बुधवार, 29 अगस्त 2018

लिंचिंग

"लिंचिंग"
मोब लिंचिंग अर्थात भीड़ द्वारा हिंसा की घटनायें आपने पिछले दिनो सुनी या देखी होंगी। 1984 मे सिखों के विरुद्ध उन्मादी भीड़ द्वारा हिंसा भारत के इतिहास की एक सबसे निर्मम एवं शर्मनाक घटना है। उन्मादी भीड़ द्वारा जब किसी व्यक्ति या व्यक्तियों के समूह के विरुद्ध अकारण हिंसा की जाती है जबकि पीड़ित  प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से कहीं दोषी भी न हो तब पीड़ित व्यक्ति और उसका परिवार उस हिंसा को ताउम्र कभी नहीं भुला पाता है। इन सभी घटनाओं मे शासन प्रशासन द्वारा ऐसे हिंसक व्यक्तियों  के विरुद्ध सख्त कार्यवाही की जानी चाहिये ताकि प्रभावित व्यक्तियों के घावों पर कुछ मलहम लग सके।  लेकिन दुर्भाग्य से ऐसा हो नहीं पाता??
लेकिन मैं यहाँ ऐसी लिंचिंग या हिंसा की बात करूंगा जिनमे शारीरिक हिंसा तो नही होती पर मानसिक हिंसा जरूर होती है जो पुलिस, सी. बी. आई. या अन्य सरकारी अर्ध सरकारी या गैर सरकारी विभागो मे संवैधानिक अधिकार प्राप्त उच्च अधिकारियों द्वारा अपने अधीनस्थों या आम लोगो के विरुद्ध इरादतन या गैर इरादतन, अपनी पसंद नपसंद के आधार पर  की जाती है जिनके लिये वह लोग, अधीनस्थ अधिकारी या कर्मचारी दोषी नहीं होता  और ऐसे मामलों मे लिंचिंग करने वाले व्यक्ति पर प्रायः कोई कार्यवाही नहीं होती क्योंकि लिंचिंग करने वाला व्यक्ति उच्च अधिकार बाला शक्तिशाली अधिकारी होता है। प्रत्येक विभाग या संस्थानो मे ऐसी अनेक घटनाओं  से हम आप भलीभाँति परिचित होंगे। मुझे याद है जब मै तीसरी या चौथी का छात्र रहा हूंगा। राजकीय आदर्श विध्यालय झाँसी मे पढ़ता था। 14 नवंबर बाल दिवस की घटना है जिसे मैं आज भी नहीं भूला हूँ। हमारा विध्यालय छोटा था इसलिए चाचा नेहरू के जन्मदिन पर एक व्रहद कार्यक्रम राजकीय इंटर कॉलेज झाँसी मे आयोजित किया गया था। झाँसी के अन्य स्कूलो के सभी छात्रों को वहाँ आमंत्रित किया गया था। वह दिन मेरे छात्र जीवन का ऐसा पहला दिन था जब मैं अपने स्कूल के बाहर किसी दूसरे स्कूल मे जा रहा था। मैं बड़ा उत्साहित था जैसे एक नया परिंदा अपने घोंसले के बाहर खुले आकाश मे पहली बार उड़ान भरता हैं। हमारे साथ हमारे स्कूल के 2-3 अध्यापक  भी हम बच्चों की देख भाल के लिये साथ मे थे।  कचहरी चौराह के पास हमारा स्कूल था जहां से होकर झाँसी की बसे चारों दिशाओं को जाती थी। ग्वालियर रोड स्थित जिस राजकीय इंटर कॉलेज मे हमे जाना था उसके लिये भी दतिया, डबरा, ग्वालियर जाने बाली सभी बसे उस स्कूल से होकर जाती थी। मुझे पहली बार छात्र शक्ति का एहसास उस उम्र मे  तब हुआ जब हमारे वरिष्ठ छात्रों ने एक बस को रोक कर सभी छात्रो को उस बस मे बैठा दिया और हम सभी छात्र बस मे कुछ इस तरह बैठ गये जैसे बारात मे आये बाराती। हम सभी छात्र  बड़े  फ़क्र के साथ राजकीय इंटर कॉलेज पहुँच गये। वहाँ और दूसरे स्कूल से आये छात्र अलग अलग यूनिफ़ोर्म मे नजर आरहे थे। सभी छात्रों को एक बड़े हाल मे चलने के लिये हमारे अध्यापकों ने हम लोगो को कहा, हम सभी छात्र अन्य स्कूल के छात्रों के साथ बड़े हाल की तरफ बड़ ही रहे थे कि अचानक आगे से आ रहे छात्रों की भीड़ दौड़ते हुये पीछे की ओर भागी। गलियारे मे भगदड़ मच गई। इस अचानक उत्पन्न परिस्थिति के लिये मैं तैयार नहीं था मैंने देखा एक व्यक्ति छात्रों को पीठ पर  थप्पड़ मार के पीछे धकेल रहे है। निश्चित तौर पर वह उस स्कूल के कोई अध्यापक रहे थे और शायद उत्पात कर रहे बच्चों को नियंत्रित कर रहे थे। सारे बच्चे उन से दूर होकर भाग रहे थे ताकि उनको अध्यापक की हिंसा का  कोपभाजन न बनना पड़े।  मैं इन सब बातों से बेफिक्र होकर हाल की ओर ये सोच कर बढ़ता गया की ये अनुशासन हीन उद्दंड छात्र इसी स्कूल के है जिनको पीट  कर उन्हे नियंत्रित किया जा रहा है,  मैं तो दूसरे स्कूल से आया हूँ और इस स्कूल के लिये अतिथि छात्र हूँ। मुझे उनसे क्या ? इसी उधेड़ बुन मे मैं उन अध्यापक के नजदीक से बेखबर  होकर निकला परन्तू ये क्या एक ज़ोर का चांटा उन अध्यापक ने हमारी पीठ पर भी मारा,  मैं तिलमिला गया, मैं हतप्रभ था और कतई इसके लिये तैयार नहीं था। मुझे मालूम होता तो मैं कदापि उस ओर नहीं जाता और उस थप्पड़ से बच जाता। मेरा सारा उत्साह काफ़ूर हो चुका था, छात्र शक्ति की छवि मेरे मन मे बुरी तरह से आहात हो चुकी थी। उस क्रूर व्यक्ति के विरुद्ध मैं काफी क्रोधित था परन्तू मैं मज़बूर था कि मैं इस अन्याय के विरुद्ध कुछ नहीं कर सका।  चांटा जवरदस्त था जिसकी गूंज मैं आज तक नहीं भूला और न ही उस अध्यापक का चेहरा मैं आज तक भूला हूँ जिसने मुझे इतनी कड़ी सजा दी पर क्यो?
एक अन्य घटना का भी मैं यहाँ उल्लेख करना चाहूँगा याध्यापि इस घटना मे शारीरिक हिंसा जैसी कोई बात नही थी परन्तू मानसिक पीढा का घाव उस शारीरिक हिंसा से कम न था। मैं एक विस्तार पटल पर प्रबन्धक के पद पर पदस्थ था। विस्तार पटल एक संस्था मे खोला गया था। दो तीन महीने मे ही लगभग 3000  वेतन (सैलरी) खाते हमारे पटल पर खुल गये। शाखा मे केवल मुझे मिला कर दो ही स्टाफ थे। एक कैशियर और स्वयं एक मैं। सारा काम मैनुअल ही हुआ करता। शुरू के 5-6 महीने तक तो सब ठीक चला सारे लेजर के बैलेन्स जैसे तैसे मिलाते रहे। परन्तू दिसम्बर मे दो लेजर के बैलेन्स नहीं मिले। मैंने इसकी सूचना लिखित रूप मे अपने कार्यालय को दी कि "दो लेजर को छोड़कर अन्य सभी लेजर का मिलान कर लिया है" । पर कोई जबाब नहीं आया। मार्च मे हालात और गंभीर हो गये मैंने अपने कार्यालय को लिखा "समस्त लेजर बैलेन्स "अनटैलीड"। फिर भी कुछ नही हुआ। मैं  लेजर बैलेंसिंग के लिये काफी परेशान होने लगा।  एक दिन चिन्तित और परेशान होकर मैंने अपने अधिकारी को फोन पर बैलेंसिंग के बारे मे अपनी परेशानी सांझा की तो काफी नाराज हुए और कुछ दिन बाद एक लंबा फरमान पत्र के माध्यम से हमारी शाखा मे भेजा।  "चूकि आपने फोन पर हमारे कार्यालय को सूचित किया था  कि सारे लेजर बैलेंसिंग कर लिये है फिर आपने  पत्र लिख कर सूचित किया कि लेजर बैलेंसिंग नहीं है। आपने गलत सूचना दी है क्यों न आपके विरुद्ध अनुशासनात्मक कार्यवाही की जाय ? मुझे शेर और मेमने की कहानी याद आ गई। याध्यापि उन्होने हमारी सहायता तुरंत की और एक अधिकारी को विशेष तौर पर इस कार्य के लिये भेज दिया। उनके साथ लगकर हमने स्थिति मे  सुधार ला कर सारे लेजर बैलेन्स का मिलान कर लिया। हमने सोचा कि शायद अब मामला समाप्त हो गया लेकिन हमारे पास कुछ दिन बाद फिर फोन आया कि आपने पत्र का जबाब नहीं दिया। मैंने कहा श्रीमान आपकी कृपा से  बैलेन्स का कार्य हो गया था इसलिये मैंने समझा मामला समाप्त हो गया अब आप ही सुझाये कैसे, क्या करना है। तो उन्होने कहा अपनी गलती स्वीकारो अन्यथा आपके विरुद्ध जांच कराई जाएगी। मारता क्या न करता मैंने अपनी गलती स्वीकृति  का पत्र भेज दिया इस तरह मामला समाप्त हुआ और मुझे पुनः बचपन के उस चांटे की गूंज सुनाई दी?
इन दोनों ही घटनाओ मे अध्यापक महोदय और अधिकारी महोदय से उस तात्कालिक समय को भूल कर  हम आज उनके प्रति सद्विचार रखते हैं। शायद किन्ही कारणोवश उन्हे ऐसी कार्यवाही के लिये मज़बूर होना पड़ा हो। हम उन्हे अपनी सदभावना प्रेषित करते है।   
विजय सहगल
नोएडा 

मंगलवार, 21 अगस्त 2018

"रुटियाँ और खटियाँ"

"रुटियाँ और खटियाँ"  




नाम- नामालूम         ​           

पिता का नाम - नामालूम           

जाति         -            नामालूम

ग्राम/कस्बा     -            नामालूम

जिला         -            रिकार्ड

 

जी हाँयही उपर्युक्त सूचना का एक अंश जो हमारी आगे वाली लाइन मे बैठे आपस मे बात कर रहे उन दो सज्जन से मैं  सुन सका। घटना 2018 मे  हरिद्वार के  शिविर मे शामिल अनेकों शिवरार्थियों के बीच  मध्याहन भोजन के बाद  के समय एक बुजुर्ग सज्जन जो शायद अपनी आपबीति अपने बगल मे बैठे सज्जन के साथ सांझा कर रहे थे।  मैं उन दोनों  के ठीक पीछे बैठा उनकी बातचीत सुन रहा था। आपबीती सुना रहे बुजुर्ग सज्जन की उम्र लगभग 75-80  के आसपास रही होगी। उनके चेहरे पर उनकी वेदना का दर्द स्पष्ट देखा जा सकता था। हरिद्वार प्रवास के दौरान  घटी  उक्त घटना को मैं आप लोगो के साथ सांझा करना चाहूँगा। बातचीत जारी थी वह बुजुर्ग सज्जन पिछले 3-4 दिन से हरिद्वार मे रहने की ठौर तलाश कर रहे थे। अकेले की बजह से किसी ने अपना घर नहीं दिया। आश्रम मे कमरा किराया 5000 रूपय प्रति माह और खाना पीना बिजली अलग। तभी उन्हे शांतिकुंज हरिद्वार के बारे मे पता चलाउनको  2-3 दिन  के लिये यहाँ रुकने की निशुल्क व्यवस्था हो गयी। तभी किसी परिचित के माध्यम से 9 दिवसीय शिविर की सूचना उन्हे मिली और इस तरह वे 9 दिवसीय शिविर मे हमारे सहभागी हो गये अर्थात उन्हे हरिद्वार मे 9 दिन के लिये रहने का अश्रय मिल गया। उनका  शिविर मे शामिल होने  के साथ साथ आश्रय स्थल तलाशने का प्रयास जारी रहा।   उन्होने जो दर्द अपने बगल मे बैठे व्यक्ति से सांझा किया उसने हमे समाज मे टूट रहे परिवारों और उनके बीच पिस  रहे बुजुर्ग व्यक्तियों की मनोदशाअकेले पन और उम्र के आख़री पढ़ाव  मे होने बाली परेशनियों पर सोचने को मजबूर कर दिया। वह बुजुर्ग सज्जन किसी भी कीमत पर अब घर लौटने को तैयार नहीं थे। ऐसा नहीं था कि उनके परिवार मे और कोई सदस्य नहीं था। दो शादीशुदा बेटे-बहुएचार नाती और दो नातिन का भरा-पूरा परिवार था। बच्चे ज्यादा पढे-लिखे नहीं थे। खुद फौज से सेवानिव्रत्त 24000/- रूपय मासिक पेंशन पा रहे थे। पत्नी का देहांत हो गया था। रोज-रोज की आपस मे बहुओं से  होने वाली कलह से दुखी थे। खेती की जमीन को बच्चों मे बाँट दिया था फिर भी बेटों मे पैसों की लिये आपस मे झगड़ा कम नहीं हुआइसी क्लेश से मुक्ति का मार्ग उन्हे शांति की चाह मे हरिद्वार खींच लाया। तुम्हारे बेटेनाती-नातिन तुम्हें याद कर के तुम्हें वापस नहीं बुलायंगेदूसरे सज्जन ने उन बुजुर्ग सज्जन से पूछा। बुजुर्ग सज्जन जिनकी आँखें नम थी पर पूरी कोशिश के बाद भी आँखों मे उठे सैलाब को भरसक कोशिश के बावजूद भी वे उन आंसुओं को रोक न सके,  उनके दिल मे उठ रही टीस ने मुझे  भीतर तक झकझोर दिया। उन्होने अपनी भाषा मे जब कहा कि "बेटे क्यों याद करेंगे उनकी तो रूठियाँ (रोटी) बची और खटियाँ (चारपाई/जगह) बची !!        

सत्रह के बाद बुजुर्ग सहचर को कहां आश्रय मिला, लेकिन समाज में बुजुर्ग सहचर के साथ हो रहे इस तरह के व्यवहार ने मुझे झकझोर दिया। हम इतने बेगारट , बेहया और बेशरम कैसे हो गए ? हमारी संवेदनाएं इतनी प्यारी हो कर मर गईं कि हम अपने बड़े मां-बाप को उम्र के इस आखिरी पाव में दो घंटे की रोटी और सुख शांति भी नहीं दे सकते ? ताकि वे अपने , इस जीवन यात्रा के अंतिम आख़री को , शांति ‍अंक पूरा भी करें , न कर आकर्षण ?

 

विजय सहगल

 

 

शनिवार, 18 अगस्त 2018

अटल बिहारी बाजपेयी


देश मे सबसे प्रसिद्ध जन जन के प्रिय  पूर्व प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी बाजपेयी का निधन हो गया। प्रसिद्ध कवि, ओजस्वी वक्ता, राजनीति मे ईमानदार छवि और आम लोगो मे लोकप्रिय ऐसे श्री अटल बिहारी बाजपेयी का निधन देश के लिये एक अपूर्णीय क्षति है। हमे याद है जब मेरी ग्वालियर मे पोस्टिंग के समय झाँसी से ग्वालियर प्रति दिन अपने मित्र विजय नीखरा के साथ उप-डाउन करते थे। हम लोग प्रातः ग्वालियर 9.30 बजे लगभग पहुँच जाते थे। एक बार अटल जी भी सुबह ग्वालियर स्टेशन पर अपना छोटा बैग खुद उठाए प्लेटफॉर्म पर नज़र आये हम कुछ दैनिक यात्रियो ने बैग उठाने मे सहायता करने के उद्देशय से पूंछा कोई लेने नहीं आया? उन्होने कहा शायद सूचना नहीं मिली होगी और अपना समान खुद ही लेकर प्लेटफॉर्म से बाहर निकल गये। उस समय वह देश के पूर्व विदेश मंत्री थे। उनका प्रायः ग्वालियर आना जाना लगा रहता था। एक बार मै  विजय गुप्ता के साथ  ग्वालियर से दिल्ली शताब्दी ट्रेन से  ट्रेनिंग के लिये जा रहा था  उस ट्रेन से पता चला बाजपेयी जी भी दिल्ली जा रहे है और जिस डिब्बे मे उनका रिज़र्वेशन था उस का ए.सी. ठीक से  काम नही कर रहा था। लोगो ने उनसे डिब्बा चेंज करने का आग्रह किया पर उन्होने अपनी यात्रा उसी डिब्बे मे की। ये दोनो घटनाये 1984 से 1987 के बीच की है जब वह प्रधान मंत्री नहीं थे। उनकी सादगी एवं साधारण रहन सहन से ग्वालियर वासी भलीभाँति परिचित हैं। 1984 मे मे उनका चुनावी जुलूस नया बाज़ार  ग्वालियर शाखा के सामने से निकला था तब उनके पैर मे फैकचर के कारण प्लास्टर चढ़ा था और बे एक छोटी गाड़ी की छत्त पर बैठे थे। ग्वालियर के लोग उनके प्रति काफी आदर और सम्मान का भाव रखते थे किन्तु मै आजतक नहीं समझ पाया कि श्रीमती इंद्रा गांधी के निधन के बाद हुए 1984 लोकसभा चुनाव  मे उन्हे ग्वालियर से पराजय का मुख क्यों देखना पड़ा !!!! शायद इसकी बड़ी बजह उनके विरुद्ध चुनाव लड़ रहे ग्वालियर के महाराज श्री माधव राव सिंधिया का होना रहा हो।  ऐसे जन जन मे लोकप्रिय भारत के पूर्व प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी बाजपेयी को हमारी भावभीनि विनम्र श्रद्धांजलि।

विजय सहगल