"कोटि
लिंगेश्वर" मंदिर-मंदिर प्रबंधन!!
कोटि लिंगेश्वर मंदिर कर्नाटक के कोलार जिले
के कम्मासन्द्रा ग्राम मे स्थित हैं जो कि बेंगलुरु से लगभग 80 किमी॰ राष्ट्रीय
राजमार्ग 75 पर स्थित हैं। यह शिव मंदिर इस क्षेत्र का एक प्रसिद्ध क्षेत्र है
जहां पर कोटि अर्थात एक करोड़ शिव लिंग की स्थापना बहुत बड़े क्षेत्र मे की गयी है।
इस मंदिर मे 108 फुट ऊंचे शिवलिंग और उसके सामने 11 मीटर ऊंचे शिवलिंग की स्थापना
भी, 15 एकड़
मे फैले, विभिन्न आकार और प्रकार
वाले एक करोड़ शिवलिंग के साथ की गयी है।
मंदिर की स्थापना 1980 के आसपास स्वामी संभा शिव मूर्ति और उनकी अर्धांग्नि वी
रुक्मणि द्वारा करायी गयी थी,
जिनका उद्देश्य इस स्थान पर एक करोड़ शिवलिंग की स्थापना करना था,
एक अनुमान के मुताबिक अब तक 90 लाख शिवलिंग स्थापित हो चुके हैं। एक करोड़ शिवलिंग की स्थापना के लक्ष्य की
प्राप्ति हेतु इस पूरे मंदिर परिसर मे हर जगह हर कदम पर शिव लिंग की प्रतिमाएँ हैं,
साथ ही भगवान ब्रह्मा,
विष्णु, श्री राम,
कृष्ण, पाँच मुखी गणेश,
भगवान आंजनेय, देवी कन्निका परमेश्वरी
के साथ अन्य देवी देवताओं के 11 मंदिर भी
हैं। पूरे मंदिर परिसर मे मंदिर प्रबंधन द्वारा मंदिर परिसर के चारों ओर भी दो-तीन
सीढ़ी नुमा पट्टियों पर शिव लिंग की स्थापना एक लाइन से की गई है। एक सिरे से दूसरे सिरे तक लगभग चार इंच चौड़ी और
लगभग सवा या डेढ़ फुट ऊंची दीवार की पट्टी बनाई गयी है जिस पर छोटे शिव लिंग की
स्थापना लाइन से की गयी हैं। अब तक मैंने अनेकों पुरातन और एतिहासिक महत्व के
सैकड़ो शिव मंदिर देखे हैं प्रायः हर मंदिर मे शिवलिंग की झलारी (जलधारी) जहां से
शिव जलाभिषेक का जल नीचे गिरता है उत्तर दिशा की ओर ही होती हैं लेकिन इस कोटि
लिंगेश्वर मंदिर मे मंदिर प्रबंधन ने,
स्थान की उपलब्धता और सुहुलियत के अनुसार हजारों शिवलिंग की जलधारी की उत्तर
दक्षिण की दिशा के विपरीत किसी भी दिशा मे रक्ख दिया है। सैकड़ों की संख्या मे हर
रोज़ श्रद्धालु इस मंदिर के दर्शन हेतु आते हैं। मंदिर मे प्रवेश हेतु रुपए 20/-
का निर्धारित शुल्क देय हैं।
मंदिर मे प्रवेश के पश्चात मंदिर प्रबंधन
द्वारा निर्धारित, निश्चित पथ से अलग बीच-आधे
रास्ते मे मंदिर परिसर से निकलने का कोई
अन्य वैकल्पिक रास्ता उपलब्ध नहीं कराया
हैं अर्थात एक बार प्रवेश के पश्चात आपको मंदिर
प्रबंधन द्वारा तय रास्ते, विभिन्न मंदिरों
से होकर, आरती,
अभिषेक आदि धार्मिक क्रिया कर्म संपादित होने के पश्चात ही अंत मे मंदिर परिसर से
निकलने की अनुमति है, इस हेतु जगह जगह
मदिर मे कार्यरत स्टाफ आपको निर्देशित कर तय मार्ग पर भेजते हैं और आवश्यकता पड़ने
पर निषेध और वर्जित स्थानों पर रस्सी से रास्ता रोक कर तय पथ की ओर अग्रेषित किया
जाता हैं। कभी कभी मंदिर प्रबंधन के इस पथ अनुगमन का नियम खीझ,
वितृष्णा और विरक्ति पैदा करता हैं।
मंदिर मे हर जगह शिव लिंग की स्थापना देखकर मन मे जिज्ञासा हुई कि मंदिर
प्रबंधन से शिवलिंग की स्थापना के नियम आदि की जानकारी ली जाय इस हेतु मंदिर के
कर्मचारियों से कार्यालय की जानकारी ले उनके कार्यालय मे पहुंचा। कार्यालय मे
पदस्थ कर्मचारियों से शिवलिंग की स्थापना के मन्तव्य के बारे मे पूछने पर उन्होने कार्यालय
मे रक्खे 3-4 प्रकार के शिवलिंग को दिखलाते हुए हमसे पूंछा कि आप किस प्रकार के
शिव लिंग की स्थापना कराना चाहते हैं?
मैंने प्रतिप्रश्न करते हुए वहाँ रखे तीनों शिव लिंग के बारे मे जानने की जिज्ञासा
प्रकट की? छोटे शिव लिंग की
स्थापना हेतु रूपये 8500/- मध्यम शिवलिंघ हेतु 31000/- और बड़े शिव लिंग हेतु
64000/- रुपए मंदिर प्रबंधन को दान के पश्चात अपनी इच्छानुरूप शिवलिंग की स्थापना
का संकल्प दोहराया। बड़े शिवलिंग की स्थापना हेतु दो-ढाई फुट के वर्गाकार चबूतरे पर
कराई गयी थी, कुछ बड़ी प्रतिमाओं पर
दान दाताओं के नाम का पत्थर भी लगाया गया था जो सिर्फ बड़ी मूर्तियों के लिए ही
उपलब्ध था। जब हमने शिवलिंग की स्थापना हेतु लगने वाले वक्त और समय पर सवाल किया,
तो मंदिर प्रबंधन ने कहा कि अभी जैसे ही आप दक्षिणा कार्यालय मे जमा करते हैं तो
तुरंत ही शिव लिंग की स्थापना करा दी जायेगी। स्थान की उपलब्धता पर हमे निश्चिंत
करते हुए भरोसा दिलाया गया कि मंदिर प्रबंधन पर समुचित स्थान उपलब्ध हैं। वार्तमान
मे मंदिर मे स्थापित शिवलिंग की गणना का कोई आंकड़ा उपलब्ध नहीं था। पूरे मंदिर
परिसर मे सिर्फ पैदल पथ पर चलने के अलावा मंदिर प्रबंधन ने कहीं बैठने की कोई
व्यवस्था नहीं दिखायी दी। लोग लगातार चलने के बाद रास्ते मे,
जमीन पर जहां तहां बैठे नज़र आए।
मै लोगों,
श्रद्धालुओं और भक्तजनों की सम्मान,
आस्था और विश्वास को ठेस पहुंचाए बिना माफी मांगते हुए लिखने की धृष्टता कर रहा
हूँ कि महज एक करोड़ शिव लिंग की स्थापना के लक्ष्य हांसिल करने हेतु मंदिर प्रबंधन ने लाखों
शिवलिंग की सनातन धर्म के न्यूनतम दैनिक मूल्यों,
गारिमा यथा बिना जलाभिषेक,
पूजा अर्चना, पत्र,
पुष्प, फल,
आरती, प्रार्थनाओं,
मंत्रोच्चारण और स्तुति और स्रोत्र आदि
क्रिया कलापों की अनदेखी नहीं हैं?
बिना प्राण प्रतिष्ठा के शिवलिंग की स्थापना जहां तहां करा देना कहाँ तक उचित हैं समझना
कठिन हैं। क्या ये सनातन भक्तों,
श्रद्धालुओं दर्शनार्थियों की भावनाओं का दोहन और शोषण नहीं है?
क्या हमें, हमारी भक्ति, आस्था और विश्वास पर मंदिर प्रबंधन के उद्देश्यों और लक्ष्यों पर विचार मंथन नहीं करना चाहिये? मंदिर प्रबंधन पर ये बड़े महत्वपूर्ण प्रश्न हैं।
विजय सहगल
















