शुक्रवार, 28 नवंबर 2025

विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR-2025)-पर घमासान

 

"विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR-2025)-पर घमासान"








बिहार राज्य के सफल और शांत चुनाव सम्पन्न होने के पश्चात जब से भारतीय चुनाव आयोग ने नौ राज्यों और तीन केंद्र शासित प्रदेशों मे एस॰आई॰आर॰ का दूसरा चरण शुरू कराने का निर्णय लिया है तब से पूरे देश मे पक्ष और विपक्ष के बीच घमासान चरम पर है। एसआईआर का कार्य 28 अक्टूबर  से 3 नवंबर 2025 तक कर्मचारियों के प्राशिक्षण से शुरू होगा। 4 नवंबर 2025 से इस प्रक्रिया का मुख्य कार्य बीएलओ (ब्लॉक लेबल ऑफिसर) द्वारा घर घर जा कर गणना प्रपत्रों का वितरण 4 दिसम्बर 2025 तक, पूरा करने का लक्ष्य रक्खा गया है। इस पूरे कार्य मे इन बारह राज्यों के, 51 करोड़ मतदाताओं का सत्यापन कर उनको मतदान के लिये आवश्यक योग्यता, पात्रता और अहर्ता की कसौटी पर कसा जाएगा।  इस कार्य का समापन 7 फरवरी 2026 तक फाइनल सूची के प्रकाशन के साथ पूर्ण करने का लक्ष्य रक्खा गया है।  यह कार्य मतदाता सूची को अद्यतन करने का एक अभियान है।

विदित हो कि बिहार राज्य के विधान सभा के लिये हुए चुनाव के पूर्व किए गए इस एस॰आई॰आर॰ अभियान के पहले चरण मे मे 68 लाख अयोग्य/स्थानांतरित/मृत मतदाताओं के नाम वोटर लिस्ट से हटा दिये गए थे। विपक्षी दलों के महागठबंधन का मानना था कि इस विशेष गहन पुनरीक्षण-2025 के दौरान हटाये गए, इन लाखों मतदाताओं के कारण ही उन्हे भारी पराजय का मुँह देखना पड़ा। कॉंग्रेस के नेता राहुल गांधी और राजद नेता तेजस्वी यादव  ने तो जगह जगह अपनी चुनावी रैली मे चुनाव आयोग और सत्तारूढ़ मोदी सरकार की इस मिलीभगत को  वोट चोरी के नाम से उद्धृत कर इसे देश के साथ धोखाधड़ी बतलाया। कॉंग्रेस के दिग्गज नेताओं यथा राहुल गांधी, मल्लिकार्जुन खडगे, प्रियंका गांधी सहित अनेक विपक्षी  नेताओं ने तो अपनी चुनावी रैलियों मे मोदी सरकार पर वोट चोर, गद्दी छोड़ जैसे संगीन आरोप भी लगाये इसके बावजूद, बिहार के चुनावी जनादेश 2025 को अपने पक्ष मे करने पर असफल रहे। 23 नवंबर 2025 को राहुल गांधी ने एक्स पर लिखा, "भारत दुनियाँ के लिए सॉफ्टवेयर बनाता है, मगर भारत का चुनाव आयोग आज भी कागजों का जंगल खड़ा करने पर अड़ा है!! जब राहुल गांधी के उक्त वक्तव्य को चुनावों मे ईवीएम की जगह कागजी मतदान पत्रों के इस्तेमाल के परिपेक्ष्य मे देखते है तो उनकी सॉफ्टवेयर वाली सोच मे विरोधाभास, स्पष्ट नज़र आता है। कॉंग्रेस ने वोट चोरी और एस॰आई॰आर॰ के विरुद्ध  14 दिसम्बर 2025 को दिल्ली के राम लीला मैदान मे एक विशाल रैली का आयोजन भी किया है।

देश के 12 राज्यों मे शुरू हुई इस विशेष गहन पुनरीक्षण प्रक्रिया मे सबसे ज्यादा तीखा विरोध पश्चिमी बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी द्वारा राज्य मे जगह जगह विरोध रैलियाँ के रूप  देखने को मिला। उन्होने तो 20 नवंबर 2025 को मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को पत्र लिख मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण कार्य को तत्काल रोकने को कहा है। उन्होने आरोप लगाते हुए इस प्रक्रिया को अनियोजित, खतरनाक बतलाते हुए इस अभियान मे शामिल बीएलओ और अन्य कर्मचारियों के ऊपर भारी चुनावी कार्य के बोझ के दबाव के कारण कुछ ब्लॉक लेवल अधिकारियों द्वारा आत्महत्या जैसे घातक कदम उठाने पर अपनी चिंता प्रकट की और  चुनाव की विश्वसनीयता पर भी सवाल खड़े किये।

पश्चिमी बंगाल मे सर्वाधिक राजनैतिक  विरोध के साथ साथ, इस गहन पुनरीक्षण का अधिकतम प्रभाव भी पश्चिमी बंगाल मे ही देखने को मिला। पश्चिमी बंगाल और बांगलादेश के सीमावर्ती क्षेत्रों मे अवैध बंगलादेशी घुसपैठियों मे एसआईआर के डर और दहशत के कारण  भगदड़ देखने को मिली। पश्चिमी बंगाल मे पिछली एस॰आई॰आर॰-2002  से SIR-2025 के बीच 23 सालों मे वोटरों की संख्या मे  अप्रत्याशित रूप से 66 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई। पश्चिमी बंगाल के बांग्लादेश के सीमावर्ती 9 जिलों मे तो वोटरों की संख्या 70 प्रतिशत से ज्यादा बढ़ी जो अनापेक्षित थी। इन 23 सालों मे राज्य मे मतदाताओं की संख्या 4,58 करोड़ से बढ़ कर 7.63 करोड़ हो गई। 3.05 करोड़ मतदाताओं की ये  बृद्धि,  पश्चिमी बंगाल मे शंका और षड्यंत्र की ओर इशारा करती  है, जिसकी जांच पड़ताल गहन पुनरीक्षण-2025 के माध्यम से अवश्य ही देश के सामने आएगी।  पश्चिमी बंगाल के उत्तर 24 परगना जिला, हाकिमपुर चौकी, उत्तरी दिनाजपुर, जलपाई गुड़ी, नादिया जिले सहित अन्य जिलों  मे ऐसे हजारों बंगलादेशी घुसपैठिए भारत से बांग्लादेश बापस जाने के इंतज़ार मे सीमा सुरक्षा बलों से अनुनय विनय करते देखे गए। इन अवैध घुसपैठियों के मन मे डर हैं कि कहीं विशेष गहन पुनरीक्षण मे वे पकड़े गए तो उनको गिरफ्तार कर हिरासत केन्द्रों और जेलों मे रक्खा जायेगा। ऐसे अनेक अवैध बंगला देशियों के पास भारतीय आधार कार्ड, वोटर कार्ड और पैन कार्ड भी देखने को मिले जो इन्होने  स्थानीय जालसाजों की मदद से पैसे देकर बनवाए थे। ये अवैध बंगला देशी  पश्चिमी बंगाल सहित देश के अन्य अनेक हिस्सों मे दशकों से गैर कानूनी तरीके से रह रहे थे, लेकिन अब विशेष चुनावी पुनरीक्षण के डर, भय और हिरासत मे जेलों मे रखे जाने की आशंका और चिंता के कारण बांगलादेश बापस भागने मे ही अपनी भलाई समझते हैं। केंद्रीय चुनाव आयोग द्वारा घोषित  SIR के कारण  पश्चिमी बंगाल के इलामबाज़ार थाना क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले गाँव लेलेंगढ़, बाधपाड़ा, नीचूपाड़ा और अनेक आसपास के ग्रामीण इलाकों मे भय, असमंजस और अनिश्चितता के चलते लोग अपने बैंक खातों से जल्दीबाजी मे पैसे निकाल रहे है। यही कारण हैं कि पश्चिमी बंगाल की तृणमूल सरकार इस एसआईआर पृक्रिया को अनियोजित और खतरनाक बतलाने, सरकारी कर्मचारियों पर काम के बोझ का दबाव,  किसानों की धान की फसल कटाई मे व्यस्तता जैसे मुद्दों की आड़ लेकर  इस विशेष गहन पुनरीक्षण का तीव्र और सख्त विरोध कर रही है।  

आखिर इस विशेष गहन पुनरीक्षण 2025 के गणना प्रपत्र मे ऐसा क्या है जिससे पक्ष और विपक्ष के राजनैतिक दलों के बीच  घमासान की स्थिति उत्पन्न हो गयी? एक पेज के इस प्रपत्र मे ऐसी कौन सी जानकारियाँ हैं जिनको देने या न देने पर पक्ष और विपक्ष के बीच तलवारें खींची हुई हैं? आइये इस पर थोड़ी चर्चा कर ली जाय! क्योंकि मै स्वयं इस गणना प्रपत्र को भरने की इस एसआईआर-2025 के प्रोसैस मे सहभागी रहा हूँ।

2025 तक की मतदाता सूची के आधार पर बने इन एसआईआर फॉर्म के बाएँ तरफ चुनाव आयोग ने पहले से ही मतदाता के नाम, इपिक संख्या, पता और फोटो  के साथ मतदाता क्रमांक भाग संख्या और निर्वाचन क्षेत्र का नाम प्रिंट कर दिया है। एक पेज के इस  फॉर्म के ऊपरी आधे भाग जिसमे 9 कॉलम हैं, आवश्यक रूप से उन सभी मतदाताओं को अपनी नवीन फोटो को चस्पा कर भरना है, जिनका नाम फॉर्म मे प्रिंट है। जन्म तिथि, आधार कार्ड संख्या, मतदाता का मोबाइल नंबर, पिता, माता, पति या पत्नी के नाम और उसके नीचे उनका वोटर पहचान संख्या लिखने के कॉलम ही इस पहले भाग मे लिखना है। रही बात पेज के आधे, नीचे वाले दो भागों की तो इन दोनों मे से किसी एक, बाएँ या दायें भाग का चयन करना हैं। बाएँ वाले भाग का चयन उन मतदाताओं को करना हैं जिन्होने 2002-03 मे मतदान किया है। इसी प्रकार यदि आपने 2003 मे मतदान अवयस्क या अन्य किसी कारणों से नहीं किया तो दायें वाले भाग मे सिर्फ मतदाता के  पिता से संबन्धित की सारी सूचनाएँ उपलब्ध करानी हैं। शेष निर्वाचन क्षेत्र का नाम एवं  संख्या, भाग संख्या और मतदाता क्रमांक मतदाता सूची 2002-03 के आधार पर संबंधित बीएलओ आपकी सहायता से भरा जा सकता है।  मै नहीं समझता कि किसी भी मतदाता को इन सूचनाओं को भरने मे कोई बहुत कठिन और श्रमसाध्य ज्ञान और कौशल की आवश्यकता है। इस सामान्य से फॉर्म को भरने के विरुद्ध विपक्षी दलों का विरोध समझ से परे है।

ये बात स्पष्ट रूप से जान लेनी चाहिए कि विशेष गहन पुनरीक्षण अभियान-2025 के पश्चात तैयार  नयी सूची मे से ऐसे  मतदाता  जिनकी मृत्यु हो चुकी है या कहीं दूसरी जगह  स्थानांतरित हो गए हों का नाम स्वतः ही सूची मे से हटा कर सूची को   अद्यतन कर दिया जाएगा। आशा की जानी चाहिये कि मतदाता सूची मे फर्जी और अवैध तरीके से नाम जुड़वाने वाले घुसपैठिए मतदाता,  जिन्होने 2002-03 के बाद मतदान किया हो और उनके पिता, माता, पत्नी अथवा पति की वोटर मतदाता पहचान संख्या नहीं होगी पूरी संभावना है कि वे अब फर्जी, नकली और जाली मतदान नहीं कर सकेंगे।

विजय सहगल        

शनिवार, 22 नवंबर 2025

बिहार जनादेश-2025, बहुआयामी संदेश

 

"बिहार जनादेश-2025, बहुआयामी संदेश"





पिछले दिनों 25 अक्टूबर से 30 अक्टूबर 2025 को बिहार प्रवास के दौरान पूरे देश मे, बिहार की मजबूत सांस्कृतिक पहचान बने छट पर्व की छंटा जगह जगह देखने को मिली, वहीं आरा, दानापुर, पटना, जमुई, लखीसराय और मोकामा के राजनैतिक परिदृश्य को करीब से देखने का मौका मिला। जगह जगह हमारी कार को रोक कर विडियो ग्राफी और जांच पड़ताल की गयी जो इस बात का सबूत था कि चुनाव आयोग प्रदेश मे कानून व्यवस्था के प्रति कितना सचेत और जागरूक था। मैंने एक पुलिस अफसर से यूं ही पूंछ लिया कि कहीं बिहार के  बाहर की गाड़ी होने के कारण, कार को तो नहीं जांचा जा रहा? उसने मुस्करा कर कहा सर! उपर से आदेश होने के कारण बिना किसी भेदभाव के सभी गाड़ियों की चेकिंग की जा रही है।    

अंततः 14 नवंबर 2025 को बिहार मे हुए चुनाव का जनादेश 2025 एनडीए के जबर्दस्त पक्ष मे रहा, जिसकी कल्पना कदाचित एनडीए और महागठबंधन  के घटक दलों के सूरवीरों ने भी नहीं की होगी। जहां एनडीए और उसके दलों के नेताओं, कार्यकर्ताओं और समर्थकों के चेहरे इस सफलता पर खुशी से फुले नहीं समा रहे थे, वहीं  महागठबंधन के सहयोगी दल राजद और कॉंग्रेस के नेताओं के चेहरों की हवाइयाँ उडी हुए थी। बिहारी भाषा की कहावत कहें तो इस चुनाव मे एनडीए ने गर्दा उड़ा दिया!!

कॉंग्रेस के नेता और संसद मे विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने बिहार राज्य के अंदर और बाहर भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर बड़े ही अभद्र भाषा मे वोट चोरी के आरोप लगा कर अपनी चुनावी सभाओं मे उपस्थित लोगों से "वोट चोर-गद्दी छोड़"  जैसे नारे लगवा कर  अपनी अपरिपक्व राजनीति और सोच का परिचय दिया। एसआईआर (विशेष गहन पुनिरीक्षण) के मुद्दे पर  5 नवंबर 2025 को हरियाणा मे  केन्द्रीय चुनाव आयोग  पर इस कथित वोट चोरी मे संलिप्तता और सहयोग का आरोप लगाते हुए इन तीनों सर्वोच्च पदस्थ अधिकारियों पर सहभागी होने के आरोप भी लगाए।  कॉंग्रेस की महासचिव प्रियंका बाड्रा ने तो एक कदम बढ़ कर, चंपारण जिले के रीगा मे अपनी चुनाव रैली मे केंद्रीय  चुनाव आयोग के मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार, उपायुक्त द्वय एसएस संधु एवं विवेक जोशी का नाम लेकर उन पर संविधान और लोकतन्त्र के साथ विश्वासघात करने के  आरोप लगा कर उन्हे चोर ठहराने के नारे उपस्थित जन समूह से लगवाए। चुनाव आयुक्त और उपायुक्तों पर आरोप प्रत्यारोपों के बावजूद, बिहार राज्य के विधान सभा चुनाव 2025 इन मायने मे बेहद महत्वपूर्ण रहे  कि स्वतन्त्रता के बाद हुए अब तक के चुनावों मे मतों के प्रतिशत सर्वाधिक 67.13 प्रतिशत  रहा जो अब तक के हुए चुनावों मे एक कीर्तिमान है। यह मतदान पिछले वर्ष के हुए मतदान से 9.6% अधिक है जो एक रिकॉर्ड है। महिलाओं द्वारा किए गए मतदान की दृष्टि से  भी बिहार राज्य के  चुनाव 2025 ने एक प्रभावशाली छाप छोड़ी, जो पुरुषों द्वारा किए गये 62.98 प्रतिशत  से 8.15 प्रतिशत अधिक अर्थात 71.78 प्रतिशत, जो भी एक रिकॉर्ड है। इस असाधारण मताधिकार के लिये बिहार राज्य के चुनाव आयोग और केंद्रीय चुनाव आयोग और उनके अधिकारी, कर्मचारी बधाई के पात्र हैं जिन्होने अपने श्रेष्ठ चुनाव प्रबंधन और सूझ बूझ के साथ अब तक सर्वाधिक मतदान प्रतिशत के साथ हिंसा, हत्या और हानि के लिये बदनाम बिहार मे, 2025 के चुनावों को कमोवेश शांति और सफलता पूर्वक सम्पन्न कराया।

जिस तरह बिहार की 243 सदस्यीय विधान सभा मे एनडीए और उंसके सहयोगी दलों ने 202 सीटें जीत कर स्पष्ट दो तिहाई बहुमत प्राप्त किया वह कबीले तारीफ है। महा गठबंधन ने सिर्फ 34 सीटें जीत कर, जैसी शर्मनाक हार का प्रदर्शन किया वह उनके नेता राहुल गांधी और राजद नेता तेजस्वी यादव द्वारा महागठबंधन की सरकार बनाने के किये गये दावों के एकदम विपरीत रहा। जन स्वराज पार्टी के प्रशांत किशोर जो कभी अपनी चाणक्य नीति के तहत देश के तमाम नेताओं को अपनी चुनावी  रणनीति और चुनावी युद्ध कौशल से अनेकों राज्यों मे विभिन्न दलों के मुखियाओं को  मुख्य मंत्री बनवाते नज़र आते थे, पर  बिहार मे अपने दल के लिये न कोई उपाय और न ही कोई युक्ति बना और सुझा सके, नतीजतन बिहार के इस विधान सभा चुनाव 2025 ज़ीरो पर आउट हो गये और अपने दल के लिये एक भी सीट नहीं जुगाड़ सके।     

आने वाले साल 2026 मे पश्चिमी बंगाल, केरल, असम और तमिलनाडु मे  होने वाले राज्य विधान सभाओं के चुनाव मे बिहार की इस जीत का बड़ा असर दिखलाई पड़ेगा। जहाँ तक एनडीए का प्रश्न है बिहार की इस शानदार जीत पर इसके घटक दलों मे जबर्दस्त उत्साह है, जिसकी बानगी नरेंद्र मोदी के भाजपा कार्यालय मे हुए जश्न मे देखने को मिली। पीएम ने अपने सम्बोधन मे जीत का श्रेय बिहार की उन बहिनों, बेटियों को दिया जिन्होने आरजेडी के राज मे जंगलराज का आतंक झेला है। उन्होने अपने सम्बोधन मे बिहार के लोगो को धन्यवाद ज्ञापित करते हुए कहा कि गंगा जी बिहार से बंगाल जाती हैं, बिहार ने बंगाल मे बीजेपी की विजय का रास्ता बना दिया है।  बीजेपी आप के साथ मिल कर पश्चिमी बंगाल से भी जंगल राज उखाड़ फ़ेंकेगी।

इस बार के चुनाव मे एक ओर जहाँ जातिवादी और धार्मिक समीकरण  टूटते नज़र आए, वही महागठबंधन के एमवाई फैक्टर अर्थात मुस्लिम और यादव के मुक़ाबले एनडीए का एमवाई फैक्टर अर्थात महिला और यूथ (युवा) अधिक कारगर रहा। चुनाव के ठीक पहले महिलाओं के  लिये बिहार सरकार की, "मुख्यमंत्री महिला रोजगार योजना" ने एक अहम भूमिका अदा की। इस योजना के अंतर्गत अगड़े, पिछड़े, हिन्दू-मुस्लिम, आदिवासी, अनुसूचित जाति की हर उस महिला के बचत खाते मे सीधे ही दस हज़ार रूपये जमा किये गये जो  स्वरोजगार शुरू करने के उद्देश्य से सहायता की  अपेक्षा रखती थी। इस यौजना मे बिहार की 25 लाख महिलाओं के खाते मे दो हजार पाँच सौ करोड़ की राशि सीधे ही महिलाओं के खाते मे जमा की गयी। एक ओर इस विकासोन्मुख  और सकारात्मक योजना ने एनडीए गठबंधन को जीत दिलाने मे तुरुप के इक्के का कार्य किया वही दूसरी ओर विपक्षी महागठबंधन के प्रमुख नेता राहुल गांधी ने  नकारात्मक सोच के रूप मे जगह जगह मोदी को वोट चोर गद्दी छोड़ के आरोप लगाये। भ्रष्ट परिवारवादी, वंशवादी, कट्टा बंदूक के जंगलराज की राजनीति के विरुद्ध लोगो की एकजुटता ने भी महागठबंधन को काफी नुकसान पहुंचाया। एनडीए की सफलता मे जहाँ एक ओर मुख्यमंत्री नितीश कुमार और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बीच आपसी समझ-बूझ और एक दूसरे के प्रति सम्मान के साथ ही एनडीए के घटक दलों द्वारा एक टीम की तरह चुनाव लड़ने का जज्बे ने महत्वपूर्ण भूमिका अदा की वहीं महागठबंधन द्वारा 8-9 जगह एक दूसरे के विरुद्ध अपने प्रत्याशियों को खड़ा करना भी उनके अदूरदर्शीय सोच और आपसी तालमेल की कमी को दिखा रहा था।

अभी समय आ गया है कि महागठबंधन के घटक दलों विशेषकर काँग्रेस,  आत्मचिंतन कर देश के सामने विकास योजनाओं को लेकर जनता के सामने आयें।  राहुल गांधी को नरेंद्र मोदी को कभी चौकीदार चोर, कभी वोट चोर, तूँ-तड़ाक जैसी भाषा रूपी  अपने नकारात्मक चिंतन को छोड़ विकास के मुद्दों को लाना होगा ताकि भारतीय जनमानस को अपने पक्ष मे लाकर सकारात्मक राजनीति कर सकें।

विजय सहगल                               

रविवार, 16 नवंबर 2025

"भीमा शंकर, ज्योतिर्लिंग, पुणे"

 

"भीमा शंकर, ज्योतिर्लिंग, पुणे"










बैसे तो अब तक मै देश के विभिन्न हिस्सों मे स्थित 12 पवित्र ज्योतिर्लिंगों के दर्शन कर चुका हूँ। हाल ही मे पिछले माह जुलाई 2025 मे भीमाशंकर और घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग के साथ पूरे बारह ज्योतिर्लिंग के दर्शन किए थे। अभी हाल ही मे अक्टूबर  2025 मे बनारस मे  बाबा विश्वनाथ और देवघर मे बाबा बैजनाथ के दर्शन किए जो हिन्दू धर्म मे एक पवित्र धार्मिक यात्राओं मे से एक पुण्य कार्य समझा जाता है। इन बारह ज्योतिर्लिंगों की यात्रा के अपने अनुभव के आधार पर  बनारस के बाबा विश्वनाथ के मंदिर का प्रबंधन सर्वोत्तम रहा जहां का रखरखाब, दर्शनार्थियों की सुविधाओं की दृष्टि से सारी व्यवस्थायेँ  हर पैमाने पर अतिउत्तम थी इसके विपरीत भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग के मंदिर के  प्रबंधन की व्यवस्था पूरी तरह से अव्यवस्थित थी   तथा  दर्शनार्थियों के लिये सुख सुविधाओं की दृष्टि से अति निम्नस्तरीय कहा जायेगा। लेकिन बाबा बैजनाथ धाम मे तो मंदिर प्रबंधन कहीं दूर दूर तक नज़र नहीं आता। हर तरफ मंदिर मे पंडे, पुजारियों के वर्चस्व मे अराजकता और अव्यवस्था ही नज़र आती है।  

चलिये, फिर भी  इस दक्षिण-पश्चिम  यात्रा मे मेरा इरादा पुणे के नजदीक भीमा शंकर और घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग थे। अपने समुद्र तटीय यात्रा के अगले पड़ाव के रूप मे हमारा लक्ष्य महाराष्ट्र राज्य पुणे के नजदीक सनातन धर्म के 12 पवित्र ज्योतिर्लिंग मे से एक भीमा शंकर मंदिर था। बैसे मेरा लक्ष्य सह्याद्रि पर्वत शृंखला पर स्थित भीमशंकर ज्योतिर्लिंग के दर्शन पश्चात आगे की यात्रा के रूप मे  छत्रपति संभाजीनगर मे स्थित घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग के दर्शन के  लिए बढ़ना था पर जब हमारे मित्र श्याम टंडन और उनकी पत्नी आशा ने भी हम लोगो के साथ चलने की मनसा जतलाई तो हम दोनों की भी प्रसन्नता की सीमा न रही।      

भीमा शंकर ज्योतिर्लिंग के बारे मे एक पौराणिक कथा हैं कि जब भगवान ब्रह्मा जी के बरदान से राक्षस भीमा जो कि कुंभकरण का पुत्र था देवताओं पर अत्याचार करने लगा। जब राजा सुदक्षिण ने पार्थिव शिव लिंग का निर्माण कर भगवान शिव की पूजा अर्चना की तो राक्षस भीमा ने उन्हे मारने का कुत्सित प्रयास किया। तब भगवान शिव ने प्रकट होकर अपनी क्रोधाग्नि से राक्षस भीमा का वध किया। देवताओं के अनुरोध पर तभी से ज्योतिर्लिंग के रूप मे स्थापित हो गए। सह्याद्रि पर्वत श्रंखला के बीच यह क्षेत्र वन्य जीव अभ्यारण मे स्थित होने के कारण यह क्षेत्र हरियाली, झरनों, जंगलों और वन्य जीवन के लिए जाना जाता है। 11 जुलाई 2025 को सावन मास  के प्रथम दिन  प्रातः लगभग 7 बजे हम चारों लोगों ने जब पुणे से लगभग 125 किमी दूर इसी जिले के खेड़ तालुका के भीमाशंकर गाँव मे स्थित बारह  पवित्र ज्योतिर्लिंगों मे से एक भगवान शिव के भीमाशंकर तीर्थ के लिए प्रस्थान किया तो अंदेशा तो था कि सावन महिना होने के कारण भीड़ मिलेगी पर हम जिस मंचर, फूलेगाँव, वाघोली मार्ग से  होकर जा रहे थे, वहाँ,  कहीं कोई ट्रेफिक नहीं दिखलाई दिया। लेकिन जैसे ही हम भीमाशंकर गाँव से कुछ किमी पहले पहुंचे तो वाहनों, बसों और लोगों की भीड़ देख कर हतप्रभ थे।

मुख्य मंदिर से लगभग दो किमी पहले ही पुलिस ने यातायात व्यवस्था बनाए रखने हेतु हमारी कार सहित सभी चार पहिया वाहनों को एक अस्थाई पार्किंग की ओर मोड़  दिया। पार्किंग भी ऊबड़-खाबड़, छोटे बड़े चट्टानी पत्थरों से भरी, कच्चे रास्ते मे थी और  पूरी तरह अव्यवस्थता व्याप्त थी। पार्किंग से लगभग डेढ़-दो किमी मंदिर क्षेत्र तक जाने के दो विकल्प थे या तो आप पैदल जाएँ या पीछे से आ रही महाराष्ट्र राज्य परिवहन निगम की बसों  मे चढ़ कर मंदिर क्षेत्र पहुंचे। पर अपर्याप्त बसों के कारण व्यवस्था व्यवस्था पूरी तरह तहस-नहस थी। ऊपर से बरसात  होने के कारण जैसे तैसे हम लोग भीगते हुए बस मे चढ़ कर मंदिर के प्रवेश द्वार पर पहुंचे।

उत्साह, उमंग से भरपूर दर्शनार्थ आए श्रद्धालुओं को ज्योतिर्लिंग के दर्शन की जानकारी हेतु कहीं कोई सूचना या जानकारी नहीं दिखलाई दी। ज्ञात हुआ कि मंदिर के दर्शन हेतु लगभग सौ-सवा सौ सीढ़ियाँ उतर कर जाना पड़ेगा। बायीं तरफ बनी दो लाइनों की रेलिंग मे दर्शनार्थी लाइन मे खड़े थे। जूते चप्पल आदि रखने की कहीं कोई व्यवस्था नहीं थी। सीढ़ियों के दोनों ओर प्रसाद, नाश्ता, फल फूल आदि की दुकाने बनी हुई थी।  बरसाती पानी अपने साथ लाये कूड़ा-कचरा के साथ सीढ़ियों से बहता हुआ श्रद्धालुओं के पैरों से होकर निकल रहा था। अनेकों  लोगो की लाइन मे प्रसाधन की कहीं कोई वयवस्था न होना मंदिर और शासन की अकर्मण्यता और अदूरदर्शता को दिखला रहा था। पूरी सीढ़ियों पर  बरसाती पानी और उसके साथ आए कचरे से गंदगी का साम्राज्य नजर आ रहा था। लाइन मे खड़े लोगो को बैठने की तनिक भी कहीं-कोई व्यवस्था नहीं थी। भाजपा शासित राज्य मे सनातन धर्म के बारह पवित्र ज्योतिर्लिंग तीर्थों  मे एक इस भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग मे  ऐसी अराजकता, अस्तव्यस्तता, अव्यवस्था देखना मन को दुःखी कर रहा था। जगह जगह ऐसे असामाजिक तत्वों से सावधान रहने की चेतावनी के बोर्ड लगे थे जो पैसा लेकर शीघ्र दर्शन कराने का दावा करते हों, पर  फिर भी ऐसे पंडे पुजारी, लोगो को ले  जाकर लाइन मे आगे लगाते दिखे, जो मंदिर प्रशासन की ढील-पोल की पोल खोलते दिखे। मंदिर मे ज्योतिर्लिंग के दर्शन मे पाँच घंटे से ज्यादा लगे समय के चलते, मंदिर परिसर के नजदीक आने पर ये देख मन एक बार फिर दुखी हुआ क्योंकि मंदिर परिसर को बड़े बड़े टीन शेड और टेंट से ढँक दिया गया था। लाइन मे लगे कर चलते हुए पुरातन  मंदिर के वास्तु  सौन्दर्य को देखते हुए लाइन मे चलते तो शायद लाइन का दुःख दर्द कुछ कम होता।   

5-6 घंटे की कष्टदायक, पीढ़ादायक और मंदिर की निराशजनक  व्यवस्था की लंबी यात्रा के  बाद  जैसे ही मंदिर के बड़े मंडप गृह मे  कदम रखा  तो सारे दुःख दर्द भूल गए और सधे  कदमों से चंद कदमों की दूर मंदिर के पवित्र गर्भ गृह की ओर कदम बढ़ चले। चंद मिनटों के बाद जैसे ही हम लोग मंदिर के प्रवेश द्वार को पार कर मंदिर के गर्भ गृह मे स्थापित भगवान भीमा शंकर, ज्योतिर्लिंग को स्पर्श कर वंदन, अभिनंदन कर दर्शन किये तो अपने जीवन को धन्यभागी मान, ईश्वर के प्रति कृतज्ञता  ज्ञपित की। दर्शनों के पश्चात बापस रंग मंडप मे परिक्रमा कर मंदिर परिसर के बाहर निकले। बाहर निकलने पर मंदिर के शिखर के दर्शन कर मन एक बार पुनः प्रसन्न हो गया। यहाँ पर मोबाइल से फोटो लेना सहज था इसलिए कुछ फोटो मंदिर के शिखर के लिये। मंदिर के बाहर, भगवान शिव के वाहन नंदी की अति प्राचीन जोड़ी और  एक विशाल मिश्रधातु के अति प्राचीन, (सन 1729 मे निर्मित) विशाल घंटे को देखना भी कौतूहल से कम न था। दक्षिण पश्चिम के कोंकण और महाराष्ट्र के मंदिरों  मे प्रायः एक कलात्मक दीप स्तम्भ की उपस्थिती यहाँ भी देखने को मिली। मंदिर के बाहरी दरवाजे पर एक पवित्र कुंड जिसमे शायद ज्योतिर्लिंग पर चढ़ाया गया पवित्र जल एकत्रित किया गया था।  

दर्शन उपरांत एकबार पुनः उन्ही सीढ़ियों पर चढ़ते हुए बापस अपने गंतव्य पुणे के लिए हमलोगों ने  प्रस्थान किया।   

विजय सहगल

                

 

शुक्रवार, 7 नवंबर 2025

गुप्तकालीन ईंटों का पुरातन मंदिर, भीतरगाँव, कानपुर

 

"गुप्तकालीन ईंटों का पुरातन मंदिर, भीतरगाँव, कानपुर"









पिछले दिनों मैराथन यात्राओं के कारण रविवार को साप्ताहिक ब्लॉग लिखने से रह गया लेकिन 15 दिवसीय इस यात्रा मे अनेकों नए शहर और उनके नये धार्मिक/पर्यटन स्थलों का भ्रमण मुझे नये ब्लॉग, यात्रा वृतांत लिखने के लिये प्रेरित करेगा। इसी कड़ी मे प्रस्तुत है एक अनछुए मंदिर का विवरण जो पर्यटन की दृष्टि से अभी कम लोकप्रिय है।   

यूं तो कानपुर महानगर मे अनेकों बार आना जाना हुआ पर 4 नवंबर 2025 को मै अपने दृढ़ निश्चय के साथ ही कानपुर आया था कि इस बार कानपुर से लगभग 30-35 किमी॰ दूर भीतरगाँव मे स्थित 5वी शती के गुप्त कालीन, ईंटों से बने अद्भुत मंदिर का भ्रमण अवश्य करूंगा। भारत के स्वर्ण युग कहे जाने वाले चन्द्र गुप्त प्रथम से विष्णुगुप्त तक के  शासकों का काल 320 ईस्वी से 550 ईस्वी तक रहा जिसमे कला, साहित्य, विज्ञान और वास्तु निर्माण मे अद्भुत अकल्पनीय कार्य हुए। इनके ही काल के दौरान भीतरगाँव स्थित इस स्थल पर टेरकोटा की ईंटों से बना ये गुप्तकालीन मंदिर अत्यंत दर्शनीय और सुंदर है। मैंने ईंटों की बारीक नक्काशी का एक अन्य मंदिर को  अपने छत्तीसगढ़ पदस्थापना के दौरान सिरपुर (जिला रायपुर, बसना) मे स्थित लक्षमण मंदिर 1998-99 मे देखा था। कहा जाता हैं कि  इस गुप्त कालीन  लक्ष्मण मंदिर को भी पहले कच्ची ईंटों से बनाया गया था और फिर पूरे मंदिर को आवा लगा कर उसी तरह पकाया गया था जैसे कच्ची ईंटों को पकाने के लिए आग मे तपा कर पकाया जाता था।

कानपुर महानगर की आपा-धापी और दौड़ भाग भरी ज़िंदगी से निकलते हुए जब हम रमईपुर औधोगिक क्षेत्र से निकल कर भीतरगाँव के शांत और ग्रामीण इलाके मे पहुंचे तो अलग ही सुकून और शांति का अनुभव किया।  जब हम अपने परिवार के साथ भीतरगाँव मे पहुंचे तो एक अदृश्य डर और कल्पना के कारण, गाँव मे घनी आबादी और बाजार के बीच मे इस प्राचीन मंदिर को देखना एक चिंता मिश्रित अलग अनुभव था। लेकिन इस छोटे से मैदान मे बने मंदिर को पुरातत्व विभाग द्वारा मंदिर के रख रखाव को देख कर सुखद अनुभव किया। मंदिर के परिसर की साफ सफाई के बीच ईंटों से बने इस मंदिर को देखना एक विलक्षण अनुभव था। सूरज की स्वर्णिम किरणों से सुहागा रंग की ईंटों पर पड़ रही चमक सोने पर सुहागा की कहावत को चरितार्थ कर रहीं थी। हरी घास के मैदान के बीच 36X47 फीट आयताकार परिसर मे बना लगभग 68 फीट ऊंचा मंदिर अपनी आभा, चमक  और तेज के कारण अत्यंत ही आकर्षक और सुंदर लग रहा था। पूर्वोन्मुख इस भव्य मंदिर का द्वार एक अर्ध वलयाकार आर्क की आकृति लिए था जिसमे 18X9X3 इंच की ईंटों से बनाया गया था।  4-5 सीढ़ियाँ चढ़ कर मंदिर के गर्भ गृह मे पहुंचा जा सकता हैं। लेकिन जाली दर गेट मे ताला डला होने के कारण अंदर जाना वर्जित था। यध्यपि 15X15 फुट के मंदिर के वर्गाकार गर्भ गृह मे कभी कोई मूर्ति रही हो, पर  अभी कोई मूर्ति या निर्माण नहीं था। मंदिर के अंदर मे सिवाय इस दरवाजे के कहीं कोई खिड़की या अन्य दरवाजा नहीं था लेकिन आर्क की आकृति के ऊपर ईंटों से बने त्रिकोणीय दीवार के बजन को सहन करने की वास्तु तकनीकि को देख आश्चर्य, विस्मय और अचंभा तो होता ही है कि चौथी-पाँचवीं शती मे भी हमारे देश का वास्तु निर्माण कितना उन्नत, विकसित और उत्कृष्ट रहा होगा।

भीतरगाँव का ये मंदिर टेराकोटा ईंटों से बना एक मात्र पुरातन हिन्दू मंदिर है जो आज भी अपने भव्य और जीवंत रूप मे विराजमान हैं, निश्चित ही पुरातत्व विभाग को इस महत्वपूर्ण योगदान के लिए प्रशंसा करनी होगी। मंदिर की चारों दीवारों पर जहां नीचे 6-7 फीट तक  सामान्य ईंटों का आधार देकर चबूतरा बनाया गया था, उसके ऊपर चारों तरफ आयताकार आलों पर हिन्दू देवी देवताओं, सनातनी कथाओं को टेराकोटा मे उपयोग होने वाली कच्ची मिट्टी से निर्मित कर आग मे तपा कर मंदिर मे लगाया गया पर दुर्भाग्य से आक्रांताओं लुटेरों ने इन मूर्तियों को विरूपित कर अपभ्रष्ट कर दिया।  लेकिन हिन्दू देवी देवताओं और उनके स्वरूपों को उनकी  चित परिचित रूप और शैली से उन आकृतियों को पहचान करना कठिन नहीं था। भगवान विष्णु द्वारा वामन अवतार मे उपयुक्त बौने ब्राहमण और हाथ मे छत्री को देख कर अनुमान लगाना कथित नहीं कि ये भगवान विष्णु के वामन अवतार का प्रसंग हैं। चार भुजा धारी माँ दुर्गा की मूर्ति स्वयं ही अपने रूप का वर्णन करती प्रतीत होती हैं। नर और नारायण के रूपों का संदेश देती मूर्ति भी मंदिर की एक दीवार मे देखी  जा सकती हैं। भगवान के बराह अवतार रूप को एक फ्रेम मे उत्क्रीण किया गया था। एक विरूपित मूर्ति मे रावण द्वारा माँ सीता का झोपड़ी से हरण और जटायु की उपस्थिती को दर्शाया गया हैं। देवधिदेव भगवान श्री गणेश की विकृत की गयी मूर्ति को लंबोदर की सूढ़ से बड़ी आसानी से पहचाना जा सकता हैं। कहने का तात्पर्य हैं इन विधर्मी आक्रांताओं की अपवित्र कोशिशें  भी सनातन स्वरूपों, संस्कारों और  सांस्कृति को नहीं मिटा सके। इन मूर्तियों के दोनों ओर षटकोणीय स्तंभों के ऊपर और नीचे अर्धगोलाकार बारीक नक्काशी को उकेरना टेराकोटा की इस अद्भुत वास्तु कला की पराकाष्ठा रही होगी।    

मंदिर की दीवारों पर ईंटों से बने हाथी,  शेर और अन्य प्रतीकों को भी बड़ी बारीकी से उकेरा गया हैं।  ईंटों से बने छज्जे, आले और कंगूरों को बहुत ही शानदार ढंग से बनाया गया हैं। मंदिर की दीवारों के ऊपरी सतह पर एक के उपर एक अनेकों आर्क का निर्माण मंदिर के निर्माण को एक शानदार ज्योमिति रूप प्रदान करता हैं जिसे देख कर तत्कालीन वास्तु निर्माण मे पारंगत हमारे श्रमिकों और कारीगरों की कला देखते ही बनती हैं।

जहां एक ओर पुरातत्व विभाग के कर्मचारी श्री शाही द्वारा मंदिर के बारे मे हम पर्यटकों को  विस्तृत विवरण देना उनकी कर्तव्य परायणता को दर्शाता है जो आज के समय मे कम देखने को मिलता है वहीं दूसरी ओर  कानपुर जैसे महानगर मे इतने प्राचीन भव्य मंदिर के दर्शन के लिए पर्यटकों का आभाव  होना इस बात की ओर इशारा करता हैं कि शासन और सरकार के उत्तरदायी अधिकारियों द्वारा अपने कर्तव्यों मे कोताही करते हुए  सार्थक पहल और प्रचार प्रसार नहीं किया जा रहा हैं जो निश्चित ही चिंता का विषय है। आप अब जब कभी कानपुर जाएँ तो भीतरगाँव के इस गुप्तकालीन मंदिर के दर्शन करना न भूले।

विजय सहगल