शुक्रवार, 28 अक्टूबर 2022

अल्पसंख्यक प्रधानमंत्री??"

 

"श्री ऋषि सुनक-अल्पसंख्यक प्रधानमंत्री??"





कल दीपावली के दिन 24 अक्टूबर 2022 को ब्रिटेन के प्रधान मंत्री के रूप मे श्री ऋषि सुनक के चुने जाने की खबर ने देश मे "सोने पर सुहागा" का काम किया। आज देश के अतिरिक्त दुनियाँ के छः देशों मे भारत वंशी, राजनैतिक दृष्टि से अहम पदों और भूमिकाओं मे पदस्थ है। श्री ऋषि सुनक या अन्य भारत वंशियों की वरीयता और  प्राथमिकताएं उनके अपने धर्म से भी बढ़ कर उस देश या भूमि के प्रति है जिनमे वे जन्मे या रहते है। क्योंकि सनातन धर्मावलम्बी अपनी शिक्षाओं, रीतिरिवाजों और धार्मिक  संस्कारों के कारण उनकी निष्ठा, समर्पण और मातृभक्ति  अपनी उस धरा के प्रति है जहां वे जन्मे है या निवासरत है।  फिर वह भारत वंशी  चाहे पुर्तगाल के प्रधानमंत्री-  अंटोनियो कोस्टा हों, गयाना के राष्ट्रपति मो॰ इरफान हों, मॉरीशस के पृथ्वी राजसिंह रूपण हों, सूरीनाम के राष्ट्रपति चंद्रिका प्रसाद या ब्रिटेन के नवनिर्वाचित प्रधानमंत्री श्री ऋषि सुनक। जैसे कि  श्री बाल्मीकी रामायण के उस ध्येय वाक्य- "जननी जन्मभूमिश्च, स्वर्गादापि गरीयसी" अर्थात जननी (माँ) एवं जन्म भूमि स्वर्ग (धर्म) से भी बढ़ कर है! कदाचित ही ऐसी भावना और सोच किसी अन्य धर्मावलम्बी या मत मतांतर के मानने वालों मे हो?

जैसे कि चर्चा हो रही है कि श्री सुनक ने पिछली वार मंत्री पद की शपथ श्रीमद्भगवद  गीता के नाम पर ली थी। जहाँ तक  श्रीमद्भगवद  गीता का प्रश्न है इसका स्वाध्याय करने वाले लोग अच्छी तरह से जानते है कि धर्म आडंबर से परे  श्रीमद्भगवद  गीता की शिक्षाएं देश काल से परे एक आदर्श मानव के निर्माण को प्रेरित करने वाली है और जो आज के इस आधुनिक वैज्ञानिक युग मे उतनी ही  प्रासंगिक है जितनी आज से लगभग दो हजार साल पहले जब मानव प्रौगएतिहासिक युग मे था। यही कारण है कि राज्याश्रय से परे मानव मे "जीवन जीने की कला"  के विषय मे "भगवान श्रीकृष्ण" के ये संदेश धर्म, संप्रदाय, पंथ और मत  से परे   दुनियाँ मे सैकड़ों भाषाओं मे  अनूदित, अनुवादित  हो चुके है और अनेक विद्वानों, श्रेष्ठियों और मनीषियों द्वारा श्रीमदभगवत गीता पर टीका, भाष्य और व्याख्यायेँ लिखी गयी है। एक श्लोक मे भगवान श्री कृष्ण अर्जुन को दिये एक संदेश मे कहते है :-

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन ।
मा कर्मफलहेतुर्भुर्मा ते संगोऽस्त्वकर्मणि ॥ 

अर्थात कर्तव्य-कर्म करनेमें ही तेरा अधिकार है, फलों में कभी नहीं। अतः तू कर्मफल का हेतु भी मत बन और तेरी अकर्मण्यतामें भी आसक्ति न हो!! श्रीमद्भगवद गीता की ऐसी कर्म फल के त्याग की  गूढ व्याख्या शायद ही किसी ग्रंथ या पाण्डुलिपि मे हों? इसलिये करोड़ों-करोड़ गीता स्वाध्याय प्रेमियों, अनुयायियों  की तरह श्री ऋषि सुनक को श्रीमद्भगवद गीता और सनातन धर्म मे गहरी आस्था, विश्वास और निष्ठा है तो कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिये।    
 

देश मे श्री सुनक के प्रधानमंत्री पद पर चुने जाने पर एक बार पुनः छद्म, गंदी राजनीति की शुरुआत काँग्रेस के पूर्व मंत्री श्री पी चिदम्बरम द्वारा शुरू कर दी गयी। उनके स्वर मे स्वर मिलाया  श्री शशि थरूर और जम्मू कश्मीर की पूर्व मुख्य मंत्री महबूबा मुफ़्ती ने। उनका कहना था कि जब ब्रिटेन मे एक अल्पसंख्यक श्री ऋषि सुनक प्रधान मंत्री बनाए ज सकते है तो भारत के बहुसंख्यकवाद का पालन करने वाली पार्टियों द्वारा सीखने के लिए सबक है। इन सारे लोगो को कहने का आशय ये था कि ब्रिटेन की तरह ही भारत मे किसी अल्पसंख्यक को क्यों नहीं प्रधानमंत्री बनाया जा सकता है?

श्री चिदम्बरम जी  शायद ये भूल गये कि देश मे इससे पूर्व देश के  सबसे सर्वोच्च संवैधानिक राष्ट्रपति पद पर स्व॰ श्री डॉ जाकिर हुसैन, स्व॰ श्री फख़रुद्दीन अली अहमद, स्व॰श्री ज्ञानी जैल सिंह, स्व॰डॉ एपीजे अब्दुल कलाम अल्पसंख्यक समुदाय ही  से थे। डॉ श्री मनमोहन सिंह जी ने देश के प्रधानमंत्री के रूप मे उल्लेखनीय सेवाएँ से राष्ट्र को कृतार्ध किया। लेकिन मेरा ये मानना है कि ब्रिटेन मे यदि  अल्पसंख्यक ही  प्रधानमंत्री पद का पैमाना होता तो लाखों हिन्दू अल्पसंख्यकों मे  श्री ऋषि सुनक को ही क्यों चुना जाता? अन्य अनेक अल्पसंख्यक हिन्दू मे से कोई और क्यों नहीं चुना गया? हमे ये याद रखना होगा कि मात्र हिन्दू होने के पूर्व ऋषि सुनक अपने ज्ञान, मेधा और शिक्षा के बल पर प्रधान मंत्री बने न कि अल्पसंख्यक हिन्दू होने पर?  इसी तरह भारत मे भी लाखों हिन्दू, मुसलमान, सिक्ख या ईसाई होंगे इस का ये तात्पर्य नहीं कि महज धर्म के आधार पर राजनैतिक पदों पर नियुक्तियाँ की जाए?

श्री चिदम्बरम, शशि थरूर, महबूबा मुफ़्ती जैसे राजनैतिक पदों से वंचित लोग आज सत्ता मे  "बिना पानी की मछ्ली" की तरह तड़प रहे है!!, वे उल-जलूल, कुटिल और कुतर्क देकर अपने क्षुद्र मानसिकता का परिचय दे येन केन प्रकारेण, धर्म, भाषा और प्रांत के के आधार पर अपने विरोधियों को तुक्ष, हेय और छोटा ठहराने की कुत्सित, अशास्त्रिय चेष्टा से सत्तासीन होने की बचकानी कोशिश  कर रहे है। श्री चिदम्बरम, शशि थरूर, महबूबा मुफ़्ती जैसे राजनैतिक पदों से वंचित पूर्वाग्रह से ग्रसित दुराग्रही व्यक्ति नहीं जानते कि वे जिन व्यक्तियों या दलों को अपनी सतही, तुच्छ और ओछी हरकतों से छोटा जतलाने का कुप्रयास कर रहे है असल मे वे देश की जनता द्वारा लोकतान्त्रिक तरीके से बहुमत के आधार पर चुन कर आए जन प्रतिनिधि  है। 

दरअसल चिदम्बरम, शशि थरूर और महबूबा  मुफ़्ती जैसे लोग निजी पद प्रतिष्ठा पाने की आड़ मे धर्म, भाषा और प्रांत के आधार पर अपने कुतर्कों के माध्यम से अपनी  छुपी कार्य सूची (hidden agenda) को लागू करवाने का प्रयास करते है। ये बंटबारे की राजनीति कुछ उसी तरह से करते है जैसा कि आठवीं  या दसवीं की कक्षा मे प्रमेय या निर्मये के सूत्र को सिद्ध करने मे लिखा जाता था।

ये विघ्न संतोषी दीर्घ सूत्री व्यक्ति या व्यक्तियों का समूह राजनैतिक पद प्राप्ति हेतु क्षेत्रवाद  या प्रांत वाद का वास्ता देकर अपनी मांग की शुरुआत करेंगे!! यदि उनकी ये प्रांतवाद की  अभिलाषा पूर्ण हो जयगी तो ये अपने जिले से राजनैतिक पद प्राप्ति की आकांक्षा करेंगे!! इसकी भी पूर्ति होने पर पुनः ये अपने ब्लॉक या खंड से राजनैतिक पद की लालसा के लिये उस क्षेत्र की जनता को भड़काने का कुसत्सित कृत करेंगे। यदि ब्लॉक या खंड स्तर पर भी ये सफल हो जाएंगे तो फिर अपने गाँव या कस्बे से राजनैतिक पद प्राप्ति के आवेग को हवा देंगे।  जब उनकी ये महत्वाकांक्षा भी पूरी हो जाएगी तो ये मोह, तृष्णा से न अघाने वाले नीच पुरुष गाँव के वाद  राजनैतिक पद प्राप्ति  हेतु अपने परिवार और फिर स्वयं अपने लिये पद प्राप्ति की मांग करेंगे!! आप देखिये भाषा, प्रांत से शुरू हुई राजनैतिक पद प्राप्ति की वासना कैसे जिले, खंड, गाँव से होती हुई परिवारवाद पर समाप्त होती है। इस परिवारवाद के जीवंत उदाहरण राष्ट्रीय स्तर पर "काँग्रेस" मे "गांधी परिवार" और राज्य स्तर पर उत्तर के जम्मू कश्मीर से लेकर दक्षिण मे तमिलनाडू  राज्य स्तर तक समानरूप से परिवार वाद के ज्वलंत उदाहरण मिल जाएंगे।

जम्मू कश्मीर मे महबूबा मुफ़्ती एवं फारुख अब्दुल्ला परिवार, बिहार मे लालू यादव परिवार, उत्तर प्रदेश मे स्व॰ मुलायम सिंह परिवार, पंजाब मे प्रकाश सिंह बादल, तमिलनाडु स्व॰ एम॰ करूणानिधि, आंध्रा मे स्व॰ एनटी रामा राव, झारखंड मे शिबू सोरेन, तेलंगाना मे के॰ चन्द्रशेखर राव, कर्नाटक मे देवेगौड़ा और येदीयुरप्पा, महाराष्ट्र मे ठाकरे और शरद पवार, परिवार वाद के प्रमुख उदाहरण है। नख-शिख (पैर के नाखून से लेकर सिर तक) से भ्रष्टाचार मे डूबे इस परिवारवाद ने देश का बड़ा अहित किया है। पश्चिमी बंगाल मे ममता बैनर्जी की सरकार के मंत्रियों के घर करोड़ो रूपये की नगद धनराशि की  बरामदगी इस बात का ध्योतक है कि इनके अपने निजी स्वार्थ देश हित और राष्ट्र हित से उपर है। ये ही परिवार वादी ताकते आज एक बार पुनः ऋषि सुनक की आड़ मे "अल्पसंख्यक" मुद्दा उछाल कर देश की राजनीति की दिशा और दशा, परिवारवाद, भाषा वाद और बहुसंख्यक-अल्पसंख्यक वाद  की ओर मोड़ कर देश की प्रगति को पीछे धकेल कर अवरोध पैदा कर रही है? क्या हमे इन निहित स्वार्थी और लोकतान्त्रिक  विरोधी ताकतों से सावधान नहीं रहना चाहिये?? 

विजय सहगल      

 

सोमवार, 24 अक्टूबर 2022

सही अर्थ दिवाली आई

 

 

"सही अर्थ दिवाली आई"



कुम्हार के दिये।

जब घरों मे जले॥
तिमिर को भेद रोशनी छाई।
सही अर्थ दिवाली आई॥

कुची, रंगरेज की,
घरों पर जब चली।
जगमगा उठी, पौर,
आँगन, हर गली॥
श्रम से घर, खुशियाँ छाई।
सही अर्थ दिवाली आई॥

अपने तन को मैला करके,
करें शुद्ध जो घर, शौचालय।
होम करें खुद को हव्य मे,
बना, हमारा घर देवालय॥
देवतुल्य नमन है उनको,
जिनके चेहरे, खुशियाँ छाई।
सही अर्थ दिवाली आई॥

माली के फूलों से जब हम,
घर को खूब सजाएँगे।
कागज के फूलों से बैसी,
सुंगंध कहाँ से पाएंगे॥
"लटर बेल" बगिया मे छाई।
सही अर्थ दीवाली आई॥

विजय सहगल

 

शुक्रवार, 21 अक्टूबर 2022

आईबीए की हैल्थ इन्शुरेंस स्कीम

 

"आईबीए की हैल्थ इन्शुरेंस स्कीम"






बैंक से दीगर हमारे सुधि और सम्मानित पाठकों को बताना चाहते है कि भारत मे बैंकिंग प्रबंधन हेतु एक प्रितिनिधि संस्था के रूप मे भारतीय बैंकों और वित्तीय संस्थानों ने "भारतीय बैंक संघ"की स्थापना  की थी।  1946 मे गठित इस संस्था का उद्देश्य भारतीय  वित्तीय और बैंकिंग संस्थानों के विकास के साथ उनमे कार्यरत कर्मचारियों/अधिकारियों के वेतन समझौते के अतिरिक्त  उनके कल्याण हेतु अन्य उपाय आदि करना है। इस प्रिक्रिया  मे  बैंक की सेवा से सेवानिवृत्त स्टाफ एवं उनके परिवार भी शामिल है। इस हेतु बैंक कर्मियों और अधिकारी संगठनों की सरकार से बातचीत मे यह संस्था एक पुल की तरह काम करती है। बैंक यूनियन और भारतीय बैंक संघ  के बीच की सहमति को केंद्रीय सरकार सम्मान कर अपनी सहमति प्रदान करती है। बैंक स्टाफ के वेतन समझौते और कल्याण की दृष्टि से इसका ये संक्षिप्त परिचय है। हर पाँच साल मे  बैंक स्टाफ के  द्विपक्षीय वेतन समझौते पर वार्ता की शर्त के अनुसार बैंक स्टाफ के पहला वेतन सम्झौता 19 अक्टूबर 1966 मे हुआ। आगे भी बैंक कर्मियों के 8-9 द्विपक्षीय वेतन समझौते संघर्ष, विरोध प्रदर्शन और हड़ताल के बीच सम्मान जनक तरीके से  होते रहे।

पर जिन बैंक यूनियन और भारतीय बैंक संघ से बैंक के सेवानिवृत्त पेंशनर  को अपेक्षा थी कि  ये दोनों संगठन पेन्शनधारियों  के कल्याण के लिए कार्य करेंगे किंतु खेद और अफसोस है कि पिछले 10वे और 11वे  द्विपक्षीय वेतन समझौते मे  बैंक के सेवानिवृत्त पेंशनरों के हित को दरकिनार कर उनकी पेंशन की कीमत पर समझौते से बैंक के सेवानिवृत्त अधिकारी कर्मचारी आज बड़े संकट और कठिनाई मे है। ये छलावा सेवानिवृत्त बैंक स्टाफ के विरुद्ध एक सोचे  समझे षड्यंत्र के तहत "बैंक यूनियन" और "भारतीय बैंक संघ" द्वारा किया गया!! ये साजिश और कपट सेवनिवृत्त बैंक अधिकारियों के विरुद्ध 10वे वेतन समझौते की उस "हत्यारी" "धारा" के अंतर्गत किया गया जिसके तहत अधिकारियों के वेतन मे मूल वेतन के 7.75% से 11% के रूप मे  एक "विशेष भत्ते" भत्ता प्रदान करने की सहमति इस शर्त पर प्रदान की गयी कि उक्त "विशेष भत्ते" की गणना  "सेवानिवृत्त लाभ" के लिए नहीं की जायेगी!! इस "विशेष भत्ते" मे किसी "विशेषता" का किंचित  भी कहीं कोई उल्लेख किया गया!! इस तरह की शर्त लगाकर सेवनिवृत्त स्टाफ के साथ तत्कालीन यूनियन नेतृत्व और भारतीय बैंक संघ ने धोखा किया, षड्यंत्र!!, किया!! पर हा!! दुःख!! और क्षोभ!! रिटायर्ड बैंक अधिकारियों पर किसी भी सरकार और संस्था ने  कोई ध्यान नहीं दिया??  ये दुनियाँ का एक मात्र अजूबा वेतन समझौता था जिस के कारण  अधिकारियों की पेंशन मे अच्छी ख़ासी कमी हो गयी!! मेरा दावा और चुनौती है कि दुनियाँ मे किसी भी "वेतन समझौते" मे श्रमिकों, मजदूरों या कर्मचारियों के वेतन मे कभी कोई कमी की  गयी हो? लेकिन पिछले 10वे और 11वे  द्विपक्षीय वेतन समझौते मे  बैंक के सेवानिवृत्त पेंशनरों की पेंशन मे कमी हुई है!! यही नहीं  समझौते की तारीख से हर पेंशन धारक से औसत 3 से 4 हजार प्रतिमाह की कटौती पेंशनर से की गयी है। ये दुनियाँ का अपने आप मे एक अजूबा इकलौता वेतन सम्झौता था  जो अर्थशास्त्रियों और अर्थशास्त्र के विध्यार्थियों के लिए शोध का विषय हो सकता है,  जिसमे वेतन समझौते के पश्चात बैंककर्मि पेंशनर की पेंशन मे कटौती हुई हो?

आप सभी को ये जान कर और भी हैरानी और आश्चर्य होगा कि बैंक से दो-तीन दशक पूर्व  सेवानिवृत्त "महा प्रबन्धक" को भी आज के चतुर्थ श्रेणी भृत्य और लिपिक से कम पेंशन मिल रही है। कितना दुर्भाग्य है कि दो दशक पूर्व बैंक के सर्वोच्च प्रबंधन वर्ग से रिटायर्ड अधिकारी को आज के सबसे निम्न पदासीन स्टाफ से कम पेंशन मिल रही है!! केंद्र सरकार, हर राज्य सरकार, रिजर्व बैंक एवं अन्य सरकारी उपक्रमों मे समय समय पर  स्टाफ के वेतन पुनिरीक्षण के साथ उनके सेवानिवृत्त स्टाफ की पेंशन मे भी एक अंतराल के बाद पुनिरीक्षण और परिशोधन किया जाता है ताकि उनकी पेंशन भी अद्यतन होती रहे पर हा!! दुर्दैव!! बैंक स्टाफ की पेंशन मे 1966 से आज तक कोई पुनिरीक्षण या परिशोधन नहीं किया गया। सरकार, भारतीय  बैंक संघ और बैंक यूनियन की इस  विसंगति और अन्याय की सजा आज तक बैंक के रिटायर्ड कर्मि भुगतने को मजबूर है! और भविष्य मे भी इन कल्याणकारी सरकारों से असी कोई उम्मीद की किरण भी नज़र नहीं आती!!         

हर लोकतान्त्रिक सरकार अपने नागरिकों के स्वास्थ और चिकित्सा हेतु आवश्यक सेवा एवं अस्पताल रूपी आधारभूत संरचना प्रदान करने का  प्रयत्न और प्रयास करती है। बैंक स्वयं तो अपने स्टाफ को आवश्यक चिकित्सकीय सेवायें इन्शुरेंस कंपनियों के माध्यम से उपलब्ध कराते है पर अपने सेवानिवृत्त स्टाफ को भारतीय बैंक संघ के माध्यम से समूहिक   मेडिकल सेवायें इन्शुरेंस कंपनियों के माध्यम से आवश्यक शुल्क ले कर उपलब्ध कराता  है। इस हेतु सेवनिवृत्त स्टाफ की ओर से भारतीय बैंक संघ देश की समस्त मेडिकल हैल्थ इन्शुरेंस कंपनियों से प्रस्ताव आमंत्रित कर उनमे से किसी  एक कंपनी को देश के एक लाख से ज्यादा रिटायर्ड स्टाफ के मेडिकल हैल्थ इन्शुरेंस की ज़िम्मेदारी देती है। सेवानिवृत्त बैंक स्टाफ भारतीय बैंक संघ के उपर भरोसा और विश्वास कर ये मान कर चलता कि उनके स्वास्थ और सुखमय जीवन हेतु वह सभी को सर्वोत्तम मेडिकल इन्शुरेंस कंपनी  की सेवाए मुहैया करायेगा। अब जरा भारतीय बैंक संघ की कल्याण कारी मेडिकल इन्शुरेंस की बानगी देखिये। मुझे 9 लाख के मेडिकल इन्शुरेंस के लिए रुपए वर्ष 2020-21 मे रुपए 39327/- का भुगतान करना पड़ा। इसी 9 लाख के मेडिकल इन्शुरेंस के लिए 2021-22 मे 39.47% बढ़ा कर  रुपए 54850/-,  एवं इस वर्ष 2022-23 मे ये प्रीमियम  33.06% बढा  कर  राशि रुपए 72988/- कर दी, जिसने सेवानिवृत्त अधिकारियों की कमर ही तोड़ दी।  औसत रूप मे ये राशि लगभग दो महीने की पेंशन के बराबर बैठती है। विश्वास मानिये यदि हम बैंक कर्मियों ने अपने पेट काट कर पीएफ़, ग्रेच्यूटी से मिले फ़ंड पर  मिलने वाली ब्याज की राशि और संस्कारी संताने न होती तो मेडिकल इन्शुरेंस की प्रीमियम के लिए बैंक या साहूकार से उधार लेने की नौबत आन पड़ती!!

ऐसा नहीं है कि मार्केट मे आज के  प्रतिस्पर्द्धी युग मे मेडिकल हैल्थ इन्शुरेंस कंपनियाँ भारतीय बैंक संघ की तरह इतनी महंगी प्रीमियम रुपए 72988/-  ही बसूल कर रही है? संदेह और शंका तब होती है जब   स्टार हैल्थ इन्शुरेंस कंपनी पंजाब नेशनल बैंक के ग्राहकों से रुपए दस लाख के मेडिकल इन्शुरेंस के लिए रुपए कुछ शर्तों के साथ रुपए 30901/- एवं यही स्टार हैल्थ इन्शुरेंस कंपनी बैंक ऑफ बड़ौदा के ग्राहकों से दस लाख के हैल्थ  इन्शुरेंस के लिए रुपए 18299/- बसूलती है। एक ही धनराशि के हैल्थ इन्शुरेंस प्रीमियम मे इतना अंतर शक और शंका पैदा तो करता ही है? क्या सरकार और भारतीय बीमा नियामक एवं विकास प्राधिकरण (IRDA) को इस संबंध मे समुचित छान-बीन और समुचित कार्यवाही नहीं करनी चाहिए? क्या आईबीए, हेल्थ इन्शुरेंस कंपनी और बैंक के इस षड्यंत्रकारी, धूर्त और पाखंड के गठबंधन के चंगुल से बैंक के सेवानिवृत्त कर्मियों को मुक्त नहीं कराना चाहिये?                

विजय सहगल

शनिवार, 15 अक्टूबर 2022

किमर्थं "आदिपुरुष"-चलचित्रस्य विरोधं

"किमर्थं "आदिपुरुष"-चलचित्रस्य विरोधं?"






पिछले दिनों कोई 46 वर्षीय मनोज मुंतशिर द्वारा "आदिपुरुष" नाम से रामचरित मानस पर आधारित भगवान राम की कथा के  फिल्मांकन का 90 सेकंड का एक  छोटा-वृत्तचित्र (teaser) के प्रदर्शिन पर बड़ा  वाद विवाद सुना और देखा गया। 2 अक्टूबर 2022 को प्रदर्शित   इस विवादास्पद वृत्त-चित्र पर इंडिया टीवी के  श्री रजत शर्मा के साथ चर्चा सुनी तब इस फिल्म "आदिपुरुष", फिल्म के पटकथा लेखक, गीतकार मनोज मुंतशिर और निर्देशक ओम राऊत के बारे मे जाना और सुना। फिल्म के पटकथा लेखक और निर्देशक के अनुसार, "इस वृत्त चित्र  मे भगवान राम, श्री हनुमान, सीता माता एवं रावण के स्वरूप को आज के दौर के हिसाब से मोल्ड किया है!!"। अभी तो फिल्म बनी भी नहीं है? उपर से लेखक महोदय का तुर्रा कि "दर्शकों को इस नए जमाने की फिल्म से   पुराने जमाने की कहानी की  तुलना नहीं करना चाहिए!!  सदा शांत और सौम्य रहने वाले भगवान राम के स्वरूप को क्रोधाग्नि मे आवेशित दाढ़ी-मूंछ युक्त पुरुष के रूप मे एवं माता सीता को वनवासी स्वरूप मे आभूषणों से युक्त दिखाना कोई सनातनी व्यक्ति कैसे स्वीकार कर सकता है? रामभक्त  श्री हनुमान एवं राम लक्ष्मण के  शरीर पर चमढ़े का अंगवस्त्र/कवच  पहने, दाढ़ी मूंछ वाले और हनुमान को  बिना पूंछ वाले वानर राज को दिखाना कहाँ तक उचित है?  पटकथा लेखक उन अंग वस्त्रों को  कपड़े का बता कर कहना नहीं भूलते कि हनुमान जी को चमड़े का अंग वस्त्र कैसे पहना सकते है?  मेरा आग्रह है कि आप  हजारों साल से चली आ रही हनुमान जी की  छवि मे को भी कैसे आधुनिक जमाने के रूप मे परिवर्तित कर सकते है? लंकाधिपति असुर के महाप्रतापी शिवभक्त रावण के सिर पर बगैर राजमुकुट और मस्तक पर त्रिपुंड चन्दन के तिलक के साथ चमगादण रूपी वाहन पर आरूढ़ कर  अलाउद्दीन खिलजी नुमा दाढ़ी के रूप मे प्रदर्शन निश्चित ही हमारी भावनाओं को ठेस पहुंचाने और मान्यताओं के विरुद्ध षड्यंत्र है!! उनका ये कहना कि खिलजी त्रिपुंड चन्दन का तिलक लगता था?, वह रुद्राक्ष की माला पहनता था? मेरा कहना  है कि जब लेखक  ने रावण के त्रिपुंड मे, रुद्राक्ष मे कोई परिवर्तन नहीं किया तो उसके चेहरे मे खिलजी नुमा दाढ़ी बना, उसके रूप को विरूपित क्यों किया? रावण, हनुमान, श्री राम  को उसके सनातन रूप मे ही रहने देने मे लेखक को क्या हर्ज़ था। वे क्यों आज की जेनेरेशन की पसंद को ध्यान मे रक्ख फिल्म मे रामायण के पात्रों के साथ छेड़-छाड़ करना चाहते है।  

मनोज मुंतशिर जी की  मानना है कि इस मात्र 90 सेकंड के इस अति सूक्ष्म वृत्त को लोग  3 घंटे की फिल्म की कल्पना कैसे कर सकते है? उनके इस 90 सेकंड के फिल्म टीज़र मे दिखलाए विरूपित ईश्वर स्वरूपों पर समाज के कुछ बौद्धजीवियों का मत है कि इस अल्प वृत्त के आधार पर फिल्म रोकने जैसे कठिन निर्णय लेना उचित नहीं? उन्हे पूरी फिल्म का इंतज़ार करना चाहिये? मिस्टर मनोज मुंतशिर!,! आपको ये नहीं भूलना चाहिये कि हांडी मे बन रहे चावल के एक दाने को ही परख कर पूरी हांडी के चावल की स्थिति का अंदाज़ लगाना हमारी अति प्राचीन परंपरा है!! क्या हमारे आरध्यों, जो  इस फिल्म के मुख्य कथानक और पात्र है, जिनके स्वरूपों मे बदलाव कर  इस नब्बे सेकंड के टीज़र मे दिखाया गया है, कैसे पारंपरिक रूप मे प्रदर्शित करेंगे? स्पष्ट करना चाहिये? आदिकवि बाल्मीकी द्वारा रचित रामायण और गोस्वामी तुलसी द्वारा अनुवादित रामचरित मानस के आधार पर रामलीला मंचन द्वारा  हजारों साल से जो छवि हमारे पूज्य भगवान की गढ़ी गयी उसमे मिस्टर मनोज मुंतशिर और ओम राऊत क्यों बदलाव करना चाहते है? वे क्यों हमारी भावनाओं और श्रद्धा से खिलवाड़ करना चाहते है?? और उस पर ये कुतुर्क देना कि वे भी ब्राह्मण है? और राम उनके भी आराध्य है!!?  आजकल लेखक महोदय ने अपने नाम के साथ मनोज मुंतशिर "शुक्ला"  लिखना भी शुरू कर दिया है!!  मनोज मुंतशिर या ओम राऊत को भगवान श्री राम के भक्त होने  और ब्राह्मण होने से क्या उन्हे हिन्दू धर्म के  आरध्यों के स्वरूपों  एवं कथानकों  मे परिवर्तित करने की स्वच्छंद अनुज्ञप्ति मिल गयी? क्या वे रामायण का लेखन या हमारे आरध्यों के स्वरूपों की छवि मे परिवर्तन आज के आधुनिक युग के  रूप मे करेंगे? उन्हे  अपनी कुत्सित मान्यता और घटिया सोच के मुताविक कुछ भी दिखाने और प्रदर्शित करने की अनुमति कैसे दी जा सकती है? 

देश सहित दुनियाँ मे समय समय पर नेपाल, कम्बोडिया, इंडोनेसिया, तिब्बत, बर्मा, थाईलैंड सहित   अनेकों मनीषयों, चिंतकों और विचारकों ने भगवान राम पर रामायण की रचना कर पांडुलिपियाँ लिखी हैं  पर किसी मे भी उनके मूल स्वरूप मे कोई परिवर्तन नहीं किया है।  

जब बे आज की पीढ़ी की आवश्यकता के अनुरूप रामायण के पात्रों मे परिवर्तन करेंगे तो क्या वे कल के दिन हमारे विभिन्न संस्कारों के विधि विधान और पूजा पद्धतिमे अपनी मनमर्जी से परिवर्तन के कुत्सित कृत्य  को  न्यायोचित ठहराने का प्रयास नहीं करेंगे? क्या वे कल के दिन शास्त्रनुकूल निर्धारित हवन और अन्य पूजा पद्धति जैसे पवित्रीकरणम, देवाहनाम, आचमनम, चन्दन धारणम, शिखा वंदनम, रक्षाश्रोतम आदि मे उच्चरित श्लोकों के उद्धघोष मे परिवर्तन कर छिन्न-भिन्न या नष्ट-भ्रष्ट नहीं करेंगे। उनको ये छूट कदापि नहीं दी जानी चाहिये।    

अगर उन्हे अपनी पटकथा लेखन, निर्देशन और गीत लेखन पर इतना ही अभिमान और अहंकार  है तो क्यों नहीं हॉलीवुड या बॉलीवुड की फिल्मी तर्ज़ पर कोई नई कालजयी रचना या कोई पटकथा लिख अपनी ज्ञान प्रतिभा का परिचय किसी  नवीन विषय पर फिल्मांकन, साहित्य लेखांकन कर देते है? ताकि उन्हे दुनियाँ के श्रेष्ठतम "ऑस्कर पुरुस्कार" जीतने की प्रबल दावेदारी पेश करने सुयोग प्रपट हों!! या कम से कम  भारत के "फिल्मफेयर" परितोषिक प्राप्त करने मे नाम तो आ ही सकता है?  या फिर सिर्फ सनातन धर्म के  ऋषियों  और मनीषियों द्वारा रचित  साहित्यक की चोरी और उसमे स्वच्छंद  परिवर्तन कर, छद्म ख्याति अर्जित करना ही इन लेखक द्वय का उद्देश्य है? आज की पीढ़ी की आवश्यकता के अनुरूप, आदिपुरुष मे भगवान राम सहित हनुमान, माता सीता या रावण के 90 सेकंड के टीज़र से परे अन्य किसी धर्म या संप्रदाय के आरध्यों के  बारे मे श्रीमान मनोज मुंतशिर 90 तो क्या मात्र  09 सेकंड के वृत्त चित्र बनाने का भी  साहस कर सकते है?????

मेरा आरोप  है कि भारतीय लोकतन्त्र मे मिले अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता की आढ़ मे इस तरह की फिल्मों  का फिल्मांकन सिर्फ और सिर्फ अनुचित और अपवित्र सोच के साथ  धनार्जन करना है!! यदि कोई श्रेष्ठ साहित्यकार या कथाकार होता तो कदापि इस तरह के निर्लज्ज, धूर्त और कुटिल कार्य न करता।  मेरा स्पष्ट मत है  हमारे ऋषियों और गुरुओं की पांडुलिपयों मे परिवर्तन कर यदि कोई लेखक या  निर्देशक द्वारा इस तरह के पापार्जन से धनार्जन और भिखारी द्वारा "भिक्षावृत्ती" से एकत्रित धनार्जन   मे कोई अंतर नहीं!! ये दोनों तथाकथित श्रेष्ठी वर्ग "भिक्षा के अन्न को खाने" के प्रयोजन को  श्रीमद्भगवत गीता के अध्याय 2  के श्लोक संख्या 5 मे अर्जुन द्वारा उल्लेखित "अभिप्राय" से भलीभाँति परिचित होंगे जिसके अनुसार-:

"गुरूनहत्वा हि महानुभावान्
श्रेयो भोक्तुं भैक्ष्यमपीह लोके।"
"हत्वार्थकामांस्तु गुरूनिहैव
भुञ्जीय भोगान् रुधिरप्रदिग्धान्॥" ॥2.5 

अर्थात हे  महानुभाव, गुरुजनों को न मारकर इस (मैं) इस लोक में भिक्षा का अन्न खाना भी कल्याणकारक  समझता हूँ।   क्योंकि गुरुजनोंको मारकर भी इस लोक में  रुधिर से सने हुए अर्थ और कामरूप भोगों को तो भोगूँगा!  (कहने का तात्पर्य है कि भिक्षा के अन्न को  खाना गुरु की हत्या के पाप से भी घृणित और निकृष्ट कार्य है!!) 


विजय सहगल      

 

 


शुक्रवार, 7 अक्टूबर 2022

ऊंची हैसियत वाले- श्री जबर सिंह

 

"ऊंची हैसियत वाले- श्री जबर सिंह"





भोपाल मे मेरे  बड़े भाई समान एक मित्र है श्री ए॰ के॰ शर्मा जी,  जब कभी इन से दूरभाष पर बात होती है तो जरा लंबी और देर तक! पिछले दिनों बातचीत मे न जाने कहाँ से  "हैसियत" और "औकात" शब्द पर चर्चा हो आयी। दोनों ही शब्दों का शाब्दिक अर्थ तो  स्थिति और  सामर्थ्य रूप से  तो समान है, सिवाय सकारात्मक और नकारात्मक भावों के!! निश्चित ही ऊंची मान, प्रतिष्ठा, पद और सम्मानारूढ़ व्यक्ति को समाज मे ऊंची हैसियत वाले माननीय  श्रेष्ठ पुरुषों की श्रेणी मे रक्खा  जा सकता  है और रक्खे भी जाते है, पर यदि उनके आचरण उनके सामर्थ्य से भिन्न,  विपरीत या प्रतिकूल हों तो उसके लिये नकारात्मक भाव से युक्त "औकात" शब्द का प्रयोग कर हेय दृष्टि से किया जाना श्रेयष्कर है। इन शब्दों का सटीक उदाहरण गायत्री परिवार के कलेंडर की 15वी तारीख के सद्वाक्य मे देखा जा सकता है। जिसके अनुसार  "उन्हे मत सराहो, जिनने अनीतिपूर्वक सफलता पाई और संपत्ति कमाई!!"

मै अपने बैंक के कुछ उच्चतम पदासीन  "श्रीमान" पुरुषों और महिलाओं  को जनता हूँ जिन्होने अपने पद पर आरूढ़  रहते  हुए बैंक द्वारा   प्रदत्त शक्तियों का दुरुपयोग कर बैंक के हितों के विपरीत अपने निजि स्वार्थ को प्राथमिकता दे, अनैतिक और भ्रष्ट आचरण के माध्यम से संपत्तियाँ अर्जित की है और आज समाज मे एक ऊंची  हैसियत रखते है, पर उनकी ये तथाकथित हैसियत झूठी, काल्पनिक और आभासी है!! सही मानों मे उनकी ये छद्म मान, प्रतिष्ठा रूपी "औकात" एक अधम सड़क छाप "चोर" व्यक्ति  की तरह ही है जो समाज मे "बगुला भक्ति" का "मुखौटा" ओढ़ झूठे आडंबर करते है।

इसके विपरीत अनेक ऐसे श्रेष्ठ व्यक्ति भी बैंक मे पदाशीन है जो छोटे प्राथमिक पदों पर आसीन,  अल्प शिक्षित, सीमित साधनों और साधारण मान प्रतिष्ठा के बावजूद अपने श्रेष्ठ आचरण से न केवल बैंक अपितु मानव समाज  के सामने अपनी  उत्कृष्टतम,  उत्तम और श्रेष्ठतम आचरण से श्रीमान पुरुषों के गृह मे जन्म लेने वाले है और  समाज मे ऊंची "हैसियत" अर्जित करते है, जो  कदाचित ही ईश्वर की कृपा से समाज के आत्मोद्धार के लिये कर्म करने वाले व्यक्ति को प्राप्त होती है। 

ऐसे ही एक उच्च कुलीन श्री जबर सिंह का उल्लेख हमारे मित्र श्री शर्मा जी ने किया जो  सेना से सेवानिवृत्त ओबीसी बैंक मे गार्ड के पद पर नियुक्त हुए थे और  कालांतर मे प्रोन्नति पा कर रिकॉर्ड कीपर (दफ्तरी) के पद पर कार्यरत थे। सेना मे रहकर स्व्भाविक रूप से अनुशासित जबर सिंह अपने बैंकिंग कार्य मे सिद्धहस्त हो अपने कार्य को पूरी निष्ठा और समर्पण से संपादित करते थे। राजस्थान राज्य की एक शाखा मे कार्यरत श्री जबर सिंह,  दिनांक 10 फरवरी 2012 हर रोज़ की तरह अपने कार्य मे रत रहते हुए बैंक के महत्वपूर्ण दस्तावेज़ो और कागजों को जब बैंक के स्ट्रॉंग रूम (वह अति मजबूत, सुरक्षित कक्ष जहां नगदी, लॉकर एवं अन्य महत्वपूर्ण कागज जैसे ड्राफ्ट, चैक बुक, एफ़डीआर आदि रक्खे जाते है) मे रख रहे थे, तभी  एक कागज के बैग जिसमे 2 हीरों के हार, छह सोने की अंगूठियाँ एवं एक जोड़ी कानों के आभूषण थे शाखा प्रबन्धक के सामने लाकर रख दिये। उन्होने बताया शायद कोई ग्राहक लॉकर के संचालन के दौरान उन्हे स्ट्रॉंग रूम मे भूलवश छोड़ गया। उन दिनों उक्त आभूषणों की कीमत लगभग 14-15 लाख थी निश्चित ही आज के समय उन आभूषणों के दाम 30 लाख रुपए से कम कदापि न होंगे। बैंक ने अपने स्तर पर उक्त गहनों को उसके सही ग्राहक तक पहुंचाने के सार्थक प्रयास किये लेकिन दुर्भाग्यवश प्रयास निष्फल रहने के कारण उनको नियम पूर्वक बैंक की सुरक्षित अभिरक्षा मे रक्ख दिया गया।  

इस घटना को जब प्रबन्धक श्री शर्मा जी ने अपने उच्च अधिकारियों को अपनी इस अनुशंसा के साथ भेजा कि श्री जबर सिंह द्वारा अपने कर्तव्य के निष्पादन एवं निर्वहन के दौरान अपनी ईमानदारी, सत्यनिष्ठा और समर्पण के लिये उनको प्रशंसा पत्र, नगद पुरुष्कार एवं बैंक की गृह पत्रिका "आधार" मे घटना का संक्षिप्त विवरण एवं उनकी फोटो प्रकाशित कर उनका उत्साहवर्धन किया जाये!! पर हा!! दुःख और अफसोस!!, प्रबंधन ने उनमे से एक भी सद्कार्य करने की ज़हमत नहीं उठाई!!

मै नहीं जानता कि जबर सिंह कौन है? इनकी क्या शिक्षा, दीक्षा है?? इनकी क्या कद काठी है??? इनका क्या रूप रंग है???? मै उनसे कभी नहीं मिला, पर मै निश्चित दावे के साथ कह सकता हूँ कि मै, इनके संस्कार, इनकी सोच, इनकी सांस्कृति और इनके कुल की शिक्षाओं और मर्यादाओं, माँ-बाप द्वारा दिये गए संस्कारों को स्पष्ट रूप से पढ़ सकता हूँ!! जिनको मैंने इनकी   कर्तव्यनिष्ठा, सत्यनिष्ठा और कर्तव्यपरायणता मे देखा और महसूस किया। प्रबन्धक महोदय द्वारा उनकी सराहना के प्रत्युत्तर मे  श्री जबर सिंह के "ये"  शब्दों थे, "साहब!!, जी ये तो मेरी ड्यूटि थी!"। सौभाग्य देखिये कि एक "छोटे" से पद पर कार्य करने वाले जबर सिंह के मन मे एक क्षण  भी ये विचार नहीं आया कि स्ट्रॉंग रूम मे मिलने वाले 14 लाख रुपए के गहने बाजार मे एक "बड़ी" नहीं "बहुत बड़ी" कीमत रखते है। श्री जबर सिंह के मन मे एक पल के लिये भी ये बदनीयती नहीं आयी कि इन बेशकीमती आभूषणों को अपने पास रक्ख ले? क्योंकि किसी ने उन्हे आभूषणों के बैग के साथ देखा नहीं था? पर इस छोटी हैसियत वाले जबर सिंह के  पारवारिक संस्कार, कुल की मर्यादाएं  और समाज और धर्म की सीख एवं सेना मे सिखायी  गयी  देशभक्ति और अनुशासन  ने उन्हे  ये बड़ी शिक्षा दी थी  कि "ईश्वर सर्वज्ञ"!! है, "वो"! "सर्वव्यापी"!! है, "वो सर्वशक्तिमान"!! है।

उपर उल्लेखित जिन अधिकारियों ने अपने पद और अधिकारों का दुरुपयोग कर अपने  भ्रष्ट आचरण से अनैतिक धन अर्जित किया और बैंक सहित देश और समाज से द्रोह किया!!,  काश! श्री जबर सिंह जैसी  शिक्षा, संस्कार और पारवारिक संस्कार हमारे उन उच्च पदस्थ तथाकथित ऊंची हैसियत? वाले अधिकारियों को भी मिली होती कि ईश्वर सर्वज्ञ!! है, सर्वव्यापी!! है, सर्वशक्तिमान!! है, वो सब कुछ देख रहा है!!    

विजय सहगल