शनिवार, 26 नवंबर 2022

मनीष- ए बॉटल बॉय ऑफ-गंगटोक

 

"मनीष- ए बॉटल बॉय ऑफ-गंगटोक"








यूं तो 14 नवम्बर 2022 का दिन भारत के इतिहास मे भारत के प्रथम प्रधानमंत्री प॰ जवाहार लाल नेहरू के जन्मदिन बाल दिवस के रूप मे प्रसिद्ध है पर मै सिक्किम की राजधानी गंगटोक मे प्रातः लगभग 5.30 बजे भ्रमण पर निकला हुआ था। हल्की सर्दी के बीच "सविता देवता"  अपने पूरे ओज और प्रकाश के साथ गंगोटोक की पहाड़ियों को प्रकाशित कर रहे थे। तब मान बहादुर और राम प्रसाद जैसे लोग सूर्योदय के पूर्व प्रातः के 3.00 बजे से अपने सहकर्मियों के साथ गंगोटोक की सड़कों को स्वच्छ बनाने मे जुट जाते है। गंगटोक शहर या पूरा सिक्किम यूं ही साफ सुथरा नहीं हो जाता। सिक्किम का हर नागरिक जो  परोक्षताः  अपने प्रदेश को साफ सुथरा बनाता ही है पर प्रत्यक्षतः सिक्किम के सफाई कर्मी ही अपने प्रदेश को देश मे सबसे साफ-सफाई  वाला प्रदेश बनाने मे अपना महत्वपूर्ण योगदान प्रदान करते है। ऐसे ही एक सफाई योद्धा "श्री मान बहादुर" से मुलाक़ात हुई जो महात्मा गांधी रोड की ओर जाने वाली सड़क पर निष्काम भाव से  सेवा मे रत थे। आगे मुख्य महात्मा गांधी रोड की सफाई के पूर्व और सफाई के पश्चात का अंतर स्पष्ट देखने को मिला जिसको मैंने अपने मोबाइल मे  कैद करने की कोशिश की। एक और स्वच्छ कर्मवीर  श्री राम प्रसाद अपने अन्य साथियों के साथ महात्मा गांधी मार्ग पर सफाई के इस अंतर को विस्तार रूप देने लगे थे। लोग यूं ही गंगटोक को देश का सबसे  साफ सुथरा शहर  नहीं कहते इसका जीता जागता उदाहरण मान बहादुर और रामप्रसाद जैसे सफाई कर्मियों के रूप मे पूरे महात्मा गांधी मार्ग गंगटोक पर देखा जा सकता है।

भारत मे छद्म आवरण ओढ़े बुद्धिजीवियों की एक जमात अपनी आदत और व्यवहार के अनुरूप  समान रूप से  जम्मू कश्मीर से दक्षिण भारत के राज्यों तक एवं पूर्वोत्तर राज्यों से पश्चिम के गुजरात तक समान रूप से मिल जायेगी जो रात मे अँग्रेजी शराब, व्हिस्की या बियर का उपयोग कर उनकी खाली बोतलों को रात के अंधेरे मे शहर के कचरघरों, कूड़ाघरों या घूरों पर बेतरतीब ढंग से फेंक देते है। ये आदत जाति, धर्म, संप्रदाय और क्षेत्रीयता से परे एक समान रूप से पूरे देश मे व्याप्त है।                 

गंगटोक के एमजी मार्ग से प्रातः भ्रमण मे बापसी पर एक और स्वाभिमानी, चतुर और तीव्र बुद्धि अठारह वर्षीय किशोर श्री मनीष से मुलाक़ात हुई जो अपनी पीठ पर एक भारी भरकम बड़े से बोरे (झोले) को अपनी पीठ पर लादे, गंगटोक की पहाड़ी सड़कों की चढ़ाई पर चढ़ रहा था। एक तो सीधी कड़ी चढ़ाई उपर से पीठ पर लदे  बोझ ने उस किशोर की पीठ को झुका रक्खा था। मैंने जब हे! यंग बॉय!! संबोधित कर उत्साहवर्धन के साथ उसका परिचय जानने और बात करने की इक्छा प्रकट की? तो वह शंका और जिज्ञासा वश कुछ डरा और सहमा नज़र आया। मैंने उसे अपनेपन और सहजता से जब उसे धैर्य पूर्वक कुछ शांत किया तब वह अपने वारे मे खुल का बोलने को तैयार हो गया। बिहार के सीतामढी  जिले का रहवासी उस नव युवक ने जीवन संघर्ष के पथ पर अपनी जीवन यापन की यात्रा तब शुरू कर दी थी जब समान्यतः बच्चे विध्याध्यन हेतु स्कूल की राह पकड़ते है। आठवीं पास मनीष के पीठ पर लदे बोझ का अंदाजा लेने हेतु जब मैंने उस के झोले को उठा बजन का अनुमान लगाया जो किसी भी हालत मे 18-20 किलो से कम न था। मनीष भी एक ऐसा परोक्ष सफाई योद्धा था जो समाज के उस तथा-कथित उच्च तबके की फैलाई बीयर और व्हिस्की की खाली बोतलों की  गंदगी को साफ करने मे संलग्न था जो तमाम छद्म आवरण ओढ़े समाज मे एक श्रेष्ठ स्थान रखने का प्रयास करते  है और जो बुद्धिजीवि वर्ग के नाम से पुकारे जाते है। ये थोपे हुए बुद्धिजीवि वर्ग जो अपने  मजबूत कंधो पर देश की समस्याओं के समाधान का बोझ ढोते तो  है पर अपनी कमजोर और कायर सोच को पूरे देश मे समान रूप से रात के अंधेरे मे सड़कों मे इधर-उधर बेतरतीब रूप से छितरा कर फैला देते है।

जब मैंने मनीष से  उसके  दिल को दुखाने जैसी किसी घटना को सांझा करने को कहा तो सुन कर सहसा वह कहीं शून्य मे खो गया। उसके चेहरे पर मायूसी और निराशा के भाव साफ नज़र आये!! उसने बताया कि जब उसके साथ के दूसरे लोग जो अन्य दूसरा व्यवसाय करते है और उसे कबाड़ी का काम करने वाले कृत को हिकारत और हेय दृष्टि से देखते है। वे लोग कचरे मे से इस बोतल, प्लास्टिक के कबाड़ को इकट्ठा करने के काम को नीच काम मानते है। उसके अपने लोग उसकी शक्ल सूरत पर व्यंग कस उसे  काला और भूतह शक्ल का बता उसका मज़ाक उड़ाते है। जब बड़े भोलेपन से उसने ये कहा, "कि सर क्या मै काला और भूतह दिखता हूँ? या मेहनत और ईमानदारी से काम करना कोई गलत या गंदा काम है? मैंने उसका हौसला बढ़ाते हुए उसको ईमानदार और मेहनती युवा कहा, जो अपनी लगन और परिश्रम के बल पर अपना जीवन यापन कर रहा है। कोई काम ऊंचा या नीचा नहीं होता।

मनीष ने बताया कि बीयर या विभिन्न ब्रांड और रूप की व्हिस्की या अँग्रेजी शराब की बोतलों की खाली बोतले 3.50 रूपये प्रति बोतल की दर से वह ठेकेदार को बेच देता है। मुझे ये जान कर अति प्रसन्नता हुई जब मनीष ने  बताया कि कल उसे इन बोतलों को बेचने पर 1500/- की कमाई हुई। मनीष के बारे मे कुछ और जानने की जिज्ञासा के क्रम मे उसने बताया कि वह अपनी कमाई का आधे से ज्यादा हिस्सा अपने गाँव मे अपने माँ-बाप को भेजने के लिए बचत के रूप मे अपने सेठ अनिल भाई  के पास जमा करता है। बोतलों के साथ लोहा 19-20 रूपये किलो की दर से एवं  प्लास्टिक का कबाड़ को भी एकत्रित कर 10-15 रूपये तक मे बेचता है। वह बताता है कि इस कबाड़ को इकट्ठा करने हेतु वह अपनी चुस्त और फुर्तीले शारीरिक क्षमता के चलते 7-8 किमी॰ की पैदल यात्रा कर लेता है जबकि उसके अन्य साथी नीचे  पहाड़ी क्षेत्रों से जाने से बचते है। शहर के अन्य कबाड़ खरीदने वाले ठेकेदार उसके कबाड़ को ज्यादा पैसे मे खरीदने के लालच देने के बावजूद वह अपने कबाड़ को सिर्फ अनिल भाई को ही बेचता है क्योंकि अनिल भाई ने उसको रहने की ठौर और खाने आदि की सुविधा के साथ एक सामाजिक संरक्षण दे रक्खा है जो प्रायः इस तबके को काम ही नसीब होता है।

बेशक सिक्किम या देश के अन्य शासक-सरकारें, तुम (मनीष) जैसे लोगो के कार्य की सराहना या पहचान न करें लेकिन तुम लोगो का भी गंगटोक को साफ सफाई, स्वच्छ रखने  मे एक अहम और महत्वपूर्ण भूमिका से इंकार नहीं किया जा सकता और निश्चित ही सभी को तुम्हारी  सराहना करनी ही चाहिये!! उसके आँखों की चमक ने उसके चेहरे पर खुशी की एक हल्कि मुस्कान ला दी जिसने मेरे मन मे भी खुशियों की एक हिलोर पैदा कर दी!! जिसको मै अब तक न भूल सका!! मनीष के उज्ज्वल जीवन की कामना करते हुए मैंने मनीष जैसे मासूम और अबोध किशोर से बिदा ली।

विजय सहगल

सोमवार, 21 नवंबर 2022

काजीरंगा पार्क मे हाथी की जान जोखिम सवारी

 

"काजीरंगा पार्क मे हाथी की जान जोखिम सवारी"







सेवानिवृत्त जीवन को यादगार बनाने हेतु हम पांचों मित्र जो "पाँच पांडव" नाम से विख्यात थे  ने देश के पूर्वोत्तर राज्य आसाम और मेघालय जाने का कार्यक्रम बनाया। मित्र नीलिमा-अनिल रस्तोगी तो अपने पूर्व निर्धारित कार्यक्रम के कारण उपलब्ध न हो सके लेकिन हम चारों मित्रों को  अपनी अपनी अर्धांगनियों के साथ देश के पूर्वोत्तर राज्यों के प्रवेश द्वार गुवाहाटी मे एकत्रित होना था। यात्रा के एन एक दिन पहले डी॰के॰ (साधना-दिनेश मेहरोत्रा) की अस्वस्थता के चलते वे भी लखनऊ से न आ सके। कार्यक्रम पूर्व निर्धारित था इसलिये अब हम तीनों साथी उमा-संजीव, आशा-श्याम टंडन, रीता और मै दिनांक 31 अक्टूबर  2022 को गुवाहाटी पहुँच गये। हमारे ग्रुप मे आशा-श्याम की बेटी दिशा भी थी जो ग्रुप मे सबकी लाड़ली और चहेती थी, दिशा के मेघालय मे मावसमई की लाईम स्टोन से बनी गुफाओं   मे उसकी बहदुरी और निडरता के लिए हम सभी ने  उसे "कर्नल" कह संभोधित कहना शुरू कर दिया!  

5 नवंबर 2022 को हम लोगो का काजीरंगा राष्ट्रीय अभ्यारण मे एक सींग वाला गेंडा हाथी (Rhino) देखने जाने हेतु प्रातः चार बजे उठ कर हाथी की सवारी करने हेतु प्रस्थान करना था।  समस्या ये थी कि हाथी की सवारी के दो ही टिकिट उपलब्ध थे। तब निश्चित ही ग्रुप के दो बहादुर सदस्यों को स्थान मिलना था। इस हेतु मेरे और कर्नल (दिशा बिटिया) को मौका मिलना ही था पर प्रतीक्षा सूची के कारण आशा और मेरी पत्नी रीता को भी हाथी की सवारी की संभावना थी, जो काजीरंगा के बारगी स्थित पार्क के प्रवेश द्वार पहुँचने पर कन्फ़र्म हो गयी। एक हाथी पर चार पर्यटकों  के बैठने की व्यवस्था थी पर अभ्यारण के नियमों के चलते कन्फ़र्म और प्रतीक्षा सूची के पर्यटकों को अलग अलग हाथी से सवारी करनी थी। पर आशा और रीता रूपी महिला शक्ति के प्रतिवाद के चलते अंततः हम सभी एक ही हाथी पर सवार हो राइनो की तलाश मे कांजी रंगा पार्क के जंगल मे चल पड़े।

चूंकि हाथी की सवारी के पूर्व रुपए 100/- की एक "सशस्त्र सुरक्षा फीस" के नाम की रसीद संख्या 63793 दी गयी जो प्रवेश द्वार पर काजीरंगा अभ्यारण के स्टाफ ने बापस ले ली। पर देश मे व्याप्त विभागों मे अफसरशाही, लालफ़ीताशाही और अनधिकृत कदाचार के मेरे अमुभव ने मुझे सशस्त्र सुरक्षा रसीद की फोटो लेने को प्रेरित किया। हाथी की सवारी की फीस 1000/- रुपए प्रति सवारी की कोई रसीद किसी भी पर्यटक के पास नहीं थी क्योंकि काजीरंगा अभ्यारण के अधिकारियों ने कोई रसीद किसी को दी ही नहीं गयी।

कुछ कदम अंदर पैदल जाने पर हाथियों के झुंड देखने को मिले जिनकी संख्या 30-40 से कम न थी। बाएँ हाथ की दिशा मे बने सीमेंट के प्लेटफॉर्म पर से पर्यटक हाथी पर कसे हौदों पर बैठ रहे थे। एक हाथी पर निर्धारित चार पर्यटकों के बैठते ही दूसरे हाथी पर पर्यटकों को बैठने के लिये स्थान खाली कर आगे बढा दिया जाता। इस तरह पाँच-छह हथियों का एक झुंड बना हाथी के महावतों की अगुआई मे उनको जंगल की ओर छोड़ दिया जाता। हम लोग भी छह हथियों के  एक समूह के साथ आगे बढे। ये समूह कुछ दूर आगे बढ़ा ही था कि पुनः तीन-तीन हथियों के दो दल मे विभक्त हो कर अलग अलग दिशाओं मे "राइनो" की तलाश मे बढ़ गया। हम लोग कुछ सौभाग्यशाली थे मुख्य पगडंडी को छोड़ दलदले मे  मुड़े ही थे कि एक मादा राइनो अपने एक बच्चे के साथ बैठी दिखाई दी। हाथी के पदचाप और पर्यटकों के शोर के कारण वह मादा राइनो  दूसरी ओर झड़ियों के तरफ मुड़ गयी। तीनों हथियों पर बैठे सभी सवारों  ने जिज्ञासा और उत्सुकता से काजीरंगा अभ्यारण के मुख्य आकर्षक इन मेहमान राइनो को देखा और अपने अपने मोबाइल, कैमरों मे कैद किया। प्राकृतिक परिवेश मे इन अथितियों को इतने नजदीक से  देखना एक अलग ही रोमांचक अनुभव था जिसको मैंने भी अपने मोबाइल मे कैद करने की कोशिश की।

हम सभी खुश थे और इसके बाद अन्य राइनो की तलाश मे आगे बढ़ ही रहे थे कि हमारे समूह के एक हाथी पर बैठे पर्यटकों के साथ एक अनहोनी घटना घटी। हाथी पर बंधे हौदा धीरे-धीरे एक ओर झुकने लगा। उनके साथ एक 2-3 साल का बच्चा बिट्टू भी था, जो हौदे के  एक ओर झुकने के कारण लगातार रोये जा रहा था। धीरे धीरे हौदा लगभग 45 डिग्री तक झुक चुका था।  मैंने तीनों  हाथी के महावतों को हौदे को ठीक कर सीधा करने को कहा। तीनों महावतों के प्रयास के बावजूद उस हाथी के हौदे को ठीक न किया जा सका, इस आपाधापी मे  अचानक ही सवारों के सामने लगा लोहे का  सुरक्षा रौड भी निकल गया। इस कारण जमीन की तरफ बैठे युगल और उनके बच्चे के नीचे गिरने की नौबत देख अन्य पर्यटकों के तो मानों प्राण ही हलक मे अटक गये!! नीचे की ओर लटक रहे युगल के बच्चे को सबसे पहले हमारे समूह की  आशा ने अपने हाथों से खींच कर अपने साथ हौदे पर बैठा लिया। तीनों महावत भी हाथी को बिल्कुल एक दूसरे के नजदीक सटा कर आपदा और संकट मे फंसे सहयात्रियों को दूसरे हथियों पर स्थानांतरित करने का प्रयास कर रहे थे साथ ही मै भी अपने ग्रुप के सदस्यों के साथ संकटग्रस्त हाथी सवारों की हौसला अफजाई और प्रोत्साहन से उनके डर-भय को दूर करने का प्रयास कर रहा था ताकि वे निडर होकर आए हुए संकट का सामने बहदुरी और हिम्मत से कर सके। जब मैंने तीनों महावतों से हाथी को नीचे बैठा उस पर सवार यात्रियों को संतुलित तरीके से बैठाने या पैदल पैदल गंतव्य तक ले चलने को कहा? तो महावतों ने कहा कि नीचे दलदल मे राइनो का संकट अभ्यारण के नियम के तहत  हमे इस तरह की अनुमति नहीं देते!! नीचे झुक रहे हौदे पर से हमारे हाथी के महावत ने अब आकस्मिक परिस्थितियों मे उस युवती का हाथ पकड़ कर अपने हाथी पर हिम्मत से कदम बढ़ा उछलने को कहा!! यध्यपि दोनों हथियों के बीच मात्र 3-4 फुट का ही फासला था पर इनके बीच नीचे  तीन हथियों के भारी-भरकम पैरों के बीच 15-17  फुट नीचे  की दलदली खाई, मेरे सहित सभी पर्यटकों का दिल दहलाने को काफी थी।   साथ ही आस-पास अदृश्य रूप से घूम रहे एक सींग वाले हिंसक राइनो का भी जान लेवा संकट मंडरा रहा था। डर ये था कि हाथ छूटने की कल्पना से ही मन सिहर जाता था। पर ईश्वर की कृपा और उन दोनों युगल की हिम्मत और बहदुरी ने एक एक कर दोनों युवतियां  हमारे हाथी पर एवं उनके पतियों को दूसरे हाथी पर चढ़ने की कोशिश कामयाब हो गयी। संकट का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि जिस हाथी पर नियमानुसार चार व्यक्तियों के बैठने की अनुमति थी उस पर 7-8 लोग सवार थे। लेकिन मानवता का तक़ाज़ा था कि हमे एक दूसरे के सहयोग से इस संकट से उबरना था। यही नहीं हाथी के माथे पर, सूड़ की तरफ महावत के बाद दो सवार और बैठे थे जो घोर संकट मे थे। हम सभी ने इस संकट ग्रस्त परिस्थियों से ध्यान हटाने के लिए और इस दौरान माहौल को हल्का-फुल्का बनाने के लिए एक दूसरे का उत्साहवर्धन किया और "चल चल चल मेरे हाथी............" जैसे गाने गाये ताकि उन युगल बापसी स्थल तक के संकट का समय   शिथिलता और निडरता से कर सके। 

अब विना एक पल गँवाए मैंने तुरंत ही महावतों से बापस गंतव्य स्थल पर चलने का आग्रह किया। मेरे क्रोध की सीमा उस समय चरम पर थी जब इस संकट के दौरान एक हाथी पर सवार पर्यटक ने श!.....श!....श!.... चुप कराते हुए शोर न करने का इशारा किया ताकि "राइनो" को देखा जा सके!! मैंने क्रोधावेश मे उन सज्जन को डांटते हुए कहा कि लोगो की जान जोखिम है और आपको राइनो देखने की पड़ी है!! चुप रहिए!! बंद कीजिये अपनी श!.....श!....श!....। अब तक हमारे तीन हाथी समूह का एक हाथी बिना सवारी के साथ-साथ  खाली चल रहा था और  जिसकी सवारियों अन्य दो हाथी पर सवार हो, अपनी यात्रा अधूरी छोड़ कर बापसी की राह पकड़ चुकी थी।

हद तो तब हो गयी जब दोनों हथियों को बापसी स्थल के सामने, हाथी को बैठा कर हम लोगो को उतारने का प्रयास किया गया। क्योंकि 30-40 हथियों और सकड़ों पर्यटकों के भीड़ के बीच हमारे दोनों हथियों जिन पर 7-8 सवार थे को कोई ध्यान न दे  सके और इस "अप्रिय जान जोखिम" की घटना को रफा दफा किया  जा सके!! इस आशंका को भाँप मैंने चीख-चींख कर वहाँ उपस्थित एक दो गार्ड को तुरंत आपात स्थिति मे प्लेटफॉर्म को खाली करा हमारे दोनों हथियों को प्राथमिकता के आधार पर पर्यटकों को तुरंत उतार सकने का निर्देश दिया। मेरे चीखने-चिल्लाने पर वहाँ उपस्थित सैकड़ो पर्यटकों और काजीरंगा अभ्यारण के उपस्थित स्टाफ का ध्यानाकर्षित हुआ और शीघ्र  ही  प्लेटफॉर्म को खाली करा कर तुरंत हम सभी को उतारा जा सका। अब हम लोगो की जान सांसत से मुक्त हो चुकी थी। उन दोनों युवतियों की आँखों मे खुशी के आँसू थे। अपने बच्चे "विट्टू" को गोद मे लिए वे बार-बार एक दूसरे को गले लग अपनी खुशी का इज़हार कर रहे थे।

बाद मे ज्ञात हुआ कि ओड़ीशा  निवासी श्री संतोष साहू अपनी पत्नी, बच्चे और साथी युगल  के  साथ त्रिपुरा राज्य की राजधानी अगरतला से आये थे जहां वे इरकॉन मे उप महा प्रबन्धक के पद पर कार्यरत थे। उनके साथी श्री प्रत्युष साहू भी उनके साथ थे।        

इस पूरे प्रकरण मे काजीरंगा अभ्यारण के अधिकारियों का व्यवहार बहुत ही लापरवाही और गैरजिम्मेदारन था। उसी दिन मैंने bagorirange@gmailcom को शिकायत प्रस्तुत की। असम के दृश्य और प्रिंट मीडिया ने इस घटना को प्रमुखता से प्रसारित किया लेकिन कहीं कोई कार्यवाही की सूचना हमे अब तक अप्राप्त है। मेरी ऐसी शंका है कि काजीरंगा वन अभ्यारण मे अधिकारियों की आपसी मिली भगत से कोई बड़ा घपला या घोटाला  चल रहा है? जिसकी जांच आवश्यक है।   पार्क मे वन अभ्यारण की देख रेख मे प्रति हाथी की सवारी की फीस 4000/- बसूल की जा रही है अनेकों अनुनय विनय के बावजूद इसकी कोई रसीद मुझे नहीं प्रदान की गयी? रुपए 100/- की  सशस्त्र सुरक्षा रसीद दी गयी किन्तु प्रवेश द्वार पर वह भी बापस ले ली गयी। ईश्वर न करें यदि कहीं कोई अनहोनी हो जाती तो काजीरंगा अभ्यारण प्रशासन की ज़िम्मेदारी तय करने का कोई भी प्रामाणिक दस्तावेज़ हमारे पास उपलब्ध नहीं था??  

आशा है असम के मुख्य मंत्री श्री हिमन्त बिश्व शर्मा इस संबंध मे आवश्यक कार्यवाही करेंगे!! एवं  इस संबंध मे की गयी कार्यवाही से अधोहस्ताक्षरित को अवगत कराएंगे?  पार्क मे हाथी के सवारी के दौरान  सुरक्षा के आवश्यक प्रबंध एवं  हाथी की सवारी मे बसूले जा रहे शुल्क की रसीद मे पारदर्शिता रखेंगे?          

विजय सहगल

बुधवार, 16 नवंबर 2022

अमूल्य दूध पीता है इंडिया

 अमूल्य दूध/लस्सी पीता है इंडिया  by विजय सहगल 


अमूल्य दूध पीता है इंडिया 




सिक्किम पुलिस मुस्तैदी से अपनी ड्यूटि करती हुई साथ मे है दूध अमूल्य पीता है सिक्किम पुलिस 

शुक्रवार, 11 नवंबर 2022

सराहन बुशहर (हि॰प्र॰)

 

"भीमकाली मंदिर-सराहन बुशहर (हि॰प्र॰)"

 




               



2 जून 2022 को रामपुर बुशहर के भ्रमण के बाद  मुझे शिमला जिले के सराहन कस्बे मे स्थित माँ भीमाकली मंदिर मे जाने का सौभाग्य प्राप्त हुआ जो समुद्र तल से लगभग 7600 फुट की ऊंचाई पर, पहाड़ों पर स्थित है। भारत-तिब्बत सीमा के पुराने मार्ग पर स्थित सराहन कस्बा भौगोलिक दृष्टि से हिमाचल प्रदेश का एक बहुत छोटा कस्बा है। बुशहर राजवंश की कुलदेवी भीमा काली का एक प्राचीन मंदिर जिसकी गिनती 51 शक्तिपीठों मे होती है। रामपुर से 47 किमी॰ दूर स्थित इस कस्बे मे तापमान के अंतर को स्पष्टतः महसूस किया जाता है जो इसे  प्राचीन बुशहर राज्य की ग्रीष्मकालीन राजधानी होने के दर्जे को न्यायोचित ठहराता है।  सराहन का ये भीमा काली  मंदिर, शिमला से 180 किमी॰ तथा रामपुर कस्बे से 46 किमी॰ की दूरी पर है। ऐसा माना जाता है कि  किन्नौर घाटी के प्रवेश द्वार पर स्थित ये  हिमाचल प्रदेश का एक अति प्राचीन मंदिर है जो लगभग 2000 वर्ष पूर्व वसा था। पुराणों मे शिव के वास स्थान के रूप मे इसे सोनितपुर के रूप मे वर्णित किया गया है। मंदिर का निर्माण 3 विशाल आँगन मे अवरोह की स्थित मे किया गया है अर्थात सबसे उपर के आँगन मे माँ भीमा काली का पाँच मंज़िला काष्ठ कला का अद्भुद स्थापत्य का नमूना मंदिर बनाया गया है। मंदिर के प्रांगण के नीचे दो और आँगन बने है। नीचे के सबसे विशाल आँगन मे मंदिर का प्रवेश द्वार के साथ ही रघुनाथ जी, नरसिंह एवं पाताल भैरव जी का भी मंदिर है। मंदिर परिसर के इस आँगन मे एक ओर श्रद्धालुओं को ठहरने के लिये 12  आवासीय कमरे भी बनाये गायें है, मंदिर प्रबंधन से संपर्क कर पूर्व सूचना देकर जिनको आरक्षित किया जा सकता है। अपने सुधि पाठकों की सुविधा हेतु मंदिर का दूरभास क्रमांक 01782274248/234054 उल्लेखित है।   

सराहन मे मंदिर प्रबंधन द्वारा ठहरने और खाने की उत्तम व्यवस्था की गयी है।  सराहन के मौसम, शुकून  और शांति को देख मुझे लगा कि रामपुर बुशहर की जगह यदि एक दिन का प्रवास सराहन मे किया जाता तो उचित होता। दो राजमहलों और बमुश्किल सौ-सवा सौ घरों के इस सुरम्य, शांत और प्राकृतिक सौन्दर्य से भरपूर कस्बे मे हिमाचल की सांस्कृति की झलक एवं  गाँव के लोगो की मंदिर के प्रति श्रद्धा भक्ति को सरलता से देखा जा सकता है। कस्बे के रहवासियों, सरकारी कर्मचारियों और छात्र-छात्राओं की नित्य, माँ भीमा काली के दर्शन हेतु ललक-लालसा इस बात का ध्योतक है।

मंदिर के फर्श पर साधारण पत्थर लगाए गए थे पर मंदिर की छत्ते ढालूदार काले आयताकार स्लेट पत्थर से बनाई गयी थी जो उपर से नीचे एक के नीचे एक क्रम मे सीधे लाइन से रक्खे गए थे ताकि वर्षात का पानी सीधे बाहर आँगन या मंदिर प्रांगण मे गिरे। लकड़ी की उपलब्धता प्रचुर मात्रा मे होने के कारण मंदिर की  ऊपरी मंज़िले सुनहरे रंग मे रंगी नक्काशी दार स्तंभों और दीवारों से बनाई गयी थी। कहीं बारीक नक्काशी दार बलयाकार बालकनी, छोटी-छोटी खिड़कियाँ, दरबाजे देखने मे अति सुंदर प्रतीत हो रहे थे। पहले आँगन से सीढ़ियों के माध्यम से प्रवेश कर दूसरे कुछ छोटे आँगन मे प्रवेश करते ही एक शानदार चाँदी का दरबाजा दिखाई दिया जो मंदिर का द्व्तिय  प्रवेश द्वार था। दरवाजे के दोनों ओर पारंपरिक लकड़ी के शेरों के पुतले रक्खे गए थे। इसमे प्रवेश करते ही आगंतुकों, पर्यटकों को अपने पर्स, बेल्ट मोबाइल और कैमरों को वहाँ उपलब्ध लॉकर की  अभिरक्षा मे अनिवार्यतः रखना होता है। उस स्थान पर मंदिर प्रबंधन द्वारा उपलब्ध कराई गयी सफ़ेद रंग की बुशहरी टोपी पहनना अनिवार्य थी जिसके बिना मंदिर मे प्रवेश की अनुमति नहीं थी। महिलाओं को सिर पर दुपट्टा या पल्लू भी इसी श्रेणी मे था। चूंकि मोबाइल कैमरे आदि की अनुमति न होने के कारण मंदिर के मुख्य प्रांगण और मंदिर की तसवीरों को लेना संभव नहीं थी।

प्रायः हिमाचल के मंदिरों की बनावट एक सी देखने को मिली। विशेष वर्गाकार स्तम्भ के ऊपरी सिरे पर उससे भी बड़े वर्गाकार की लकड़ी से निर्मित आकृति  को मजबूती से बनाया गया था जो दूर से ऐसे प्रतीत होती थी मानों वर्गाकार स्तम्भ के ऊपर एक और बड़े वर्गाकार कक्ष को टिका कर रक्खा  गया हो। मंदिर के लगभग 12-15 फुट के वर्गाकार कॉरीडोर मे प्रवेश करते ही एक तरफ छोटी सीढ़ियों के माध्यम से प्रत्येक सीढ़ी, जिन पर लाल रंग के गरम कालीन से  सजाया गया था, उपर जाने का रास्ता था। तीसरी मंजिल पर मुख्य मंदिर का मंडप जो लगभग 20X20 फुट का था और जिसके केंद्र मे एक सुंदर  सिंहासन पर देवी भीमकाली की भव्य चाँदी की प्रतिमा विराजित थी। हम लोगो का सौभाग्य था कि प्रातः के 9.00 बजे आरती का समय होने के कारण आरती मे शामिल होने का सौभाग्य मिल गया। लगभग 20 मिनिट आरती और स्तुति मे शामिल होने के दौरान मंदिर के मंडप मे बैठने के इस अद्भुद सुयोग ने देवी भीमा काली  के दर्शन को अविस्मरणीय बना दिया। मंगल  आरती और प्रसाद को ग्रहण कर, मंदिर पथ  की परिक्रमा कर, दूसरी ओर से बनी सीढ़ियों से हम लोग नीचे बापस आ गए। पूरे मंदिर परिसर मे हर जगह लाल रंग का कालीन लगाया गया था ताकि पूरे साल चलने वाली सर्दी से दर्शनार्थियों और मंदिर के सेवादार विप्रवरों को सर्दी से राहत मिल सके। मंदिर की इस विशेष शैली को कोट शैली के नाम से जाना जाता है।

मंदिर से बापस नीचे आने पर मंदिर प्रांगण मे ही मंदिर मे प्रयोग आने वाले पुराने वर्तन, कड़ाहों, कांस्य जल पात्रों  आदि का संग्रहालय बनाया गया है जिसमे वर्तनों के अतरिक्त हवन पूजन मे आने वाली वतुओं को करीने से सजाया गया था। जिसके पास ही एक छोटी और आकर्षित यज्ञ शाला जिसके मध्य मे हवन कुंड और उसके किनारे विप्र औ जजमानों के बैठने की व्यवस्था थी, बनाया गया था। प्रवेश द्वारों के उपर बने कमरों मे मंदिर मे कार्यरत कर्मचारियों के ठहरने की व्यवस्था थी लकड़ी से बने इन विश्राम स्थलों पर की गयी नक्काशी और लकड़ी की कलात्मकता देखते ही बनती थी। मंदिर के प्रांगण मे निरुद्देश्य बैठना भी अध्यमिक सुख और शांति देने वाला था। प्रातः के लगभग 10 बजे थे मंदिर प्रांगड़ मे ही बनी साफ सुथरी  कैंटीन मे गरमा गरम आलू के पराँठों का नाश्ता स्वादिष्ट और स्वास्थ्यकर था।

मंदिर प्रांगण से कुछ ही दूरी पर सेवों के बगीचे से होते हुए जब सराहन कस्बे मे बने दो महलों को देखने पहुंचे तो उनके मुख्य द्वार बंद थे, फिर भी महल की चाहारदीवारी के बाहर से महल को देखने से ऐसा लगा कि उक्त महलों का सीधा संबंध वुशहर राजवंश से हो? बेशक ये सुंदर महल इन राजपरिवारों की व्यक्तिगत संपत्तियाँ है पर ये  भवन और राजप्रसादों को भव्य और सुंदर रूप देने वाले कारीगरों, श्रमिकों और वास्तुकारों की वास्तुकला का ये एक   बेजोढ़ रचना के  नायाब नगीने है, जिनके श्रम से इनको इतना शानदार रूपाकार  दिया गया था।  अतः इन राजपरिवारों को पर्यटकों की सुविधा हेतु इनके भ्रमण और देखने की व्यवस्था करनी ही चाहिए बेशक चैल पैलेस की तरह वे कुछ प्रवेश शुल्क इसके एवज मे,  टूरिस्टों से  बसूल कर सकते है।  रामूपुर की तरह ही यहाँ के दोनों  महल अत्यंत आकर्षक और सुंदर थे पर प्रवेश के अभाव मे हम उन श्रमिकों की कला, हिमांचल की सांस्कृति  को अच्छी तरह देखने से वंचित रहे। हमे उम्मीद है हिमाचल प्रदेश का पर्यटक विभाग इस हेतु आवश्यक कार्यवाही करेगा।  

सराहन मे माँ भीमा काली के अद्भुद मंदिर और सुंदर राज महलों की अविस्मरणीय यादगार यात्रा प्रकृति और मानव के बीच पारस्परिक संतुलन का  एक बेजोड़ उदाहरण और आदर्श नमूना थी।

 

विजय सहगल             

शुक्रवार, 4 नवंबर 2022

चुक्खू भाई साब

 

"चुक्खू भाई साब!!"



साठ-सत्तर के दशक मे प्रायः  छोटे कस्बे या वस्ती मे छोटे छोटे मुहल्ले हुआ करते थे। मुहल्लों मे त्योहारों, पर्वो या यूं ही ठांड़े-बैठे बगैर किसी प्रतियोगिता के ही प्रतिद्वंदता हो जाती थी। कब हंसी-ठिठोली या कोई छोटी सी बात मे मान-प्रतिष्ठा का सवाल खड़ा हो लड़ाई झगड़े मे तब्दील हो जाये  नहीं कहा जा सकता था। ऐसे मे मुहल्ले के बलशाली, शूरवीर और दिलेर व्यक्तियों की बड़ी पूंछ परक होती थी और उन्हे सम्मान की दृष्टि से देखा जाता था। ऐसे ही साहसी और निडर व्यक्ति उस मुहल्ले के वास्तविक "हीरो" हुआ करते थे। प्रायः हर मुहल्ले मे ऐसे व्यक्ति हुआ करते थे जो अपने स्वभावगत लक्षणों से अपने मुहल्ले के बच्चों, बड़े-बुजुर्गों, महिलाओं के स्वाभिमान की रक्षा के लिये हमेशा तत्पर हो आगे  खड़े नज़र आते, बिलकुल "शक्तिमान" की तरह! जरूरत और आवश्यकता पड़ने पर उन्हे लड़ाई-झगड़े या मार-पिटाई से भी परहेज़ नहीं रहता। उनके लिये "मुहल्ला" और "मुहल्ला वासियों" की प्रतिष्ठा ही,  उनके "आन-वान-शान" का सवाल हुआ करती थी। बचपन मे मेरे मुहल्ले मे एक ऐसे ही शक्तिमान रूपी पात्र हुआ करते थे  जिनकी उपस्थिती मे हम बच्चों का समूह अपने आप को शेर समझता था और जिन्हे मुहल्ले के सभी लोग "चुक्खू" भाई साब कहा करते थे। चुक्खू भाई साब कद काठी मे एकदम दुबले पतले और छोटे थे पर थे बड़े स्फूर्तिवान, दिलेर और बहादुर। मैंने एक-दो  अवसरों पर दूसरे मुहल्ले के 2-4 लोगों  से बहस मुसाहिबरे मे उनकी दिलेरी और स्फूर्ति को देखा था  जब उनसे हाथापाई की नौबत आयी!! अपने आक्रामक रुख और दहाड़ती आवाज मे 2-4 लोग का भी उनके सामने टिकना मुश्किल हो जाता था। 

हमारे परिवार को जब कभी तालबेहट जाना होता जहां मेरी बुआ और एक चाचा रहते थे, तो बस मे एक अलग ही रुतबा रहता क्योंकि चुक्खू भाई साब  बस ऑपरेटर यूनियन मे कार्यरत थे और आवश्यकता के अनुरूप बस मे मुफ्त यात्रा हो जाती थी। उन दिनों चिट्ठी भेजने/पहुँचने मे हफ़्तों लग जाते लेकिन चुक्खू भाई साहब के माध्यम से चिट्ठी, तार की तेजी से बस के ड्राईवर के हाथ से कुछ ही घंटों मे तालबेहट पहुँच जाती थी। वे हरफनमौला थे कोई व्यवसाय हो या कारीगरी वे कठिन परिश्रमी की तरह हर काम मे अपना हाथ आजमाने से पीछे नहीं हटते। वे मौसम और समय के हिसाब से पूरी मेहनत और लगन के साथ अनेक व्यवसाय मे भी अपना हाथ आजमाते। दीपावली पर आतिशबाज़ी हो या  होली पर रंगों से संबन्धित काम या गर्मी मे कोंछाभांवर के मटके हों सावन के महीने मे राखी हर काम पर उनकी अच्छी पकड़ रहती। फिल्मों का पहले दिन पहला शो शायद ही उनसे कभी छूटता था।        

सड़क पर गोली-कंचा, गिल्ली-डंडा, टीपो या पिट्ठू (आजकल का सितोलिया) खेलते या कबड्डी की दौड़ भाग के दौरान प्रायः हम बच्चों की गलती के बावजूद साइकल से टक्कर हो जाती तो फिर साइकल वाले को साइकल न चलाने के उलहाने दे झगड़ा करना आम बात थी।  "चोरी और सीना जोरी" के तहत उनसे झगड़ना या झूमा झटकी करना हम बच्चों की आदत मे सुमार था। प्रतिद्वंदी से कमजोर पड़ने पर चुक्खू भाई साब रूपी तुरुप का इक्का हमारे पास हमेशा मौजूद रहता था। चुक्खू भाई साब मे एक खास बात थी कि लड़ाई झगड़े मे तो वे हम बच्चों के साथ हमारे पक्ष मे खड़े होते पर पीछे हम लोगो को डांटना और शैतानी ने करने की सख्त हिदायत देना भी नहीं भूलते।     

होली त्योहार के हफ्ते भर पहले से  लकड़ी, कंडा, घास बेचने वालों से होली जलाने की  सामाग्री की बसूली हो या गाँव से आ रही बैलगाड़ियों से 5-10 पैसे की बसूली हम बच्चे अपना हक समझते थे। उन दिनों लोग भी उदारमना, सदाशय कृपालु स्वभाव के होते थे, कुछ लोग हम बच्चों की हठ! और शरारतों!! को नज़रअंदाज़ कर चंदा दे देते थे पर कुछ लोग प्रतिवाद कर चंदा नहीं भी देते थे। जब कभी वाद-विवाद बढ़ता और लड़ाई झगड़े की नौबत आती तो हम बच्चों का परोक्ष रूप से चुक्खू भाई साब पर भरोसा रहता था और चुक्खू भाई साब येन केन प्रकारेण हम बच्चों के पक्ष मे खड़े नज़र आते।

एक बार होलिका दहन हेतु लकड़ी इकट्ठा करने हम बच्चे घर से थोड़ी दूर स्थित नारायण बाग चले गये जहां लकड़ी बहुतायत मे पड़ी रहती थी। 10-12 साल के 5-6 बच्चों ने नारायण बाग मे खजूर के एक कटे पड़े का  एक 6-7 फुट लंबे  पेड़ को देख हम लोग  उसे होलिका दहन के लिये उचित मान लुढ़काते हुए ले जाने लगे। तभी बाग का एक चौकीदार ने आकर हम बच्चों को रोक लिया और खजूर के पेड़ को ले जाने पर पूंछ तांछ शुरू कर दी, उसके हाथ मे पेड़ों की टहनियाँ काटने का एक छोटा सरौता (cutter) था। हम ये  अंदेशा नहीं था कि इस तरह बाग से लकड़ी ले जाना गैर कानूनी है। हम तो ये मान कर चल रहे थे कि होली के त्योहार पर एक अनुपयोगी पेड़ को ले जाने मे कोई हर्ज़ नहीं होगा! जब गार्ड से अनुनय-विनय की तो वो तो हमे अपने बाग अधीक्षक के सामने पेश करने की धमकी देने लगा। वह ये भी कह रहा था कि पेड़ों की चोरी करने वालों के वह इस सरौते से हाथ काट देगा!! हम बच्चे तो घबड़ा गये। ये क्या!! होम करते हाथ जलने की कहावत तो सुनी थी पर यहाँ तो होली जलाने पर हाथ काटने की नौबत आ गयी!! हम बच्चों मे से एक  बच्चे को खुसुर-फुसुर कर इशारे से घर की ओर  दौड़ाया। घर भी नारायण बाग से एक-डेढ किमी॰ दूर था। चुक्खू भाई साब और मोहन किताब वाले को जैसे ही खबर मिली वे साइकल से दौड़ते-भागते पहुंचे।   इस दौरान मै डर के मारे, बार-बार उस गार्ड के सरौते को देख कर आँख बंद कर लेता!! हम बच्चों का तो बुरा हाल था। चुक्खू भाई साहब को  देखते ही बच्चे रोने-चिल्लाने लगे। उनसे हाथ काटने से बचाने की गुहार लगाई!! इसी बीच बाग के एक दो कर्मचारी भी आ चुके थे। सौभाग्य से एक व्यक्ति उनके जानने वाला था। तब हम बच्चों की जान मे जान आयी। जब उनको पता चला कि ये खजूर का पेड़ होलिका दहन हेतु ले जा रहे है तो अधिकारियों ने बिना कोई आपत्ति के ले जाने की अनुमति दे  दी लेकिन भविष्य मे बिना पूर्व अनुमति के इस तरह कृत्य करने से आगाह किया।

जैसे तैसे  उस खजूर के पेड़ को लुढ़काते हुए हम लोग 2-3 घंटे मे घर पहुंचे। पहले तो कुछ लोगो ने भय दिखाया कि होली जलाने को पुलिस से परमिशन लेनी होगी? कुछ ने कहा चौराहे पर ही पावर हाउस मे कहीं होली से आग न लग जाये!! तमाम किन्तु परंतु के बीच अंततः  चुक्खू भाई साहब और मुहल्ले के अन्य लोगो के रहते हम लोगो ने पहली बार, घास की मंडी मे जलने वाली पारंपरिक  होली से अलग, मुरली मनोहर मंदिर तिराहे पर अपने मुहल्ले की  होली जलायी थी!! जो आज तक हमे याद है और याद है वे चुक्खू भाई साब जो बचपन मे हम बच्चे के साथ शक्तिमान की तरह खड़े रहते थे !!

विजय सहगल