रविवार, 2 अक्टूबर 2022

रामपुर बुशहर - (हि॰ प्र॰)

 

"रामपुर बुशहर - (हि॰ प्र॰)"









2 जून 2022 को प्रातः शिमला से 120 किमी॰ दूर, राष्ट्रीय राजमार्ग 5 पर स्थित  हमारा अगला  प्रवास "रामपुर बुशहर" था। शिमला जिले का ही एक भाग रामपुर बुशहर सतलज नदी के तट पर बसा एक छोटा कस्बा है जो स्वतन्त्रता के पूर्व बुशहर रियासत की राजधानी था। रामपुर बुशहर और नारकंडा की दूरी लगभग 60 किमी॰ है पर दोनों शहरों की भौगोलिक स्थिति तथा शहर के तापमान मे जमीन आसमान का अंतर था। एक ओर जहां नारकंडा  मे रात का तापमान  रज़ाई ओढ़ने को मजबूर कर रहा था, वही रामपुर बुशहर मे रात को  ऊंचे तापमान के कारण  बगैर एसी के रात बिताना भी मुश्किल था।  बमुश्किल डेढ़-दो किमी॰ मे बसे इस शहर के भ्रमण के दौरान डाक घर की इमारत और उसके वास्तु शिल्प ने मुझे प्रभावित किया। सफ़ेद एवं लाल रंग से रंगी यूरोपियन शैली के भवन बहुत ही आकर्षक थी।

कस्बे मे कीटनाशकों और उर्वरकों के बड़े बड़े प्रतिष्ठान, इस क्षेत्र की उन्नतशील कृषि और बागवानी के कारण ग्रामीण जीवन मे किसानों की संपन्नता की कहानी कह रहे थे। मुख्य चौराहे पर एक आकर्षक बौद्ध मठ एवं मंदिर यहाँ के निवासियों की ईश्वर के प्रति आस्था और विश्वास को सहज ही प्रकट करता है। बाजार मे विभिन्न तरह के फलों जैसे सेव, चैरि, आड़ू, आलूबुखारा, खुमानी अर्थात शक्कर पारा वास्तव मे इतना मीठा था कि शायद शक्कर पारे से भी मीठा!! इन विभिन्न फलों को इतने कम दाम पर बिकते देख हैरानी हुई। प्रकृतिक रूप से समृद्ध और सुंदर  सतलज नदी के लंबे तट के बावजूद सड़क के एक ओर ठेले, खोमचे, ढाबों के अवैध अतिक्रमण के चलते कदाचित ही आपको सतलज नदी के दर्शन हो सके जो  पर्यटन की संभावनाओं को हतोत्साहित करने वाला था।     

बैसे रामपुर बुशहर  का मुख्य आकर्षक पदम महल और उसके बगल मे एक और छोटा राजसी महल था जिसे अब "नऊ नभ" विरासत कालीन पाँच सितारा होटल मे परिवर्तित कर दिया गया है।  पदम महल की नीव तत्कालीन रियासत के राजा पदम सिंह द्वारा  वैशाख सुदी विक्रमी संवत 1976 को रक्खी गयी थी जो   हिमाचल प्रदेश के छह बार मुख्यमंत्री रहे स्व॰ श्री वीरभद्र सिंह के पिता थे। इस रियासत के वैभव-विलास  और संपन्नता की कहानी  रामपुर जैसे छोटे  कस्बे मे स्थित पदम महल को देख सहज ही लगाया जा सकता है। रामपुर बुशहर के पर्यटन की दृष्टि से  यहाँ  एक मात्र दर्शनीय स्थल "पदम महल" ही है।

पदम महल मे प्रवेश करते ही एक सज्जन श्री राम आसरे जी से आमना सामना हुआ जिन्होने महल के राजपरिवार के आगमन के कारण मुंह जबानी प्रवेश निषेध का संदेश दिया। यध्यपि समय सारणी अनुसार महल देखे जाने की अनुमति थी पर शायद देखने  का कोई शुल्क न होने के कारण उनके अधिकार क्षेत्र मे हो? निर्दिष्ट समय के बावजूद हम लोगो ने बिना किसी प्रतिपाद के महल से बापसी का रुख कर लिया। हम लोगो की महल देखने की बेरुखी ने  शायद राम आसरे जी को  अपनी  अशिष्ट झिझक का बचाव करने के भाव से  हम लोगो का गंतव्य,  परिचय इत्यादि पूंछ महल देखने की अनुमति प्रदान कर दी! बातचीत से ऐसा प्रतीत हुआ कि शायद वे अपने महत्व और प्रभाव को जताना चाहते थे कि वे उस राजपरिवार के निकटस्थ है और राजमहल के देख रेख करने वाले है!! वे राजपरिवार द्वारा महल परिसर मे दिये आवास मे ही निवासरत थे।  बहरहाल!, पदम महल यूरोपियन शैली के पत्थरों से निर्मित एक विशाल परिसर मे बनाया गया है जिसमे बुशहर राज्य की लकड़ी की कलात्मकता के शानदार और सुंदर दर्शन होते है। महल के गलियारों मे स्थित  दर्जनों कमरो के खिड़की और दरवाजों को  रंगीन काँचों से सजाया गया है जिन्हे पर्यटक, गलियारे मे घूम कर राज्य के कारीगरों की इस कलात्मकता को नजदीक से देख सकते है पर कमरों मे आम जनों और पर्यटकों को जाने की अनुमति नहीं है। महल के सामने वृहद खुले घास के मैदान मे एक गहरे जलाशय के बीच आकर्षक फव्वारा लगाया गया है जिसके धरातल और चारों दीवारों पर आसमानी और नीले रंग के टाइल्स को सुंदर तरीके से लगाया गया था। इस दुमंजिले महल की छत्तों को लाल रंग की लोहे की ढलवां चादरों से बड़ी कलात्मकता के साथ लगाया गया है। एक सिरे से दूसरे सिरे तक गोल मेहराव दार पत्थरों से निर्मित दर्जनों द्वार  जो महल के गलियारे मे खुलते है और जो महल की सुंदरता और मनोहरता मे चार चाँद लगाते है।        

महल के प्रवेश द्वार के पास ही पूर्णतः लकड़ी के आसमानी और सफ़ेद रंग से रंगे नक्काशी दार स्तंभों से निर्मित दो मंजिली बैठक बनाई गयी है जो देखने मे मोहक और आकर्षक थी। जिस बैठक पर बैठ कर कभी रामपुर के महाराजा अपनी प्रजा के हाल-चाल पूंछा करते थे उस  बैठक के मुख्य कक्ष मे बैठ कर पहाड़ पर लगे हरे भरे वृक्षों की पृष्ठ भूमि मे निर्मित पदम महल को निहारना मन को सुकून और आनंद देने वाला अनुभव था। बेशक तत्कालीन राजाओं और रियसतदानों ने धन के भुगतान कर इस महल और बैठक को बनवाया हो लेकिन इन भवनों के निर्माण मे जिन अनाम और अजनवी श्रमिकों ने अपने श्रम से इन  कलात्मक वास्तु का निर्माण किया है वो बधाई और प्रशंसा के पात्र है। शायद  इन वास्तुकारों और श्रिमकों की कारीगरों द्वारा  निर्मित इन्ही कृतियों के कारण ही हमारी सांस्कृति और सभ्यता मे "इन्हे वास्तु देवताभ्यो  नमः" कह  मान और सम्मान दिया गया है। मै भी इन "वास्तु देवों"  को उनकी सुंदर, शानदार और आकर्षक कृतियों की रचना हेतु अपना आदर सम्मान प्रेषित करता हूँ।

अपने स्वभाव के विपरीत लोगो  द्वारा इन विरासत होटल मे भोजन आदि  पर करने  वाले विलसता पूर्ण व्यय को मै  फिजूल खर्ची मानता हूँ। पर  "पीढियों के बीच  इस सोच के अंतर को  सामाजिक और आर्थिक विकास की गतिविधियों को बढ़ावा देने के लिये इस तरह की मुद्रा प्रसार और मुद्रा विनिमय आवश्यक है और फिर इन  पूर्व रियासत दानों के महलों और इनमे कार्यरत कामगारों के रोजगार भी तो आर्थिक विकास का एक हिस्सा है? हैरिटेज होटल का  भोजन स्वादिष्ट और शानदार था, साथ ही इस  होटल रूपी महल मे कमरों के बाहर के गलियारे की वास्तु और लकड़ी की शिल्पकारी देखने काबिल थी। छोटे से आँगन मे तीन मंज़िला सुंदर भवन की बनावट देखते ही बनती थी।

शाम के नगर भ्रमण के दौरान एक वृहद और आधुनिक काँच से निर्मित भवन को देख कौतूहल और सुखद आश्चर्य हुआ।  देश के छोटे  तो क्या बड़े-बड़े कस्बों मे भी प्रायः पुस्तकालय का अभाव रहता है पर इस छोटे से नगर मे वातानुकूलित पुस्तकालय देख कर सुखद अनुभूति  हुयी। अपनी जिज्ञासा को मूर्त रूप देने हेतु मै रजिस्टर मे प्रिविष्टि कर कुछ समय के लिए लाइब्रेरी के अंदर भी गया। लाइब्रेरी मे इतिहास, भूगोल सहित अन्य विषयों तथा प्रतियोगी परीक्षाओं की अनेक पुस्तकें उपलब्ध थी और काफी युवा और किशोर अपने अकादमिक विषयों के साथ प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिये वातानकूलित  पुस्तकालय की सेवाओं का लाभ ले रहे थे। रामपुर के युवाओं का वाचनालय मे प्रतियोगी परीक्षाओं के लिये जुनून देखना देश के सुनहरे भविष्य के शुभ लक्षण थे।   

विजय सहगल   

3 टिप्‍पणियां:

बेनामी ने कहा…

Lovely write up. I could imagine myself in your experiences.

बेनामी ने कहा…

I am Mani Iyer

बेनामी ने कहा…

बहुत ही सुंदर वर्णन