मा की कृपा से ही तू परम शांति को तथा सनातन परम धाम को प्राप्त होगा।

मै ऐसे परम परमात्मा भगवान श्री कृष्ण से प्रार्थना करूंगा कि वह मेरी पूज्यनीय माँ को अपने श्री चरणों मे स्थान प्रदान करें। माँ तेरे चरणों मे नमन, बारंबार नमन।

ॐ शांति, ॐ शांति॰   

विजय सहगल   

       

 


शुक्रवार, 9 जून 2023

"चश्मा"


"चश्मा"


मै एक बार शताब्दी एक्सप्रेस से ग्वालियर की किसी शाखा का निरीक्षण कर  भोपाल आ रहा था। घटना 2011-2012 की रही थी। मेरी पोस्टिंग उस समय भोपाल स्थित प्रादेशिक निरीक्षालय मे थी। ट्रेन मे पेपर पढ़ने के बाद हमने चश्मे को सीट और खिड़की के बीच बाली खाली  जगह पर रख दिया कि अभी फिर से मैगजीन या पेपर पढ़ने के लिये चश्मे की जरूरत पड़ेगी कौन बार बार उसे बैग से निकलेगा,  सोचा चलते समय इसको बैग या पेंट मे रख लूँगा, चूंकि  चश्मा मै सिर्फ पढ़ने के लिये ही इस्तेमाल करता था। प्रादेशिक कार्यालय भोपल मे हमारे मित्र श्री अनिल जैन ने एक बार मुझे सुझाव  दिया कि हम लोग 8-9 घंटे कम्प्युटर पर कार्य करते है अतः आप ये काँच के लेंस के चश्मे की जगह अच्छी कंपनी का प्रोग्रेसिव लेंस का चश्मा लगाओ, जिससे आप को काम करने मे आसानी रहेगी बजन मे हल्के होने के कारण कान, नाक पर दबाब एवं तनाव भी कम रहेगा। उन दिनो टाइटन वर्ल्ड पर चश्मे की सेल भी लगी थी। हमने भी मौके का फायदा उठाते हुए टाइटन का एक चश्मा खरीद लिया जिसकी उस समय कीमत 3000-3500  के लगभग थी जो हमे तभी भी काफी महंगी लगी थी। इसलिये चश्मे के इस्तेमाल और सुरक्षा  मे मै अतरिक्त सावधानी वर्तता था। लेकिन हमने प्रायः  ऐसा देखा है जब किसी कार्य को आप अतरिक्त सावधानी और सुरक्षा पूर्वक करते है तो उस कार्य के करने मे प्रायः गलती हो जाती है। उस दिन भी ऐसा ही हुआ, हमने सोचा जब ट्रेन से उतरेंगे तो चश्मे को उठा लेंगे। ट्रेन अपनी गति से आगे बढ़ती रही हम खिड़की से बाहर सुंदर जंगल, नदी, पहाड़ो के नजारे देखते रहे और भोपाल कब पहुँच गये पता ही नही चला। भोपाल आते ही मै अपना समान ले कर ट्रेन से बाहर आ गया। नई दिल्ली-भोपाल शताब्दी ट्रेन मे अक्सर देखने मे आता है कि ट्रेन मे आते या जाते समय कोई न कोई ग्वालियर या झाँसी का  परिचित मिल ही जाता है क्योंकि ट्रेन का बही रैक नई दिल्ली बापस जाता है और ग्वालियर, झाँसी से आने बाले और ग्वालियर झाँसी जाने बाले प्लेटफॉर्म पर ही मिल जाते है।  उतरते समय मुझे हमारे एक मित्र विजय गुप्ता जी भी उस दिन अचानक भोपाल प्लेटफॉर्म  पर मिल गये जो उसी ट्रेन से झाँसी  बापस जा रहे थे। गुप्ता जी से कुछ समय बात कर मै शालीमार गार्डन, कोलार रोड स्थित अपने घर की ओर चल दिया। अपने चश्मे से बेखबर जब मै  लगभग 18-19 कि. मी. दूर अपने घर पहुंचा, जैसा कि मेरी आदत है ऑफिस या बाहर  से घर आकार मै अपना सामान जो मेरी पेंट/शर्ट मे रहता है घर आने पर कपड़े चेंज करते समय सामान जैसे  पर्स,चश्मा, पेन, कंघा, रुमाल, चाबी  आदि अपनी  अलमारी मे रखता हूँ। उस दिन भी जब मैंने अपना पर्स, कंघा, पेन, निकाला तो हमे अहसास हुआ कि मै अपना चश्मा तो ट्रेन मे भूल आया हूँ। अब कुछ समय तो मै हतप्रभ हो कर किंकर्तव्यविमूढ़ की स्थिति मे  था कि मुझे  क्या करना चाहिये?  जानते हुए भी मैंने  कैसी बेबकूफी करदी, क्यों नहीं चश्मे को तुरंत ही बैग या पेंट की जेब मे रखा, मुझे अपनी गलती पर बड़ा अफ़्सोस हो रहा था। बेमतलब मे तीन-साड़े तीन हजार का नुकसान हो गया। चश्मा बनवाए हुए भी ज्यादा समय नाही हुआ था। अचानक अपने को नियंत्रित करके हमे याद आया कि हमारे मित्र गुप्ता जी भी उसी ट्रेन से बापस झाँसी जा रहे है उनसे संपर्क करना चाहिये? यध्यापि ट्रेन को प्रस्थान किये हुए लगभग 2 घंटे  हो चुके थे पर  ट्रेन झाँसी नही पहुंची थी। मैंने गुप्तजी को फोन लगाया। ट्रेन की सुपर फास्ट गति के कारण दो तीन बार कोशिश के बाद फोन लगा, हमने उन्हे सारी घटना बताई, अपना कोच नंबर और सीट नंबर भी बताया। उनको कोच मे सेवा कर रहे लड़कों से तुरंत संपर्क कर चश्मे के बारे मे पता करने  का निवेदन किया। मुझे चश्मा मिलने की कुछ  उम्मीद  जागी। गुप्ता जी की सीट किसी अन्य कोच मे थी।  कष्ट उठाते हुए गुप्ता जी जब उस कोच मे पहुँचे जिसमे मै बैठा था। बहाँ से जब गुप्ता जी का फोन आया तो शंका मिश्रित ख़ुशी से मैंने फोन उठाया तो उन्होने जो घटना क्रम बताया तो सुन कर काफी निराशा हुई। गुप्ता जी ने बताया की उस कोच मे काम कर रहे लड़के ने बताया "चश्मा तो मिला था लेकिन रेल्वे के एक अफसर कोच खाली होने के बाद सफाई के दौरान कोच मे आये थे उनके किसी मिलने बाले का मोबाइल खो गया था, जो उसी कोच मे उस दिन यात्रा कर रहे थे। जब उस अफसर ने कोच के उस लड़के से  मोबाइल फोन के बारे मे पूंछ-ताछ की तो उसने  उन्हे मोबाइल फोन के मिलने  के बारे मे अपनी अनिभिग्यता बताते हुए चश्मे के मिलने की जानकारी दी और वह चश्मा उन्होने अपने पास रख लिया। अब मन ही मन मै सोचने लगा की मिली हुई चीज़ फिर हाथ से फिसल गई।  मै चश्मे की उधेड़-बुन मे ही उलझा रहा।  एक बारगी तो लगा शायद चश्मे का न मिलना ही भाग्य मे लिखा होगा छोड़ो जो नुकसान होना था हो गया पर अचानक दिमाक मे आया  कि  हमे चश्मे को  ढूड्ने का प्रयास तो करना ही चाहिये।
मन मे विचार आया कि जिन सज्जन का मोबाइल खोया है बे जरूर मोबाइल खोने की रिपोर्ट पुलिस मे दर्ज़ करायेंगे, क्योंकि सुरक्षा कि द्रष्टि से ऐसा करना आवश्यक होता है।  मै बगैर कुछ देरी किये रेल्वे स्टेशन भोपाल के लिये रवाना हुआ। स्टेशन हमारे घर से काफी दूरी पर था, लगभग 1 घंटे मे जैसे ही मै स्टेशन पर  प्लेटफॉर्म न. 1 पर स्थित आर. पी. एफ़.  थाने पर पहुँच कर जब ड्यूटि पर तैनात सिपाही से मोबाइल खोने की रिपोर्ट के बारे मे पूंछा तो उसने मोबाइल खोने की ऐसी किसी भी रिपोर्ट आने से माना किया जब मैंने उससे  किसी व्यक्ति द्वारा चश्मा जमा करने के बारे मे पूंछा तो उसने कुछ मुस्कराते हुए कहा श्रीमान, आज के समय मे भी आप उम्मीद करते है कि  कोई मिली चीज़ भी जमा कराने आयेगा?  एक बार पुनः हताशा हाथ लगी फिर भी निराश न होते हुए मै जी. आर. पी. थाने पहुंचा और मोबाइल खोने या चश्मा जमा करने की  रिपोर्ट के बारे मे जानकारी ली वहाँ पर भी निराशा हाथ लगी। पूरी तरह न उम्मीद होकर मैंने हार मन ली और एक अंतिम प्रयास के रूप मे प्लेटफॉर्म पर स्थित मुख्य निकासी गेट पर स्थित पुलिस चौकी पर मोबाइल खोने या चश्मे के पाने की सूचना के बारे मे पूंछा वहाँ से भी नकारात्मक उत्तर प्राप्त हुआ। अब मैंने प्लेटफॉर्म न. 1 पर स्थित टिकिट चेकिंग ऑफिस, स्टेशन मास्टर ऑफिस, उप स्टेशन अधीक्षक ऑफिस, बुकिंग ऑफिस, रेल पुंछ-ताछ सेवा, विद्धुत मैंटेनेंस ऑफिस मे एक एक कर चश्मा मिलने के बारे मे जानकारी जुटाई परन्तू कोई लाभ नही हुआ और प्रत्येक ऑफिस मे हमे "न" मे जानकारी मिली । मन ही मन,  बार बार मै उस ऑफिसर को कोस रहा था कि काश वो  रेल्वे ऑफिसर कोच अटेंडेंट को  न मिलता तो चश्मा गुप्ता जी के माध्यम से तो मिल जाता? पर शायद चश्मा जान हार था सो चला गया?  अब एक आर. एम. एस. एवं पार्सल ऑफिस के अलावा एक-दो ऑफिस और शेष थे हमने इन्हे भी संपर्क करने का निश्चय किया। जब मै सी. एंड  डबल्यू.  कार्यालय मे पहुंचा और अपने चश्मे को शताब्दी एक्सप्रेस मे खोने की बात का जिक्र किया तो उस कार्यालय के बाबू ने जो उत्तर दिया जिसे सुनकर  मेरी ख़ुशी का ठिकाना नही रहा। उस बाबू ने बताया कि हमारे साहब को एक चश्मा मिला तो है वह चश्मा साहब ने अलमारी मे रख दिया है बे अभी आते है तब तक आप इंतजार करें। एक उम्मीद की किरण फिर दिखलाई दी लेकिन लगता है सफलता अभी पूरी तरह नही मिली थी। 15-20 मिनिट इंतजार के बाद श्री पटेल (पूरा नाम मै भूल गया) जी कार्यालय मे आये तो बाबू ने मेरा परिचय कराते हुए चश्मे की  बात बताई। जब हमने चश्मे की कंपनी  टाइटन और कवर का रंग काला बताते हुए पटेल साहब को घटना बताई तो उन्होने अलमारी से चश्मे को निकाल कर दिखाया। चश्मा मेरा ही था जिसे देख कर जो प्रसन्नता हुई उसको  बयां करना मुश्किल है। उन्होने सारा घटना चक्र सुना हमे चाय पिलाई और चश्मा हमारे सुपुर्द कर दिया। उन्होने बताया कि उनके एक परिचित  भी उसी कोच से भोपाल आये थे उनका मोबाइल ट्रेन मे खो गया था उसकी छान-बीन करने हेतु वह उस कोच मे आये थे उस दौरान ट्रेन मे साफ-सफाई चल रही थी, जब मैंने उस लड़के से मोबाइल फोन के बारे मे पूंछा तो उसने बताया कि एक चश्मा मिला है जिसे मैंने उससे ले कर अपने पास रख लिया और जिसे अब मै आपके सुपुर्द कर रहा हूँ।  बेशक  एक साधारण सी वस्तु जिसका मूल्य कम या नगण्य था  पर कठिन मेहनत के बाद उसे हासिल करने मे जो ख़ुशी मिली बह अनमोल थी।  

विजय सहगल