शुक्रवार, 29 सितंबर 2023

महिला आरक्षण विधेयक-2023

 





"महिला आरक्षण विधेयक-2023"

21 सितम्बर 2023 भारतीय इतिहास की एक सुनहरी घटना के रूप मे याद किया जाएगा क्योंकि इस दिन महिला आरक्षण विधेयक अर्थात "नारी शक्ति वंदन विधेयक" सर्वसम्मति से पारित कर दिया गया। लोकसभा मे यह बिल पहले ही  बुधवार 20 सितम्बर 2023 को पारित हो चुका था। माननीय राष्ट्रपति के स्वीकृति और हस्ताक्षर के पश्चात अब यह बिल कानून का रूप धरण कर लेगा।

महिला आरक्षण विधेयक पर चर्चा के दौरान दोनों सदनों मे राजनैतिक दलों, उनकी नीतियों और उनके नेतृत्व के "दोहरे - चाल, चरित्र और चेहरे" देखने को मिले। जिस काँग्रेस ने महिला आरक्षण का विधेयक अपनी टाला-मटोली नीति और नियत मे खोट के कारण पिछले 27 साल से त्रिशंकु की तरह हवा मे अटका, लटका और भटका कर छोड़ा था आज नरेंद्र मोदी की सरकार पर इस महिला आरक्षण विधेयक को भी "झूठे जुमले" का आरोप लगा रही हैं। संसद मे महिला आरक्षण पर देश के सबसे पुराने दल काँग्रेस की सांसद एवं पूर्व  एनडीए प्रमुख श्रीमती सोनिया गांधी ने अपने 8 मिनिट के भाषण मे महिला आरक्षण विधेयक के समर्थन से अपनी बात कही। उन्होने समाज और देश मे महिलाओं के योगदान पर चर्चा करते हुए पहली बार  स्व॰ राजीव गांधी द्वारा स्थानीय निकायों मे महिलाओं की भागीदारी वाला संविधान संशोधन बिल लाने और 1993 मे स्व॰ पीवी नरसिंम्हा राव सरकार मे पारित होने का उल्लेख किया। श्री मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली सरकार ने 2008 मे महिला आरक्षण बिल पेश किया, जो  2010 मे राज्य सभा से पारित हुआ, लेकिन साल 2014 में ये बिल लोकसभा में कालातीत हो गया। श्रीमती सोनिया गांधी ने इस आधे-अधूरे कालातीत महिला आरक्षण बिल की तुलना मोदी सरकार द्वारा लाये 2023 के "नारी शक्ति वंदन विधेयक" से करते हुए बड़ी ढिठाई और हठधर्मिता  से इसे राजीव गांधी की कल्पना का नतीजा बताया!! इस बिल को वे काँग्रेस का बिल बताने मे पूरी एड़ी चोटी का ज़ोर लगाने से नहीं चूंकी। उन्होने कहा कि, "राजीव गांधी का सपना अभी तक आधा ही पूरा हुआ था इस बिल के पारित होने के साथ ही उनका सपना पूरा हो गया?" कमोवेश इसी लाइन पर सारे विपक्षी दलों का ज़ोर था।

6 मई 2008 को किस तरह सांसद मे सपा सांसद ने तत्कालीन कानून मंत्री श्री हंस राज भारतद्वाज से पेश किए जा रहे  महिला आरक्षण विधेयक को छीन कर फाड़ने का प्रयास किया था। समाजवादी पार्टी, राष्ट्रीय जनता दल, तृणमूल काँग्रेस, बीएसपी सहित अन्य विपक्षी दलों ने कैसे पिछले तीन दशकों से महिला आरक्षण बिल को येन-केन-प्रकारेण लटकाने का काम करते रहे थे। जिसकी बानगी  8 मार्च 2010 को महिला दिवस के दिन देखने को मिली।   समाजवादी पार्टी के राज्य सभा सांसद द्व्य नन्द किशोर यादव एवं कमाल अख्तर ने महिला आरक्षण विधेयक को कैसे राज्य सभा के सभापति श्री हमीद अंसारी की टेबल से छीनने की कोशिश की और उनका माइक तोड़ने का प्रयास किया। ये दोनों घटनायेँ  भारतीय राजनीति के इतिहास मे अत्यंत  शर्मनाक घटनायेँ  थी और इन दलों की, महिलाओं के प्रति घृणा की पराकाष्ठा को परिलक्षित करती दिखीं थी।

आज ये ही राजनीतिक दल तमाम असहमतियों और किन्तु-परंतु के बीच यूं ही "महिला आरक्षण बिल" का समर्थन नहीं कर रहे हैं बल्कि उनके उपर सारे देश के लोगों का दबाव हैं। उनमे यदि हिम्मत थी तो अपनी असहमतियों को उठा कर बिल मे संशोधन लाते या विरोध करते, लेकिन वे ऐसा नहीं कर सकते थे  क्योंकि इन्हे डर था कि महिला आरक्षण बिल के विरोध करने से आने वाले लोकसभा चुनाव 2024 मे, कहीं उनका असली चेहरा देश की आम जनता के बीच उघड़ या अनावृत हो जायेगा!!  

जो काँग्रेस सरकार,  स्व॰ राजीव गांधी, स्व॰ पीवी नर्सिहमा राव और श्री मन मोहन सिंह के पूर्ण बहुमत  के चलते अपनी ढुलमुल रवैये से महिला आरक्षण विधेयक को 27 साल मे पारित नहीं करा सकी, सोनिया जी उसे तुरंत लागू कर ओबीसी कोटे को भी लागू करवाना की मांग कर रहीं हैं। वे अच्छी तरह जानती हैं कि ये बिल  कोरोना, जन गणना मे बिलंब  और परिसीमन के बिना लागू नहीं हो सकता फिर भी महिलाओं के अधिकार की चिंता मे घड़ियाली आँसू बहा कर कहती है कि, "भारतीय महिलाएं पिछले 13 साल से इंतज़ार कर रही हैं उन्हे अब कुछ वर्ष और इंतज़ार करने के लिए कहा जा रहा है, कितने वर्ष?, 2वर्ष?, 4वर्ष?, 6वर्ष?, या 8वर्ष? क्या ये वर्ताव  स्त्रियॉं के साथ उचित है? "भारतीय काँग्रेस की मांग हैं कि बिल फौरन अमल मे लाया जाय" साथ ही जाति आधारित जन गणना कराई जाए"।  "एससी,एसटी ओबीसी महिलाओ के आरक्षण मे और देर करना भारत की स्त्रियॉं के साथ घोर नाइंसाफी हैं"। यदि परिसीमन के बिना इस तुरंत ही लागू कर दिया गया और "ईश्वर न करें", कि सोनिया जी की संसदीय सीट, "रायबरेली", एससी या एसटी कोटे के तहत आरक्षित हो गयी? या राहुल गांधी की  वायनाड, लोकसभा सीट महिला के लिए आरक्षित हो गयी तो ये ही लोग सरकार पर आरोप लगाएंगे कि सरकार उन्हे लोक सभा की सदस्यता से वंचित करने का कुचक्र कर रही है? बैसे   श्री मनमोहन के एक दशक के एक छत्र राज्य मे श्रीमती सोनिया गांधी को  महिला आरक्षण बिल लाने और तुरंत लागू करने  से किसने रोका था? तब उन्हे महिलाओं के साथ हो रही नाइंसाफी की याद क्यों नहीं आयी? ओबीसी कोटा और जातिगत जनगणना कराने से उन्हे  किसने मना किया था?? जबकि वे स्वयं महिला थी और पर्दे के पीछे श्रीमती सोनिया गांधी की  सुपर प्रधानमंत्री की भूमिका को सभी ने देखा। वे चाहती तो महिला आरक्षण बिल तीन दशक पूर्व ही एक दिन मे पारित करा दिया होता?  

देश की स्वतन्त्रता के बाद से ही कॉंग्रेस मे दृढ़ इच्छा शक्ति का अभाव देखने को मिला!! अन्यथा क्या कारण थे कि इस महिला आरक्षण विधेयक के साथ ही, धारा 370 और 35 ए का समापन, सैनिकों को एक पद, एक पेंशन, तीन तलाक विधेयक, नागरिकता संशोधन विधेयक 2019, वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी), नोट बंदी, पाकिस्तान के विरुद्ध सर्जिकल स्ट्राइक,  सेना के लिए राफेल विमानों की खरीद, सेना के आधुनिक हथियारों की खरीद, सामरिक दृष्टि से देश के सीमावर्ती क्षेत्रों मे  सड़कों एवं आधारभूत संरचना के  विकास जैसे मामलों को  दशकों तक लटकाएँ रख देश के विकास मे अवरोध और बाधायेँ  खड़ी करने मे कोई कोर कसर बाकी नहीं छोड़ी और भ्रष्टाचार को बढ़ावा दिया। अब देश की जनता उनके इस दो मुहेंपन को अच्छी तरह जान गयी हैं। कॉंग्रेस की भूमिका हमेशा से "हाथी के दांत खाने के और, दिखने के और" की रही हैं।

काँग्रेस सहित सभी विपक्षी दलों के एक शिकायत और हैं कि सरकार के महिला आरक्षण विधेयक अर्थात "नारी शक्ति वंदन विधेयक-2023" का सारा श्रेय स्वयं लेकर ओच्छी राजनीति कर रही हैं? तो इस मे गलत क्या हैं!! सरकारें आम जनों के हितार्थ किए गये उल्लेखनीय कामों लागू ही इसलिये करते हैं कि आम जनमानस का भला हो, और वही लोकमानस सरकार को अच्छे कामों का श्रेय देकर उन्हे दुबारा चुनने का मन बनाते हैं। शायद उपर्युक्त सद्कार्यों सहित महिला आरक्षण विधेयक अर्थात "नारी शक्ति वंदन विधेयक-2023" का श्रेय लेना कॉंग्रेस के भाग्य मे नहीं था अन्यथा इन कार्यों को अपने कार्य काल मे लागू करा दिये होते? लेकिन लगता हैं कि कॉंग्रेस ने इन सभी सद्कार्यों का श्रेय मोदी सरकार को ही देने का मन बना लिया, तो फिर होनी को कौन टाल सकता हैं।    

विजय सहगल

शुक्रवार, 22 सितंबर 2023

श्रीनू

 

"मिस्टर श्रीनू"






12 सितम्बर 2023 को अपने हैदराबाद प्रवास की कालावधि मे  हैदराबाद विश्वविध्यालय और राष्ट्रीय डेयरी विकास निगम, के बीच स्थित, ओल्ड बॉम्बे रोड के किनारे, प्रातः भ्रमण के दौरान एक  स्ट्रीट फूड विक्रेता को देखा, जो बड़े जतन से टीवीएस एक्सएल100  मोपेड  के उपर अपनी अस्थाई दुकान पर स्वल्पाहार के रूप मे दक्षिण भारतीय व्यंजनों यथा इडली, बड़ा, पुंगलू, उत्तपम, के साथ गरम गरम सांभर, और तीन तरह की चटनी को  अपने ग्राहकों को बड़े ही सम्मान और समर्पण के साथ परोस रहा था। मैंने दक्षिण भारत मे प्रायः देखा है कि टीवीएस कंपनी की इस मोपेड़ को छोटे तवके के मजदूर, किसान और व्यापारी अपनी आवश्यकता के अनुरूप मोपेड मे परिवर्तन कर अपने उपयोग  मे लाते हैं। यहाँ भी इस नवयुवक ने  मोपेड़ के पीछे लगे लोहे की जाली के अंदर स्टील के छोटे बड़े वर्तनों मे विभिन्न स्नेक्स को ढक्कन से बंद कर रक्खा हुआ था ताकि सभी वस्तुए ताजी और गरम रह सके। यही नहीं उसने अपने इस अस्थाई स्टाल  पर वो सारी उपयोग मे आने वाली वस्तुओं को बड़े ही करीने और साफ सफाई के साथ रक्खी हुई थी जो एक आदर्श खाने की गुमटी  पर होना चाहिए। उसने अपनी मोपेड़ के सहारे एक बड़ी बैगनी छतरी लगाई हुए थी जो उसके खाने की वस्तुओं को धूप और  पेड़ों के उपर से आने वाली धूल और पत्तियों से बचा रही थी। व्यंजनों से निकालने वाली सुंदर  महक ने न चहते हुए भी मेरी भूख को बढ़ा दिया। उस नौजवान ने  जहां एक ओर पीने के पानी के लिए स्वच्छ आरओ वॉटर की बॉटल को एक किनारे रक्खा था वही दूसरी ओर काले जरीकेन मे हाथ धोने का पानी और कचरा एकत्रित करने के लिए एक डस्ट्बिन भी रक्खी हुई थी। कुल मिला का हरे भरे पेड़ों की छाँव मे ग्राहकों को स्वादिष्ट स्वल्पाहार के साथ प्रकृति के निकट होने का अहसास और फील, सोने पर सुहागा का काम कर रहा था।

मैं जैसे ही अपनी जिज्ञासा और उत्सुकता वश उस नौजवान के पास बात करने के लिए पहुंचा, उसने बड़ी तत्परता से पेड़ों के पत्तों की प्लेट हाथ मे लेते हुए हमारे ऑर्डर की प्रतीक्षा की। लेकिन जब हमने उससे सिर्फ उसके बारे मे बात करने की इच्छा व्यप्त की तो वह कुछ समझ न सका। मैंने भाषा के संवाद हीनता को महसूस कर अँग्रेजी मे नाम पूंछा तो उसने अपनी अनिभिज्ञता प्रकट करते हुए तेलगु मे कुछ कहा जो मै न समझ सका। इस सब के बावजूद  उस नौजवान के चेहरे उलझन या तनाव के भाव न होकर ग्राहक सेवा मे तत्पर एक व्यवसायी की  मुस्कान के भाव स्पष्ट देखे जा सकते थे। मेरी इस समस्या को वहीं खड़े एक युवक चंदु, जो वही नाश्ता कर रहा था ने तुरंत ही मेरे बिना किसी आग्रह के स्वयं ही दुभाषिए के रूप मे संवाद हीनता की समस्या को आसान कर दिया। छोटी सी गुमटी चला रहे लगभग 40 वर्षीय नवयुवक ने अपना नाम श्रीनु बताया। अपनी परंपरागत पढ़ाई को धनाभाव मे पूरी न कर पाने का दर्द उसके चेहरे पर जरूर था पर शासन या समाज से  बेरोजगारी की शिकायत से परे, उसने  ईमानदारी से  मेहनत, लगन और परिश्रम के साथ स्वल्पाहार के व्यापार करने का निश्चय किया। नवयुवक श्रीनू की  इस मुहिम मे उसकी पत्नी ने भी अपनी  माँ से परंपरागत रूप से मिली "पाक और रसोई कला" का उपयोग एक सहभागी के रूप मे किया। पिछले 12-13 वर्ष के कठिन श्रम और समर्पण से आज उसका व्यापार अच्छा चल रहा हैं। उसने बताया कि वह सारी वस्तुओं के समाप्त होने या 11.30 बजे तक, जो भी पहले हो अपना रेस्टुरेंट बंद कर देता है। मेरे पूंछने  पर उसने बताया कि व्यंजनों को बनाने के लिए उसकी पत्नी और वे  रात मे ही आवश्यक तैयारी कर प्रातः लगभग चार बजे उठ कर व्यंजन बनाने मे लग जाते है। श्रीनु प्रातः सात बजे के पूर्व विश्व विध्यालय रोड पर स्थित अपने ठिये (स्थान) पर अपनी दुकान सजा लेता है।

श्रीनु इस जगह से लगभग 6-7 किमी॰ दूर  अपने छोटे से घर मे अपनी पत्नी के साथ रहते हैं। उनके परिवार मे एक बेटा और एक बेटी है। बेटा कम्प्युटर विज्ञान विषय मे इंजीन्यरिंग मे तीसरे वर्ष की पढ़ाई कर रहा है और बेटी इंटर्मीडिएट क्लास मे अध्यनरत् है। जब मैंने महज जानकारी और जिज्ञासा के चलते उससे पूरे दिन की कमाई के बारे मे पूंछा तो उसने हाथ जोड़ कर आसमान की ओर देखते हुए ईश्वर के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करते हुए बड़े शर्मीले अंदाज़ मे संकोच के साथ बताया कि उसे  दिन भर मे  लगभग 1000/- - 1500/- के बीच मे आय हो जाती है जिसमे उसकी आवश्यकताओं की पूर्ति हो जाती है और कुछ थोड़ी बहुत बचत भी कर लेता  है।

श्रीनु के दक्षिण भारतीय व्यंजनों की मुक्तकंठ से प्रशंसा करते हुए जहां एक ओर श्रीनु से बिदा ली वहीं भाषा की संवाद हीनता का समाधान करने, हमारे दुभाषिए और अनुवादक श्री चंदु गिल्लेल्ला जो इंफ़ोसिस कंपनी हैदराबाद मे कार्यरत हैं को भी हार्दिक धन्यवाद कर उनके उज्ज्वल भविष्य की कामना की।

यहाँ इस बात का उल्लेख करना आवश्यक है कि जहां आज कल रोजगार के लिए सरकार और शासन को कोसने और बुरा भल्ला कहने का चलन चल पड़ा है वही श्रीनु जैसे नवयुवक बगैर उलाहने और शिकवे शिकायत के श्रीमद्भगवत गीता के कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन........ के भाव से स्वयं ही अपना रास्ता गढ़ते हुए देश के आर्थिक विकास मे अपना योगदान दे रहे है जो सरहनीय और प्रशंसनीय है।       

विजय सहगल
 
            

मंगलवार, 19 सितंबर 2023

"गणेश उत्सव, हैदराबाद"

"गणेश उत्सव, हैदराबाद"











यूं तो देवादिदेव  भगवान श्री गणेश के मंदिर देश-विदेश  मे समान रूप से मिल जाएंगे, जहां पर बड़ी संख्या मे श्रद्धालु नित्य प्रति दर्शन कर दिन की शुरुआत करते है, पर  महाराष्ट्र को गणेश उत्सव की प्रथा का जनक माना जाता है। यहाँ पर सात वाहन, चालुक्या, राष्ट्रकूट जैसे राजाओं ने गणेशोत्सव की प्रथा चलाई। पेशवाओं के शासन काल मे  गणेश उत्सव फला फूला। जिस तरह सनातन धर्म संस्कृति मे किसी भी सद कार्य के संकल्प और सम्पादन के पूर्व भूर्लोके, जंबूदीपे, भारतवर्षे.......... से शुरू होकर "ग्राम देवताभ्यो नमः", "स्थान देवताभ्यो नमः", और "वास्तु देवताभ्यो नमः" के आवाहन कर आगे बढ़ती है, कदाचित ही किसी धर्म, संप्रदाय या पंथ मे देखने को मिले? उसी तरह छत्रपति शिवाजी महाराज की माँ, "राजमाता जीजाबाई" को पुणे मे हर गाँव और कस्बे मे "कस्बा गणपति"  की स्थापना का श्रेय जाता है। उसी परंपरा पर चलते हुए स्व॰ बाल गंगाधर तिलक द्वारा स्वतन्त्रता के संघर्ष मे सार्वजनिक गनेश उत्सव को जोड़कर अपने स्वराज के आंदोलन को आम जनमानस से जोड़ा।   

मैंने लखनऊ, झाँसी, ग्वालियर, भोपाल रायपुर, सागर, दिल्ली, नोएडा और  पूना  सहित देश के अनेक स्थानों पर गणेश उसत्सव के आयोजन देखें है। लेकिन पूना के बाद हैदराबाद मे आज  गणेश चतुर्थी के आयोजन का  उत्साह, उमंग और उल्लास एक अलग रूप मे देखा और महसूस किया। एक ओर पूना मे गणेश उत्सव समितियों के सामूहिक उत्सव और अनुष्ठान देंखे। विभिन्न सांस्कृति, भेषभूषा के दर्शन, नाना प्रकार के वाद्य यंत्रों के सामूहिक प्रदर्शन, गायन-वादन के सुमधुर और सुंदर आयोजन देखे इन सभी कलाओं  की सुंदरता मे  सड़कों के चौराहों पर कलात्मक और जीवंत रंगोली ने ऊंचे और नए आयाम जोड़े जिसके दर्शन शायद ही कहीं देखने को मिले!! वहीं व्यक्तिगत और पूजा मंडलों के समूहिक गणेश स्थापना के दर्शन हैदराबाद मे हुए।

आज दिनांक 18 सितम्बर की सुबह 7 बजे  हैदराबाद के  अंबेडकर सर्कल से साइकल पार्क के पहले तक, बोटिनीकल गार्डन रोड के दोनों ओर की चहल पहल और गणेश उत्सव की तैयारियों की जैसी  बानगी देखी उसके आधार पर तो हैदराबाद मे गणेश चतुर्थी के उत्साह उमंग की कल्पना सहज ही लगाई जा सकती है। सामूहिकता और व्यक्तिगत स्तर पर लोगों का जो उत्साह यहाँ के बच्चों, नव युवकों और प्रौढ़ो मे देखा वो अद्व्तीय था।  हैदराबाद मे गणेश उत्सव की शुरुआत मे पर्यावरण के प्रति यहाँ के लोगो  की जागरूकता को मैंने देखा और महसूस किया उसको गणेश प्रतिमाओं जो चाहे छोटी हों या बड़ी, गणेश प्रतिमाओं की गढ़ाई कच्ची मिट्टी से की गयी थी। कुछ अतिरिक्त शुल्क देकर आप वहाँ उपस्थित चितेरों से अपने इच्छा अनुरूप रंगों का चयन कर आकार दे सकते हैं या यूं ही उनकी स्थापना घरों या मंडपों मे कर सकते है।

यहाँ के लोगो ने गणेश पूजा मे प्रयुक्त होने सैकड़ों तरह की सामग्री यथा पत्र, पुष्प, फल आदि को देख अधिकार पूर्वक कह सकता हूँ कि हमारे पवित्र वेदों आदि मे उल्लेखित प्राकृतिक साधनों को अपनी पूजा पद्धति के  विधि विधान से जोड़ा है वह प्रशंसनीय है। पीपल, बरगद, अमलतास, इमली, दूर्वा, अकौआ, सेज्वंती आदि विभिन्न प्रकार की पत्तीयां, गेंदा, गुलाब, जुही, हरश्रंगार के प्रचलित पुष्पों के अतरिक्त अन्य पुष्प जिन्हे मै नहीं पहचान सका  तथा फलों मे सीताफल, अमरूद, कैथा, मकई (भुट्टा), बेर, इमली, वेल्पत्र, पेठा और न जाने अंगिनित नाना प्रकार के फलों को लोग  उसी भावना से अपने ईष्ट भगवान श्री गणेश को अर्पित करते है जैसे श्रीमद्भगवत गीता के अध्याय 9 के श्लोक संख्या 26 मे भगवान श्री कृष्ण कहते हैं कि :-

पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति।
तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मनः।।9.26।।    अर्थात

जो कोई भक्त, मेरे लिये प्रेम से पत्र, पुष्प, फल, जल आदि अर्पण करता है, उस शुद्ध बुद्धि निष्काम प्रेमी भक्त का प्रेमपूर्वक अर्पण किया वह पत्र-पुष्पादि मैं सगुण रूप से प्रकट होकर प्रीति सहित खाता हूँ।

अनेक जगहों पर चार आड़ी और चार खड़ी लकड़ी की पट्टियों से एक नौ खानों की एक वर्गाकार आकृति का निर्माण किया गया था जिसे वे तेलगु मे शायद "पल्लवी" पुकार रहे थे। जब मैंने इसके उपयोग के बारे मे पूंछा तो उन्होने बताया कि इस आकृति को गणेश भगवान के उपर छत्र के रूप मे लटकाकर इसके नौ वर्गाकार खानों मे लाएँ गए विभिन्न फलों को धागे की सहायता से लटकाते है। यह घर मे धन्य-धान का शुभ प्रतीक है अर्थात विघ्नहरता गणेश घर मे धन-संपत्ति, वैभव और खद्ध्यान्नों से  भरपूर रक्ख अपनी शुभ दृष्टि बनाए रक्खे।   

मै समझ गया था कि गणेश उत्सव के आने वाले 10 दिन हैदराबाद नगर मे  गणेश चतुर्थी के उत्साह के रंग मे रंगे होने वाले है और जिसका उल्लेख मैं आने वाले दिनों मे करूंगा।

इसी बीच भगवान श्री गणेश आप सब पर स्वास्थ,  सुख, समृद्धि और शांति का आशीर्वाद बनाएँ रक्खे।

श्री गणेश चतुर्थी की हार्दिक शुभकामनायें एवं बधाई।  

विजय सहगल     


शनिवार, 16 सितंबर 2023

श्री शैलम ज्योतिर्लिंग तीर्थ

 

"श्री शैलम, श्री मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग"






2 सितम्बर 2023 का दिन मेरे लिये आंध्र प्रदेश के जिला कर्नूल मे स्थित  सनातन सांस्कृति के पवित्र और महत्वपूर्ण 12 ज्योतिर्लिंग मे से एक, कृष्णा नदी के तट पर स्थापित श्री शैलम या श्री मल्लिकार्जुन  शिव मंदिर के दर्शन जहां एक ओर प्रसन्नता और आनंद देने वाला था वही दूसरी ओर भावनाओं के उद्वेग मे अपनी स्वर्गीय  माँ के  स्मरण के भी क्षण थे जिनको याद कर मन दुःख और आत्मग्लानि से भरा था। पिछले वर्ष जब मुझे बेटे की आईएसबी, मुहाली मे कैम्पस सलैक्शन के दौरान पहली पदस्थपना, हैदराबाद की सूचना मिली तो मै बेहद खुश था क्योंकि मेरी दो ख्वाइश पूरी होने जा रही थीं। पहली दिली तमन्ना तो 85-86 वर्षीय मेरी माँ की  थी कि उन्हे हैदराबाद के पास स्थित श्री शैलम ज्योतिर्लिंग के दर्शन कराऊँ। दूसरी, उनकी इस कामना मे मेरा भी एक हित निहित था कि मै अपनी माँ को इस तीर्थ यात्रा के बहाने दिल्ली या ग्वालियर से हैदराबाद की हवाई यात्रा कराऊँ क्योंकि उन्होने कभी हवाई यात्रा नहीं की थी, यध्यपि उन्होने कभी हवाई यात्रा का इच्छा या उत्सुकता प्रकट नहीं की थी। परिस्थितियाँ पूर्णतः अनुकूल थी पर हा!! दुर्भाग्य कि माँ की  श्री शैलम तीर्थ की यात्रा की अभिलाषा  और उनको हवाई यात्रा कराने की मेरी  इच्छा को मै पूरा करा पाता कि 18 जून 2023 के उस मनहूस दिन, काल के क्रूर हाथों ने माँ को  मुझ से  छीन लिया, उनका देहावसान हो गया!! मुझे इस बात का दुःख! और अफसोस! पूरे जीवन भर रहेगा कि मै अपनी  माँ को, भगवान श्री शैलम तीर्थ के दर्शन और हवाई यात्रा  कराने की  इच्छा को पूर्ण न करा सका। काश मैंने मैंने संत कबीर की उन पंक्तियों के सार को गंभीरता से लिया होता:-

काल करे से आज करें, आज करे सो अब।

पल मे  प्रलय होएगी,  बहुरि करेगा कब॥  

 

2 सितम्बर 2023 को जब मैंने परिवार सहित प्रातः छह बजे हैदराबाद से श्री शैलम ज्योतिर्लिंग के दर्शन के लिये टैक्सी से प्रस्थान किया तो रह रह कर मुझे "अम्माँ" की याद आती रही कि काश कुछ माह पूर्व श्री शैलम तीर्थ की यात्रा का कार्यक्रम बनाया होता तो माँ आज हम लोगो के साथ तीर्थ दर्शन का लाभ ले रहीं होती। पर होनी को टाला न जा सका!! हैदराबाद से लगभग सवा दो सौ किमी॰ की दूरी और लगभग छह घंटे की यात्रा के बाद हम लोग 12.30 बजे श्री शैलम पहुँच गये। हैदराबाद के  शानदार आठ लेन के बाहरी रिंग रोड की  40 किमी॰ की  यात्रा के राष्ट्रीय राज मार्ग के पश्चात राज्य का दो लेन के राजमार्ग के दोनों ओर दूर दूर तक  सघन हरे पेड़ों से आच्छादित   वनों  के बीच  श्री शैलम टाइगर अभ्यारण से होकर यात्रा करना सुखद था। जगह जगह बाघ, लकड़बग्घा, तेंदुआ, हिरण, चीतल, चिंकारा के बड़े बड़े सूचना पट तो लगे मिले लेकिन इनमे से किसी एक के रु-ब-रु दर्शन तो दूर उनकी परछाईं भी न दिखाई दी, हाँ बंदरों की उपस्थिती लगातार सड़क के दोनों ओर अवश्य नज़र आती रही। लगभग 70 किमी॰ पक्की डम्मर रोड पर  जंगल के बीच यात्रा प्रकृति और मानव के बीच सामंजस का अनुपम उदाहरण थी। तेलंगाना और आंध्रा की सीमा को जोड़ता कृष्णा नदी पर बनाया   गया  पाताल गंगा  पन बिजली बांध का बिहंगम दृश्य मन को मोहने वाला था। यहाँ से अब श्री शैलम महादेव मंदिर लगभग 25 किमी॰ शेष रह जाता है।

श्री शैलम तीर्थ एक छोटे से पर व्यवस्थित तरीके से बसे कस्बे की तरह था। साफ सुथरा, चौड़ी पक्की सड़के और जगह जगह सुंदर पूजा और उपहारों से सजी दुकाने, खाने-पीने और चाय-कॉफी के दुकाने लगभग 24 घंटे खुली रहती है। अब सबसे पहले मंदिर के दर्शन और ठहरने की व्यवस्था के बारे मे सूचना एकत्रित करना था क्योंकि 7-8 घंटे की मानसिक और शारीरिक यात्रा के पश्चात कुछ आराम करने की भी इच्छा मन मे बलवती हो रही थी। मंदिर परिसर के मुख्य गेट पर ही दर्शन से संबन्धित सूचना मिल गयी। भाषा की थोड़ी समस्या के बावजूद मंदिर स्टाफ और सुरक्षा कर्मियों का रुख सहयोगात्मक था। मंदिर मे होने वाले नित्य पूजा आरती, रुद्रभिषेक, काल सर्प योग पूजा आदि के शुल्क निर्धारित थे।  निशुल्क दर्शन, शीघ्र दर्शन, अतिशीघ्र दर्शन के अतिरिक्त स्पर्शदर्शनम की भी व्यवस्था थी जिसके के लिए निर्धारित शुल्क 150/-, 300/-, एवं 500/- रुपए देकर लाइन मे शामिल हुआ जा सकता था। इस हेतु प्रवेश द्वार के पास ही टिकिट काउंटर बने हुए थे। लेकिन स्पर्शदर्शनम के लिए ऑन लाइन बुकिंग कराना आवश्यक था। आप अपने से स्वयं या प्रवेश द्वार के बाज़ारों मे कुछ अतिरिक्त शुल्क देकर पहचान पत्र के साथ इस सुविधा का लाभ ले सकते हैं। हम लोगो को 500 रुपए प्रति दर्शनार्थी के हिसाब से रात्रि 8 बजे के टिकिट प्राप्त हुए। अब थोड़ा ठहरने की व्यवस्था  की चर्चा कर लें। चूंकि हम लोगो ने पूर्व मे ही  होटल/गेस्ट हाउस आदि बुक नहीं किए थे इस लिए थोड़ी असुविधा का सामना करना पड़ा। श्री शैलम मंदिर ट्रस्ट की वेवसाइट से आप यात्रा के पूर्व या वहाँ पहुँच कर उनके केंद्रीय नियंत्रण कार्यालय से गेस्ट हाउस/रूम बूक करा सकते है। एसी (12-14 सौ दो बेड रूम) और नॉन एसी रूम (800/- दो बेड रूम) की व्यवस्था उचित दर पर उपलब्ध थी। लेकिन गर्मी और उमस के कारण मंदिर ट्रस्ट मे एसी रूम उपलब्ध नहीं थे। पर निजी होटल, धर्मशाला मे भी बाजिब दाम पर दोनों तरह के रूम उपलब्ध थे। एक धर्मशाल मे एसी रूम की व्यवस्था 2500/- मे हो गयी।   कुछ घंटे  विश्राम और भोजन के बाद शाम को सात बजे  हम सभी मंदिर द्वारा निर्धारित वस्त्र यथा महिलाओं के लिए सलवार, कुर्ता या धोती और पुरुषों के लिए भारतीय परवेश लुंगी, धोती, कुर्ता या पयजामा, शर्ट  धारण कर श्री शैलम ज्योतिर्लिंग के दर्शन हेतु निर्धारित स्थान पर पहुँच गए।  

 2 एकड़ मे फैले मंदिर प्रांगड़ को ऊंची ऊंची दीवारों के माध्यम से घेरा गया है और चारों दिशाओं मे दक्षिण भारतीय  वास्तु शैली मे विशाल प्रवेश द्वार बनाए गए है जिसके केंद्र मे भगवान श्री शैलम का स्वर्ण पत्रों से जड़ित  शिखर को बनाया गया है। मुख्य मंदिर के प्रवेश द्वार पर   टिकिट आदि की  जांच और सुरक्षा जांच के पश्चात एक प्रतीक्षालय मे लगभग आधा घंटे के इंतजार के बाद दर्शनार्थियों के समूह को कतारवद्ध रूप से मंदिर मे दर्शनार्थ हेतु ले जाया गया। लंबी स्टील रेलिंग मे दायें बाए घूमते हुए जब मंदिर के प्रवेश द्वार पर पहुंचे जिसके दरवाजों पर चाँदी का खूबसूरत नक्काशी दार पत्र चढ़ाया गया था। जिसमे जगह जगह शिव लिंग को करीने से उकेरा गया था। दरवाजे से प्रवेश करते ही बारह पत्थर के नक्काशी दार स्तंभों के बीच शिव  वाहन नंदी  की विशाल बैठी हुई प्रतिमा स्थापित थी जिनका मुंह शिव ज्योतिर्लिंग की तरफ था। दर्शनार्थी नंदी के दोनों ओर दो लाइन मे विभक्त हो मंदिर की तरफ बढ़ रहे थे। इस मंडप के बाद पुनः एक इतने ही बड़े मंडप मे एक भजन मंडली ढोलक, तबले, हारमोनियम मजीरे और झांझर की ताल पर बड़े ही सुंदर लय और ताल मे शिव भजन गा रहे थे। इसी बीच भक्तों की दोनों लाइन धीमी गति से ज्योतिर्लिंग के दर्शनार्थ आगे बढ़ रही थी। मंडली मे शामिल एक समान भगवा वस्त्र धारी गायकों ने अपने भजनों से  शिवलिंग के दर्शन की आतुरता, आवेग और उद्वेग को कुछ कम कर दिया था।

कुछ ही मिनटों मे अब हम मंदिर के मुख्य मंडप के प्रवेश द्वार पर थे जिनके उपर चाँदी की परतों को चढ़ाया कर सुसज्जित किया गया था। जिसके शीर्ष पर भगवान गणेश की प्रतिमा स्थापित की गयी थे। इस मंडप मे प्रवेश करते ही सामने साक्षात श्री शैलम ज्योतिर्लिंग विराजमान थे। चूंकि मंदिर के कक्ष छोटा था और एक बार मे 5-6 दर्सनार्थी से ज्यादा प्रवेश नहीं कर सकते थे। यहाँ इस बात का उल्लेख करना आवश्यक है कि  "स्पर्श दर्शनम" व्यवस्था जैसा कि नाम से स्पष्ट है कि प्रत्येक श्रद्धालु को एक बार भगवान श्री शैलम के दर्शन के साथ-साथ  माथा टेक कर स्पर्श करने और नमन करने की अनुमति थी। इस बजह से दर्शन मे थोड़ा समय लग रहा था। इस वास्तविकता से अवगत होने पर उपस्थित भक्त  समुदाय मे  भगवान महादेव श्री शैलम के दर्शन की आतुरता, उत्सुकता और अधीरता  को और बढ़ा दिया था। अब जैसे ही मैंने अपने परिवार के साथ मंदिर कक्ष मे प्रवेश किया तो हम सभी ज्योतिर्लिंग के दर्शन कर कुछ सेकण्ड्स के लिए अपनी सुधि-बुधि खो बैठे। चार-पाँच दर्शनार्थीयों के प्रवेश करते ही किसी ने ठीक सामने से, किसी ने बाएँ और किसी ने दाहिनी तरफ से भगवान शिव का मस्ताकाभिषेक कर नमन किया पर मैंने बड़े ही संयत और शांत चित्त हो सामने के विपरीत दिशा मे बाएँ दिशा से प्रवेश कर  भगवान श्री शैलम को नतमस्तक हो प्रणाम किया और अपनी माँ को नम आँखों से  स्मरण करते हुए भगवान शिव से उनकी आत्मा को शांति और कल्याण की कामना करते हुए प्रदक्षिणा की। कुछ ही सेकण्ड्स पश्चात आने वाले दर्शनार्थियों के लिए मंदिर कक्ष से भगवान श्री शैलम का स्मरण करते मैने बाहर की ओर प्रस्थान किया। पृथ्वी से लगभग आठ अंगुल उपर ऊंचे उठे स्वयंभू भगवान श्री शैलम के दर्शन और स्पर्श अद्भुत, शक्ति और ऊर्जा का संचार करने वाले थे। भगवान श्री मल्लिकार्जुन/श्री शैलम के वो दर्शन अद्भुत, अविस्मरणीय और चिरस्मरणीय हैं। मंदिर के मुख्य मंडप के चारों ओर खुले विशाल प्रांगण की परधि पर विभिन्न देवालयों मे सहस्त्र लिंगेश्वर, अर्ध नारीश्वर, वीरमद, उमा महेश्वर, और ब्रह्मा के मंदिर स्थापित किए गए है। एक तरफ यज्ञशाला और गौशाला का निर्माण किया गया हैं।  अंत मे मंदिर के अंतिम छोर पर सीढ़ियो के ऊपर से पूरे मंदिर प्रांगड़ के भव्य दर्शन मन को प्रसन्न करने बाले थे। यहीं से माता भ्रमराम्बा देवी के दर्शन पश्चात मंदिर परिसर के बाहर स्थित लड्डू प्रसाद काउंटर से प्रसाद  लेकर मंदिर से प्रस्थान किया। शेष अगले अंक ......2 मे॰

विजय सहगल                           

       

शनिवार, 9 सितंबर 2023

सनातन से पूर्वाग्रह

 

"सनातन से पूर्वाग्रह"




दिनांक 03 सितम्बर 2023 को चेन्नई मे तमिलनाडू सरकार के खेल मंत्री और वहाँ के मुख्यमंत्री श्री एम के स्टालिन के पुत्र उदय निधि स्टालिन ने सनातन धर्म की तुलना मच्छर, मलेरिया और डेंगू बीमारी से करते हुए उसके उन्मूलन की बात कही  हैं। सनातन धर्म, अध्यात्म और सांस्कृति  के एक मुख्य केंद्र तमिलनाडू, जहां देव सांस्कृति, संस्कृत और सनातन संस्कार की छाप वहाँ के देवालयों  से निकल कर पूरे देश मे प्रचारित और प्रसारित हुई है वहाँ की  सरकार के एक जिम्मेदार मंत्री से देश के बहुसंख्यक सनातन हिन्दू आबादी को आहत करने वाले ब्यान की उम्मीद नहीं की जा सकती थी।  अपनी संकीर्ण सोच, अल्प बुद्धि और अल्प ज्ञान के बशीभूत उदय निधि स्टालिन अपने किसी ज्ञान-कौशल, योग्यता के आधार पर मंत्री पद हांसिल करने वाले व्यक्ति नहीं है अपितु चाँदी की चम्मच लेकर अपने मुख्य मंत्री पिता श्री  एम के स्टालिन के घर पैदा हुए व्यक्ति है जो अपने पिता के  पुत्र मोह की बदौलत सरकार मे मंत्री पद पाने वाले एक ऐसे गुणहीन, अनुपयुक्त, अयोग्य पुत्र हैं जिनमे परंपरागत भारतीय परिवारों से मिली शिक्षा और संस्कारों का पूर्णतः अभाव है अन्यथा ऐसे व्यक्ति को सनातन धर्म के अपमान पर मंत्री परिषद  की  जगह  किसी मानसिक आरोग्यशाला मे होना चाहिए थी। इस घटना मे काँग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री मल्लिकार्जुन खडगे के पुत्र प्रियांक खडगे और कर्नाटक के गृह मंत्री जी परमेश्वर के बयानों ने आग मे घी का काम कर इस ईर्ष्याग्नि को और भी प्रज्ज्व्लित किया। इन सभी मलिन और कुटिल व्यक्तियों की एक मात्र योग्यता सनातम धर्म के प्रति ईर्ष्या और पूर्वाग्रह ही है जिसके कारण इन्हे सरकार मे मंत्री पद की प्राप्ति पुत्र मोह के रूप मे हुयी है।   

मै उदयनिधि स्टालिन के बारे मे दावे के साथ कह सकता हूँ कि कदाचित ही उन्हे सनातन धर्म के बारे मे क॰ख॰ग॰ का ज्ञान भी हो!! सनातन धर्म मे समानता के बारे मे श्रीमद्भगवत गीता के अध्याय 18 का श्लोक संख्या 41 मे स्पष्ट ढंग से व्याख्या करते हुए  भगवान श्री कृष्ण कहते है :-

ब्राह्मणक्षत्रियविशां शूद्राणां च परंतप।
कर्माणि प्रविभक्तानि स्वभावप्रभवैर्गुणैः।।18.41।।
अर्थात

हे परंतप! ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्यों के तथा शूद्रों के कर्म "स्वभाव" से उत्पन्न गुणों द्वारा विभक्त किये गये हैं।

एक नहीं अनेकों जगह पर इस बात को उद्धृत किया गया है कि सनातन धर्म मे वर्ण व्यवस्था जन्मगत/जातिगत  आधार पर न  होकर स्वभाव के अनुसार विभक्त की गयी है। जैसे जो व्यक्ति "अन्तः करण का निग्रह, इंद्रियों का दमन, धर्म पालन के लिए कष्ट सहना, आंतरिक शुद्धता, वेद, शास्त्र का पठन पाठन, ईश्वर मे श्रद्धा रखने वाला है तो वह ब्राह्मण का स्वाभाविक कर्म है (अध्याय 18/42)। ठीक इसी तरह  शूर वीरता, तेज, धैर्य और युद्ध से न पलायन करने वाला किसी भी गोत्र या जाति मे उत्पन्न व्यक्ति क्षत्री ही मानने योग्य है (अध्याय 18/43)। श्रीमद्भगवत गीता के अध्याय 18 के श्लोक 44 और 45 मे भी वैश्य और परिचार्यतामक परिचार्यात्मक स्वभाव बाले व्यक्तियों का उल्लेख किया गया। इससे स्पष्ट है कि सनातन धर्म मे वर्ण व्यवस्था जन्म या जाति आधारित न होकर स्वाभाविक गुणों के आधार पर है।  

हजारों वर्षों से हमारे देश पर कुषाण, हूण, शक, अरब, तुर्क, मंगोल और मुगलों सहित अनेक  विदेशी आक्रांताओं तथा  अंग्रेज़ शासकों ने भारतीय सनातन सांस्कृति पर  आक्षेप और आक्रमण कर विरूपित और विक्रत किया और जो वर्तमान मे वर्ण शंकर से उत्पन्न राजे रजवाड़ों की अधम मानसिकता वाली सोच के प्रतिनिधि  उदय निधि, प्रियांक खडगे, जी परमेश्वर जैसे लोगो द्वारा आज भी जारी है। जो विदेशी और विधर्मी  आक्रांता सहस्त्रों साल से सनातन धर्म को विद्रूपित करने  के प्रयास मे निष्फल रहे और जो अनादि काल से चली आ रही सत्य सनातन सांस्कृति को  न मिटा पाये और जिनका आज कोई नाम लेवा नहीं हैं। सनातन सांस्कृति के उन्मूलन वाली ऐसी ही घृणित, अपवित्र और कलुषित  मानसिकता की सोच वाले स्टालिन, खडगे और जी॰ परमेश्वर की तो विसात ही क्या हैं?   

लॉर्ड मैकाले की शिक्षा पद्धति  मे पोषित उदय निधि हों या प्रियांक खडगे पर सनातनी संस्कार और शिक्षा एवं इसके पवित्र साहित्य मे निहित  अध्यात्म विध्या मे ये सभी अशिक्षित, अनपढ़ और अनजान हैं। इन आसुरी और पैशाचिक सोच के लोगो ने न केवल सनातन धर्म मे  समानता और सामाजिक न्याय पर प्रश्न खड़े किये हैं अपितु  सनातन की एक मनगढ़ंत परिभाषा को गढ़ा है? समानता और न्याय के अनगिनत प्रसंग हमारे पवित्र ग्रन्थों मे भरे पड़े है। निषाद राज, केवट और भगवान श्री राम के संवाद से कौन भारतीय परिचित नहीं है। हनुमान जी  द्वारा भगवान श्री राम और सुग्रीव की मित्रता को हर सनातन धर्मी श्रद्धा भाव से स्मरण करता है। माँ शबरी के निश्छल प्रेम के दर्शन भगवान श्री राम का आथिति सत्कार मे जूठे बेर खिलाने के मार्मिक प्रसंग, हर भारतीय की आँखों को नम कर देने वाला है।  देवी अहिल्या को अपने चरणों से स्पर्श कर, उद्धार करने की कथा भारतीय जनमानस मे आदर और सम्मान के साथ कही और सुनाई जाती है। "आदि ऋषि बाल्मीकी" द्वारा रचित संस्कृत महाकाव्य रामायण एवं गोस्वामी तुलसी दास द्वारा रचित रामचरित मानस समान रूप से हर सनातनी हिन्दू द्वारा नित्य पूजित और पठनीय ग्रंथ हैं। कृष्ण सुदामा के मिलन का प्रसंग एक राजा द्वारा अपने बाल सखा से मिलने के लिए नंगे पैर दौड़े आने की कथा सामाजिक समरसता और समानता का सर्वोच्च उदाहरण से क्या हम अनिभिज्ञ है?

भारतीय पौराणिक उपनिषद मे उल्लेखित "सर्वे भवन्तु सुखिनः......." अर्थात सभी सुखी हों,   सभी निरोगी हों, सभी का जीवन मंगलमय हों कोई भी दुःख का भागी न हों, की कल्पना सिर्फ सनातन धर्म मे ही परिलक्षित होती है। कदाचित ही किसी सभ्यता और संप्रदाय के ग्रन्थों  मे ऐसा भाव हो जो सनातन धर्म के महोपनिषद मे वर्णित "वसुधैव कुटुंबकम्" अर्थात सारी धरती ही मेरा परिवार है के भाव से परिपूर्ण हो। वेदों के आदर्श वाक्य "अतिथि देवो भवः" अर्थात "अतिथि देवता तुल्य है!" का भाव सनातन धर्म की आत्मा और प्राण है। भला, स्टेलिनों, खडगों और परमेश्वरों को ये न दिखाई दे तो इसे इनकी अज्ञानता और अशिक्षा ही कहा जाएगा। अगर सनातन धर्म मे नयी सोच और नए विचारों का अभाव होता तो शायद ही श्रीमद्भगवत गीता जैसे महान ग्रंथ की रचना हो पाती जिसमे भगवान श्री कृष्ण की वाणी का समावेश है। सनातन धर्म के इस पवित्र ग्रंथ का राज्याश्रय के बिना जितनी भाषाओं मे अनुवादित और अनूदित किया गया है शायद ही किसी धर्मग्रंथ का किया गया हों। इसके साथ ही  वेदों, उपनिषदों, रिचाओं, सूत्र ग्रन्थों, पुराणों, स्मृतियों  और शिव, विष्णु, ब्रह्मा, राम, कृष्ण जैसे देवताओं की शिक्षाओं पर नित्य नवीन रचनाओं एवं अनगिनीत ग्रन्थों की रचना कैसे होती? भक्तकवि सूरदास, रैदास, मीराबाई, कबीर दास और  दक्षिण भारत के कवि कंबर, नयनार और अलवर  ने सनातन धर्म के सदसाहित्य को समृद्ध किया है। 

यहाँ इस बात का उल्लेख करना आवश्यक है कि सनातन के मूल मे मानवीय जीवन  और एक शास्त्र सम्मत आदर्श जीवन के पहलुओं का समावेश करता हैं जो आज भी उतने ही प्रासंगिक है जो हजारों साल पहले थी। श्रीमद्भगवत गीता इसका सर्वश्रेष्ठ उदाहरण है। इस पवित्र ग्रंथ की शिक्षाएं धर्म, भाषा, प्रांत से परे पूरी मानवता पर समान रूप से लागू होती है। कैसे भगवान श्री कृष्ण ने महाभारत के युद्ध मे शोक और विषाद से परिपूर्ण वीर योद्धा अर्जुन द्वारा रण भूमि मे शस्त्रों को त्याग युद्ध न करने के निश्चय को शास्त्र सम्मत एवं सत्य के लिए युद्ध करने की प्रेरणा और शिक्षाएं दी।  वे  शिक्षाएं आज भी  सामान्य मानवी के जीवन मे जीने की कला का मार्ग प्रशस्त करती हैं। सामान्य विषयों से हट कर  श्रीमद्भगवत गीता मे अध्यात्म विध्या के माध्यम से उन विषयों को छुआ गया है जो उदय निधि स्टालिन, प्रियांक खडगे और जी परमेश्वर जैसे  साधारण बुद्धि वालों की समझ से परे हैं। आइये श्रीमदभगवत के कुछ श्लोकों के अर्थों की चर्चा करें जो हजारों साल पहले भी उतने सार्थक थे जैसे आज भी है:-- 

जो दुःखों की प्राप्ति मे जो उद्वेग न हो, सुखों मे निःस्पृह हो, जिसके राग, भय क्रोध नष्ट हो गये हों वो स्थिर बुद्धि कहा गया है (गीता अध्याय 2/56)।  क्या ऐसी शिक्षा किसी काल मे भी बदली जा सकती है?

जिस प्रकार गणित या विज्ञान  के किसी  एक सूत्र की तरह प्रतिपादित किया जाता है उसी तरह क्रोध से उत्पन्न मूढ़भाव वाले व्यक्ति को "अशांतश्य कुतः सुखम" अर्थात शांति रहित मनुष्य को सुख कैसे मिल सकता है? (अध्याय2 श्लोक63से 66) "अशांत और सुख" की परिभाषा के बारे मे इस सार्वकालिक  शिक्षण को कैसे किसी भाषा, प्रांत, जाति और धर्म मे बांधा जा सकता है?

ज्ञान विज्ञान से तृप्त, इंद्रियों पर विजय प्राप्त एक आदर्श योगी जिसके लिए मिट्टी, पत्थर और सोना (स्वर्ण) समान हो (अध्याय 6 श्लोक 8) की कल्पना संसार मे मात्र सनातन सांस्कृति की सर्वोत्तम शिक्षा है जो वर्तमान मे भी उतनी सच्ची है जितनी पहले थी।

श्रीमद भागवत गीता मे मानव जीवन मे आने वाली हर चुनौती, संघर्ष, संशय और समस्या के  समाधान और उसके  हर पहलू पर प्रकाश डाला गया है फिर वह चाहे निष्काम कर्म (2/47), आत्मतत्व (2/23), त्याग (18/4-6), ज्ञान (18/20-22), कर्म(18/23-25), कर्ता 18/26-28), बुद्धि(18/30-32), धृति (धारण शक्ति) (18/33-35), सुख (18/37-39), दान, हवन-यज्ञ, भोजन  तथा अन्य अनेक विषयों का उल्लेख भी श्रीमद्भगवत गीता मे किया गया है। इतने विशाल और विस्तृत विषयों पर व्याख्या उदय निधि स्टालिन जैसे लोगो की सोच और समझ से परे है, तब कैसे वे अधिकार पूर्वक सनातन धर्म की व्याख्या कर सकते है? सनातन धर्म की निंदा करने वाले इन कुलघातियों के वर्णसङ्कर वंशजों के बारे मे हजारों वर्ष पूर्व ही श्रीमद्भगवत गीता मे उल्लेख किया था (अध्याय 1 श्लोक 38 से 43) जो आज भी प्रासगिक हैं। ऐसे सत्ता स्वार्थ मे मदांध विक्षिप्त चित्त व्यक्तियों की जितनी भी कड़ी निंदा और भर्त्स्ना की जाए कम है।

विजय सहगल