"आईबीए
की हैल्थ इन्शुरेंस स्कीम"
बैंक से दीगर हमारे सुधि और सम्मानित पाठकों
को बताना चाहते है कि भारत मे बैंकिंग प्रबंधन हेतु एक प्रितिनिधि संस्था के रूप
मे भारतीय बैंकों और वित्तीय संस्थानों ने "भारतीय बैंक संघ"की स्थापना की थी। 1946 मे गठित इस संस्था का उद्देश्य भारतीय वित्तीय और बैंकिंग संस्थानों के विकास के साथ
उनमे कार्यरत कर्मचारियों/अधिकारियों के वेतन समझौते के अतिरिक्त उनके कल्याण हेतु अन्य उपाय आदि करना है। इस
प्रिक्रिया मे बैंक की सेवा से सेवानिवृत्त स्टाफ एवं उनके
परिवार भी शामिल है। इस हेतु बैंक कर्मियों और अधिकारी संगठनों की सरकार से बातचीत
मे यह संस्था एक पुल की तरह काम करती है। बैंक यूनियन और भारतीय बैंक संघ के बीच की सहमति को केंद्रीय सरकार सम्मान कर
अपनी सहमति प्रदान करती है। बैंक स्टाफ के वेतन समझौते और कल्याण की दृष्टि से
इसका ये संक्षिप्त परिचय है। हर पाँच साल मे बैंक स्टाफ के
द्विपक्षीय वेतन समझौते पर वार्ता की शर्त के अनुसार बैंक स्टाफ के पहला
वेतन सम्झौता 19 अक्टूबर 1966 मे हुआ। आगे भी बैंक कर्मियों के 8-9 द्विपक्षीय
वेतन समझौते संघर्ष, विरोध प्रदर्शन और
हड़ताल के बीच सम्मान जनक तरीके से होते
रहे।
पर जिन बैंक यूनियन और भारतीय बैंक संघ से
बैंक के सेवानिवृत्त पेंशनर को अपेक्षा थी
कि ये दोनों संगठन पेन्शनधारियों के कल्याण के लिए कार्य करेंगे किंतु खेद और
अफसोस है कि पिछले 10वे और 11वे द्विपक्षीय
वेतन समझौते मे बैंक के सेवानिवृत्त
पेंशनरों के हित को दरकिनार कर उनकी पेंशन की कीमत पर समझौते से बैंक के
सेवानिवृत्त अधिकारी कर्मचारी आज बड़े संकट और कठिनाई मे है। ये छलावा सेवानिवृत्त
बैंक स्टाफ के विरुद्ध एक सोचे समझे
षड्यंत्र के तहत "बैंक यूनियन" और "भारतीय बैंक संघ" द्वारा
किया गया!! ये साजिश और कपट सेवनिवृत्त बैंक अधिकारियों के विरुद्ध 10वे वेतन
समझौते की उस "हत्यारी" "धारा" के अंतर्गत किया गया जिसके तहत
अधिकारियों के वेतन मे मूल वेतन के 7.75% से 11% के रूप मे एक "विशेष भत्ते" भत्ता प्रदान करने की
सहमति इस शर्त पर प्रदान की गयी कि उक्त "विशेष भत्ते" की गणना "सेवानिवृत्त लाभ" के लिए नहीं की
जायेगी!! इस "विशेष भत्ते" मे किसी "विशेषता" का किंचित भी कहीं कोई उल्लेख किया गया!! इस तरह की शर्त
लगाकर सेवनिवृत्त स्टाफ के साथ तत्कालीन यूनियन नेतृत्व और भारतीय बैंक संघ ने
धोखा किया, षड्यंत्र!!,
किया!! पर हा!! दुःख!! और क्षोभ!! रिटायर्ड बैंक अधिकारियों पर किसी भी सरकार और संस्था
ने कोई ध्यान नहीं दिया?? ये दुनियाँ का एक मात्र अजूबा वेतन समझौता था जिस
के कारण अधिकारियों की पेंशन मे अच्छी ख़ासी
कमी हो गयी!! मेरा दावा और चुनौती है कि दुनियाँ मे किसी भी "वेतन
समझौते" मे श्रमिकों, मजदूरों या
कर्मचारियों के वेतन मे कभी कोई कमी की गयी हो?
लेकिन पिछले 10वे और 11वे द्विपक्षीय वेतन
समझौते मे बैंक के सेवानिवृत्त पेंशनरों की
पेंशन मे कमी हुई है!! यही नहीं समझौते की
तारीख से हर पेंशन धारक से औसत 3 से 4 हजार प्रतिमाह की कटौती पेंशनर से की गयी
है। ये दुनियाँ का अपने आप मे एक अजूबा इकलौता वेतन सम्झौता था जो अर्थशास्त्रियों और अर्थशास्त्र के
विध्यार्थियों के लिए शोध का विषय हो सकता है,
जिसमे वेतन समझौते के पश्चात बैंककर्मि
पेंशनर की पेंशन मे कटौती हुई हो?
आप सभी को ये जान कर और भी हैरानी और आश्चर्य
होगा कि बैंक से दो-तीन दशक पूर्व सेवानिवृत्त
"महा प्रबन्धक" को भी आज के चतुर्थ श्रेणी भृत्य और लिपिक से कम पेंशन मिल
रही है। कितना दुर्भाग्य है कि दो दशक पूर्व बैंक के सर्वोच्च प्रबंधन वर्ग से रिटायर्ड
अधिकारी को आज के सबसे निम्न पदासीन स्टाफ से कम पेंशन मिल रही है!! केंद्र सरकार,
हर राज्य सरकार, रिजर्व बैंक एवं अन्य सरकारी
उपक्रमों मे समय समय पर स्टाफ के वेतन पुनिरीक्षण
के साथ उनके सेवानिवृत्त स्टाफ की पेंशन मे भी एक अंतराल के बाद पुनिरीक्षण और परिशोधन
किया जाता है ताकि उनकी पेंशन भी अद्यतन होती रहे पर हा!! दुर्दैव!! बैंक स्टाफ की
पेंशन मे 1966 से आज तक कोई पुनिरीक्षण या परिशोधन नहीं किया गया। सरकार,
भारतीय बैंक संघ और बैंक यूनियन की इस विसंगति और अन्याय की सजा आज तक बैंक के रिटायर्ड
कर्मि भुगतने को मजबूर है! और भविष्य मे भी इन कल्याणकारी सरकारों से असी कोई उम्मीद
की किरण भी नज़र नहीं आती!!
हर लोकतान्त्रिक सरकार अपने नागरिकों के स्वास्थ और
चिकित्सा हेतु आवश्यक सेवा एवं अस्पताल रूपी आधारभूत संरचना प्रदान करने का प्रयत्न और प्रयास करती है। बैंक स्वयं तो अपने स्टाफ
को आवश्यक चिकित्सकीय सेवायें इन्शुरेंस कंपनियों के माध्यम से उपलब्ध कराते है पर
अपने सेवानिवृत्त स्टाफ को भारतीय बैंक संघ के माध्यम से समूहिक मेडिकल सेवायें
इन्शुरेंस कंपनियों के माध्यम से आवश्यक शुल्क ले कर उपलब्ध कराता है। इस हेतु सेवनिवृत्त स्टाफ की ओर से भारतीय बैंक
संघ देश की समस्त मेडिकल हैल्थ इन्शुरेंस कंपनियों से प्रस्ताव आमंत्रित कर उनमे से
किसी एक कंपनी को देश के एक लाख से ज्यादा
रिटायर्ड स्टाफ के मेडिकल हैल्थ इन्शुरेंस की ज़िम्मेदारी देती है। सेवानिवृत्त बैंक
स्टाफ भारतीय बैंक संघ के उपर भरोसा और विश्वास कर ये मान कर चलता कि उनके स्वास्थ
और सुखमय जीवन हेतु वह सभी को सर्वोत्तम मेडिकल इन्शुरेंस कंपनी की सेवाए मुहैया करायेगा। अब जरा भारतीय बैंक संघ
की कल्याण कारी मेडिकल इन्शुरेंस की बानगी देखिये। मुझे 9 लाख के मेडिकल इन्शुरेंस
के लिए रुपए वर्ष 2020-21 मे रुपए 39327/- का भुगतान करना पड़ा। इसी 9 लाख के मेडिकल
इन्शुरेंस के लिए 2021-22 मे 39.47% बढ़ा कर रुपए 54850/-, एवं इस वर्ष 2022-23 मे ये प्रीमियम
33.06% बढा कर राशि
रुपए 72988/- कर दी, जिसने सेवानिवृत्त अधिकारियों की कमर ही
तोड़ दी। औसत रूप मे ये राशि लगभग दो महीने
की पेंशन के बराबर बैठती है। विश्वास मानिये यदि हम बैंक कर्मियों ने अपने पेट काट
कर पीएफ़, ग्रेच्यूटी से मिले फ़ंड पर मिलने वाली ब्याज की राशि और संस्कारी संताने न होती
तो मेडिकल इन्शुरेंस की प्रीमियम के लिए बैंक या साहूकार से उधार लेने की नौबत आन पड़ती!!
ऐसा नहीं है कि मार्केट मे आज के प्रतिस्पर्द्धी युग मे मेडिकल हैल्थ इन्शुरेंस कंपनियाँ
भारतीय बैंक संघ की तरह इतनी महंगी प्रीमियम रुपए 72988/- ही बसूल कर रही है? संदेह और शंका तब होती है जब स्टार हैल्थ
इन्शुरेंस कंपनी पंजाब नेशनल बैंक के ग्राहकों से रुपए दस लाख के मेडिकल इन्शुरेंस
के लिए रुपए कुछ शर्तों के साथ रुपए 30901/- एवं यही स्टार हैल्थ इन्शुरेंस कंपनी बैंक
ऑफ बड़ौदा के ग्राहकों से दस लाख के हैल्थ इन्शुरेंस
के लिए रुपए 18299/- बसूलती है। एक ही धनराशि के हैल्थ इन्शुरेंस प्रीमियम मे इतना
अंतर शक और शंका पैदा तो करता ही है? क्या सरकार और भारतीय बीमा
नियामक एवं विकास प्राधिकरण (IRDA) को इस संबंध मे समुचित छान-बीन
और समुचित कार्यवाही नहीं करनी चाहिए? क्या आईबीए, हेल्थ इन्शुरेंस कंपनी और बैंक के इस षड्यंत्रकारी,
धूर्त और पाखंड के गठबंधन के चंगुल से बैंक के सेवानिवृत्त कर्मियों को मुक्त नहीं
कराना चाहिये?
विजय सहगल




2 टिप्पणियां:
अलग अलग बैंकों में प्रीमियम राशि अलग अलग है। होसकता है कि बैंको की अथॉरिटीज को लाभान्वित किया जाता हो। बड़े बड़े ऑफर्स दिए जाते है।
Bahut dukhad
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