शनिवार, 19 जुलाई 2025

कोटि लिंगेश्वर" मंदिर

 

"कोटि लिंगेश्वर" मंदिर-मंदिर प्रबंधन!!








कोटि लिंगेश्वर मंदिर कर्नाटक के कोलार जिले के कम्मासन्द्रा ग्राम मे स्थित हैं जो कि बेंगलुरु से लगभग 80 किमी॰ राष्ट्रीय राजमार्ग 75 पर स्थित हैं। यह शिव मंदिर इस क्षेत्र का एक प्रसिद्ध क्षेत्र है जहां पर कोटि अर्थात एक करोड़ शिव लिंग की स्थापना बहुत बड़े क्षेत्र मे की गयी है। इस मंदिर मे 108 फुट ऊंचे शिवलिंग और उसके सामने 11 मीटर ऊंचे शिवलिंग की स्थापना भी, 15 एकड़ मे फैले, विभिन्न आकार और प्रकार वाले  एक करोड़ शिवलिंग के साथ की गयी है। मंदिर की स्थापना 1980 के आसपास स्वामी संभा शिव मूर्ति और उनकी अर्धांग्नि वी रुक्मणि द्वारा करायी  गयी थी, जिनका उद्देश्य इस स्थान पर एक करोड़ शिवलिंग की स्थापना करना था, एक अनुमान के मुताबिक अब तक 90 लाख शिवलिंग स्थापित हो चुके हैं।  एक करोड़ शिवलिंग की स्थापना के लक्ष्य की प्राप्ति हेतु इस पूरे मंदिर परिसर मे हर जगह हर कदम पर शिव लिंग की प्रतिमाएँ हैं, साथ ही   भगवान ब्रह्मा, विष्णु, श्री राम, कृष्ण, पाँच मुखी गणेश, भगवान आंजनेय, देवी कन्निका परमेश्वरी  के साथ अन्य देवी देवताओं के 11 मंदिर भी हैं। पूरे मंदिर परिसर मे मंदिर प्रबंधन द्वारा मंदिर परिसर के चारों ओर भी दो-तीन सीढ़ी नुमा पट्टियों पर शिव लिंग की स्थापना एक लाइन से की गई है।  एक सिरे से दूसरे सिरे तक लगभग चार इंच चौड़ी और लगभग सवा या डेढ़ फुट ऊंची दीवार की पट्टी बनाई गयी है जिस पर छोटे शिव लिंग की स्थापना लाइन से की गयी हैं। अब तक मैंने अनेकों पुरातन और एतिहासिक महत्व के सैकड़ो शिव मंदिर देखे हैं प्रायः हर मंदिर मे शिवलिंग की झलारी (जलधारी) जहां से शिव जलाभिषेक का जल नीचे गिरता है उत्तर दिशा की ओर ही होती हैं लेकिन इस कोटि लिंगेश्वर मंदिर मे मंदिर प्रबंधन ने, स्थान की उपलब्धता और सुहुलियत के अनुसार हजारों शिवलिंग की जलधारी की उत्तर दक्षिण की दिशा के विपरीत किसी भी दिशा मे रक्ख दिया है। सैकड़ों की संख्या मे हर रोज़ श्रद्धालु इस मंदिर के दर्शन हेतु आते हैं। मंदिर मे प्रवेश हेतु रुपए 20/- का निर्धारित शुल्क देय हैं।     

मंदिर मे प्रवेश के पश्चात मंदिर प्रबंधन द्वारा निर्धारित, निश्चित पथ से अलग बीच-आधे रास्ते मे  मंदिर परिसर से निकलने का कोई अन्य वैकल्पिक  रास्ता उपलब्ध नहीं कराया हैं अर्थात एक बार प्रवेश के पश्चात  आपको मंदिर प्रबंधन द्वारा तय रास्ते, विभिन्न मंदिरों से होकर, आरती, अभिषेक आदि धार्मिक क्रिया कर्म संपादित होने के पश्चात ही अंत मे मंदिर परिसर से निकलने की अनुमति है, इस हेतु जगह जगह मदिर मे कार्यरत स्टाफ आपको निर्देशित कर तय मार्ग पर भेजते हैं और आवश्यकता पड़ने पर निषेध और वर्जित स्थानों पर रस्सी से रास्ता रोक कर तय पथ की ओर अग्रेषित किया जाता हैं। कभी कभी मंदिर प्रबंधन के इस पथ अनुगमन का नियम  खीझ, वितृष्णा और विरक्ति पैदा करता हैं।

मंदिर मे हर जगह शिव लिंग  की स्थापना देखकर मन मे जिज्ञासा हुई कि मंदिर प्रबंधन से शिवलिंग की स्थापना के नियम आदि की जानकारी ली जाय इस हेतु मंदिर के कर्मचारियों से कार्यालय की जानकारी ले उनके कार्यालय मे पहुंचा। कार्यालय मे पदस्थ कर्मचारियों से शिवलिंग की स्थापना के  मन्तव्य के बारे मे पूछने पर उन्होने कार्यालय मे रक्खे 3-4 प्रकार के शिवलिंग को दिखलाते हुए हमसे पूंछा कि आप किस प्रकार के शिव लिंग की स्थापना कराना चाहते हैं? मैंने प्रतिप्रश्न करते हुए वहाँ रखे तीनों शिव लिंग के बारे मे जानने की जिज्ञासा प्रकट की? छोटे शिव लिंग की स्थापना हेतु रूपये 8500/- मध्यम शिवलिंघ हेतु 31000/- और बड़े शिव लिंग हेतु 64000/- रुपए मंदिर प्रबंधन को दान के पश्चात अपनी इच्छानुरूप शिवलिंग की स्थापना का संकल्प दोहराया। बड़े शिवलिंग की स्थापना हेतु दो-ढाई फुट के वर्गाकार चबूतरे पर कराई गयी थी, कुछ बड़ी प्रतिमाओं पर दान दाताओं के नाम का पत्थर भी लगाया गया था जो सिर्फ बड़ी मूर्तियों के लिए ही उपलब्ध था। जब हमने शिवलिंग की स्थापना हेतु लगने वाले वक्त और समय पर सवाल किया, तो मंदिर प्रबंधन ने कहा कि अभी जैसे ही आप दक्षिणा कार्यालय मे जमा करते हैं तो तुरंत ही शिव लिंग की स्थापना करा दी जायेगी। स्थान की उपलब्धता पर हमे निश्चिंत करते हुए भरोसा दिलाया गया कि मंदिर प्रबंधन पर समुचित स्थान उपलब्ध हैं। वार्तमान मे मंदिर मे स्थापित शिवलिंग की गणना का कोई आंकड़ा उपलब्ध नहीं था। पूरे मंदिर परिसर मे सिर्फ पैदल पथ पर चलने के अलावा मंदिर प्रबंधन ने कहीं बैठने की कोई व्यवस्था नहीं दिखायी दी। लोग लगातार चलने के बाद रास्ते मे, जमीन पर जहां तहां बैठे नज़र आए।  

मै लोगों, श्रद्धालुओं और भक्तजनों की सम्मान, आस्था और विश्वास को ठेस पहुंचाए बिना माफी मांगते हुए लिखने की धृष्टता कर रहा हूँ कि महज एक करोड़ शिव लिंग की स्थापना के लक्ष्य  हांसिल करने हेतु मंदिर प्रबंधन ने लाखों शिवलिंग की सनातन धर्म के न्यूनतम दैनिक मूल्यों, गारिमा  यथा बिना जलाभिषेक, पूजा अर्चना, पत्र, पुष्प, फल, आरती, प्रार्थनाओं, मंत्रोच्चारण और स्तुति और स्रोत्र  आदि क्रिया कलापों की अनदेखी नहीं  हैं? बिना प्राण प्रतिष्ठा के शिवलिंग की स्थापना जहां तहां करा देना कहाँ तक उचित हैं समझना कठिन हैं। क्या ये सनातन  भक्तों, श्रद्धालुओं दर्शनार्थियों की भावनाओं का दोहन और शोषण नहीं है? क्या हमें, हमारी भक्ति,  आस्था और विश्वास पर मंदिर प्रबंधन के  उद्देश्यों और लक्ष्यों  पर विचार मंथन नहीं करना चाहिये?  मंदिर प्रबंधन पर ये बड़े महत्वपूर्ण प्रश्न हैं।

विजय सहगल      

      

शुक्रवार, 4 जुलाई 2025

लेपाक्षी मंदिर-आंध्र प्रदेश

 

"लेपाक्षी मंदिर-आंध्र प्रदेश"

















15 जून 2025 को आंध्र प्रदेश के श्री सत्य साईं जिले के लेपाक्षी ग्राम मे स्थित लेपाक्षी मंदिर के दर्शन का दैव योग प्राप्त हुआ। बेंगलुरु से लगभग 112 किमी दूर लेपाक्षी मंदिर भगवान शिव के रुद्रावतार वीरभद्र को समर्पित हैं। लेपाक्षी का तेलगु मे अर्थ हैं हे! पक्षी उठो! जो सनातन की पौराणिक कथा से जुड़ा है। ऐसी किवदंती हैं कि राम वन गमन मे रावण द्वारा सीता हरण के दौरान जटायु द्वारा रावण के सीता हरण के मार्ग को रोक कर उस पर आक्रमण किया था और रावण द्वारा जटायु के पर काट कर उसको घायल कर दिया था। इसी स्थान पर घायल जटायु गिरे थे जहां भगवान राम से जटायु की मुलाक़ात हुई थी और श्री राम ने जटायु को संबोधित करते हुए उन्हे उठाया था।  यह मंदिर विजय नगर वास्तु शैली पर निर्मित हैं जिसकी नीव  दक्षिण भारत के महान, वीर प्रतापी राजा कृष्ण देव राय के विजय नगर साम्राज्य के रूप मे रक्खी थी। तेनाली राम, जिनकी चतुराई और बुद्धि कौशल के किस्से हम बचपन मे मासिक पत्रिका नन्दन मे पढ़ते आये थे वे दक्षिण भारत के इन्ही प्रसिद्ध राजा कृष्ण देव राय के मंत्री परिषद के मंत्री थे जो अपनी कला, साहित्य मंदिर निर्माण के संरक्षण के लिए जाने जाते हैं। राजा कृष्ण देव राय के शासन काल मे उनके राज्य विजय नगर मे अनेकों मंदिर, गोपुरम, मंडप प्रासादों का निर्माण कराया था।

लेपाक्षी मंदिर का निर्माण 1520 ई॰ मे  विजय नगर साम्राज्य की पेनुकुंडा रियासत के राज्य पाल वीरूपन्न नायक और वीरन्ना ने कराया था जो राजा अच्युतदेव  राय के अधीन था। विजय नगर शैली मे एक कछुआ के आकार की पहाड़ी को काट कर बनाए गये इस विलक्षण मंदिर को आज भी आधे भाग मे मंदिर और आधे  भाग मे मूल पहाड़ी के अवशेष को स्पष्ट देखा जा सकता हैं। मंदिर मे कदम कदम पर हर स्तम्भ, मंडप और मंदिर के गर्भ गृह मे विजय नगर शैली की नक्काशी और वास्तु कौशल को प्रचुर मात्रा मे दर्शाया गया हैं। यह मंदिर दक्षिण भारत मे  भगवान शिव का एक महत्वपूर्ण तीर्थ स्थल जहां देश विदेश से श्रद्धालु बड़ी संख्या मे दर्शनार्थ आते हैं। एक वर्गाकार विशाल चबूतरे के उपर चबूतरों पर मंदिर का निर्माण किया गया हैं। सीढ़ियों से चढ़कर मंदिर की ओर बढ़ते हैं जहां ऊंची ऊंची सपाट चहर दीवारों से ढंके मंदिर के प्रवेश द्वार से मंदिर परिसर मे प्रवेश करते हैं।  पुनः मंदिर के प्रवेश द्वार से लगे छोटे गलियारे से  होकर जैसे ही मंदिर के रंगमंडपम मे प्रवेश करते हैं तो मंदिर की शोभा और वैभव के दर्शन होते हैं। आयताकार ऊंचे ऊंचे पत्थर के स्तंभों से मंदिर के रंग मंडप का निर्माण एक चबूतरे पर किया गया हैं। मंडप के केंद्र को छह नक्काशीदार बड़े और चौड़े खंभों से बनाया गया हैं। हर खंबे पर अलग अलग देव, किन्नर, यक्ष की मूर्तियों को उत्कीर्ण किया गया हैं। कहीं बेलबूटे, कहीं कलश और कहीं केले के  साथ अन्य वृक्षों और फूलों को उकेरा गया हैं। हर स्तंभ पर अलग अलग चित्र और चित्रकारी की ज्ञाई हैं जो देखते ही बनती हैं।

अब बारी थी उस चमत्कारिक विशाल पत्थर के स्तंभ को देखने की जिसके बारे मे सुना था कि यह  भारी-भरकम हवा मे लटका हैं। इस रंगमंडपम के बायीं ओर एक वर्गाकार स्तंभ के चारों ओर लोगों की भीड़-भाड़ दिखाई दी। यहीं वो अलौकिक स्तंभ था जिसके नीचे से लोग कपड़ा और कागज को आर पार निकालने का प्रयास करते दिखलाई दिये।  स्तंभ के आधार और तल के बीच मे बहुत बारीक खाली जगह हैं जिसमे से होकर पतला कपड़ा, कागज या धागा आर पार निकल जाता हैं।  लगभग बीस फुट ऊंचे और डेढ़-दो  फुट वर्गाकार,  पाषाण के टनों भारी  स्तंभ के नीचे से मैंने लोगो द्वारा चुन्नी, दुपट्टा को आर पार होते देखा जो किसी चमत्कार से कम न था। इतने भारी भरकम स्तंभ को हवा मे लटके देखना, तत्कालीन शासकों और राजमिस्त्ररियों की वास्तु और स्थापत्य कला का अद्भुद नमूना था जो किसी आश्चर्य, कौतुक  और अचम्भे से कम न था। इस अलौकिक घटना के गवाह बनना हैरत करने वाला था। कुछ सीढ़ियाँ पुनः चढ़ कर अब हम मंदिर के गर्भ गृह मे थे जहां भगवान वीर भाद्र की अलौकिक प्रतिमा के दर्शन कर मन भाव विभोर हो गया। मंदिर की परिक्रमा कर हमने वहाँ भी हर स्तम्भ और दीवारों पर विजय नगर वास्तु शिल्प स्पष्ट दृष्टिगोचर हो रही थी। मंदिर के परिक्रमा पथ के कोने मे भगवान पद्मावती देवी की प्रतिमा के स्पष्ट दर्शन हेतु एक बड़ा सा शीशा (मिरर) लगाया गया था ताकि कोने की आड़ के कारण प्रतिमा के दर्शन सहज सुलभ हो सके। मंदिर की अंदर की छत्त पर प्राचीन पेंटिंग आज भी स्पष्ट देखि जा सकती हैं। जहां पर पौराणिक कथाओं का चित्रण विभिन रंगों की सहायता से कलात्मक ढंग से किया गया था।  मंदिर के बाहर आने पर एक विशाल ढालू दार  चट्टान स्पष्ट दिखाई दे रही थी।  इस कछुए की तरह की चट्टान को तराश कर ही मंदिर का निर्माण किया गया था। मुख्य मंदिर के चारों ओर दालान का निर्माण किया गया था वहाँ पर भी सुंदर स्थापत्य के दर्शन हुए। मंदिर के पीछे एक बड़ी चट्टान को तराश कर शिवलिंग के ऊपर नागराज को फन फैलाये शिव लिंग की रक्षार्थ देखा जा सकता था जिसके पीछे भगवान गणेश की प्रतिमा को उत्कीर्ण किया गया था। इस चट्टान के आगे, उपर के  चबूतरे पर एक खुले रंगमंच निर्माण किया गया था। रंगमंच पर एक लाइन से पाषाण स्तंभों को लगाया गया था जिन पर विजय नगर वास्तु शैली की नक्काशी, राजा कृष्ण देव राय के वैभव और समृद्धशाली राज्य की कहानी कह रहे थे। पूरा मंदिर परिसर एक विशाल चट्टान पर बनाया गया हैं। दूसरी तरफ का प्रांगढ़ काफी बड़ा और उसके चारों तरफ बने बरामदे मे अति कलात्मक स्तंभों के ऊपर पत्थर  की चट्टानों कवर किया गया हैं जहां पर श्रद्धालु विश्राम कर धूप और वर्षात से अपना वचाव कर सकते हैं। मंदिर के खुले आँगन मे एक ऊंचे चबूतरे पर लगे चार काफी ऊंचे और लंबे स्तंभो के नीचे पवनसुत हनुमान की प्रतिमा एक चट्टान पर उकेरी गयी थी। लेपक्षी मंदिर के पवित्र आध्यात्मिक वातावरण मे भगवान वीरभद्र के अलौकिक दर्शन मन को सुकून और शांति प्रदान करने वाले थे। इस तरह विश्व के इस अनोखे मंदिर मे भगवान वीरभद्र के दर्शन और मंदिर की वास्तु शैली और हवा मे लटके विशाल स्तम्भ को देखना अपने आप मे एक सुखद अनुभव था।

मंदिर के परिकोटा के बाहर चारों तरफ पुरातत्व विभाग दर्शनार्थियों के लिये ठंडे पानी, बैठने और सार्वजनिक प्रसाधन की समुचित व्यवस्था के साथ मंदिर परिसर का रख रखाव भी अच्छी तरह से किया गया था।

लेपाक्षी ग्राम मे ही एक पहाड़ी की चट्टान पर जटायु की प्रतिकृति बनाई गयी है जो पंख फैलाये चट्टान पर खड़ी हैं और गाँव के हर क्षेत्र से नज़र आती है। यह मूर्ति राम कथा के जटायु प्रसंग को चरितार्थ करती नज़र आती है जिसके दर्शनार्थ भी लोग पहाड़ी पर चढ़ते हैं। पहाड़ी के सामने ही शिव के नंदी की विशाल प्रतिमा भी एक पार्क मे स्थापित की गयी है जो एक चट्टान को तराश कर  बनाई गयी हैं।       

मंदिर तक पहुँचने के लिए बनी सीढ़ियों के दोनों तरफ और मंदिर परिसर के चारों तरफ स्थानीय लोगो और एक अन्य धर्म के  धर्मावलंबियों द्वारा मंदिर के ठीक सामने  अपने धार्मिक स्थल के निर्माण के  कारण अति प्राचीन विश्व प्रसिद्ध लेपाक्षी मंदिर की भव्यता और दिव्यता मे कुछ पराभव  दिखलाई पड़ता  हैं। मंदिर परिसर के चारों ओर यदि वाराणसी, उज्जैन और पुरी की तर्ज़ पर, मंदिर के कॉरीडोर का निर्माण कराया जय तो मंदिर की भव्यता मे चार चाँद लग जाएंगे साथ ही मंदिर से परे वाहनों की  पार्किंग शुल्क तो वसूला जाता हैं पर पार्किंग की समुचित व्यवस्था नहीं है। यदि कार और वाहन पार्किंग की व्यवस्था अन्यत्र की जाय तो उत्तम रहेगा। और  श्रद्धालुओं को पहुँचने के मार्ग मे बाधा भी  उत्पन्न नहीं होगी।    

विजय सहगल