"श्री ऋषि
सुनक-अल्पसंख्यक प्रधानमंत्री??"
कल दीपावली के दिन 24 अक्टूबर 2022 को
ब्रिटेन के प्रधान मंत्री के रूप मे श्री ऋषि सुनक के चुने जाने की खबर ने देश मे
"सोने पर सुहागा" का काम किया। आज देश के अतिरिक्त दुनियाँ के छः देशों
मे भारत वंशी, राजनैतिक दृष्टि से अहम
पदों और भूमिकाओं मे पदस्थ है। श्री ऋषि सुनक या अन्य भारत वंशियों की वरीयता
और प्राथमिकताएं उनके अपने धर्म से भी बढ़
कर उस देश या भूमि के प्रति है जिनमे वे जन्मे या रहते है। क्योंकि सनातन धर्मावलम्बी
अपनी शिक्षाओं, रीतिरिवाजों और
धार्मिक संस्कारों के कारण उनकी निष्ठा,
समर्पण और मातृभक्ति अपनी उस धरा के प्रति
है जहां वे जन्मे है या निवासरत है। फिर
वह भारत वंशी चाहे पुर्तगाल के
प्रधानमंत्री- अंटोनियो कोस्टा हों,
गयाना के राष्ट्रपति मो॰ इरफान हों,
मॉरीशस के पृथ्वी राजसिंह रूपण हों,
सूरीनाम के राष्ट्रपति चंद्रिका प्रसाद या ब्रिटेन के नवनिर्वाचित प्रधानमंत्री
श्री ऋषि सुनक। जैसे कि श्री बाल्मीकी
रामायण के उस ध्येय वाक्य- "जननी जन्मभूमिश्च,
स्वर्गादापि गरीयसी" अर्थात जननी (माँ) एवं जन्म भूमि स्वर्ग (धर्म) से भी बढ़
कर है! कदाचित ही ऐसी भावना और सोच किसी अन्य धर्मावलम्बी या मत मतांतर के मानने
वालों मे हो?
जैसे कि चर्चा हो रही है कि श्री सुनक ने
पिछली वार मंत्री पद की शपथ श्रीमद्भगवद गीता के नाम पर ली थी। जहाँ तक श्रीमद्भगवद गीता का प्रश्न है इसका स्वाध्याय करने वाले लोग
अच्छी तरह से जानते है कि धर्म आडंबर से परे
श्रीमद्भगवद गीता की शिक्षाएं देश
काल से परे एक आदर्श मानव के निर्माण को प्रेरित करने वाली है और जो आज के इस
आधुनिक वैज्ञानिक युग मे उतनी ही
प्रासंगिक है जितनी आज से लगभग दो हजार साल पहले जब मानव प्रौगएतिहासिक युग
मे था। यही कारण है कि राज्याश्रय से परे मानव मे "जीवन जीने की
कला" के विषय मे "भगवान
श्रीकृष्ण" के ये संदेश धर्म,
संप्रदाय, पंथ और मत से परे
दुनियाँ मे सैकड़ों भाषाओं मे अनूदित,
अनुवादित हो चुके है और अनेक विद्वानों,
श्रेष्ठियों और मनीषियों द्वारा श्रीमदभगवत गीता पर टीका,
भाष्य और व्याख्यायेँ लिखी गयी है। एक श्लोक मे भगवान श्री कृष्ण अर्जुन को दिये
एक संदेश मे कहते है :-
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु
कदाचन ।
मा कर्मफलहेतुर्भुर्मा ते
संगोऽस्त्वकर्मणि ॥
अर्थात
कर्तव्य-कर्म
करनेमें ही तेरा अधिकार है, फलों
में कभी नहीं। अतः तू कर्मफल का हेतु भी मत बन और तेरी अकर्मण्यतामें भी आसक्ति न हो!! श्रीमद्भगवद गीता की
ऐसी कर्म फल के त्याग की गूढ व्याख्या
शायद ही किसी ग्रंथ या पाण्डुलिपि मे हों? इसलिये करोड़ों-करोड़ गीता स्वाध्याय प्रेमियों, अनुयायियों की तरह श्री ऋषि सुनक
को श्रीमद्भगवद गीता और सनातन धर्म मे गहरी आस्था, विश्वास
और निष्ठा है तो कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिये।
देश मे
श्री सुनक के प्रधानमंत्री पद पर चुने जाने पर एक बार पुनः छद्म, गंदी
राजनीति की शुरुआत काँग्रेस के पूर्व मंत्री श्री पी चिदम्बरम द्वारा शुरू कर दी
गयी। उनके स्वर मे स्वर मिलाया श्री शशि
थरूर और जम्मू कश्मीर की पूर्व मुख्य मंत्री महबूबा मुफ़्ती ने। उनका कहना था कि जब
ब्रिटेन मे एक अल्पसंख्यक श्री ऋषि सुनक प्रधान मंत्री बनाए ज सकते है तो भारत के
बहुसंख्यकवाद का पालन करने वाली पार्टियों द्वारा सीखने के लिए सबक है। इन सारे
लोगो को कहने का आशय ये था कि ब्रिटेन की तरह ही भारत मे किसी अल्पसंख्यक को क्यों
नहीं प्रधानमंत्री बनाया जा सकता है?
श्री चिदम्बरम जी शायद ये भूल गये कि देश मे इससे पूर्व देश
के सबसे सर्वोच्च संवैधानिक राष्ट्रपति पद
पर स्व॰ श्री डॉ जाकिर हुसैन, स्व॰ श्री
फख़रुद्दीन अली अहमद, स्व॰श्री ज्ञानी जैल सिंह,
स्व॰डॉ एपीजे अब्दुल कलाम अल्पसंख्यक समुदाय ही से थे। डॉ श्री मनमोहन सिंह जी ने देश के
प्रधानमंत्री के रूप मे उल्लेखनीय सेवाएँ से राष्ट्र को कृतार्ध किया। लेकिन मेरा
ये मानना है कि ब्रिटेन मे यदि अल्पसंख्यक
ही प्रधानमंत्री पद का पैमाना होता तो
लाखों हिन्दू अल्पसंख्यकों मे श्री ऋषि
सुनक को ही क्यों चुना जाता? अन्य अनेक
अल्पसंख्यक हिन्दू मे से कोई और क्यों नहीं चुना गया?
हमे ये याद रखना होगा कि मात्र हिन्दू होने के पूर्व ऋषि सुनक अपने ज्ञान,
मेधा और शिक्षा के बल पर प्रधान मंत्री बने न कि अल्पसंख्यक हिन्दू होने पर? इसी तरह भारत मे भी लाखों हिन्दू,
मुसलमान, सिक्ख या ईसाई होंगे इस
का ये तात्पर्य नहीं कि महज धर्म के आधार पर राजनैतिक पदों पर नियुक्तियाँ की जाए?
श्री चिदम्बरम,
शशि थरूर, महबूबा मुफ़्ती जैसे
राजनैतिक पदों से वंचित लोग आज सत्ता मे
"बिना पानी की मछ्ली" की तरह तड़प रहे है!!,
वे उल-जलूल, कुटिल और कुतर्क देकर
अपने क्षुद्र मानसिकता का परिचय दे येन केन प्रकारेण,
धर्म, भाषा और प्रांत के के आधार पर अपने
विरोधियों को तुक्ष, हेय और छोटा ठहराने की
कुत्सित, अशास्त्रिय चेष्टा से
सत्तासीन होने की बचकानी कोशिश कर रहे है।
श्री चिदम्बरम, शशि थरूर,
महबूबा मुफ़्ती जैसे राजनैतिक पदों से वंचित पूर्वाग्रह से ग्रसित दुराग्रही
व्यक्ति नहीं जानते कि वे जिन व्यक्तियों या दलों को अपनी सतही,
तुच्छ और ओछी हरकतों से छोटा जतलाने का कुप्रयास कर रहे है असल मे वे देश की जनता
द्वारा लोकतान्त्रिक तरीके से बहुमत के आधार पर चुन कर आए जन प्रतिनिधि है।
दरअसल चिदम्बरम,
शशि थरूर और महबूबा मुफ़्ती जैसे लोग निजी
पद प्रतिष्ठा पाने की आड़ मे धर्म, भाषा और प्रांत
के आधार पर अपने कुतर्कों के माध्यम से अपनी छुपी कार्य सूची (hidden
agenda) को लागू करवाने का प्रयास करते है। ये बंटबारे की
राजनीति कुछ उसी तरह से करते है जैसा कि आठवीं
या दसवीं की कक्षा मे प्रमेय या निर्मये के सूत्र को सिद्ध करने मे लिखा
जाता था।
ये विघ्न संतोषी दीर्घ सूत्री व्यक्ति या
व्यक्तियों का समूह राजनैतिक पद प्राप्ति हेतु क्षेत्रवाद या प्रांत वाद का वास्ता देकर अपनी मांग की
शुरुआत करेंगे!! यदि उनकी ये प्रांतवाद की अभिलाषा पूर्ण हो जयगी तो ये अपने जिले से
राजनैतिक पद प्राप्ति की आकांक्षा करेंगे!! इसकी भी पूर्ति होने पर पुनः ये अपने
ब्लॉक या खंड से राजनैतिक पद की लालसा के लिये उस क्षेत्र की जनता को भड़काने का
कुसत्सित कृत करेंगे। यदि ब्लॉक या खंड स्तर पर भी ये सफल हो जाएंगे तो फिर अपने
गाँव या कस्बे से राजनैतिक पद प्राप्ति के आवेग को हवा देंगे। जब उनकी ये महत्वाकांक्षा भी पूरी हो जाएगी तो
ये मोह, तृष्णा से न अघाने वाले
नीच पुरुष गाँव के वाद राजनैतिक पद
प्राप्ति हेतु अपने परिवार और फिर स्वयं
अपने लिये पद प्राप्ति की मांग करेंगे!! आप देखिये भाषा,
प्रांत से शुरू हुई राजनैतिक पद प्राप्ति की वासना कैसे जिले,
खंड, गाँव से होती हुई परिवारवाद पर समाप्त होती
है। इस परिवारवाद के जीवंत उदाहरण राष्ट्रीय स्तर पर "काँग्रेस" मे
"गांधी परिवार" और राज्य स्तर पर उत्तर के जम्मू कश्मीर से लेकर दक्षिण
मे तमिलनाडू राज्य स्तर तक समानरूप से परिवार
वाद के ज्वलंत उदाहरण मिल जाएंगे।
जम्मू कश्मीर मे महबूबा मुफ़्ती एवं फारुख
अब्दुल्ला परिवार, बिहार मे लालू यादव
परिवार, उत्तर प्रदेश मे स्व॰ मुलायम
सिंह परिवार, पंजाब मे प्रकाश सिंह
बादल, तमिलनाडु स्व॰ एम॰ करूणानिधि,
आंध्रा मे स्व॰ एनटी रामा राव, झारखंड मे शिबू
सोरेन, तेलंगाना मे के॰ चन्द्रशेखर राव,
कर्नाटक मे देवेगौड़ा और येदीयुरप्पा,
महाराष्ट्र मे ठाकरे और शरद पवार, परिवार वाद के
प्रमुख उदाहरण है। नख-शिख (पैर के नाखून से लेकर सिर तक) से भ्रष्टाचार मे डूबे इस
परिवारवाद ने देश का बड़ा अहित किया है। पश्चिमी बंगाल मे ममता बैनर्जी की सरकार के
मंत्रियों के घर करोड़ो रूपये की नगद धनराशि की बरामदगी इस बात का ध्योतक है कि इनके अपने निजी
स्वार्थ देश हित और राष्ट्र हित से उपर है। ये ही परिवार वादी ताकते आज एक बार
पुनः ऋषि सुनक की आड़ मे "अल्पसंख्यक" मुद्दा उछाल कर देश की राजनीति की
दिशा और दशा, परिवारवाद,
भाषा वाद और बहुसंख्यक-अल्पसंख्यक वाद की
ओर मोड़ कर देश की प्रगति को पीछे धकेल कर अवरोध पैदा कर रही है?
क्या हमे इन निहित स्वार्थी और लोकतान्त्रिक विरोधी ताकतों से सावधान नहीं रहना चाहिये??
विजय सहगल














