21 सितम्बर
2023 भारतीय इतिहास की एक सुनहरी घटना के रूप मे याद किया जाएगा क्योंकि इस दिन महिला
आरक्षण विधेयक अर्थात "नारी शक्ति वंदन विधेयक" सर्वसम्मति से पारित कर
दिया गया। लोकसभा मे यह बिल पहले ही
बुधवार 20 सितम्बर 2023 को पारित हो चुका था। माननीय राष्ट्रपति के
स्वीकृति और हस्ताक्षर के पश्चात अब यह बिल कानून का रूप धरण कर लेगा।
महिला आरक्षण विधेयक पर चर्चा के दौरान
दोनों सदनों मे राजनैतिक दलों, उनकी नीतियों और
उनके नेतृत्व के "दोहरे - चाल,
चरित्र और चेहरे" देखने को मिले। जिस काँग्रेस ने महिला आरक्षण का विधेयक
अपनी टाला-मटोली नीति और नियत मे खोट के कारण पिछले 27 साल से त्रिशंकु की तरह हवा
मे अटका, लटका और भटका कर छोड़ा
था आज नरेंद्र मोदी की सरकार पर इस महिला आरक्षण विधेयक को भी "झूठे जुमले"
का आरोप लगा रही हैं। संसद मे महिला आरक्षण पर देश के सबसे पुराने दल काँग्रेस की
सांसद एवं पूर्व एनडीए प्रमुख श्रीमती
सोनिया गांधी ने अपने 8 मिनिट के भाषण मे महिला आरक्षण विधेयक के समर्थन से अपनी
बात कही। उन्होने समाज और देश मे महिलाओं के योगदान पर चर्चा करते हुए पहली
बार स्व॰ राजीव गांधी द्वारा स्थानीय
निकायों मे महिलाओं की भागीदारी वाला संविधान संशोधन बिल लाने और 1993 मे स्व॰
पीवी नरसिंम्हा राव सरकार मे पारित होने का उल्लेख किया। श्री मनमोहन सिंह के
नेतृत्व वाली सरकार ने 2008 मे
महिला आरक्षण बिल पेश किया, जो 2010 मे राज्य
सभा से पारित हुआ, लेकिन साल
2014 में ये बिल लोकसभा में कालातीत हो गया। श्रीमती सोनिया गांधी ने इस आधे-अधूरे कालातीत महिला
आरक्षण बिल की तुलना मोदी सरकार द्वारा लाये 2023 के "नारी
शक्ति वंदन विधेयक" से करते हुए बड़ी ढिठाई और हठधर्मिता से इसे राजीव गांधी की कल्पना का नतीजा बताया!! इस
बिल को वे काँग्रेस का बिल बताने मे पूरी एड़ी चोटी का ज़ोर लगाने से नहीं चूंकी। उन्होने
कहा कि,
"राजीव गांधी का सपना अभी तक आधा ही पूरा हुआ था इस बिल के पारित होने के साथ
ही उनका सपना पूरा हो गया?" कमोवेश इसी लाइन पर सारे
विपक्षी दलों का ज़ोर था।
6 मई 2008 को किस
तरह सांसद मे सपा सांसद ने तत्कालीन कानून मंत्री श्री हंस राज भारतद्वाज से पेश
किए जा रहे महिला आरक्षण विधेयक को छीन कर
फाड़ने का प्रयास किया था। समाजवादी पार्टी, राष्ट्रीय जनता दल, तृणमूल काँग्रेस, बीएसपी सहित अन्य विपक्षी दलों ने कैसे पिछले तीन दशकों से महिला आरक्षण
बिल को येन-केन-प्रकारेण लटकाने का काम करते रहे थे। जिसकी बानगी 8 मार्च 2010 को महिला दिवस के दिन देखने को
मिली। समाजवादी पार्टी के राज्य सभा सांसद
द्व्य नन्द किशोर यादव एवं कमाल अख्तर ने महिला आरक्षण विधेयक को कैसे राज्य सभा
के सभापति श्री हमीद अंसारी की टेबल से छीनने की कोशिश की और उनका माइक तोड़ने का
प्रयास किया। ये दोनों घटनायेँ भारतीय
राजनीति के इतिहास मे अत्यंत शर्मनाक घटनायेँ
थी और इन दलों की,
महिलाओं के प्रति घृणा की पराकाष्ठा को परिलक्षित करती दिखीं थी।
आज ये ही राजनीतिक
दल तमाम असहमतियों और किन्तु-परंतु के बीच यूं ही "महिला आरक्षण बिल" का
समर्थन नहीं कर रहे हैं बल्कि उनके उपर सारे देश के लोगों का दबाव हैं। उनमे यदि हिम्मत
थी तो अपनी असहमतियों को उठा कर बिल मे संशोधन लाते या विरोध करते, लेकिन वे ऐसा नहीं कर सकते थे क्योंकि इन्हे डर था कि महिला आरक्षण बिल के
विरोध करने से आने वाले लोकसभा चुनाव 2024 मे, कहीं उनका
असली चेहरा देश की आम जनता के बीच उघड़ या अनावृत हो जायेगा!!
जो काँग्रेस सरकार, स्व॰ राजीव गांधी, स्व॰
पीवी नर्सिहमा राव और श्री मन मोहन सिंह के पूर्ण बहुमत के चलते अपनी ढुलमुल रवैये से महिला आरक्षण
विधेयक को 27 साल मे पारित नहीं करा सकी, सोनिया जी उसे
तुरंत लागू कर ओबीसी कोटे को भी लागू करवाना की मांग कर रहीं हैं। वे अच्छी तरह
जानती हैं कि ये बिल कोरोना, जन गणना मे बिलंब और परिसीमन के
बिना लागू नहीं हो सकता फिर भी महिलाओं के अधिकार की चिंता मे घड़ियाली आँसू बहा कर
कहती है कि, "भारतीय महिलाएं पिछले 13 साल से इंतज़ार कर
रही हैं उन्हे अब कुछ वर्ष और इंतज़ार करने के लिए कहा जा रहा है, कितने वर्ष?, 2वर्ष?, 4वर्ष?, 6वर्ष?, या 8वर्ष? क्या ये वर्ताव स्त्रियॉं के साथ
उचित है? "भारतीय काँग्रेस की मांग हैं कि बिल फौरन अमल
मे लाया जाय" साथ ही जाति आधारित जन गणना कराई जाए"। "एससी,एसटी ओबीसी
महिलाओ के आरक्षण मे और देर करना भारत की स्त्रियॉं के साथ घोर नाइंसाफी हैं"।
यदि परिसीमन के बिना इस तुरंत ही लागू कर दिया गया और "ईश्वर न करें", कि सोनिया जी की संसदीय सीट, "रायबरेली", एससी या एसटी कोटे के तहत आरक्षित हो गयी? या राहुल
गांधी की वायनाड,
लोकसभा सीट महिला के लिए आरक्षित हो गयी तो ये ही लोग सरकार पर आरोप लगाएंगे कि
सरकार उन्हे लोक सभा की सदस्यता से वंचित करने का कुचक्र कर रही है? बैसे श्री मनमोहन के एक दशक के एक छत्र राज्य मे श्रीमती
सोनिया गांधी को महिला आरक्षण बिल लाने और
तुरंत लागू करने से किसने रोका था? तब उन्हे महिलाओं के साथ हो रही नाइंसाफी की याद क्यों नहीं आयी? ओबीसी कोटा और जातिगत जनगणना कराने से उन्हे किसने मना किया था?? जबकि
वे स्वयं महिला थी और पर्दे के पीछे श्रीमती सोनिया गांधी की सुपर प्रधानमंत्री की भूमिका को सभी ने देखा। वे
चाहती तो महिला आरक्षण बिल तीन दशक पूर्व ही एक दिन मे पारित करा दिया होता?
देश की स्वतन्त्रता
के बाद से ही कॉंग्रेस मे दृढ़ इच्छा शक्ति का अभाव देखने को मिला!! अन्यथा क्या
कारण थे कि इस महिला आरक्षण विधेयक के साथ ही, धारा 370 और 35 ए का समापन, सैनिकों
को एक पद, एक पेंशन, तीन तलाक विधेयक, नागरिकता संशोधन विधेयक 2019, वस्तु एवं सेवा कर
(जीएसटी), नोट बंदी, पाकिस्तान के
विरुद्ध सर्जिकल स्ट्राइक,
सेना के लिए राफेल विमानों की खरीद, सेना के आधुनिक
हथियारों की खरीद, सामरिक दृष्टि से देश के सीमावर्ती
क्षेत्रों मे सड़कों एवं आधारभूत संरचना
के विकास जैसे मामलों को दशकों तक लटकाएँ रख देश के विकास मे अवरोध और बाधायेँ
खड़ी करने मे कोई कोर कसर बाकी नहीं छोड़ी और
भ्रष्टाचार को बढ़ावा दिया। अब देश की जनता उनके इस दो मुहेंपन को अच्छी तरह जान
गयी हैं। कॉंग्रेस की भूमिका हमेशा से "हाथी
के दांत खाने के और, दिखने के और" की रही
हैं।
काँग्रेस सहित सभी विपक्षी दलों के एक
शिकायत और हैं कि सरकार के महिला आरक्षण विधेयक अर्थात "नारी शक्ति वंदन
विधेयक-2023" का सारा श्रेय स्वयं लेकर ओच्छी राजनीति कर रही हैं?
तो इस मे गलत क्या हैं!! सरकारें आम जनों के हितार्थ किए गये उल्लेखनीय कामों लागू
ही इसलिये करते हैं कि आम जनमानस का भला हो,
और वही लोकमानस सरकार को अच्छे कामों का श्रेय देकर उन्हे दुबारा चुनने का मन
बनाते हैं। शायद उपर्युक्त सद्कार्यों सहित महिला आरक्षण विधेयक अर्थात "नारी
शक्ति वंदन विधेयक-2023" का श्रेय लेना कॉंग्रेस के भाग्य मे नहीं था अन्यथा
इन कार्यों को अपने कार्य काल मे लागू करा दिये होते?
लेकिन लगता हैं कि कॉंग्रेस ने इन सभी सद्कार्यों का श्रेय मोदी सरकार को ही देने
का मन बना लिया, तो फिर होनी को कौन टाल
सकता हैं।
विजय सहगल


















